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संघर्ष

किसान आंदोलन के दौरान कितने किसानों की मौत हुई? सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं, न मुआवजे पर विचार

पिछले आठ महीने से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन के दौरान कितने किसानों की मौत हुई या कितने बीमार हुए, इस बारे में केंद्र सरकार को कोई जानकारी नहीं है। इसलिए आंदोलन के दौरान मरने वाले किसानों के परिवारों को मुआवजा भी नहीं मिलेगा। यह जानकारी केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने लोकसभा में दी है।

लोकसभा में बहुजन समाज पार्टी के सांसद कुंवर दानिश अली समेत कई सांसदों ने सवाल उठाया था कि किसान आंदोलन के दौरान कितने किसान मारे गए हैं या फिर बीमार हुए हैं। क्या सरकार आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिवारों को मुआवजा देने पर विचार कर रही है? इस सवाल के लिखित जवाब में कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि भारत सरकार के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है। तथापि, सरकार ने किसान यूनियनों के साथ चर्चा के दौरान बच्चों और बुजुर्गों विशेषकर महिलाओं को ठंड व कोविड की स्थिति को देखते हुए घर भेजने की अपील की थी। सरकार किसान आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों को मुआवजा देने पर विचार नहीं कर रही है।  

केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान पिछले आठ महीने से सर्दी, गर्मी, बारिश और आंधी-तूफान झेलते हुए आंदोलनरत हैं। संयुक्त किसान मोर्चा ने इस दौरान 550 से ज्यादा किसानों की मौत का दावा किया है। इस दौरान कई किसानों ने आत्महत्या कर ली। दिल्ली की सीमाओं पर सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर के किसान मोर्चों पर दिल्ली पुलिस की निगरानी है जो सीधे केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के तहत आती है। इसके बावजूद केंद्र सरकार के पास किसानों की मौत का रिकॉर्ड न होना हैरानी की बात है।

संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ नेता और भाकियू (राजेवाल) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल किसानों की मौत का रिकॉर्ड न होने को मोदी सरकार के किसान विरोध होने का प्रमाण बताते हैं। असलीभारत.कॉम के साथ टेलीफोन पर बातचीत में बलबीर सिंह राजेवाल ने कहा कि यह सरकार इतनी असंवेदनशील है कि किसानों को श्रद्धाजंलि देना भी जरूरी नहीं समझती है। जबकि इस आंदोलन में 580 के लगभग किसानों की मौत हो चुकी है। सरकार की इसी संवेदनहीनता की वजह से किसान तमाम मुश्किलें उठाकर भी आंदोलन करने को मजबूर हैं।

केंद्र सरकार भले ही किसानों की मौत का रिकॉर्ड न होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रही है, लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक रूप से जोर पकड़ रहा है। किसान आंदोलन के दौरान मरने वाले ज्यादातर किसान पंजाब के हैं, इसलिए राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में यह बड़ा मुद्दा होगा। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह मृतकों के परिजनों को 5 लाख रुपये मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी देने का ऐलान कर चुके हैं। कृषि कानूनों के मुद्दे पर एनडीए से अलग होने वाले शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने सरकार में आने पर आंदोलन में शहीद किसानों के परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी और बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का वादा किया है।

किसान संगठनों के अलावा राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर भाजपा व मोदी सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर ट्वीट किया कि अपनों को खोने वालों के आंसुओं में सब रिकॉर्ड है।

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