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नोबेल विजेता बैनर्जी कैसे मिटाते हैं गरीबी? क्या हैं उनके प्रयोग?



अभिजीत बैनर्जी गरीबी के लिए जिम्मेदार शोषणकारी व्यवस्था में परिवर्तन जैसे बड़े सवालों से जूझने के बजाय समस्या को छोटे-छोटे हिस्सों में देखते हैं। लेकिन तेजी से लोकप्रिय हो रही इस पद्धति में भी कई खामियां हैं।

पुरस्कारों से गरीबी मिटती तो कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलते ही बाल श्रम मिट जाता। जाहिर है पुरस्कारों की अपनी राजनीति है। अपनी सीमाएं हैं। फिर भी किसी व्यक्ति को नोबेल जैसा पुरस्कार मिलना बड़ी बात है। खासतौर पर अगर वह व्यक्ति भारत जैसे देश से हो। गरीबी पर रिसर्च करता हो। एंटी-नेशनल कहे गए जेएनयू से पढ़ा हो। मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता हो। कांग्रेस को न्याय योजना बनाने और अरविंद केजरीवाल को स्कूलों की दशा सुधारने में मदद करता हो। तो मानकर चलिए कि उसके काम के अलावा हर बात की चर्चा होगी।

इस साल का सेवरिग्स रिक्सबैंक पुरस्कार यानी अर्थशास्त्र का नोबेल भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के साथ-साथ फ्रांसिसी मूल की उनकी संगिनी एस्थर डुफ्लो और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से दिया गया है। बैनर्जी और डुफ्लो अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी में प्रोफेसर हैं। इन तीनों को यह पुरस्कार दुनिया भर में गरीबी मिटाने के लिए उनके प्रयोगात्मक दृष्टिकोण के लिए दिया गया है, जो गरीबी से निपटने में मददगार है। इस दृष्टिकोण की पहचान है रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल यानी आरटीसी मेडिकल साइंस की तर्ज पर होने वाले इन प्रयोगों को गरीबी दूर करने में कारगर टूल माना जा रहा है। हालांकि, इसके आलोचक भी कम नहीं हैं।

क्या है यह नया दृष्टिकोण?

पुरस्कार की घोषणा करते हुए द रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने कहा है कि पिछले दो दशकों में बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर के प्रयोगात्मक दृष्टिकोण ने विकास अर्थशास्त्र का कायाकल्प कर दिया है। वैश्विक गरीबी से निपटने का वे नया तरीका लाए हैं, जिसके तहत बड़ी समस्या को छोटे-छोटे टुकड़ों या सवालों में तोड़कर देखा जाता है। फिर सोचे-समझे प्रयोगों के जरिए इन सवालों या समस्याओं के समाधान तलाशे जाते हैं। इन तीनों के शोध से वैश्विक गरीबी से निपटने की क्षमता में इजाफा हुआ है।

जिस तरह लैब में चूहों पर दवाओं का ट्रायल होते हैं, वैसे ही बैनर्जी और उनके साथी गरीबों पर प्रयोग करते हैं। ताकि पता लगे कि गरीबी से निपटने का कौन-सा उपाय सबसे कारगर है। ऐसे प्रयोगों में लोगों को अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है। इनमें से कुछ पर उपाय आजमाए जाते हैं, जबकि कुछ लोगों को इससे वंचित रखकर प्रभाव की तुलना की जाती है। भारत गरीबी पर ऐसे प्रयोगों की बड़ी प्रयोगशाला बन चुका है। मतलब, गरीबी नेताओं के भाषण से निकलकर लैब में पहुंच चुकी है। गरीब वहीं का वहीं है!

प्रयोगों और साक्ष्यों पर जोर

बैनर्जी और उनके साथी पिछले 25 वर्षों से गरीबी पर प्रयोग कर रहे हैं और अब यह पद्धति विकास अर्थशास्त्र में धूम मचा रही है। इससे लोगों की आदतों और व्यवहार के अध्ययन के जरिए गरीबी दूर करने का एक नया औजार मिला है। इन प्रयोगों से प्राप्त साक्ष्य नीतिगत फैसलों को वैज्ञानिक आधार देते हैं। आज दुनिया भर में ऐसे प्रयोगों के जरिए सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की जा रही है।

इस पद्धति के तौर-तरीकों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का काम गरीब और जन कल्याण पर केंद्रित है। उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने से विकास अर्थशास्त्र और नए दृष्टिकोण की अहमियत बढ़ेगी।

जिस दौर में दुनिया आर्थिक संकटों से जूझ रही है। नव उदारवादी पूंजीवादी नीतियां और वैश्विकरण के परिणाम सवालों से घिरे हैं। ऐसे में अर्थशास्त्र को भी प्रसांगिक बने रहने के लिए ज्यादा तार्किक, कल्याणकारी और जमीनी वास्तविकता के करीब होने की जरूरत है। बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का काम इन आवश्यकताओं के अनुरूप है।

गरीबी पर अपने प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने साल 2003 में एक पावट्री एक्शन लैब की स्थापना की। जिसके साथ 2005 में सऊदी शेख अब्दुल लतीफ जमील का नाम और पैसा जुड़ गया। इस सऊदी कनेक्शन पर बहुत से लोग सवाल उठाते हैं। फिर बैनर्जी का नाता दुनिया के सबसे प्रभावशाली थिंक टैंक फोर्ड फाउंडेशन से भी है। बैनर्जी और उनके साथियों के काम को मिली स्वीकृति और सम्मान को इन संबंधों से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

किताबें जरूरी या भोजन?

