बिहार में बांस की खेती क्यों छोड़ रहे हैं किसान

बांस की खेती पारंपरिक तौर पर भारत में होती आई है। हालांकि, इसे वृक्ष की श्रेणी में रखे जाने से इसकी व्यावसायिक खेती को उतना बढ़ावा नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। इसलिए केंद्र सरकार ने इसे कानून में संशोधन करके वृक्ष की श्रेणी से बाहर निकालने का काम किया है।

इसके बावजूद बांस की खेती को लेकर किसानों में उत्साह का माहौल नहीं है। बिहार से यह जानकारी मिल रही है कि राज्य के जिन इलाकों में बांस की खेती होती थी, उन इलाकों के लोग अब बांस की खेती छोड़ रहे हैं।

बिहार में पारंपरिक तौर पर कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बांस की खेती होती आई है। इस क्षेत्र में बांस से बनने वाले उत्पाद भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होते आए हैं। बांस के उत्पाद इस क्षेत्र राज्य के दूसरे इलाकों में भी भेजे जाते हैं। लेकिन अब इस क्षेत्र के किसान बांस की खेती से किनारा कर रहे हैं।

इसकी कई वजहें हैं। सबसे पहली वजह तो यह बताई जा रही है कि यहां के किसानों को सरकार से बांस की खेती के लिए जिस तरह की मदद की उम्मीद थी, उस तरह की मदद इन्हें नहीं मिल पा रही है। इस क्षेत्र के किसानों का कहना है कि बांस की खेती को प्रोत्साहित करने की बात सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत तो करती है लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें सरकार की ओर कोई मदद नहीं मिल रही है।

बिहार सरकार ने इस इलाके में बांस की खेती को देखते हुए पहले यह भी कहा था कि इस क्षेत्र में बांस आधारित उद्योग स्थापित किए जाएंगे। लेकिन यह सरकारी वादा भी पूरा नहीं हो पाया। जबकि किसानों ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि अगर बांस आधारित उद्योग लगते हैं तो इससे उन्हें लाभ होगा और इस क्षेत्र में होने वाली बांस की खेती को और प्रोत्साहन मिलेगा।

एक बात यह भी चल रही थी कि इस क्षेत्र में कागज के कारखाने लगाए जाएं। क्योंकि कागज उत्पादन में लकड़ी के पल्प के साथ-साथ बांस के पल्प का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर होता है। बल्कि बांस के पल्प को कागज उत्पादन के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है। इस आधार पर यह कहा जा रहा था कि इस क्षेत्र में कागज उद्योग के लिए काफी संभावनाएं हैं। क्योंकि इस उद्योग के लिए बांस के रूप में कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में यहां उपलब्ध है। लेकिन इस क्षेत्र में कागज उद्योग भी विकसित नहीं हो पाया।

बांस की खेती से किसानों की बढ़ती दूरी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि अब बांस से बनने वाले उत्पादों की मांग में कमी आती जा रही है। पहले सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के साथ रोजमर्रा के कार्यों में भी बांस से बनने वाले उत्पादों का इस्तेमाल होता था। अब इनकी जगह प्लास्टिक के उत्पाद लेते जा रहे हैं।

बांस के उत्पाद पारंपरिक ढंग से बनते हैं। इसलिए इनमें श्रम लगता है। इस वजह से इनकी लागत अधिक होती है। जबकि प्लास्टिक उत्पादों का उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में अत्याधुनिक मशीनों के जरिए होता है। इसलिए इनका उत्पादन लागत कम होता है और बांस के उत्पादों के मुकाबले प्लास्टिक उत्पाद अपेक्षाकृत कम पैसे में लोगों को मिल जाते हैं।

बिहार के कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बांस की खेती से किसानों के दूर होने की वजह से इस क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बेरोजगारी बढ़ने से इन क्षेत्रों से दिल्ली और मुंबई जैसे औद्योगिक केंद्रों की ओर पलायन भी बढ़ सकता है। क्योंकि स्थानीय स्तर पर जब बांस की खेती में लगे किसान और मजदूर बेरोजगार होंगे तो स्वाभाविक ही है कि ये रोजगार की तलाश में शहरी केंद्रों का रुख करेंगे।

