संवाद

हमें जीएम सरसों की जरूरत ही क्‍या है?



जेनेटिक तौर पर संवर्धित (जीएम) सरसों को व्‍यवसायिक मंजूरी देने का मामला टालेे जाने के 13 साल बाद यह जिन्‍न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। इस बार जीएम सरसों सरकारी भेष में व्‍यवसायिक खेती की मंंजूरी के लिए आई है।

जेनेटिक तौर पर संवर्धित (जीएम) सरसों को व्‍यवसायिक मंजूरी देने का मामला टालेे जाने के 13 साल बाद यह जिन्‍न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। इस बार जीएम सरसों सरकारी भेष में व्‍यवसायिक खेती की मंंजूरी के लिए आई है। इस पर टैक्‍सपेयर का 70 करोड़ रुपया खर्च हुआ है, जिस पैसे से बहुत से स्‍कूल खुल सकते थे।

इस बार भी वही दावे हैं, वही भाषा है और हमारी आशंकाएं भी वही हैं। 13 साल पहले एग्रो-कैमिकल क्षेत्र की दिग्गज बहुराष्‍ट्रीय कंपनी बायर की सहायक प्रो-एग्रो सीड्स इंडिया लिमिटेड ने दावा किया था कि उसकी जीएम सरसों वैरायटी में चार विदेशी जीन हैं जो सरसों की उत्‍पादकता 20-25 फीसदी तक बढ़ा सकतेे हैंं और तेल की गुणवत्‍ता भी सुधरेगी। नई जीएम सरसों को दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्‍लांट्स ने विकसित किया है जिसमें तीन विदेशी जीन – बार, बारनेस और बारस्‍टार हैं। इस बार भी जीएम सरसों को लेकर वैसेे ही दावे किए जा रहे हैं जैसेे प्रो-एग्रो सीड्स ने किये थे। जीएम सरसों के ये दोनों पैरोकार, पहले प्रो-एग्रो सीड्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अब दिल्ली विश्वविद्यालय, हर्बिसाइड रिज़िस्टेेन्स यानी खरपतवार प्रतिरोध होने से इंकार करतेे हैं जबकि दोनों ने इसके लिए ज्ञात जीन का इस्‍तेमाल किया है।

जीएम समर्थन और तथ्‍यों से खिलवाड़

भारत हर साल करीब 60 हजार करोड़ रुपये के खाद्य तेलों का आयात करता है इसलिए तत्‍काल सरसों का उत्‍पादन बढ़ाना जरूरी है। खाद्य तेेलों का उत्‍पादन बढ़ेने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी। इस विषय पर कई परिचर्चाओं और सर्वजनिक बहसों में मैंने दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और नई जीएम सरसों विकसित करने वालों में अग्रणी डॉ. दीपक पेंटल को बार-बार जोर देते हुए सुना कि खाद्य तेलों के आयात पर खर्च हो रही विदेशी मुद्रा में कटौती की आवश्‍यकता हैै और भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह कितनी बड़ी बचत होगी! यह बिल्‍कुल वही दावा है जो 13 साल पहले प्रो-एग्रो की जीएम सरसों के पैरोकार किया करते थे। उस समय खाद्य तेलों का आयात घरेलू खपत का करीब 50 फीसदी था, जिस पर 12 हजार करोड़ रुपयेे खर्च होते थे।

कोई भी पढ़ा-लिखा व्‍यक्ति इस बात से सहमत होगा कि खाद्य तेलों के आयात पर होने वाले भारी खर्च में कमी आनी चाहिए। लेकिन जीएम लॉबी ने बड़ी चतुराई से इस तर्क का इस्‍तेमाल यह आभास दिलाने में किया है जैसे सरसों के उत्‍पादन में कमी की वजह से ही खाद्य तेलों का इतना अधिक आयात करना पड़ता है। जबकि असलियत में ऐसा नहीं है। खाद्य तेल के इतनी अधिक मात्रा में आयात के पीछे कई और भी कारण हैं। मिसाल के तौर पर, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी देश के बढ़ते आयात को लेकर चिंतित रहते थे। वह चालू खाते के घाटे को कम करने को बेताब थे। उस समय ईंधन, उर्वरक और खाद्य तेल का सबसे ज्‍यादा आयात होता था। खाद्य तेलों का सालाना आयात 1500 से 3000 हजार करोड़ रुपए के आसपास रहता था। यह बात समझते हुए कि भारत में घरेलू तिलहन उत्‍पादन बढ़ाने की क्षमता है और खाद्य तेलों का आयात कम किया जा सकता है उन्‍होंने 1985 में तिलहन में एक प्रौद्योगिकी मिशन आरंभ किया।

