संवाद

गायब मुद्दे: अपने एजेंडे पर भी वोट नहीं मांग पाया विपक्ष


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आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर, जब यह प्रधानमंत्री से पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण सवाल बन गया हो तो फिर देश की प्रसिद्ध महिला कार्यकर्ताओं द्वारा पूछे गए 56 सवालों को कौन पूछेगा?

चुनाव का  पांचवा चरण खत्म हो गया, विद्वान मित्र चिंतित हैं कि देश की अगले 5 वर्ष में क्या दिशा-दशा होगी? चुनाव लड़ रही पार्टियां (किसी एक गठबंधन को तो आना ही है), अगर सत्ता में आई तो उनका किसानों के लिए क्या एजेंडा होगा? वो शिक्षा के क्षेत्र में क्या पहल करेंगी? स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण, पेयजल, शहरी नीति, ग्रामीण नीति, विदेश नीति और आर्थिक नीति  क्या होगी? आखिर राजनीतिक दल क्या कहकर वोट मांग रहे हैं? अगर एक सामान्य नागरिक अपने सूझबूझ से मतदान करना चाहे तो किसे वोट दे?

ये प्रश्न पूरे चुनावी संवाद में अनुत्तरित रहे हैं, और विद्वान मित्र परेशान।

हालांकि, विद्वानों के परेशान होने का कोई खास कारण नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र और भीड़तंत्र में कोई विशेष फर्क नहीं होता। भले ही आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्री हों, वैज्ञानिक हों, प्रोफेसर हों या दिन भर शराब के नशे में धुत्त अनपढ़ और कामचोर हो, वोट की कीमत तो सबकी बराबर ही है।

आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर, जब यह प्रधानमंत्री जी से पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण सवाल बन गया हो तो फिर देश की प्रसिद्ध महिला कार्यकर्ताओं द्वारा पूछे गए 56 सवालों (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला नीति, महिला आरक्षण, किसान आत्महत्या, कृषि नीति) को कौन पूछेगा?  अगर सिर्फ दिल्ली की सात सीटों के बारे में ही बात करें तो एक तरफ आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा,  आतिशी जैसे विद्वान नौजवानों को टिकट दिया है तो वहीँ एक ऐसा व्यक्ति भी चुनावी मैदान में है 1971 की भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश बनने का पता ही नहीं है। क्योंकि तब वह बहुत छोटा था। ठीक से कुछ याद नहीं है!

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विदेश नीति और अर्थव्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री की सोच और नजरिये से ज्यादा खुद उनकी शैक्षिक योग्यता चर्चा का विषय बनी हुई है। इस तरह पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हर चुनाव में शैक्षिक योग्यता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हट जाती हैं। एक अन्य फिल्म स्टार और चुनावी उम्मीदवार की 2014 से 2019 के पांच वर्षो में उम्र तो 7 साल बढ़ गई लेकिन शैक्षिक योग्यता बीए से घटकर इंटर पास हो गई है। ऐसे माहौल में मुद्दों पर क्या खाक चर्चा होगी! मजेदार बात यह है कि ये सभी लोग प्रमुख राजनैतिक दल के लोग हैं और शायद चुनाव जीत भी जाएं क्योंकि इनमें से कोई गाता अच्छा है तो कोई एक्टिंग अच्छी करता है और कोई बड़ा खिलाड़ी है।

शायद जनता भी यही चाहती है इसलिए तो डॉक्टर मनमोहन सिंह जैसे अंतरराष्ट्रीय छवि के अर्थशास्त्री दक्षिणी दिल्ली जैसी पढ़े-लिखे लोगों वाली लोकसभा सीट से चुनाव हार जाते हैं। स्वर्गीय नरसिम्हा राव, जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी और मुल्क को आर्थिक संकट से उबारा  वे आर्थिक उदारीकरण के फायदे गिनाते हुए चुनावी राजनीति में कूदे और इतिहास हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी जो अपनी वाकपटुता, ईमानदारी और स्वच्छ छवि के लिए जाने जाते थे, इंडिया शाइनिंग के बावजूद फीके पड़ गए। तब सोशल मीडिया भी नहीं था, लेकिन देश तो यही था।

ध्यान से देखा जाय तो 21वीं के पहले 19 वर्षों में देश में  कोई बड़ा राजनैतिक आंदोलन नहीं हुआ है। चुनावी रैलियों के अलावा किसी बड़े मुद्दे पर राजनैतिक दल देश को एकजुट करने या दिशा देने में नाकाम रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं के नेतृत्व में विरोध-प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे किसानों को राजधानी में घुसने से रोका गया और लाठीचार्ज कर तितर-बितर कर दिया गया। तमिलनाडु के किसान अपने मुद्दे उठाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। शिक्षामित्रों और बेरोजगारों के पुलिस से पिटने पर अब किसी को फर्क नहीं पड़ता। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी साल भर संघर्षरत रहती हैं। सरकारी कर्मचारी और पूर्व सैनिक भी अपनी मांगों को लेकर हर वक्त सरकार से सींग लड़ाये रहते हैं। ताज्जुब की बात है कि चुनाव के वक्त से सारे मुद्दे सिरे से गायब हैं। या कहना चाहिए गायब कर दिए गए हैं।

