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मंथन

वर्ल्ड रैंकिंग में भारतीय विश्वविद्यालय इतना नीचे क्यों हैं?

केवल वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि एशिया में भी भारत की उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत प्रभावपूर्ण नहीं है

https://www.freepik.com/author/artursafronovvvv
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भारत के संदर्भ में क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग को दो तरह से देखा जा सकता है। पहला, बीते चार साल के आंकड़ों को सामने रखकर कहा जा सकता है कि भारत के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों ने जोरदार प्रदर्शन करते हुए वर्ल्ड रैंकिंग में शामिल संस्थाओं में अपनी संख्या को डेढ़ गुना से अधिक कर लिया है। वर्ष 2021 में जहां डेढ़ हजार विश्वविद्यालयों में भारत की केवल 28 संस्थाएं शामिल थीं, अब 2024 में इनकी संख्या 45 हो गई है। 2022 और 2023 में भारत की क्रमशः 35 और 41 संस्थाएं इस सूची में शामिल थीं। इतना ही नहीं, संस्थाओं के रैंक में भी सुधार हुआ है। लेकिन, एक और पहलू है। दूसरा पहलू इससे अधिक महत्वपूर्ण है, जो यह बताता है कि दुनिया के टाॅप 1500 संस्थाओं में भारत की हिस्सेदारी महज तीन फीसद है। टाॅप 200 में तो स्थिति और भी खराब है। इस दायरे में भारत की केवल दो संस्थाएं आ सकी हैं, यहां भारत का हिस्सा एक फीसद है। यानी स्थितियां चुनौतीपूर्ण हैं और ज्यादा गंभीर प्रयासों की मांग करती हैं।

दूसरे पहलू को विस्तार से देखने से पहले यह जानना जरूरी है कि क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग किन आधारों और मानकों के आधार पर दी जाती है। पिछले साल तक इसका निर्धारण छह मानकों पर किया जाता है था, जिनमें एकेडमिक रेपुटेशन, इंप्लायर रेपुटेशन, शोध उपलब्धि, छात्र-शिक्षक अनुपात, विदेशी छात्र अनुपात, विदेशी शिक्षक अनुपात शामिल थे। इस बार इनमें तीन मानक बढ़ाए गए हैं, जिनमें इंटरनेशनल रिसर्च नेटवर्क, इंप्लायमेंट आउटकम और शैक्षिक टिकाऊपन सम्मिलित हैं। इस वक्त भारत में करीब 1200 विश्वविद्यालय और समकक्ष संस्थाएं हैं और इनमें प्रतिवर्ष औसतन 70-75 की बढ़ोत्तरी हो रही है। संख्या की दृष्टि से अब भारत उस जगह आ गया है, जहां सभी योग्य और इच्छुक युवाओं को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके, लेकिन बड़ा सवाल गुणवत्ता का है।

भारत में गुणवत्ता के निर्धारण के लिए नैक और एनआईआरएफ रैंकिंग की अक्सर चर्चा होती है। नैक द्वारा वर्ष 2023 तक जिन संस्थाओं का मूल्यांकन एवं प्रत्यावर्तन किया गया है, उनमें 3.6 प्रतिशत संस्थाओं को सर्वाेच्च ए डबल प्लस श्रेणी प्रदान की गई है। इसी प्रकार एनआरआरएफ ने संस्थाओं की भीड़ में देश की 200 सबसे बेहतरीन संस्थाओं को छांटा है। यानी देश में इन संस्थाओं से बेहतर कोई दूसरी संस्था नहीं है। (नैक की ए डबल प्लस रैंक वाली कई संस्थाएं एनआईआरएफ की टॉप 200 में भी शामिल हैं) लेकिन, वैश्विक रैंकिंग क्या बताती है? वो ये बताती है कि जिन्हें नैक ए डबल प्लस बता रहा है, उनमें आधी संस्थाएं भी उपर्युक्त 1500 विश्वविद्यालयों में स्थान नहीं पा सकी हैं। ऐसे में नैक द्वारा किए जाने वाले मूल्यांकन और प्रत्यार्वतन पर सवाल खड़े होंगे ही। इस मामले में एनआईआरएफ की रैंकिंग को थोड़ा भरोसे के लायक मान सकते हैं। एनआईआरएफ की रैकिंग में टाॅप 20 में जिन संस्थाओं को स्थान मिला है, वे क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में भी किसी न किसी स्तर पर स्थान पा गई हैं। हालांकि, दो आईआईटी को छोड़ दें तो अन्य की रैंकिंग 200 के बाद शुरू हुई है।

