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मौसम की मार से कैसे बचाएंगे सरकार के गोलमोल पूर्वानुमान?


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मौसम विभाग के अनुमान इतने व्यापक और गोलमोल हैं कि अगर कश्मीर से कन्याकुमारी तक कहीं भी बारिश हो जाए या ना भी हो तब भी अनुमान सही साबित होगा।

पिछले तीन-चार दिनों के दौरान राजस्‍थान, गुजरात और मध्‍य प्रदेश समेत देश के कई इलाकों में बेमौसम बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि से कम से कम 57 लोगों की जान चली गई। मध्‍य प्रदेश में 22, राजस्‍थान में 25 और गुजरात में 10 लोगों के मारे जाने की खबर है। तैयार फसलों पर मौसम की मार कहर बनकर टूटी है। किसानों की तबाही और मंडियों  में भीगते अनाज की दिल दुखाने वाली तस्‍वीरें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 21वी सदी में किसानों को मौसम की मार से बचाने का कोई उपाय नहीं है?

मौसम अक्सर किसान का ऐसे ही इम्तिहान लेता है। लेकिन जिस दौर में सरकार अंतरिक्ष में सर्जिकल स्ट्राइक की वाहवाही लूट रही है, क्या मौसम का सही पूर्वानुमान लोगों तक नहीं पहुंचना चाहिए?

फिलहाल किस तरह के मौसम पूर्वानुमान लोगों तक पहुंच रहे हैं, जरा गौर कीजिए

मौसम विभाग ने अगले पांच दिनों यानी 18 अप्रैल से 22 अप्रैल के लिए देश के कई हिस्सों में बारिश, आंधी, गरज-चमक और ओलावृष्टि की चेतावनी जारी की है।

18 अप्रैल के लिए जारी चेतावनी में कहा गया है कि तमिलनाडु, रायलसीमा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, केरल, दक्षिणी कर्नाटक, तटीय आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और त्रिपुरा के अलग-अलग इलाकों में आंधी-तूफान से साथ बिजली गरज सकती है।

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इस अनुमान से कोई क्या समझेगा? तकरीबन आधे भारत के अलग-अलग इलाकों में, कहीं-कहीं आंधी-तूफान, गरज-चमक की चेतावनी दी गई है। इसी तरह 22 अप्रैल को राजस्थान के कुछ इलाकों में हीट वेव यानी लू चलने की चेतावनी है। इन कुछ इलाकों में कौन-कौन से इलाके आते हैं, मौसम विभाग ही जाने!

करीब 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले राजस्थान के कुछ इलाकों में लू चलने के अनुमान से किसी को क्या समझ आएगा? ऐसे अस्पष्ट और अनिश्चित अनुमान मौसम विभाग की साख पर तो बट्टा लगा ही रहे हैं साथ ही मौसम पूर्वानुमान की गंभीरता और विश्वसनीयता को भी कमजोर कर रहे हैं।

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मौसम के अचानक करवट बदलने और उत्तर, मध्य व पश्चिमी भारत के राज्यों में बेमौसम बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि के  लिए पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के ऊपर उत्पन्न  Western Disturbance यानी पश्चिमी विक्षोभ को वजह बताया जा रहा है।

मौसम विभाग का अनुमान है कि 22 अप्रैल से एक नया पश्चिमी विक्षोभ पश्चिमी हिमालय क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इसका असर हिमाचल प्रदेश में होगा या उत्तराखंड में यह अभी स्पष्ट नहीं है। जिलेवार जानकारी मिलना तो दूर राज्यवार भी मौसम के पूर्वानुमान बहुत सटीक नहीं हैं।

23 और 25 अप्रैल के बारे में मौसम विभाग का वेदर आउटलुक बताता है कि पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के बहुत से इलाकों और पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वी भारत में कहीं-कहीं बारिश या गरज-बौछार की संभावना है। जबकि उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानों और दक्षिणी प्रायद्वीप में कहीं-कहीं बारिश या गरज-बौछार हो सकती है। देश के बाकी हिस्सों में मौसम शुष्क रहेगा। अब आप पता कीजिए कि उत्तर, पूर्वी, पश्चिमी भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप के अलावा देश में कौन-से हिस्से बचते हैं जहां मौसम शुष्क रहेगा।

मध्य प्रदेश या राजस्थान के किसी गांव में बैठे व्यक्ति को ऐसे पूर्वानुमान से कैसे अंदाजा लगेगा कि उसके जिले में बारिश की संभावना है या नहीं?

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इसी तरह 18 अप्रैल के बारे में मौसम विभाग का अनुमान था कि पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल में कहीं-कहीं बारिश हो सकती है। यूपी में ही 75 जिले हैं। सहारनपुर से बलिया तक 1000 किलोमीटर की दूरी है। ऐसे में गोलमोल पूर्वानुमानों का मतलब?

मौसम के तमाम अनुमान “कहीं-कहीं”, “अलग-अलग”, “कुछ-कुछ” इलाके जैसे शब्दों से बयान होते हैं जिससे सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है। 

संभवत: गलत साबित होने से बचने के लिए मौसम विभाग इतने अस्पष्ट और गोलमोल अनुमान पेश करता है। दीर्घअवधि पूर्वानुमानों को लेकर मौसम विभाग पर काफी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कम अवधि के अनुमान भी बहुत सटीक या उपयोगी नहीं हैं।

उदाहरण के तौर पर, 4 अप्रैल को जारी वेदर आउटलुक में मौसम विभाग ने 11 से 17 अप्रैल के बीच पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, उत्तरी केरल में सामान्य से अधिक जबकि दक्षिणी केरल, दक्षिणी तमिलनाडु, पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से कम और देश के बाकी हिस्सों में सामान्य बारिश की संभावना जताई थी।

जाहिर है कि 15 से 17 अप्रैल के दौरान गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में आंधी-तूफान, ओलावृष्टि और बारिश का मौसम विभाग के 4 अप्रैल को जारी आउटलुक से बहुत अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। क्योंकि यह अनुमान बहुत जेनरिक था।

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हालांकि, 14 और 15 अप्रैल को मौसम विभाग ने पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के कुछेक इलाकों में भारी बारिश या ओले पड़ने की चेतावनी जारी की थी। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के कुछ इलाकों में भी आंंधी-तूफान, ओलावृष्टि के साथ हल्की से सामान्य बारिश की संभावना जताई गई। गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, मराठवाडा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी गरज-चमक और अंधड़ के साथ कहीं-कहीं बारिश और बिजली गिरने का अलर्ट था।

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लेकिन एक तो यह चेतावनी 14 और 15 अप्रैल को तब जारी की गई जब मौसम की मार पड़ने लगी थी। मंडियों में पड़े अनाज या कट चुकी फसलों के बचाव के लिए ज्यादा समय नहीं था। दूसरा, इस चेतावनी में राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में ओलावृष्टि होने का जिक्र नहीं था। पंजाब, हरियाणा में ओलावृष्टि की आशंका ज़रूर जताई गई थी।

सब जानते हैं देश की अर्थव्यवस्था किस हद तक मौसम पर निर्भर है। किसान के अलावा कई दूसरे काम-धंधों और जान-माल की सुरक्षा के लिए समय रहते मौसम की सटीक जानकारी मिलना जरूरी है। लेकिन यहां तो मौसम के सारे अनुमान गोलमोल तकनीकी शब्दावली की भेंट चढ़ते दिख रहे हैं।

सबसे बड़ा सवालिया निशान भारत सरकार के उस मौसम विभाग पर है जिस पर प्राइवेट एजेंसियों के अनुमान भी कई बार भारी पड़ जाते हैं।