नीम कोटेड यूरिया पर कैसे हुआ मिलावट का लेप?

केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में खेती-किसानी के मामले में एक चीज पर काफी जोर दिया है। नीम कोटेड यूरिया! प्रधानमंत्री के तमाम भाषाणों और सरकारी दावों में नीम कोटेड यूरिया के फायदे गिनाए गए।

दरअसल, यूरिया के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। लेकिन किसानों का तो बस नाम है। यह सब्सिडी असल में मिलती है फर्टीलाइजर कंपनियों को। हर साल करीब 65-70 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी फर्टीलाइजर कंपनियों को दी जाती है। यह रकम देश के कृषि बजट से भी बड़ी है तो घपले-घोटाले भी बड़े ही होंगे। सरकारी सब्सिडी से बने यूरिया का गैर-कृषि कार्यों जैसे नकली दूध बनाने, कैमिकल बनाने आदि में डायवर्ट होना और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में तस्करी आम बात हो गई।

देश पर यह दोहरी मार थी। एक तरफ, सब्सिडी का यूरिया देश से बाहर जाने लगा। तो दूसरी तरफ, किसानों के लिए यूरिया की किल्लत होने लगी। यूरिया की तस्करी और कालाबाजारी की यह समस्या काफी पुरानी है। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही इसका तोड़ निकाल लिया। ये तोड़ था नीम कोटेड यूरिया। हालांकि,  नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हो गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने यूरिया को 100 फीसदी नीम कोटेड करने का फैसला किया। जो बड़ा कदम था।

साल 2015 में सरकार ने देश में यूरिया के संपूर्ण उत्पादन को नीम लेपित करना अनिवार्य कर दिया। आयात होने वाले यूरिया पर भी निंबोलियों के तेल यानी नीम तेल का स्प्रे करना जरूरी था। नीम के इतने ज्यादा अच्छे दिन कभी नहीं आए थे। सरकार का दावा था कि नीम कोटेड यूरिया से मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल की पैदावार बढ़ेगी। क्योंकि नीम लेपित यूरिया धीमी गति से प्रसारित होता है जिसके कारण फसलों की जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन की खुराक मिलती रहती है। नीम कोटिंग से यूरिया के औद्याेगिक इस्तेमाल और कालाबाजारी पर अंकुश लगने का दावा भी किया गया।

सरकार का मानना है कि नीम कोटिंग के जरिए यूरिया की कालाबाजारी रुकने से सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। बेशक, आइडिया अच्छा था। लागू भी 100 परसेंट हुआ। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई।

विज्ञान और पर्यावरण की जानी-मानी पत्रिका डाउन टू अर्थ ने हिसाब-किताब लगाया है कि देश में यूरिया की जितनी खपत है उसे नीम कोटेड करने के लिए जितना नीम तेल चाहिए उतना तो देश में उत्पादन ही नहीं है। जबकि सरकार का दावा है कि आजकल 100 फीसदी यूरिया नीम कोटेड है।

अगर सरकार की बात सही मानें तो सवाल उठता है कि जब देश में यूरिया के समूचे उत्पादन और आयातित यूरिया की कोटिंग के लिए पर्याप्त नीम तेल ही उपलब्ध नहीं है तो फिर नीम कोटिंग हो कैसे रही है? अब या तो यूरिया की 100 फीसदी नीम कोटिंग का सरकारी दावा गलत है या फिर नीम कोटिंग के लिए मिलावटी नीम तेल का इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार ने जब यूरिया की नीम कोटिंग का फैसला किया, ये सवाल कुछ लोगों ने तब भी उठाया था कि यूरिया की इतनी बड़ी मात्रा पर नीम स्प्रे के लिए नीम तेल कहां से आएगा? तब सिर्फ संदेह था, अब हमारे सामने डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट है। वो भी पूरी कैलकुलेशन के साथ!

https://www.downtoearth.org.in/news/governance/towards-a-bitter-end-india-s-neem-shortage-63978

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में नीम ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि भारत में यूरिया की जितनी खपत है, उसकी कोटिंग के लिए करीब 20,000 टन नीम तेल की जरूरत है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,000 टन नीम तेल की है। मतलब, जरूरत के मुकाबले मुश्किल से 15 फीसदी नीम का तेल देश में बनता है। सवाल फिर वही है। जब देश में इतना नीम तेल ही नहीं है तो फिर नीम कोटिंग कैसे हो रही है? बाकी का 85 फीसदी नीम तेल कहां से आ रहा है?

