उर्वरकों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी पर इफको की भयंकर लीपापोती

ऐसे समय जब देश में किसान आंदोलन चल रहा है, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की सरगर्मियां तेज हैं, तब खेती से जुड़ी एक खबर ने किसानों की नाराजगी बढ़ा दी है। उर्वरक बनाने वाले देश के सबसे बड़े संगठन इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने डीएपी समेत कई उर्वरकों के दाम 45 फीसदी से लेकर 58 फीसदी तक बढ़ा दिये हैं। डीएपी के 50 किलो के कट्टे का दाम 1200 रुपये से बढ़ाकर 1900 रुपये कर दिया है। डीजल व बाकी चीजोंं की महंगाई से जूझ रहे किसानों पर यह बड़ी मार है।

मामले के तूल पकड़ने के बाद इफको ने सफाई दी है कि ये दाम अस्थायी हैं और किसानों को पुराने रेट के उर्वरक ही बेचे जाएंगे। लेकिन कीमतों को लेकर मचे इस विवाद से उर्वरकों की कालाबाजारी का खतरा पैदा हो गया है। इफको की सफाई पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का खुलासा 7 अप्रैल को इफको के मार्केटिंग डायरेक्ट योगेंद्र कुमार की ओर से स्टेट मार्केटिंग मैनेजरों को भेजे गये एक विभागीय पत्र से हुआ है। इस पत्र के मुताबिक, डीएपी के अलावा चार अन्य उर्वरकों की कीमतें बढ़ायी गई हैं। एनपीके (10:26:26) की कीमत 1175 रुपये बढ़कर 1775 रुपये, एनपीके (12:32:16) की कीमत 1185 रुपये से बढ़कर 1800 रुपये, एनपीएस (20:20:0:13) की कीमत 925 रुपये से बढ़कर 1350 रुपये और एनपीके (15:15:15) की कीमत 1500 रुपये प्रति बैग तय की गई है। पत्र में कहा गया है कि नई कीमतें एक अप्रैल, 2021 से लागू होंगी और डीएपी व एनपीके का पुराना स्टॉक पुराने दाम पर बेचा जाएगा।

उर्वरकों की कीमतों में यह अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। इसके लिए अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की बढ़ती कीमतों को वजह बताया गया है। किसानों और विपक्ष के नेताओं ने इस मामले पर सरकार को घेरते हुए खासी नाराजगी जाहिर की है। कांग्रेस के सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि किसानों को क्या पता था कि किसान सम्मान निधि से कई गुना ज्यादा पैसा उनसे ही वसूला जाएगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान जारी कर उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा काफी चर्चाओं में है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, एक एकड़ खेती में लगभग एक कुंतल डीएपी का इस्तेमाल होता है। इस तरह प्रति एकड़ लगभग 1400 रुपये का खर्च केवल एक उर्वरक पर बढ़ जाएगा। डीएपी के अलावा यूरिया, देसी खाद और कीटनाशकों की लागत अलग है। प्रमुख उर्वरकों के दाम में 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी किसानों पर बहुत बड़ा बोझ है, जिससे किसानों की नाराजगी बढ़नी तय है। खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए सरकार पर आगामी खरीफ फसलों के एमएसपी बढ़ाने का दबाव भी बढ़ जाएगा।

पुराने स्टॉक की आड़ में इफको की सफाई

कायदे से तो इफको जैसी सहकारी संस्था को खुद ही नई कीमतों का ऐलान करना चाहिए था। लेकिन ऐसा ना करते हुए पूरे मामले पर लीपापोती की कोशिशें की जा रही हैं। इफको के एमडी और सीईओ डॉ. यूएस अवस्थी ने नियंत्रण-मुक्त उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि के लिए किसी राजनीतिक दल या सरकार को जिम्मेदार ठहराने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कई ट्वीट किये।

डॉ. यूएस अवस्थी के ट्वीट के मुताबिक, इफको 11.26 लाख टन कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री पुरानी दरों पर ही करेगी। बाजार में उर्वरकों की नई दरें किसानों को बिक्री के लिए नहीं हैं। एक ट्वीट में उन्होंने यहां तक कहा कि पत्र में उल्लिखित मूल्य केवल बैगों पर दिखाने के लिए हैं। क्योंकि फैक्ट्री में बने माल पर मूल्य अंकित करना पड़ता है। इफको मार्केटिंग टीम को निर्देश दिया गया है कि किसानों को केवल पुराने मूल्य वाले उर्वरक ही बेचे जाएं।

सवाल उठाता है कि अगर उर्वरकों के नये रेट किसानों के लिए नहीं हैं तो फिर किसके लिए हैं। जब पुराना स्टॉक खत्म हो जाएगा, तब उर्वरक किस रेट पर बिकेंगे? इफको ने खुद ही उर्वरकों के दाम बढ़ाये हैं तो फिर मामले को इतना क्यों घुमाया जा रहा है?

स्पष्ट है कि इफको ने उर्वरकों के दाम में बढ़ोतरी वाले अपने पत्र को खारिज नहीं किया है। लेकिन मामले को दबाने या कुछ दिनों के लिए टालने की कोशिश जरूर की जा रही है। इफको का यह कहना बहुत अजीब है कि नये मूल्य केवल बैगों पर दिखाने के लिए हैं और किसानों को बिक्री के लिए नहीं है। अगर उर्वरकों को पुराने रेट पर ही बेचना था तो रेट बढ़ाये ही क्यों? क्या पुराना स्टॉक खत्म होने के बाद उर्वरक नई कीमतों पर नहीं बिकेंगे? ये सवाल खूब उठा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दोहरा रवैया

उर्वरकों के दाम में बढ़ोतरी के लिए अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों को वजह बताया जा रहा है। हैरानी की बात है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है तो पेट्रोल-डीजल के दाम कम नहीं होते, लेकिन उर्वरकों के दाम कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के नाम पर बढ़ाये जा रहे हैं। यह दोहरा मापदंड किसानों पर दोहरी मार डाल रहा है।

कालाबाजारी का खतरा

उर्वरक की कीमतों को लेकर पैदा की जा रही गलतफहमी का फायदा जमाखोर उठा सकते हैं। इसके अलावा प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को भी दाम बढ़ाने का मौका मिल सकता है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में तेजी का रुझान है। इफको द्वारा बढ़ायी गई कीमतें अब सबके सामने हैं। ऐसे में कुछ लोग पुराने रेट का माल स्टॉक कर कालाबाजारी कर सकते हैं। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।

मामले को चुनाव तक टालने का प्रयास

उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ यूपी के पंचायत चुनाव पर भी असर डाल सकता है। किसान आंदोलन में तो यह मुद्दा बनेगा ही। संभवत: इसलिए पुराने स्टॉक के नाम पर मामले को कुछ दिनों के लिए टालने का प्रयास किया जा रहा है। माना जा रहा है कि जल्द ही उर्वरकों की कीमतों में संशोधन कर डैमेज कंट्रोल का प्रयास किया जा सकता है।

जल्द तय हो सकते हैं संशोधित रेट

इफको से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जिन देशों से उर्वरकों के लिए कच्चा माल आयात किया जाता है, वहां की कंपनियों के साथ बातचीत जारी है। इन सौदों के फाइनल होने के बाद उर्वरकों की कीमतें नए सिरे से तय हो सकती हैं। तब तक किसानों को पुराने रेट के उर्वरक बेचे जाएंगे। हालांकि, इफको के इन दावों की हकीकत जल्द ही सामने आ जाएगी, जब किसान खरीफ की बुवाई के लिए उर्वरक खरीदेंगे।

कहां चूकी सरकार?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में तेजी का हवाला देते हुए प्राइवेट कंपनियां उर्वरकों के दाम पहले ही बढ़ा चुकी हैं। ऐसे में सरकार और सहकारिता की अहमियत बढ़ जाती है। कोराना काल में जिन किसानों ने समूची अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, उन्हें महंगाई की मार से बचाना भी सरकार का फर्ज है। सरकार किसानों को रियायती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी देती है। अगर कच्चे माल की कीमतों में तेजी का रुख देखकर सरकार पहले ही सब्सिडी की दरें बढ़ा देती तो उर्वरकों की कीमतें इतनी ज्यादा ना बढ़ती। लेकिन ऐसा करने की बजाय किसानों को उनके हाल पर छोड़ने की नीति अपनाई जा रही है।

