अब ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान देने की योजना

देश की आबादी के तकरीबन 57 फीसदी लोग जीवनयापन के लिए कृषि पर आधारित हैं। इतनी बड़ी आबादी की कृषि पर निर्भरता के बावजूद भारतीय कृषि अब भी मोटे तौर पर बारिश के पानी पर निर्भर है। बारिश के अलावा सिंचाई के दूसरे साधन अब भी काफी सीमित हैं।

ऐसे में कृषि के लिहाज से मौसम पूर्वानुमानों की भूमिका बढ़ जाती है। इसमें भी सही मौसम पूर्वानुमान आए, यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों भारत मौसम विभाग यानी आईएमडी के अधिकारियों ने यह जानकारी दी कि विभाग इस योजना पर काम कर रहा है कि अगले साल से ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराए जाएं।

भारत में अभी 660 जिले हैं। इनमें कुल ब्लाॅकों की संख्या 6,500 है। मौसम विभाग अभी 200 ब्लाॅकों में पायलट परियोजना चला रहा है। ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराने की योजन पर काम कर रहे मौसम विभाग का अनुमान है कि इससे तकरीबन 9.5 करोड़ किसानों को लाभ मिलेगा।

अभी मौसम विभाग जिला स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है। इससे तकरीबन चार करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जिला स्तर पर किसानों को मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराने के लिए एसएमएस और एमकिसान पोर्टल का सहारा लिया जा रहा है।

मौसम विभाग ने ब्लाॅक स्तर पर पूर्वानुमान उपलब्ध कराने के लिए इंडियन काउंसिल फाॅर एग्रीकल्चर रिसर्च के साथ समझौता किया है। मौसम विभाग के अधिकारियों का दावा है कि 2018 में आईसीएआर के साथ समझौता होने के बाद से इस योजना पर तेजी से काम चल रहा है। जरूरी बुनियादी ढांचा विकसित किया जा रहा है और इस काम के लिए लोगों को नियुक्त करने और उन्हें प्रशिक्षित करने का काम चल रहा है।

मौसम विभाग के पास अभी 130 जिलों में ऐसा ढांचा है जिसके जरिए मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध करने के लिए जानकारियां जुटाई जाती हैं। विभाग की योजना यह है कि ये सुविधाएं 530 अन्य जिलों में भी विकसित कर ली जाएं। विभाग यह काम कृषि विज्ञान केंद्र के तहत ग्रामीण कृषि मौसम सेवा के जरिए करने की योजना पर काम कर रहा है।

मौसम पूर्वानुमानों के सबसे बड़ी समस्या यही है कि इनके सही होने को लेकर लोगों के मन में काफी संदेह रहता है। कई मौके ऐसे आए हैं जब मौसम पूर्वानुमान पूरी तरह गलत साबित हुए हैं। ऐसे में सिर्फ ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। मौसम विभाग को इस दिशा में में करना होगा कि ब्लाॅक स्तर पर और जिला स्तर पर उपलब्ध कराए जा रहे मौसम पूर्वानुमान अधिक से अधिक सही हों।

क्योंकि यह बात तो विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मौसम पूर्वानुमान सौ फीसदी सही नहीं हो सकते। क्योंकि पूर्वानुमानों के लिए जिन मानकों का अध्ययन किया जाता है, उनमें प्रकृति कई बार बदलाव भी करती है। लेकिन साथ ही विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अधिक से अधिक सही पूर्वानुमान सुनिश्चित करने की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

भारत में मौसम पूर्वानुमानों के साथ दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब भी किसानों में इस स्तर की जागरूकता नहीं है कि वे मौसम पूर्वानुमानों का सही ढंग से इस्तेमाल कर सकें। इसके लिए मौसम विभाग के साथ-साथ कृषि विभाग को भी कार्य करना होगा। किसानों को इसके लिए प्रशिक्षित करना होगा कि मौसम पूर्वानुमानों का वे सही इस्तेमाल कर सकें। मौसम विभाग और कृषि विभाग को किसान संगठनों और अन्य सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर किसानों को जागरूक बनाने के लिए अभियान चलाना होगा।

बिहार में बांस की खेती क्यों छोड़ रहे हैं किसान

बांस की खेती पारंपरिक तौर पर भारत में होती आई है। हालांकि, इसे वृक्ष की श्रेणी में रखे जाने से इसकी व्यावसायिक खेती को उतना बढ़ावा नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। इसलिए केंद्र सरकार ने इसे कानून में संशोधन करके वृक्ष की श्रेणी से बाहर निकालने का काम किया है।

इसके बावजूद बांस की खेती को लेकर किसानों में उत्साह का माहौल नहीं है। बिहार से यह जानकारी मिल रही है कि राज्य के जिन इलाकों में बांस की खेती होती थी, उन इलाकों के लोग अब बांस की खेती छोड़ रहे हैं।

बिहार में पारंपरिक तौर पर कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बांस की खेती होती आई है। इस क्षेत्र में बांस से बनने वाले उत्पाद भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होते आए हैं। बांस के उत्पाद इस क्षेत्र राज्य के दूसरे इलाकों में भी भेजे जाते हैं। लेकिन अब इस क्षेत्र के किसान बांस की खेती से किनारा कर रहे हैं।

इसकी कई वजहें हैं। सबसे पहली वजह तो यह बताई जा रही है कि यहां के किसानों को सरकार से बांस की खेती के लिए जिस तरह की मदद की उम्मीद थी, उस तरह की मदद इन्हें नहीं मिल पा रही है। इस क्षेत्र के किसानों का कहना है कि बांस की खेती को प्रोत्साहित करने की बात सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत तो करती है लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें सरकार की ओर कोई मदद नहीं मिल रही है।

बिहार सरकार ने इस इलाके में बांस की खेती को देखते हुए पहले यह भी कहा था कि इस क्षेत्र में बांस आधारित उद्योग स्थापित किए जाएंगे। लेकिन यह सरकारी वादा भी पूरा नहीं हो पाया। जबकि किसानों ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि अगर बांस आधारित उद्योग लगते हैं तो इससे उन्हें लाभ होगा और इस क्षेत्र में होने वाली बांस की खेती को और प्रोत्साहन मिलेगा।

