सरकारी योजनाएंं

केंद्र सरकार का कपड़ा मंत्रालय इसके अधीन काम करने वाले बोर्ड को खत्म करता जा रहा है। इसके पीछे “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” का तर्क दिया जा रहा है। पिछले दिनों राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर केंद्र सरकार की हैंडलूम बोर्ड खत्म करने को लेकर काफी आलोचना हुई थी। लेकिन ऐसी आलोचनाओं की परवाह न करते हुए केंद्र सरकार ने पटसन सलाहकार बोर्ड (जेएबी) और कपास सलाहकार बोर्ड (सीएबी) को भी खत्म करने का फैसला लिया है। यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब बुनकर और हस्तशिल्प से जुड़े उद्यय आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं और उन्हें सरकारी मदद का इंतजार है।

गत 4 अगस्त को जारी अधिसूचना के अनुसार, भारत सरकार ने मिनिमम गवर्नमेंट और मैक्सिमम गवर्नेंस के दृष्टिकोण और एक न्यून सरकारी तंत्र की आवश्यकता के अनुरूप पटसन सलाहकार बोर्ड को समाप्त कर दिया है।

इससे पहले 3 अगस्त को यही कारण बताते हुए कपास सलाहकार बोर्ड को समाप्त कर दिया था। कपड़ा मंत्रालय के तहत काम करने वाली ये दोनों संस्थाएं जूट और कॉटन की खपत और उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ-साथ इनसे जुड़े उत्पादों की मार्केटिंग के लिए सरकार को सलाह देने का काम करती थीं। इनमें सरकारी प्रतिनिधियों के अलावा उद्योग जगत, कला क्षेत्र और बुनकरों के प्रतिनिधि शामिल थे।

कला क्षेत्र से जुड़ी कई हस्तियां सरकार के इस फैसले पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए सवाल उठा रही हैं। परंपरागत भारतीय शिल्प के संवर्धन में जुटी दस्तकार संस्था की लीला तैयबजी ने फेसबुक पर लिखा कि बरसों से हैंडीक्राफ्ट बोर्ड बुनकरों और शिल्प जगत के लोगों के विचारों को सरकार तक पहुंचाने का माध्यम था। कोराना काल में चुपके से अजीब चीजें घटित हो रही हैं। 70 साल पुराने हैंडीक्राफ्ट बोर्ड को खत्म करने का फैसला हैरान करने वाला है।

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जूट और कॉटन एडवाइजरी बोर्ड को खत्म करने के अलावा सरकार ने टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन को संबद्ध निकाय की बजाय स्वीकृत निकाय का दर्जा दिया है। देश में कपड़ा मंत्रालय से स्वीकृत आठ टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन हैं। इनका दर्जा बदलते हुए गवर्निंग बॉडी से कपड़ा मंत्रालय के अधिकारियों को भी हटा दिया है।

अब तक तक केंद्र सरकार कपड़ा मंत्रालय से जुड़े 5 बोर्ड खत्म कर चुकी है। इनकी स्थापना टेक्सटाइल और हस्तशिल्प से जुड़े उद्योगों को बढ़ावा देने और इनसे जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार को सलाह देने के लिए की गई थी। कई दशक पहले स्थापित हुए इन बोर्डों को खत्म करने को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं ने भी सरकार की आलोचना की है। कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी की मार झेल रहे बुनकरों के सामने रोजी-रोजी का संकट है। लेकिन सरकार ने आत्मनिर्भर पैकेज के जरिए उन्हें कोई राहत नहीं दी बल्कि हैंडलूम बोर्ड को ही खत्म कर दिया है।

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खत्म किए गए हैंडीक्राफ्ट बोर्ड का इतिहास पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा है, इसलिए कई लोग सरकार के फैसले को नेहरू दौर की संस्थाओं को समाप्त करने के क्रम में देख रहे हैं। हैंडीक्राफ्ट बोर्ड की स्थापना 1952 में पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहल पर हुई थी, जब उन्होंने सांस्कृतिक कार्यकर्ता पुपुल जयकर को देश में हस्तशिल्प, हथकरघा और ग्राम शिल्प को बढ़ावा देने के लिए एक नीति बनाने का जिम्मा दिया। लेकिन पिछले वर्षों में बोर्ड की गतिविधियां काफी सीमित हो गई थीं। इस आधार पर ही हैंडीक्राफ्ट बोर्ड को खत्म करने के फैसले को सही ठहराया जा रहा है।

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टेक्सटाइल से जुड़ी कई संस्थाओं को एक झटके में समाप्त किए जाने के बाद सवाल उठ रहा है कि शिल्पकारों, कला और उद्याेग जगत के लोगों और सरकारी अधिकारियों के बीच समन्वय की भूमिका अब कौन निभाएगा? क्या सरकार इस जिम्मेदारी को निफ्ट और एनआईडी जैसे सरकारी संस्थानों को देगी या फिर नीति आयोग की तर्ज पर नई संस्थाओं का गठन किया जाएगा।


- अजीत सिंह     ·   12 अक्टूबर, 2018 -->