नीति

कृषि कर्ज के लिए अलग किसान बैंक क्यों जरूरी?

वित्त वर्ष 2022 के बजट में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैंकिंग क्षेत्र के लिए दो विशिष्ट सुधारों की घोषणा की है। कुछ एनपीए को घरेलू वित्तीय संस्थानों (डीएफआई) में वापस लाने के लिए नए एआरसी और एएमसी जैसे उपाय ऋण वृद्धि और इसके प्रवाह में सुधार के लिए लक्षित हैं। परियोजना वित्त को पुनर्जीवित करने के लिए डीएफआई अधिक महत्वपूर्ण रूप से लक्षित हैं। उम्मीद है,अतीत के सबक बैंकिंग क्षेत्र के सुधार में लागू होंगे। इसके अलावा, कुछ ऐसे सेक्टर हैं जिन्हें सीधे ऋण की जरूरत है। इनमें एक है कस्टोडियन बैंकिंग और दूसरा कृषि क्षेत्र।

ऋण वितरण में जोखिम है इसलिए इसकी उपलब्धता और मार्जिन में सुधार के लिए विशेषज्ञता की जरुरत है। सरकारों ने कई दशकों तक ऋण को प्राॅयरिटी सेक्टर में परिवर्तित करने की नीति बनाई पर यह कारगर सिद्ध नहीं हो पाई। विडंबना इस बात की है कि तीन दशकों से प्राॅयरिटी सेक्टर लैंडिंग में बैंकों के उदासीन प्रदर्शन के बावजूद किसी भी बैंकों को इन क्षेत्रों में ऋण का लक्ष्य पूरा करने में विफल रहने पर दंडित नहीं किया गया। इसके बजाय उन्हें राष्ट्रीय कृषि एंव ग्रामीण विकास बैंक(नाबार्ड) द्वारा प्रबंधित रुरल इंफ्रास्ट्रक्चर विकास फंड(आरआईडीएफ) में निवेश के लिए कहा जाता है। हकीकत यह है कि कई आकांक्षी जिलों में बैंकों ने कई वर्षाें से प्राॅयरिटी सेक्टर लैंडिंग नहीं की हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण जारी करने के लिए दबाव नहीं बनाया गया। इसके लिए ऋण नीति को अौर अधिक आकर्षक बनाए जाने की जरुरत है और इसका एकमात्र तरीका है कृषि विशेष भारतीय किसान बैंक खोलने की अनुमित दी जाए। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पास प्यार्प्त जमा राशियां हैं और भौगोलिक दृष्टि से इनका विस्तार भी बहुत बड़ा है पर कृषि क्षेत्र, छोटे उद्यमियों और यहां तक की अनौपचारिक क्षेत्र को ऋण जोखिम के मूल्यांकन के लिए ये बैंक विकसित नहीं हो पाए हैं। 

बैंकिंग क्षेत्र में व्यापत भ्रष्टाचार और ऋण जोखिम के मूल्यांकन के अभाव में बैंकों की ऋण के प्रति मानसिकता का ही नतीजा है कि काॅरपाेरेट क्षेत्र में बैंकों का एनपीए(नॉन परफार्मिंग एसेट्स) बहुत बढ़ा है। इसकी वजह से ज्यादातर बैंकों में कॉरपोरेट एनपीए का करीब एक जैसा रुझान है। मजे की बात यह है कि ऋण जोखिम की जांच के लिए बैंक एक जैसी प्रणाली का अनुसरण कर रहे हैं या हर कोई लीड बैंक मॉडल की नकल कर रहा है। ऋण जोखिम के मूल्यांकन की प्रणाली सही नहीं है जिसकी वजह से कुछ क्षेत्रा में जोखिम पहचानने में विशेषज्ञता की कमी प्रतीत होती है।

कृषि क्षेत्र में भी बहुत एनपीए है जिससे इस क्षेत्र में ऋण की वृद्धि दर खराब है। कृषि बैंकिग के लिए नोडल एजेंसी नाबार्ड का दावा है कि वित्त वर्ष 2019-20 में बैंकों ने कृषि ऋण के 13.50 लाख करोड़ रुपए के सरकारी लक्ष्य को पार करते हुए 13.73 लाख करोड़ रुपए के ऋण जारी किए। हालांकि कृषि ऋण की ये प्रंबधित उपलब्धियां निरर्थक हैं क्योंकि यह सही तस्वीर नहीं दर्शाती। बड़ा कारण यही है कि कृषि क्षेत्र को बढ़ते ऋणों का कृषि क्षेत्र के प्रदर्शन या किसान की आय से कोई संबंध नहीं है। आरआईडीएफ के लिए निर्देशित फंड किसानों तक नहीं पहुंचता,वह राज्य सरकारों को बांट दिया जाता है। सवाल उठता है कि क्या कृषि ऋण का उपयोग इच्छित उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है? यदि नहीं तो क्या रियायती ब्याज दरों की वजह से कृषि ऋण के दुरुपयोग में मध्यस्थता बढ़ी है? इस समस्या का संस्थागत समाधान क्या है?