बंगाल में भाजपा के खिलाफ उतरा किसान मोर्चा, कोलकाता में जोरदार स्वागत

कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से आंदोलन कर रहे किसान नेता अब पश्चिम बंगाल और असम की चुनावी रणभूमि में उतर चुके हैं। संयुक्त किसान मोर्चा अगले तीन दिनों के दौरान पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में किसान पंचायतें कर भाजपा को वोट न देने की अपील करेगा। नंदीग्राम में 13 मार्च को होने वाली किसान महापंचायत में राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी, डॉ. दर्शनपाल और योगेंद्र यादव शामिल होंगे। नंदीग्राम किसान आंदोलन का पुराना गढ़ रहा है। यहीं से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही हैं। नंदीग्राम में किसान नेताओं का जमावड़ा ममता बनर्जी के लिए मददगार साबित हो सकता है।

कोलकाता में किसान नेताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो चुका है। गुरुवार को कोलकता हवाई अड्डे पर किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढूनी का जोरदार स्वागत किया गया। एयरपोर्ट पर किसान नेताओं के स्वागत के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।  

इससे पहले 10 मार्च को पंजाब और हरियाणा के किसान नेताओं ने कोलकाता में एक जनसभा कर भाजपा को वोट न देने की अपील की थी। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी पंजाब, हरियाणा और देश के अन्य राज्यों से किसानों के अलग-अलग जत्थे बंगाल और असम पहुंच रहे हैं। आज कोलकाता पहुंचे संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी रणनीति के बारे में विस्तार से बताया।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत आज राजस्थान में हैं। वे कल बंगाल पहुंचेंगे। राकेश टिकैत का कहना है कि वे बंगाल के किसानों से जाकर पूछेंगे कि उन्हें एमएसपी मिला या नहीं। बंगाल में भी बहुत किसान हैं, उन्हें कृषि कानूनों की हकीकत बताएंगे। किसान यूनियनों के राजनीति में उतरने के सवाल पर टिकैत का कहना है कि वे किसी पार्टी के लिए वोट नहीं मांग रहे हैं, बल्कि किसानों को भाजपा सरकार की असलियत बताने जा रहे हैं।

28 जनवरी को दिल्ली बॉर्डर से किसानों के धरने हटाने की कोशिशों के बाद किसान आंदोलन एक नये दौर में प्रवेश कर चुका है। कई राज्यों में किसान पंचायतें हो रही हैं, जिनमें राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में किसान पंचायतें करने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने बंगाल समेत उन पांचों राज्यों में जाने का फैसला किया है, जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से मिली जानकारी के अनुसार, आज कोलकाता के प्रेस क्लब में किसान नेताओं की प्रेस वार्ता के बाद एक वाहन रैली निकाली जाएगी। दोपहर बाद रामलीला मैदान में किसान-मजदूर महापंचायत होगी। कल 13 मार्च को नंदीग्राम और 14 मार्च को सिंगूर और आसनसोल में किसान महापंचायतें होंगी। इन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पश्चिम बंगाल किसान कॉर्डिनेशन कमेटी गठित की गई है।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि उसके नेता भाजपा और उसके सहयोगी दलों के खिलाफ मतदान करने की अपील करेंगे। बंगाल के अलावा किसानों के जत्थे असम भी पहुंच रहे हैं। 26 मार्च को किसान आंदोलन के चार महीने पूरे होने के मौके पर भारत बंद का ऐलान किया गया है। इस बार होली पर कृषि कानूनों की प्रतियां जलाई जाएंगी। इस तरह यह पूरा महीना किसान आंदोलन की हलचल से भरपूर रहेगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने बताया 26 जनवरी को कहां हुई चूक, पुलिस की भूमिका पर उठाये सवाल

दिल्ली में 26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली के दौरान हिंसा और लाल किले पर मचे उपद्रव को लेकर संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली पुलिस के नोटिसों का जवाब दिया है। दिल्ली पुलिस ने ये नोटिस 26 जनवरी की घटनाओं के बाद किसान नेताओं को भेजे थे, जिनके जवाब में संयुक्त किसान मोर्चा ने एक सामूहिक पत्र दिल्ली पुलिस कमिश्नर को भेजा है।

पत्र में संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा है कि 26 जनवरी को उन्होंने ट्रैक्टर मार्च की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया। इस दौरान हुई घटनाओं को मोर्चा ने किसान आंदोलन की छवि बिगाड़ने की सुनियोजित साजिश करार देते हुए दिल्ली पुलिस की भूमिका पर कई सवाल खड़े किये हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि दिल्ली पुलिस को जानकारी थी कि कई ग्रुप जो संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल नहीं हैं, उनकी अलग योजना है। वे अलग रूट पर जाना चाहते हैं। लेकिन प्रशासन ने उन्हें अनुशासित ट्रैक्टर मार्च में गड़बड़ी फैलाने से रोकने का कोई प्रयास नहीं किया। बल्कि दिल्ली पुलिस ने ऐसे तत्वों को संयुक्त किसान मोर्चा की परेड से काफी पहले ही रैली निकालने दी। उन्हें न केवल अलग रूट पर जाने दिया गया, बल्कि पुलिस ने तय रूट पर जाने का रास्ता भी बंद कर दिया था। इस कारण संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल किसानों को मजबूरन उस रास्ते पर जाना पड़ा जिसे दूसरे ग्रुपों ने जानबूझकर संयुक्त किसान मोर्चा की छवि बिगाड़ने के लिए चुना था।

संयुक्त किसान मोर्चा ने आरोप लगाया कि 26 जनवरी की निंदनीय घटनाएं सुनियोजित थी और दिल्ली पुलिस की मौजूदगी में हुई। उन्हें तुरंत रोकने की बजाय दिल्ली पुलिस मूकदर्शक बनी रही और सब कुछ होने दिया। संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि जैसे ही उसके नेताओं को गड़बड़ी का पता चला, उन्होंने रैली समाप्त कर किसानों को वापस लौटने को कह दिया था। जिसका किसानों ने पालन किया।

संयुक्त किसान मोर्चा ने 26 जनवरी की हिसंक घटनाओं और लाल किले पर चढ़े उपद्रवियों के साथ किसी प्रकार का संबंध होने से साफ इंकार किया है। खुद को निर्दोष बताते हुए मोर्चा ने अपुष्ट जानकारियों के आधार पर दर्ज एफआईआर को निरस्त कर पूरे घटनाक्रम की न्यायिक जांच कराने की मांग की है।

कैसे टूटे रूट, क्यों नहीं थी लाल किले की सुरक्षा?

संयुक्त किसान मोर्चा ने उपद्रव मचाने वालों के साथ दिल्ली पुलिस की मिलीभगत का आरोप लगाया है। मोर्चा का कहना है कि 26 जनवरी को गड़बड़ी की आशंका और खुफिया इनपुट के बावजूद लाल किले जैसे राष्ट्रीय स्मारक की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं किये गये थे। दिल्ली पुलिस ने दूसरे ग्रुप को अलग रूट से जाने दिया और सहमति वाले रूट पर बैरिकेड लगाकर संयुक्त किसान मोर्चा के किसानों को भी उसी तरफ जाने को मजबूर किया।

पत्र के मुताबिक, हाई अलर्ट के बावजूद गणतंत्र दिवस के दिन कुछ असामाजिक तत्व मुख्य द्वार से घुसकर लाल किले पर चढ़ गये और पुलिस खड़ी देखती रही। जबकि निर्दोष लोगों को जानबूझकर दिग्भ्रमित किया गया। संयुक्त किसान मोर्चा ने इस सबको महीनों से चल रहे शांतिपूर्ण किसान आंदोलन को बदनाम करने की गहरी साजिश करार दिया है।

