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क्या भारत में सौर ऊर्जा क्षमता विस्तार की गति धीमी हो रही है?



जिस गति से सौर ऊर्जा क्षमता विस्तार हो रहा है, उससे 2022 तक 1,00,000 मेगावाॅट के लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल लग रहा है

भारत ने 2022 तक 1,75,000 मेगावाॅट बिजली का उत्पादन नवीकरणीय स्रोतों से करने का लक्ष्य रखा है। इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 1,00,000 मेगावाॅट रखी गई है। इसका मतलब यह हुआ कि भारत ने अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने की योजना कें केंद्र में सौर ऊर्जा को रखा है।

यह बात सच है कि पिछले कुछ सालों में सौर ऊर्जा के उत्पादन में तेजी भी देखी गई। जहां कुछ साल पहले तक सौर ऊर्जा का उत्पादन काफी कम हो रहा था, वह बढ़ते हुए 2018 के दिसंबर में बढ़कर 25,000 मेगावाॅट के पार चला गया। ऐसे में कुछ लोगों को यह लग सकता है कि इस मामले में भारत प्रगति कर रहा है और 2022 तक सौर ऊर्जा से 1,00,000 मेगावाॅट बिजली उत्पादन का लक्ष्य हासिल कर सकता है।

लेकिन सौर ऊर्जा के मामले में क्षमता विस्तार की गति को देखते हुए 2022 के लक्ष्यों को भारत द्वारा हासिल किए जाने को लेकर वैश्विक स्तर पर काम करने वाली विश्लेषण एजेंसियां अब सवाल खड़े कर रही हैं। हाल ही में ऐसी एक एजेंसी क्रिसिल ने एक रिपोर्ट जारी की है।

किसिल की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 तक भारत सौर ऊर्जा से 1,00,000 मेगावाॅट बिजली उत्पादन के लक्ष्य से तकरीबन 40 फीसदी तक पीछे रह सकता है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिस गति से सौर ऊर्जा का क्षमता विस्तार हो रहा है, उससे 2022 तक भारत के सौर ऊर्जा उत्पादन में अभी के स्तर से 44,000 से 46,000 मेगावाॅट का अतिरिक्त उत्पादन होगा। लेकिन इस स्थिति में भी 1,00,000 मेगावाॅट के उत्पादन लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा सकेगा।

भारत में सौर ऊर्जा क्षमता विस्तार में आई कमी का अंदाज पिछले दो साल के आंकड़ों की तुलना से लगाया जा सकता है। 2017-18 में जहां सौर ऊर्जा में 9,000 मेगावाॅट का क्षमता विस्तार हुआ था। वहीं 2018-19 में यह आंकड़ा 7,000 मेगावाॅट पर रहने की उम्मीद है।

क्रिसिल ने भारत में सौर ऊर्जा में क्षमता विस्तार की धीमी गति के लिए केंद्र सरकार की कुछ नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। जुलाई, 2018 में केंद्र सरकार ने आयातित सोलर सेल पर एंटी-डंपिंग कदम उठाते हुए सुरक्षा कर लगाया। इसके तहत पहले एक साल में आयातित सौर सेल पर 25 फीसदी की दर पर कर वसूला जाएगा। इसके बाद के छह महीने के लिए यह दर 20 फीसदी होगी और इसके बाद के छह मीने के लिए 15 फीसदी।

क्रिसिल की रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि भारत के बाजारों में सोलर सेल वाली कंपनियों की सुरक्षा हो सके। दरअसल, हो यह रहा था कि चीन और मलेशिया से आने वाले सोलर सेल भारत में उत्पादित सोलर सेल के मुकाबले भारत के बाजारों में सस्ते बिक रहे थे। जाहिर है कि इससे भारत की कंपनियों को नुकसान हो रहा था।

क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है आने वाले समय में इस कर में कमी आएगी और इस वजह से सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षमता विस्तार में तेजी आ सकती है। क्रिसिल का मानना है कि सरकार द्वारा लगाए गए इस शुल्क की वजह से सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए इकाइयों को लगाने में 10 से 15 फीसदी अतिरिक्त खर्च हो रहे हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां इस अतिरिक्त बोझ को उठाने से बच रही हैं।

क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट में आने वाले सालों में सौर ऊर्जा के उत्पादन को लेकर जो तस्वीर पेश की है, उसके मुताबिक 2019-20 में 10,000 मेगावाॅट का क्षमता विस्तार संभावित है। क्रिसिल का मानना है कि 2020-21 में यह आंकड़ा 12,000 मेगावाॅट पर पहुंच सकता है।

लेकिन इसके बावजूद 2022 तक 1,00,000 मेगावाॅट की सौर ऊर्जा क्षमता को हासिल करना संभव नहीं हो पाएगा। ऐसे में अगर सरकार सौर ऊर्जा उत्पादन के अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है तो उसे सौर ऊर्जा उत्पादन में आई सुस्ती के कारणों का विश्लेषण करके इसके समाधान की दिशा मे ठोस कदम उठाना होगा।

क्योंकि सौर ऊर्जा से संबंधित लक्ष्यों को हासिल करना सिर्फ एक लक्ष्य को पूरा करने भर नहीं है बल्कि इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भारत ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बढ़ेगा। इससे पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करना तो आसान होगा ही साथ ही साथ इससे ऊर्जा संबंधित जरूरतों के लिए भारत की पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता घटेगी।

  • प्रियंका राय