किसान आंदोलन: निर्णायक संघर्ष या एक नई शुरुआत?

भारत में तीन नए कृषि कानून लगभग 20 करोड़ छोटे किसानों और उनके परिवारों के लिए निर्णायक संघर्ष साबित हो रहे हैं। अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर लगभग 80 करोड़ की ग्रामीण आबादी के लिए भी इसके गंभीर निहितार्थ हैं। इसके अलावा, 135 करोड़ की आबादी वाले देश की खाद्य सुरक्षा को लेकर भी कई चिंताएं जताई ज रही हैं। भारत सरकार का कहना है कि ये कानून संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र में एक नई आर्थिक क्रांति की शुरूआत करेंगे। जबकि किसान इनका विरोध कर रहे हैं क्योंकि कॉरपोरेट को बढ़ावा दिये जाने से उन्हें सरकारी मंडियों के खत्म होने और अपनी जमीन खोने का खतरा है।

फिलहाल, भारत सरकार 22 प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का ऐलान कर कृषि उपज मंडियों के जरिये इन्हें किसानों से खरीदने की व्यवस्था करती है। असल में यह व्यवस्था केवल 2-4 फसलों और देश के कुछ ही हिस्सों खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और तेलंगाना आदि में लागू है। बाकी फसलों पर किसानों को एमएसपी नहीं मिल पाता है क्योंकि उनकी सरकारी खरीद की कोई व्यवस्था नहीं है।

मौटे तौर पर सरकार केवल धान और गेहूं की एमएसपी पर खरीद करती है, जिसका इस्तेमाल दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के जरिये आबादी के बड़े हिस्से विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए किया जाता है। इस प्रकार एमएसपी पर खरीद सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मामला भी है।

इस प्रणाली का फायदा यह है कि किसानों को उनकी उपज का सुनिश्चित दाम मिलता है। जबकि गरीब उपभोक्ताओं को बहुत ही रियायती दरों पर अनाज मुहैया कराया जाता है। लेकिन इसकी कमी यह है कि एमएसपी केवल दो मुख्य फसलों और मुख्यत: उत्तर भारत के राज्यों में मिलता है। इसलिए किसान साल-दर-साल गेहूं और धान ही उगाते रहते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में धान और गेहूं को सरकारी प्रोत्साहन ने प्राकृतिक संसाधनों पर बुरा असर डाला है। इससे मिट्टी की सेहत खराब हुई है, भूजल स्तर गिर गया है और फसल विविधता घटकर दो फसलों तक सीमित रह गई है।

कृषि कानूनों पर सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि एमएसपी के परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हुआ है, इसलिए एमएसपी को खत्म कर देना चाहिए। बाजार के दरवाजे सभी खरीदारों के लिए खुले होने चाहिए। दूसरी तरफ किसानों की मांग है कि एमएसपी सभी फसलों के लिए होना चाहिए और सभी फसलों की एमएसपी पर खरीद होनी चाहिए। तभी किसान बाकी फसलें उगाएंगे और फसल विविधता को बढ़ावा मिल सकेगा।

इस प्रकार किसान प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और फसल विविधता को बनाये रखने में सक्षम हो पाएंगे। यह खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के लिए कारगर रहेगा। इतना ही नहीं सरकारी मंडियों के जरिये एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने की जरूरत है, ताकि पूरे देश में किसानों को उपज का उचित दाम मिल सके और उनकी आमदनी बढ़े।

इसके विपरीत, भारत सरकार किसानों को भरोसे में लिए बगैर धीरे-धीरे एमएसपी से हाथ खींचने वाले कृषि कानून लेकर आई। छोटे किसानों को बड़े कॉरपोरेट के साथ अनुबंध का रास्ता दिखाया जा रहा है, जबकि किसानों के पास न तो कॉरपोरेट से मोलभाव की ताकत है और न ही कानून और मार्केटिंग के विशेषज्ञों की टीम। इसलिए किसानों को डर है कि कृषि कानून लागू हो गये तो उनकी आजीविका का एकमात्र सहारा उनकी जमीन छिन जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की सामाजिक-आर्थिक खुशहाली और आजीविका में सुधार की वकालत करते हैं। इनका जोर सबको पोषणयुक्त आहार उपलब्ध कराने पर है। इन लक्ष्यों को पूरा करने में छोटे किसानों की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की अगुवाई वाले ‘इकोसिस्टम एंड इकोनॉमिक्स फॉर बायोडायवर्सिटी फॉर एग्रीकल्चर एंड फूड’ (TEEBAgriFood) जैसे प्रयासों ने मान्यता दी है।

भारत में सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने और खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में किसानों की भूमिका को मजबूत करने की आवश्यकता है। अधिकांश शहरी आबादी और भारतीय नीति निर्माता यह पहचानने में विफल रहे हैं कि छोटे किसान भारत में 41 फीसदी श्रमबल को रोजगार देते हैं। जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर 20 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

वास्तव में, किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और लगभग 80 करोड़ की ग्रामीण आबादी को सहारा देते हैं। 2018 में भारत के किसानों ने लगभग 20 लाख करोड़ रुपये की कृषि उपज पैदा की, जिनमें से अधिकांश के पास 5 एकड़ से कम जमीन है। (भारत में कुल कृषि योग्य भूमि लगभग 40 करोड़ एकड़ है)। भारत में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी ज्यादातर कीटनाशकों और उर्वरकों के लिए दी जाती है जो प्रति एकड़ लगभग 2070 रुपये बैठती है। यह न सिर्फ नाकाफी है बल्कि सभी किसानों को मिल भी नहीं पाती है।

सोचने वाली बात यह है कि यदि देश में छोटे किसान नहीं बचेंगे तो ग्रामीण क्षेत्रों के कामगार कहां जाएगा? गांवों से शहरी क्षेत्रों में पलायन के कारण शहरों पर पहले ही अत्यधिक बोझ है।

