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धनिये की नई किस्म विकसित करने वाले उत्तराखंड के किसान को मिला जीनोम पुरस्कार

उत्तराखंड के प्रगतिशील किसान गोपाल दत्त उप्रेती पादप जीनोम संरक्षक पुरस्कार से सम्मानित। उप्रेती द्वारा विकसित धनिये की प्रजाति पहाड़ के किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।

gopal upreti

कृषि मंत्रालय द्वारा राजधानी नई दिल्ली में आयोजित कृषक अधिकारों पर वैश्विक संगोष्ठी के दौरान उत्तराखंड के प्रगतिशील किसान गोपाल दत्त उप्रेती को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पादप जीनोम संरक्षक पुरस्कार (2023) से सम्मानित किया। देश के कुल 22 प्रगतिशील किसानों को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए यह सम्मान मिला। उप्रेती को यह पुरस्कार धनिये की नई प्रजाति विकसित करने के लिए प्रदान किया गया।

अल्मोड़ा जिले के ताड़ीखेत खंड स्थित बिल्लेख गांव के निवासी गोपाल दत्त प्रेती ने पारंपरिक तरीके से धनिये की नई किस्म (जीएस-1999) विकसित की है। उप्रेती सेब की खेती में भी काफी नाम कमा चुके हैं और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स की उपलब्धि भी उनके नाम दर्ज है।

जैविक और सुगंधित धनिया

गोपाल दत्त उप्रेती ने धनिये की नई किस्म पूरी तरह जैविक खाद और पारंपरिक कृषि पद्धति से विकसित की है। अल्मोड़ा कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी वैज्ञानिक शिव शांतनु सिंह बताते हैं कि जीएस-1999 धनिये की खेती पहाड़ के किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। क्योंकि यह हरा धनिया न केवल ज्यादा सुगंधित है बल्कि इसके बीज उत्पादन की मात्रा भी अधिक होती है। एक पौधे से लगभग 350-500 ग्राम धनिया बीज निकल जाता है। जबकि आमतौर पर एक नाली (200 वर्ग मीटर) में 100 ग्राम सामान्य बीज बोने पर 500 धनिया पौध तैयार होती हैं। 500 पौधों से लगभग आधा किलो धनिया बीज का उत्पादन ही हो पाता है। इस तरह जीएस-1999 धनिया उगाने से किसान हरा धनिया और धनिया बीज उत्पादन से लाभान्वित होंगे।

पहाड़ में धनिया खेती लाभदायक

आमतौर पर अप्रैल से अक्तूबर के बीच मैदानी क्षेत्रों में हरे धनिये का अभाव रहता है। यदि इस अवधि में पर्वतीय किसान नई किस्म के धनिए की खेती करते हैं तो एक नाली जमीन से औसतन 25-30 हजार रुपये तीन महीनों में कमा सकते हैं। यह आय अन्य फसलों की तुलना में अधिक है, और एक वर्ष में किसान दो फसल ले सकते हैं। धनिये में कीट भी कम लगते हैं, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान भी कम होगा। 

गोपाल दत्त उप्रेती द्वारा विकसित की गई धनिये की किस्म पूर्ण रूप से जैविक है। इसमें कीटनाशक या हर्बीसाइड प्रयोग में नहीं लाया जाता है। उत्तराखंड सरकार की जैविक खेती को बढ़ावा देने की योजना में भी धनिया महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। शिव शांतनु सिंह सुझाव देते हैं कि आम तौर पर हरे धनिए की फसल 90-95 दिन (3 महीने) में तैयार हो जाती है। जब मैदानी क्षेत्रों में धनिया खत्म हो जाता है, तब पहाड़ के किसान नई प्रजाति से हरा धनिया बाजार में उपलब्ध करा सकते हैं।

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में सब्जी विज्ञान के प्रो. डीके सिंह ने अल्मोड़ा कृषि विज्ञान केन्द्र से प्राप्त उप्रेती द्वारा विकसित धनिये की प्रजाति को रजिस्टर करने के लिए नामांकित किया था। वे उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जीएस-1999 के बीज से धनिये की खेती का सुझाव देते हैं। साथ में, इस बीज को भविष्य में ब्रीडिंग व क्राॅप इंप्रूवमेंट प्रोग्राम में शामिल किया जा सकता है।