पिछले चार दशकों में कृषि क्षेत्र के ऋण में 1000 गुणा से अधिक की वृद्धि हुई है। हालांकि कृषि जीडीपी कृषि क्षेत्र में ऋण की वृद्धि का वास्तविक मापक होना चाहिए पर  इस हिसाब से कृषि क्षेत्र की वृद्धि नहीं हुई है। उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र में सुधार पूर्व अवधि(1972 से 1990)के दौरान कृषि क्षेत्र में औसतन वार्षिेक विकास दर 4.2 प्रतिशत रही जबकि 1991 से लेकर 2000 तक यह गिर कर औसतन प्रति वर्ष 3.2 हो गई है। लेकिन 2001 से 2008 के बीच 12 फीसदी की जबरदस्त वृद्धि देखी गई जबकि 2009 और वित्त वर्ष 2018 के दौरान यह वापस गिरकर 3.6 प्रतिशत हो गई।

वित्त वर्ष 2001 और 2008 के बीच बड़े पैमाने पर कृषि क्षेत्र में विकास के लिए किसान क्रेडिट कार्ड(केसीसी)की भूमिका बताई जा रही है। 1998 में शुरु किए गए केसीसी के जरिए रियायती ब्याज दरों पर फसलों के अल्पकालिक ऋण प्रोत्साहित किए गए थे। 2008 की आर्थिक सुस्ती के दौरान कृषि ऋण माफी स्कीम के बाद से कृषि ऋणों में रुकावट आई। बैंक आशंकित है कि किसानों की ऋण माफी ने ऋण संस्कृति में नैतिक खतरा पैदा कर दिया है।

रियायती ब्याज दरों पर कृषि ऋण के लिए 2006 में शुरु की गई ब्याज सबवेंशन स्कीम के तहत 7 फीसदी ब्याज दर पर किसानों को अल्पकालिक फसल ऋण प्रदान किए जा रहे हैं जबकि तय समय पर चुकाने वाले किसानों को यह 4 प्रतिशत ब्याज दर पर दिए जा रहे हैं। वहीं माइक्रो-फाइनेंस कंपनियां और साहुकार 18 से 36 प्रतिशत ब्याज दर पर किसानों को ऋण देते है इसलिए कृषि क्षेत्र के सस्ते ऋणों का प्रवाह गैर कृषि कार्यों के लिए बढ़ा है। केसीसी के जरिए सस्ते ऋण के अलावा बैंकों से लंबी अविध के करोड़ों रुपए के कृषि ऋण भी 9 से 10 प्रतिशत ब्याज दर पर पाने वाले बड़े किसान छोटे व सीमांत किसानों को 36 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर पर ऋण दे रहे हैं। कई बार तो बड़े किसान बैंकों में ही एफडी करा देते हैं।

कृषि ऋणों को गैर कृषि कार्यों पर लगाने का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि  कुछ राज्यों में बैंकों द्वारा जरुरत से दिए गए कृषि ऋण उन राज्यों की कृषि जीडीपी के अनुपात में दोगुने से से कही अधिक थे। केरल में यह 326 फीसदी,आंध्रप्रदेश में 254,तमिलनाडू में 245,पंजाब 231 और तेलंगाना की कृषि जीडीपी की तुलना में 210 फीसदी अधिक कृषि ऋण जारी किए गए। जरुरत से अधिक कृषि ऋण से साफ संकेत है कि कृषि ऋणों को गैर-कृषि कार्यों पर लगाया जा रहा है और इसमें बिचौलियों की भूमिका बढ़ रही है। 

दिलचस्प बात यह है कि वित्त वर्ष 1982 में कृषि क्षेत्र को अल्पकालिक 44 प्रतिशत ऋण 2016 में बढ़कर 74.3 प्रतिशत हो गए हैं। जबकि लंबी अविध के ऋण 56.1 प्रतिशत से गिरकर 25.3 प्रतिशत रह गए हैं। बैंक कृषि उपकरणों और ट्रैक्टरों के लिए दीर्घकालिक ऋण देने के इच्छुक नहीं हैं इसलिए 95 प्रतिशत कृषि उपकरण और ट्रैक्टर के लिए गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान(एनबीएफसी)महंगे ऋण दे रहे हैं। इस त्थ्य को ट्रैक्टर निर्माता कंपनियों ने भले ही अपने रिकॉर्ड से हटा दिया है पर ट्रैक्टरों के लिए ऋण निर्माता कंपनियों की खुद की एनबीएफसी से दिया जा रहा है। चूंकि कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक ऋण मूल रुप से निवेश और पूंजी निर्माण के लिए होते हैं पर इसमें भारी गिरावट से कृषि उत्पादकता और कृषि क्षेत्र के समग्र विकास पर असर पड़ा है।  

यदि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक प्राथिमकता क्षेत्र के ऋणों के लिए जारी निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं, यदि ज्यादा फंड आरआईडीएफ व नाबार्ड को जा रहे हैं  और किसान महंगी ब्याज दरों पर ऋण उठाने को मजबूर हैं तो समय आ गया है कि आरबीआई कृषि क्षेत्र के लिए अलग बैंक के लाइसेंस पर विचार करे। ग्रामीण क्षेत्र की इस सेवा के लिए बहुत से ऐसे लोग सामने आएंगे जो फसलों के विविधीकरण के लिए बहुत जरुरी सुधारों को कारगर करने को ऋणों का विस्तार करेंगे। 

(लेखक लोकनीति विशेषज्ञ हैं )

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