कारण बताओ नोटिस में गलत शर्तों का उल्लेख

संयुक्त किसान मोर्चा का दावा है कि 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के दौरान उन्होंने समझौते की किसी भी शर्त का उल्लंघन नहीं किया। दिल्ली पुलिस के कारण बताओ नोटिस में जिन शर्तों का जिक्र किया गया है, उन पर सहमति बनी ही नहीं थी। उन शर्तों को हटाने के बाद ही समझौते पर सहमति बनी थी। उस हस्तलिखित समझौते की फोटो किसान नेताओं के मोबाइल फोन में है।

गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस की ओर से किसान नेताओं को भेजे गये कारण बताओ नोटिस में कहा गया था कि ट्रैक्टर रैली गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह के बाद शुरू होनी थी और इसमें 5000 से ज्यादा ट्रैक्टर शामिल नहीं होने थे। दिल्ली पुलिस के इस दावे को संयुक्त किसान मोर्चा ने खारिज करते हुए कहा है कि ट्रैक्टर परेड सुबह 8 बजे शुरू होनी थी और किसानों की संख्या की कोई पाबंदी नहीं थी।

संयुक्त किसान मोर्चा ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कार्रवाई का आरोप लगाते हुए पुलिस जांच पर अविश्वास जताया है।

26 जनवरी का घटनाक्रम

केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों ने गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर परेड निकालने का ऐलान किया था। कई दौर की वार्ता के बाद ट्रैक्टर रैली के रूट को लेकर दिल्ली पुलिस और संयुक्त किसान मोर्चा के बीच सहमति बनी थी। पुलिस ने आउटर रिंग रोड के बाहर ट्रैक्टर मार्च का रूट दिया था। लेकिन 26 जनवरी के दिन किसानों के कई जत्थे बैरीकेड तोड़कर रिंग रोड पर आ गये।

इस बीच बहुत से प्रदर्शनकारी लाल किले तक पहुंच गये और वहां चढ़कर सिख समुदाय का झंडा फहरा दिया था। इस दौरान आईटीओ समेत कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ, जिसमें सैकड़ों पुलिसकर्मी घायल हो गये थे। इस दौरान रामपुर के 25 वर्षीय किसान नवरीत सिंह की मौत हो गई थी। 

26 जनवरी की हिंसा और उपद्रव को लेकर दिल्ली पुलिस ने 44 एफआईआर दर्ज की और लगभग 122 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया है। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने किसान नेताओं को ट्रैक्टर मार्च के रूट और समझौते की शर्तों के उल्लंघन के लिए कारण बताओ नोटिस भेजे थे। संयुक्त किसान मोर्चा उसी दिन से इन घटनाओं से पल्ला झाड़ते हुए इसे दूसरे संगठन और असामाजिक तत्वों की साजिश बता रहा है।

अब किसी संगठन का नाम नहीं लिया

27 जनवरी को जारी बयान में संयुक्त किसान मोर्चा ने कलाकार दीप सिद्धू और सतनाम सिंह पन्नू के संगठन किसान मजदूर संघर्ष समिति को आंदोलन में हिंसा फैलाने का जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन दिल्ली पुलिस के नोटिस के जवाब में मोर्चा ने किसी व्यक्ति या संगठन का नाम नहीं लिया है।

दरअसल, 26 जनवरी की घटनाओं के बाद गिरफ्तार हुए आंदोलनकारियों को हरियाणा-पंजाब में जिस प्रकार का समर्थन मिल रहा है, संभवत: उसे देखते हुए ही संयुक्त किसान मोर्चा ने अब किसी संगठन या व्यक्ति का नाम नहीं लिया। क्योंकि किसान आंदोलन में पंजाब के ऐसे संगठन भी शामिल हैं जो संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा नहीं हैं, मगर आंदोलन की बड़ी ताकत हैं।

26 जनवरी की घटनाओं का ठीकरा बाकी संगठनों पर फोड़ना उनकी नाराजगी बढ़ा सकता है। शायद इसलिए संयुक्त किसान मोर्चा ने किसी संगठन की बजाय दिल्ली पुलिस पर ज्यादा निशाना साधा है। 26 जनवरी की घटनाओं से पल्ला झाड़ने के बावजूद किसान आंदोलन को इसके दुष्परिणामों से उबरने में वक्त लगेगा।

किसान आंदोलन को किधर ले जाएंगे राकेश और नरेश टिकैत के बयान

अपने आंसूओं से किसान आंदोलन में नई जान फूंकने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत सरकार को लगातार चुनौतियां दे रहे हैं। अब राकेश टिकैत ने 40 लाख ट्रैक्टरों के साथ संसद घेराव की चेतावनी दी है। जबकि उनके भाई भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताते हुए सरकार को उनके जरिये सुलह का रास्ता सुझाया है। सुलह और चेतावनी के इन दो सुरों के बीच किसान आंदोलन की भावी रणनीति और असमंजस के संकेत देखे जा सकते हैं।

मंगलवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने राजस्थान के सीकर में किसान महापंचायत बुलाई थी। इसमें राकेश टिकैत के अलावा स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमरा राम भी मौजूद थे। सीकर महापंचायत में मंच से किसानों को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत कहा

“कान खोलकर सुन लो दिल्ली। ये ट्रैक्टर भी वही है और ये किसान भी वही है। अबकी कॉल पार्लियामेंट की होगी। और कह के जाएंगे। पार्लियामेंट पर जाएंगे। इस बार चार लाख ट्रैक्टर नहीं होंगे, चालीस लाख ट्रैक्टर जाएंगे। अबकी बार हल क्रांति होगी।”

किसान आंदोलन में राकेश टिकैत की एंट्री थोड़ी देरी से हुई थी। वे संयुक्त किसान मोर्चा के 26 नवंबर को दिल्ली कूच से एक दिन बाद आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन तब से वे संयुक्त किसान मोर्चा के साथ हैं और किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। किसानोंं के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे उनके ठेठ अंदाज का बड़ा हाथ है। हालांकि, उन पर किसान आंदोलन को भड़काने के आरोप भी लग रहे हैं।

26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का ऐलान भी सबसे पहले राकेश टिकैत ने किया था। “एक तरफ जवान चलेगा, दूसरी तरफ किसान चलेगा।” और “उधर टैंक चलेगा, इधर ट्रैक्टर चलेगा” इस तरह के बयानों ने 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का माहौल बनाया था। बाद में इसे संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना कार्यक्रम बना लिया। इसी तर्ज पर अब राकेश टिकैत लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद कूच की बात कह रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने लाल किले पर जाने से साफ इंकार किया है। सीकर में राकेश टिकैत ने हुंकार भरी

“तिरंगा भी फैलेगा और पार्लियामेंट पर फैलेगा, कान खोलकर सुन लो। ये ट्रैक्टर जाएंगे और हल के साथ जाएंगे। पार्लियामेंट के बाहर जिन पार्कों में आज से 32 साल पहले 1988 में आंदोलन हुआ था, वहां ट्रैक्टर चलेगा, वहां खेती होगी। इंडिया गेट पर जो पार्क है उसमें ट्रैक्टर चलेगा, जुताई होगी। सरकार या तो बिल वापस ले, एमएसपी पर कानून बनाये, नहीं तो दिल्ली की घेराबंदी पक्की होगी। तारीख कौनसी होगा? यह संयुक्त मोर्चा बताएगा। हमारे पंच भी यही हैं और हमारा मंच भी वही है।”

कभी आक्रामक तो कभी चुटीली बयानबाजी से आंदोलन में जोश भरना राकेश टिकैत की रणनीति का हिस्सा है। इससे वे मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। 26 जनवरी को लालकिले की घटना के बाद जब किसानों का मनोबल और संख्याबल दोनों टूटने लगे थे, तब राकेश टिकैत ने “किसान सीने पर गोली खाएगा, किसान कहीं नहीं जाएगा” और “जब तक गांव से पानी नहीं आएगा, जल ग्रहण करूंगा” जैसी बातों से किसानों को भावुक कर दिया था।