एक बात यह भी चल रही थी कि इस क्षेत्र में कागज के कारखाने लगाए जाएं। क्योंकि कागज उत्पादन में लकड़ी के पल्प के साथ-साथ बांस के पल्प का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर होता है। बल्कि बांस के पल्प को कागज उत्पादन के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है। इस आधार पर यह कहा जा रहा था कि इस क्षेत्र में कागज उद्योग के लिए काफी संभावनाएं हैं। क्योंकि इस उद्योग के लिए बांस के रूप में कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में यहां उपलब्ध है। लेकिन इस क्षेत्र में कागज उद्योग भी विकसित नहीं हो पाया।

बांस की खेती से किसानों की बढ़ती दूरी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि अब बांस से बनने वाले उत्पादों की मांग में कमी आती जा रही है। पहले सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के साथ रोजमर्रा के कार्यों में भी बांस से बनने वाले उत्पादों का इस्तेमाल होता था। अब इनकी जगह प्लास्टिक के उत्पाद लेते जा रहे हैं।

बांस के उत्पाद पारंपरिक ढंग से बनते हैं। इसलिए इनमें श्रम लगता है। इस वजह से इनकी लागत अधिक होती है। जबकि प्लास्टिक उत्पादों का उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में अत्याधुनिक मशीनों के जरिए होता है। इसलिए इनका उत्पादन लागत कम होता है और बांस के उत्पादों के मुकाबले प्लास्टिक उत्पाद अपेक्षाकृत कम पैसे में लोगों को मिल जाते हैं।

बिहार के कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बांस की खेती से किसानों के दूर होने की वजह से इस क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बेरोजगारी बढ़ने से इन क्षेत्रों से दिल्ली और मुंबई जैसे औद्योगिक केंद्रों की ओर पलायन भी बढ़ सकता है। क्योंकि स्थानीय स्तर पर जब बांस की खेती में लगे किसान और मजदूर बेरोजगार होंगे तो स्वाभाविक ही है कि ये रोजगार की तलाश में शहरी केंद्रों का रुख करेंगे।

बांस की खेती से किसानों के अलग होने से इस क्षेत्र में बाढ़ से और अधिक नुकसान होने की आशंका पैदा होगी। उल्लेखनीय है कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शुमार किया जाता है और इस क्षेत्र को अमूमन हर साल ही बाढ़ का सामना करना पड़ता है। बांस की खेती होने से बाढ़ की स्थिति में मिट्टी का कटाव कम होता है और बाढ़ का पानी एक हद तक रोकने का काम भी बांस की खेती के जरिए होता है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में बांस की खेती लगातार कम होती जाएगी तो इससे इस क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति में पहले के मुकाबले और अधिक नुकसान होगा।

सूखा क्यों नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा?

लोकसभा चुनावों के चार चरण के मतदान हो गए हैं। तीन चरण के चुनाव अभी बाकी हैं। इस लिहाज से देखें तो अब भी देश के बड़े हिस्से में लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक प्रचार जोर-शोर से चल रहा है। इसमें कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं। लेकिन सूखे का मुद्दा नहीं उठ रहा है।

जबकि देश भयानक सूखे की ओर बढ़ रहा है। विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी आ रही है, उससे पता चल रहा है कि देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सूखे की स्थिति बहुत बुरी है।

इंडियास्पेंड सूखे की स्थिति के बारे में बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य सूखे से बुरी तरह से प्रभावित हैं। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण भारत के 31 जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 25 प्रतिशत ही पानी बचा हुआ है। जबकि नवंबर, 2018 में यह आंकड़ा 61 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले चार-पांच महीनों में इन जलाशयों के पानी में 36 फीसदी कमी आई।

आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के चार जिलों अनंतपुर, कुरनुल, चित्तूर और वाईएसआर कड़प्पा में बेहद भयानक सूखा है। खबरों में यह बताया जा रहा है कि यहां लगातार नौवें साल सूखा पड़ा है। 2000 से लेकर 2018 के बीच इस क्षेत्र में 15 साल ऐसे रहे हैं जब यहां सूखा पड़ा है। बताया जाता है कि सूखे की वजह से यहां के लोगों को पलायन लगातार हो रहा है। 2018 में सिर्फ सात लाख लोगों का पलायन इस क्षेत्र के गांवों से हुआ है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां सिर्फ बुजुर्ग लोग ही रह रहे हैं।

इसी तरह की खबर महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों के बारे में भी आ रही है। मराठवाड़ा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है। बीड़ जिले में तो लोग सूखे से बुरी तरह बेहाल हैं। तेलंगाना के कुछ क्षेत्र भी भयंकर सूखे की चपेट में हैं। इसके बावजूद इन राज्यों में सूखा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।

कुछ साल पहले इंडियन प्रीमियर लीग चल रहा था तो उस वक्त सूखे का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठा था। दबाव में मुंबई के मैच को कहीं और कराना पड़ा था। इस बार तो आईपीएल और लोकसभा चुनाव दोनों चल रहे हैं लेकिन सूखा कोई मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

सूखा का चुनावी मुद्दा नहीं होना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। भारत की कुल आबादी के 57 फीसदी लोग अब भी जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। कृषि पानी पर निर्भर है। ऐसे में सूखे की समस्या हर तरह से एक राष्ट्रीय समस्या है लेकिन देश के सबसे बड़े चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।

सूखे की समस्या को कोई भी दल नहीं उठा रहा है। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अगर इस मसले को नहीं उठा रही है तो समझ में आता है कि भला वह खुद अपनी नाकामी को कैसे चुनावी मुद्दा बनाए। लेकिन विपक्षी दल भी अगर सूखे की समस्या को चुनावी मुद्दा नहीं बना रहे हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है?