भारत में खेती के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया का इस्तेमाल होता है। देश में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 3.15 करोड़ टन है जिसमें से 76 लाख टन यूरिया आयात होता है। नीम कोटिंग से यूरिया की खपत घटने की बात कही गई थी लेकिन हाल के वर्षों में यूरिया की खपत बढ़ी है। लिहाजा आयात भी बढ़ा है।

नीम कोटिंग में मिलावट?

नीम तेल के उत्पादन और खपत में भारी अंतर से संदेह पैदा होता है कि कहीं नकली नीम तेल का इस्तेमाल तो यूरिया में नहीं हो रहा है। यह आशंका अप्रैल, 2017 में उर्वरक मंत्रालय की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन से पुख्ता होती है जिसमें कहा गया है कि कई नीम तेल सप्लायर यूरिया कंपनियों को नीम तेल की इतनी आपूर्ति कर रहे हैं जितनी उनकी उत्पादन क्षमता भी नहीं है। मंत्रालय ने नीम तेल सप्लायरों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिनडाउन टू अर्थ की रिपोर्ट का दावा है कि सरकार के इस नोटिस के बावजूद नीम तेल में मिलावट बदस्तूर जारी है।

यह हाल तब है जबकि एक टन यूरिया में सिर्फ 600 ग्राम नीम तेल स्प्रे का मानक तय किया गया है जिसे कई विशेषज्ञ बहुत कम मानते हैं। इस मात्रा को बढ़ाकर 2 किलोग्राम करने की मांग भी उठ रही है। कहा जा रहा है है कि एक टन यूरिया में 2 किलोग्राम से कम नीम तेल के स्प्रे से मिट्टी या फसलों पर कोई खास फायदा नहीं पहुंचेगा। खैर, ये कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेकिन असली सवाल नकली नीम तेल की मिलावट और सरकारी दावे की असलियत का है। नीम तेल में मिलावट के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस मिलावट को रोकने की कोई मजबूत नियामक व्यवस्था भी नहीं है।

नीम तेल आयात की तैयारी

लेकिन एक बात साफ है कि देश में नीम तेल की कमी है। जिसे दूर करने के लिए नीम तेल के आयात की सुगबुगाहट चल रही है। बहुत जल्द हम चीन या म्यांमार से नीम तेल आयात कर रहे होंगे। मतलब, चीन का विरोध करने के लिए चीनी फुलझंडी और पिचकारी के अलावा नीम तेल का भी बहिष्कार करना पड़ेगा।

उपाय क्या है?

बात ये है कि देश में जितने नीम के पेड़ हैं, उस हिसाब से नीम तेल का बाजार संगठित नहीं है। इसलिए इसे संगठित करने की जरूरत है। साथ ही नीम के पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहन देना पड़ेगा। भारत का सबसे बड़े उर्वरक निर्माता इफको ने इस दिशा में पहल की है। इफको ने देश भर में निंबोली खरीद केंद्र बनाए हैं। गुजरात और राजस्थान में कहीं जगह निंबोली संग्रह जोर पकड़ रहा है। लेकिन नीम तेल में मिलावट के के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अन्यथा,यूरिया की कालाबाजारी रोकने के चक्कर में नकली नीम तेल का कारोबार चमकने लगेगा।

खेती-किसानी पर चर्चा के बिना गुजरता चुनाव

राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याएं उठाने के साथ-साथ सरकार बनने के बाद उन समस्याओं को दूर करने का वायदा भी करते हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हिस्सेदारी कम होने के बावजूद खेती-किसानी आज भी भारत की आबादी को प्रत्यक्ष रोजगार देती है और अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक तथा सर्विस सेक्टर को कच्चा माल व बाजार उपलब्ध कराती है। रोजगार और बाजार को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली आर्थिक गतिविधि खेती-किसानी की समस्याएं और उनके समाधान के उपाय इस बार चुनावी चर्चा से यदि गायब नही हैं तो प्रमुखता में भी नही हैं।

अगर वर्ष 2014 से तुलना करें तो तब कृषि एवं किसानों के लिए भाजपा की चिन्ता व प्रतिबद्धता आज के मुकाबले अधिक दिखाई देती थी। सार्वजनिक सभाओं में नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार पर तंज करते हुए दोहराते थे कि कांग्रेस की नीति ‘मर जवान, मर किसान’ की हैं और यदि उनकी सरकार बनती है तो वे किसानो की बहुप्रतिक्षित मांग ‘स्वामीनाथन आयोग’ की संस्तुतियों को लागू कर किसानों को उनकी लागत पर 50% लाभ देंगे, कृषि बाजार में आमूल-चूल परिवर्तन कर बिचौलियों को कृषि बाजार से बाहर करेंगे, कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाएंगे, मध्यम एवं दीर्घकालिक सिंचाई योजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कर ‘पर ड्राप-मोर क्राप’ की व्यवस्था करेंगे।

