किसानों के साथ धोखा? कम आंकी जा रही है उपज की लागत

इन बातों पर यकीन करना मुश्किल है! लेकिन आजकल बहुत कुछ मुमकिन है। पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन क्षेत्रों में क्रांतिकारी कारनामे हुए हैं, उनमें आंकड़ेबाजी अहम है। केंद्र सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करें तो पिछले पांच वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी भले न हुई हो, लेकिन खेती की लागत बढ़ने कम हो गई है। लागत में इस ठहराव यानी कमतर लागत के आधार पर ही केंद्र सरकार खरीफ फसलों के एमएसपी में भारी बढ़ोतरी का दावा कर रही है। कई अखबारों ने इसे बजट से पहले किसानों को सरकार का तोहफा करार दिया। कुछ लोगों ने मास्टर स्ट्रोक भी बताया ही होगा।

दावा और हकीकत

खुद केंद्र सरकार का दावा है कि खरीफ सीजन 2019-20 के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी से किसानों को लागत पर 50 से लेकर 85 फीसदी का लाभ मिलेगा। सरकार लागत पर डेढ़ गुना मुनाफा देने के वादे से काफी आगे निकल चुकी है।

एमएसपी की मामूली बढ़ोतरी को सरकार का तोहफा बताने की होड़

 

अब जरा इन दावों की हकीकत भी जान लीजिए। सामान्य किस्म के धान का एमएसपी इस साल सिर्फ 65 रुपये प्रति कुंतल बढ़ा है जो 4 फीसदी से भी कम है। लेकिन दावा है कि इस मामूली बढ़ोतरी के बावजूद किसानों को लागत पर 50 फीसदी रिटर्न मिलेगा। पता है कैसे? जिस लागत के आधार पर सरकार यह दावा कर रही है वह लागत पिछले पांच साल में सिर्फ 23 फीसदी बढ़ी मानी गई है। जबकि धान की खेती की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 114 फीसदी बढ़ी थी। मतलब, सरकारी अर्थशास्त्रियों ने 2014 के बाद धान उत्पादन की लागत को बढ़ने ही नहीं दिया। लागत बढ़ाएंगे तो एमएसपी भी ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा। लागत को ही कम से कम रखें तो एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी भी ज्यादा दिखेगी। सीधा गणित है।

खरीफ फसलों की अनुमानित लागत (रुपये प्रति कुंतल में )

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ नीति रिपोर्ट  https://cacp.dacnet.nic.in/KeyBullets.aspx?pid=39

 

सरकारी अर्थशास्त्री अपनी पर आ जाएं तो आंकड़ों को अपने पक्ष में घुमाना उनके बाएं हाथ का खेल है। मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम इस मुद्दे पर पूरा रिसर्च पेपर लिख चुके हैं कि हाल के वर्षों में भारत सरकार ने कैसे जीडीपी की ग्रोथ रेट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन किसानों के मामले में उल्टा हुआ। सरकारी अर्थशास्त्री किसानों की लागत बढ़ने ही नहीं दे रहे हैं। जमीन पर भले कितनी ही महंगाई क्यों ना हो, कागजों में खेती फायदे का सौदा साबित की जा रही है।

लागत पर ब्रेक और डेढ़ गुना दाम का दावा

फसलों का एमएसपी कितना होना चाहिए और उपज की लागत क्या आंकी जाए? इस हिसाब-किताब के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग नाम की एक सरकारी संस्था है जो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत काम करती है। इसमें दिग्गज कृषि अर्थशास्त्री बैठकर तय करते हैं कि किस उपज पर कितनी लागत आती है। विभिन्न राज्यों से कृषि लागत के आंकड़े जुटाए जाते हैं। महंगाई, आयात-निर्यात, वैश्विक बाजार और मौजूदा भंडार को देखते हुए फसलों के एमएसपी तय किए जाते हैं।