बांस की खेती से किसानों के अलग होने से इस क्षेत्र में बाढ़ से और अधिक नुकसान होने की आशंका पैदा होगी। उल्लेखनीय है कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शुमार किया जाता है और इस क्षेत्र को अमूमन हर साल ही बाढ़ का सामना करना पड़ता है। बांस की खेती होने से बाढ़ की स्थिति में मिट्टी का कटाव कम होता है और बाढ़ का पानी एक हद तक रोकने का काम भी बांस की खेती के जरिए होता है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में बांस की खेती लगातार कम होती जाएगी तो इससे इस क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति में पहले के मुकाबले और अधिक नुकसान होगा।

चुनावों में कहां गायब है किसान आंदोलनों की आवाज?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यह दावा करते हुए नहीं थकती है कि उसने पिछले पांच सालों में किसानों के कल्याण के लिए काफी काम किए हैं। भारतीय जनता पार्टी की यह सरकार ये भी कहती है कि पहली बार किसानों की आय दोगुनी करने का एक लक्ष्य तय किया गया। किसानों के लिए उठाए गए कई कदमों का उल्लेख नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार करती आई है।

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले पांच सालों में पूरे देश में सबसे अधिक किसान आंदोलन हुए। ये आंदोलन किसी एक राज्य या कुछ खास राज्यों तक सीमित नहीं रहे हैं। बल्कि उन सभी राज्यों में किसान आंदोलन पिछले पांच सालों में हुए हैं, जिन राज्यों को सामान्य तौर पर कृषि प्रधान राज्य माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को आम तौर पर औद्योगिक केंद्र माना जाता है लेकिन इन राज्यों में भी किसानों ने बीते सालों में आंदोलन किए।

किसान आंदोलनों के लेकर कुछ ऐसा माहौल बना कि देश भर में काम करने वाले कई अलग-अलग किसान संगठन एक मंच पर आए। इन सभी ने मिलकर संयुक्त तौर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इन लोगों ने अपनी मांगों में एकरूपता लाई। सभी जगह के किसान आंदोलनों में उचित मूल्य, कर्ज माफी और लागत में कमी की बात समान रूप से आई।

इसके बावजूद किसान आंदोलनों की गूंज लोकसभा चुनावों में सुनाई नहीं दे रही है। इसकी वजहों के बारे में पता लगाने के लिए जब कृषि के जानकारों, इन आंदोलनों में शरीक रहे लोगों और राजनीतिक विशेषज्ञों से बात करें तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं।

सबसे पहली बात तो यह बताई जा रही है कि आजादी के बाद से अब तक जितने भी लोकसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से किसी भी चुनाव में कृषि और किसान के मुद्दे केंद्र में नहीं रहे हैं। खेती-किसानी एक मुद्दा तो रहा है लेकिन यह मूल मुद्दा कभी नहीं रहा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यह कभी ऐसा मुद्दा नहीं रहा है जिस पर वोटों का धु्रवीकरण किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसान एक वर्ग के तौर पर भारत में एकजुट नहीं रहा है। इन लोगों का कहना है कि अगर किसान को एक वर्ग मानें तो इसके अंदर कई उपवर्ग हैं। जाति का उपवर्ग है, धर्म का उपवर्ग, भाषा का उपवर्ग है और क्षेत्र का उपवर्ग है। लेकिन इन लोगों का ये कहना है कि ये उपवर्ग चुनावों में किसानों के मुख्य वर्ग बन जाते हैं और किसान वर्ग खुद उपवर्ग बनकर पीछे छूट जाता है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक किसान जब वोट देने जाता है तो उस वक्त वह बतौर किसान नहीं वोट देता है बल्कि चुनावी राजनीति में वोट देने का उसका निर्णय उसकी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से अधिक प्रभावित होती है। ऐसे में खेती-किसानी के मुद्दे उठते तो रहते हैं लेकिन चुनावों के मूल मुद्दे नहीं बन पाते।

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि किसान खुद को किसानों का एक वर्ग मानकर मतदान नहीं करता। इसलिए वे किसानी के मुद्दों को मूल मुद्दा नहीं बनाते हैं। क्योंकि अगर खेती-किसानी के मुद्दे मूल मुद्दे बन गए तो उन्हें नुकसान अधिक होगा।