एक वजह यह समझ में आती है कि प्रमुख विपक्षी दलों की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वे राज्य भी कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। इसलिए इन्हें लगता है कि अगर ये सूखा को चुनावी मुद्दा बनाते हैं तो इसकी आंच इन तक भी आएगी और इन्हें भी चुनावों में नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए सभी दलों में एक तरह से यह आम सहमति दिखती है कि लोकसभा चुनाव 2019 में सूखा को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देना है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह प्रयोग पूरे देश के किसानों के लिए एक सबक है

पूर्वी उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक गांव के किसानों ने ऐसा प्रयोग किया है जो देश के दूसरे हिस्सों के किसानों के लिए एक सबक है। भदोही जिला बनारस से सटा हुआ है। भदोही जिले के बड़गांव के किसानों ने ‘गृहस्थ’ के नाम से एक ऐसा स्टार्ट अप शुरू किया है कि जो न सिर्फ किसानों से उनके उत्पाद खरीदता है बल्कि इसकी पैकिंग से लेकर आपूर्ति का काम करता है।

दरअसल, इस बदलाव के बारे में कुछ दिनों पहले हिंदुस्तान टाइम्स में एक खबर प्रकाशित हुई। इसमें यह बताया गया कि इस प्रयोग की शुरुआत कुछ महीने पहले तब हुई जब गांव की एक महिला किसान जूही सिंह ने इस दिशा में काम करना शुरू किया। उन्हें लगा कि अगर यहां के किसानों की स्थिति सुधारनी है और आसपास के ग्राहकों को खाने के लिए शुद्ध और बेहतर गुणवत्ता वाला अनाज उपलब्ध कराना है तो इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए।

उन्होंने गांव के कुछ किसानों से इस बारे में बात की। शुरुआत में उनके साथ गांव के कुछ किसान जुड़े। शुरुआत में इनकी संख्या 50 के आसपास थी। इसके बाद इन लोगों ने ‘गृहस्थ’ के नाम से एक कृषि स्टार्ट अप रजिस्टर कराया। धीरे-धीरे इनकी यह कोशिश रंग लाने लगी और आज स्थिति यह है कि इनके साथ आसपास के क्षेत्रों के तकरीबन 200 किसान जुड़ गए हैं। इसमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं।

अब सवाल उठता है कि इस स्टार्ट अप के जरिए किसानों का सशक्तिकरण कैसे किया जा रहा है। इस समूह के साथ जो किसान जुड़े हैं, वे कई तरह के अनाज और मसालों का उत्पादन करते हैं। इनमें गेहूं, चावल, मक्का, जौ, दाल, धनिया, लहसन, प्याज आदि शामिल हैं। किसान जो उत्पाद पैदा करते हैं, उसे गृहस्थ स्टार्ट अप खरीद लेता है।

इसने एक केंद्र बनाया है। इस केंद्र पर इन उत्पादों की छंटाई होती है। इसके बाद इसे पैक किया जाता है। इस केंद्र पर यह काम भी गांव की महिलाएं ही करती हैं। इसके लिए बाकायदा यहां कुछ मशीन लगाए गए हैं और इन महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया है। इससे गांव की महिला किसानों को रोजगार भी मिल रहा है और उनकी अतिरिक्त आमदनी भी होती है।

इन सबके साथ आसपास के चार जिलों में इन उत्पादों की आपूर्ति के लिए एक आॅनलाइन पोर्टल के जरिए ऑर्डर लिया जाता है। आॅर्डर मिलने के बाद ग्राहकों को इन उत्पादों की डिलिवरी की जाती है। इस काम में गांव के पुरुष लगते हैं। इस तरह से उन्हें भी कृषि के अतिरिक्त रोजगार मिला है और इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी भी हो रही है।

सबसे अच्छी बात इस प्रयोग की यह है कि किसानों को उनके उत्पाद का अच्छा दाम मिल रहा है। आम तौर पर ‘गृहस्थ’ उनके उत्पाद उस दर पर खरीदता है जो न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार भाव से अधिक होती है। इससे भी किसानों की आमदनी बढ़ रही है। फिर महिला किसानों को पैकिंग में रोजगार मिल रहा है और पुरुषों को डिलिवरी में। इसके अलावा गृहस्थ को अंत में जितना मुनाफा होता है, उसमें भी किसानों को हिस्सेदारी दी जाती है।

इस तरह से इन किसान परिवारों के लिए कृषि एक फायदे का काम हो गया है। इससे ग्राहकों को भी ये लाभ हो रहा है कि उन्हें शुद्ध और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद खाने के लिए मिल जा रहे हैं। ग्राहकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए गृहस्थ ने वेबसाइट बनाने के अलावा फेसबुक पेज और ट्विटर पेज भी बनाया है। गृहस्थ के उत्पादों की आपूर्ति भदोही के अलावा बनारस, मिर्जापुर और चंदौली में की जा रही है।

इस प्रयोग ने यह दिखाया है कि अगर किसानों की थोड़ी मदद कर दी जाए और उन्हें एक दिशा दे दी जाए तो वे खुद ही खुद को मजबूत करते हुए कृषि को एक लाभकारी कार्य बना सकते हैं। यहां के किसानों को यह मदद मुहैया कराने का काम स्काॅटलैंड के क्वीन माग्र्रेट यूनिवर्सिटी काॅलेज में पढ़ी डाॅ. दीप्ति ने किया। उन्होंने इसके रजिस्ट्रेशन से लेकर जरूरी उपकरण लगाने और प्रशिक्षण तक में यहां के किसानों की मदद की।

नीम कोटेड यूरिया पर कैसे हुआ मिलावट का लेप?

केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में खेती-किसानी के मामले में एक चीज पर काफी जोर दिया है। नीम कोटेड यूरिया! प्रधानमंत्री के तमाम भाषाणों और सरकारी दावों में नीम कोटेड यूरिया के फायदे गिनाए गए।

दरअसल, यूरिया के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। लेकिन किसानों का तो बस नाम है। यह सब्सिडी असल में मिलती है फर्टीलाइजर कंपनियों को। हर साल करीब 65-70 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी फर्टीलाइजर कंपनियों को दी जाती है। यह रकम देश के कृषि बजट से भी बड़ी है तो घपले-घोटाले भी बड़े ही होंगे। सरकारी सब्सिडी से बने यूरिया का गैर-कृषि कार्यों जैसे नकली दूध बनाने, कैमिकल बनाने आदि में डायवर्ट होना और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में तस्करी आम बात हो गई।

देश पर यह दोहरी मार थी। एक तरफ, सब्सिडी का यूरिया देश से बाहर जाने लगा। तो दूसरी तरफ, किसानों के लिए यूरिया की किल्लत होने लगी। यूरिया की तस्करी और कालाबाजारी की यह समस्या काफी पुरानी है। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही इसका तोड़ निकाल लिया। ये तोड़ था नीम कोटेड यूरिया। हालांकि,  नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हो गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने यूरिया को 100 फीसदी नीम कोटेड करने का फैसला किया। जो बड़ा कदम था।

