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मंथन

गाँधी का चरखा और उत्तराखंड का विकास

आज गाँधी जयंती है, आप बापू का समर्थन कर सकते हैं, बापू को गाली भी दे सकते हैं, बापू के सीने में गोली मार सकते हैं और बापू की शहादत के 70 साल बाद, बापू के पुतले पर गाली और गोली दाग सकते हो, लेकिन आप महात्मा गाँधी को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते हो। आज भी दुनिया को बचाने का मन्त्र गांधीवादी दर्शन में ही है।

आज चर्चा गाँधी दर्शन पर नहीं बल्कि देश (विशेषकर उत्तराखंड) के विकास में चरखे की भूमिका पर होगी।

अक्सर एक खास विचारधारा के लोग सवाल उठाते हैं कि क्या चरखे से आजादी मिल सकती है, वो लोग चरखे को सिर्फ एक सूत कातने वाले औजार या मशीन की तरह देखते हैं, जबकि सच यह है कि चरखा राष्ट्रीय नवजागरण का एक प्रमुख प्रतीक था। नित्य चरखा कातना सिर्फ सूत कातने का एक उपक्रम ही नहीं था बल्कि यह नित्यप्रति अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने का संकल्प दोहराना भी था, यह एक प्रकार की तपस्या का संकल्प लेना भी था।

चरखा स्वावलंबन, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता का प्रतीक भी है, महात्मा गाँधी ने चरखे का प्रचार-प्रसार ऐसे समय में किया जब इंग्लैंड में बने कपड़े अधिक आकर्षक और सस्ते थे, जिस कारण भारतीय महाद्वीप के जुलाहे बेरोजगारी के कारण भूखों मर रहे थे। और सिर्फ चरखे का प्रचार ही नहीं किया बल्कि विदेशी कपड़ों का बहिष्कार भी किया, जुलाहों के अतिरिक्त अन्य लोगों से भी कहा कि चरखा कातो, स्वयं के बनाये सूत के कपडे पहनों, इस प्रकार चरखे से बने कपड़ों ने भारतीयों में स्वालंबन और स्वतंत्रता का बीज रोपित भी किया।

गाँधी का चरखा, ब्रिटिश शासन के खिलाफ, अहिंसक प्रतिरोध का एक मजबूत स्तंभ बन गया, ये एक ऐसी मौन क्रांति का धोतक बन गया जिसने इंग्लैंड की मिलों के पहिये रोक दिए, जिसने भारतीयों के ठन्डे पड़े खून में, नई उर्जा का संचार किया, जो अंततःब्रिटिश साम्राज्यवाद का अंत का कारण बनी।

गाँधी के चरखे की याद आज अचानक नहीं आई है, बल्कि उत्तराखण्ड राज्य की मूल अवधारणा के साथ जब-जब खिलवाड़ होता है तब-तब गाँधी जी की याद आना स्वाभाविक है। हमारे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अभी अभी इंग्लैंड से वापस लौटे हैं, खबर है कि वहां पर उन्होंने रोडशो (अर्थात सड़क पर प्रदर्शन) करके, पूंजीपतियों को उत्तराखण्ड में निवेश करने के लिए आमंत्रित किया है. दिसम्बर महीने में भी राज्य में एक बड़ा निवेशकों का जमावड़ा होने वाला है। इसी प्रकार का निवेशक सम्मेलन कुछ साल पहले, तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी आयोजित किया था, बल्कि उन्होंने तो पहाड़ों की जमीनों को नीलाम करने के लिए भू कानून में बदलाव भी कर दिया था, उनके कानून के अनुसार आप जमीन खरीदों, भू उपयोग स्वतः ही बदल जायेगा। उस आयोजन में कितना खर्चा हुआ तथा कितना निवेश आया, कितना रोजगार पैदा हुआ, राज्य को क्या फायदा हुआ, इसका कोई आंकलन हुआ होगा या नहीं, इसकी किसी को जानकारी नहीं है।