वर्ल्ड रैंकिंग में भारत की लाज बचाने का श्रेय टेक्नोलाॅजी और इंजीनियरिंग की संस्थाओं को जाता है। कुल 45 में से 23 संस्थाएं वे हैं जो इंजीनियरिंग की पढ़ाई करा रही हैं। (इनमें भी ज्यादा पुरानी आईआईटी हैं) सभी विषयों की पढ़ाई कराने वाले विश्वविद्यालयों और संस्थाओं की संख्या महज 15 है। बात साफ है कि हम भले ही भारत के भीतर जेएनयू, बीएचयू, दिल्ली विवि, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, मद्रास विवि, हैदराबाद विवि, अन्नामलाई विवि, हैदराबाद विवि आदि का डंका पीटते रहें, लेकिन दुनिया के स्तर पर इन संस्थाओं की हैसियत बमुश्किल टाॅप 1000 में ही आ पाती है। भारत में अक्सर ये कहा जाता है कि वैश्विक स्तर पर रैंकिंग देने वाली संस्थाओं के पैमाने विकासशील देशों के अनुकूल नहीं है और भारत को संस्थानों की रैंकिंग के लिए अपने अलग मानक तैयार करने चाहिए। उपर्युक्त कथन में इसलिए ज्यादा दम नहीं है क्योंकि इस वर्ल्ड रैंकिंग में एशिया के 487 विश्वविद्यालयों और समकक्ष संस्थानों को स्थान मिला है। जो यूरोप को मिले 501 स्थानों के लगभग बराबर है।

ज्यादातर लोगों को इस बात पर आश्चर्य होगा कि क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग में पाकिस्तान के 14 विश्वविद्यालय/संस्थान शाामिल हैं। आबादी और अर्थव्यवस्था के लिहाज से भारत पाकिस्तान की तुलना में 7 गुना से अधिक बढ़ा है। यदि इस सात गुने को ही आधार मान लें भारत की 100 संस्थाएं इस रैंकिंग में होनी चाहिए थी। इसी क्रम में चीन से भी तुलना कर सकते हैं। टाॅप 100 में चीन (हांगकांग सहित) की 10 यूनिवर्सिटी को स्थान मिला है, जबकि भारत को शून्य। टॉप 500 में भी दोनों के बीच कोई मुकाबला नहीं दिखता। कुल संख्या में भी चीन की 78 यूनिवर्सिटीज ने इस सूची में स्थान बनाया है। एशिया के दो अन्य देशों जापान और दक्षिण कोरिया से भी भारत की तुलना कर सकते हैं। ये दोनों देश आबादी के मामले में भारत के सामने बहुत छोटे हैं। जबकि, टाॅप 100 में दोनों के 5-5 विश्वविद्यालय शामिल हैं। टॉप 500 में भी दोनों ने 16-16 स्थान हासिल किए हैं और कुल संख्या में देखें तो दक्षिण कोरिया के 43 और जापान के 50 विश्वविद्यालय वर्ल्ड रैंकिंग में मौजूद हैं। बात साफ है, केवल वैश्विक स्तर पर ही नहीं, बल्कि एशिया में भी भारत की उच्च शिक्षा की स्थिति बहुत प्रभावपूर्ण नहीं है।

