बुधवार, 12 मई 2021
टॉप न्यूज़

उर्वरकों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी पर इफको की भयंकर लीपापोती



उर्वरकों की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि से बढ़ेगी खेती की लागत और किसानों की नाराजगी

ऐसे समय जब देश में किसान आंदोलन चल रहा है, पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव और उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव की सरगर्मियां तेज हैं, तब खेती से जुड़ी एक खबर ने किसानों की नाराजगी बढ़ा दी है। उर्वरक बनाने वाले देश के सबसे बड़े संगठन इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोआपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने डीएपी समेत कई उर्वरकों के दाम 45 फीसदी से लेकर 58 फीसदी तक बढ़ा दिये हैं। डीएपी के 50 किलो के कट्टे का दाम 1200 रुपये से बढ़ाकर 1900 रुपये कर दिया है। डीजल व बाकी चीजोंं की महंगाई से जूझ रहे किसानों पर यह बड़ी मार है।

मामले के तूल पकड़ने के बाद इफको ने सफाई दी है कि ये दाम अस्थायी हैं और किसानों को पुराने रेट के उर्वरक ही बेचे जाएंगे। लेकिन कीमतों को लेकर मचे इस विवाद से उर्वरकों की कालाबाजारी का खतरा पैदा हो गया है। इफको की सफाई पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं।

उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का खुलासा 7 अप्रैल को इफको के मार्केटिंग डायरेक्ट योगेंद्र कुमार की ओर से स्टेट मार्केटिंग मैनेजरों को भेजे गये एक विभागीय पत्र से हुआ है। इस पत्र के मुताबिक, डीएपी के अलावा चार अन्य उर्वरकों की कीमतें बढ़ायी गई हैं। एनपीके (10:26:26) की कीमत 1175 रुपये बढ़कर 1775 रुपये, एनपीके (12:32:16) की कीमत 1185 रुपये से बढ़कर 1800 रुपये, एनपीएस (20:20:0:13) की कीमत 925 रुपये से बढ़कर 1350 रुपये और एनपीके (15:15:15) की कीमत 1500 रुपये प्रति बैग तय की गई है। पत्र में कहा गया है कि नई कीमतें एक अप्रैल, 2021 से लागू होंगी और डीएपी व एनपीके का पुराना स्टॉक पुराने दाम पर बेचा जाएगा।

उर्वरकों की कीमतों में यह अब तक की सबसे बड़ी बढ़ोतरी मानी जा रही है। इसके लिए अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की बढ़ती कीमतों को वजह बताया गया है। किसानों और विपक्ष के नेताओं ने इस मामले पर सरकार को घेरते हुए खासी नाराजगी जाहिर की है। कांग्रेस के सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि किसानों को क्या पता था कि किसान सम्मान निधि से कई गुना ज्यादा पैसा उनसे ही वसूला जाएगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान जारी कर उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर आंदोलन तेज करने की चेतावनी दी है। सोशल मीडिया पर यह मुद्दा काफी चर्चाओं में है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, एक एकड़ खेती में लगभग एक कुंतल डीएपी का इस्तेमाल होता है। इस तरह प्रति एकड़ लगभग 1400 रुपये का खर्च केवल एक उर्वरक पर बढ़ जाएगा। डीएपी के अलावा यूरिया, देसी खाद और कीटनाशकों की लागत अलग है। प्रमुख उर्वरकों के दाम में 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी किसानों पर बहुत बड़ा बोझ है, जिससे किसानों की नाराजगी बढ़नी तय है। खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए सरकार पर आगामी खरीफ फसलों के एमएसपी बढ़ाने का दबाव भी बढ़ जाएगा।

पुराने स्टॉक की आड़ में इफको की सफाई

कायदे से तो इफको जैसी सहकारी संस्था को खुद ही नई कीमतों का ऐलान करना चाहिए था। लेकिन ऐसा ना करते हुए पूरे मामले पर लीपापोती की कोशिशें की जा रही हैं। इफको के एमडी और सीईओ डॉ. यूएस अवस्थी ने नियंत्रण-मुक्त उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि के लिए किसी राजनीतिक दल या सरकार को जिम्मेदार ठहराने पर आपत्ति व्यक्त करते हुए कई ट्वीट किये।

