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वन हेल्थ: बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में लंबी यात्रा की शुरुआत

“वन हेल्थ” शब्द अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इस अवधारणा को काफी समय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है

https://www.who.int/
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वन हेल्थ एक बहु-क्षेत्रीय, बहु-विषयक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण है जो मानव, पशुओं, पेड़-पौधों और उनके पर्यावरण के बीच अंतरसंबंध को पहचानते हुए इनके बेहतर स्वास्थ्य के लिए विभिन्न स्तरों पर काम करता है। हालांकि “वन हेल्थ” शब्द अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इस अवधारणा को काफी समय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली हुई है। वैज्ञानिक 1800 के दशक से पशु और मानव रोग प्रक्रियाओं के बीच समानताएं देख रहे हैं। लेकिन 20वीं शताब्दी तक, मानव और पशु चिकित्सा अलग-अलग की जाती थी। हाल के वर्षों में, वन हेल्थ अवधारणा के बारे में जागरूकता बढ़ी है। यूरोपीय खाद्य संरक्षा प्राधिकरण (EFSA) के अनुसार, 75 प्रतिशत मानव संक्रामक रोग जानवरों में उत्पन्न होते हैं। उदाहरणों के तौर पर SARS, MERS, COVID, रेबीज, साल्मोनेला, डेंगू बुखार, वेस्ट नाइल वायरस, लाइम रोग और मलेरिया आदि। इस चुनौती से निपटने के लिए एक समग्र रणनीति की आवश्यकता है।

वन हेल्थ की प्रमुख चुनौतियाँ:

रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR): जब बैक्टीरिया, वायरस, कवक या परजीवी रोगाणुरोधी दवाओं के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, तो इसे रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR) के रूप में जाना जाता है। इससे दवाओं का असर कम होने लगता है और संक्रमण का इलाज करना मुश्किल हो जाता है। इसकी रोकथाम के लिए एक व्यापक और समन्वित रणनीति की आवश्यकता है जिसमें रोगाणुरोधी दवाओं के उचित उपयोग, संक्रमण की निगरानी व रोकथाम, नई रोगाणुरोधी दवाएं विकसित करना और वन हेल्थ को बढ़ावा देना शामिल है।

खाद्य सुरक्षा: खाद्य आपूर्ति श्रृंखला जटिल होती है और इसमें किसान, फूड प्रोसेसर, खुदरा विक्रेताओं और उपभोक्ताओं सहित कई पक्ष शामिल हैं। खाद्य आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जन स्वास्थ्य, कृषि, पर्यावरण और पशु चिकित्सा सहित विभिन्न क्षेत्रों को मिलकर काम करना चाहिए। वन हेल्थ रणनीति में खाद्य सुरक्षा के जोखिमों को बढ़ाने वाले मूल कारणों जैसे साफ-सफाई की कमी, पशुपालन में एंटीबायोटिक दवाओं का अनुचित उपयोग और पर्यावरण प्रदूषण आदि की रोकथाम शामिल है। साथ ही पर्यावरण के अनुकूल खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देना चाहिए।  

पर्यावरण (प्रदूषण/जलवायु परिवर्तन): अंधाधुंध वनों की कटाई, बढ़ता प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का पर्यावरण और लोग दोनों पर असर पड़ता है। इसलिए लोगों के स्वास्थ्य के साथ-साथ पूरे पर्यावरण की सेहत के बारे में सोचना होगा। पर्यावरण अनुकूल गतिविधियों को बढ़ावा देने और पर्यावरण को बिगड़ने से रोकने की जरूरत है।

वन हेल्थ दृष्टिकोण को लागू करना कई कारणों से कठिन हो सकता है, जिनमें मुख्य हैं:

संसाधनों की कमी: वन हेल्थ से जुड़े कार्यक्रमों को कारगर बनाने के लिए काफी वित्तीय और मानव संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है। कम और मध्यम आय वाले देशों में वन हेल्थ इनीशिएटिव की अधिक आवश्यकता है लेकिन वहां संसाधनों की कमी इसमें बड़ी बाधा है।

समन्वय का अभाव: वन हेल्थ से जुड़े कार्यक्रमों के लिए विभिन्न क्षेत्रों और हितधारकों के बीच मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर समन्वय आवश्यक होता है। हेल्थकेयर सिस्टम की जटिलाओं और हितधारकों की प्राथमिकताओं में अंतर के चलते यह काम मुश्किल हो जाता है।

जागरूकता की कमी: वन हेल्थ अपेक्षाकृत नवीन अवधारणा है। इसे लेकर आम जनता, स्वास्थ्यकर्मियों और नीति-निर्धारकों में जागरूकता की कमी है।

सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष: पशुपालन और खान-पान से संबंधित प्रचलित तौर-तरीके ज़ूनोटिक बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। इनमें बदलाव लाना आसान नहीं है।