भारत में नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के बाद से लगातार कहा जा सकता है कि प्रौद्योगिकी, शिक्षा और मेडिकल जैसे क्षेत्रों में भारत वैश्विक साॅफ्ट पावर बन गया है। जबकि वर्ल्ड रैंकिंग के आंकड़े अलग ही बात कह रहे हैं। इन आंकड़ों के दृष्टिगत यदि भारत की तुलना अमेरिका अथवा यूरोप से करेंगे तो स्थिति और भी चिंताजनक नजर आएगी। वर्ल्ड रैंकिंग में अमेरिका की 199, इंग्लैंड की 90, जर्मनी की 49 और कनाड़ा की 30 संस्थाएं शामिल हैं। कई तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे रूस की 48 उच्च संस्थाओं ने खुद को बेहतरीन शैक्षिक संस्थाएं साबित किया है। भारत को इस बात पर भी चिंतित होना चाहिए कि कुल संख्या के मामले में भी आठ ऐसे देश हैं, जिनके वर्ल्ड रैंकिंग में भारत के 45 संस्थानों की तुलना में अधिक संस्थान जगह बनाने में कामयाब रहे हैं।

भारत में जिन विश्वविद्यालयों और समकक्ष संस्थाओं को राष्ट्रीय महत्व के संस्थान के तौर पर श्रेणीबद्ध किया गया है, उनके मामले में यह देखे जाने की जरूरत है कि वे वैश्विक स्तर की रैंकिंग में इतना नीचे क्यों हैं! यह बात भी विचारणीय है कि देश के 54 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से बमुश्किल 10 फीसद ऐसे हैं जो वर्ल्ड रैंकिंग में दिखाई देते हैं, हालांकि वे भी बहुत निचले पायदान पर हैं। भारत में विगत दो दशकों से यह बात भी काफी प्रचारित की जाती रही है कि प्राइवेट सेक्टर की संस्थाएं बहुत उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन वर्ल्ड रैंकिंग देखने से साफ पता चल रहा है कि 45 भारतीय विश्वविद्यालयों या संस्थाओं में से एक तिहाई से भी कम प्राइवेट संस्थाएं हैं। इनमें 31 संस्थाएं ऐसी हैं जो सरकारी हैं या सरकार के अनुदान पर संचालित हैं। क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग ने भारत के मामले में उत्तर भारत को थोड़ी राहत दी है क्योंकि अक्सर कहा जाता है कि दक्षिण भारत की संस्थाओं की गुणवत्ता ज्सादा बेहतर है, लेकिन इस रैकिंग में उत्तर भारत की 22, जबकि दक्षिण भारत की महाराष्ट्र सहित 16 संस्थाएं स्थान बना पाई हैं।

इन आंकड़ों से परे भी कुछ ऐसी बातें हैं, जो गंभीर दिशा में संकेत करती हैं। क्यूएस वर्ल्ड रैंकिंग रिपोर्ट बताती है कि भारतीय संस्थानों और विश्वविद्यालयों की एकेडमिक रेपुटेशन चिंताजनक है। अमेरिका और यूरोप की ऐसी कई संस्थाएं हैं, जिन्हें एकेडमिक रेपुटेशन में 100 में से 100 अंक मिले हैं, जबकि भारत में केवल आईआईटी बांबे और आईआईटी दिल्ली, ऐसे दो संस्थान हैं जो 50 फीसद से ज्यादा अंक हासिल कर पाए हैं। इस सूची में शामिल अन्य भारतीय संस्थाओं की एकेडमिक रेपुटेशन बहुत निचले स्तर पर है। ऐसे में भारत की उन संस्थाओं की रेपुटेशन के बारे में सोचिए जो इस सूची में स्थान हासिल नहीं कर सके हैं। इस टिप्पणी को इंफोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति के उस कथन के साथ खत्म किया जा सकता है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में स्नातक उपाधि प्राप्त करने वाले युवाओं में तीन फीसद ही वैश्विक स्तर पर सफल होने लायक होते हैं। और भारत के विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों ने भी इस तीन फीसद की बात को (वर्ल्ड रैंकिंग में 1500 से 45 स्थान पाकर) परोक्ष तौर पर सही साबित कर दिया है।

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