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लगातार दूसरे साल गेहूं उत्पादन के सरकारी अनुमान फेल, आयात के आसार

निर्यात पर प्रतिबंध के बावजूद गेहूं की बढ़ती कीमतों से रिकॉर्ड उत्पादन के अनुमानों पर उठे सवाल

https://www.needpix.com/photo/378294/wheat-fields-punjab-patiala-men-farmer-india-people-field-labor
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देश में गेहूं उत्पादन लगातार दूसरे साल सरकारी अनुमान से कम रह सकता है। कृषि मंत्रालय ने वर्ष 2023-24 में रिकॉर्ड 1127.43 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया है जबकि सरकारी खरीद, केंद्रीय पूल के भंडार और बाजार भाव की स्थिति को देखते हुए इन दावों पर सवाल उठ रहे हैं। गेहूं का वास्तविक उत्पादन सरकारी अनुमान से लगभग 10% फीसदी तक कम रह सकता है। यही वजह है निर्यात पर प्रतिबंध और स्टॉक लिमिट के बावजूद घरेलू बाजार में गेहूं के दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से ऊपर हैं। ऐसे में सरकार को गेहूं के आयात का रास्ता खोलना पड़ सकता है।

इस साल फरवरी में अत्यधिक गर्मी और मार्च-अप्रैल में बेमौसम बारिश से गेहूं की फसल को नुकसान हुआ था। तभी लग रहा था कि इस साल गेहूं के उत्पादन पर असर पड़ेगा। बारिश से प्रभावित गेहूं की खरीद के लिए सरकार को खरीद मानकों में छूट देनी पड़ी थी। लेकिन 25 मई को जारी वर्ष 2022-23 में तीसरे अग्रिम अनुमानों में केंद्र सरकार ने रिकॉर्ड 1127.43 लाख टन गेहूं उत्पादन की उम्मीद जताई। इन आंकड़ों पर कई सवाल उठ रहे हैं।

लगभग यही स्थिति पिछले साल थी, जब हीटवेव से गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा, लेकिन सरकार बंपर उत्पादन के दावे करती रही। शुरुआत में 1113 लाख टन गेहूं उत्पादन का अनुमान था जिसे घटाकर बाद में 1077 लाख टन किया गया। जानकारों की मानें तो पिछले साल वास्तविक उत्पादन 950-1000 लाख टन के आसपास रहा था। तब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें बढ़ रही थीं जिसे भुनाने के लिए गेहूं का निर्यात तेजी से बढ़ा। निर्यात के लिए प्राइवेट ट्रेडर्स किसानों से गेहूं खरीदने लगे तो घरेलू बाजार में गेहूं के दाम एमएसपी से ऊपर चले गये थे। यही वजह है कि पिछले साल गेहूं की सरकारी खरीद पिछले 15 साल में सबसे कम 188 लाख टन रह गई थी। इसके बाद मई, 2022 में सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में तो यह स्थिति आ गई थी कि सरकार को पीडीएस के तहत गेहूं की जगह चावल बांटना पड़ा। दिसंबर, 2022 तक मंडियों में गेहूं के दाम 3000 रुपये कुंतल तक पहुंच गए थे, जबकि गेहूं का एमएसपी 2125 रुपये है। तभी से सरकार गेहूं की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रही है।

वास्तव में, प्रतिकूल मौसम के कारण पिछले दो साल से देश का गेहूं उत्पादन घटा है। समय रहते इस सच्चाई को स्वीकार करने की बजाय सरकार ने उत्पादन के अनुमानों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। देश में सर्वाधिक 1096 लाख टन गेहूं उत्पादन वर्ष 2020-21 में हुआ था। इसके बाद 2021-22 में यह घटकर 1077 लाख टन रह गया। जबकि इस साल गेहूं उत्पादन 1025 लाख टन के आसपास रह सकता है।

