बुधवार, 21 अप्रैल 2021
मेरा गांव

दिल्ली घेरने पर क्यों मजबूर हुआ किसान?



खेती-किसानी से जुड़े मसलों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाना इस किसान आंदोलन की बड़ी कामयाबी है

जब से किसान आंदोलन शुरू हुआ है देश में खेती-किसानी को लेकर खूब चर्चा हो रही है। शहरों में लोग कृषि के प्रति क्या नजरिया रखते हैं यह भी पता चल रहा है। कुछ लोग किसान आंदोलन को विपक्ष की चाल, खालिस्तानी, नक्सली और अंतरराष्ट्रीय साजिश करार दे चुके हैं। जो यह सब नहीं कहते वो भी इतना तो कह दी देते हैं कि किसानों को विपक्ष ने भड़का दिया है। शहरी समाज में यह गलतफहमी भी हाल के वर्षों में काफी ज्यादा फैलायी गई है कि किसानों को जरूरत से ज्यादा सब्सिडी और छूट मिलती हैं। बिजली, पानी, खाद, सब फ्री मिलता है।

कुछ लोग तो यहां तक कुतर्क करते हैं कि अगर किसानों को खेती में नुकसान हो रहा है तो कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेते? अन्न उगाकर किसान कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। हालांकि, बहुत से किसान खेती छोड़कर मजदूर बन चुके हैं। कुछ ने इस अपमान से बचने की लिए जिंदगी का ही साथ छोड़ दिया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की सालाना रिपोर्टों के अनुसार 1995 से 2012 के बीच करीब 3 लाख किसानों ने आत्महत्या कर चुके हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 में देश में 10,281 किसानों ने खुदकुशी कर ली यानी प्रतिदिन औसतन 28 किसान आत्महत्या करते हैं।  

क्या आप जानते हैं कि किसान कितना कमाता है? किसान का घर कैसे चलता है? किसान के बेटे को खेती करने में शर्म क्यों आती है? किसान के बच्चे पलायन करने पर क्यों मजबूर हैं? किसान की बेटी क्यों नौकरीवाले से ही शादी करना पसंद करती है, खेती वाले से नहीं? और सबसे बड़ा सवाल, किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? इन्ही सब सवालों का जवाब मुझे मिला, जब मैंने खेती का रुख किया।

तीन साल पहले मैंने खेती में हाथ आजमाने का इरादा किया तो एक नयी उमंग के साथ मैं अपने उन सभी रिश्तेदारों से मिलने गई जो अभी भी गांव में रहकर खेती करते हैं। लेकिन यह उमंग जल्द ही निराशा में बदल गई, जब देखा कि कई बीघा जमीन के मालिक भी खेती से मायूस हैं। खेती के काम में कोई गरिमा नहीं रही और गुजारा करना भी मुश्किल है। किसान पुत्र अब खेती छोड़कर रोजगार की तलाश में शहरों में भटक रहे हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश दोआबा का सिंचित क्षेत्र है जो दुनिया का बेहतरीन कृषि भूभाग माना जाता था। यहां गन्ना, गेहूं, धान, दलहन, तिलहन की खूब खेती होती थी। किसानों को मौसम की मार और बाजार की अनिश्चितता से जूझना पड़ता था, लेकिन कभी नहीं सुना था कि पश्चिमी यूपी का किसान आत्महत्या कर रहा है। बल्कि इस इलाके ने तो किसान राजनीति को राष्ट्रीय फलक पर लाने पर चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे नेता दिये। इसके किसानों की आत्मनिर्भरता और खेती से जुड़े आत्मसम्मान की ताकत थी।

साठ के दशक में आई हरित क्रांति ने किसानों को उपज बढ़ाने और देश का खाद्य सुरक्षा का रास्ता दिखाया। लेकिन महंगे उर्वरक, कीटनाशक, संकर बीज और मशीनीकरण ने खेती की लागत इतनी बढ़ा दी कि उचित दाम न मिले तो खेती घाटे का सौदा हो जाए। देखते ही देखते किसानों को बेची जाने वाली चीजों का विशाल बाजार खड़ा हो गया, जिसके लिए किसानों को सस्ता कर्ज भी मिलने लगा। इसी की नई कड़ी है प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना। जिसमें प्राइवेट कंपनियों को एकमुश्त हजारों करोड़ रुपये का कारोबार मिल गया। मतलब, कृषि से जुड़े बिजनेस फायदे का सौदा बनते गये, लेकिन खेती घाटे का सौदा।

