नीतिगत

सूखा क्यों नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा?



देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की चपेट में है लेकिन फिर भी यह लोकसभा चुनावों में मुद्दा नहीं है

लोकसभा चुनावों के चार चरण के मतदान हो गए हैं। तीन चरण के चुनाव अभी बाकी हैं। इस लिहाज से देखें तो अब भी देश के बड़े हिस्से में लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक प्रचार जोर-शोर से चल रहा है। इसमें कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं। लेकिन सूखे का मुद्दा नहीं उठ रहा है।

जबकि देश भयानक सूखे की ओर बढ़ रहा है। विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी आ रही है, उससे पता चल रहा है कि देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सूखे की स्थिति बहुत बुरी है।

इंडियास्पेंड सूखे की स्थिति के बारे में बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य सूखे से बुरी तरह से प्रभावित हैं। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण भारत के 31 जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 25 प्रतिशत ही पानी बचा हुआ है। जबकि नवंबर, 2018 में यह आंकड़ा 61 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले चार-पांच महीनों में इन जलाशयों के पानी में 36 फीसदी कमी आई।

आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के चार जिलों अनंतपुर, कुरनुल, चित्तूर और वाईएसआर कड़प्पा में बेहद भयानक सूखा है। खबरों में यह बताया जा रहा है कि यहां लगातार नौवें साल सूखा पड़ा है। 2000 से लेकर 2018 के बीच इस क्षेत्र में 15 साल ऐसे रहे हैं जब यहां सूखा पड़ा है। बताया जाता है कि सूखे की वजह से यहां के लोगों को पलायन लगातार हो रहा है। 2018 में सिर्फ सात लाख लोगों का पलायन इस क्षेत्र के गांवों से हुआ है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां सिर्फ बुजुर्ग लोग ही रह रहे हैं।

इसी तरह की खबर महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों के बारे में भी आ रही है। मराठवाड़ा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है। बीड़ जिले में तो लोग सूखे से बुरी तरह बेहाल हैं। तेलंगाना के कुछ क्षेत्र भी भयंकर सूखे की चपेट में हैं। इसके बावजूद इन राज्यों में सूखा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।

कुछ साल पहले इंडियन प्रीमियर लीग चल रहा था तो उस वक्त सूखे का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठा था। दबाव में मुंबई के मैच को कहीं और कराना पड़ा था। इस बार तो आईपीएल और लोकसभा चुनाव दोनों चल रहे हैं लेकिन सूखा कोई मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

सूखा का चुनावी मुद्दा नहीं होना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। भारत की कुल आबादी के 57 फीसदी लोग अब भी जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। कृषि पानी पर निर्भर है। ऐसे में सूखे की समस्या हर तरह से एक राष्ट्रीय समस्या है लेकिन देश के सबसे बड़े चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।

सूखे की समस्या को कोई भी दल नहीं उठा रहा है। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अगर इस मसले को नहीं उठा रही है तो समझ में आता है कि भला वह खुद अपनी नाकामी को कैसे चुनावी मुद्दा बनाए। लेकिन विपक्षी दल भी अगर सूखे की समस्या को चुनावी मुद्दा नहीं बना रहे हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है?

एक वजह यह समझ में आती है कि प्रमुख विपक्षी दलों की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वे राज्य भी कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। इसलिए इन्हें लगता है कि अगर ये सूखा को चुनावी मुद्दा बनाते हैं तो इसकी आंच इन तक भी आएगी और इन्हें भी चुनावों में नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए सभी दलों में एक तरह से यह आम सहमति दिखती है कि लोकसभा चुनाव 2019 में सूखा को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देना है।

  • असलीभारत टीम