धनिये की नई विकसित किस्म की तुड़ाई 60-65 दिनों में शुरू की जा सकती है और लम्बे समय तक हरा धनिया तोड़ा जा सकता है। इसमें फोलिएज (हरी पत्तियां) ज्यादा है इसलिए किसान तीन-चार तुड़ाई कर सकते हैं। धनिये की अन्य प्रजातियों में सामान्य तौर पर दो-तीन तुड़ाई ही होती हैं। जहां आम तौर पर धनिया का पौधा 18-24 इंच तक होता है, वहीं उप्रेती के बगीचे में धनिये के पौधे 48-54 इंच तक बढ़ना आम बात है।

तितली और मधुमक्खी से मिली प्रेरणा

गोपाल दत्त उप्रेती बताते हैं कि धनिए की नई प्रजाति विकसित करने की प्रेरणा उन्हें 2015 में अपने बगीचे में काम करते हुए मिली थी। उनका ध्यान धनिये के फूल पर मंडराती तितलियों और मधुमक्खियों की तरफ गया। उन्होंने देखा कि धनिये और सेब पर एक ही समय फूल आया था। धनिए के फूल मधुमक्खी, तितली और अन्य पॉलिनेटर या परागणक को आकर्षित कर रहे थे। इसके अलावा सेब के पेड़ों के बीच में धनिया लगाने से कीट-पतंगों की रोकथाम भी हुई। धनिया लगाने से फलों पर आने वाली फ्रूट फ्लाई से सेब के बगीचे में कम नुकसान हुआ। इसलिए उन्होंने धनिये के पारंपरिक बीज संरक्षित करने शुरू किये। एक-दो साल में उच्च क्वालिटी के बीज बोए और क्राॅस पॉलिनेशन से पारंपरिक बीज संरक्षित करने में सफलता प्राप्त की।

उप्रेती के अनुसार, पहाड़ों में पुराने लोग अच्छे बीजों को अगले साल के लिए सुरक्षित रख देते थे। इसी पारंपरिक ज्ञान को उन्होंने अपनाया और लगभग दो साल में बीज भंडारण से नई प्रजाति विकसित करने में सफल प्रयोग किये। उसके बाद उन बीजों को अल्मोड़ा के कृषि विज्ञान केन्द्र के शोधकर्ताओं को दिया गया।

विश्व रिकॉर्ड भी बनाया

गोपाल दत्त उप्रेती ने साल 2018 में पांच फुट ऊंची धनिया पौध विकसित कर लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में नाम दर्ज किया था। उसके बाद 2020 में जैविक पद्धति से सबसे ऊंची धनिया पौध ( ऊंचाई 7.1 फुट या 2.16 मीटर) उगाने का रिकॉर्ड बनाया। इस उपलब्धि को गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। कृषि और बागवानी के क्षेत्र में नवाचारों के लिए गोपाल दत्त उप्रेती को उद्यान पंडित, कृषि भूषण, इनोवेटिव फार्मर अवार्ड और प्रगतिशील कृषक सम्मान से सम्मानित किया गया है।

गोपाल दत्त उप्रेती को मिले पादप जीनोम संरक्षक पुरस्कार से उत्तराखंड के साथ-साथ प्रदेश के किसानों का भी मान बढ़ा है। इससे उत्तराखंड की विषम भौगोलिक परिस्थितियों में काम करने वाले किसानों को आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। साथ ही धनिये की खेती में लाभ कमाने के अवसर खुल सकते हैं।

  • मेघा प्रकाश

    मेघा प्रकाश एक स्वतंत्र पत्रकार है। स्वतंत्र पत्रकारिता करने से पहले वह भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु में सहायक संपादक के पद पर कार्यरत थीं। पिछले डेढ़ दशक से पर्यावरण, विज्ञान और विकास से जुड़े मामलों को कवर कर रही हैं।

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