नीतिगत मुद्दे:  मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरण से संबंधित विरोधाभासी नीतियां वन हेल्थ की राह में बाधक बन सकती हैं।

वन हेल्थ को बढ़ावा देने वाली सफल पहल:

वन हेल्थ दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की कई सफल पहल हुई हैं। वन हेल्थ सेंट्रल एंड ईस्टर्न अफ्रीका (OHCEA) नेटवर्क मानव, जानवरों और पर्यावरण के बीच स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए चिकित्सा कर्मियों की क्षमता बढ़ाने की एक सहयोगात्मक पहल है। इस नेटवर्क से 8 अफ्रीकी देशों के 22 अकादमिक संस्थान जुड़े हैं। ऐसा ही एक दूसरा उदाहरण भारत में राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र का एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (IDSP) है। इसके तहत मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण में संक्रामक रोगों के प्रकोप की निगरानी और रिपोर्टिंग होती है। यह कार्यक्रम ज़ूनोटिक (पशुओं से होने वाली) बीमारियों जैसे एवियन फ्लू और रेबीज़ पर केंद्रित है और प्रकोप की पहचान और प्रतिक्रिया को बेहतर बनाने पर जोर देता है। इसके अलावा भारत में पर्यावरण अनुकूल खेती और खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देने के कई कार्यक्रम हैं जो वन हेल्थ के लिए महत्वपूर्ण हैं।

राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) द्वारा स्थापित राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन पर्यावरण अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है और छोटे उत्पादकों को उनकी आजीविका बढ़ाने में मदद करता है। राष्ट्रीय पशु जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (NIAB) पशु स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण अनुकूल कृषि और खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देने का काम करता है। आईकेपी नॉलेज पार्क, हैदराबाद ने वन हेल्थ इंक्यूबेटर की शुरुआत की है जो कंपनियों को जागरूकता लाने, बाजार से जुड़ने, नवाचार को बढ़ावा देने और नीतिगत मामलों में मदद करता है।

लोगों की भूमिका:

सरकार और अन्य संस्थाएं स्वास्थ्य से जुड़े खतरे को कम करने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयासरत हैं। लेकिन इसमें लोगों और उद्यमों की भी अहम भूमिका है। हम विभिन्न तरीकों से वन हेल्थ पहल में अपना योगदान दे सकते हैं:

साफ-सफाई का ध्यान: साफ-सफाई का ध्यान रखने से ज़ूनोटिक रोगों व अन्य संक्रामक रोगों को फैलने से रोकने में सहायता की जा सकती है।

भोजन को सही ढंग से तैयार पकाना: मांस और अन्य पशु उत्पादों को सही ढंग से पकाने और उचित रखरखाव से खाद्य जनित बीमारी और ज़ूनोटिक रोगों के जोखिम को कम किया जा सकता है।

संक्रमण की रिपोर्टिंग: पशु या मानव स्वास्थ्य से जुड़ी असामान्य घटनाओं की समय रहते सूचना ज़ूनोटिक रोग के प्रकोप की पहचान और रोकथाम में मददगार हो सकती है।

पर्यावरण अनुकूल कृषि और खाद्य प्रणालियां: स्थानीय और जैविक उत्पादों की खरीद के साथ-साथ पर्यावरण अनुकूल कृषि और खाद्य प्रणालियों को बढ़ावा देकर मनुष्यों, जानवरों और पर्यावरण के स्वास्थ्य में सुधार की कोशिशों को बल दिया जा सकता है।

वन हेल्थ का समर्थन: वन हेल्थ से जुड़ी नीतियों और कार्यक्रमों को सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर बढ़ावा देने की आवश्यकता है। वन हेल्थ से जुड़े कार्यक्रमों की पैरवी और फंडिंग के साथ-साथ व्यवहार में बदलाव, संक्रमण की निगरानी और पर्यावरण अनुकूल खाद्य प्रणाली को प्रोत्साहन देना कारगार साबित हो सकता है।

कुल मिलाकर, वन हेल्थ बेहतर स्वास्थ्य की दिशा में एक लंबी यात्रा की शुरुआत है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों और हितधारकों को साथ आना होगा। स्वास्थ्य और पर्यावरण को लेकर समन्वित प्रयास और समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है।

(डॉ. रचना दवे स्मार्ट हाईजीन सॉल्यूशन प्रदाता माइक्रो-गो की संस्थापक हैं और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में बतौर वैज्ञानिक अधिकारी कार्य कर चुकी हैं।)

  • डॉ. रचना दवे

    डॉ. रचना दवे स्मार्ट हाईजीन सॉल्यूशन प्रदाता माइक्रो-गो की संस्थापक हैं और भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में बतौर वैज्ञानिक अधिकारी कार्य कर चुकी हैं।

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