सोमवार, 21 जून 2021
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किसान आंदोलन को किधर ले जाएंगे राकेश और नरेश टिकैत के बयान



भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत संसद घेराव की चेतावनी से सरकार को ललकार रहे हैं तो उनके भाई नरेश टिकैत सुलह का रास्ता दिखा रहे हैं। फिलहाल इसी दोराहे पर खड़ा है किसान आंदोलन

अपने आंसूओं से किसान आंदोलन में नई जान फूंकने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत सरकार को लगातार चुनौतियां दे रहे हैं। अब राकेश टिकैत ने 40 लाख ट्रैक्टरों के साथ संसद घेराव की चेतावनी दी है। जबकि उनके भाई भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताते हुए सरकार को उनके जरिये सुलह का रास्ता सुझाया है। सुलह और चेतावनी के इन दो सुरों के बीच किसान आंदोलन की भावी रणनीति और असमंजस के संकेत देखे जा सकते हैं।

मंगलवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने राजस्थान के सीकर में किसान महापंचायत बुलाई थी। इसमें राकेश टिकैत के अलावा स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमरा राम भी मौजूद थे। सीकर महापंचायत में मंच से किसानों को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत कहा

“कान खोलकर सुन लो दिल्ली। ये ट्रैक्टर भी वही है और ये किसान भी वही है। अबकी कॉल पार्लियामेंट की होगी। और कह के जाएंगे। पार्लियामेंट पर जाएंगे। इस बार चार लाख ट्रैक्टर नहीं होंगे, चालीस लाख ट्रैक्टर जाएंगे। अबकी बार हल क्रांति होगी।”

किसान आंदोलन में राकेश टिकैत की एंट्री थोड़ी देरी से हुई थी। वे संयुक्त किसान मोर्चा के 26 नवंबर को दिल्ली कूच से एक दिन बाद आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन तब से वे संयुक्त किसान मोर्चा के साथ हैं और किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। किसानोंं के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे उनके ठेठ अंदाज का बड़ा हाथ है। हालांकि, उन पर किसान आंदोलन को भड़काने के आरोप भी लग रहे हैं।

26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का ऐलान भी सबसे पहले राकेश टिकैत ने किया था। “एक तरफ जवान चलेगा, दूसरी तरफ किसान चलेगा।” और “उधर टैंक चलेगा, इधर ट्रैक्टर चलेगा” इस तरह के बयानों ने 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का माहौल बनाया था। बाद में इसे संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना कार्यक्रम बना लिया। इसी तर्ज पर अब राकेश टिकैत लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद कूच की बात कह रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने लाल किले पर जाने से साफ इंकार किया है। सीकर में राकेश टिकैत ने हुंकार भरी

“तिरंगा भी फैलेगा और पार्लियामेंट पर फैलेगा, कान खोलकर सुन लो। ये ट्रैक्टर जाएंगे और हल के साथ जाएंगे। पार्लियामेंट के बाहर जिन पार्कों में आज से 32 साल पहले 1988 में आंदोलन हुआ था, वहां ट्रैक्टर चलेगा, वहां खेती होगी। इंडिया गेट पर जो पार्क है उसमें ट्रैक्टर चलेगा, जुताई होगी। सरकार या तो बिल वापस ले, एमएसपी पर कानून बनाये, नहीं तो दिल्ली की घेराबंदी पक्की होगी। तारीख कौनसी होगा? यह संयुक्त मोर्चा बताएगा। हमारे पंच भी यही हैं और हमारा मंच भी वही है।”

कभी आक्रामक तो कभी चुटीली बयानबाजी से आंदोलन में जोश भरना राकेश टिकैत की रणनीति का हिस्सा है। इससे वे मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। 26 जनवरी को लालकिले की घटना के बाद जब किसानों का मनोबल और संख्याबल दोनों टूटने लगे थे, तब राकेश टिकैत ने “किसान सीने पर गोली खाएगा, किसान कहीं नहीं जाएगा” और “जब तक गांव से पानी नहीं आएगा, जल ग्रहण करूंगा” जैसी बातों से किसानों को भावुक कर दिया था।

हालांकि, कई बार अपने बयानों पर खुद राकेश टिकैत को भी सफाई देनी पड़ती है। तब वे बड़ी मासूमियत से बात टाल देते हैं। आंदोलन को 2024 तक जारी रखने, फसलों को आग लगाने और लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद घेरने के ऐलान पर उन्हें सफाई देनी पड़ी। लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर टिकैत जिस मजबूती से डटे रहे। उससे उनकी छवि धाकड़ नेता की बनी है। सरकार को ललकारने वाले उनके बयान इस छवि को पुख्ता करते हैं। इसलिए भी वे रोजाना कुछ न कुछ सुर्खियां बटोरने वाला कह डालते हैं। ऐसा करते हुए टिकैत की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि वे हरियाणा और राजस्थान में बड़ी-बड़ी किसान पंचायतें कर रहे हैं।  

अब जबकि दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को तीन महीने बीत चुके हैं। सरकार के साथ आखिरी वार्ता हुए भी एक महीने से ज्यादा गुजर चुका है तो किसान आंदोलन की धार बनाये रखना बड़ी चुनौती है। यहां टिकैत काम आते हैं। यह बात संयुक्त किसान मोर्चा भी समझता है। शायद इसीलिए टिकैत के बयानों पर संयुक्त किसान मोर्चा कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनी सभाओं और प्रेस वार्ताओं में बुलाता है।

