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मोदी की आंधी में कैसे गुम हुए किसान आंदोलन और उनके नेता



विपक्ष के तमाम समीकरणों, गठबंधनों, दिग्गजों और मंसूबों को धराशायी करने वाली नरेंद्र मोदी और उनके राष्ट्रवाद की आंधी ने किसानों आंदोलनों को भी बेअसर कर दिया।

याद कीजिए, 2014 के बाद मोदी सरकार को पहली चुनौती कैसे मिली थी? भारी बहुमत और मजबूत इरादों के बावजूद भूमि अधिग्रहण विधेयक के मुद्दे पर मोदी सरकार को झुकना पड़ा था। क्योंकि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर लामबंद हो गया था। इसके बाद भी हर साल किसानों के आंदोलन, धरने-प्रदर्शन और महापड़ाव सुर्खियों में छाए रहे। यह एकमात्र मोर्चा था जहां मोदी सरकार लगातार घिरती नजर आई। लेकिन 2019 आते-आते यह सब हवा हो गया।

विपक्ष के तमाम समीकरणों, गठबंधनों, दिग्गजों और मंसूबों को धराशायी करने वाली नरेंद्र मोदी और उनके राष्ट्रवाद की आंधी ने किसानों आंदोलनों को भी बेअसर कर दिया। इतना बेअसर कि न तो पूरे चुनाव में किसानों के मुद्दे कहीं सुनाई पड़े और न ही नतीजों पर उनका कोई असर दिखा।

उपज का उचित दाम न मिलने के खिलाफ किसान संगठनों की ‘गांव बंद’ सरीखी मुहिम लोकसभा चुनावी में बेअसर

 

जिन सूबों की राजनीति किसान और खेती के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां भी किसान मुद्दा नहीं बन सका। यह विपक्ष की नाकामी तो है ही, मोदी का भी मैैजिक है। इसके अलावा कुछ असर किसानों के खातों में सीधे पैसे पहुंचाने की पीएम-किसान जैसी योजनाओं का भी जरूर रहा। जबकि विपक्ष और किसानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले नेता यह भरोसा पैदा करने में नाकाम रहे कि वे वाकई किसानों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

मोदी तंत्र बेहद चुस्त और चौकन्ना भी था। चुनाव से ठीक पहले किसानों के खातों में सालाना 6 हजार रुपये पहुंचाने के लिए पीएम-किसान योजना लाई गई। सरकार नेे आनन-फानन मेें सवा दो करोड़ से ज्यादा किसानों के खातों में 2,000 रुपये की पहली किस्त भी पहुंचा दी। इनमें एक करोड़ से ज्यादा किसान उत्तर प्रदेश के थे। महागठबंधन की एक काट यह भी थी, जो किसानों की नाराजगी दूर करने में मददगार साबित हुई।

अभी छह महीने भी नहीं हुए जब किसान कर्जमाफी के वादे ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी कराई थी। लेकिन तीनों राज्यों में  कांग्रेस सरकारें किसानों के मुद्दे पर अब बैकफुट पर आ चुकी हैं। आधी-अधूरी कर्जमाफी को लेकर कांग्रेस इस कदर घिरी कि कर्जमाफी का श्रेय लेना तो दूर किसानों को मुद्दा ही नहीं बना पाई। इसे यूं भी देख सकते हैं कि किसानों के जिस मुद्दे को कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भुना लिया था, उसे कुछ महीनों बाद दोबारा भुनाना मुश्किल हो गया, क्योंकि अब सवाल उसकी राज्य सरकारों पर भी उठने लगे थे।

मध्य प्रदेश जहां मंदसौर से भड़का आंदोलन किसानों के गुस्से का प्रतीक बन गया था, वहां भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। मंदसौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन भाजपा प्रत्याशी से करीब पौने चार लाख वोटों से हारी। इसी तरह खंडवा में कमलनाथ सरकार के कृषि मंत्री सचिन यादव के भाई अरुण यादव मैदान में थे, उन्हें भाजपा के नंद कुमार सिंह ने पौने तीन लाख वोटों से हराया। शहरों की बात तो छोड़ ही दीजिए, यह मध्य प्रदेश के किसान बहुल इलाकों का हाल है। विधानसभा चुनाव में 41 फीसदी वोट हासिल करने वाली कांग्रेस लोकसभा की एकमात्र छिंदवाड़ा सीट बचा सकी। जबकि वोट शेयर घटकर 34.5 फीसदी रह गया। इससे ज्यादा वोट तो कांग्रेस को 2014 में मिले थे। तब 2 सीटों पर जीती थी।