मुद्दों की इन गुमशुदगी का एक बड़ा कारण है सत्ताधारी भाजपा की तनखैया और अवैतनिक ट्रोल आर्मी जो व्हाट्सअप विश्वविद्यालय से ज्ञान पाते ही किसी का भी मुंह काला कर सकती है। किसी पर जूता फेंक सकती है। इनके डर से ज्यादातर विद्वान और समझदार लोगों ने अपने मुंह पर ताला लगा लिया है।  यह ट्रोल आर्मी एक फौजी को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए तीन दिन के अंदर उसे देशद्रोही, विदेशी जासूस, अय्याश और  आतंकवाद की  आरोपी को राष्ट्रभक्त घोषित कर सकती है। शहीद पुलिस अफसर स्वर्गीय हेमंत करकरे की शहादत को बदनाम करना इनके लिए चुटकी बजाने जितना आसान काम है।

यह सब एक सोची-समझी चुनावी रणनीति के तहत किया गया है। धर्म, जाति और क्षेत्रीय संकीर्णताओं में बंटे भारतीय समाज के मनोविज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया गया। प्रधानमंत्री के भाषणों में तमाम गैर-जरूरी और हल्की बातों (राजीव गांधी भ्रष्टाचारी नंबर वन बनकर मरा, कांग्रेस मुझे मरवाना चाहती है, मैं भिक्षा मांगता था, मेरी मां दूसरे के घर वर्तन धोती थी, चेतक घोड़े की मां गुजराती थी) को शुमार किया। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों को दूर से ही नमस्ते कर दी।

पिछले पांच वर्ष में तमाम योजनाओं, परियोजनाओं को गेम चेंजर कहा जा रहा था। जीएसटी, नोटबंदी, तीन तलाक, विदेश नीति, एफडीआई और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे गेम चेंजर मुद्दे भी इस चुनाव में गुम हैं।

ऐसा भी नहीं है कि आम जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को दफन करने का काम सिर्फ भाजपा ने किया है। कांग्रेस सहित लगभग सभी क्षेत्रीय दल सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, अकाली दल मुद्दाविहीन चुनाव ही लड़ रहे हैं।  चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियां जो किसानों की लड़ाई लड़ने का दावा करती हैं, वे भी किसानों के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन छेड़ने में नाकाम रही हैं। कैराना उपचुनाव में जयंत चौधरी ने जरूर जिन्ना नहीं गन्ना का नारा दिया था जो कारगर भी रहा लेकिन लोकसभा चुनाव में गन्ना किसानों के भुगतान का मुद्दा ज्यादा नहीं उठ पाया। मुद्दों के इस नैरेटिव को बनाने, मिटाने में मुख्यधारा के मीडिया की बड़ी भूमिका है। भाजपा के पक्ष में मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी इस भूमिका को पूरी तरह सरेंडर कर दिया।

आज कृषि और किसान एक बड़े संकट से गुजर रहे हैं। लागत बढ़ रही है, आमदनी घट रही है, नई पीढ़ी खेती किसानी से दूर भाग रही है, ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की मार अलग है। लेकिन देश की तकरीबन आधी आबादी की रोजी-रोटी का सहारा खेती और किसान चुनावी चर्चा से गायब हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में कई अहम मुद्दों को जगह दी और कहा है कि कृषि पर अलग से बजट लाएंगे, लेकिन घोषणा-पत्र की ऐसी ज्यादातर बातों पर कांग्रेस वोट मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। घोषणा पत्र में लिखे अपने वायदों पर भी कांग्रेस वोट मांगने से कतरा रही है।

राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर की अनेक रिपोर्ट बता रही है कि भारत के शहरों की गिनती दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में होती है। शुद्ध पेयजल तो अब धीरे-धीरे लग्जरी बनता जा रहा है। यमुना, गंगा  और हिंडन  सहित अनेक छोटी बड़ी नदियां नाले में परिवर्तित हो चुकी  हैं लेकिन इस पर भी चुनाव में कोई चर्चा नहीं है, उल्टे मथुरा की वर्तमान सांसद शुद्ध पेयजल और शुद्ध हवा की मशीनों के प्रचार में लीन हैं। नदियों को मां का दर्जा देने वाले समाज की संवेदनाएं इन्हें गंदा नाला बनते देख कतई आहत नहीं होती हैं।

(लेखक समाजशास्त्री हैं और कांग्रेस का घोषणा-पत्र बनाने वाली टीम में शामिल रहे हैं) 

 

  • प्रेम बहुखंडी