साल 2015 में सरकार ने देश में यूरिया के संपूर्ण उत्पादन को नीम लेपित करना अनिवार्य कर दिया। आयात होने वाले यूरिया पर भी निंबोलियों के तेल यानी नीम तेल का स्प्रे करना जरूरी था। नीम के इतने ज्यादा अच्छे दिन कभी नहीं आए थे। सरकार का दावा था कि नीम कोटेड यूरिया से मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल की पैदावार बढ़ेगी। क्योंकि नीम लेपित यूरिया धीमी गति से प्रसारित होता है जिसके कारण फसलों की जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन की खुराक मिलती रहती है। नीम कोटिंग से यूरिया के औद्याेगिक इस्तेमाल और कालाबाजारी पर अंकुश लगने का दावा भी किया गया।

सरकार का मानना है कि नीम कोटिंग के जरिए यूरिया की कालाबाजारी रुकने से सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। बेशक, आइडिया अच्छा था। लागू भी 100 परसेंट हुआ। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई।

विज्ञान और पर्यावरण की जानी-मानी पत्रिका डाउन टू अर्थ ने हिसाब-किताब लगाया है कि देश में यूरिया की जितनी खपत है उसे नीम कोटेड करने के लिए जितना नीम तेल चाहिए उतना तो देश में उत्पादन ही नहीं है। जबकि सरकार का दावा है कि आजकल 100 फीसदी यूरिया नीम कोटेड है।

अगर सरकार की बात सही मानें तो सवाल उठता है कि जब देश में यूरिया के समूचे उत्पादन और आयातित यूरिया की कोटिंग के लिए पर्याप्त नीम तेल ही उपलब्ध नहीं है तो फिर नीम कोटिंग हो कैसे रही है? अब या तो यूरिया की 100 फीसदी नीम कोटिंग का सरकारी दावा गलत है या फिर नीम कोटिंग के लिए मिलावटी नीम तेल का इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार ने जब यूरिया की नीम कोटिंग का फैसला किया, ये सवाल कुछ लोगों ने तब भी उठाया था कि यूरिया की इतनी बड़ी मात्रा पर नीम स्प्रे के लिए नीम तेल कहां से आएगा? तब सिर्फ संदेह था, अब हमारे सामने डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट है। वो भी पूरी कैलकुलेशन के साथ!

https://www.downtoearth.org.in/news/governance/towards-a-bitter-end-india-s-neem-shortage-63978

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में नीम ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि भारत में यूरिया की जितनी खपत है, उसकी कोटिंग के लिए करीब 20,000 टन नीम तेल की जरूरत है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,000 टन नीम तेल की है। मतलब, जरूरत के मुकाबले मुश्किल से 15 फीसदी नीम का तेल देश में बनता है। सवाल फिर वही है। जब देश में इतना नीम तेल ही नहीं है तो फिर नीम कोटिंग कैसे हो रही है? बाकी का 85 फीसदी नीम तेल कहां से आ रहा है?

भारत में खेती के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया का इस्तेमाल होता है। देश में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 3.15 करोड़ टन है जिसमें से 76 लाख टन यूरिया आयात होता है। नीम कोटिंग से यूरिया की खपत घटने की बात कही गई थी लेकिन हाल के वर्षों में यूरिया की खपत बढ़ी है। लिहाजा आयात भी बढ़ा है।

नीम कोटिंग में मिलावट?

नीम तेल के उत्पादन और खपत में भारी अंतर से संदेह पैदा होता है कि कहीं नकली नीम तेल का इस्तेमाल तो यूरिया में नहीं हो रहा है। यह आशंका अप्रैल, 2017 में उर्वरक मंत्रालय की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन से पुख्ता होती है जिसमें कहा गया है कि कई नीम तेल सप्लायर यूरिया कंपनियों को नीम तेल की इतनी आपूर्ति कर रहे हैं जितनी उनकी उत्पादन क्षमता भी नहीं है। मंत्रालय ने नीम तेल सप्लायरों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिनडाउन टू अर्थ की रिपोर्ट का दावा है कि सरकार के इस नोटिस के बावजूद नीम तेल में मिलावट बदस्तूर जारी है।

यह हाल तब है जबकि एक टन यूरिया में सिर्फ 600 ग्राम नीम तेल स्प्रे का मानक तय किया गया है जिसे कई विशेषज्ञ बहुत कम मानते हैं। इस मात्रा को बढ़ाकर 2 किलोग्राम करने की मांग भी उठ रही है। कहा जा रहा है है कि एक टन यूरिया में 2 किलोग्राम से कम नीम तेल के स्प्रे से मिट्टी या फसलों पर कोई खास फायदा नहीं पहुंचेगा। खैर, ये कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेकिन असली सवाल नकली नीम तेल की मिलावट और सरकारी दावे की असलियत का है। नीम तेल में मिलावट के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस मिलावट को रोकने की कोई मजबूत नियामक व्यवस्था भी नहीं है।

नीम तेल आयात की तैयारी

लेकिन एक बात साफ है कि देश में नीम तेल की कमी है। जिसे दूर करने के लिए नीम तेल के आयात की सुगबुगाहट चल रही है। बहुत जल्द हम चीन या म्यांमार से नीम तेल आयात कर रहे होंगे। मतलब, चीन का विरोध करने के लिए चीनी फुलझंडी और पिचकारी के अलावा नीम तेल का भी बहिष्कार करना पड़ेगा।

उपाय क्या है?