यह किसान आंदोलन विश्व समुदाय, वैज्ञानिकों, नेताओं, मशहूर हस्तियों और आम जनता का ध्यान खींचने में कामयाब रहा है। किसानों के विरोध-प्रदर्शन और दृढ़ता ने खेती-किसानी के मुद्दों पर चर्चा का अवसर दिया है जो एक नई शुरुआत का अवसर बन सकता है। अगर किसानों से बातचीत कर सही कदम उठाये जाएं तो छोटे किसानों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।


(डॉ हरपिंदर संधू कृषि अर्थशास्त्री और पर्यावरण विशेषज्ञ हैं जो दक्षिण ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय, एडिलेड में पढ़ाते हैं। यह लेख foodtank.comपर प्रकाशित उनके अंग्रेजी लेख का अनुवाद है। डॉ. संधू से उनके ट्विटर https://twitter.com/001harpinder पर संपर्क कर सकते हैं।)

किसानों के लिए क्यों जरूरी है एमएसपी की गारंटी

भारत में तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की लेकर एक तरफ ऐतिहासिक किसान आंदोलन चल रहा है वहीं एमएसपी पर खरीफ फसलों की खरीद भी जारी है। यह किसान आंदोलन का ही असर है कि खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और कृषि मंत्रालय रोज धान और अन्य फसलों की खरीद के आंकड़े जारी करते हुए एक जताने का दावा कर रहा है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी पर खरीद के प्रति कितनी गंभीर है।  

खैर तीनों कानूनों के लागू होने के बाद सरकार खरीफ 2020-21 में रिकार्ड खरीद का दावा कर रही है। किसान आंदोलन का यह असर है कि मौजूदा खरीद के आंकड़े रोज सरकार जारी कर रही है। एमएसपी पर धान 23 राज्यों में और गेहूं 10 राज्यों में खरीदा जाता है। इस बार सरकारी मंशा 156 लाख से अधिक किसानों से 738 लाख टन तक धान खरीदने की है जिस पर 1.40 लाख करोड़ रुपए व्यय होगे। पिछले साल 627 लाख टन धान खरीदी हुई थी। इस बार 125 लाख गांठ कपास की खरीद का लक्ष्य भी सरकार ने रखा है जिस पर 35,500 करोड़ रुपए व्यय होगा। धान खरीदी के लिए इस बार देश भर में करीब 40 हजार केंद्र खोले गए हैं। फिर भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की बुरी दशा है जहां पखवारे तक भाग दौड़ के बाद भी तमाम किसान अपना धान नहीं बेंच पा रहे हैं और मजबूरी में एक हजार से 1200 रुपए में व्यापारियों को बेच रहे हैं। जबकि धान का एमएसपी 1868 रुपए कामन और 1888 रुपए प्रति कुंतल ए ग्रेड का है। 

सरकार एमएसपी पर देश भर में 15 दिसंबर तक करीब 391 लाख टन धान की खरीदी कर चुकी है। यह पिछले साल इसी अवधि की गयी 319 लाख टन से 22.41 फीसदी ज्यादा है। खरीद में भी सबसे अधिक 202 लाख टन से अधिक का योजना पंजाब का है जो करीब 52 फीसदी का बैठता है। 22 नवंबर तक पंजाब का योगदान करीब 70 फीसदी तक था। अब तक खरीफ में 73,781 करोड़ रुपये से अधिक का धान किसानों से खरीदा गया है और इससे 44.32 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। वही 52.40 करोड़ रुपये एमएसपी मूल्य पर 5089 टन खोपरा खरीद से कर्नाटक और तमिलनाडु के 3,961 किसानों को फायदा हुआ। धान के बाद सबसे अधिक 10.01 लाख किसानों को एमएसपी पर कपास बेचने से हुआ। कपास खरीद पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक राज्यों में जारी है और अब तक 14,894 करोड़ रुपये से अधिक दाम पर 5179479  गांठ कपास खरीदी गयी है। 

पंजाब में सबसे अधिक खरीद की वजह व्यवस्थित तैयारी और मंडियां भी हैं। लेकिन इसी साल देश मे पंजाब से भी अधिक और 129.42 लाख टन गेहूं मध्य प्रदेश ने खरीदा, जबकि उत्तर प्रदेश केवल 35.77 लाख टन खरीदी के साथ चौथे नंबर पर रहा। एमएसपी पर खरीद को लेकर कई राज्यों में दिक्कतें हैं। इसी साल के आरंभ में आंध्र प्रदेश में धान किसानों की समस्याओं को लेकर उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडु को कृषि मंत्री और खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री से हस्तक्षेप करना पड़ा था। बाद में 2 मार्च 2020 को खाद्य मंत्रालय और एफसीआई के अधिकारियों ने उपराष्ट्रपति से मुलाकात कर धान किसानों से समय पर खरीदारी न होने और समय पर भुगतान के मसले पर सफाई दी और समाधान के लिए जल्दी कार्रवाई करने औऱ राज्य सरकार को बकाया राशि का तुरन्‍त भुगतान करने की बात कही।

इस समय चल रहा देशव्यापी किसान आंदोलन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी भी मांग रहा है। किसानों की एमएसपी की मांग को राष्ट्रव्यापी समर्थन मिलते देख भारत सरकार के कई मंत्री एक स्वर में एमएसपी पर खरीद जारी रखने की बात किसान संगठनों को लिख कर देने को तैयार है। लेकिन किसान चाहते हैं कि सरकार ऐसा कानून बनाए जिससे कोई भी उनके उत्पाद को एमएसपी से नीचे न खरीद सके। उसके लिए दंड की व्यवस्था हो। अभी एमएसपी पर खरीद दो दर्जन फसलों तक सीमित है। लेकिन गेहूं औऱ धान को छोड़ दें तो अधिकतर फसलों की खरीद दयनीय दशा में है। और ऐसा नहीं है कि मौजूदा किसान आंदोंलन में ही एमएसपी पर खरीद की चर्चा हो रही है। बीती एक सदी से किसान आंदोलनों के केंद्र में कृषि मूल्य नीति या वाजिब दाम शामिल रहा है। 