इन नतीजों के बारे में मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष केदार सिरोही का कहना है कि यह मुद्दों का चुनाव था ही नहीं। भावनाओं का चुनाव था। किसानों का गुस्सा विधानसभा चुनाव में भाजपा पर निकल चुका था। इस बीच पुलवामा हो गया। और माहौल बदल गया। सिरोही मानते हैं कि ना तो कांग्रेस ने इस चुनाव में किसानों के मुद्दों को बहुत गंभीरता से उठाया और ना ही खुद किसानों ने इन मुद्दों को खास तवज्जो दी। कांग्रेस भी भावनात्मक मुद्दों और भाजपा के एजेंडे में उलझ गई। इसलिए मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों, फसल के दाम और किसानों के मुद्दों पर बात नहीं हुई।

कमोबेश यही स्थिति छत्तीसगढ़ में रही जहां सत्ता में आते ही कांग्रेस किसानों के सवालों पर मोदी सरकार को घेरना भूलकर अपने बचाव में जुट गई। विधानसभा चुनाव में 85 में से 68 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप करने वाली कांग्रेस छत्तीसगढ़ की 11 में से केवल 2 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर पाई है।

पिछले पांच वर्षों में महाराष्ट्र केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारों के खिलाफ किसान आंदोलनों का गढ़ बना रहा। लेकिन लोकसभा चुनाव में किसानों के मुद्दों की छाया भी भाजपा और शिवसेना को छू नहीं पाई। वहां कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया और एनसीपी 4 सीटों पर ही सिमटी रही। महाराष्ट्र में किसान आंदोलनों को चेहरा रहे स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के राजू शेट्टी हातकणंगले सीट करीब 96 हजार वोटों से हार गए जबकि उन्हें कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन हासिल था। सांगली में भी कांग्रेस-एनसीपी समर्थित स्वाभिमानी पक्ष के उम्मीदवार को डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र की गन्ना बेल्ट में शरद पवार-राजू शेट्टी का गठबंधन मोदी वेव के सामने बेअसर साबित हुआ। पश्चिमी महाराष्ट्र में एनसीपी और राजू शेट्टी का गढ़ रहे कोल्हापुर, हातकंणगले, सांगली और माढा लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा और शिवसेना का परचम फैल चुका है। किसान और कॉओपरेटिव पॉलिटिक्स के दिग्गज शरद पवार के कुनबे को पहली बार हार का मुंह देखना पड़ा है। मावल लोकसभा सीट पर शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार दो लाख से ज्यादा वोटों से हार गए। कांग्रेस ने महाराष्ट्र की 48 सीटों में से एकमात्र चंद्रपुर सीट जीती है। किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष नाना पटोले को नागपुर में नितिन गडकरी ने करारी शिकस्त दी। कांग्रेस के दो पूर्व सीएम अपनी सीट भी नहीं बचा पाए।

महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और राजू शेट्टी के गठबंधन का खेल बिगाड़ने में प्रकाश अंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के गठजोड़ का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसान राजनीति पर शरद पवार की पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

अक्टूबर 2018 में भाकियू की किसान क्रांति यात्रा

 