बात ये है कि देश में जितने नीम के पेड़ हैं, उस हिसाब से नीम तेल का बाजार संगठित नहीं है। इसलिए इसे संगठित करने की जरूरत है। साथ ही नीम के पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहन देना पड़ेगा। भारत का सबसे बड़े उर्वरक निर्माता इफको ने इस दिशा में पहल की है। इफको ने देश भर में निंबोली खरीद केंद्र बनाए हैं। गुजरात और राजस्थान में कहीं जगह निंबोली संग्रह जोर पकड़ रहा है। लेकिन नीम तेल में मिलावट के के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अन्यथा,यूरिया की कालाबाजारी रोकने के चक्कर में नकली नीम तेल का कारोबार चमकने लगेगा।

किसानों की रसीद से नदारद गेहूं बोनस की रकम

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने गेहूं की खरीद पर केंद्र द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अलावा अपनी तरफ से प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। इसके बावजूद बोनस की रकम का उल्लेख सरकारी खरीद की रसीद में नहीं है। इससे किसानों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि उन्हें बोनस मिलेगा भी या नहीं।

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों के मुद्दाें को जोरशोर से उठाया था, लेकिन सरकार बदलने के बावजूद सरकारी रवैये में ज्यादा बदलाव नहीं दिख रहा है। इस बात को गेहूं पर बोनस के मामले से समझा जा सकता है। कांग्रेस ने अपने वचन-पत्र में किसानों को बोनस देने का ऐलान किया था। पिछले महीने पांच मार्च को भोपाल में हुई प्रदेश कैबिनेट की बैठक में कमलनाथ सरकार ने गेहूं पर 160 रुपये और मक्का पर 250 रुपये प्रति क्विंटल बाेनस देने को मंजूरी दी थी। 25 मार्च से शुरू होकर 24 मई तक चलने वाली गेहूं की सरकारी खरीद में किसानों को 1840 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी के साथ 160 रुपए बाेनस भी दिया जाना था।

लेकिन सरकारी खरीद केंद्रों पर किसानों द्वारा बेचे जा रहे गेहूं के बाद दी जाने वाली रसीद पर  राज्य या केंद्र सरकार के किसी बाेनस का उल्लेख नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने गेहूं बोनस को लेकर असंमजस की स्थिति बनी हुई है। क्रय सोसायटी से दी जाने वाली पावती रसीद पर केंद्र और राज्य सरकार के बोनस की जगह शून्य लिखा है। ये शून्य किसानों की नाराजगी का सबब बना रहा है।

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसान

 

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसानमध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के टोड़ी गांव के किसान धनराज सिंह गुर्जर इस बारे में बताते हैं, “राज्य सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य पर गेहूं की तुलाई पर प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। लेकिन पावती रसीद पर न तो केंद्र सरकार का कोई बाेनस है न ही राज्य सरकार का। केवल जीरो लिखा है। किसानों को गुमराह किया जा रहा है। किसानों को सोयाबीन का 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस भी अभी नहीं मिला है।”

मध्य प्रदेश के जिस राजगढ़ में किसानों को इस समस्या का सामना करना पड़ा वहां की कलेक्टर निधि निवेदिता ने इस बारे में सरकार का पक्ष रखा है। उनका कहना है कि किसानों को पूरा बोनस दिया जा रहा है। वे कहती हैं, “सॉफ्टवेयर समस्या के कारण जो प्रिंट निकल रही थी उसमें बोनस नहीं दिख पा रहा था। जो भुगतान किसानों दिया गया है, उसमें 160 रुपये बोनस जोड़कर ही भुगतान हुआ है। अब सॉफ्टवेयर की समस्या को ठीक करवा दिया गया है जिससे समस्या नहीं होगी।”

खेती-किसानी पर चर्चा के बिना गुजरता चुनाव

राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याएं उठाने के साथ-साथ सरकार बनने के बाद उन समस्याओं को दूर करने का वायदा भी करते हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हिस्सेदारी कम होने के बावजूद खेती-किसानी आज भी भारत की आबादी को प्रत्यक्ष रोजगार देती है और अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक तथा सर्विस सेक्टर को कच्चा माल व बाजार उपलब्ध कराती है। रोजगार और बाजार को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली आर्थिक गतिविधि खेती-किसानी की समस्याएं और उनके समाधान के उपाय इस बार चुनावी चर्चा से यदि गायब नही हैं तो प्रमुखता में भी नही हैं।

अगर वर्ष 2014 से तुलना करें तो तब कृषि एवं किसानों के लिए भाजपा की चिन्ता व प्रतिबद्धता आज के मुकाबले अधिक दिखाई देती थी। सार्वजनिक सभाओं में नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार पर तंज करते हुए दोहराते थे कि कांग्रेस की नीति ‘मर जवान, मर किसान’ की हैं और यदि उनकी सरकार बनती है तो वे किसानो की बहुप्रतिक्षित मांग ‘स्वामीनाथन आयोग’ की संस्तुतियों को लागू कर किसानों को उनकी लागत पर 50% लाभ देंगे, कृषि बाजार में आमूल-चूल परिवर्तन कर बिचौलियों को कृषि बाजार से बाहर करेंगे, कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाएंगे, मध्यम एवं दीर्घकालिक सिंचाई योजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कर ‘पर ड्राप-मोर क्राप’ की व्यवस्था करेंगे।

2014 के चुनावों में किसानों ने भाजपा के वायदों पर भरोसा वोट दिए और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। लेकिन खेती और किसान सरकार की प्राथमिकता में नहीं आ पाए। मोदी सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार को गेहूं पर दिए जा रहे बोनस को समाप्त करने के लिए लिखा तथा सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से बताया गया कि किसानों को लागत पर 50% लाभ देने वाली स्वामीनाथन कमेंटी की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं है।

सरकार के पहले दो वर्षों 2014-15 और 2015-16 में किसानों को सूखे का भी सामना करना पड़ा जिससे उसकी आमदनी प्रभावित हुई। लेकिन बाद के तीन वर्षों में रिकार्ड उत्पादन तथा सरकार की महंगाई नियन्त्रण की नीतियों के कारण किसानों की आमदनी में कमी आई। चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने स्वामीनाथन की रिपोर्ट के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का दावा तो किया लेकिन उससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसकी गणना में भूमि का किराया सम्मिलित नही किया गया था।

मोदी सरकार की बड़ी-बड़ी घोषणाओं जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य योजना, गन्ने का 14 दिनों में भुगतान आदि जमीन पर असफल होने के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्यों में चुनाव जीतने के लिए कृषि ऋण माफी  का वायदा करना पड़ा। विभिन्न राज्यों में आधे-अधूरे तरीके से कृषि ऋण माफी योजना लागू भी की गई।

आखिरकार तमाम संरचनात्मक सुधारों को भूलकर भाजपा ने तेलंगाना और उड़ीसा सरकार के 2 हेक्टेयर तक जोत वाले किसानों के लिए 6000 रुपये/वार्षिक की प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना लागू कर चुनाव से पहले किसानों के खाते में 2000 रुपये हस्तांतरित करने का दांव चला। जो खेती-किसानी के मोर्चे पर सरकार की नाकामी को साबित करता है।

विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा सपा-बसपा-रालोद गठबंधन ने भी किसानों से कर्ज माफी का वायदा तो किया है लेकिन यह चुनाव भी खेती-किसानी पर बिना किसी गंभीर विमर्श और कार्य योजना के बिना गुजर रहा है।

(लेखक उत्तर प्रदेश योजना के पूर्व सदस्य और कृषि से जुड़े मामलों के जानकार हैं)

 

चुनावों में कहां गायब है किसान आंदोलनों की आवाज?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यह दावा करते हुए नहीं थकती है कि उसने पिछले पांच सालों में किसानों के कल्याण के लिए काफी काम किए हैं। भारतीय जनता पार्टी की यह सरकार ये भी कहती है कि पहली बार किसानों की आय दोगुनी करने का एक लक्ष्य तय किया गया। किसानों के लिए उठाए गए कई कदमों का उल्लेख नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार करती आई है।

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले पांच सालों में पूरे देश में सबसे अधिक किसान आंदोलन हुए। ये आंदोलन किसी एक राज्य या कुछ खास राज्यों तक सीमित नहीं रहे हैं। बल्कि उन सभी राज्यों में किसान आंदोलन पिछले पांच सालों में हुए हैं, जिन राज्यों को सामान्य तौर पर कृषि प्रधान राज्य माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को आम तौर पर औद्योगिक केंद्र माना जाता है लेकिन इन राज्यों में भी किसानों ने बीते सालों में आंदोलन किए।

किसान आंदोलनों के लेकर कुछ ऐसा माहौल बना कि देश भर में काम करने वाले कई अलग-अलग किसान संगठन एक मंच पर आए। इन सभी ने मिलकर संयुक्त तौर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इन लोगों ने अपनी मांगों में एकरूपता लाई। सभी जगह के किसान आंदोलनों में उचित मूल्य, कर्ज माफी और लागत में कमी की बात समान रूप से आई।

इसके बावजूद किसान आंदोलनों की गूंज लोकसभा चुनावों में सुनाई नहीं दे रही है। इसकी वजहों के बारे में पता लगाने के लिए जब कृषि के जानकारों, इन आंदोलनों में शरीक रहे लोगों और राजनीतिक विशेषज्ञों से बात करें तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं।

सबसे पहली बात तो यह बताई जा रही है कि आजादी के बाद से अब तक जितने भी लोकसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से किसी भी चुनाव में कृषि और किसान के मुद्दे केंद्र में नहीं रहे हैं। खेती-किसानी एक मुद्दा तो रहा है लेकिन यह मूल मुद्दा कभी नहीं रहा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यह कभी ऐसा मुद्दा नहीं रहा है जिस पर वोटों का धु्रवीकरण किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसान एक वर्ग के तौर पर भारत में एकजुट नहीं रहा है। इन लोगों का कहना है कि अगर किसान को एक वर्ग मानें तो इसके अंदर कई उपवर्ग हैं। जाति का उपवर्ग है, धर्म का उपवर्ग, भाषा का उपवर्ग है और क्षेत्र का उपवर्ग है। लेकिन इन लोगों का ये कहना है कि ये उपवर्ग चुनावों में किसानों के मुख्य वर्ग बन जाते हैं और किसान वर्ग खुद उपवर्ग बनकर पीछे छूट जाता है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक किसान जब वोट देने जाता है तो उस वक्त वह बतौर किसान नहीं वोट देता है बल्कि चुनावी राजनीति में वोट देने का उसका निर्णय उसकी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से अधिक प्रभावित होती है। ऐसे में खेती-किसानी के मुद्दे उठते तो रहते हैं लेकिन चुनावों के मूल मुद्दे नहीं बन पाते।

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि किसान खुद को किसानों का एक वर्ग मानकर मतदान नहीं करता। इसलिए वे किसानी के मुद्दों को मूल मुद्दा नहीं बनाते हैं। क्योंकि अगर खेती-किसानी के मुद्दे मूल मुद्दे बन गए तो उन्हें नुकसान अधिक होगा।

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि खुद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते कि किसान एक वर्ग के तौर पर उभरे। इसकी वजह बताते हुए ये लोग कहते हैं कि देश के 57 फीसदी लोग अब भी कृषि पर जीवनयापन के लिए निर्भर हैं। अगर किसी तरह से इन 57 फीसदी लोगों का एक वर्ग बन गया और ये एक वोट बैंक की तरह वोट देने लगे तो फिर ये होगा कि किसान जैसी सरकार चाहेंगे, वैसी सरकार बनेगी। सारी नीतियां किसानों के हिसाब से बनेगी।

इसका एक असर यह भी होगा कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवार भी टूटेगी। इससे वोट बैंक की मौजूदा राजनीति को झटका लगेगा और राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।

इन लोगों का यह भी कहना है कि यह उद्योग जगत भी नहीं चाहता कि किसान एक वर्ग के तौर पर एकजुट हो जाएं। क्योंकि इन्हें लगता है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर सरकारी नीतियों को जिस तरह से वे अपने फायदे के लिए प्रभावित कर पा रहे हैं, उस तरह से वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे और किसानों के हिसाब से सारी सरकारी नीतियां बनने लगेंगी।

ऐसे में स्थिति ये दिखती है कि किसानी के सवालों को मूल चुनावी मुद्दा बनाने के पक्ष में चुनाव प्रक्रिया में अधिकांश हितधारक नहीं हैं। इसलिए हाल के सालों में किसान आंदोलनों की देशव्यापी गूंज के बावजूद लोकसभा चुनावों में इनकी धमक नहीं सुनाई दे रही है।

हरियाणा में सरसों खरीद को लेकर किसान नाराज क्यों हैं?