हालांकि, कई बार अपने बयानों पर खुद राकेश टिकैत को भी सफाई देनी पड़ती है। तब वे बड़ी मासूमियत से बात टाल देते हैं। आंदोलन को 2024 तक जारी रखने, फसलों को आग लगाने और लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद घेरने के ऐलान पर उन्हें सफाई देनी पड़ी। लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर टिकैत जिस मजबूती से डटे रहे। उससे उनकी छवि धाकड़ नेता की बनी है। सरकार को ललकारने वाले उनके बयान इस छवि को पुख्ता करते हैं। इसलिए भी वे रोजाना कुछ न कुछ सुर्खियां बटोरने वाला कह डालते हैं। ऐसा करते हुए टिकैत की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि वे हरियाणा और राजस्थान में बड़ी-बड़ी किसान पंचायतें कर रहे हैं।  

अब जबकि दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को तीन महीने बीत चुके हैं। सरकार के साथ आखिरी वार्ता हुए भी एक महीने से ज्यादा गुजर चुका है तो किसान आंदोलन की धार बनाये रखना बड़ी चुनौती है। यहां टिकैत काम आते हैं। यह बात संयुक्त किसान मोर्चा भी समझता है। शायद इसीलिए टिकैत के बयानों पर संयुक्त किसान मोर्चा कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनी सभाओं और प्रेस वार्ताओं में बुलाता है।

किसान आंदोलन को हरियाणा-पंजाब से बाहर फैलाने में टिकैत अहम भूमिका निभा रहे हैं। महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत और भाकियू के बड़े संगठन से उन्हें मदद मिल रही है। खासतौर पर सरदार वीएम सिंह के संयुक्त किसान मोर्चा से अलग होने के बाद किसान आंदोलन को व्यापक और एकजुट बनाये रखने के लिए टिकैत बंधुओं की जरूरत है। यही वजह है कि किसान आंदोलन के बाकी नेता आंदोलन में उभरते नये शक्ति केंद्र और राकेश टिकैत की बयानबाजी से असहज होने के बावजूद इस पर कुछ बोलने से बचते हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 23 मार्च को शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस पर दिल्ली कूच या संसद घेराव की रणनीति का ऐलान हो सकता है। इसकी रूपरेखा तय होनी बाकी है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल ऑल इंडिया किसान सभा के राजस्थान में संयुक्त सचिव संजय माधव का कहना है कि संसद मार्च की योजना पहले एक फरवरी को बनी थी, जिसे 26 जनवरी की घटना के बाद स्थगित कर दिया गया था। राकेश टिकैत ने संसद घेराव की जो बात कही है, उस पर भी विचार किया जाएगा। आंदोलन की भावी रणनीति का ऐलान 28 फरवरी को होगा।

एक तरफ जहां राकेश टिकैत संसद घेराव की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं भाकियू के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने सुलह का रास्ता सुझाया है। नरेश टिकैत ने कहा कि राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। उनकी बहुत शर्म-लिहाज है। हम भी उन पर विश्वास करते हैं। लेकिन उन्हें पिंजरे के तोते की तरह कैद कर रखा है। अगर उन्हें किसानों से बात करने की आजादी दी जाए तो एक दिन या एक घंटे में आंदोलन का फैसला हो जाएगा। लेकिन राजनाथ सिंह सरकार के शिकंजे में हैं। वे सरकार से बाहर नहीं बोल सकते।

लगता है बयानों से सुर्खियां बटोरने वाला फार्मूला नरेश टिकैत भी आजमाने लगे हैं। नरेश टिकैत का बयान खाप पंचायतों द्वारा आंदोलन का हल निकालने की कोशिशों के तौर पर भी देखा जा सकता है। इससे पहले भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में भी खाप पंचायतों से बातचीत के प्रयास किये थे, लेकिन तब खुद नरेश टिकैत ने भाजपा नेताओं से मिलने से इंकार कर दिया था। इसके बावजूद केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान खाप चौधरियों से मिलने पहुंचे तो उनकी खिलाफ नारेबाजी हुई जो अगले दिन हिंसक टकराव में बदल गई।

राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताकर नरेश टिकैत ने भाजपा की अंदरुनी राजनीति पर भी निशाना साधा है। साथ ही कृषि मंत्री से इतर किसी दूसरे नेता के जरिये सुलह का संकेत भी दिया है। वैसे, टिकैत बंधु राजनाथ सिंह के नजदीक माने जाते हैं और उनके साथ मंच साझा कर चुके हैं। लेकिन जिस अंदाज में नरेश टिकैत ने राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताया है, उससे यह सुझाव कम तंज ज्यादा हो गया है और सरकार शायद ही इसे स्वीकार करे।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े हरियाणा के बड़े किसान नेता गुरनाम सिंह चडूनी का कहना है कि राकेश टिकैत ने संसद घेराव की बात अपनी तरफ से कही है। इस बारे में संयुक्त किसान मोर्चा ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इसी तरह राजनाथ सिंह के जरिये सुलह का सुझाव भी नरेश टिकैत का व्यक्तिगत सुझाव है। चडूनी का कहना है कि टिकैत किसान आंदोलन में शामिल हैं, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा नहीं हैं।

राकेश टिकैत के सहयोगी और भाकियू के मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र मलिक का कहना है कि आंदोलन को मजबूत भी करना है और बातचीत का रास्ता भी निकालना है। राकेश टिकैत और नरेश टिकैत के हालिया बयानों को इसी संदर्भ देख जाना चाहिए। लेकिन इस बारे में अंतिम निर्णय संयुक्त किसान मोर्चा लेगा। राकेश टिकैत ने भी अपना मंच और पंच संयुक्त किसान मोर्चा को ही बताया है।

सामूहिक नेतृत्व इस किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है तो एक बड़ी चुनौती भी। एक नई चुनौती किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरे के तौर पर किसी एक नेता का उभरना भी है। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी आंदोलन में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान संगठन शामिल हैं। 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्चा के दौरान हुई हिंसा के बाद सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां पंजाब के आंदोलनकारियों की हुई थी। तब संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली हिंसा से किनारा करते हुए दीप सिद्धू के साथ-साथ सतनाम सिंह पन्नू के नेतृत्व वाली किसान मजदूर संघर्ष कमेटी से पल्ला झाड़ लिया था। आंदोलन की आगामी रणनीति पर इसका असर भी पड़ेगा।

पिछली बार ट्रैक्टर मार्च के दौरान जो कुछ हुआ, उसे देखते हुए संसद घेराव की चेतावनी पर सहमति बनाना आसान नहीं है। लेकिन जब तक मामला किसी निर्णायक स्थिति में पहुंचता है, तब तक टिकैत बंधु अपने बयानों से आंदोलन को चर्चाओं में जरूर बनाये रखेंगे।

आंदोलन को नया रुख दे सकती है उग्राहां की किसान-मजदूर महारैली

किसान आंदोलन की सबसे मजबूत ताकत भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्राहां) ने पंजाब खेत मजदूर यूनियन के साथ मिलकर रविवार को पंजाब के बरनाला में एक बड़ी रैली बुलाई है। बरनाला अनाज मंडी में होने वाली यह महारैली किसान-मजदूर एकता की मिसाल बन सकती है। रैली की तैयार बहुत जोरशोर से हो रही हैं। आयोजकों का दावा है कि इसमें लाखों की तादाद में किसान और मजदूर जुटेंगे।

इससे पहले रेल रोको और चक्का जाम में भी बीकेयू (एकता उग्राहां) ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। संगठन के बैनर लगे हजारों महिलाओं कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से सड़कों पर हैं। दरअसल, पंजाब में किसान आंदोलन को मजबूती देकर हरियाणा और दिल्ली के रास्ते देश के कई राज्यों में पहुंचाने का बहुत बड़ा श्रेय उग्राहां को जाता है। अब संगठन किसान सभाओं के जरिये नए सिरे से आंदोलन की जड़ों को मजबूती देने में जुटा है।

अभिनेता सुशांत सिंह समेत कई लोग सोशल मीडिया पर किसान मजदूर एकता महारैली के समर्थन में आगे आए हैं।