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि खुद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते कि किसान एक वर्ग के तौर पर उभरे। इसकी वजह बताते हुए ये लोग कहते हैं कि देश के 57 फीसदी लोग अब भी कृषि पर जीवनयापन के लिए निर्भर हैं। अगर किसी तरह से इन 57 फीसदी लोगों का एक वर्ग बन गया और ये एक वोट बैंक की तरह वोट देने लगे तो फिर ये होगा कि किसान जैसी सरकार चाहेंगे, वैसी सरकार बनेगी। सारी नीतियां किसानों के हिसाब से बनेगी।

इसका एक असर यह भी होगा कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवार भी टूटेगी। इससे वोट बैंक की मौजूदा राजनीति को झटका लगेगा और राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।

इन लोगों का यह भी कहना है कि यह उद्योग जगत भी नहीं चाहता कि किसान एक वर्ग के तौर पर एकजुट हो जाएं। क्योंकि इन्हें लगता है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर सरकारी नीतियों को जिस तरह से वे अपने फायदे के लिए प्रभावित कर पा रहे हैं, उस तरह से वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे और किसानों के हिसाब से सारी सरकारी नीतियां बनने लगेंगी।

ऐसे में स्थिति ये दिखती है कि किसानी के सवालों को मूल चुनावी मुद्दा बनाने के पक्ष में चुनाव प्रक्रिया में अधिकांश हितधारक नहीं हैं। इसलिए हाल के सालों में किसान आंदोलनों की देशव्यापी गूंज के बावजूद लोकसभा चुनावों में इनकी धमक नहीं सुनाई दे रही है।

खेती-किसानी की समस्याएं जो हर पार्टी के मुद्दे होने चाहिए?

पिछले दो-तीन साल में पूरे देश में किसानों ने अपनी समस्याओं को लेकर देश में कई आंदोलन किए। ऐसा कम ही होता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले किसान संगठन एक साथ आएं और किसानी के मुद्दों पर मिलकर संघर्ष करें। लेकिन हाल के समय में ऐसा होते देखा गया।

देश भर में 200 से अधिक किसान संगठन एक साथ आए और इन सबने मिलकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति बनाकर देश के विभिन्न हिस्सों से अपने हक और हित की बात उठाने की कोशिश की। इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनावों में किसान और किसानी का संकट चुनावी मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

देश भर में किसानों का जो संघर्ष चला, उसका असर यह तो हुए कि कुछ राज्यों में कर्ज माफी हुई। तेलंगाना और ओडिशा जैसे राज्यों ने जब किसानों को सीधी आर्थिक मदद देने वाली योजनाओं की घोषणा कर दी तो दबाव में केंद्र सरकार को भी प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना की घोषणा करनी पड़ी। इसके तहत किसानों को सालाना 6,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी।

इन सबके बावजूद कृषि क्षेत्र की मूल समस्याएं चुनावों में मुद्दा नहीं बन पा रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि किसान और किसानी से संबंधित वे मुद्दे कौन से हैं जिन्हें इन चुनावों में उठाया जाना चाहिए था लेकिन जिन पर अभी तक कोई खास चुनावी चर्चा नहीं हो रही है।

इसमें सबसे पहली दो बातें ध्यान में आती हैं। सबसे पहली बात कि किसानों को उनकी उपज के बदले उचित मूल्य मिले। केंद्र सरकार ने यह घोषणा तो कर दी है कि उसने न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से 50 फीसदी अधिक तय कर दिया है। लेकिन न तो इसे तय करने में केंद्र सरकार द्वारा इस्तेमाल किए गए फाॅर्मूले पर जानकारों को यकीन है और न ही जमीनी स्तर पर किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना पैसा अपनी उपज के बदले मिल रहा है।

वहीं दूसरी तरफ किसानों की कर्ज की समस्या बहुत बड़ी है। बैंकों के जरिए किसानों को दिए जाने वाले कर्ज का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है लेकिन आम किसानों तक संस्थागत कर्ज इस अनुपात में काफी कम पहुंच पा रहा है। ऐसी स्थिति में किसानों को अब भी साहूकारों के पास अधिक ब्याज दर पर कर्ज लेने के लिए जाना पड़ रहा है। जो लोग बैंक से कर्ज रहे हैं और जो साहूकारों से ले रहे हैं, उन दोनों की समस्या यही है कि उन्हें अपनी उपज की उचित कीमत नहीं मिल रही है और इस वजह से कर्ज के दुष्चक्र से निकल पाना इनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है।

