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क्या सतत विकास लक्ष्यों को भारत हासिल कर पाएगा?



2015 में पूरी दुनिया ने मिलकर 17 सतत विकास लक्ष्य तय किए थे। इन्हें 2030 तक हासिल किया जाना है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर भारत को 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना है तो उसे जीडीपी का दस फीसदी खर्च करना पड़ेगा
2015 में पूरी दुनिया ने मिलकर 17 सतत विकास लक्ष्य तय किए थे। इन्हें 2030 तक हासिल किया जाना है। इसके तहत गरीब और भूखमरी मिटाने से लेकर बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर पर्यावरण, बेहतर रोजगार, दुनिया में अमन सुनिश्चित करने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं।
इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए दुनिया के देशों के बीच आपसी सहयोग का लक्ष्य भी रखा गया था। जिन देशों ने सतत विकास लक्ष्यों ;एसडीजीद्ध को हासिल करने का लक्ष्य रखा है, वे सभी देश संयुक्त राष्ट्र को हर साल एक रिपोर्ट सौंपते हैं। इसमें यह बताया जाता है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के मोर्चे पर कितनी प्रगति हुई है।
भारत ने एसडीजी से संबंधित जो रिपोर्ट दी है, उससे अब तक की भारत की प्रगति बेहद उत्साहजनक नहीं है। कई मोर्चे ऐसे हैं जिन पर भारत को और ठोस ढंग से काम करने की जरूरत है।
वार्षिक रिपोर्ट को पिछले दिनों में संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्था यूनाइटेड नेशंस इकाॅनोमिक ऐंड सोशल कमिशन फोर एशिया ऐंड दि पैसिफिक ने जारी किया। इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अगर भारत को 2030 तक गरीबी मिटानी है तो प्रति व्यक्ति हर दिन 140 रुपये खर्च करने होंगे। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कुल खर्चे के मुकाबले दोगुना है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अगर भारत 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर गंभीर है तो उसे अपनी जीडीपी का 10 फीसदी खर्च करना होगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के पास इतने पैसे एसडीजी को हासिल करने के लिए खर्च करने को हैं?
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में इस संदर्भ में भारत का जिक्र करते हुए कहा गया है कि भारत के बैंकों की बढ़ती गैर निष्पादित संपत्तियां यानी एनपीए एक बहुत बड़ी चिंता है। क्योंकि इस वजह से देश की आर्थिक स्थिति खराब होगी और इतने पैसे नहीं रहेंगे कि भारत सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के पर्याप्त पैसे खर्च कर पाए।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जितनी गरीबी है, उसे देखते हुए भारत को अपनी जीडीपी का तकरीबन 10 फीसदी सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने पर खर्च करना होगा। जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को संयुक्त तौर पर इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जीडीपी का पांच फीसदी खर्च करना होगा।
भारत में गरीबी को लेकर अलग-अलग आंकड़े हैं। सी. रंगराजन समिति के आंकड़ों का इस्तेमाल सरकार के स्तर पर हो रहा है। इस समिति के मुताबिक देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों की संख्या 36.3 करोड़ है। जाहिर है कि अगर इतनी बड़ी आबादी की गरीबी दूर करनी है तो इसके लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा और काफी पैसे खर्च करने होंगे।
सच्चाई तो यह है कि भारत में चुनावी वादे करते वक्त हर पार्टी कहती है कि वह गरीबी के खिलाफ जंग छेड़ेगी और गरीबी से भारत को मुक्त करेगी। देश ने हर दल का शासन देख लिया है। लेकिन गरीबी से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है।
इस रिपोर्ट में भारत जैसे देशों को आगाह करते यह भी लिखा गया है कि आर्थिक विकास पर बहुत अधिक जोर देने से सतत विकास नहीं होगा और इससे भविष्य का विकास नकारात्मक ढंग से प्रभावित होगा। इससे समाज में गैरबराबरी बढ़ेगी और पर्यावरण को नुकसान होगा। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आर्थिक असमानता बढ़ने से आर्थिक विकास की अवधि कम होगी।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के नीति निर्धारक इन चेतावनियों को समझते हुए भारत को सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के मार्ग पर प्रभावी ढंग से आगे ले जाने के लिए जरूरी निर्णय लेंगे या फिर जिस तरह से इस मोर्चे पर 2015 से 2019 तक काम हुआ है, वही रवैया आगे भी बरकरार रहेगा।

  • असली भारत टीम