2009-10 खरीफ सीजन के लिए सीएसीपी ने तुहर यानी अरहर दाल की वास्तविक उत्पादन लागत (ए2 + एफएल) 1181 रुपये प्रति कुंतल आंकी थी। (ए2 + एफएल) वह लागत है जिसमें खेती पर आने वाले तमाम वास्तविक खर्च जैसे बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनरी, ईंधन का खर्च और खेती में लगे कृषक परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है।

इस प्रकार 2009-10 में तुहर उत्पादन की जो लागत 1181 रुपये प्रति कुंतल थी, वह 2014-15 तक बढ़कर 3105 रुपये हो गई। यानी पांच साल में तुहर की लागत 163 फीसदी या ढाई गुना से ज्यादा बढ़ी। ताज्जुब की बात है कि 2014 के बाद तुहर की लागत बढ़ने का सिलसिला थम-सा गया। 2014-15 से 2019-20 के बीच पांच वर्षों में तुहर की लागत सिर्फ 17 फीसदी बढ़कर 3636 रुपये प्रति कुंतल तक ही पहुंची। कहां पहले पांच वर्षों में 163 फीसदी की वृद्धि और कहां अब पांच साल में केवल 17 फीसदी की बढ़ोतरी? है ना कमाल! एक ही फसल, एक ही देश लेकिन लागत बढ़ती इतनी कम कैसे हो गई। यह सवाल तो उठेगा।

बड़ा सवाल

यह शोध का विषय है कि जिन फसलों की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ी थी, 2014 के बाद उनकी लागत 20-30 फीसदी ही क्यों बढ़ी है? यह सिर्फ अर्थशास्त्रियों का कारनामा है या फिर इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति भी सक्रिय है?

खुद सीएसीपी के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों की लागत 66 से 163 फीसदी तक बढ़ी थी। धान की लागत 114 फीसदी तो ज्वार की लागत 122 फीसदी बढ़ी थी। लेकिन 2014-15 के बाद के पांच वर्षों में खरीफ फसलों की लागत 5 से 43 फीसदी ही बढ़ी है। इस दौरान सबसे ज्यादा 43 फीसदी लागत सोयाबीन की बढ़ी जबकि सबसे कम 5 फीसदी लागत मूंगफली की बढ़ी है। यहां सबसे बड़ा सवालिया निशान खेती की लागत और एमएसपी तय करने की सरकारी प्रक्रिया पर है, जिसमें किसानों की हिस्सेदारी नाममात्र की रहती है।

किसानों पर दोहरी मार, फार्मूला और लागत का खेल

सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देना का शॉर्टकट ढूंढ़ लिया है। जब कमतर लागत को आधार बनाया जाएगा तो एमएसपी में थोड़ी बढ़ोतरी भी डेढ़ गुना बताई जा सकती है। यह बहस तब भी खड़ी हुई थी जब केंद्र सरकार ने समग्र लागत (सी2), जिसमें किसान की अपनी जमीन का अनुमानित किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है, की बजाय वास्तविक लागत (ए2 + एफएल) के आधार पर डे़ढ़ गुना एमएसपी देने का वादा किया था। पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि जिस कमतर लागत को सरकार आधार मान रही है, उनमें भी साल दर साल बेहद कम बढ़ोतरी आंकी जा रही है। यह किसानों पर दोहरी मार है।

जाहिर है कमतर लागत के आधार पर ही सरकार एमएसपी में बढ़ोतरी की वाहवाही बटोरना चाहती है। जबकि तथ्य यह है कि 2014 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों के एमएसपी 2014 के बाद पांच वर्षों के मुकाबले ज्यादा बढ़े थे। 2014 से 2019 के बीच केवल बाजरा, रागी, नाइजर बीज और कपास (लंबा रेशा) के एमएसपी में पहले 5 सालों के मुकाबले अधिक वृद्धि हुई है। जबकि 2009 से 2014 के बीच मुख्य खरीफ फसलों जैसे – धान, ज्वार, मक्का, तुहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, कपास और सोयाबीन के एमएसपी पिछले पांच वर्षों के मुकाबले अधिक बढ़े थे। खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के लिहाज से डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल पिछले पांच वर्षों से कमतर नहीं बल्कि बेहतर ही था।