किसानी का एक और बड़ा संकट लागत में लगातार बढ़ोतरी के तौर पर दिख रहा है। कृषि में इस्तेमाल होने वाला इनपुट लगातार महंगा हो रहा है। वह चाहे बीज हो, खाद हो, कीटनाशक हो या फिर श्रम बल। इस वजह से बाजार में किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तो उनका लागत बढ़ गया है और दूसरी तरफ उन्हें उचित कीमत भी नहीं मिल पा रहा है।

हाल के समय में यह भी देखा जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन का असर भी कृषि पर हो रहा है। इस वजह से मौसम को लेकर किसानों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश क्षेत्रों में जलस्तर नीचे जा रहा है। अभी भी जल और दूसरे संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में कृषि पर उद्योगों को तरजीह दी जा रही है। इस वजह से जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर और अधिक पड़ने की आशंका खुद सरकारी दस्तावेजों में जताई जा रही है। आर्थिक समीक्षा में इस संबंध में लगातार चर्चा हो रही है।

ये मुद्दे ऐसे हैं जो भारत के कृषि क्षेत्र को बेहद नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर रहे हैं। इन वजहों से देश का किसान बेहाल है। लेकिन इसके बावजूद भारत जैसे देश में जहां की 57 फीसदी आबादी अब भी जीवनयापन के लिए निर्भर है, वहां कृषि का संकट चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है।

किसानों की युवा पीढ़ी ने ट्विटर पर दिखाई अपनी ताकत

2019 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष जहां ‘चौकीदार चोर है’ के नाम से अभियान चला रहा तो इसके जवाब में केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान चला रखा है। इसके तहत सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत उनके तमाम मंत्रियों, भाजपा नेताओं और पार्टी के समर्थकों ने ट्विटर पर अपने नाम से पहले चौकीदार शब्द जोड़ लिया है। भाजपा के लोग मिलकर इसे ट्विटर पर ट्रेंड भी करा रहे हैं।

अब सरकार की नाकामियों के लिए देश के आम लोग भी इसी तरीके को अपना रहे हैं। बीते दिनों किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश में कुछ युवा किसानों के एक समूह ने ट्विटर पर ‘कर्जदार किसान’ हैशटैग करा दिया।

जिस ट्विटर का इस्तेमाल राजनीतिक दल के लोग अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए करते आए हैं, उसका बहुत अच्छा इस्तेमाल कुछ युवा किसानों ने किया। इनकी कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि ट्विटर पर दो-तीन दिनों तक ‘कर्जदार किसान’ सबसे अधिक ट्रेंड में रहे हैशटैग में से एक रहा।

इसके जरिए इन युवा किसानों ने ट्विटर के माध्यम से लोगों का ध्यान किसान और किसानी की समस्याओं की ओर खींचने की कोशिश की। इसके जरिए इन लोगों बताया कि कैसे मौजूदा केंद्र सरकार खेती-किसानी की समस्याओं के समाधान में नाकाम रही है।

इस दौरान कर्जदार किसान हैशटैग के साथ हुए हजारों ट्विट के जरिए देश में किसानों द्वारा की जा रही खुदुकुशी, सूखे की मार झेल रहे किसानों की समस्या और उपज का पर्याप्त नहीं मिलने जैसी समस्याओं को भी लोगों के सामने लाने में इन्हें सफलता हासिल हुई। इससे वैसे लोगों को भी किसानों की समस्याओं के बारे में पता चला जिन्हें इस बारे में कुछ खास मालूम नहीं था।

कर्जदार किसान हैशटैग के साथ बड़ी संख्या में ऐसे ट्विट हुए जिनमें यह बताया गया कि किसानों की कर्ज की समस्या कितनी विकराल है। यह बात सामने आई कि किसानों को संस्थागत कर्ज देने के दावे कितने खोखले हैं और किसानों को अब भी अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय साहूकारों से अधिक ब्याज दर पर कर्ज लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है। यह मांग भी उठी कि स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट को ठीक से लागू किया जाए।

कर्जदार किसान हैशटैग ट्रेंड करने के बाद ट्विटर पर कई युवा किसानों और किसानों की समस्याओं से हमदर्दी रखने वाले कई लोगों ने अपने नाम के आगे ‘कर्जदार किसान’ उसी तरह जोड़ लिया जिस तरह भाजपा के नेताओं ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ शब्द जोड़ लिया है। अपने नाम के आगे कर्जदार किसान जोड़ने वाले लोग किसानों से यह अपील करते हुए नजर आए कि किसी राजनीतिक दल के पक्ष में खड़ा होने के बजाए किसान खुद को जागरूक करने पर अधिक ध्यान दें।