2014 के चुनावों में किसानों ने भाजपा के वायदों पर भरोसा वोट दिए और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। लेकिन खेती और किसान सरकार की प्राथमिकता में नहीं आ पाए। मोदी सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार को गेहूं पर दिए जा रहे बोनस को समाप्त करने के लिए लिखा तथा सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से बताया गया कि किसानों को लागत पर 50% लाभ देने वाली स्वामीनाथन कमेंटी की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं है।

सरकार के पहले दो वर्षों 2014-15 और 2015-16 में किसानों को सूखे का भी सामना करना पड़ा जिससे उसकी आमदनी प्रभावित हुई। लेकिन बाद के तीन वर्षों में रिकार्ड उत्पादन तथा सरकार की महंगाई नियन्त्रण की नीतियों के कारण किसानों की आमदनी में कमी आई। चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने स्वामीनाथन की रिपोर्ट के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का दावा तो किया लेकिन उससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसकी गणना में भूमि का किराया सम्मिलित नही किया गया था।

मोदी सरकार की बड़ी-बड़ी घोषणाओं जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य योजना, गन्ने का 14 दिनों में भुगतान आदि जमीन पर असफल होने के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्यों में चुनाव जीतने के लिए कृषि ऋण माफी  का वायदा करना पड़ा। विभिन्न राज्यों में आधे-अधूरे तरीके से कृषि ऋण माफी योजना लागू भी की गई।

आखिरकार तमाम संरचनात्मक सुधारों को भूलकर भाजपा ने तेलंगाना और उड़ीसा सरकार के 2 हेक्टेयर तक जोत वाले किसानों के लिए 6000 रुपये/वार्षिक की प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना लागू कर चुनाव से पहले किसानों के खाते में 2000 रुपये हस्तांतरित करने का दांव चला। जो खेती-किसानी के मोर्चे पर सरकार की नाकामी को साबित करता है।

विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा सपा-बसपा-रालोद गठबंधन ने भी किसानों से कर्ज माफी का वायदा तो किया है लेकिन यह चुनाव भी खेती-किसानी पर बिना किसी गंभीर विमर्श और कार्य योजना के बिना गुजर रहा है।

(लेखक उत्तर प्रदेश योजना के पूर्व सदस्य और कृषि से जुड़े मामलों के जानकार हैं)

 

चुनावों में कहां गायब है किसान आंदोलनों की आवाज?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यह दावा करते हुए नहीं थकती है कि उसने पिछले पांच सालों में किसानों के कल्याण के लिए काफी काम किए हैं। भारतीय जनता पार्टी की यह सरकार ये भी कहती है कि पहली बार किसानों की आय दोगुनी करने का एक लक्ष्य तय किया गया। किसानों के लिए उठाए गए कई कदमों का उल्लेख नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार करती आई है।

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले पांच सालों में पूरे देश में सबसे अधिक किसान आंदोलन हुए। ये आंदोलन किसी एक राज्य या कुछ खास राज्यों तक सीमित नहीं रहे हैं। बल्कि उन सभी राज्यों में किसान आंदोलन पिछले पांच सालों में हुए हैं, जिन राज्यों को सामान्य तौर पर कृषि प्रधान राज्य माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को आम तौर पर औद्योगिक केंद्र माना जाता है लेकिन इन राज्यों में भी किसानों ने बीते सालों में आंदोलन किए।

किसान आंदोलनों के लेकर कुछ ऐसा माहौल बना कि देश भर में काम करने वाले कई अलग-अलग किसान संगठन एक मंच पर आए। इन सभी ने मिलकर संयुक्त तौर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इन लोगों ने अपनी मांगों में एकरूपता लाई। सभी जगह के किसान आंदोलनों में उचित मूल्य, कर्ज माफी और लागत में कमी की बात समान रूप से आई।

इसके बावजूद किसान आंदोलनों की गूंज लोकसभा चुनावों में सुनाई नहीं दे रही है। इसकी वजहों के बारे में पता लगाने के लिए जब कृषि के जानकारों, इन आंदोलनों में शरीक रहे लोगों और राजनीतिक विशेषज्ञों से बात करें तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं।