महाराष्ट्र की तरह कृषि प्रधान होते हुए भी उत्तर प्रदेश की कहानी अलग है। यहां मुख्य विपक्षी दलों सपा और बसपा ने पांच साल किसानों के मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिल्ली में होने वाले किसानों के धरने-प्रदर्शन को कभी समर्थन नहीं दिया। हालांकि, गठबंधन की तीसरी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल किसान राजनीति करने का दम भरती है। लेकिन उसके धरने-प्रदर्शनों की गूंज पश्चिमी यूपी के 4-5 जिलों से बाहर नहीं निकली। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन बस परंपरागत वोट बैंक और उसके गठजोड़ के भरोसे था, जो गच्चा दे गया।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत संभाल रही भारतीय किसान यूनियन ने पिछले साल किसान क्रांति यात्रा ज़रूर निकाली थी। लेकिन टिकैत बंधु भी मोदी सरकार के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं कर पाए। 2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच हुए संघर्ष से ज्यादा किसान यात्रा की अचानक समाप्ति का ऐलान चर्चाओं में रहा। इस तरह किसानों की खुदकुशी, गहराते कृषि संकट और किसान के बार-बार सड़कों पर उतरने के बावजूद किसान राजनीति नेतृत्व और भरोसे की कमी का शिकार हो गई। कृषक जातियों का बड़ा हिस्सा भी मोदी लहर को प्रचंड बनाने में जुटा रहा।

कैराना और नूरपुर उपचुनाव में “जिन्ना नहीं गन्ना” नारे के साथ गठबंधन की उम्मीदें जगाने वाली रालोद के दोनों बड़े नेता अजित सिंह और जयंत चौधरी सपा-बसपा और कांग्रेस के समर्थन के बावजूद चुनाव हार गए हैं। पांच साल में कोई बड़ा किसान आंदोलन खड़ा न करना और किसानों के मुद्दे पर ढुलमुल रवैया इस गठबंधन की खामियों में गिना जाएगा। तभी तो देश को चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेता देने वाले उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में फिलहाल गहरा सन्नाटा है।

कमोबेश यही स्थिति हरियाणा की है जहां इंडियन नेशनल लोकदल पारिवारिक कलह में बिखर गई तो कांग्रेस किसानों के मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय जातिगत घेराबंद में लगी रही। इस बीच, छोटे-छोटे संगठन अपने स्तर पर किसानों के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन चुनाव में उनका कोई असर नहीं दिखा। जबकि जाट ध्रुवीकरण और मोदी ब्रांड के सहारे भाजपा हरियाणा की सभी 10 सीटें भारी अंतर से जीतने में कामयाब रही। किसान कार्यकर्ता रमनदीप सिंह मान का कहना है कि 2019 की लोकसभा में 38% सांसद खुद को किसान बता रहे हैं, लेकिन किसान के असल मुद्दे अछूते ही रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी किसानों की अनदेखी की है। किसान खुद भी अपनी परेशानियां भूलकर चुनाव के समय जात-धर्म  में बंट जाता है।

मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों के मुद्दे जोर-शोर से उठे थे। उससे पहले शेखावाटी में सीपीएम की ऑल इंडिया किसान सभा ने एक बड़ा आंदोलन किया था। लेकिन यहां भी लोकसभा चुनाव पूरी तरह मोदी और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। सीकर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के किसान नेता अमरा राम महज 31 हजार वोट पा सके। उधर, भाजपा ने राजस्थान में तेजी से उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल को साध लिया। इससे जाटों का साथ तो मिला ही, किसानों के मुद्दों पर मोदी सरकार को भी घिरने से बचा लिया। विधानसभा चुनाव में भी बेनीवाल ने कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।

लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए का दामन थामने वाले राजस्थान के उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल

 

पंजाब में सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी अकाली दल एक-दूसरे पर कृषि संकट का ठीकरा तो फोड़ते रहे लेकिन चुनाव में इन मुद्दों का खास असर वहां भी नहीं दिखा। भाजपा सिर्फ एक सीट पर मुकाबले में थी, जहां सनी देओल के हैंडपंप और मोदी ब्रांड के अलावा किसी मुद्दे की जरूरत नहीं पड़ी।

