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नीति

दुग्ध उत्पादन में भी आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया उत्तराखंड?

9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड निर्माण के समय से ही उत्तराखंड सरकार नीतिगत दिशाहीनता का शिकार रही है। जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए आंदोलन किया, वे नारे लगाते रह गए और जो राज्य विरोधी थे वे सत्ता में बैठ गए। जिस राज्य (उत्तरप्रदेश) की व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन किया, शहादतें दीं, उसी राज्य उत्तर प्रदेश की व्यवस्था को नए पर्वतीय राज्य में थोप दिया गया। नतीजतन राज्य निर्माण के 20 वर्ष बाद भी राज्य मूलभूत सुविधाओं के अभाव के साथ रोजमर्रा के जीवन उपयोगी सामग्री जैसे दूध, फल, सब्जी और अनाज के लिए भी उत्तर प्रदेश सहित बाहरी राज्यों पर निर्भर है। 

20 वर्षों के राज्य में आठ मुख्यमंत्री बन चुके हैं। राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के अलावा किसी भी मुख्यमंत्री के विकास का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं हो सका। कुछ को समय नहीं मिला और कुछ को पता ही नहीं था कि करना क्या है? नारायण दत्त तिवारी ने नेहरूवादी विकास दृष्टिकोण को अपनाते हुए सिडकुल जैसे औद्योगिक केंद्र बनाये और इस उम्मीद में कि इनके द्वारा विकास की गंगा मैदानी क्षेत्र से पर्वतीय क्षेत्र तक बहेगी। लेकिन इस शहर केंद्रित नेहरूवादी विकास मॉडल के परिणामस्वरूप पर्वतीय क्षेत्र से पलायन लगातार बढ़ने लगा है। पलायन आयोग की रिपोर्ट और कम होती विधानसभा की सीटें इस तथ्य की पुष्टि करती हैं ।

राज्य निर्माण के समय अर्थात जनगणना 2001 के अनुसार, पर्वतीय जिलों पौड़ी (697078), उत्तरकाशी (295013), चमोली (370359), रुद्रप्रयाग (227439), टिहरी गढ़वाल (604747), पिथौरागढ़ (462289), चम्पावत (224542), अल्मोड़ा (630567), बागेश्वर (249462) अर्थात पूर्णरूप से पर्वतीय जिलों की कुल जनसंख्या सैंतीस लाख इकसठ हजार चार सौ छियानवें (3761496) थी। यह जनसंख्या बहुत ज्यादा नहीं थी, पर उत्पादन और बाजार के दृष्टिकोण से बहुत मामूली भी नहीं है।

राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के अनुसार, वर्ष 2001-02 में देश में दूध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 225 ग्राम प्रतिदिन थी, जबकि उत्तराखंड में 344 ग्राम; जो कि वर्ष 2018 -19 में बढ़कर, राष्ट्रीय औसत 394 ग्राम के मुकाबले उत्तराखंड में 455 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन हो गई। दूध उपलब्धता के मामले में पंजाब (1181 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन), हरियाणा (1087 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन), राजस्थान (870 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन), गुजरात (626) ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन अग्रणी राज्यों में हैं। उत्तराखंड के पडोसी राज्य हिमाचल में 565 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की उपलब्ध्ता है। प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के मामले में उत्तराखंड की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार अल्मोड़ा (615), बागेश्वर (597), चमोली (478), चम्पावत (544), पौड़ी (452), पिथौरागढ़ (646), रुद्रप्रयाग (489), उत्तरकाशी (454), नैनीताल (417) ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की उपलब्धता है। जबकि देहरादून (227), हरिद्वार (381), उधमसिंह नगर (349) की स्थिति राज्य औसत 407 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मुकाबले कम है।

उत्तराखंड के जिलों में सालाना दुग्ध उत्पादन

2001-022015-162017-18
जनपदहजार मीट्रिक टनहजार मीट्रिक टनहजार मीट्रिक टन
अल्मोड़ा113.4139149.26
बागेश्वर47.557.661.137
चमोली66.869.870.255
चम्पावत30.654.656.423
पौड़ी94.7112.8118.281
पिथौरागढ़83.1116128.847
रुद्रप्रयाग35.844.443.09
टिहरी गढ़वाल100.4110.8118.05
उत्तरकाशी49.357.263.741
कुल621.6762.2809.084
स्रोत: उत्तराखंड सरकार के पशुपालन विभाग की वेबसाइट
https://ahd.uk.gov.in/pages/display/125–statistics-and-census