किसानों के हक और हित में काम करने वाले आम किसान यूनियन के सामाजिक कार्यकर्ता राम इनानिया ने ट्विट किया कि अब किसान के एक हाथ में ट्रैक्टर का स्टीयरिंग है तो दूसरे हाथ में ट्विटर हैंडल। उन्होंने यह भी बताया कि 22 मार्च, 2019 को शाम पांच बचे ट्विटर पर कई जगहों से किसान एक साथ ट्विटर पर सक्रिय हुए और हमने कर्जदार किसान हैशटैग ट्रेंड कराया। किसानों ने अपने खेतों में बैठकर, ट्रैक्टर पर बैठकर और बाजार की मंडियों में अपना उत्पाद बेचने के इंतजार में बैठे हुए ट्विट करना शुरू कर दिया।

मान तो यह भी जा रहा है कि ऐसा करके युवा किसानों ने राजनीतिक दलों को अपनी ताकत का अहसास कराया है और उन्हें यह संदेश देने की कोशिश की है कि अगर किसान और किसानी की समस्याओं के समाधान की बात उन्होंने नहीं की तो इसका खामियाजा उन्हें लोकसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।

कहीं चना तो कहीं सरसों एमएसपी के नीचे बेचने को मजबूर हैं किसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों को गिनाते हुए यह बताना नहीं भूलती कि उसने किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाकर लागत का डेढ़ गुना कर दिया है। सरकार के मंत्री और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लोग भी अक्सर ये दावे करते दिखते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सरकार जो एमएसपी तय कर रही है, उस पर किसानों का उत्पाद खरीदे जाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इस वजह से मंडियों में व्यापारी किसानों से मनमाने भाव पर उनके उत्पादों को खरीद रहे हैं।

इसे दो उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है। अभी चना देश की विभिन्न मंडियों में आना शुरू हुआ है। चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने 4,620 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन इस मूल्य पर सरकार ने चने की खरीद शुरू नहीं की है।

अब जाहिर है कि सरकार खरीद नहीं करेगी तो मंडियों में किसानों को व्यापारियों के तय किए गए दर पर चना बेचना पड़ेगा। यही हो रहा है। मध्य प्रदेश की मंडियों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां चना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले ही 4,620 रुपये प्रति क्विंटल का हो लेकिन किसानों को 3,800 रुपये प्रति क्विंटल का दर हासिल करने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। वहां यह दर भी जिन्हें मिल जा रहा है, वे खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं। किसानों को औसतन प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये का नुकसान हो रहा है।

अब इसके मुकाबले बाजार भाव देख लीजिए। इससे पता चलेगा कि किसानों को क्या दर मिल रहा है और आम उपभोक्ताओं को कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। जिस दिन मध्य प्रदेश की मंडियों से यह खबर आई कि वहां चना 3,800 रुपये प्रति क्विंटल यानी 38 रुपये प्रति किलो बेचने के लिए किसाना विवश हैं, उसी दिन दिल्ली में चना का खुदरा भाव पता करने पर यह बात सामने आई कि आम दिल्लीवासियों को एक किलो चने के लिए 105 रुपये से लेकर 115 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों से जिस भाव पर चना खरीदा जा रहा है, उससे तीन गुना अधिक कीमत पर उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि बीच का जो अंतर है, वह कौन खा रहा है?

सरसों का उत्पादन करने वाले किसानों को भी एमएसपी नहीं मिल रही है। सरसों के पैदावार के लिहाज से राजस्थान का देश में बेहद अहम स्थान है। यहां सरसों की पैदावार मंडियों में आने लगी है। सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

लेकिन राजस्थान के श्रीगंगानगर मंडी से यह खबर आ रही है कि 4,200 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी के मुकाबले उन्हें सिर्फ 3,400 रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 3,600 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो किसानों को एमएसपी के मुकाबले 600 से 800 रुपये कम में एक क्विंटल सरसों बेचना पड़ रहा है।

इन स्थितियों को देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ एमएसपी की घोषणा कर देना भर पर्याप्त नहीं है बल्कि इसे लागू कराने का एक उपयुक्त तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है। तब ही बढ़ी हुई एमएसपी का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच पाएगा।