किसान आंदोलन को हरियाणा-पंजाब से बाहर फैलाने में टिकैत अहम भूमिका निभा रहे हैं। महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत और भाकियू के बड़े संगठन से उन्हें मदद मिल रही है। खासतौर पर सरदार वीएम सिंह के संयुक्त किसान मोर्चा से अलग होने के बाद किसान आंदोलन को व्यापक और एकजुट बनाये रखने के लिए टिकैत बंधुओं की जरूरत है। यही वजह है कि किसान आंदोलन के बाकी नेता आंदोलन में उभरते नये शक्ति केंद्र और राकेश टिकैत की बयानबाजी से असहज होने के बावजूद इस पर कुछ बोलने से बचते हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 23 मार्च को शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस पर दिल्ली कूच या संसद घेराव की रणनीति का ऐलान हो सकता है। इसकी रूपरेखा तय होनी बाकी है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल ऑल इंडिया किसान सभा के राजस्थान में संयुक्त सचिव संजय माधव का कहना है कि संसद मार्च की योजना पहले एक फरवरी को बनी थी, जिसे 26 जनवरी की घटना के बाद स्थगित कर दिया गया था। राकेश टिकैत ने संसद घेराव की जो बात कही है, उस पर भी विचार किया जाएगा। आंदोलन की भावी रणनीति का ऐलान 28 फरवरी को होगा।

एक तरफ जहां राकेश टिकैत संसद घेराव की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं भाकियू के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने सुलह का रास्ता सुझाया है। नरेश टिकैत ने कहा कि राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। उनकी बहुत शर्म-लिहाज है। हम भी उन पर विश्वास करते हैं। लेकिन उन्हें पिंजरे के तोते की तरह कैद कर रखा है। अगर उन्हें किसानों से बात करने की आजादी दी जाए तो एक दिन या एक घंटे में आंदोलन का फैसला हो जाएगा। लेकिन राजनाथ सिंह सरकार के शिकंजे में हैं। वे सरकार से बाहर नहीं बोल सकते।

लगता है बयानों से सुर्खियां बटोरने वाला फार्मूला नरेश टिकैत भी आजमाने लगे हैं। नरेश टिकैत का बयान खाप पंचायतों द्वारा आंदोलन का हल निकालने की कोशिशों के तौर पर भी देखा जा सकता है। इससे पहले भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में भी खाप पंचायतों से बातचीत के प्रयास किये थे, लेकिन तब खुद नरेश टिकैत ने भाजपा नेताओं से मिलने से इंकार कर दिया था। इसके बावजूद केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान खाप चौधरियों से मिलने पहुंचे तो उनकी खिलाफ नारेबाजी हुई जो अगले दिन हिंसक टकराव में बदल गई।

राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताकर नरेश टिकैत ने भाजपा की अंदरुनी राजनीति पर भी निशाना साधा है। साथ ही कृषि मंत्री से इतर किसी दूसरे नेता के जरिये सुलह का संकेत भी दिया है। वैसे, टिकैत बंधु राजनाथ सिंह के नजदीक माने जाते हैं और उनके साथ मंच साझा कर चुके हैं। लेकिन जिस अंदाज में नरेश टिकैत ने राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताया है, उससे यह सुझाव कम तंज ज्यादा हो गया है और सरकार शायद ही इसे स्वीकार करे।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े हरियाणा के बड़े किसान नेता गुरनाम सिंह चडूनी का कहना है कि राकेश टिकैत ने संसद घेराव की बात अपनी तरफ से कही है। इस बारे में संयुक्त किसान मोर्चा ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इसी तरह राजनाथ सिंह के जरिये सुलह का सुझाव भी नरेश टिकैत का व्यक्तिगत सुझाव है। चडूनी का कहना है कि टिकैत किसान आंदोलन में शामिल हैं, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा नहीं हैं।

राकेश टिकैत के सहयोगी और भाकियू के मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र मलिक का कहना है कि आंदोलन को मजबूत भी करना है और बातचीत का रास्ता भी निकालना है। राकेश टिकैत और नरेश टिकैत के हालिया बयानों को इसी संदर्भ देख जाना चाहिए। लेकिन इस बारे में अंतिम निर्णय संयुक्त किसान मोर्चा लेगा। राकेश टिकैत ने भी अपना मंच और पंच संयुक्त किसान मोर्चा को ही बताया है।

सामूहिक नेतृत्व इस किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है तो एक बड़ी चुनौती भी। एक नई चुनौती किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरे के तौर पर किसी एक नेता का उभरना भी है। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी आंदोलन में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान संगठन शामिल हैं। 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्चा के दौरान हुई हिंसा के बाद सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां पंजाब के आंदोलनकारियों की हुई थी। तब संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली हिंसा से किनारा करते हुए दीप सिद्धू के साथ-साथ सतनाम सिंह पन्नू के नेतृत्व वाली किसान मजदूर संघर्ष कमेटी से पल्ला झाड़ लिया था। आंदोलन की आगामी रणनीति पर इसका असर भी पड़ेगा।

पिछली बार ट्रैक्टर मार्च के दौरान जो कुछ हुआ, उसे देखते हुए संसद घेराव की चेतावनी पर सहमति बनाना आसान नहीं है। लेकिन जब तक मामला किसी निर्णायक स्थिति में पहुंचता है, तब तक टिकैत बंधु अपने बयानों से आंदोलन को चर्चाओं में जरूर बनाये रखेंगे।