पिछले कुछ दशकों में जिस रफ्तार से खेती की लागत बढ़ी है, खेती का मुनाफा या फसलों के दाम उस गति से नहीं बढ़े। इस तथ्य को कृषि नीति के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा पूरे आंकड़ों के साथ समझा चुके हैं। स्थिति यह है कि पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ को छोड़कर बाकी राज्यों में सरकारी खरीद कम होती है। इसमें से भी अधिकांश खरीद सिर्फ दो फसलों गेहूं और धान की होती है। वर्ष 2020-21 के खरीफ सीजन में देश भर से हुई धान की कुल खरीद में करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी पंजाब और हरियाणा की रही। सरकारी खरीद के इस सिस्टम को बचाने की चिंता ही इन राज्यों के किसानों को आंदोलन करने पर विवश कर रही है।

जिन राज्यों में सरकारी मंडी और खरीद का सिस्टम नहीं है, वहां के किसानों न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधे दाम पर उपज बेचने को मजबूर हैं। पंजाब में कृषक परिवारों की सालाना आय 2.16 लाख रुपये है जबकि बिहार में किसानों की सालाना आय देश में सबसे कम 42,684 रुपये है। इस आमदनी के मुकाबले किसानों पर कर्ज का बोझ ज्यादा है। अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण (AIDIS) के अनुसार 2014 में 46 प्रतिशत कृषक परिवार कर्ज में डूबे थे और उन पर औसत कर्ज  70,580 रुपये का है। चूंकि कई बार ये ऋण बैंकों से ना लेकर अनौपचारिक क्षेत्र से लिया जाता है तो ब्याज दर भी बहुत ज़्यादा होती है। कर्ज के दुष्चक्र में फंसा किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है या फिर उसे अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ता है।

देश में किसान आंदोलन पिछले तीन-चार साल से लगातार चल रहे हैं। लेकिन आप वही देख पाते हैं जो ज्यादातर मीडिया दिखाता है। अप्रैल 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनोखा विरोध-प्रदर्शन किया था। ये किसान तमिलनाड़ु के भीषण अकाल की ओर सरकार का ध्यान खींचना चाहते थे। सरकार ने ना केवल उनकी उपेक्षा की, बल्कि कोई बातचीत करने भी नहीं आया। किसानों को निराश होकर लौटना पड़ा। मार्च 2018 में दोबारा तमिलनाड़ु के किसान दिल्ली में धरने पर बैठे। करीब डेढ़ महीने बाद उन्हें भी ख़ाली हाथ लौटना पड़ा। 

2018 में ही किसान कई बार दिल्ली के दरवाजे खटखटाने आए, लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद नासिक से मुंबई तक किसान मार्च निकाला गया तो चर्चा जरूर हुई लेकिन किसानों को झूठे आश्वासन देकर वापस भेज दिया गया। अक्टूबर 2018 में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के नेतृत्व में किसान यात्रा दिल्ली पहुंची तो यूपी बॉर्डर पर ही रोक दिया। तब भी किसानों को मायूस होकर वापस लौटना पड़ा था। इससे पहले 2017 में मंदसौर में उचित मूल्य की मांग कर रहे किसानों पर पुलिस ने गोली चला दी थी।

मंदसौर की घटना के बाद ही किसानों ने ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) का गठन किया गया था। इसकी शुरुआत मुट्ठी भर किसान संगठनों को एक मंच पर लाने से हुई। अब इसमें देश भर के सैकड़ों संगठन जुड़ चुके हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए AIKSCC और कई दूसरे संगठनों ने मिलकर संयुक्त किसान मोर्चे का गठन हुआ जो किसानों की एकजुटता का प्रतीक बना चुका है। करीब दो महीने से दिल्ली की घेराबंदी के बाद आज यह किसान आंदोलन अपने शांतिपूर्ण तरीके, अनुशासन, प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करने के हौसले और किसी दबाव के आगे न झुकने के कारण कृषि कानूनों का स्थगित करवा चुका है और इन्हें रद्द कराने की मांग पर अडिग है। आंदोलन का सामूूूूूहिक नेतृत्व और एकजुटता इस आंदोलन की बड़ी ताकत है, जिसका अहसास सरकार को भी कहीं ना कहीं हो रहा है।