रिकॉर्ड उत्पादन के दावों के बावजूद गेहूं की बढ़ती कीमतों को रोकने के लिए केंद्र सरकार को कई उठाने पड़ रहे हैं। गत 12 जून को गेहूं के भंडारण पर 15 साल में पहली बार स्टॉक लिमिट लगानी पड़ी। यह फैसला केंद्र सरकार द्वारा लाए गये कृषि कानूनों के प्रावधानों के विपरीत है। ये कानून किसान आंदोलन के कारण लागू नहीं हो पाए। लेकिन अब केंद्र सरकार को कृषि उपज पर स्टॉक लिमिट नहीं लगाने की अपनी ही नीति से यू-टर्न लेना पड़ रहा है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अगर देश में गेहूं का रिकॉर्ड उत्पादन है तो स्टॉक लिमिट लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

गेहूं की सरकारी खरीद के आंकड़े भी रिकॉर्ड उत्पादन के दावों पर सवाल खड़े करते हैं। रबी मार्केटिंग सीजन 2023-24 में 262 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है जबकि सरकार ने 341.5 लाख टन की खरीद का लक्ष्य रखा था। यह खरीद पिछले साल हुई 188 लाख टन की खरीद से तो अधिक है। लेकिन उससे पिछले साल (2021-22) हुई 434 लाख टन गेहूं की खरीद से लगभग 40 फीसदी कम है। पिछले 7 वर्षों में दूसरी बार गेहूं की इतनी कम खरीद हुई है। गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध के बावजूद इतनी कम खरीद रिकॉर्ड उत्पादन के अनुमानों से मेल नहीं खा रही है। संभावना यह भी है कि बेहतर दाम की उम्मीद में किसानों ने अपना पूरा गेहूं बेचने की बजाय स्टॉक बचाकर रखा हो। अगर ऐसा है तो इसका असर भी आने वाले दिनों में दिख जाएगा।

फिलहाल गेहूं की बढ़ती कीमतों को रोकना सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने ओपन मार्केट सेल स्कीम (OMSS) के तहत केंद्रीय पूल से राज्य सरकारों को गेहूं और चावल की बिक्री बंद कर दी। इससे मुफ्त अनाज बांटने का ऐलान कर चुकी कर्नाटक सरकार का झटका लगा है। दूसरी तरफ, एफसीआई के स्टॉक से 15 लाख टन गेहूं आटा मिलों और थोक व्यापारियों को बेचने का निर्णय लिया गया। ये कदम खाद्यान्न की महंगाई रोकने के लिए उठाए गये। लेकिन इस साल गेहूं की कम खरीद को देखते हुए केंद्रीय पूल से खुले बाजार में बिक्री के जरिए कीमतों पर अंकुश लगाने की गुंजाइश भी कम बची है। देश में सरकारी योजनओं के लिए जितने गेहूं की जरूरत है, इस साल लगभग उतनी ही सरकारी खरीद हुई है।

केंद्रीय पूल में गेहूं के स्टॉक की वर्तमान स्थिति भी रिकॉर्ड उत्पादन के दावों के अनुरूप नहीं है। जून, 2023 में केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक 314 लाख टन है जो पिछले साल इसी समय 311 लाख टन स्टॉक के लगभग बराबर है। जबकि जून, 2021 में 603 लाख टन गेहूं का स्टॉक था। पिछले साल को छोड़ दें तो इस साल केंद्रीय पूल में गेहूं का स्टॉक साल 2008 के बाद सबसे कम है।

इस साल मानसून पर अल नीनो प्रभाव और अगले साल लोकसभा चुनाव को देखते हुए केंद्र सरकार हर हाल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई रोकना चाहेगी। लेकिन गेहूं के उत्पादन व सरकारी खरीद में गिरावट और केंद्रीय पूल की स्थिति को देखते हुए यह आसान नहीं है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार से गेहूं के आयात की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। अगर भारत सरकार गेहूं के आयात का रास्ता खोलती है तो रिकॉर्ड उत्पादन के दावे खुद ही ध्वस्त हो जाएंगे।

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