मेरा गांव

समाज और पर्यावरण के बीच से गुम होते घराट


http://www.uttarakhandnews1.com/2015/08/blog-post_36.html

घराट सिर्फ आटा पीसने या धान कूटने का यंंत्र नहीं है बल्कि आदिवासी/पर्वतीय क्षेत्र की संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के बीच सामंजस्य का एक अनूठा नमूना है।

हिंंदुुकुश-हिमालय क्षेत्र मेंं 2 लाख घराटोंं का इतिहास मिलता है जो धीरे-धीरे समाप्त हो गए हैं। हालांकि इन्‍हें बचाने के लिए कुछ सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास भी हुए हैं लेकिन ज्‍यादातर अपनी पीठ थपथपाने तक ही सीमित रहे हैं ..।।

घराट जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) और ग्लोबल वार्मिंग का एक सरल जबाब भी है। आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज के खतरे से सहमी हुई है। कहींं बाढ़ तो कहींं बेमौसम बारिश या ओलावृष्टि मुसीबत बनकर आते हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर विद्वानोंं में दो मत हो सकते हैंं लेकिन यह मानव सभ्यता और पृथ्‍वी पर जनजीवन के लिए एक खतरा है इस पर किसी को भी संदेह नहीं है।

पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और राजनैतिक नेतृत्व इस खतरे को कम करने या टालने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैंं। जहां एक तरफ ग्रीन टेक्नोलॉजी (green technology), फ्यूल एफिशिएंसी (fuel efficiency), रिन्यूअल एनर्जी ( renewable energy) और न जाने कितने नए-नए शब्द सुनाई दे रहे हैं। वहींं दूसरी तरफ प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाले किसी भी कार्य को करने में इन्सान जरा भी झिझक नहींं रहा है।

गेहूं पीसकर आटा बनाने या धान से चावल निकालने जैसे बेहद साधारण कामों के लिए भी बिजली/डीजल जैसे ऊर्जा के उच्चतम स्रोतों का प्रयोग कर रहा है, जबकि मानव सभ्यता के प्रथम चरण से ही आटा बनाने या धान कूटने जैसे साधारण कार्योंं के लिए ऊर्जा के न्यूनतम स्रोतों का सफलतापूर्वक प्रयोग मनुष्य करता आ रहा है।

घराट अर्थात पानी से चलने वाली चक्की या पनचक्की मानव निर्मित एक बेहद साधारण और प्राथमिक तकनीक है, जिसमें पानी की धारा को थोड़ा-सा मोड़कर काइनेटिक एनर्जी अर्थात गतिक ऊर्जा को मैकेनिकल एनर्जी अर्थात मशीनी ऊर्जा मेंं परिवर्तित किया जाता है। इस कार्य मेंं न तो पर्यावरण का कोई नुकसान होता है ओर न ही पानी मेंं किसी भी प्रकार का प्रदूषण। इस तरह प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाते हुए कुदरती शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है।

पूरे हिंंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में लगभग 2 लाख घराटोंं का इतिहास मिलता है जो धीरे –धीरे सरकारों की उदासीनता, गलत तकनीक के चयन और ऊर्जा के उच्‍चतम स्रोत के अंधाधुंंध इस्तेमाल के परिणामस्वरूप अाज लगभग समाप्त हो रहे हैंं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह किसी समाज और संस्कृति को गुलाम बनाने की मानसिकता का परिणाम है कि समाज से उसका ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति छीन लो और फिर उसे अपने पर पूरी तरह से अाश्रित बना डालो। जिससे कि अाटा पीसने, धान कूटने और तिलहन से तेल निकालने जैसे साधारण कार्यों के लिए भी वो दूसरों पर अाश्रित रहे ताकि विकास के नाम पर उनके साथ मनमानी की जा सके।

तकनीकी इतिहास के जानकार मानते है कि तकनीक का उदय अचानक से नहीं होता है बल्कि तकनीक एक स्टेज (स्तर) से दूसरे स्टेज की तरफ जाती है, अर्थात तकनीक का विकास एक सतत प्रकिया है, बशर्ते उस पर ध्यान दिया जाए। लेकिन अफसोस ज्यादातर घराट अाज भी पुरानी तकनीक से ही चल रहे हैं और इसी कारण समय के साथ कदम ताल नही कर पा रहे हैं। लेकिन मामला सिर्फ गति का नहीं है, गति तो बढ़ाई भी जा सकती है।

घराटों को व्यापारिक तौर पर लाभप्रद भी बनाया जा सकता है, इसके लिए थोड़ा नीति में और थोड़ा तकनीकीी में बदलाव करना होगा। पहाडी क्षेत्रों में जो राशन जाता है उसमें आटे की जगह गेंहूं जाए। सरकारे घराट के आटे को प्रथमिकता देंं। इससे न सिर्फ स्वास्‍थवर्धक आटा मिलेगा बल्कि पर्यावरण की रक्षा भी होगी और पहाड़ोंं से पलायन रोकने में भी मदद मिलेगी।

हालांकि कुछ स्थानोंं पर घराट मेंं तकनीकी सुधार के लिए कुछ प्रयास भी किए गए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यह तभी संभव है जब मुख्य धारा की राजनीति और तथाकथित मुख्य धारा का समाज अपनी साम्राज्यवादी सोच को बदलेंगे और उन तकनीक, विचारों ओर संस्कृतियों को आगे बढ़ने का मौका देंगे जो अाज किसी वजह से पीछे छूट गए हैं। घराटों का पुनर्जीवन इन समाजों को तकनीकी और अर्थिक तौर पर न सिर्फ सामर्थ्यवान बनाएगा, बल्कि आत्मनिर्भर भी बनाएगा। यही ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज जैसे सवालों का भी जबाब है।

 

 

  • प्रेम बहुखंडी