भारतीय किसान यूनियन के नेता स्व. महेंद्र सिंह टिकैत अपने जीवनकाल में कृषि उत्पादों के मूल्य 1967 को आधार वर्ष पर तय करने की मांग करते रहे। सारे प्रमुख किसान संगठन भी इस मांग से सहमत थे। अस्सी के दशक के बाद कोई ऐसा  किसान आंदोलन नहीं हुआ जिसमें फसलों का वाजिब दाम न शामिल रहा हो। खुद संसद, संसदीय समितियों और विधान सभाओं में इस पर व्यापक चर्चाएं हुई हैं। किसान संगठन चाहते हैं कि उनका उत्पाद सरकार खरीदे या निजी क्षेत्र लेकिन सही दाम मिलेगा तो उनके जीवन स्तर पर असर पड़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था पर भी।

भारत के किसानों ने कठिन चुनौतियों और अपनी मेहनत से कम उत्पादकता के बावजूद भारत को चीन के बाद सबसे बडा फल औऱ सब्जी उत्पादक बना दिया है। चीन और अमेरिका के बाद सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक देश भारत ही है। पांच दशको में हमारा गेहूं उत्पादन 9 गुना और धान उत्पादन पांच गुणा से ज्यादा बढ़ा है। लेकिन खेती की लागत भी लगातार बढी है, जबकि उनके उत्पादों के दाम नहीं मिलते। जैसे ही किसान की फसल कटने वाली होती है, दाम गिरने लगते हैं। मौजूदा तीन कृषि कानूनो के बाद अगर एमएसपी की गारंटी बिना किसान बाजार के हवाले हो गया तो बड़े कारोबारी किसानों और उपभोक्ताओं दोनों की क्या दशा करेंगे, यह बात किसान समझ रहा है। 

सरकारी स्तर पर यह दावा हो रहा है कि पीएम-किसान सम्मान निधि जैसी योजना जो सरकार शुरू कर सकती है वह किसानों का अहित कैसे कर सकती है। भूमि जोतों के आधार पर साढे 14 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि के दायरे में लाने की बात सरकार ने की थी लेकिन अब तक 10 करोड़ किसानों के खाते में सरकार ने एक लाख करोड़ रूपये पहुंचाया है। किसानों के इस आंकड़े के हिसाब से एमएसपी पर सरकारी खरीद को देखेंगे तो पता चलेगा कि कितने कम किसानो से एमएसपी पर उनकी उपज खरीदी जाती है। सरकारी एकाधिकार के दौर में अगर एमएसपी पर खरीद चंद राज्यों और दो फसलों तक सीमित है तो निजी क्षेत्र के दबदबे के बाद बिना गारंटी के किसान की क्या हालत होगी। 

संसद के मानसून सत्र में भी यह विषय उठा था तो कृषि मंत्री नरेन्द्र  सिंह तोमर ने दावा किया था कि अब किसानों को उपज बेचने के प्रतिबंधों से मुक्ति के साथ अधिक विकल्प मिलेगा। कृषि मंडियों के बाहर एमएसपी से ऊंचे दामों पर खरीद होगी। उसी दौरान सांसदों ने मांग की थी कि विधेयक में यह गारंटी शामिल की जाये कि जो कारोबारी मंडियों से बाहर एमएसपी से कम दाम पर खरीदेगा वह दंडित होगा। लेकिन सरकार ने इसे नजरंदाज किया। जिससे किसानों के मन में संदेह का और बीजारोपण हुआ। यही नहीं हाल में हरियाणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में अनाज बिक्री के लिए आने वाले दूसरे राज्यों के किसानों को रोकने और दंडित करने की बात तक की। अगर किसान अपनी मर्जी का मालिक है तो ऐसे बंधन क्यों। 

सरकार ने इसी साल खरीफ में मूल्य समर्थन योजना  के तहत 48.11 लाख टन दलहन और तिलहन की खरीद को मंजूरी दी। लेकिन 15 दिसंबर 2020 तक 1.72 लाख टन से अधिक दलहन खरीद हुई जिसका एमएसपी मूल्य 924.06 करोड़ रुपये है। इस खरीद से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के 96,028 किसानों को लाभ मिला। दलहन और तिलहन खरीद को बढ़ावा देने के लिए 2018 में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के तहत खास तवज्जो दी गयी। लेकिन इसके दिशानिर्देशों में उत्पादित 75 फीसदी फसल खरीद के दायरे से बाहर कर दी गयी। 2020-21 में राजस्थान में कुल 22.07 चना की खरीद हुई जबकि उपचुनावों के नाते मध्य प्रदेश में 27 फीसदी तक चना खरीदी हुई। मूंग खरीद न होने के कारण राजस्थान के किसानों को करीब 98 करोड़ का घाटा उठाना पड़ा। इसे लेकर किसानों ने आंदोलन भी किया और किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट ने केंद्र सरकार को पत्र लिख कर गुहार भी लगायी लेकिन हालत नहीं सुधरी। 

कोरोना संकट में खाद्य सुरक्षा के हित में किसानों ने खरीफ बुवाई का क्षेत्र 316 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा दिया जो पिछले पांच सालों के दौरान औसतन 187 लाख हेक्टेयर था। लेकिन एमएसपी में आशाजनक बढोत्तरी नहीं की गयी। भारतीय किसान यूनियन ने खरीफ एमएसपी घोषणा के साथ ही यह कहते हुए विरोध जताया था कि पिछले पांच वर्षों में इसकी सबसे कम मूल्य वृद्धि रही। धान का एमएससी 2016-17 में 4.3 फीसदी, 2017-18 में 5.4, 2018-19 में 12.9 और 2019-20 में 3.71 फीसदी बढ़ा था जबकि 2020-21 में सबसे कम 2.92 फीसदी बढ़ा। 