भयंकर कृषि संकट का सामना कर रहे हैं गांव

इंटरनैशनल फूड पाॅलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें इस संस्था ने बताया है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के गांव भयंकर कृषि संकट का सामना कर रहे हैं। संस्था ने यह भी कहा है कि अगर स्थितियों को नहीं सुधारा गया तो इससे और भी कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

संस्था ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों के ग्रामीण इलाकों की स्थिति और वहां के भयंकर कृषि संकट का अध्ययन करके बताया है कि इस वजह से इन क्षेत्रों में भूखमरी, कुपोषण, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। साथ ही पर्यावरण को लेकर भी नए तरह की चुनौतियां पैदा हो रही हैं।

इस रिपोर्ट में इस स्थिति के खतरों से भी पूरी दुनिया को आगाह करने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट मंे बताया गया है कि अगर स्थिति को नहीं सुधारा गया तो दुनिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में आएगी। इसके अलावा सतत विकास लक्ष्यों को 2030 तक हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर स्थितियों में सुधार नहीं लाया गया तो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को भी हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।

इस रिपोर्ट में अफ्रीका, भारत और चीन के ग्रामीण इलाकों के संकट की खास तौर पर चर्चा की गई है और कहा गया है कि इन क्षेत्रों के शहरी इलाकों में जो सुविधाएं हैं, उनके मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में काफी कम सुविधाएं हैं। चीन के ग्रामीण इलाके पर्यावरण से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे हैं। वहीं अफ्रीका के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी बड़ी समस्या है। जबकि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि संकट कई और समस्याओं के मूल में है।

अब भी गांवों में सबसे ज्यादा गरीब लोग रहते हैं। पूरी दुनिया की आबादी में गांवों की हिस्सेदारी 45.3 प्रतिशत है। जबकि दुनिया के 70 फीसदी गरीब लोग गांवों में ही रहते हैं। शहरी इलाकों में गरीबी की दर सात फीसदी है। जबकि गांवों के लिए यह आंकड़ा वैश्विक स्तर पर 17 फीसदी का है।

समाधान की राह सुझाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों पर खास जोर देते हुए उनका विकास करने की जरूरत है। नीतिगत मामलों में ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण विकास को व्यापक दायरे में देखने की जरूरत है।

रिपोर्ट में नीति निर्धारकों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि उन्हें यह भी देखने की जरूरत है कि अगर गांवों का विकास होगा तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वैश्विक विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा और पर्यावरण संरक्षण संबंधित लक्ष्यों को पूरा करना भी आसान होगा।

इस रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि समस्या के समाधान के लिए गांवों और शहरों की अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ना होगा। इससे कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में सामंजस्य बनेगा और इसका असर न सिर्फ आर्थिक स्तर पर पड़ेगा बल्कि सामाजिक जीवन में भी इससे सुधार होगा।

इस रिपोर्ट में ग्रामीण इलाकों की स्थिति में सुधार के लिए पांच उपाय अलग से बताए गए हैं। ये उपाय हैंः गांवों में कृषि और गैर-कृषि रोजगार सृजन, लैंगिक समानता, पर्यावरण चुनौतियों का समाधान, उर्जा स्रोतों तक पहुंच में सुधार और सुशासन में निवेश। जाहिर है कि अगर इन मोर्चो पर काम होता है तो इससे न पूरी दुनिया के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल सकती है।

इस रिपोर्ट में पहली बार कुछ अच्छे प्रयोगों के बारे में भी बताया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे यूरोप के कुछ देशों ने अपने यहां के गांवों को संकट को दूर करने का सफल प्रयोग किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन प्रयोगों में से कुछ बातें दुनिया के वैसे देश अपनी जरूरत के हिसाब से अपना सकते हैं, जहां के ग्रामीण क्षेत्र संकटों का सामना कर रहे हैं।

गांव की यादें और शहरों में अजनबी

समय आगे बढ़ता है और हम जैसे लोग अपने जीवन में हर वक्त इस विरोधाभास को सामने खड़ा पाते हैं। बल्कि, गांव जाकर अपने भाई-बंधुओं को यह बताने लगते हैं कि अपने भरोसे रहो, जो करो खुद करो, किसी की मदद न लो, अपने बल पर आगे बढ़ो। पर, वे नहीं समझते कि उन्हें ‘क्या’ समझाया जा रहा है। बल्कि ‘क्या’ से अधिक बड़ा ‘क्यों’ होता है, उन्हें ‘क्यों’ समझाया जा रहा है। समझाने की यह प्रक्रिया खुद के लिए किसी दिलासा से कम नहीं होती। तब लगता है कि हमने गांव के प्रति, अपनी धरती के प्रति और वहां रह रहे (छूट गए) लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर लिया है।