इस महारैली के जरिये किसान-मजदूर एकता का प्रदर्शन तो होगा ही, साथ ही किसान आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किये गए लोगों की रिहाई के लिए आवाज उठायी जाएगी। आयोजकों का कहना है कि महारैली के लिए बरनाला की अनाज मंडी में 9 लाख वर्ग फीट का स्थान बनाया जा रहा है, जहां 2 लाख किसानों के पहुंचने की उम्मीद है।

ऐसे समय जब किसान आंदोलन को लगभग तीन महीने हो चुकी है और फसल कटाई का समय आ रहा है तो आंदोलन को लेकर भी कई तरह के कयास लग रहे हैं। इस बीच, दिल्ली बॉर्डर पर डटे किसानों की तादाद भी कम हुई है। ऐसे में यह रैली पंजाब में आंदोलन को नए सिरे से मजबूती दे सकती है, जिसका असर दिल्ली मोर्चों और देश के बाकी राज्यों में किसान आंदोलन के मूड पर भी पड़ेगा।

26 जनवरी को जिस प्रकार दिल्ली में उपद्रव हुआ। ट्रैक्टर मार्च निकालते हुए प्रदर्शनकारी आईटीओ व लाल किले तक पहुंचे, उसके बाद से ही आंदोलन के तौर-तरीकों और जनता में उसके मैसेज को लेकर काफी मंथन चल रहा है। इस बीच आंदोलनकारियों, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से भी कहीं न कहीं आंदोलन के मनोबल पर असर पड़ा है। लेकिन जिस तरीके से 28 जनवरी को राकेश टिकैत की भावुक अपील ने आंदोलन में जान फूंक दी। उम्मीद की जा रही है कि वैसा ही कुछ करिश्मा उग्राहां की किसान-मजदूर एकता महारैली भी कर सकती है।

टिकैत के आंसू निकले तो पीएम के होंठों पर हंसी थी: प्रियंका गांधी

कृषि कानूनों के खिलाफ तीन महीने से दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसान आंदोलन अब उत्तर भारत की राजनीति में हलचल मचा रहा है। किसान यूनियनों के साथ-साथ विपक्ष के नेता किसान पंचायतें को जरिये अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने में जुटे हैं।

इसी क्रम में 20 फरवरी को मुजफ्फरनगर जिले के बघरा में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने एक किसान पंचायत को संबोधित किया। इस मौके पर प्रियंका गांधी को सुनने भारी संख्या में पहुंचे किसानों को देखकर कांग्रेसी गदगद थे। इससे पहले बिजनौर के चांदपुर और सहारनपुर के चिलकाना में भी प्रियंका गांधी की किसान पंचायतों में अच्छी खासी भीड़ जुटी थी।

प्रियंका गांधी ने किसानों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर जमकर प्रहार किये। उन्होने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री जिन कानूनों को किसान हितैषी बता रहे हैं, वे किस किसान से पूछकर बनाये। कृषि कानूनों के खिलाफ जोरदार हुंकार भरते हुए प्रियंका गांधी ने किसानों का साथ देने का वादा किया।

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि जो किसान अपने बेटे को देश की रखवाली करने भेजता है उसे देशद्रोही, आतंकवादी कहा गया। जब चौधरी टिकैत की आंखों में आंसू आते हैं तो हमारे प्रधानमंत्री जी के होठों पर मुस्कान आती है। उन्हें मजाक सूझता है। जो प्रधानमंत्री अमेरिका जा सकते थे, पाकिस्तान जा सकते थे, चीन जा सकते थे वो किसानों के आंसू पोंछने उन तक नहीं जा पाये।

आज प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना कहानियों के अहंकारी राजा से कर डाली जो किसी की नहीं सुनता। उन्होंने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री की राजनीति सिर्फ अपने लिए और अपने खरबपति मित्रों के लिए है।

मुजफ्फरनगर किसान पंचायत में प्रियंका गांधी ने गन्ने के दाम और बकाया भुगतान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में गन्ने का बकाया भुगतान 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। लेकिन सरकार ने पीएम के दुनिया घूमने के लिए दो हवाई जहाज खरीदे हैं, जिनकी कीमत 16 हजार करोड़ रुपये है।

किसानों की दुखती रग पर हाथ रखते हुए प्रियंका गांधी ने डीजल, खाद, बीज की महंगाई का मुद्दा उठाया। साथ ही नए कृषि कानूनों से मंडियों के खत्म होने और पूंजीपतियों की मनमानी का डर भी दिखाया। उन्होंने कहा कि आज किसानों के घरों से लूट हो रही है और प्रधानमंत्री के दो पूंजीपति मित्रों को पूरी छूट दी गई है।

इस किसान पंचायत में शामिल हुए लोगों का कहना है कि लंबे अरसे के बाद मुजफ्फरनगर में कांग्रेस की किसी सभा में इतनी भीड़ जुटी। प्रियंका गांधी की इन सभाओं से पश्चिमी यूपी में शिथिल पड़े कांग्रेस संगठन में नई जान आ सकती है। हालांकि, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल भी किसान आंदोलन से उपजी लहर को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।

रेल रोकी, यात्रियों पर फूल बरसायें, चाय पिलाई और समय पर ट्रैक खाली कर दिये

आज किसानों के रेल रोको अभियान के साथ भी ऐसा ही हुआ। ज्यादातर रेलगाड़ियों की आवाजाही सामान्य रहने के दावे को प्रदर्शन की नाकामी के तौर पर पेश किया जा रहा है। जबकि पंजाब में कई महीनों तक रेल ठप रहने पर किसान आंदोलन की खूब आलोचना हुई थी। इस बार रेलगाड़ियों को लंबे समय तक नहीं रोका गया। न कोई तोड़फोड़ हुई और न ही यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। रेल रोकने का प्रयास करने वाले कई आंदोलनकारियों को बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में पुलिस ने हिरासत में जरूर लिया। लेकिन इस दौरान किसी हिसंक घटना की जानकारी नहीं है। कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

आज संयुक्त किसान मोर्चा का रेल रोको आंदोलन कितना सफल या कितना असफल रहा, यह देखने के नजरिये पर निर्भर करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आंदोलन का असर कई राज्यों में दिखा। कई जगह महिलाओं ने नेतृत्व किया। दिन भर रेल लाइनों पर किसानों के जमावड़े की तस्वीरें आती रही। कहीं रेल यात्रियों पर फूल बरसाये गये तो कहीं यात्रियों को चाय-पानी पिलाकर आंदोलनकारियों ने उन तक अपने मुद्दे पहुंचाने की कोशिश की। कहीं जलेबियां बंट रही थी, तो कहीं आंदोलन के गीतों पर किसान झूम रहे थे।

क्या यह सब सफल आंदोलन के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है? देश में सैकड़ों जगह कृषि कानूनों के विरोध में किसान इकट्ठा हुए। अपना विरोध व्यक्त किया और समय से ट्रैक खाली कर दिये। क्या किसी आंदोलन के सफल होने के लिए कुछ बड़ा होना जरूरी है? कोई बड़ा बवाल या हल्ला? तभी आंदोलन को सफल माना जाएगा?