राष्ट्रीय डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड और उत्तराखंड सरकार के पशुपालन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में सालाना दुग्ध उत्पादन 3 प्रतिशत की चक्रवृद्धि दर के साथ वर्ष 2001-02 के 10 लाख 66 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर, 2016-17 में 16 लाख मीट्रिक टन और वर्ष 2017-18 में लगभग 17 लाख 42 हजार मीट्रिक टन हो गया था। हरिद्वार और उधमसिंह नगर में कुल दूध का 35 प्रतिशत उत्पादित होता है, हालांकि प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के मामले में ये दोनों जिले राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे हैं।

उत्तराखंड में कृषि और पशुपाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं। दूग्ध उत्पादन और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2001 में, उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड की स्थापना की गई। इसके पीछे सहकारी ब्रांड अमूल की सफलता को उत्तराखंड में दोहराने की सोच रही होगी। यह सहकारी समिति, जिला स्तरीय दुग्ध सहकारी संघों का राज्य स्तरीय शीर्ष संघ है। इस फेडरेशन का मुख्य उद्देश्य ग्राम स्तर पर दुग्ध संघों का निर्माण करते हुए, दुग्ध उत्पादन को बढ़ाना, किसानों को उचित मूल्य दिलवाना और अंततः ग्रामीण विकास में सहयोग करना है। इस कार्य के लिए राज्य के 13 जिलों में कुल 11 दुग्ध संघ गठित किये गए हैं। रुद्रप्रयाग जिले को पौड़ी और बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले के दुग्ध संघ के साथ सम्वद्ध किया गया है। इन दुग्ध संघों के पास नौ (9) दुग्ध प्रसंस्करण केंद्र हैं जिनकी कुल क्षमता 2.62 लाख लीटर प्रतिदिन है, और 44 शीतलन केंद्र हैं, जिनकी क्षमता 1.15 लाख लीटर प्रतिदिन है। जिला स्तर पर क्षमता का आंकड़ा नीचे की तालिका में दिया हुआ है। 

उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में सहकारी डेयरी संघ की क्षमता

 जनपदकुल धारण क्षमता
(लीटर प्रतिदिन)
शीतलन केंद्र की क्षमता
(लीटर प्रतिदिन)
औसत खरीद
(लीटर प्रतिदिन)
औसत बिक्री
(लीटर प्रतिदिन)
अल्मोड़ा2000010000834411730
चमोली5000100013201134
चम्पावत5000100013201134
पौड़ी 20000600026833833
पिथौरागढ़5000100052734600
टिहरी गढ़वाल5000100021641763
उत्तरकाशी20001000825891
देहरादून2000040001167418802
नैनीताल100000500007967971087
उधम सिंह नगर50000400004812428990
हरिद्वार300000110898316
 कुल262000115000172495152280
स्रोत: उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड की वेबसाइट https://www.ucdfaanchal.org

किसी भी व्यापार की सफलता का प्रथम सूत्र है कि उसके उत्पाद की बाजार में मांग कितनी है। उसके पश्चात उत्पादन तथा आपूर्ति करने की क्षमता और आपूर्ति का तरीका अर्थात सप्लाई चेन पर नजर जाती है। भारत सरकार के जनगणना के अनुसार, वर्ष 2020 में उत्तराखंड की अनुमानित जनसंख्या एक करोड़ सत्रह लाख है। दूध की उपलब्धता के राष्ट्रीय औसत 455 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से उत्तराखंड को रोजाना 53.24 लाख लीटर दूध की आवश्यकता होती है, जबकि राज्य के औसत 344 ग्राम प्रतिदिन के अनुसार 40.25 लाख लीटर दूध की जरूरत होती है। इसके मुकाबले उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन की रोजाना औसत बिक्री डेढ़ लाख लीटर के आसपास है, जो राज्य की अनुमानित मांग का 5 फीसदी भी नहीं है। यानी 95 फीसदी दूध की खपत सहकारी डेयरी के अलावा अन्य स्रोतों से पूरी हो रही है। इस दूध का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से आता है।

राज्य के 72 प्रतिशत हिस्से में वन भूमि है, अर्थात हरा चारा भी उपलब्ध है। पीने के पानी की समस्या भी नहीं है इसके बावजूद भी क्या कारण है कि राज्य की दुग्ध सहकारी समिति राज्य में दूध की मांग के आंकड़े के आसपास भी नहीं पहुंच पाती है। यह बहुत बड़ा प्रश्न है, जिसका उत्तर ढूंढने के लिए हमें देश के सफलतम दुग्ध संघ अमूल के साथ साथ राज्य की कृषि, वन और पशुपालन नीतियों की समीक्षा करनी होगी।

