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अमृतकाल में कृषि मंत्रालय का बजट घटा, कई योजनाएं बंद

Guru Moorthy Gokul/Unsplash
Guru Moorthy Gokul/Unsplash

आजादी के अमृतकाल में कृषि मंत्रालय का बजट घट गया है। जिस खेती ने कोविड काल में पूरे देश की अर्थव्यवस्था को संभाला, उससे जुड़ी कई योजनाएं बंद हो गईं जबकि कई योजनाओं के बजट में कटौती की गई है। यह सब आपको वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण से पता नहीं चलेगा। इसके लिए बजट दस्तावेजों को गौर से पढ़ना होगा।

आम बजट 2023-24 के मुताबिक, कृषि मंत्रालय का बजट पिछले साल लगभग 1.33 लाख करोड़ रुपये था जो इस साल घटकर 1.25 लाख करोड़ रह गया है। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के लिए पिछले साल 1,24,000 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान था जबकि इस साल 1,15,532 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है। यह कटौती करीब 6.8 फीसदी बैठती है।

कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग का बजट 8513 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 9504 करोड़ रुपये किया गया है। इसके बावजूद कृषि मंत्रालय का कुल बजट पिछले साल के बजट अनुमान से 5.6 फीसदी कम है। इस कटौती के अलावा किसानों को उपज का बेहतर दाम दिलाने और खेती को घाटे से उबारने का कोई रोडमैप भी बजट में नजर नहीं आया।

बजट कटौती की मार खेती से जुड़ी जिन योजनाओं पर पड़ी है, उनमें प्रधानमंत्री फसल बीमा भी शामिल है। इस योजना का बजट पिछले साल 15,500 करोड़ रुपये था, जो घटकर 13,625 करोड़ रुपये रह गया है। उम्मीद लगाई जा रही थी कि पीएम-किसान सम्मान निधि की धनराशि में बढ़ोतरी की जाएगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि पीएम-किसान योजना के बजट को 68,000 करोड़ रुपये से घटाकर 60,000 करोड़ रुपये कर दिया है। इसी तरह राष्ट्रीय कृषि विकास योजना का बजट 10,433 करोड़ रुपये से घटकर 7,150 करोड़ रुपये रह गया है।

पिछले साल केंद्र सरकार ने हरित क्रांति से जुड़ी कई योजनाओं को बंद कर कृषोन्नति योजना शुरू की थी। इसके बजट में भी कटौती की गई है। इसका बजट पिछले साल के 7183 करोड़ रुपये से घटाकर इस साल 7066 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है।

खेती से जुड़ी कई योजनाएं केंद्र सरकार ने बंद कर दी हैं या फिर बेहद मामूली बजट रखा है। किसानों को बाजार से उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए मार्केट इंटरवेंशन एंड प्राइस सपोर्ट स्कीम के लिए पिछले साल बजट में 1500 करोड़ रुपये का प्रावधान था, जबकि इस साल मात्र एक लाख रुपये का बजट मिला है। यही हाल प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण योजना (पीएम-आशा) का है। पिछले साल इसका बजट मात्र एक करोड़ था, जो खर्च नहीं हुआ। इस साल केवल एक लाख रुपये का बजट मिला है। नेशनल बीकीपिंग हनी मिशन का भी यही हाल है। पिछले साल इसका बजट 100 करोड़ रुपये था, जो इस साल मात्र एक लाख रुपये रह गया है।

किसानों को पराली जलाने से रोकने की योजना भी ठंडे बस्ते में जा चुकी है। इस योजना के लिए कोई बजट नहीं है। जलवायु परिवर्तन के मुताबिक खेती की योजना भी बजट में कटौती का शिकार हुई हैं। पिछले साल इस योजना के लिए 40 करोड़ रुपये का बजट था जबकि इस साल इसके लिए कोई बजट नहीं है। बजट आवंटन की स्थिति से स्पष्ट है कि ये योजनाएं बंद हो चुकी हैं या फिर बंद होने के कगार पर हैं।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में मोटे अनाजों को ‘श्री अन्न’ करार देते हुए भारत को इनका ग्लोबल हब बनाने की बात कही है। लेकिन मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए कितना बजट रखा गया है, यह स्पष्ट नहीं है। जबकि परंपरागत कृषि विकास योजना बंद हो चुकी है।

कृषि अनुसंधान और शिक्षा के बजट में बढ़ोतरी हुई है, जिसके चलते कृषि विश्वविद्यालयोंं 263 करोड़ रुपये से बढ़कर 322 करोड़ रुपये हो गया है। आईसीएआर और सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी का बजट भी बढ़ा है।

प्रमुख घोषणाएं और उनके मायने

ग्रामीण क्षेत्रों में एग्री स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए एग्रीकल्चर एक्सलरेटर फंड बनाया जाएगा। इसे कितना बजट मिला है, अभी इसकी जानकारी नहीं है।

एक लाख किसानों को अगले 3 साल में प्राकृतिक खेती अपनाने में मदद की जाएगी। लेकिन इसके लिए सिर्फ 459 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है जो बहुत कम है। कुछ साल पहले जीरो बजट प्राकृतिक खेती और गंगा किनारे जैविक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया था। उसमें कितनी प्रगति हुई, यह देखने वाली बात है।

एफपीओ का बजट बढ़ा: सरकार ने एफपीओ को बढ़ावा की योजना का बजट 500 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 955 करोड़ रुपये कर दिया है।

खेती में पीपीपी: कपास की उत्पादकता बढ़ाने के लिए सरकार खेती के दरवाजे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के लिए खोलना चाहती है। हालांकि, तीन कृषि कानूनों के जरिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग और प्राइवेट मंडियों को बढ़ावा देने की सरकार की कोशिशों का खूब विरोध हुआ था।

20 लाख करोड़ रुपये के कृषि ऋण: इस साल सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के कृषि कर्ज बांटने का लक्ष्य रखा है। किसानों को सस्ती दरों पर फसल कर्ज मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार ब्याज छूट की योजना चलाती है, इसके गत वर्ष 15500 करोड़ रुपये का बजट था, जिसे बढ़ाकर 23000 करोड़ कर दिया है।

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