आज के रेल रोको अभियान का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखने को मिला। पंजाब के बठिंडा में हजारों की तादाद में किसानों ने रेल की पटरियों पर डेरा जमा लिया। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं। लेकिन यह आंदोलन पंजाब तक सीमित नहीं था।

हरियाणा की जींद में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर रेल रोको अभियान में हिस्सा लिया। हरियाणा के अंबाला, कुरुक्षेत्र और चरखी दादरी में भी किसानों ने रेल की पटरियों पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया।

इस दौरान बिहार के पटना, झारखंड के रांची, यूपी के कानपुर, उरई, चित्रकूट, फर्रुखाबाद, मध्यप्रदेश के विदिशा, महाराष्ट्र के औरंगाबाद, बुलढाणा और कर्नाटक के रायचूर समेत कई जगहों से प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। यूपी के कई जिलों में आंदोलनकारियों को रोकने और नज़रबंद किये जाने की खबर है। कई जगह प्रदर्शनकारी रेल की पटरियों पर ही लेट गये, जिन्हें हटाने के लिए पुलिस को मशक्कत करनी पड़ी। इस रेल रोको आंदोलन में किसान यूनियनों के साथ विपक्षी दल भी शामिल थे।

रेल रोकने का कार्यक्रम सुबह 12 से 4 बजे तक था। चार बजते ही प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक से हटने लगे थे। बेशक, रेल रोको अभियान का असर हरियाणा और पंजाब में सबसे ज्यादा दिखा। लेकिन देश के बाकी राज्यों खासकर पश्चिमी बंगाल, बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में भी किसानों ने अपने नजदीकी रेलवे स्टेशनों पर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन किया। इस लिहाज से इसे देशव्यापी कहा जा सकता है। दोपहर 12 बजते ही विभिन्न राज्यों से आंदोलनकारी किसानों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाने लगी थीं।

राजस्थान के जयपुर में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक पर जुटे और रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद करा दी। बंगाल और ओडिशा में भी कई जगह प्रदर्शन हुए।

रेल रोको अभियान के कई रंग-ढंग काफी निराले रहे। लुधियाना में एक रेल यात्री को चाय पिलाते किसान की यह तस्वीर काफी वायरल हो रही है।

हरियाणा के चरखी दादरी स्टेशन पर आंदोलनकारी महिलाओं ने प्रदर्शन के दौरान जलेबी और पकौड़े का वितरण किया तो कहीं महिलाओं ने नाच-गाकर विरोध दर्ज कराया।

कई जगह आंदोलनकारियों ने ट्रेन के ड्राइवर और यात्रियों का फूल-मालाओं से स्वागत भी किया।

यूपी के शामिली में रेलवे ट्रैक पर डेरा जमाये किसान आंदोलन के गीतों पर थिरकते नजर आये।

भारतीय किसान यूनियन एकता उग्राहां का कहना है कि पंजाब के 15 जिलों में 20 जगहों पर रेल रोकी गई। जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। हरियाणा और पंजाब के विरोध-प्रदर्शनों में महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।

यूपी के मोदीनगर और हापुड़ में किसानों ने रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन किया। यूपी में मोदीनगर, मुजफ्फरनगर, गढ़ मुक्तेश्वर, हापुड़ और दनकौर में किसान यूनियन के कार्यकर्ताओं ने रेल की पटरियों पर बैठकर धरना दिया।

भारतीय रेल की ओर से आए बयान के अनुसार, रेल रोको अभियान का रेलगाड़ियों की आवाजाही पर बहुत कम असर पड़ा है। इस दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। कुछ इलाकों में रेलगाड़ियों को रोका गया था, लेकिन जल्द ही आवागमन सामान्य हो गया। विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए 25 ट्रेनों के समय या रुट में बदलाव किया गया था।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि राष्ट्रव्यापी रेल रोको आंदोलन के तहत देश भर के सैकड़ों स्थानों पर दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक ट्रेनों को रोका गया। देश भर में ये कार्यक्रम सफल रहे व कोई हिंसक गतिविधि नहीं हुई। देश भर के किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए, तीन कृषि कानून, विद्युत विधेयक व प्रदूषण विधेयक के खिलाफ लगभग तीन महीने से आंदोलन कर रहे हैं। किसानों में गुस्सा तेज हो रहा है। केंद्र सरकार को कानून को रद्द करने होंगे।

कृषि कानूनों पर संसदीय परामर्श से ही निकलेगा सहमति का रास्ता

पिछले दिनों हुई एक सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर तीन कृषि कानूनों को 18 महीने के लिए स्थगित रखने का प्रस्ताव दिया है। इस सुझाव पर अमल तभी करना चाहिए जब इस अवधि के दौरान कृषि कानूनों पर विचार-विमर्श करने का जिम्मा किसी संसदीय समिति को सौंपा जाए। सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले जो विधायी परामर्श नहीं किया था, उसके लिए पश्चाताप तो करना ही पड़ेगा। कृषि कानूनों पर पूर्णतः नए सिरे से विचार करने की जरुरत है, और ये काम केवल संसद ही कर सकती है। 

इस बात से कोई इंकार नहीं है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों की जरूरत है। लेकिन किस तरह के सुधार से किसानों को फायदा होगा? यह बड़ा सवाल है। ये कानून महामारी के दौरान जल्दबाजी में पर्याप्त चर्चा और व्यापक स्वीकृति के बगैर लागू किये गये थे। जिसके परिणामस्वरूप किसानों को 75 दिनों से हाड़ कंपा देने वाली ठंड में दिल्ली की सीमाओं पर कंटीले तारों, कीलों, किले जैसी नाकेबंदी का सामना करना पड़ रहा है। किसानों की बिजली, पानी, इंटरनेट और शौचालय की सुविधाएं भी सरकार ने बंद कर दी। इस दौरान लगभग 150 को जान गंवानी पड़ी। किसी भी आंदोलन के लिए यह बहुत बड़ा बलिदान है। अब केंद्र सरकार ने इन कानूनों को 18 महीने के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव दिया (जो किसानों को मंजूर नहीं) है, तो इन कृषि सुधारों पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। हमें भारत के कृषि क्षेत्र को नई क्षमता प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए तीन पहलू महत्वपूर्ण हैं।

पहला, कृषि राज्य का विषय है इसलिए राज्यों को कानून बनाने का पहला अधिकार होना चाहिए। अलग-अलग राज्यों को अलग-अलग से तरह प्रभावित करने वाले कानूनों को पूरे देश पर लागू करना केंद्र सरकार की हड़बड़ी और गलत अनुमान का नतीजा है। केंद्र सरकार को मॉडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 के कार्यान्वयन से सबक लेना चाहिए था, जिसे सत्तारूढ़ पार्टी शासित राज्यों ने भी लागू नहीं किया। कृषि मंत्रियों, वित्त मंत्रियों और सभी राज्यों के विशेषज्ञ प्रतिनिधियों से युक्त जीएसटी परिषद की तर्ज पर एक ‘कृषि सुधार परिषद’ का गठन करने की आवश्यकता है। यह राज्यों और केंद्र के बीच कई मुद्दों को भी हल करेगी। ‘कृषि सुधार परिषद’ के प्रस्ताव को कृषि कानूनों में शामिल किया जा सकता है और राज्यों को अपने हिसाब से बदलाव लाने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। यही संघीय ढांचे और “टीम इंडिया” के अनुरुप होगा।   

दूसरा पहलू है – संसदीय प्रणाली की उपयोगिता। संसद में एक विधायिका के रूप में कानूनों में संशोधन करने की सर्वोच्च शक्ति है। कानूनों के पारित होने के बाद भी ऐसा करना संभव है। एक स्थायी समिति या संसद की एक प्रवर समिति तीनों कृषि कानूनों की जांच कर सकती है और किसान संगठनों को भी सदन में अपना पक्ष रखने का मौका मिल सकता है। संसदीय स्थायी समिति महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। ये विचार-विमर्श संसद के फर्श पर नारेबाजी और शोरगुल में नहीं हो सकता है, जहां नेता राजनीतिक बढ़त बनाने के लिए बहस में हिस्सा लेते हैं । केवल संसदीय समिति द्वारा कानूनों की सावधानीपूर्वक जांच-पड़ताल कर उपयुक्त संशोधनों के सुझाव दिए जा सकते हैं और सभी पक्षों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है। 

कृषि कानूनों को संसद को पंगु बनाकर, हंगामे के बीच राज्यसभा में ध्वनि मत से पारित किया गया। आलोचकों का तर्क हो सकता है कि ध्वनि मत से किसी कानून को पारित करना संसदीय  प्रणाली का उल्लंघन नहीं है। यह बात अपनी जगह सही है। संविधान में भी ध्वनि मत पर कोई पाबंदी नहीं है। हालांकि, 17 वीं लोकसभा में बहुत अधिक विधेयकों को ध्वनि मत से पारित किया गया है। वोट का विभाजन संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बनाता है। क्या हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी ईवीएम की बजाय किसी सार्वजनिक रैली में ‘ध्वनि मत’ के माध्यम से चुना जा सकता है? 