उत्तराखंड सहकारी दुग्ध संघ की स्थापना राज्य प्राप्ति के मात्र चार महीने बाद की मार्च 2001 में हो गई थी। इसके तहत आंचल नाम से एक नए ब्रांड पंजीकृत किया गया था। उत्तराखंड सहकारी दुग्ध संघ लिमिटेड की वेबसाइट में लिखा है कि यह उत्तर प्रदेश सहकारी दुग्ध संघ का ही उत्तराधिकारी है।  अर्थात उम्मीद की जा सकती है कि इसके काम करने का तरीका, प्रबंधन भी उत्तरप्रदेश सहकारी संघ जैसा ही होगा और सफलता-असफलता का पैमाना भी मिलता-जुलता ही रहेगा।  

उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ की बात करें या रुद्रप्रयाग – पौड़ी की, सब जगह आंचल डेरी की हालत एक जैसी ही है। इसी से पूरे राज्य की स्थिति का पता चल जाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पिथौरागढ़ शहर की जनसंख्या 56044 थी। पिछले 10 वर्षों में शहर भी फैला है और जनसंख्या का घनत्व भी बड़ा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्ष 2020 में शहर की जनसंख्या लगभग एक लाख होगी। जिले की जनसंख्या 2011 में 4 लाख 83 हजार थी, जो वर्ष 2019 में आधारकार्डों के आधार पर लगभग 5 लाख 28 हजार हो गई है। अगर हम राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के आंकड़ों को आधार मानें तो पिथौरागढ़ शहर को प्रतिदिन 45 हजार 500 लीटर दूध की आवश्यकता होती है। पिथौरागढ़ स्थित आंचल डेरी की क्षमता ही 10 हजार लीटर की है और प्रतिदिन का दूध संग्रहण मात्र 3000 लीटर का है। अर्थात शहर में राज्य औसत के हिसाब से प्रतिदिन 42 लीटर से अधिक दूध आंचल डेरी और सहकारिता के बाहर के स्रोतों से आ रहा है। यही स्थिति श्रीनगर स्थित आंचल डेरी की भी है। श्रीनगर डेरी के कार्यक्षेत्र में पौड़ी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग जिले का कार्यभार है जबकि इसकी कुल क्षमता ही मात्र 3000 लीटर की है। कोटद्वार स्थित आंचल डेरी में भी मात्र 3000 लीटर दूध की संग्रहण क्षमता है। 

अगर राज्य में दूध की औसत उपलब्धता को आधार माना जाए तो प्रतिदिन राज्य को 53 लाख 25 हजार 500 लीटर दूध की आवश्यकता होती है। अमूल दूध जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सहकारिता संघ है, उसका भी प्रतिदिन दूध संग्रहण 33 लाख लीटर ही है और क्षमता 50 लाख लीटर दूध की है। वर्ष 2018 -19 में इसकी बिक्री 6,966 करोड़ रूपये की थी। मतलब, उत्तराखंड राज्य सिर्फ दूध पर ही ध्यान केंद्रित करे तो इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन आंकड़े और इतिहास तो इसके खिलाफ गवाही दे रहे हैं। पायनियर अखबार के दिनांक 17 जुलाई 2019 के अंक में सहकारिता मंत्री धनसिंह रावत के हवाले से छपी खबर के अनुसार, आंचल डेरी की कुल बिक्री 2 लाख 25 हजार लीटर प्रतिदिन है, और अगर इसे 40 रूपये प्रति लीटर के औसत से जोड़ा जाये तो यह एक साल में 328.5 करोड़ रुपये बैठता है। इसमें कुल तनख्वाह, संयंत्रों में बिजली की खपत, पेट्रोल डीजल की खपत, संयंत्रों का रखरखाव जोड़ देने के बाद क्या बचता होगा यह एक अलग अध्ययन का विषय है।      

उत्तराखंड में दुग्ध उत्पादन की इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या वन नीतियां जिम्मेदार हैं? या हमारा उद्यमिता के प्रति नकारात्मक और सुषुप्त रवैया इसका कारण हैं?

उत्तराखंड में कुल भूमि का लगभग 72 प्रतिशत वन भूमि है और अगर पर्वतीय जिलों की बात करें तो कुल क्षेत्रफल के 90 प्रतिशत में वन हैं। यह सच है कि वन कानून अनेक विकास कार्यो के आड़े आते हैं, पर क्या जंगल से चारा पत्ती लाना, जानवर चराना, नदी में ले जाकर जानवरों को पानी पिलाने पर भी रोक है या वन कानून आड़े आ रहे हैं? शायद कुछ हद तक, लेकिन गांव के आसपास बंजर पड़े खेत तो चारा उगाने में काम आ सकते हैं; तो फिर दूध उत्पादन में हम आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो पा रहे हैं? 

