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कोविड के बावजूद बढ़े अरबपति, 1% लोगों के पास देश की 40% संपत्ति

भारत में 21 अरबपतियों के पास 70 करोड़ लोगों से ज्यादा संपत्ति, लेकिन टैक्स का बोझ गरीबों पर ज्यादा

विश्व के साथ-साथ भारत में भी अमीरों और गरीबों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। कोविड महामारी के बाद जहां आम लोग अपनी नौकरी और कामधंधे बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं अरबपतियों की संख्या और संपत्ति बढ़ती जा रही है। अगर सबसे धनी लोगों पर टैक्स बढ़ाया जाए तो करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में मदद मिल सकती है।

ऑक्सफैम की नवीनतम रिपोर्ट सरवाईवल ऑफ द रिचस्ट: द इंडिया स्टोरी के अनुसार, भारत के सबसे धनी 1 फीसदी लोगों के पास देश की 40 फीसदी से ज्यादा संपत्ति है जबकि 50 फीसदी लोग सिर्फ 3 फीसदी संपत्ति पर गुजारा कर रहे हैं। देश के 21 अरबपतियों के पास 70 करोड़ लोगों से ज्यादा संपत्ति है। सबसे धनी 10 भारतीयों की कुल संपत्ति 27 लाख करोड़ रुपए है जो मनरेगा के 38 वर्ष के बजट के बराबर है। पिछले साल से इसमें 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

दूसरी तरफ देश में भूख से त्रस्त लोगों की तादाद चार साल में 18 करोड़ से बढ़कर 35 करोड़ हो गई है। जन साधारण पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ ज्यादा है और बैंक भी उनके साथ सख्ती करते हैं।

बढ़ी अरबपतियों की तादाद

कोविड संकट के बावजूद भारत में अरबपतियों की तादाद बढ़ी है। देश में अरबपतियों की संख्या वर्ष 2020 में 102 से बढ़कर वर्ष 2022 में 166 हो गई। इस दौरान अरबपतियों की संपत्ति 121 फीसदी बढ़ी है। भारत के 100 सबसे धनी लोगों की कुल संपत्ति 54 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई है, जो केंद्र सरकार के डेढ़ साल के बजट के बराबर है।

सुपररिच पर टैक्स लगाने का सुझाव

ऑक्सफैम ने गरीबी कम करने के लिए अरबपतियों पर टैक्स बढ़ाने की पैरवी की है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के सबसे धनी व्यक्ति (गौतम अड़ानी) की संपत्ति वर्ष 2022 में 46 प्रतिशत बढ़ी है। उनके अनरियलाईज्ड गेन्स (2017-21 के दौरान) पर एकबारगी 20 प्रतिशत टैक्स लगाकर 1.8 लाख करोड़ रुपए जुटाए जा सकते हैं। यह धनराशि साल भर तक प्राथमिक विद्यालयों के 50 लाख शिक्षकों को वेतन देने के लिए पर्याप्त है। रिपोर्ट में कहा गया है कि टॉप 100 अरबपतियों पर 2.5 प्रतिशत कर लगाने या 10 सबसे अमीर लोगों पर पांच प्रतिशत कर लगाने से बच्चों को स्कूल वापस लाने के लिए आवश्यक राशि इकट्ठा हो जाएगी। 

ऑक्सफैम इंडिया के सीईओ अमिताभ बेहर ने कहा, “जहां देश भूख, बेकारी, महंगाई व स्वास्थ्य आपदाओं से जूझ रहा है, वहां भारत के अरबपति अच्छा कमा रहे हैं। भूख से त्रस्त भारतीयों की संख्या वर्ष 2018 में 19 करोड़ थी जो वर्ष 2022 में 35 करोड़ हो गई। कोविड को देखते हुए भारतीय सरकार को निर्धनता के विरुद्ध बड़े कदम उठाने चाहिए थे, पर यह नहीं हो सका। धनी वर्ग पर अधिक ध्यान दिया गया।”

भारत ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भी अमीरी और गरीबी का अंतर बढ़ता जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2020 से विश्व के सबसे धनी 1 फीसदी अरबपतियों ने 90 फीसदी लोगों के मुकाबले छह गुना ज्यादा संपत्ति अर्जित है।

अरबपतियों पर बैंक मेहरबान

रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय बैंकिंग व्यवस्था कर्ज वसूली के मामले में पक्षपात करती है। गरीबों से कर्ज वसूलने में खूब सख्ती बरती जाती है जबकि कॉरपोरेट सेक्टर को दिए गए 11 लाख करोड़ रुपए के कर्ज सरकारी बैंकों द्वारा बट्टे खाते में डाल दिए गये। इसमें से बमुश्किल 13 फीसदी कर्ज की वसूली हो पायी। सरकार और नीतियों पर अपने प्रभाव के चलते सबसे धनी लोगों को उनकी संपत्ति बढ़ाने में मदद मिलती है। इस चक्र को तोड़ने के लिए सबसे ऊपर के 1 प्रतिशत धनी व्यक्तियों की संपत्ति पर स्थाई तौर पर कर लगाना चाहिए।

टैक्स का बोझ आम जनता पर ज्यादा

एक तरफ जहां अरबपतियों की टैक्स रियायतों का लाभ मिलता है, वहीं टैक्स का बोझ जन साधारण पर ज्यादा है। वर्ष 2021-22 में जो 14.83 लाख करोड़ रुपये जीएसटी के रूप में प्राप्त हुए, उसका 64 प्रतिशत हिस्सा नीचे की 50 प्रतिशत जनसंख्या से प्राप्त हुआ जबकि ऊपर के 10 प्रतिशत से मात्र 3 प्रतिशत जीएसटी का हिस्सा प्राप्त हुआ। टॉप 10 फीसदी अमीरों के मुकाबले नीचे के 50 फीसदी लोग अपनी आय का छह गुना ज्यादा अप्रत्यक्ष करों के रूप में देते हैं।

ऑक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक गैब्रीला बुचर का कहना है कि धनी वर्ग पर टैक्स कम करने में कोई लाभ नहीं मिलेगा जबकि अत्यधिक धनी पर टैक्स लगाना विषमता कम करने व लोकतंत्र सशक्त करने के लिए जरूरी है।।

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