खरीफ फसलों के एमएसपी में 1 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी

इस साल खरीफ फसलों के एमएसपी में जो मामूली बढ़ोतरी हुई है, उसे छिपा पाना मुश्किल है। खरीफ सीजन 2019-20 के लिए उपज एमएसपी में 1.1 फीसदी से लेकर 9.1 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। सबसे कम 1.1 फीसदी यानी 75 रुपये का इजाफा मूंग के एमएसपी में हुआ है। जबकि सबसे अधिक 9.1 फीसदी यानी 311 रुपये की वृद्धि सोयाबीन के एमएसपी में की गई है। खरीफ की प्रमुख फसल धान का एमएसपी सिर्फ 65 रुपये यानी 3.7 फीसदी ही बढ़ा है। कपास के एमएसपी में भी 1.8 – 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है। किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने और आमदनी दोगुनी के सरकारी दावे की फिलहाल यही असलियत है।

खरीफ फसलों के एमएसपी  (रुपये प्रति कुंतल)

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ रिपोर्ट, सीएसीपी के आंकड़े https://cacp.dacnet.nic.in/ViewContents.aspx?Input=1&PageId=36&KeyId=0 और पीआईबी की विज्ञप्ति http://pib.nic.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1576842

 

किसानों को उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से निकली यह बात 2014 में भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र तक पहुंच गई थी। मोदी सरकार ने सैद्धांतिक रूप से डेढ़ गुना दाम की नीति को अपनाया था। मगर इस पर अमल करने के तरीके में कई झोल हैं।

जिस लागत के आधार पर डेढ़ गुना दाम दिलना का दावा किया जा रहा है कि सरकार उस लागत को ही कम आंक रही है। इसलिए किसान के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है। जबकि लगातार सूखे और घाटे की मार झेल रहे किसानों को आंकड़ों की इस बाजीगर के बजाय कारगर राहत और ईमानदार कोशिशों की दरकार है।

 

दिल में बसा गांव: आदमी बैल और सपने

अस्सी नब्बे के दशक तक ग्रामीण इलाकों में बैलगाड़ी का प्रयोग माल ढुलाई के अलावा घर की बहुओं को ससुराल पहुंचाने के लिये किया जाता था। बारात विदाई में लोकल पैसेंजर ट्रेन की भी शानदार भूमिका होती थी। भावी बहु अपने मैके से डोली में बैठकर रेलवे स्टेशन तक आती फिर डोली उठाने वाले कहार पैसेंजन ट्रेन की खिड़की के पास डोली को तजुर्बे से बांध देते।

जब ट्रेन गंतव्य पर पहुंचती पुन: कहार डोली को उतारकर प्लेटफार्म पर रखते और बहु एक बार फिर डोली में जाकर बैठ जाती। स्टेशन से बाहर निकलकर बताये स्थल पर पेड़ की छांव में बैलगाड़ी में बांस की कमानी से घेरा बना दिया जाता। एक जोड़ी बैल को जुआठ में बांधने के पहले उसके ऊपर से धोती-साड़ी या चांदनी जैसे मोटे कपड़े तान दिये जाते।

वर-वधु-सहबाला तीनों बारी-बारी से कमानी तने घरनुमा बैलगाड़ी पर सवार होते…उसके बार गाड़ीवान दोनों बैलों के कंधे पर जुआठ चढ़ाकर उनके गले को रस्सी से बांध देता….गाड़ीवान एक बार चलते के पहले दुल्हे से पूछता – सब ठीक से बैठ गये हैं न…दुल्हा की हामी के बाद गाड़ीवान पहले दाहिन बगल वाले बैल का पुट्ठा ठोकता या पैर के अंगुठा व मध्यमा उंगली से बैल के पांव के पिछले हिस्से को हल्के से ठोकता…इशारा पाते ही बैल कुछ दूर अनमने तरीके से चलने के बाद अपनी चाल रौ में चल पड़ते…बिना बोले दोनों बैल का आपसी तालमेल और उनके गले में बंधी घंटी की टन…टून…टन…टून….सुमधुर आवाज प्रकृतिक संगीत के आनंदलोक में विचरने को बाध्य करते। टूटी जर्जर सड़कों पर पहिये की खड़खड़ाहट, बांस की बाती से बने बेस एरिया की चरमराहट घंटियों के स्वर लहरियों से पूरी यात्रा में युगलबंदी करते अनूठा मंजर पेश करते।