अपने गांव में आउटसाइडर

मेरे परिचित एक इंजीनियर साहब कुछ साल पहले रिटायर होने के बाद स्थायी तौर पर गांव चले गए। उनके मन में वैसे ही ऊंचे आदर्श थे, जैसे कि गांव से उजड़े हम जैसे ज्यादातर लोगों के मन में हैं या होते हैं। कुछ दिन गांव में उन्हें खूब तवज्जो मिली, हर कोई सलाह-मशवरे के लिए उनके पास जाता था। इंजीनियर साहब को अपनी विवेक-बुद्धि पर पूरा भरोसा था। लेकिन, वक्त ने जल्द ही उन्हें बता दिया कि अब वे ‘आउटसाइडर’ हैं। हुआ यह कि इंजीनियर साहब के परिवार के एक व्यक्ति ने दूसरे की जमीन पर कब्जा कर लिया और जिसकी जमीन हड़पी उसी पर मुकदमा भी करा दिया। पीड़ित आदमी सिर पटक कर रह गया, कहीं से कोई मदद नहीं मिली। इस पूरी घटना से इंजीनियर साहब की न्याय-बुद्धि को झटका लगा, उन्होंने अपने परिवार के लोगों को भला-बुरा कहा और पीड़ित की जमीन लौटाने पर जोर दिया। अगले दिन परिवार के लोगों ने इंजीनियर साहब को कुनबे से बाहर कर दिया और ये भी समझा दिया कि अब ज्यादा दिन गांव में रहोगे तो किसी दिन लौंडे-लफाड़े हाथ रवा कर देंगे! इंजीनियर दोबारा शहर में आ गए हैं और गांव में अपने हिस्से की जमीन को बेचने की तैयारी में हैं! क्या ये ही था सपनों का गांव!

जवाब बेहद मुश्किल है। क्योंकि इंजीनियर साहब एक सपना लेकर गए थे, गांव में एक अच्छे स्कूल का, एक डिस्पेंसरी का और जवान होती पीढ़ी के लिए एक स्किल एंड काउंसलिंग सेंटर का। इनमें से एक भी सपना पूरा नहीं हुआ क्योंकि गांव की जिंदगी उस 30-40 साल पहले के दौर में नहीं है, जब किसी एक पीढ़ी के कुछ उत्साही युवाओं ने अपने सपनों के लिए गांव की धरती छोड़ी थी। इस उम्मीद के साथ छोड़ी थी कि एक दिन फिर लौट कर आएंगे और इस धरती को सूद समेत उसका हक अदा करेंगे। लेकिन, कुछ भी अदा नहीं होता क्योंकि आप जिस धरातल पर लौटना चाहते हैं, उस धरातल का लेवल बदल चुका है। तब, सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि उस लेवल के साथ खुद को किस प्रकार एडजस्ट करें। इस पूरी प्रक्रिया में ‘सत्य’ ऐसे विरोधाभास का सामना करना है, जिसकी कोई काट आमतौर पर हमारे सामने नहीं होती।

नये जमानेे से कदमताल की जटिलता

यह सच है कि गांव की नई पीढ़ी को कॅरियर और शैक्षिक परामर्श की जरूरत है। उन्हें नहीं पता कि शहर में रहने वाले उनके जैसे युवा बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, उनसे प्रतिस्पर्धा के लिए यह जरूरी है कि गांव के युवाओं को काउंसलिंग और गाइडेंस मिले। कोई उन्हें यह बता सके कि वे अगर बीए भी करना चाहते हैं तो किन विषयों के साथ करें और किस काॅलेज या विश्वविद्यालय करें! जब वे बीटेक के पीछे दौड़ रहे होते हैं तब उन्हें पता चलता है कि फैक्ट्रियों में तो पाॅलीटेक्निक डिप्लोमा वालों की मांग है और जब वे बार-बार इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल होते हैं तो तब उन्हें शायद पता ही नहीं होता कि आईटीआई की किसी ट्रेड में दाखिल होकर भविष्य में ठीक-ठाक नौकरी पा सकते थे। यह विरोधाभास सतत रूप से गांव की जिंदगी का हिस्सा बना रहता है।

