Connect with us

Hi, what are you looking for?

संघर्ष

महिला किसान – अधिकार और पहचान का इंतजार

तीन साल पहले मैंने एक किसान प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया था। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के एक गांव में प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह ने आवर्तनशील खेती के बारे में प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया था। इसमें देश भर से किसान भाग लेने पहुंचे थे। वहां पहुंचकर पता चला कि मुझे छोड़कर सभी प्रतिभागी पुरुष हैं। आश्चर्य हुआ, क्योंकि अक्सर ये देखा गया है कि खेती में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर ही रहती है।

हमारे कृषि प्रधान देश में जब भी किसान की बात होती है तो एक पुरुष की छवि ही दिमाग में आती है। अक्सर आप देखेंगे कि रेडियो, टेलीविजन आदि पर जब किसान से संबंधित कार्यक्रम दिखाते हैं तो उनमें प्रायः पुरुष ही दिखायी देते हैं। ट्रैक्टर, खाद वगैरह के विज्ञापनों में भी अक्सर पुरुष किसान ही दिखते हैं। कोई किसान हाट हो, मेला हो या किसान आंदोलन हो, या किसान नेता हों, सभी जगहों पर पुरुष ही दिखाई देते हैं। इसी के चलते एक महिला किसान की छवि सहज ही ध्यान में नहीं आती।

महिलाएं खेत में मजदूर की तरह ही दिखाई पड़ती हैं। हालांकि यह अवधारणा गलत है कि किसानी में महिलाओं का योगदान केवल मजदूरी तक सीमित है। दरअसल, खेती की जमीन पर मालिकाना हक न के बराबर होने के कारण महिलाओं को पुरुषों के बराबर या पुरुषों की तरह एक किसान की पहचान नहीं मिल पायी है। महिला किसान का ना तो राजनीति में प्रतिनिधित्व है और ना ही कृषि अर्थव्यवस्था में।

सोचिए, जो महिलाएं बीज बुआई से लेकर फसल कटाई तक सभी कामों में बराबर हाथ बंटाती हैं, उनका ना कहीं प्रतिनिधित्व है ना ही भू-स्वामित्व। खेत से निकलते ही फसल के विक्रय, व्यय संबंधित सभी निर्णय पुरुष ही करते हैं। महिला किसान एक आम गृहिणी की तरह पति, भाई या बेटे के अधीन ही रहती है। अपने ही हाथों से उगाए अन्न में उसका व्यावसायिक हिस्सा नहीं रहता। क्या यह किसी और व्यवसाय में सम्भव है? पुरुषों के बराबर या अधिक काम करके भी कमाई व खर्च में स्त्रियों की हिस्सेदारी न के बराबर है। महिलाएं अपने परिश्रम से सींचकर भी कृषि भूमी पर अपना हक नहीं जमा पातीं।

पितृसत्ता के चलते वैसे ही महिलाओं की भागीदारी सभी प्रकार की संपत्तियों में कम ही होती है। लेकिन कृषि भूमि में मालिकाना हक आय से भी जुड़ा होता है। कृषि भूमि के दस्तावेजों में नाम ना होने के कारण महिलाएं किसान क्रेडिट कार्ड, किसान बीमा या अन्य कृषि योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाती हैं। महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और निवेश के लिए प्रोत्साहन देने के लिए सुरक्षित भूमि अधिकार आवश्यक हैं। तभी महिलाएं अपने हिसाब से खेती की कमाई को खर्च या निवेश करने के सभी फैसले ले पाएंगी। महिलाओं को मिला भूमि स्वामित्व पूरे परिवार की वित्तीय स्थिरता के लिए एक ठोस आधार प्रदान करता है।