अपने गांव/गंतव्य की यह यात्रा किस्से कहानियों में ही जिन्दा है अब। सड़कों के पक्कीकरण, विस्तार तथा आटो रिक्शा के आगमन से बैलगाड़ी गुजरे जमाने की सवारी होती चली गयी। हॉवर्ड को हॉर्डवर्क से चुनौती देने वाले चौकीदार को पता होना चाहिए कि ज्ञान बैल के अंदर भी होता है। मनुष्य ज्ञान का विभाजन विद्यागत विशिष्टता के लिये करता है, पशु के अंदर ऐसी चेतना का अभाव होता है।

रामशरण जोशी की एक किताब का शीर्षक था-आदमी बैल और सपने। हालांकि, उस किताब को मैंने पढ़ा नहीं है। इसी तरह बैल पर कवि शमशेर बहादुर सिंह की भी एक शानदार कविता है-

मैं वह गुट्ठल काली कड़ी कूबवाला बैल हूं

जो अकेले धीरे-धीरे छह मील खींचकर ले जाते हुये

ठेले के उपर लदा हुआ माल

स्टेशन से गोदाम तक 

चुपचाप धीरे-धीरे आंखे बाहर को निकली हुईं 

त्योरी चढ़ी हुई, कंधे जोर लगाते हुये

सीना और छाती आगे की ओर झुककर जोर लगाते हुये 

राने भरी हुईं गर्म पसीने से तर, मगर जोर लगती हुईं

आगे कविता में विडंबना बोध का स्वर गहराता है और बैल की स्वभाविक नाराजगी की अभिव्यक्ति में भी वह श्रम से भागता नहीं है। यथा-

वह गहरा लगातार श्रम 

पुट्ठों को श्लथ कर देनेवाला श्रम 

स्वंय मेरी नींद का कब्र बन जाता है 

मालिक पर तब जो मुझे गुस्सा आता है

उससे मेरा जोर और बढ़ जाता है

बैल का अक्स कवि केदारनाथ सिंह की कविता मांझी का पुल में भी प्रतिध्वनित होता है-जब खैनी बनाते लालमोहर को बैलों की सींग के बीच एन दिख जाता है मांझी का पुल….बैल मूक पशु है, लेकिन जैसी उपमा उसे (मूर्ख ) दी जाती है….वैसा वह है नहीं…मनुष्य सपना देख सकता है बैल नहीं…उसके वारिस मानव जात में कहीं ज्यादा मिल जायेंगे हमें।

साहित्यकार रामदेव सिंह अपने अतीत की स्मृतियों के झरोखे में विचरण करते हुये कहते हैं – जबसे होश संभाला साधन के रुप में बैलगाड़ी से रुमानी रिश्ता रहा। लगभग तीन दशकों तक। 1967 से 1971 तक जब हाईस्कूल में पढ़ रहा था। हास्टल में रहता था। छुट्टियों में यही बैलगाड़ी मुझे लाने भेजी जाती थी और हास्टल पहुंचाने भी। गांव भर में हमारी बैलगाड़ी सबसे सुंदर थी। नक्काशियों वाला टप्पर था। पर से टीन वाला चदरा, ताकि बारिश में सवार भींगे नहीं। टप्पर का इस्तेमाल जनाना सवारी के लिए ज्यादा होता था। अपनी शादी में ट्रेन पकड़ने के लिए मैं बैलगाड़ी से ही स्टेशन गया था।