अपवाद हर जगह हो सकते हैं कि लेकिन यह सच्चाई है कि गांव में अब भी सबसे बड़ा कॅरियर या तो इंजीनियर बनना है या फिर डाॅक्टरी की पढ़ाई करना है। जब तक उन्हें नए जमाने की पढ़ाई के बारे में पता चलता है तब तक ‘नया जमाना’ और आगे जा चुका होता है। यही आज के गांव का सच है और उस गांव में आप चारों तरफ एक परेशान पीढ़ी को पाएंगे, यह पीढ़ी खेतों में खट रही है। उन खेतों में खट रही है जहां पूरे परिवार को साल भर की सतत मेहनत के बावजूद न्यूनतम मजदूरी जितनी आय भी नहीं होती। ये सब कुछ जानते हुए भी कोई व्यक्ति गांव के साथ अपने रिश्ते को किस प्रकार पुनर्निधारित और पुनर्परिभाषित करेगा, यह काफी चुनौतीपूर्ण है। चुनौती इसलिए भी बहुत बड़ी है क्योंकि शहर की जिंदगी का बाहरी पक्ष काफी प्रभावपूर्ण है और यह पक्ष गांव की नई पीढ़ी को आकर्षित करता है।

जब भी गांव में जाता हूं तो नई पीढ़ी वो शाॅर्टकट जानना चाहती है, जिस पर चलकर वह भी शहर की चमकीली दुनिया में खुद के लिए जगह पा सके। काश, ऐसा कोई शाॅर्टकट होता और उस शाॅर्टकट का मुझे भी पता होता! जारी…..

हरियाणा: मक्‍का की बुवाई के लिए मुफ्त मिलेगा बीज, जानिए कैसे?

हरियाणा में किसानों को मक्‍का के बीज मुफ्त दिए जाएंगे। हरियाणा सरकार प्रति एकड़ 2,000 रुपये के हिसाब से अधिकतम 4 एकड़ के लिए मक्‍का के बीज मुफ्त उपलब्‍ध कराएगी।

ज्‍यादा पानी लेने वाली धान के बजाय मक्‍का की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई राज्‍य प्रयासरत हैं। हरियाणा में मक्‍का के बीज किसानोंं को मुफ्त दिए जाएंगे।

फसल विविधिकरण योजना के तहत हरियाणा में किसानों को प्रति एकड़ 2 हजार रुपये के अनुदान पर मक्‍का का संकर बीज मुहैया कराया जाएगा। यह अनुदान अधिकतम 4 एकड़ के लिए मिलेगा। इस तरह मक्‍का की बुवाई के लिए अधिकतम 8 हजार रुपये तक अनुदान मिल सकता है। पंजाब में भी मक्‍का के उन्‍नत बीजों पर 84 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी दी जा रही है।

मक्‍का के बीज पर अनुदान हासिल करने के लिए किसान हरियाणा कृषि विभाग की वेबसाइट http://agriharyana.in/ पर पंजीकरण करा सकते हैं जिसकी अंतिम तिथि 20 जून है। सब्सिडी का पैसा सीधे किसानों के खातों में पहुंचेगा। योजना का लाभ उठाने के लिए किसान अपने जिले के कृषि विकास अधिकारी या संबंधित ब्‍लॉक कृषि अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं।

गौरतलब है मक्‍का की बुवाई का उपयुक्‍त समय 20 जून से 25 जुलाई के बीच होता है। मक्का कार्बोहाइड्रेट का बहुत अच्छा स्रोत है और यह एक बहुुपयोगी फसल है। इसलिए मक्‍का का आद्यौगिक महत्‍व लगातार बढ़ता जा रहा है।

धान की सीधी रोपाई पर भी अनुदान
हरियाणा सरकार धान की सीधी रोपाई को बढ़ावा देनेे के लिए किसानों को प्रति एकड़ 3 हजार रुपये का अनुुदान देगी। यह अनुदान अधिकतम 5 एकड़ के लिए मिलेगा। धान की सीधी रोपाई से पानी, बिजली और मजदूरी की बचत होती है। इसके लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 25 जून है। राज्‍य सरकार ने 15 जून से पहले धान की रोपाई पर पूरी तरह रोक लगाई है।