कृषि मूल्य नीति और मंडियो को लेकर किसानों को तमाम शिकायतें है।  मोदी सरकार ने स्वामिनाथन आयोग की सिफारिश के तहत एमएसपी तय करने का वादा किया था। लेकिन इसे आधा अधूरा माना गया। तमाम कमजोरियों के बाद भी सरकारी मंडियां बाजार की तुलना में किसानों के हितों की अधिक रक्षा करती हैं। अगर यह व्यवस्था भी अर्थहीन हो गयीं तो उत्तर भारत का किसान अपना गेहूं या चावल हैदराबाद या भुवनेश्वर के बाजार में बेचने कैसे जाएगा। यह काम बड़ा कारोबारी ही करेगा। बेशक किसान के पास कई विकल्प होने चाहिए। लेकिन यह छोटे किसानों के संदर्भ में 22 हजार ग्रामीण मंडियों या हाट बाजार के विकास से निकल सकते हैं। अधिकतर छोटे किसान अपने गांव में ही छोटे व्यापारियों को उपज बेचते हैं, जिस पर कोई रोक नहीं है। रोक इस पर लगनी चाहिए कि सरकार जो एमएसपी घोषित करती है बाजार में इससे कम में कोई कारोबारी न खरीदे। औद्योगिक औऱ दूसरे उत्पादों को अधिकतम कीमत वसूलने का लाइसेंस देने वाली सरकार किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी क्यों नहीं दे सकती।

राज्य सभा में 19 जुलाई, 2019 को गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्प के तहत सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर ने किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए संवैधानिक दर्जे वाले एक राष्ट्रीय किसान आयोग की स्थापना की मांग की थी जिसे व्यापक समर्थन मिला। उनका कहना था कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि फसलों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदा या बेचा न जाए और इसका उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। लेकिन अब यह मांग किसान आंदोलन की व्यापक मांग बन गयी है। जमीनी हकीकत यही है कि अगर इस व्यवस्था में किसानो के लिए एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी नहीं दी गयी तो सुधार किसानों को गहरी खाई में धकेल देंगे।

कृषि अध्यादेशों के खिलाफ किसानों ने ट्विटर और ट्रैक्टर को बनाया हथियार

खेती-किसानी को प्रभावित करने वाले केंद्र सरकार के तीन अध्यादेशों के खिलाफ हरियाणा-पंजाब सहित कई राज्यों में किसानों ने विरोध का बिगुल बजा दिया है। सोमवार को हरियाणा-पंजाब के हजारों किसान ट्रैक्टर लेकर सड़कों पर उतर आए। किसानों का यह विरोध-प्रदर्शन की ट्विटर पर भी खूब चर्चाएं बटोर रहा है।

किसानों का यह विरोध फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था को कमजोर या खत्म करने की आशंका से उपजा है। पिछले महीने केंद्र सरकार ने किसानों को कहीं भी, किसी को भी उपज बेचने की छूट देने सहित कई मंडी सुधारों को ऐलान करते हुए तीन अध्यादेश जारी किए थे।

ये अध्यादेश हैं
– कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश, 2020
– मूल्‍य आश्‍वासन पर किसान (बंदोबस्ती और सुरक्षा) समझौता और कृषि सेवा अध्‍यादेश – 2020
– आवश्यक वस्तु (संशोधन)अध्यादेश, 2020

एक राष्ट्र-एक बाजार नारे के साथ लाए गए इन अध्यादेशों के जरिए सरकार किसानों से सीधी खरीद और कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा देना चाहती है। इसके अलावा अनाज, दालों, आलू, प्याज, टमाटर आदि को स्टॉक लिमिट के दायरे से बाहर निकालने का फैसला किया गया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन अध्यादेशों को किसानों के हित में ऐतिहासिक कदम बताते हुए कृषि क्षेत्र को अनलॉक करने का दावा किया है। केंद्र सरकार ने राज्यों के बीच कृषि व्यापार की कई अड़चनें दूर कर दी हैं। मंडी के बाहर उपज की खरीद-फरोख्त पर मंडी टैक्स भी नहीं देना पड़ेगा।

लेकिन सवाल ये है कि सरकार के इन दावों के बावजूद किसान सड़कों पर उतरने पर क्यों मजबूर हैं। किसान एक्टिविस्ट रमनदीप सिंह मान के अनुसार, किसानों में भय है कि कृषि अध्यादेशों के जरिए सरकार समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद की व्यवस्था को खत्म करने जा रही है। यह ट्रैक्टर मार्च किसानों के लिए चेतावनी है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य से किसी तरह की छेड़छाड़ न की जाए।

कृषि अध्यादेशों के खिलाफ विरोध के सबसे ज्यादा स्वर पंजाब से उठे हैं जहां कांग्रेस की सरकार है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह कृषि अध्यादेशों को किसान विरोधी बताकर केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे हैं। इस मुद्दे पर पंजाब की राजनीति गरमा गई है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के विधायक कुलतार सिंह खुद ट्रैक्टर चलाकर विरोध-प्रदर्शन में शामिल हुए। भाजपा के सहयोगी अकाली दल ने किसानों के विरोध-प्रदर्शन का समर्थन तो नहीं किया लेकिन एमएसपी से किसी तरह की छेड़छाड़ न होने देने की बात जरूर कही है।

कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा की मानें तो इन तीन अध्यादेशों के साथ एक चौथा अध्यादेश लाकर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का कानूनी हक दिलाने की जरूरत है। उनका कहना है कि जब सरकार मानती है कि किसानों को कहीं भी बेचने की छूट मिलने से बेहतर दाम मिलेगा तो एमएसपी को कानूनी अधिकार बनाने में क्या दिक्कत है? एमएसपी से नीचे किसी भी खरीद की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

