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अमेरिकी बादाम-अखरोट कैसे पचा लेती है हमारी देशभक्ति?



देश के किसान जो कुछ भी उगाते हैं, उसका बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को बेचा जाता है। इसी तरह हम अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाने-पीने की चीजों खासकर फलों, दालों और खाद्य तेलों का आयात करते हैं। कृषि व्यापार का यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है, लेकिन इसके नियम-कायदे और तौर-तरीके बदलते रहते हैं। किसानों को उनकी उपज का क्या दाम मिलेगा, यह बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग-पूर्ति और दाम पर निर्भर करता है। आयात-निर्यात से जुड़ी नीतियां और फैसले इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

हाल ही में भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले सेब, बादाम, अखरोट समेत कुल 28 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। यानी, अमेरिका से इन चीजों का आयात महंगा पड़ेगा। यह कदम अमेरिका की उस कार्रवाई के विरोध में उठाया गया, जिसके तहत भारत से ड्यूटी फ्री एक्सपोर्ट जैसी रियायतें खत्म कर दी गई हैं। व्यापार मोर्चे पर अमेरिका के साथ इस तनातनी के अलावा भारत का बढ़ता कृषि आयात और घटता निर्यात अपने आप में चिंताजनक है।

साल 2013-14 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों के दौरान भारत के कृषि निर्यात में सालाना 2.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। मतलब, कृषि निर्यात बढ़ने के बजाय घट गया है। जबकि इसी अवधि में कृषि आयात सालाना 6.7 फीसदी की दर से बढ़ा है। जब देश में खाद्यान्न, फल, सब्जियों और दूध का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है, उसी दौर में हम दूसरे देशों से खाने-पीने की चीजों का खूब आयात करते जा रहे हैं। इसकी मार आखिरकार किसानों पर ही पड़ रही है। इस पूरे खेल के पीछे एग्री कमोडिटी ट्रेडिंग के बड़े खिलाड़ियों का हाथ है जो सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस खेल के चलते जो चीजें भारत में आसानी से पैदा हो सकती हैं, उनके लिए भी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। जो पैसा देश के किसानों की जेब में जा सकता है, वो देश से बाहर जा रहा है। उफनते राष्ट्रवाद के इस दौर में किसानों और देश के हितों पर यह चोट जारी है मगर कहीं कोई चर्चा ही नहीं! किसी को इसकी चिंता ही नहीं! ना ही किसी की राष्ट्रवादी भावनाएं आहत हो रही हैं।

हालत यह है कि भारत अमेरिकी बादाम का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। अमेरिका से हर साल भारत करीब 3,800 करोड़ रुपये का बादाम आयात करता है। इसी तरह भारत अमेरिका के सेब का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और हर साल करीब 1100 करोड़ रुपये का सेब अमेरिका से मंगाता है। देखा जाए तो अमेरिका के सेब, बादाम, अखरोट उगाने वाले किसान भारत के लिए खेती कर रहे हैं। हमारा किसान सही दाम के लिए टमाटर, प्याज  सड़क पर फेंकने से आगे सोच ही नहीं पा रहा है।

सिर्फ सेब और बादाम को ही जोड़ लें तो हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपये का आयात हम अमेरिका से करते हैं। जबकि सेब और बादाम भारत के कई राज्यों में पैदा होता है। किसानों को प्रोत्साहित किया जाए तो इन चीजों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बजाय भारत अमेरिका और अन्य देशों पर निर्भरता बढ़ाता जा रहा है। खाद्य तेलों और दालों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। आत्मनिर्भरता के बजाय देश ने आयात निर्भरता का रास्ता चुना है।

पिछले 5 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। देश का कृषि आयात बढ़ता जा रहा है जबकि निर्यात घटा है। साल 2013-14 में भारत का कृषि आयात करीब 15 अरब डॉलर था जो 2018-19 में बढ़कर 19 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। दूसरी तरफ, 2013-14 में भारत का कृषि निर्यात 42.86 अरब डालर था जो 2018-19 में घटकर 38.49 अरब डालर रह गया है। कृषि आयात और निर्यात का अंतर लगातर सिकुड़ रहा है। यानी ट्रेड सरप्लस कम होता जा रहा है। किसानों के साथ-साथ सरकारी खजाने के लिए भी नुकसानदेह है।

कृषि में वर्षों की मेहनत से हासिल आत्मनिर्भरता को हम आयात निर्भरता में गंवाते जा रहे हैं। जबकि पूरी दुनिया व्यापार युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका, चीन जैसे ताकतवर देश अपनी व्यापार नीतियों से दूसरे देशों पर वार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। लेकिन विदेशी सेब, बादाम और अखरोट खाकर भी हमारा राष्ट्रप्रेम खूब फल-फूल रहा है। राष्ट्रवाद के समूचे नैरेटिव से स्वदेशी के स्वर लुप्तप्राय हैं। जबकि स्वेदशी के पेरोकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में हैं। लेकिन चीन की पिचकारियों और झालर, फुलझड़ियों के अलावा शायद ही किसी चीज के आयात का विरोध हाल के वर्षों में हुआ है।

माना कि देश के दरवाजे अमेरिका या दूसरे देशों के लिए बंद नहीं किए जा सकते हैं। विश्व व्यापार की अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन जिन चीजों का हर साल हजारों करोड़ रुपये का आयात हो रहा है, उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित तो कर ही सकती है। कृषि आयात को कम से कम रखना देश और किसानों दोनों के हित में है। आयात शुल्क में बढ़ोतरी इसका सीधा, सरल उपाय है। लेकिन अक्सर होता इसके उलट है। देश के दरवाजे सस्ते आयात के लिए खोल दिए जाते हैं।

हिमाचल के सेब उगाने वाले किसान कई साल से आयात की मार झेल रहे हैं। इसी तरह कश्मीर और दूसरे राज्यों के किसान भी अमेरिकन ड्राईफ्रूट के आयात से परेशान हैं। कम से कम आयात की मार झेल रहे इन किसानों के हित में ही सरकार कुछ मददगार कदम उठा ले। कृषि आयात को हतोत्साहित करे। वैसे भी दुनिया में व्यापार युद्ध के हालात बन रहे हैं। बेहतर होगा, हम समय रहते संभल जाएं।