चार दिनों बाद जब अपनी नववधू को विदाई करवा कर अपने स्टेशन पर उतरा तो यही बैलगाड़ी हमारे इन्तजार में खड़ी थी। रास्ते में जोर की आंधी आयी। बारिश होने लगी। संयोग से वहां एक प्राइमरी स्कूल था। इसी स्कूल में तीन घंटे शरण लेना पड़ा। आप कल्पना कर सकते हैं शहर में पली-बढ़ी नयी नवेली और बैलगाड़ी की वह सवारी, लेकिन उस दिन को हम बहुत रूमानियत के साथ याद करते हैं। बैलगाड़ी की सवारी के अनगिनत अनुभव हैं मेरे पास। 1982 में रेल की नौकरी में आने के बाद भी 1990-91 तक मैं रेलवे स्टेशन से गांव आने-जाने के लिए शौकिया बैलगाड़ी मंगवाया करता था।

मोहन लाल यादव बताते हैं कि हमारे यहां इलाहाबाद में जब कुंभ मेला लगता था तो गंगा किनारे के निकटवर्ती गांव बैलगाड़ी और इक्कों से भर जाते थे। यूपी के पूरब और पूर्वोत्तर जिले जैसे गोरखपुर, जौनपुर, आजमगढ़ तथा गाजीपुर तक के तीर्थ यात्री बैलगाड़ियों से ही आते थे। वे महीनों पहले से ही यात्रा शुरू कर देते थे। रास्ते पर वे गाते बजाते चले आते थे। रात्रि किसी बाग में अथवा किसी सराय में रुकते। बचपन में हम उनके पास रात में किस्से सुनने जाते थे।

संस्कृतिकर्मी जावेद इस्लाम अपने बचपन को याद करते हुये बताते हैं कि मेरा घर जीटी रोड पर है। बचपन में सामान्य बच्चों की तरह हम भी सड़क पर गुजरने वाले बैल गाड़ी पर दौड़ के पीछे लटक जाते थे और मजा लेते हुये कुछ दूर तक जाते फिर उतर जाते थे। मजा तो तब आता था जब बैल गाड़ी पर दूल्हा व घूंघट में दुल्हनियां जा रही होती थी। बैलगाड़ी के पीछे कपड़ेे का पर्दा लगा होता था। हम बच्चे शोर मचाते बैल गाड़ी के पीछे भगते थे, पर्दा उठा कर दूल्हा-दुल्हन की एक झलक पाने के लिये। गाड़ी मान सोटा दिखाकर या हल्के तरीके से सटाकर कर हम बच्चों को भगाता था। वे भी क्या दिन थे?

आकाशवाणी के पूर्व कार्यक्रम अधिशासी अनिल किशोर सहाय बचपन की स्मृतियों में डूबकर बताते हैं कि हम भी बचपन में बैलगाड़ी में सवार होकर ननिहाल जाते थे। बस से सड़क पर उतरने के बाद आठ किलोमीटर का सफर कच्चे रास्ते की सवारी बैलगाड़ी के जरिये ही तय करते थे। मेरी मां कुछ जरूरी चीजें बैलगाड़ी में रख लेती और हम पैदल खेतों के रास्ते…. क्या दिन थे… रास्ते में एक छोटी नदी भी पड़ती थी, पर गाड़ीवान इतना सिद्धहस्त था कि वह जोर से हकारते हुये नदी पार….. अब सब सपना सा लगता है। वहां पक्की सड़क बन गयी है और गांव तक बस जाने लगी है। पूर्वोत्तर भारत का मुझे नहीं पता, लेकिन शेष भारत में बैलगाड़ी कृषि कार्यों में अनाज ढूलाई के अलावा आवागमन का एक महत्वपूर्ण साधन था। जिसके दरवाजे पर दो तीन थोड़ी बैल हों उसे अच्छा कृषक माना जाता था।

बहरहाल, दौर बदल रहा है और बदलते वक्त की रफ्तार में बैलगाड़ी पीछे छूट चुकी है। लेकिन शहर के बियाबान में भी उस गांव की याद तो आती है जो दिल के किसी कोने में बसा है। वहां बैलगाड़ी के चलने और बैलों के झूमने का संगीत हमेशा सुनाई देता रहेगा।