पिछले बार पंजाब में 30 फीसदी वोट 4 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी की तरफ से सिर्फ भगवंत मान लोकसभा में पहुंचे हैं। आप का वोट बैंक घटकर 7.4 फीसदी रह गया, बाकी कांग्रेस, अकाली और भाजपा में बंट गया। हालांकि, भगवंत मान किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे है, लेकिन आप भी किसानों के लिए संघर्ष करने के बजाय अपने ही झगड़ों में उलझी रही। जबकि खुद को गैर-राजनीतिक कहने वाली पंजाब की कई किसान यूनियनें नोटा के फेर में पड़ गईं। पंजाब में डेढ़ लाख से ज्यादा करीब 1.12 फीसदी वोट नोटा को गया। यानी विकल्प की कमी साफ नजर आई।

मोदी की आंधी में देवगौड़ा जैसे दिग्गज भी धराशायी

 

उत्तर भारत ही नहीं दक्षिण भारत में भी मोदी वेव के सामने किसान राजनीति कहीं टिक नहीं पाई। कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा को तुमकुर सीट पर और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के पुत्र निखिल को मांड्या सीट पर करारी शिकस्त मिली है। देवगौड़ा की छवि जमीन से जुड़े किसान नेता की रही है। लेकिन इस बार उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट पर जीती। कर्नाटक में कांग्रेेेस भी 9 सेे घटकर 1 सीट पर आ गई है।

लोकसभा चुनावों में बेअसर किसान आंदोलनों और जमीनी मुद्दों के सन्नाटे पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि मतदाताओं पर हिंदुत्ववादी भावनाएं हावी रही। किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले पार्टियां भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही। हालांकि, इस बीच किसानों की समस्याओं को लेकर जागरुकता बढ़ी है और डायरेक्ट इनकम सपोर्ट का मुद्दा सरकारों और राजनीतिक दलों के एजेंडे में आ चुका है। इसे वे अच्छा संकेत मानते हैं।

किसान संगठनों को लामबंद करने के लिए 2017 में निकली किसान मुक्ति यात्रा

 

पिछले दो साल के दौरान स्वराज इंडिया पार्टी के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने किसान संगठनों को लामबंद करने के काफी प्रयास किये। लेकिन ये कोशिशें चुनाव में असर दिखाने लायक ताकत हासिल नहीं कर पाई। चुनाव आते-आते योगेंंद्र यादव और वीएम सिंह नोटा का राग अलापने लगे। इस तरह राष्ट्रीय तो क्या क्षेत्रीय स्तर पर भी किसानों का कोई प्रभावी मोर्चा नहीं बन पाया।

कांग्रेस ने किसानों के लिए अलग बजट जैसे वादे ज़रूर किये, लेकिन पुलवामा के बाद किसानों के मुद्दों से भटक गई। राहुल गांधी किसानों के सवाल उठाते रहे, लेकिन उनकी अपनी कमियां और कमजोरियां हैं। आज की तारीख में कांग्रेस के पास कोई बड़ा किसान नेता नहीं है। ऐसी कोई कोशिश भी नहीं है। इसलिए लेफ्ट और किसान संगठनों के आंदोलनों से मोदी सरकार को मिली चुनौती लोकसभा चुनाव तक बिखर चुकी थी।

वैसे, भाजपा ने यह चुनाव जिस धनबल, सत्ता तंत्र, दुष्प्रचार और मजबूत संगठन के बूते लड़ा है, उसे भी नहीं भूलना चाहिए। विपक्ष की आवाज और असल मुद्दों को ना उठने देने में मीडिया के बड़े हिस्से ने पूरा जोर लगा दिया था। बाकी कसर निष्प्रभावी और बिखरे हुए विपक्ष ने पूरी कर दी।

बहरहाल, जमीनी मुद्दों पर सन्नाटे के बीच इन चुनावों में एक अनूठा उदाहरण भी सामने आया है। तेलंगाना की निजामाबाद सीट से मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी कविता के खिलाफ 179 निर्दलीय उम्मीदवारों ने मोर्चा खोल दिया था, इनमें से ज्यादातर सरकार से नाराज हल्दी उगाने वाले किसान थे। इन निर्दलीय उम्मीदवारों को कुल मिलाकर एक लाख से ज्यादा वोट मिले और कविता 70 हजार वोटों से चुनाव हार गईं। मुद्दों पर चुप्पी के बीच विरोध जताने का एक नायाब तरीका यह भी है।