सबसे पहली बात तो यह बताई जा रही है कि आजादी के बाद से अब तक जितने भी लोकसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से किसी भी चुनाव में कृषि और किसान के मुद्दे केंद्र में नहीं रहे हैं। खेती-किसानी एक मुद्दा तो रहा है लेकिन यह मूल मुद्दा कभी नहीं रहा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यह कभी ऐसा मुद्दा नहीं रहा है जिस पर वोटों का धु्रवीकरण किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसान एक वर्ग के तौर पर भारत में एकजुट नहीं रहा है। इन लोगों का कहना है कि अगर किसान को एक वर्ग मानें तो इसके अंदर कई उपवर्ग हैं। जाति का उपवर्ग है, धर्म का उपवर्ग, भाषा का उपवर्ग है और क्षेत्र का उपवर्ग है। लेकिन इन लोगों का ये कहना है कि ये उपवर्ग चुनावों में किसानों के मुख्य वर्ग बन जाते हैं और किसान वर्ग खुद उपवर्ग बनकर पीछे छूट जाता है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक किसान जब वोट देने जाता है तो उस वक्त वह बतौर किसान नहीं वोट देता है बल्कि चुनावी राजनीति में वोट देने का उसका निर्णय उसकी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से अधिक प्रभावित होती है। ऐसे में खेती-किसानी के मुद्दे उठते तो रहते हैं लेकिन चुनावों के मूल मुद्दे नहीं बन पाते।

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि किसान खुद को किसानों का एक वर्ग मानकर मतदान नहीं करता। इसलिए वे किसानी के मुद्दों को मूल मुद्दा नहीं बनाते हैं। क्योंकि अगर खेती-किसानी के मुद्दे मूल मुद्दे बन गए तो उन्हें नुकसान अधिक होगा।

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि खुद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते कि किसान एक वर्ग के तौर पर उभरे। इसकी वजह बताते हुए ये लोग कहते हैं कि देश के 57 फीसदी लोग अब भी कृषि पर जीवनयापन के लिए निर्भर हैं। अगर किसी तरह से इन 57 फीसदी लोगों का एक वर्ग बन गया और ये एक वोट बैंक की तरह वोट देने लगे तो फिर ये होगा कि किसान जैसी सरकार चाहेंगे, वैसी सरकार बनेगी। सारी नीतियां किसानों के हिसाब से बनेगी।

इसका एक असर यह भी होगा कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवार भी टूटेगी। इससे वोट बैंक की मौजूदा राजनीति को झटका लगेगा और राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।

इन लोगों का यह भी कहना है कि यह उद्योग जगत भी नहीं चाहता कि किसान एक वर्ग के तौर पर एकजुट हो जाएं। क्योंकि इन्हें लगता है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर सरकारी नीतियों को जिस तरह से वे अपने फायदे के लिए प्रभावित कर पा रहे हैं, उस तरह से वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे और किसानों के हिसाब से सारी सरकारी नीतियां बनने लगेंगी।

ऐसे में स्थिति ये दिखती है कि किसानी के सवालों को मूल चुनावी मुद्दा बनाने के पक्ष में चुनाव प्रक्रिया में अधिकांश हितधारक नहीं हैं। इसलिए हाल के सालों में किसान आंदोलनों की देशव्यापी गूंज के बावजूद लोकसभा चुनावों में इनकी धमक नहीं सुनाई दे रही है।

गुजरात: राजनीति और इंजीनियरिंग के लिहाज से क्‍यों खास है सौनी प्रोजेक्‍ट?

अपने महत्‍वाकांक्षी सौनी प्रोजेक्‍ट के जरिये गुजरात की सियासी इंजीनियरिंग को साधने में जुटे हैं नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को गुजरात के जामनगर पहुंचे और ‘सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण फॉर इरिगेशन’ (SAUNI) यानी सौनी प्रोजेक्‍ट के पहले चरण का लोकार्पण किया। साल 2012 में विधानसभा चुनाव से पहले बतौर सीएम नरेंद्र मोदी ने ही इस सिंचाई परियोजना का ऐलान किया था। एक बार फिर चुनाव से पहले 12 हजार करोड़़ रुपये की यह महत्‍वाकांक्षी परियोजना सुर्खियों में है। उम्‍मीद की जा रही है कि यह प्रोजेेक्‍ट सौराष्‍ट्र से सूखा पीड़‍ि़त किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। लेकिन इसका सियासी महत्‍व भी कम नहीं है। विपक्षी दल कांग्रेस ने परियोजना पूरी होने से पहले ही प्रथम चरण के लोकार्पण और प्रधानमंत्री की जनसभा को चुनावी हथकंंड़ा करार दिया है। पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी की आज गुजरात में पहली सभा थी।