तीसरा, प्राइवेट सेक्टर को कृषि बाजार में प्रवेश करने के लिए ‘खेत से प्लेट तक’ पूरी सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। भारतीय खाद्य निगम की सीमित भंडारण क्षमता और खाद्यान्न की बर्बादी को देखते हुए, सरकार को पहले हजारों छोटी मंडियों के लिए बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने की आवश्यकता थी। अकेले सरकार द्वारा मंडियों का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसमें निजी भागीदारी और निवेश की जरूरत है। इसे एक संस्थागत रूप दिए जाने की जरूरत है, जिसमें किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी मिले। भले ही कई नीति विशेषज्ञ एमएसपी को हटाने का समर्थन करते हैं, लेकिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि एमएसपी है और आगे भी रहेगा।

एमएसपी के क्रियान्वयन में जो कमियां हैं, उन्हें दूर किया जा सकता है। वर्ष 2012 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘दि फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2010’ को मंजूरी देते हुए इस तरह के एक समाधान को अपनाने का प्रयास किया था। इसमें खरीदारों और विक्रेताओं को जोखिम संभालने की सहूलियत दी गई थी और इसे रेगुलेट करने का प्रावधान भी था। कमोडिटी बाजार में ऑप्शंस के लिए रास्ता खोलने का प्रयास किया गया था, लेकिन तब एमएसपी खत्म की कोई भी कोशिश नहीं थी। जैसी इस बार दिख रही है।

ड्राफ्ट एपीएमसी रेगुलेशन, 2007 के जरिये भी कृषि व्यापार में सुधारों को लेकर कई सुझाव दिए गए थे। इसमें राज्यों को किसी भी बाजार को ‘स्पेशल कमोडिटी मार्केट’ घोषित करने का अधिकार दिया गया था। नए कृषि कानून राज्य सरकारों और मंडी समितियों (APMC) को प्राइवेट मंडियों से शुल्क वसूलने से रोकते हैं। इसलिए इन कानूनों में सुधार करना बेहद जरूरी है।

सभी पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के माध्यम से संसदीय स्थायी समिति कृषि कानूनों पर एक सही नजरिया पेश कर सकती है। इससे सरकार और किसानों के बीच गतिरोध को दूर करने में मदद मिलेगी। 

(लेखक बैंगलोर के तक्षशिला संस्थान में लोक नीति का अध्ययन कर रहे हैं। विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

दिल्ली घेरने पर क्यों मजबूर हुआ किसान?

जब से किसान आंदोलन शुरू हुआ है देश में खेती-किसानी को लेकर खूब चर्चा हो रही है। शहरों में लोग कृषि के प्रति क्या नजरिया रखते हैं यह भी पता चल रहा है। कुछ लोग किसान आंदोलन को विपक्ष की चाल, खालिस्तानी, नक्सली और अंतरराष्ट्रीय साजिश करार दे चुके हैं। जो यह सब नहीं कहते वो भी इतना तो कह दी देते हैं कि किसानों को विपक्ष ने भड़का दिया है। शहरी समाज में यह गलतफहमी भी हाल के वर्षों में काफी ज्यादा फैलायी गई है कि किसानों को जरूरत से ज्यादा सब्सिडी और छूट मिलती हैं। बिजली, पानी, खाद, सब फ्री मिलता है।

कुछ लोग तो यहां तक कुतर्क करते हैं कि अगर किसानों को खेती में नुकसान हो रहा है तो कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेते? अन्न उगाकर किसान कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। हालांकि, बहुत से किसान खेती छोड़कर मजदूर बन चुके हैं। कुछ ने इस अपमान से बचने की लिए जिंदगी का ही साथ छोड़ दिया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की सालाना रिपोर्टों के अनुसार 1995 से 2012 के बीच करीब 3 लाख किसानों ने आत्महत्या कर चुके हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में देश में 10,281 किसानों ने खुदकुशी कर ली यानी प्रतिदिन औसतन 28 किसान आत्महत्या करते हैं।  

क्या आप जानते हैं कि किसान कितना कमाता है? किसान का घर कैसे चलता है? किसान के बेटे को खेती करने में शर्म क्यों आती है? किसान के बच्चे पलायन करने पर क्यों मजबूर हैं? किसान की बेटी क्यों नौकरीवाले से ही शादी करना पसंद करती है, खेती वाले से नहीं? और सबसे बड़ा सवाल, किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? इन्ही सब सवालों का जवाब मुझे मिला, जब मैंने खेती का रुख किया।

तीन साल पहले मैंने खेती में हाथ आजमाने का इरादा किया तो एक नयी उमंग के साथ मैं अपने उन सभी रिश्तेदारों से मिलने गई जो अभी भी गांव में रहकर खेती करते हैं। लेकिन यह उमंग जल्द ही निराशा में बदल गई, जब देखा कि कई बीघा जमीन के मालिक भी खेती से मायूस हैं। खेती के काम में कोई गरिमा नहीं रही और गुजारा करना भी मुश्किल है। किसान पुत्र अब खेती छोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों में भटक रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश दोआबा का सिंचित क्षेत्र है जो दुनिया का बेहतरीन कृषि भूभाग माना जाता था। यहां गन्ना, गेहूं, धान, दलहन, तिलहन की खूब खेती होती थी। किसानों को मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितता से जूझना पड़ता था, लेकिन कभी नहीं सुना था कि पश्चिमी यूपी का किसान आत्महत्या कर रहा है। बल्कि इस इलाके ने तो किसान राजनीति को राष्ट्रीय फलक पर लाने पर चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेता दिये। इसके किसानों की आत्मनिर्भरता और खेती से जुड़े आत्मसम्मान की ताकत थी।

साठ के दशक में आई हरित क्रांति ने किसानों को उपज बढ़ाने और देश का खाद्य सुरक्षा का रास्ता दिखाया। लेकिन महंगे उर्वरक, कीटनाशक, संकर बीज और मशीनीकरण ने खेती की लागत इतनी बढ़ा दी कि उचित दाम न मिले तो खेती घाटे का सौदा हो जाए। देखते ही देखते किसानों को बेची जाने वाली चीजों का विशाल बाजार खड़ा हो गया, जिसके लिए किसानों को सस्ता कर्ज भी मिलने लगा। इसी की नई कड़ी है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। जिसमें प्राइवेट कंपनियों को एकमुश्त हजारों करोड़ रुपये का कारोबार मिल गया। मतलब, कृषि से जुड़े बिजनेस फायदे का सौदा बनते गये, लेकिन खेती घाटे का सौदा।

पिछले कुछ दशकों में जिस रफ्तार से खेती की लागत बढ़ी है, खेती का मुनाफा या फसलों के दाम उस गति से नहीं बढ़े। इस तथ्य को कृषि नीति के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा पूरे आंकड़ों के साथ समझा चुके हैं। स्थिति यह है कि पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी राज्यों में सरकारी खरीद कम होती है। इसमें से भी अधिकांश खरीद सिर्फ दो फसलों गेहूं और धान की होती है। वर्ष 2020-21 के खरीफ सीजन में देश भर से हुई धान की कुल खरीद में करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी पंजाब और हरियाणा की रही। सरकारी खरीद के इस सिस्टम को बचाने की चिंता ही इन राज्यों के किसानों को आंदोलन करने पर विवश कर रही है।

जिन राज्यों में सरकारी मंडी और खरीद का सिस्टम नहीं है, वहां के किसानों न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधे दाम पर उपज बेचने को मजबूर हैं। पंजाब में कृषक परिवारों की सालाना आय 2.16 लाख रुपये है जबकि बिहार में किसानों की सालाना आय देश में सबसे कम 42,684 रुपये है। इस आमदनी के मुकाबले किसानों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है। अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण (AIDIS) के अनुसार 2014 में 46 प्रतिशत कृषक परिवार कर्ज में डूबे थे और उन पर औसत कर्ज  70,580 रुपये का है। चूंकि कई बार ये ऋण बैंकों से ना लेकर अनौपचारिक क्षेत्र से लिया जाता है तो ब्याज दर भी बहुत ज़्यादा होती है। कर्ज के दुष्चक्र में फंसा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है या फिर उसे अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ता है।