डॉ. यूएस अवस्थी के ट्वीट के मुताबिक, इफको 11.26 लाख टन कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री पुरानी दरों पर ही करेगी। बाजार में उर्वरकों की नई दरें किसानों को बिक्री के लिए नहीं हैं। एक ट्वीट में उन्होंने यहां तक कहा कि पत्र में उल्लिखित मूल्य केवल बैगों पर दिखाने के लिए हैं। क्योंकि फैक्ट्री में बने माल पर मूल्य अंकित करना पड़ता है। इफको मार्केटिंग टीम को निर्देश दिया गया है कि किसानों को केवल पुराने मूल्य वाले उर्वरक ही बेचे जाएं।

सवाल उठाता है कि अगर उर्वरकों के नये रेट किसानों के लिए नहीं हैं तो फिर किसके लिए हैं। जब पुराना स्टॉक खत्म हो जाएगा, तब उर्वरक किस रेट पर बिकेंगे? इफको ने खुद ही उर्वरकों के दाम बढ़ाये हैं तो फिर मामले को इतना क्यों घुमाया जा रहा है?

स्पष्ट है कि इफको ने उर्वरकों के दाम में बढ़ोतरी वाले अपने पत्र को खारिज नहीं किया है। लेकिन मामले को दबाने या कुछ दिनों के लिए टालने की कोशिश जरूर की जा रही है। इफको का यह कहना बहुत अजीब है कि नये मूल्य केवल बैगों पर दिखाने के लिए हैं और किसानों को बिक्री के लिए नहीं है। अगर उर्वरकों को पुराने रेट पर ही बेचना था तो रेट बढ़ाये ही क्यों? क्या पुराना स्टॉक खत्म होने के बाद उर्वरक नई कीमतों पर नहीं बिकेंगे? ये सवाल खूब उठा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दोहरा रवैया

उर्वरकों के दाम में बढ़ोतरी के लिए अंतराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों को वजह बताया जा रहा है। हैरानी की बात है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है तो पेट्रोल-डीजल के दाम कम नहीं होते, लेकिन उर्वरकों के दाम कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि के नाम पर बढ़ाये जा रहे हैं। यह दोहरा मापदंड किसानों पर दोहरी मार डाल रहा है।

कालाबाजारी का खतरा

उर्वरक की कीमतों को लेकर पैदा की जा रही गलतफहमी का फायदा जमाखोर उठा सकते हैं। इसके अलावा प्राइवेट सेक्टर की कंपनियों को भी दाम बढ़ाने का मौका मिल सकता है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में तेजी का रुझान है। इफको द्वारा बढ़ायी गई कीमतें अब सबके सामने हैं। ऐसे में कुछ लोग पुराने रेट का माल स्टॉक कर कालाबाजारी कर सकते हैं। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है।

मामले को चुनाव तक टालने का प्रयास

उर्वरकों की कीमतों में बढ़ोतरी का मुद्दा पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव के साथ-साथ यूपी के पंचायत चुनाव पर भी असर डाल सकता है। किसान आंदोलन में तो यह मुद्दा बनेगा ही। संभवत: इसलिए पुराने स्टॉक के नाम पर मामले को कुछ दिनों के लिए टालने का प्रयास किया जा रहा है। माना जा रहा है कि जल्द ही उर्वरकों की कीमतों में संशोधन कर डैमेज कंट्रोल का प्रयास किया जा सकता है।

जल्द तय हो सकते हैं संशोधित रेट

इफको से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जिन देशों से उर्वरकों के लिए कच्चा माल आयात किया जाता है, वहां की कंपनियों के साथ बातचीत जारी है। इन सौदों के फाइनल होने के बाद उर्वरकों की कीमतें नए सिरे से तय हो सकती हैं। तब तक किसानों को पुराने रेट के उर्वरक बेचे जाएंगे। हालांकि, इफको के इन दावों की हकीकत जल्द ही सामने आ जाएगी, जब किसान खरीफ की बुवाई के लिए उर्वरक खरीदेंगे।

कहां चूकी सरकार?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में तेजी का हवाला देते हुए प्राइवेट कंपनियां उर्वरकों के दाम पहले ही बढ़ा चुकी हैं। ऐसे में सरकार और सहकारिता की अहमियत बढ़ जाती है। कोराना काल में जिन किसानों ने समूची अर्थव्यवस्था को सहारा दिया, उन्हें महंगाई की मार से बचाना भी सरकार का फर्ज है। सरकार किसानों को रियायती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी देती है। अगर कच्चे माल की कीमतों में तेजी का रुख देखकर सरकार पहले ही सब्सिडी की दरें बढ़ा देती तो उर्वरकों की कीमतें इतनी ज्यादा ना बढ़ती। लेकिन ऐसा करने की बजाय किसानों को उनके हाल पर छोड़ने की नीति अपनाई जा रही है।