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महामारी में सफाईकर्मियों को साबुन-सैनिटाइजर भी उपलब्ध नहीं



सर्वे में उजागर हुई कड़वी हकीकत, बेहद असुरक्षित माहौल में काम करने को मजबूर हैं सफाई कर्मचारी

पिछले करीब छह महीने से देश और दुनिया कोविड-19 के संकट से जूझ रहा है। कोरोना संक्रमण की रोकथाम के लिए मास्क पहनने, बार-बार साबुन या सैनिटाइजर से हाथ धोने और सामाजिक दूरी बनाए रखने पर जोर दिया जा रहा है। लेकिन इस महामारी से निपटने के सबसे अग्रिम मोर्चे पर तैनात सफाई कर्मचारी बेहद मुश्किल हालात में काम करने को मजबूर हैं। यह बात एक सर्वे में भी उजागर हुई है।

देश के दो राज्यों और दो महानगरों में सफाई कर्मचारियों के बीच किए गए सर्वे के मुताबिक, लॉकडाउन के दौरान सिर्फ 30.7 फीसदी सफाई कर्मचारियों को मास्क, 22.4 फीसदी को दस्ताने, 31.1 फीसदी को हाथ धोने के लिए साबुन और 18.9 फीसदी को सैनिटाइजर मिल पाया। बाकी सफाई कर्मचारियों को ये चीजें नहीं मिली या अपर्याप्त थीं। जबकि साफ-सफाई के काम में संक्रमण होने का खतरा और भी ज्यादा रहता है। कोरोना के खिलाफ भारत की जंग का यह ऐसा पहलू जो ताली-थाली के शोर में गुम हो गया।

सफाई कर्मचारियों से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय स्वतंत्र शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता धम्म दर्शन निगम और शीवा दुबे का यह अध्ययन कोविड-19 महामारी के दौरान भारत के सफाई कर्मचारियों की स्थिति को उजागर करता है कि कैसे अपनी जान जोखिम में डालकर सफाई कर्मचारी फ्रंटलाइन वर्कर्स और कोरोना वारियर की भूमिका निभा रहे हैं। यह सर्वे प्रमुखता से दो राज्य – असम और मध्य प्रदेश और दो महानगरों – दिल्ली और मुंबई के कुल 214 सफाई कर्मचारियों के बीच अप्रैल और मई महीनों किया गया था।

सर्वे में भाग लेने वाले 64 फीसदी सफाई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें कोविड-19 के संक्रमण से बचने के लिए किसी तरह की कोई ट्रेनिंग या सुरक्षा संबंधी दिशानिर्देश नहीं दिए गए थे। 92.5% सफाई कर्मचारियों को लॉकडाउन के पहले भी जरूरी साधन नहीं मिलते थे, जिनकी उन्हें काम करने में जरूरत होती है। इसके अलावा 89.9% सफाई कर्मचारियों को काम करने के लिए कोई वर्दी नहीं मिलती थी। 96.1% सफाई कर्मचारियों को आपातकाल के लिए कोई प्राथमिक चिकित्सा किट नहीं मिली थी जबकि 89.7% सफाई कर्मचारियों के पास किसी प्रकार का कोई स्वास्थ्य बीमा भी नहीं था।

सर्वे में महिला सफाई कर्मचारियों से पूछा कि कोविड-19 से उनके बचाव के लिए कोई खास व्यवस्था सुनिश्चित की गई या नहीं। काम पर जाने वाली 96.5% फीसदी महिला सफाईकर्मियों ने कहा कि उनके लिए काम पर कोई विशेष व्यवस्था नहीं की गई थी। इन सफाई कर्मचारियों में आधे से ज्यादा (54.7%) ठेका मजदूर हैं। यह संख्या बताती है कि लगभग सभी शहरों में ठेके पर ही ज्यादा काम चल रहा है।

हालांकि, सफाई कर्मचारियों के लिए कोविड-19 महामारी के चलते एक सकारात्मक बदलाव भी आया है। सर्वे में शामिल 71 फीसदी सफाई कर्मचारियों ने बताया कि उनकी तनख्वाह पहले समय पर नहीं आ रही थी अब समय पर आने लगी। इनमें ठेकेदार और सरकार के लिए काम करने वाले दोनों ही थे। ऐसा हो सकता है कि कोविड-19 से बचने के लिए और इस काम की ज़रूरत को देखते हुए सफाई कर्मचारियों की तनख्वाह समय पर दी जा रही हो।

कोविड-19 से संक्रमित होने पर क्या करें? इस बारे में कोई निर्देश मिला है क्या, इस सवाल का जवाब देने वाले 93.2% सफाई कर्मचारियों ने बताया कि उन्हें ऐसी कोई सूचना या निर्देश नहीं मिला। सिर्फ 4.2% भागीदारों ने कहा कि अगर उन्हें कोविड-19 पॉजिटिव पाया जाता है तो उनके विभाग में बताने के लिए कहा गया था। सिर्फ 1.6% भागीदारों को मुफ्त जांच का वादा किया गया और केवल 1.0% भागीदारों को संक्रमित होने पर मुफ्त इलाज का भरोसा दिया गया था। 87.5% भागीदारों ने कहा कि राशन, वेतन, नौकरी की सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और मुफ्त इलाज जैसा उन्हें कोई आश्वासन सरकार की तरफ से नहीं मिला। सिर्फ 3.8% भागीदारों ने कहा कि उनको नौकरी ना छूटने का आश्वासन दिया गया था। जबकि 3.8% सफाई कर्मचारियों ने कहा कि कोविड-19 महामारी में उन्हें बीमार पड़ने पर मुफ्त इलाज का आश्वासन दिया गया था।

जब तक यह सर्वे चला करीब 14% भागीदारों में से उनके एक या अधिक परिवार वालों को कोविड-19 पॉजिटिव पाया गया था। अतः यह समझा जा सकता है कि सफाई कर्मचारी उनके परिवार से दूरी बनाने में असमर्थ रहे। इसका कारण उनका छोटा घर होना और काम के लिए भीड़ वाली जगह जानी की मजबूरी हो सकता है। सर्वे में सफाई कर्मचारियों के परिवार में से किसी की मृत्यु की सूचना नहीं मिली है। उल्लेखनीय है कि बेहद जोखिम उठाने के बावजूद केंद्रीय सरकार की प्रथम पंक्ति के कामगारों (फ्रंट लाइन वर्कर्स) के लिए 50 लाख रूपये के बीमा की योजना के अंतर्गत सफाई कर्मचारी नहीं आते हैं।

सैंपल साइज छोटा होने और केवल दो राज्यों व दो महानगरों तक सीमित होने के चलते इस सर्वे के नतीजों को पूरे देश ही हकीकत नहीं माना जा सकता है। लेकिन यह अध्ययन सफाई कर्मचारियों के काम करने की स्थिति को दर्शाता है। सफाई कर्मचारियों की खराब स्थिति और उसमें बदलाव ना होने में जाति एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।