खेती पर कॉरपोरेट के कब्जे का डर

कृषि से जुड़े तीनों अध्यादेशों से किसानों को कितना फायदा या नुकसान होगा, इस पर बहस जारी है। सरकार का दावा है कि मुक्त बाजार मिलने से किसान के पास उपज बेचने के ज्यादा विकल्प होंगे, जिससे बिचौलियों की भूमिका घटेगी। इसका लाभ किसानों को मिलेगा। भंडारण की पाबंदियां हटने से कृषि से जुड़े बुनियादी ढांचे में निवेश जुटाने में मदद मिलेगी।

लेकिन कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग को बढ़ावा मिलने से खेती पर कॉरपोरेट के कब्जे का डर भी है।

मंडियों के बाहर खरीद-फरोख्त की छूट मिलने से राज्यों को राजस्व का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए पंजाब, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य इन अध्यादेशों का विरोध का रहे हैं। प्राइवेट मंडियों और किसान से सीधी खरीद की छूट मिलने से मंडियों का वर्चस्व टूट सकता है। इसलिए कई राज्यों में कृषि उपज के व्यापारी यानी आढ़तिये भी कृषि अध्यादेशों का विरोध कर रहे हैं।

कई किसान संगठन केंद्र के इन अध्यादेशों को खेती के कॉरपोरेटाइजेशन के तौर पर देख रहे हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह का कहना है कि ये अध्यादेश सुधारों के नाम पर किसानों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं। इनसे न तो किसानों को सशक्त करेंगे और न ही उनकी आमदनी बढ़ा पाएंगे। इनमें कहीं भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) या स्वामीनाथम कमीशन के फॉर्मूले (सी2 के साथ 50 फीसदी मार्जिन) का जिक्र नहीं है।

यूरोप से मिला ट्रैक्टर मार्च का आइडिया

हरियाणा और पंजाब के अलावा राजस्थान और मध्यप्रदेश से भी किसानों के ट्रैक्टर मार्च निकालने की खबरें आ रही हैं। सोशल मीडिया के जरिए शुरू हुई यह मुहिम किसी बड़े संगठन के बिना ही दूर-दराज के गांवों तक फैल रही है। किसानों को ट्रैक्टर मार्च का आइडिया कुछ दिनों पहले नीदरलैंड्स में हुए इसी तरह के विरोध-प्रदर्शन से आया था। फिर सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी गूंज हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और मध्यप्रदेश तक पहुंच गई।

गेहूं खरीद में मध्यप्रदेश नंबर वन, पंजाब को पीछे छोड़ा

मध्य प्रदेश ने चालू रबी सीजन में 127.67 लाख टन गेहूं की खरीद कर पंजाब को पीछे छोड़ दिया है। अब मध्यप्रदेश देश में सबसे ज्यादा गेहूं खरीद करने वाला राज्य बन गया है। पंजाब में इस साल 127.62 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। बरसों से सबसे ज्यादा गेहूं खरीद पंजाब की उपलब्धि रही है। लेकिन इस बार एमपी ने बाजी मार ली।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस उपलब्धि के लिए प्रदेश के किसानों और मंडी अधिकारियों को बधाई दी है।

मध्यप्रदेश की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि राज्य में पिछले साल के मुकाबले 74 फीसदी ज्यादा गेहूं खरीद हुई, जो देश की कुल गेहूं खरीद का करीब एक तिहाई है। गेहूं खरीद के मामले में पंजाब का प्रदर्शन भी काबिलेतारीफ है। लेकिन देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में सिर्फ 27.5 लाख टन गेहूं खरीदा गया है, जो तय लक्ष्य का सिर्फ 50 फीसदी है। राजस्थान और गुजरात से भी गेहूं की बहुत कम खरीद हुई है।

गेहूं की सरकारी खरीद के चलते किसानों को उपज का सही दाम मिलना संभव हुआ है। लॉकडाउन के दौरान जहां तमाम काम-धंधे ठप पड़ गए थे, वहीं कृषि मंडियों और सरकारी खरीद की व्यवस्था ने गेहूं किसानों को नुकसान पहुंचने से बचाया है। प्याज-टमाटर जैसी जिन फसलों में एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था नहीं है, वहां फसलें कौड़ियों के भाव बिक रही हैं।

इस साल देश में कुल 386 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। यानी इतनी उपज पैदा करने वाले किसान लॉकडाउन के बावजूद समर्थन मूल्य पर फसल बेचने में कामयाब रहे हैं। चालू रबी के दौरान देश में 407 लाख टन गेहूं खरीद का लक्ष्य तय किया गया था, जबकि पिछले रबी सीजन में 341.32 लाख टन गेहूं खरीद हुई थी।

मध्यप्रदेश में गेहूं की खरीद बढ़ने के पीछे सरकारी प्रयासों का बड़ा हाथ है। इस बार राज्य में खरीद केंद्रों की संख्या 3545 से बढ़ाकर 4529 की गई थी। रिकॉर्ड गेहूं खरीद के चलते राज्य में 14 लाख किसानों के खाते में करीब 20 हजार करोड़ रुपये की धनराशि पहुंच चुकी है।

 

 

देश में ‘चीनी कम’ फिर भी क्यों नहीं बढ़े गन्ने के दाम?

