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गांव को याद करते हुए गांव के अजनबी-2

शहर की जिंदगी धीरे-धीरे ये सिखाती है कि किसी के भरोसे नहीं रहना है, जो भी करना है अपने बूते पर करना है। ये मूल्य गांव की जिंदगी के खिलाफ है। वहां एक प्रकार कार ‘बाध्यकारी-सहकार’ होता है क्योंकि एक के बिना दूसरे का काम नहीं चल सकता है।

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गांव को याद करते हुए गांव के अजनबी-1

रोजी रोटी की तलाश में गांव से विस्थापित होकर शहर में आए हम जैसे लोग अक्सर गांव के साथ अपने रिश्ते को वक्त-बेवक्त परिभाषित करने की कोशिश करते रहते हैं। इस कोशिश में अक्सर निराशा हाथ लगती है।