राज्य के निवासी- विशेषकर युवा वर्ग, राज्य में भू कानून के लिए चिंतित है, युवा चिंतित है कि अगर राज्य की सारी जमीनें बिक गई तो भविष्य अंधकारमय हो जायेगा, और यह सच भी है क्योंकि राज्य के पास उपयोग के लिए सिर्फ 25 प्रतिशत भू भाग है, 71 प्रतिशत पर वन हैं, बाकी तीन चार प्रतिशत पर देवस्थान हैं। पर्वतीय क्षेत्र में तो स्थिति और भी भयावह है. 90 प्रतिशत से अधिक भूभाग में वन हैं तो फिर ये निवेशक कहाँ आयेंगे? और अगर आये भी तो इससे स्थानीय ग्रामीणों को क्या फायदा होगा? चार धाम सड़क परियोजना से पौड़ी के पोखड़ा, थैलीसेण ब्लॉक को क्या फायदा हुआ होगा, संभवतः वही फायदा हुआ है जो टिहरी बाँध बनने से टिहरी वासियों को हुआ है। 15 हजार करोड़ रूपये की लागत से बनने वाली सड़क से अगर कोई गांव बस गया हो या कुछ पलायन रुक गया हो तो भी माना जा सकता है कि राज्य के मूल निवासियों को इससे कोई फायदा होगा; जो संभवतः नहीं हुआ है। राज्य के तराई में बनने वाले उद्योगों से, जो पहाड़ के गांव थोडा बहुत बचे हुए भी थे वे भी खाली हो गये और राज्य में अपराध और अपराधी भी बढ़ गये, एनसीआरबी के आंकड़े देखने से साफ़ पता चलता है कि जिन जिलों में सिडकुल है सबसे ज्यादा अपराध भी उन्हीं जिलों में बढ़ा है।

तो फिर सवाल खड़ा है कि राज्य के विकास का रास्ता क्या है?  

और इसका जवाब है गाँधी का चरखा- चरखा मतलब स्वालंबन, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता; हमें ग्रामीण क्षेत्र को उत्पादक बनाना होगा, अभी हम उपभोक्ता राज्य हैं, एक दिन भी अगर राज्य के बाहर के क्षेत्र से सब्जी – दूध जैसे मौलिक उत्पादों की खेप नहीं आई तो राज्य के अधिकांश घरों में चूल्हा नहीं जल सकता है, इसके अतिरिक्त कंघी – सीसा से लेकर कच्छा – बनियान भी हम दुसरे राज्यों से आयात करते हैं और बदले में निर्यात के नाम पर, गंगा नदी का ठंडा पानी और हिमालय की हवा बेच रहे हैं जिसमें हमारा अपना कोई योगदान नहीं है। इसलिए अगर राज्य को बाहरी सांस्कृतिक प्रभाव से स्वतंत्र रहना है तो सबसे पहले, प्रत्येक व्यक्ति को, स्त्री- पुरुष को, अपने उपयोग की न्यूनतम वस्तु खुद उत्पादित करनी होगी, कम से कम सब्जी – दूध के लिए हमारी दुसरे राज्यों पर जो निर्भरता है उसे कम करना होगा।

एक सच्चाई यह भी है कि पर्वतीय अर्थव्यवस्था की जो महिलायें रीढ़ हुआ करती थी, तराई में पलायन करने के बाद वो एकदम से उपभोक्ता बन गई हैं, सुबह शाम घर के सामान्य काम करने के अतिरिक्त, बड़े पैमाने पर पर्वतीय मूल की महिलायें, पारिवारिक अर्थव्यवस्था में कोई सहयोग नहीं कर रही हैं, हालाँकि कुछ समय तक यह स्थिति काम के बोझ से मारी पर्वतीय मूल की महिलाओं को अच्छी लग रही हैं लेकिन धीरे धीरे यह व्यवस्था समाज में उनके सम्मान को कम ही करेगी। (इस विषय पर विस्तार से फिर कभी लिखा जायेगा)

पर्वतीय ग्रामीण क्षेत्रों में जो भूमि बंजर पड़ी हुई है उसे उत्पादक बनाने के कुछ सामूहिक और नीतिगत प्रयास करने होंगे, इसमें महिलायें विशेष सहयोग कर सकती हैं. इसके अतिरिक्त आँचल डेरी जैसे सहकारी व्यवस्था का  विकेन्द्रीकरण करना होगा उसे आज के सन्दर्भ में व्यावसायिक स्वायत्ता देनी होगी ताकि वह अमूल डेरी की तरह उत्पादक और प्रतिस्पर्धी बन सके, इसी प्रकार फल सब्जी उत्पादन के साथ साथ उनके प्रसंस्करण की छोटी छोटी इकाई बनानी होगी। आज के तकनीकी युग में यह भी संभव हो चुका है कि गांव अपने उपयोग के लायक बिजली का उत्पादन भी खुद कर सकें।

अर्थात गाँधी जी के चरखे की तरह ही, ग्राम स्वराज्य की कल्पना के बिना न तो उत्तराखण्ड के पर्वतीय गांव बचेंगे, न मूल निवासी बचेंगे और न नथुली- झगुली- तौला कू भात बचेगा….एक दुसरे को कितने भी पुरस्कार दे दो पर जब तक सर्वोदयी अर्थव्यवस्था नहीं अपनाई जायेगी तब तक राज्य की मूल अवधारणा को बचाना मुश्किल होगा।

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