जामनगर, राजकोट और मोरबी जिले की सीमाओं से सटे सणोसरा गांव मेंं एक जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सौनी प्रोजेक्ट पर हर गुजराती को गर्व होगा। किसान को जहां भी पानी मिलेगा, वह चमत्‍कार करके दिखाएगा। गुजरात के मुख्‍यमंत्री विजय रूपाणी का कहना है कि सौनी प्रोजेक्‍ट सूखे की आशंका वाले सौराष्‍ट्र के 11 जिलों की प्‍यास बुझाएगा। परियोजना के पहले चरण में राजकोट, जामनगर और मोरबी के 10 बांधों में नर्मदा का पानी पहुंचेेगा। अनुमान है कि सौराष्‍ट्र की करीब 10 लाख हेक्‍टेअर से अधिक कृषि भूमि को फायदा होगा।

सिविल इंजीनियरिंग का कमाल

सिविल इंजीनियरिंग के लिहाज से भी सौनी प्रोजेेक्‍ट काफी मायने रखता है। इसके तहत 1,126 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी, जिसके जरिये सरदार सरोवर बांध का अतिरिक्‍त पानी सौराष्ट्र के छोटे-बड़े 115 बांधों में डाला जाएगा। पहले चरण में 57 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है जिससे सौराष्‍ट्र में तीन जिलों के 10 बांधों में पानी पहुंचने लगा है। गुजरात सरकार का दावा है कि सभी 115 बांधों के भरने से करीब 5 हजार गांव के किसानों को फायदा होगा। गौरतलब है कि सौराष्‍ट्र के ये इलाके अक्‍सर सूखे की चपेट में रहते हैं। नर्मदा का पानी पहुंचने से यहां के किसानों को राहत मिल सकती है।

मोदी की रैली के सियासी मायने

हालांकि, सौनी प्रोजेक्‍ट 2019 तक पूरा होना है लेकिन अगले साल गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा और राज्‍य सरकार अभी से इसका श्रेय लेने में जुट गई है। आनंदीबेन पटेल के सीएम की कुर्सी से हटने और विजय रूपाणी के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद यह पीएम मोदी की पहली गुजरात यात्रा है। उधर, पाटीदार आरक्षण और दलित आंदोलन भी भाजपा के लिए खासी चुनौती बना हुआ हैै। इसलिए भी पीएम मोदी के कार्यक्रम और जनसभा के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सौराष्‍ट्र कृषि प्रधान क्षेत्र है और यहां पटेल आरक्षण और दलित आंदोलन का काफी असर है।

परंपरागत सिंचाई योजना से कैसे अलग है सौनी

देखा जाए तो सौनी प्रोजेेक्‍ट नर्मदा प‍रियोजना का ही विस्‍तार है। लेकिन परंपरागत सिंचाई परियोजनाओं की तरह सौनी प्रोजेक्‍ट में नए बांध, जलाशयों और खुली नहरों के निर्माण के बजाय पहले से मौजूद बाधों में पानी पहुंंचाया जाएगा। इसके लिए खुली नहरों की जगह पाइपलाइन बिछाई जा रही है। उल्‍लेखनीय है कि भूमि अधिग्रहण के झंझटों को देखते हुए गुजरात सरकार ने खुली नहरों के बजाय भूमिगत पाइपलाइन का विकल्‍प चुना था। इसी पाइपलाइन के जरिये नर्मदा का पानी सौराष्‍ट्र के 115 बांधों तक पहुंचााने की योजना है। भूमिगत पाइपलाइन से बांधों में पानी डालने के लिए बड़े पैमाने पर पंपिंग की जरूरत होगी। इस पर आने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

परियोजना पर सवाल भी कम नहीं

12 हजार करोड़ रुपये केे सौनी प्रोजेक्‍ट पर सवाल भी कम नहीं हैं। दरअसल, राज्‍य सरकार का अनुमान है कि नर्मदा से करीब 1 मिलियन एकड़ फीट अतिरिक्‍त पानी सौराष्‍ट्र के 115 बांधों को मिल सकता है। गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता शंकर सिंह वाघेला का कहना है कि सौनी प्रोजेक्‍ट की सच्‍चाई दो महीने बाद सामने आएगी। अभी तो बरसात की वजह से अधिकांश बांधों में बारिश का पानी पहुंंच रहा है। दो-तीन महीने बाद जब बांध सूख जाएंगे तब पता चलेगा सौनी प्रोजेक्‍ट से कितना पानी पहुंचता है। सरकार को कम से कम दो महीने का इंतजार करना चाहिए था।