हरियाणा में सरसों पैदा करने वाले किसान गुस्से में हैं। पिछले कई दिनों से इन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरसों की सरकारी खरीद को लेकर हरियाणा के किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

हरियाणा में इस साल सरसों की अच्छी पैदावार हुई है। इसके बावजूद सरसों किसानों को अपनी फसल के बदले उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन किसानों को इस दर से प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये कम मिल रहे हैं।

दूसरी समस्या यह हो रही है कि किसानों की कुल पैदावार की सरकारी खरीद हरियाणा के मंडियों में नहीं हो पा रही है। सरकार ने अधिकतम खरीद की सीमा तय कर रखी है। यह सीमा प्रति एकड़ 6.5 क्विंटल की है। लेकिन हरियाणा से यह जानकारी मिल रही है कि इस साल वहां प्रति एकड़ औसतन 10 से 12 क्विंटल सरसों का उत्पादन हुआ है।

इस लिहाज से देखें तो किसानों से उनकी सरसों की कुल पैदावार को मंडियों में नहीं खरीदा जा रहा है। इसके अलावा मंडियों में एक दिन में एक किसान से 25 क्विंटल सरसों खरीदने की अधिकतम सीमा भी तय की गई है। इन दोनों वजहों से किसानों को खुले बाजार में औने-पौने दाम में सरसों बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पिछले दिनों स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव ने हरियाणा की कुछ मंडियों का दौरा करके सरसों किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया है कि किसानों से खरीदी जा रही सरसों की फसल की तौल में भी किसानों के साथ धोखा किया जा रहा है। उनका आरोप है कि हर बोरी पर किसानों की फसल लूटी जा रही है। योगेंद्र यादव ने सरकार से मांग की कि इस समस्या को दूर करने के साथ खरीद पर तय की गई अधिकतम सीमा तत्काल हटाई जानी चाहिए।

सरसों किसानों की समस्या बढ़ाने का काम खरीद एजेंसी में बदलाव की वजह से भी हुआ है। पहले हरियाणा में सरसों खरीद का काम नैफेड और हैफेड के माध्यम से किया जा रहा था। लेकिन इन एजेंसियों का खरीद लक्ष्य पूरा हो गया। जबकि मंडियों में सरसों की आवक जारी रही। इस वजह से अब सरसों खरीद का काम खाद्य एवं आपूर्ति विभाग को दिया गया है। खरीद एजेंसी में हुए इस बदलाव से हरियाणा के विभिन्न मंडियों में अव्यवस्था बनी हुई है।

एजेंसी बदलने की वजह से किसानों को नए सिरे से रजिस्ट्रेशन कराना पड़ रहा है। क्योंकि बगैर रजिस्ट्रेशन के किसानों की सरसों नहीं खरीदने का प्रावधान किया गया है। एजेंसी में बदलाव किए जाने की वजह से खरीद प्रक्रिया ठीक से चल नहीं रही है। प्रदेश में कुछ जगहों पर तो नाराज किसानों ने हंगाम भी किया। कुछ जगहों पर किसानों ने सड़क जाम भी किया।

बहादुरगढ़ की मंडी में सरसों किसानों को हंगाम करने का बाध्य होना पड़ा तब जाकर सरसों खरीद शुरू हो सकी। बहादुरगढ़ मंडी में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ही गेहूं की खरीद भी कर रहा है। इस वजह से न तो मंडी में विभाग के पर्याप्त कर्मचारी थे और न ही कोई उपयुक्त व्यवस्था बन पाई।

हरियाणा की मंडियों में सरसों की सरकारी खरीद ठीक से नहीं होने की वजह से कुछ मंडियों में सरसों से लदे ट्रालियों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। रेवाड़ी में नाराज सरसों किसानों ने सड़क जाम किए। यहां किसानों से सरसों की खरीद ही शुरू नहीं हो पा रही थी। जबकि उन्हें सरसों खरीदने से संबंधित टोकन जारी हो गया था।

सरसों किसानों को इन समस्याओं का सामना तब करना पड़ा है जब केंद्र सरकार में बैठे नीति निर्धारक तिलहन के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने और खाद्य तेलों का आयात कम करने की बात लगातार कर रहे हैं। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा सत्ता में आने के बाद तिलहन मिशन शुरू करने का वादा किया है। मार्च, 2019 में भारत ने 14.46 लाख टन खाद्य और अखाद्य तेलों का आयात किया।

एक तरफ भारी आयात है तो दूसरी तरफ देश में हो रहे उत्पादन की खरीदारी ठीक से नहीं हो रही है। ऐसे में क्या ये किसान फिर से सरसों उपजाने का निर्णय लेंगे? अगर ये फिर से सरसों नहीं उपजाते हैं या उपजाते भी हैं तो अगर सरसों की खरीद ठीक ढंग से नहीं हो पाती है तो क्या देश को तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का सपना पूरा हो पाएगा।

किसानों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के दावों में कितना दम?

देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर अपने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं। आम तौर पर यह माना जा रहा था कि दोनों पार्टियां अपने घोषणापत्र में इस बार किसानों को लेकर बड़े वादे करेंगी। ऐसा इसलिए माना जा रहा था क्योंकि पिछले दो सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े किसान आंदोलन हुए और किसानों की बुरी स्थिति बार-बार सामने आई।

उम्मीद के मुताबिक दोनों दलों ने अपने घोषणापत्र में किसानों के लिए कई वादे किए हैं। इन वादों की हकीकत क्या है, उसे जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि अगर पूरे भी हुए तो इससे किसानों की स्थिति में क्या सुधार होगा।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह किसानों को ‘कर्ज माफी’ से ‘कर्ज मुक्ति’ की राह पर ले जाएगी। इसके लिए पार्टी ने कहा है कि वह किसानों को उपज के बदले लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करेगी। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि कांग्रेस की सरकार अगर बनी तो लागत में कमी लाया जाएगा और किसानों को संस्थागत कर्ज मिले, यह सुनिश्चित किया जाएगा। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस की कर्ज मुक्ति की बात को पूरा करने के लिए पार्टी ने सांकेतिक तौर पर ही सही, एक रोडमैप बताया है। हालांकि, लाभकारी मूल्य कैसे सुनिश्चित होगा और लागत में कैसे कमी आएगी, इस पर कांग्रेस ने स्थितियों को साफ नहीं किया है।