पिछले दिनों पूरे उत्तर प्रदेश में जगह-जगह गन्ना किसानों ने प्रदर्शन कर गन्ने की होली जलाई। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद तीन वर्षों में गन्ने के भाव में केवल 2017-18 में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी। उत्तर प्रदेश में गन्ने का एसएपी यानी राज्य परामर्शित मूल्य पिछले दो सालों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। इस साल गन्ना किसानों को सरकार से गन्ने का भाव बढ़ने की बड़ी उम्मीद थी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जबकि पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और विशाल चीनी-भंडार से परेशान चीनी उद्योग की स्थिति इस साल सुधर गई है। इस कारण सभी आर्थिक तर्क भी भाव बढ़ाने के पक्ष में थे। इस साल देश में चीनी उत्पादन कम होने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग के कारण चीनी उद्योग को तो पूरी राहत मिलेगी, परन्तु गन्ने के रेट ना बढ़ने से गन्ना किसानों की स्थिति और बिगड़ेगी।

2018-19 में देश में चीनी का आरंभिक भंडार (ओपनिंग स्टॉक) 104 लाख टन, उत्पादन 332 लाख टन, घरेलू खपत 255 लाख टन और निर्यात 38 लाख टन रहा। इस प्रकार वर्तमान चीनी वर्ष में चीनी का प्रारंभिक भंडार 143 लाख टन है। अतः हमारी लगभग सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में रखी हुई है। कुछ महीने पहले तक यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति थी जिसको देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए थे।

इस्मा (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्ष के 332 लाख टन के मुकाबले घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है, जो केवल घरेलू बाज़ार की खपत के लिए ही पर्याप्त होगा। इस गन्ना पेराई सत्र की पहली तिमाही अक्टूबर से दिसंबर 2019 के बीच चीनी का उत्पादन पिछले साल की इस अवधि के मुकाबले 30 प्रतिशत घटकर 78 लाख टन रह गया है। पिछले साल इस अवधि में देश में चीनी का उत्पादन 112 लाख टन था।

2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1756 लाख टन और मांग 1876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी उत्पादन मांग से 120 लाख टन कम होने का अनुमान है। इस कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की अच्छी मांग होगी, जिसकी आपूर्ति भारत कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी उत्पादन में संभावित कमी से हमारे पहाड़ से चीनी भंडार अचानक अच्छी खबर में बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग का इस स्थिति में सबसे ज्यादा लाभ होगा क्योंकि पिछले साल की तरह इस साल भी चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश ही रहेगा, जहां 120 लाख टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों ने 33,048 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति चीनी मिलों में की थी। परन्तु 31 दिसंबर 2019 तक इसमें से 2,163 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया है। चालू पेराई सत्र में तीन महीने बीतने के बाद भी 31 दिसंबर तक इस सीज़न का केवल 3,492 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान हुआ है, जबकि किसान लगभग 10,500 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों को दे चुके हैं। इसके अलावा विलम्बित भुगतान के लिए देय ब्याज़ का आंकड़ा भी 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इस तरह 31 दिसंबर तक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का चीनी मिलों के ऊपर 11,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान बकाया है।

इस साल गन्ना मूल्य निर्धारण से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया था। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी थी। किसानों का कहना है कि दो सालों से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाये गए हैं जबकि लागत काफी बढ़ गई है। गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर के अनुसार गन्ने की औसत उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल आ रही है। सरकार के लागत के डेढ़ गुना मूल्य देने के वायदे को भूल भी जाएं तो भी बदली परिस्थिति में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए था। यदि पिछले तीन सालों में 10 प्रतिशत की मामूली दर से भी वृद्धि की जाती तो भी इस वर्ष 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव अपने आप हो जाता।

वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़ आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं। इसके अलावा सह-उत्पादों से एथनॉल, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिये इस्तेमाल करती हैं। इस तरह चीनी मिलें अपने बैंकों के ब्याज के खर्चे की बचत भी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को चीनी बफर स्टॉक, एथनॉल क्षमता बनाने और बढ़ाने, चीनी निर्यात के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए हैं। इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया और न ही सरकार ने गन्ने का भाव बढ़ाया।

महंगाई के प्रभाव और बढ़ती लागत के कारण गन्ने का वास्तविक दाम घट गया है। बदली परिस्थितियों में कम चीनी उत्पादन और अच्छी अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए सरकार को लाभकारी गन्ना मूल्य दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए था। परन्तु इस स्थिति का सारा लाभ अब चीनी मिलें ही उठाएंगी और किसानों के हाथ मायूसी के अलावा कुछ नहीं लगेगा। सरकार अब भी अलग से बोनस देकर गन्ना किसानों को बदहाली से बचा सकती है।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

किसानों के साथ धोखा? कम आंकी जा रही है उपज की लागत

इन बातों पर यकीन करना मुश्किल है! लेकिन आजकल बहुत कुछ मुमकिन है। पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन क्षेत्रों में क्रांतिकारी कारनामे हुए हैं, उनमें आंकड़ेबाजी अहम है। केंद्र सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करें तो पिछले पांच वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी भले न हुई हो, लेकिन खेती की लागत बढ़ने कम हो गई है। लागत में इस ठहराव यानी कमतर लागत के आधार पर ही केंद्र सरकार खरीफ फसलों के एमएसपी में भारी बढ़ोतरी का दावा कर रही है। कई अखबारों ने इसे बजट से पहले किसानों को सरकार का तोहफा करार दिया। कुछ लोगों ने मास्टर स्ट्रोक भी बताया ही होगा।

दावा और हकीकत

खुद केंद्र सरकार का दावा है कि खरीफ सीजन 2019-20 के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी से किसानों को लागत पर 50 से लेकर 85 फीसदी का लाभ मिलेगा। सरकार लागत पर डेढ़ गुना मुनाफा देने के वादे से काफी आगे निकल चुकी है।

एमएसपी की मामूली बढ़ोतरी को सरकार का तोहफा बताने की होड़

 