भूमि पर मालिकाना हक महज एक कागज का टुकड़ा नहीं होता। भूमि स्वामित्व से जो आत्मशक्ति मिलती है, उसका प्रभाव नारी अधिकार और सम्मान पर भी पड़ता है। सदियों से महिलाओं को पुरुष से निचले दर्जे पर रखा गया है, उसका एक कारण संपत्ति अधिकार का ना होना भी है। मालिकाना हक मिलने से जो स्वाभिमान और गौरव का सुख मिलता है, महिलाएं उससे ताउम्र वंचित रह जाती हैं। महिलाओं को भूमि स्वामित्व मिलने से एक सामाजिक “पावर-बैलेन्स” भी बनेगा जिसमें स्त्री हो या पुरुष सभी को बराबर का दर्जा मिले। पति की मृत्यु के उपरांत पत्नी की बजाय पुत्र या भाई को कृषि भूमि पर अधिकार मिलने की वजह से विधवा स्त्रियों की दुर्दशा छुपी नहीं है। दूसरा, नौकरी या मजदूरी की तलाश में शहर जाने वाले छोटे किसान खेती की जिम्मेदारी घर की महिलाओं पर ही छोड़कर जाते हैं। इसलिए यह कहना कि महिलाएं खेती कैसे संभालेंगी, एक दुष्प्रचार के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि वैसे भी आधी से ज्यादा खेती का काम महिलाएं ही संभाल रही हैं। यह बात कई शोध में सामने आ चुकी है।

भारतीय महिलाओं को भूमि अधिकार ना मिलने के कई कारणों में कानूनी जागरूकता की कमी और पारिवारिक विरोध मुख्य हैं। LANDESA नामक संगठन भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में महिला भूमि अधिकार के क्षेत्र में काफी सक्रिय है। “महिलाओं के लिए, भूमि स्वामित्व वास्तव में एक सर्वोपरि, सर्वप्रथम अधिकार है – इसके बिना, मूल अधिकारों और सभी महिलाओं के उत्थान व सुधार के प्रयासों में बाधा उत्पन्न होती रहेगी।” – यह LANDESA संगठन के चीफ प्रोग्राम ऑफिसर कैरोल बोर्डों का कथन है। यह संगठन वर्ल्ड बैंक के साथ मिलकर “STAND FOR HER LAND” नामक अभियान के माध्यम से गांवों और समुदायों में महिलाओं के लिए भूमि अधिकार को एक वास्तविकता बनाने में जुटा है।

पुरुषों को करीब 90% भू-स्वामित्व मिलने से ही हमारा देश पुरुष-प्रधान बना है। विश्व के सभी आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्र पुरुष-प्रधान व्यवस्था से निकल कर एक न्याय-संगत और लैंगिक समानता वाले समाज में बदल रहे हैं। केवल कानून लाने से यह बदलाव संभव नहीं है। आर्थिक विकास के साथ साथ एक सामाजिक क्रांति वर्तमान समय की जरूरत है। अब हमें ऐसे युग की ओर बढ़ना है जिसमें स्त्री-पुरुष, शिवा-शक्ति की तरह साथ मिलकर हमारे देश की कृषि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ायें। कृषि से जुड़े हर पहलू में बिना महिलाओं की बराबर भागीदारी के यह संभव नहीं है। सभी किसान भाई अपने घर की महिलाओं को खेती में बराबर अधिकार और सम्मान दें। उन्हें आगे बढ़ने का मौका दें, प्रतिनिधित्व करने दें। जब कोई एक किसान की कल्पना करे तो महिला किसान की तस्वीर भी मन में आए। महिला किसान को उनकी अपनी पहचान मिल सके।

Written By

You May Also Like

संघर्ष

पिछले आठ महीने से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन के दौरान कितने किसानों की मौत हुई या कितने बीमार हुए, इस...

संघर्ष

दुनिया को खबर देने वाले पत्रकार रमन कश्यप की मौत की जानकारी उसके परिजनों को 9-10 घंटे बाद मिली, लिंचिंग के दावों को पिता...

Sticky Post

उत्तराखंड में बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं के प्रभाव का आकलन किए बिना आगे बढ़ने की गलती को बार-बार दोहराया जा रहा है।

संवाद

जब तक नए जमाने की पढ़ाई के बारे में पता चलता है तब तक ‘नया जमाना’ और आगे जा चुका होता है।