कांग्रेस ने देश के किसानों से यह वादा भी किया है कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद उसकी सरकार हर साल अलग से ‘किसान बजट’ पेश करेगी। इसके जरिए कृषि क्षेत्र पर उसकी जरूरतों के हिसाब से विशेष जोर दिया जा सकेगा। इससे किसानों के मुद्दों पर लोगों का ध्यान तो जाएगा लेकिन अलग बजट किसान और खेती की समस्याओं का समाधान नहीं है। रेलवे के लिए आजादी से लेकर हाल तक अलग बजट पेश किया जाता था लेकिन इससे रेलवे की सेहत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। न ही अब इसका विलय आम बजट में करने से हो रहा है। इसका मतलब यह है कि अलग बजट भर कर देने से किसी समस्या के समाधान की कोई गारंटी नहीं है। असल जरूरत समस्या के समाधान को लेकर नीयत की है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया सरकार बनाने के बाद वह एक कृषि के लिए एक स्थायी आयोग बनाएगी। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय कृषि विकास एवं योजना आयोग नाम दिया है। कांग्रेस ने कहा है कि इस आयोग में किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्रियों को शामिल किया जाएगा। ये आयोग सरकार को बताएगी कि कृषि को कैसे फायदेमंद बनाया जाए। घोषणापत्र में यह कहा गया है कि इस आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि यही आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करेगा।

यह एक सांस्थानिक हस्तक्षेप होगा। अगर कांग्रेस की सरकार बनती है और अगर वह यह काम कर देती है तो इससे दीर्घकालिक तौर पर कृषि और किसानों की समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी। यह प्रस्ताव तो ऐसा है जिस पर किसी भी सरकार को अमल करना चाहिए। दरअसल, देश में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए जो उपाय हुए हैं, उनमें अधिकांश तात्कालिक ही रहे हैं। ऐसे में अगर इस आयोग को बनाने का सांस्थानिक काम होता है तो इससे किसानों का लंबे समय तक लाभ मिलेगा और इससे कृषि को जो मजबूती मिलेगी, उसका लाभ देश की अर्थव्यवस्था को होगा। ऐसे ही सीमांत किसानों के लिए एक नया आयोग बनाने का कांग्रेस का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को भी संशोधित करने की बात कही है। पार्टी ने कहा है कि अभी यह योजना किसानों की कीमत पर बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचा रही है। इस बीमा योजना के क्रियान्वयन में खामी का संकेत भाजपा के घोषणापत्र से भी मिलता है। भाजपा ने भी कहा है कि वह इस योजना को स्वैच्छिक बनाएगी। इसके बाद से कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जिन खामियों की ओर वे लगातार संकेत कर रहे थे, अब उसे खुद इस योजना को लागू करने वाली पार्टी ने मान लिया है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का जो लक्ष्य रखा है उसे पूरा करने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे। पहली बार इसकी घोषणा 2016-17 के बजट में हुई थी। लेकिन तब से लेकर हाल में भाजपा के घोषणापत्र जारी करने तक, कभी भी यह रोडमैप देश के सामने नहीं रखा गया जिस पर चलकर इस लक्ष्य को हासिल किया जाना है। इस वजह से अब तो आम लोगों को भी 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर संदेह होने लगा है।

चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार ने दो हेक्टेयर तक जमीन वाले किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत हर परिवार को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि जीतने के बाद वह इस योजना का दायरा बढ़ाकर इसे देश के सभी किसानों के लिए लागू करेगी। भाजपा लगातार कांग्रेस की प्रस्तावित ‘न्याय’ योजना पर सवाल उठा रही जिसके तहत देश के सबसे गरीब परिवारों को 72,000 सालाना की आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव है। भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि इसके लिए पैसे कहां हैं। लेकिन भाजपा खुद यह जवाब नहीं दे रही है कि पीएम-किसान के तहत हर किसान परिवार को प्रति वर्ष वह 6,000 रुपये कहां से देगी।

भाजपा ने यह घोषणा भी की है कि वह छोटे और सीमांत किसानों के लिए पेंशन की योजना लाएगी जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस पेंशन के लिए किसानों को एक निश्चित अंश दान करना होगा या फिर उन्हें कोई आर्थिक योगदान नहीं देना होगा और यह काम खुद सरकार करेगी। क्योंकि इस सरकार ने कई पेंशन योजनाएं ऐसी लाई हैं जिनमें लाभार्थियों को भी अंशदान करना है। इसलिए किसानों के लिए प्रस्तावित पेंशन योजना पर भााजपा और स्पष्टता रखती तो ज्यादा ठीक रहता।

भाजपा ने घोषणापत्र में किसानों से यह वादा भी किया है कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि किफायती दरों पर बेहतर बीज किसानों को समय पर उपलब्ध हो सकें और घर के पास ही उनकी जांच की सुविधा उपलब्ध हो। लेकिन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के बढ़ते दबदबे के बीच यह काम कैसे किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टता नहीं है।

तिलहन के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के मकसद से भाजपा ने नए तिलहन मिशन की शुरुआत करने का वादा भी किया है। इसे लागू करने का रोडमैप तो नहीं बताया गया है लेकिन अगर यह मिशन ठीक से लागू हो तो इससे देश का काफी भला होगा। क्योंकि खाद्य तेल के मामले में आयात पर निर्भरता की वजह से देश को कई स्तर पर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसके अलावा भाजपा ने पूरे देश में कृषि भंडारण की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए यह वादा किया है कि वह पूरे देश में वेयरहाउस का नेटवर्क विकसित करेगी। भाजपा ने इस संदर्भ में अपने संकल्प पत्र में कहा है, ‘किसानों को अपनी उपज का भंडारण अपने गांव के निकट करने तथा उचित समय पर उसे लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए सक्षम करने के उद्देश्य से हम कृषि उत्पादों के लिए नई ग्राम भंडारण योजना आरंभ करेंगे। हम कृषि उत्पादों की भंडारण रसीद के आधार पर किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराएंगे।’ अगर सही ढंग से इसे लागू कर दिया जाए तो यह भी कृषि में दीर्घकालिक बदलाव लाने वाला कदम साबित होगा। क्योंकि गांवों के स्तर पर भंडारण एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है।

देखा जाए तो देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में किसानों के लिए कई उपयोगी घोषणाएं हैं। लेकिन अधिकांश घोषणाओं के साथ यह नहीं बताया गया है कि इसे कैसे पूरा किया जाएगा। इस वजह से इन चुनावी घोषणाओं पर किसानों को बहुत भरोसा नहीं हो रहा है। अच्छा तो यह होता कि हर घोषणा के साथ ये पार्टियां उसे लागू करने की कार्ययोजना भी बतातीं। इससे लोगों में इन बातों को लेकर विश्वास भी आता और फिर इस आधार पर लोग उन्हें वोट भी देते।