संवाद

गांव को याद करते गांव के अजनबी


By Brandvenkatr – CC BY-SA 3.0, https://en.wikipedia.org/w/index.php?curid=41005233

रोजी रोटी की तलाश में गांव से विस्थापित होकर शहर में आए हम जैसे लोग अक्सर गांव के साथ अपने रिश्ते को वक्त-बेवक्त परिभाषित करने की कोशिश करते रहते हैं। इस कोशिश में अक्सर निराशा हाथ लगती है।

ये कड़वा सच है कि हम जैसे लोगों की पीढ़ी न तो शहरी है और न ही अब गांव की रह गई है। शहर में होते वक्त दिमाग में गांव होता है और गांव पहुंचने पर ऐसा अजनबीपन घेर लेता है जिसकी कोई काट दिखाई नहीं पड़ती। गांव छोड़ते वक्त कोई भी किशोर या युवा पीछे मुड़कर देखता रहता है। उसे लगता है कि उसका गांव, उसकी धरती उसे पुकार रही है। यह पुकार बरसों-बरस तक सुनाई देती है। शुरु के बरसों में लगातार गांव आना-जाना बना रहता है, लेकिन बीतता समय इस बात की ज्यादा अनुमति नहीं देता कि आप बार-बार गांव जाएं। धीरे-धीरे रिश्ता पुराना पड़ने लगता है और हम गांव के किस्सों के साथ शहर में जीने लगते हैं।

गांव की दहलीज पर दस्तक देने का सिलसिला होली-दिवाली या शादी-ब्याह तक सीमित रह जाता है। और जब किसी दिन जोड़ लगाने बैठते हैं तो पता चलता है कि गांव छोड़े तो 20, 25 या 30 साल हो गए हैं। फिर किसी दिन गांव जाते हैं तो पाते हैं कि अब उन युवाओं की संख्या बढ़ रही जो आपको सीधे तौर पर नहीं पहचानते क्योंकि जब गांव छोड़ा था तो उनमें से कई का तो जन्म भी नहीं हुआ था और कुछ बच्चे ही थे। जबकि, अब वे निर्णायक स्थिति में हैं और जो परिचय हम जैसों के साथ नत्थी थे अब वे बुजुर्ग हो गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में शहर को लगातार नकारने और गांव को छाती से चिपटाए रखने का सिलसिला चलता रहता है। कुल मिलाकर दिमाग में एक गुंझल मौजूद रहती है कि आप का जुड़ाव किस जगह से है! जहां पर रोटी खा-कमा रहे हैं, वो बेगाना लगता है और जिससे भावात्मक रिश्ता है, वहां का होने की पहचान या तो खत्म हो गई है या फिर बेहद सिकुड़ गई हैै।

जिन लोगों के साथ मैंने प्राइमरी और हाईस्कूल स्तर की पढ़ाई की, उनमें से ज्यादातर अब भी गांव में हैं। खेती करते हैं या फिर बड़े किसानों के साथ मजदूरी करते हैं। इनमें मेरे कुनबे के लोग भी हैं, पड़ोसी भी हैं और वे लोग भी है जिन्हें मैं अपने मां-पिता के निकटतम दोस्तों-परिचितों में शामिल करता हूं। ऐसा भी नहीं है कि गांव ने पूरी तरह मुझे या मेरे जैसे लोगों को नकार दिया हो, वहां स्वीकार्यता तो है, लेकिन उसका स्तर बदल गया है। एक ऐसे सम्मान का दर्जा मिल जाता है, जिसे परिभाषिक करना प्रायः मुश्किल होता है। जिनके साथ बचपन में यारी-दोस्ती का नाता रहा है, उनके बच्चे अब बड़े हो गए हैं। ज्यादातर के सामने रोजगार का संकट है। खेती की जमीन सिकुड़ गई है। बड़े परिवारों के बीच जमीन इस तरह बंटी है कि दो पीढ़ी पहले जिस परिवार के पास 200-250 बीघा जमीन थी, अब तीसरी पीढ़ी के लोगों के पास 10-15 बीघा रह गई है। इस जमीन के भरोसे कैसे नई पीढ़ी जिंदा रहेगी? इस सवाल से मेरे वे दोस्त जूझते हैं जो गांव में रह गए हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि किसी भी तरह एक बच्चे को शहर में नौकरी मिल जाए। उनमें से ज्यादातर का जोर सरकारी नौकरी पर है। वे नौकरी के स्तर की बात नहीं करते, चपरासी, चैकीदार, बेलदार, डेजीवेजिज……………कुछ भी हो, बस सरकारी नौकरी मिल जाए।

न वे जानते, न समझते कि अब सरकारी दफ्तरों में चपरासियों की भर्ती बंद है। उन्हें यही लगता है कि हम जैसे लोग भी रिश्वत के आदी हो गए हैं। इसलिए वे धीरे-धीरे पैसों की बात करते हैं। फिर जिंदगी भर की जमा पूंजी को सामने रखकर नौकरी दिलाने के लिए गुहार लगाते हैं। क्या जवाब दिया जाए ऐसे हालात में ? कोई जवाब बनता ही नहीं! बस, यही कहना पड़ता है कि, मैं देखता हूं, जो भी हो सकेगा पैसों के बिना ही होगा। एक बार तो मामला टल जाता है, लेकिन अगली मुलाकात में फिर वही सवाल, वही गुहार! अंततः रिश्ते सिमट जाते हैं, बचपन की दोस्ती संदेह में बदल जाती है। दुआ-सलाम घटती जाती है। एक दूरी और दुराव जैसे हालात बन जाते हैं।

वक्त के साथ आप अपने गांव में ‘अजनबी’ हो जाते हैं, खुद को सैलानी की तरह पाते हैं। रिश्तों में ठंडापन पसर जाता है। फिर आप चाहें या न चाहें, आपको गांव बिसरा देना पड़ता है। मन के अनंत कोनों में पछतावा विराट आकार लेता रहता है। जिन दुश्वारियों से खुद निकलकर आए हैं, वे ही तमाम दुश्वारियां लोगों को घेरे हुए हैं। उनकी जिंदगी को मुश्किल बना रही हैं, लेकिन आपके पास सीधे तौर पर कोई समाधान नहीं होता। आप केवल सुन सकते हैं, कोई सैद्धांतिक रास्ता बता सकते हैं, लेकिन धरातल पर कुछ कर पाना उतना आसान नहीं होता, जितना कि कई बार लगता है। कभी-कभी उपदेश दे सकते हैं कि बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दो, जिले के सरकारी अस्पताल में मां का ईलाज करा लो, बेटी की शादी में ज्यादा दहेज मत देना, बैंक से बेमतलब कर्ज मत लेना…………………पर, ये उपदेश किसी काम नहीं आते।

गांव के लोग सच्चाई को ज्यादा गहरे तक जानते-समझते हैं, उन्होंने सिस्टम की ज्यादा मार झेली हुई है, उन्हें किसी उपदेश और दिलासा पर यकीन नहीं होता। उन्हें ज्यादातर बातें झूठी लगने लगती हैं, उनका विश्वास उठने लगता है और इस उठते हुए विश्वास की एक वजह हम जैसे लोग भी होते हैं। जारी…………….

  • डॉ. सुशील उपाध्‍याय