गरीब मुल्कों में शिक्षा का स्तर खराब है। यह बात सभी जानते हैं। इसे सुधारने के लिए ज्यादा किताबें बांटी जाएं या स्कूल में मुफ्त भोजन मुहैया कराया जाए? इस तरह के सवालों का जवाब खोजने के लिए बैनजी, डुफ्लो और क्रेमर लोगों के बीच जाकर प्रयोग करते हैं। कीनिया में हुए ऐसे ही प्रयोग में स्कूलों के एक समूह को ज्यादा किताबें दी गईं, जबकि दूसरे समूह के स्कूलों में मुफ्त भोजन। प्रयोग से पता चला कि ना ही अधिक किताबों से और ना ही मुफ्त भोजन से पढ़ाई के नतीजों में कोई खास सुधार आया है।

आगे चलकर कई प्रयोगों में सामने आया कि गरीब देशों में संसाधनों की कमी उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी छात्रों की जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई न होना।

इसी तरह के प्रयोग शिक्षकों पर भी किए गए। कुछ शिक्षकों को थोड़े समय के लिए प्रदर्शन आधारित अनुबंध पर रखा गया जबकि दूसरी तरफ स्थायी शिक्षकों पर छात्रों को बोझ कम कर दिया गया। अनुबंध पर रखे शिक्षकों ने बेहतर परिणाम दिए जबकि छात्रों की संख्या घटाने पर भी स्थायी शिक्षकों के प्रदर्शन में कोई खास सुधार नहीं आया। इन प्रयोगों के आधार पर कई राज्यों में शिक्षण सुधार कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

मुफ्त दाल से बढ़ा टीकाकरण

बैनर्जी और उनके साथियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई दिलचस्प प्रयोग किए हैं। राजस्थान में उदयपुर के जिन गांवों में मोबाइल वैक्सीनेशन वैन पहुंची, वहां टीकाकरण की दर तीन गुना बढ़ गई। टीकाकरण के साथ परिवारों को एक किलो दाल मुफ्त दी गई तो टीकाकरण की दर 18 फीसदी से बढ़कर 39 फीसदी तक पहुंच गई। जबकि दाल बांटने के बाद भी टीकाकरण की लागत आधी रह गई थी।

नकद हस्तांतरण को बढ़ावा

आरसीटी सरीखे प्रयोगों से टाइगेटेड एप्रोच यानी जरूरतमंदों को सीधी मदद के दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की पीएम-किसान और कांग्रेस की न्याय योजना के पीछे यही सोच है।

खास बात यह है कि बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का प्रयोगात्मक दृष्टिकोण लोगों के बीच जाकर समस्याओं का हल खोजने, सीमित संसाधनों के मद्देनजर कारगर उपाय तलाशने और सरकारी व्यय के बेहतर इस्तेमाल पर जोर देता है। बड़ी समस्याओं में उलझने के बजाय जो आसानी से किया जा सकता है, पहले उसे करने की सोच को भी इससे बल मिला है। इस तरह के उपाय लोक-लुभावने होते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को भी पसंद आते हैं।

इंसाफों पर चूहों तक तरह शोध कितना जायज?

बड़ी समस्या को हल करने के बजाय छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान खोजने का यह दृष्टिकोण काफी लोकप्रिय हो रहा है। क्योंकि मूल समस्या को हल करने के बजाय चीजों को टुकड़ों में देखना, छोटी-मोटी राहतें या रियायतें देना सरकारों के लिए ज्यादा आसान है। इसलिए नीति-निर्माताओं ने इसे हाथोंहाथ लिया।

लेकिन दिक्कत यह है कि यह दृष्टिकोण गरीबी निवारण के प्रयासों को छोटी-मोटी राहतों तक सीमित रखता है। गरीबी के लिए जिम्मेदार ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक कारणों, शोषणकारी व्यवस्था और पूंजीवाद की नाकामियों को नजरअंदाज किया जाता है। फिर इन प्रयोगों के तौर-तरीकों पर भी कई सवाल हैं।

एक जगह हुए प्रयोगों को दूसरे जगह कैसे लागू किया जा सकता है? क्या इस प्रकार का सामान्यीकरण उचित है? इंसानों पर चूहों की तरह प्रयोग कहां तक जायज है? कुछ लोगों को इलाज या राहतों से वंचित रखना अनैतिक नहीं है? दो लोगों या समूहों को एक समान कैसे माना जा सकता है? प्रयोग के दौरान अन्य कारक भी प्रभावी होते हैं, उन्हें कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? इस तरह के कई सवाल आरसीटी पर उठते रहे हैं।

ये सवाल अपनी जगह हैं लेकिन अभिजीत बैनर्जी, एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर को दुनिया का ध्यान गरीबी और विकास अर्थशास्त्र के नए दृष्टिकोण की तरफ खींचने का श्रेय तो मिलना ही चाहिए।

काश! भारत में इस तरह के प्रयोग नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लागू करने से पहले किए गए होते। क्या पता हार्डवर्क के साथ हार्वर्ड का मेल बेहतर परिणाम देता!

 

 

  • अजीत सिंह