अब जरा इन दावों की हकीकत भी जान लीजिए। सामान्य किस्म के धान का एमएसपी इस साल सिर्फ 65 रुपये प्रति कुंतल बढ़ा है जो 4 फीसदी से भी कम है। लेकिन दावा है कि इस मामूली बढ़ोतरी के बावजूद किसानों को लागत पर 50 फीसदी रिटर्न मिलेगा। पता है कैसे? जिस लागत के आधार पर सरकार यह दावा कर रही है वह लागत पिछले पांच साल में सिर्फ 23 फीसदी बढ़ी मानी गई है। जबकि धान की खेती की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 114 फीसदी बढ़ी थी। मतलब, सरकारी अर्थशास्त्रियों ने 2014 के बाद धान उत्पादन की लागत को बढ़ने ही नहीं दिया। लागत बढ़ाएंगे तो एमएसपी भी ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा। लागत को ही कम से कम रखें तो एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी भी ज्यादा दिखेगी। सीधा गणित है।

खरीफ फसलों की अनुमानित लागत (रुपये प्रति कुंतल में )

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ नीति रिपोर्ट  https://cacp.dacnet.nic.in/KeyBullets.aspx?pid=39

 

सरकारी अर्थशास्त्री अपनी पर आ जाएं तो आंकड़ों को अपने पक्ष में घुमाना उनके बाएं हाथ का खेल है। मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम इस मुद्दे पर पूरा रिसर्च पेपर लिख चुके हैं कि हाल के वर्षों में भारत सरकार ने कैसे जीडीपी की ग्रोथ रेट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन किसानों के मामले में उल्टा हुआ। सरकारी अर्थशास्त्री किसानों की लागत बढ़ने ही नहीं दे रहे हैं। जमीन पर भले कितनी ही महंगाई क्यों ना हो, कागजों में खेती फायदे का सौदा साबित की जा रही है।

लागत पर ब्रेक और डेढ़ गुना दाम का दावा

फसलों का एमएसपी कितना होना चाहिए और उपज की लागत क्या आंकी जाए? इस हिसाब-किताब के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग नाम की एक सरकारी संस्था है जो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत काम करती है। इसमें दिग्गज कृषि अर्थशास्त्री बैठकर तय करते हैं कि किस उपज पर कितनी लागत आती है। विभिन्न राज्यों से कृषि लागत के आंकड़े जुटाए जाते हैं। महंगाई, आयात-निर्यात, वैश्विक बाजार और मौजूदा भंडार को देखते हुए फसलों के एमएसपी तय किए जाते हैं।

2009-10 खरीफ सीजन के लिए सीएसीपी ने तुहर यानी अरहर दाल की वास्तविक उत्पादन लागत (ए2 + एफएल) 1181 रुपये प्रति कुंतल आंकी थी। (ए2 + एफएल) वह लागत है जिसमें खेती पर आने वाले तमाम वास्तविक खर्च जैसे बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनरी, ईंधन का खर्च और खेती में लगे कृषक परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है।

इस प्रकार 2009-10 में तुहर उत्पादन की जो लागत 1181 रुपये प्रति कुंतल थी, वह 2014-15 तक बढ़कर 3105 रुपये हो गई। यानी पांच साल में तुहर की लागत 163 फीसदी या ढाई गुना से ज्यादा बढ़ी। ताज्जुब की बात है कि 2014 के बाद तुहर की लागत बढ़ने का सिलसिला थम-सा गया। 2014-15 से 2019-20 के बीच पांच वर्षों में तुहर की लागत सिर्फ 17 फीसदी बढ़कर 3636 रुपये प्रति कुंतल तक ही पहुंची। कहां पहले पांच वर्षों में 163 फीसदी की वृद्धि और कहां अब पांच साल में केवल 17 फीसदी की बढ़ोतरी? है ना कमाल! एक ही फसल, एक ही देश लेकिन लागत बढ़ती इतनी कम कैसे हो गई। यह सवाल तो उठेगा।

बड़ा सवाल

यह शोध का विषय है कि जिन फसलों की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ी थी, 2014 के बाद उनकी लागत 20-30 फीसदी ही क्यों बढ़ी है? यह सिर्फ अर्थशास्त्रियों का कारनामा है या फिर इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति भी सक्रिय है?

खुद सीएसीपी के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों की लागत 66 से 163 फीसदी तक बढ़ी थी। धान की लागत 114 फीसदी तो ज्वार की लागत 122 फीसदी बढ़ी थी। लेकिन 2014-15 के बाद के पांच वर्षों में खरीफ फसलों की लागत 5 से 43 फीसदी ही बढ़ी है। इस दौरान सबसे ज्यादा 43 फीसदी लागत सोयाबीन की बढ़ी जबकि सबसे कम 5 फीसदी लागत मूंगफली की बढ़ी है। यहां सबसे बड़ा सवालिया निशान खेती की लागत और एमएसपी तय करने की सरकारी प्रक्रिया पर है, जिसमें किसानों की हिस्सेदारी नाममात्र की रहती है।

किसानों पर दोहरी मार, फार्मूला और लागत का खेल

सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देना का शॉर्टकट ढूंढ़ लिया है। जब कमतर लागत को आधार बनाया जाएगा तो एमएसपी में थोड़ी बढ़ोतरी भी डेढ़ गुना बताई जा सकती है। यह बहस तब भी खड़ी हुई थी जब केंद्र सरकार ने समग्र लागत (सी2), जिसमें किसान की अपनी जमीन का अनुमानित किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है, की बजाय वास्तविक लागत (ए2 + एफएल) के आधार पर डे़ढ़ गुना एमएसपी देने का वादा किया था। पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि जिस कमतर लागत को सरकार आधार मान रही है, उनमें भी साल दर साल बेहद कम बढ़ोतरी आंकी जा रही है। यह किसानों पर दोहरी मार है।