पिथौरागढ़ जिला सहकारी दुग्ध संघ के पूर्व अध्यक्ष विनोद कार्की के अनुसार, उनके कार्यकाल में दूध संग्रहण 8000 लीटर प्रतिदिन तक पहुंच गया था जो अब फिर से 3000 लीटर पर पहुंच गया है। इसके अनेक कारण हैं। उनमें जो सबसे प्रमुख कारण है, वह है कि लोग दूध उत्पादन को व्यवसाय के रूप में नहीं ले रहे हैं। वे दूध के लिए एक दो गाय – भैस रखते तो हैं पर उसे पूर्ण व्यवसाय नहीं समझते। एक दो गाय – भैंस के कारण उनको उचित आमदनी नहीं हो पाती है, लेकिन वे पशुपालन में पूरी तरह बंध जाते हैं। जिस कारण दूध का उत्पादन गिर रहा है। अब तो ग्रामीण क्षेत्र में भी लोग दूध की थैलियों पर निर्भर हो रहे हैं।

पौड़ी जिला दुग्ध सहकारी संघ के अध्यक्ष हरेंद्र पाल सिंह नेगी के अनुसार दूध उत्पादन और आंचल डेरी की क्षमता बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। काश्तकारों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे उन्नत किस्म के पशु खरीदें जिसे दूध उत्पादन की मात्रा बढ़ सके। इसके लिए सरकार की तरफ से  पांच और तीन गायों के हिसाब से क्रमश: 4 लाख और 2 लाख 46 हजार रूपये के ऋण की व्यवस्था का प्रावधान भी है, इस ऋण पर 50 प्रतिशत की छूट भी है। इसके अलावा आंचल डेरी के रुद्रपुर फार्म से उन्नत चारा भी रियायती दरों पर मिल रहा है। पशु चिकित्सक की सेवाएं भी मिलती हैं। 

पौड़ी गढ़वाल के संगलाकोटी के जागरूक काश्तकार और व्यवसायी भास्कर द्विवेदी बताते हैं कि यह ऋण और सब्सिडी ही सबसे बड़ी समस्या है। सरकार ऋण और सब्सिडी तो देती है पर पशु कहां से खरीदने हैं, कौन से खरीदने हैं, इस प्रकार के अनेक शर्ते लगा देती है। पैसा भी सीधे पशु विक्रेता के खाते में आता है और कभी-कभी तो डेरी के लोग स्वयं पशु खरीदकर भी दे देते हैं। इस सबमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है, और काश्तकार पूरी तरह ठगा महसूस करता है। पशु खरीदने के बाद दूध बेचने की शर्त और चारा खरीदने की अतिरिक्त शर्त भी लोगों को आंचल डेरी से दूर ले जाती है। दूध बेचने के बाद भी भुगतान समय पर नहीं मिलता है और न ही पशु के बीमार होने पर पशु चिकित्सक समय पर आता है। इस तरह की कई समस्याएं हैं।    

आंचल डेरी राज्य प्रबंधन समिति के सदस्य राम पाण्डे के अनुसार, दुग्ध सहकारिता समिति में प्रशासनिक दवाब, दखलंदाजी और लालफीताशाही के कारण निर्णय लेने में दिक्कतें आती हैं, जो इसकी दयनीय स्थिति का बड़ा कारण है। आंचल डेरी की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा निजी दुग्ध व्यवसायियों के साथ होती है, जो स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं। निजी व्यवसायी समय-समय पर बाजार की स्थिति और दूध की उपलब्धता के हिसाब से मूल्यों को घटा बढ़ाते रहते हैं। काश्तकारों को समय  पर पैसा देने के अलावा बीमारी के समय जरूरत पड़ने पर अग्रिम भुगतान भी कर देते हैं। इस कारण किसान का झुकाव निजी व्यवसायियों की तरफ रहता है।

हालांकि आंचल डेरी भी किसानों के साथ बेहतर भागीदारी के लिए अनेक प्रयास करती है। आंचल डेरी के पास अपने पशु चिकित्सक भी हैं जो समय समय पर किसानों के पशुओं की देखभाल और इलाज करते हैं। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अत्यधिक दखलंदाजी और केंद्रीकृत संरचना आंचल डेरी को एक स्वतंत्र और पेशेवर संस्था बनाने की दिशा में बाधक बन रही है। राम पाण्डे स्वेत क्रांति के पुरोधा स्वर्गीय वर्गीज कुरियन के उस वक्तव्य को याद करते हैं जो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री को दिया था।