देश में किसान आंदोलन पिछले तीन-चार साल से लगातार चल रहे हैं। लेकिन आप वही देख पाते हैं जो ज्यादातर मीडिया दिखाता है। अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनोखा विरोध-प्रदर्शन किया था। ये किसान तमिलनाड़ु के भीषण अकाल की ओर सरकार का ध्यान खींचना चाहते थे। सरकार ने ना केवल उनकी उपेक्षा की, बल्कि कोई बातचीत करने भी नहीं आया। किसानों को निराश होकर लौटना पड़ा। मार्च 2018 में दोबारा तमिलनाड़ु के किसान दिल्ली में धरने पर बैठे। करीब डेढ़ महीने बाद उन्हें भी ख़ाली हाथ लौटना पड़ा। 

2018 में ही किसान कई बार दिल्ली के दरवाजे खटखटाने आए, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद नासिक से मुंबई तक किसान मार्च निकाला गया तो चर्चा जरूर हुई लेकिन किसानों को झूठे आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया। अक्टूबर 2018 में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेतृत्व में किसान यात्रा दिल्ली पहुंची तो यूपी बॉर्डर पर ही रोक दिया। तब भी किसानों को मायूस होकर वापस लौटना पड़ा था। इससे पहले 2017 में मंदसौर में उचित मूल्य की मांग कर रहे किसानों पर पुलिस ने गोली चला दी थी।

मंदसौर की घटना के बाद ही किसानों ने ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) का गठन किया गया था। इसकी शुरुआत मुट्ठी भर किसान संगठनों को एक मंच पर लाने से हुई। अब इसमें देश भर के सैकड़ों संगठन जुड़ चुके हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए AIKSCC और कई दूसरे संगठनों ने मिलकर संयुक्त किसान मोर्चे का गठन हुआ जो किसानों की एकजुटता का प्रतीक बना चुका है। करीब दो महीने से दिल्ली की घेराबंदी के बाद आज यह किसान आंदोलन अपने शांतिपूर्ण तरीके, अनुशासन, प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के हौसले और किसी दबाव के आगे न झुकने के कारण कृषि कानूनों का स्थगित करवा चुका है और इन्हें रद्द कराने की मांग पर अडिग है। आंदोलन का सामूूूूूहिक नेतृत्व और एकजुटता इस आंदोलन की बड़ी ताकत है, जिसका अहसास सरकार को भी कहीं ना कहीं हो रहा है।

कृषि कानूनों पर स्टे के बावजूद क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं किसान?

कृषि कानूनों और इनके विरोध में चल रहे किसान आंदोलन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इसके अलावा कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार का पक्ष जानने के लिए चार सदस्यों की एक समिति भी गठित की है।

इस समिति में अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, पीके जोशी, किसान नेता भूपेंद्र सिंह मान और अनिल घनवट को शामिल किया गया है। ये नाम सुप्रीम कोर्ट के पास कहां से आये? यह तो मालूम नहीं है, लेकिन ये चारों कृषि कानूनों का समर्थन करते हैं। ऐसे सदस्यों के चयन से आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच विश्वास का संकट और ज्यादा गहरा गया है। यही वजह है कि कृषि कानूनों पर स्टे को भी वे संदेह की नजर से देख रहे हैं और आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है।

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामारामासुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि हम एक शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाना नहीं चाहेंगे। हमें लगता हैं कि कृषि कानूनों के अमल पर रोक के आदेश को आंदोलन की उपलब्धि के तौर पर देखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि इस आदेश के बाद किसान यूनियनें अपने लोगों को वापस जाने के लिए समझाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसान यूनियनों ने कृषि कानूनों के अमल पर रोक के आदेश पर संतोष तो जाहिर किया है, लेकिन इसे अपनी जीत मानने और पीछे हटने से साफ इंकार कर दिया है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने असलीभारत.कॉम को बताया कि वे सुप्रीम कोर्ट का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन किसान आंदोलन की दो ही प्रमुख मांगें हैं। तीनों कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की कानूनी गारंटी। इन मांगों के पूरा किये बगैर किसान घर वापस नहीं जाएंगे।

राकेश टिकैत ने सरकार पर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जो अशोक गुलाटी कृषि कानून बनवाने वाली समिति में शामिल थे, वे क्या सुनवाई करेंगे। इस ‘सरकारी’ समिति से बात करने से अच्छा है, सरकार से ही बात की जाये। टिकैत ने ऐसे किसान नेताओं को समिति में शामिल करने पर भी निराशा जताई, जिसका किसान आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एमएसपी की व्यवस्था को कायम रखने और कृषि कानूनों के जरिये किसानों को जमीन से बेदखल नहीं करने का भी आदेश दिया है। साथ ही किसान आंदोलन पर भी किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई है। फिर भी आंदोलनकारी किसान इसे अपनी जीत नहीं मान रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह कृषि कानूनों पर बनी समिति और विश्वास का संकट है। इसके अलावा जिस तरह यह मामला आंदोलनकारी किसान यूनियनों की मर्ज़ी के विपरीत सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, उसे लेकर भी किसान नेता आशंकित हैं।

समिति में शामिल अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और पीके जोशी कृषि कानूनों के पक्ष में खुलकर अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। ये दोनों सरकारी खरीद बढ़ाने और एमएसपी की कानूनी गारंटी के खिलाफ भी लिखते रहे हैं। समिति के अन्य सदस्य बीकेयू के भूपिंदर सिंह मान और शेतकारी संगठन के अनिल घनवट भी कुछ सुधारों के साथ कृषि कानूनों को लागू करने के पक्ष में हैं। यानी समिति के चारों सदस्य कृषि कानूनों के पैरोकार हैं। समिति में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो आंदोलनकारी किसानों का प्रतिनिधित्व करता हो या निष्पक्ष माना जाये। संयुक्त किसान मोर्चा ने अफसोस जताया कि देश के सुप्रीम कोर्ट में अपनी मदद के लिए बनाई समिति में एक भी निष्पक्ष व्यक्ति नहीं रखा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, चार सदस्यों की यह समिति कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार का पक्ष सुनने के बाद दो महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट देगी। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि यह समिति मध्यस्थता नहीं करेगी। हम मामले को हल करना चाहते हैं। इसलिए समिति गठित की है, ताकि हमारे सामने तस्वीर स्पष्ट हो सके। चीफ जस्टिस ने यहां तक कहा कि आप अनिश्चितकाल तक आंदोलन करना चाहता है तो कर सकते हैं। लेकिन हम यह तर्क नहीं सुनना चाहते कि किसान समिति के पास नहीं जाएंगे। जो लोग वाकई इस मसले का हल चाहते हैं, उन्हें समिति के समक्ष जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति से जुड़े योगेंद्र यादव ने रेशम का फंदा करार देते हुए संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार किसानों से वार्ता कर रही है और दूसरी तरफ कर रही है कि अब मामला कोर्ट में सुलझेगा। इससे संदेह पैदा होता है कि सरकार जो काम विज्ञान भवन में नहीं कर पा रही है, कहीं ये उम्मीद तो नहीं कर रही कि वो काम सुप्रीम कोर्ट कर देगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले ही संयुक्त किसान मोर्चा ने किसी प्रकार की मध्यस्थता से इंकार करते हुए समिति के समक्ष जाने से मना कर दिया था। कोर्ट के फैसले के बाद संयुक्त किसान मोर्चा नेे बयान जारी कर कहा कि हमने मामले में मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना नहीं की है और ऐसी किसी कमेटी से हमारा कोई संबंध नहीं है। चाहे यह कमेटी कोर्ट को तकनीकी राय देने के लिए बनी है या फिर किसानों और सरकार में मध्यस्थता के लिए।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि किसान आंदोलन इन तीन कानूनों के स्थगन नहीं इन्हें रद्द करने के लिए चलाया जा रहा है। इसलिए केवल इस स्टे के आधार पर अपने कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं कर सकते। किसान आंदोलन जारी रहेगा और इस साल लोहड़ी कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर मनाएंगे।