दस साल से भी कम समय यानी 1986 से 1993 के बीच देश में तिलहन उत्पादन दोगुना हो गया जो उल्लेखनीय वृद्धि है। खाद्य तेल आयात करने वाला भारत इस मामले लगभग आत्मनिर्भर हो गया। खाद्य तेल में देश की 97 प्रतिशत आत्मनिर्भरता थी और मात्र 3 फीसदी तेल आयात करने की जरूरत रह गई थी। लेकिन कुछ साल बाद भारत ने जानबूझकर आयात शुल्क घटाना शुरू किया और सस्ते व सब्सिडी वाले खाद्य तेल के बाजार में आने का रास्‍ता खोल दिया। जैसे-जैसे खाद्य तेल का आयात बढ़ा घरेलू ऑयल प्रोसेसिंग उद्योग बंद होते गए।

दरअसल खाद्य तेलों के आयात पर खर्च बढ़ने का कारण तिलहन के उत्पादन में गिरावट नहीं है। बल्कि यह सब आयात नीति की खामियों का नतीजा है। विदेशी खाद्य तेलों पर आयात शुल्क को लगभग शून्य़ कर दिया गया जबकि यह 70 फीसदी या इससे भी ज्‍यादा होना चाहिए था। (डब्ल्यूटीओ भारत को खाद्य तेलों पर आयात शुल्क अधिकतम 300 प्रतिशत करने की अनुमति देता है)। तिलहन का सही दाम और बाजार मुहैया कराया जाता तो हमारे किसान तेल की सारी कमी दूर कर देते।

दावा किया जा रहा है कि जीएम सरसों से उत्पादन में 20 से 25 फीसदी तक बढ़ोतरी होगी। यह एकदम बेतुुकी बात है। कहना पड़ेगा कि इस दावे के पीछे स्‍वार्थ निहित हैं। पहली बात तो यह है कि ऐसा कोई ज्ञात जीन (या जीन समूह) नहीं है जो उत्पादकता बढ़ा सकता है। दूसरी बात, कोई भी जीएम वैरायटी उतनी ही अच्छी होती है जितनी संकर किस्म जिसमें विदेशी जीन डाला जाता है। यदि कोई जीन संकरण की प्रक्रिया को सरल करता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह उत्पादकता बढ़ा देगा।

पिछले 13 वर्षों में मैंने उपलब्ध सरसों के तेल की गुणवत्ता से कोई शिकायत नहीं सुनी है। हमारे देश में पारंपरिक रूप से सरसों का इस्तेमाल भोजन के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों को सरसों का साग के रूप में पकाया जाता है। इसलिए सरसों को केवल खाद्य तेल के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए। मैं कभी-कभी सरसों तेल का उपयोग कान और नाक के रोगों के उपचार और शरीर की मालिश के लिए भी करता हूं। इसके अलावा सरसों के तेल का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है। इसलिए बीटी बैंगन पर रोक लगाते हुए 2010 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा व्‍यक्‍त की गई चिंताओं और जीएम फसलों पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट व सुप्रीम कोर्ट की तकनीकी समिति की सिफारिशों का पूरी तरह पालन करना आवश्यरक है।

मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा जीएम फसलों पर रोक के समय पेश की गई 19 पेजों की रिपोर्ट को नतीजों को दरकिनार क्यों कर रही है? क्या जीएम इंडस्‍ट्री इतनी ताकतवर है कि जीईएसी एक पूर्व मंत्री के नेतृत्व में आरंभ हुई एक वैज्ञानिक बहस को नजरअंदाज कर देना चाहती है? जीएम सरसों का कोई प्रत्‍यक्ष लाभ न होने के बावजूद स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की ऐसी अनदेखी?

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(देविंदर शर्मा कृषि और खाद्य नीति से जुड़े मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ हैं।)

यहां प्रस्‍तुत लेख मूलत: biospectrum पत्रिका में प्रकाशित हुआ था जो यहां पढ़ा जा सकता है http://www.biospectrumindia.com/biospecindia/views/223161/why-india-gm-mustard

  • देविंदर शर्मा