जाहिर है कमतर लागत के आधार पर ही सरकार एमएसपी में बढ़ोतरी की वाहवाही बटोरना चाहती है। जबकि तथ्य यह है कि 2014 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों के एमएसपी 2014 के बाद पांच वर्षों के मुकाबले ज्यादा बढ़े थे। 2014 से 2019 के बीच केवल बाजरा, रागी, नाइजर बीज और कपास (लंबा रेशा) के एमएसपी में पहले 5 सालों के मुकाबले अधिक वृद्धि हुई है। जबकि 2009 से 2014 के बीच मुख्य खरीफ फसलों जैसे – धान, ज्वार, मक्का, तुहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, कपास और सोयाबीन के एमएसपी पिछले पांच वर्षों के मुकाबले अधिक बढ़े थे। खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के लिहाज से डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल पिछले पांच वर्षों से कमतर नहीं बल्कि बेहतर ही था।

खरीफ फसलों के एमएसपी में 1 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी

इस साल खरीफ फसलों के एमएसपी में जो मामूली बढ़ोतरी हुई है, उसे छिपा पाना मुश्किल है। खरीफ सीजन 2019-20 के लिए उपज एमएसपी में 1.1 फीसदी से लेकर 9.1 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। सबसे कम 1.1 फीसदी यानी 75 रुपये का इजाफा मूंग के एमएसपी में हुआ है। जबकि सबसे अधिक 9.1 फीसदी यानी 311 रुपये की वृद्धि सोयाबीन के एमएसपी में की गई है। खरीफ की प्रमुख फसल धान का एमएसपी सिर्फ 65 रुपये यानी 3.7 फीसदी ही बढ़ा है। कपास के एमएसपी में भी 1.8 – 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है। किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने और आमदनी दोगुनी के सरकारी दावे की फिलहाल यही असलियत है।

खरीफ फसलों के एमएसपी  (रुपये प्रति कुंतल)

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ रिपोर्ट, सीएसीपी के आंकड़े https://cacp.dacnet.nic.in/ViewContents.aspx?Input=1&PageId=36&KeyId=0 और पीआईबी की विज्ञप्ति http://pib.nic.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1576842

 

किसानों को उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से निकली यह बात 2014 में भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र तक पहुंच गई थी। मोदी सरकार ने सैद्धांतिक रूप से डेढ़ गुना दाम की नीति को अपनाया था। मगर इस पर अमल करने के तरीके में कई झोल हैं।

जिस लागत के आधार पर डेढ़ गुना दाम दिलना का दावा किया जा रहा है कि सरकार उस लागत को ही कम आंक रही है। इसलिए किसान के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है। जबकि लगातार सूखे और घाटे की मार झेल रहे किसानों को आंकड़ों की इस बाजीगर के बजाय कारगर राहत और ईमानदार कोशिशों की दरकार है।

 

कहीं चना तो कहीं सरसों एमएसपी के नीचे बेचने को मजबूर हैं किसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों को गिनाते हुए यह बताना नहीं भूलती कि उसने किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाकर लागत का डेढ़ गुना कर दिया है। सरकार के मंत्री और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लोग भी अक्सर ये दावे करते दिखते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सरकार जो एमएसपी तय कर रही है, उस पर किसानों का उत्पाद खरीदे जाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इस वजह से मंडियों में व्यापारी किसानों से मनमाने भाव पर उनके उत्पादों को खरीद रहे हैं।

इसे दो उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है। अभी चना देश की विभिन्न मंडियों में आना शुरू हुआ है। चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने 4,620 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन इस मूल्य पर सरकार ने चने की खरीद शुरू नहीं की है।

अब जाहिर है कि सरकार खरीद नहीं करेगी तो मंडियों में किसानों को व्यापारियों के तय किए गए दर पर चना बेचना पड़ेगा। यही हो रहा है। मध्य प्रदेश की मंडियों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां चना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले ही 4,620 रुपये प्रति क्विंटल का हो लेकिन किसानों को 3,800 रुपये प्रति क्विंटल का दर हासिल करने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। वहां यह दर भी जिन्हें मिल जा रहा है, वे खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं। किसानों को औसतन प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये का नुकसान हो रहा है।

अब इसके मुकाबले बाजार भाव देख लीजिए। इससे पता चलेगा कि किसानों को क्या दर मिल रहा है और आम उपभोक्ताओं को कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। जिस दिन मध्य प्रदेश की मंडियों से यह खबर आई कि वहां चना 3,800 रुपये प्रति क्विंटल यानी 38 रुपये प्रति किलो बेचने के लिए किसाना विवश हैं, उसी दिन दिल्ली में चना का खुदरा भाव पता करने पर यह बात सामने आई कि आम दिल्लीवासियों को एक किलो चने के लिए 105 रुपये से लेकर 115 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों से जिस भाव पर चना खरीदा जा रहा है, उससे तीन गुना अधिक कीमत पर उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि बीच का जो अंतर है, वह कौन खा रहा है?

सरसों का उत्पादन करने वाले किसानों को भी एमएसपी नहीं मिल रही है। सरसों के पैदावार के लिहाज से राजस्थान का देश में बेहद अहम स्थान है। यहां सरसों की पैदावार मंडियों में आने लगी है। सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

लेकिन राजस्थान के श्रीगंगानगर मंडी से यह खबर आ रही है कि 4,200 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी के मुकाबले उन्हें सिर्फ 3,400 रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 3,600 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो किसानों को एमएसपी के मुकाबले 600 से 800 रुपये कम में एक क्विंटल सरसों बेचना पड़ रहा है।

इन स्थितियों को देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ एमएसपी की घोषणा कर देना भर पर्याप्त नहीं है बल्कि इसे लागू कराने का एक उपयुक्त तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है। तब ही बढ़ी हुई एमएसपी का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच पाएगा।

मध्य प्रदेश : ना भाव, ना भावांतर

मध्य प्रदेश में सोयाबीन की फसल कटने लगी हैं, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर सरकारी खरीद ना शुरू होने से किसान अपनी उपज औने-पौने दाम पर बेच रहे हैं। देखिए इंदौर से पुष्पेंद्र वैद्य की रिपोर्ट