किस्सा है कि अमूल की सफलता से प्रसन्न होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने वर्गीज कुरियन से कहा कि अमूल के मॉडल को देश के अन्य हिस्सों में भी फैलाया जाए और इसके लिए वे (वर्गीज कुरियन) राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड का नेतृत्व करें। प्रधानमंत्री के आग्रह पर वर्गीज कुरियन ने कहा कि वे तैयार हैं लेकिन शर्त यह है कि राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड को प्रशासनिक हस्तक्षेप और लाल फीताशाही से बचाते हुए इसके मुख्यालय को दिल्ली से दूर किसानों के बीच बनाया जाये। इस पर प्रधानमंत्री ने हामी भरी और नतीजतन देश में स्वेत क्रांति का आगाज हुआ। यही स्वायत्ता और पेशेवर नेतृत्व आंचल डेरी को भी चाहिए, तभी इसका विकास संभव है।    

इसके अलावा उत्तराखंड के मामले में दो अन्य बिंदु भी महत्वपूर्ण हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला है राज्य के विभिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक, धार्मिक और भौगोलिक परिस्थितियों में बहुत बड़ा अंतर है। उधम सिंह नगर के खटीमा की दुग्ध सहकारी समिति और उत्तरकाशी के मोरी – रवाईं घाटी की समिति के दूध की मात्रा, गुणवत्ता, उत्पादन लागत के साथ-साथ सामाजिक सोच में भी बहुत अंतर है। यह अंतर हजारों सालों के मानव विकास की यात्रा के कारण पनपा है, इसे समाप्त करना आसान नहीं है। इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए विभिन्न क्षेत्रों के लिए स्वायत्त संस्थायें बनाई जानी चाहिए, जो एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हों। और एक दूसरे के निर्णय को प्रभावित न करती हों।

दूसरा महत्वपूर्ण विषय है गोवंश के चयन का। अभी वर्तमान में जो नीति चल रही है उसके अनुसार किसानों को उन्नत श्रेणी के पशु खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि पशु विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय प्रजाति की बद्री गाय जो सैकड़ों वर्षों से हर परिस्थिति से सफलतापूर्वक जूझती हुई, स्वयं को बचाये हुए है, वही यहां के लिए सर्वश्रेष्ठ है। यह गाय जंगलों में चरने जा सकती है, जहां पर वो पौष्टिक चारे के अलावा बेशकीमती जड़ी-बूटी भी खाती है। शुद्ध वातावरण, शुद्ध चारे और साफ पानी के कारण दूध की मात्रा भले ही कम हो पर गुणवत्ता सर्वोत्तम होती है। जिसको अगर अलग तरीके से बाजार में उतारा जाए तो उसका मूल्य भी अधिक मिलेगा। इन बद्री गायों के मुकाबले उन्नत और क्रॉस ब्रीड पशुओं को लाने के कई और भी नुकसान भी हैं। जिसमें सबसे प्रमुख है कि धीरे-धीरे स्थानीय पशुओं की नस्ल खत्म हो जाएगी। यह कोई काल्पनिक बयान नहीं है बल्कि इसका खामियाजा उड़ीसा के कालाहांडी ने झेला है। नतीजतन, यह जिला भुखमरी के कगार पर पहुंच गया। इस पूरे मामले को वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने अपनी पुस्तक ‘एव्रीबडी लव्स ए गुड ड्रॉट में समझाया है।   

उत्तराखंड इस स्थिति में न पहुंचे इसके लिए अभी से प्रयास किये जाने की जरूरत है। अधिक उत्पादन, बड़ी इकाई, बड़े बाजार की मानसिकता से हटकर हमें इस तथ्य को स्वीकारना पड़ेगा कि जैसे-जैसे हम पहाड़ में चढ़ते हैं, वहां की सभी चीजें इंसान से लेकर पशु तक छोटे होते जाते हैं। इसलिए हमारा विकास मॉडल भी छोटा होना चाहिए। दूध के मामले में भी जिला स्तर पर स्वायत संस्थायें  बनानी चाहिए। दूध के विपणन को एक पेशेवर चुनौती के रूप में लेना चाहिए। अगर हम सिर्फ दूध को ही प्राथमिकता दे दें तो यही उत्तराखंड को विकास की उंचाईयों में ले जाने में सक्षम है। लेकिन उसके लिए सही नजरिये और नीति की जरूरत है।

(लेखक समाजशास्त्री और नीतिगत मामलों के जानकार हैं)

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संवाद

जब तक नए जमाने की पढ़ाई के बारे में पता चलता है तब तक ‘नया जमाना’ और आगे जा चुका होता है।