जंगल

जलवायु परिवर्तन कार्य योजना कितनी प्रभावी साबित हो रही है?


https://pixabay.com/illustrations/climate-change-global-warming-2063240/

2008 में बनी जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना के अब तक के सफर पर संसद की प्राक्कलन समिति की रिपोर्ट क्या बताती है

जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरी दुनिया में चिंता जताई जा रही है। कई स्तर पर इससे निपटने के प्रयास हो भी रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे निपटने के लिए कुछ समझौते हुए हैं। इन समझौतों के तहत विभिन्न देश अपने-अपने स्तर पर भी इस समस्या से निपटने के प्रयास कर रहे रहे हैं और आपस में मिलकर भी।
इस समस्या से निपटने के लिए कई देशों ने अपनी एक कार्ययोजना बनाई है। भारत ने जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए जून, 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना को लागू करने का काम किया था।
उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा शुरू की गई इस कार्य योजना के तहत आठ मिशन तय किए गए थे। इनमें राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन और राष्ट्रीय हरित भारत मिशन प्रमुख हैं।
अब सवाल यह उठता है कि इस कार्य योजना के लागू होने के दस साल से भी अधिक वक्त गुजरने पर इसके तहत कितना काम हुआ है। क्या इस योजना के तहत जिन लक्ष्यों को हासिल करने किए जाने की उम्मीद थी, उन्हें हासिल किया जा सका है?
इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए इस मामले की पड़ताल संसद की प्राक्कलन समिति ने की। पिछले दिनों इस समिति की रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट में विभिन्न मिशन के तहत हुई प्रगति के बारे में विस्तार से बताया गया है।
सौर मिशन के संदर्भ में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सूर्य की किरणों से 2021-22 तक एक लाख मेगावाॅट बिजली बनाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसे हासिल करने के लिए जितने निवेश की जरूरत है उतना निवेश नहीं हो पा रहा है। समिति का अनुमान है कि इस लक्ष्य को हासिल करने में तकरीबन छह लाख करोड़ रुपये का निवेश होना है लेकिन इसके मुकाबले अब तक निवेश का स्तर काफी नीचे है।
जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत चल रहे राष्ट्रीय जल मिशन के जरिए देश भर में जल की स्थिति को लेकर एक व्यापक डाटाबेस तैयार किया जाना था। लेकिन प्राक्कलन समिति ने इस मिशन के तहत हासिल किए गए लक्ष्यों को लेकर सवाल उठाए हैं। इसका कहना है कि इस मिशन के तहत जल और इसके भंडारण से संबंधित जो आंकड़े जमा किए जा रहे हैं, उनके जमा करने की तकनीक इतनी पुरानी है कि इन आंकड़ों पर यकीन करना मुश्किल है। समिति ने यह भी कहा कि जानकारियां जुटाने की पुरानी तकनीक की वजह से न सिर्फ संसाधनों की बर्बादी हो रही है बल्कि इससे समय भी खराब हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत स्थायी कृषि के लिए भी एक राष्ट्रीय मिशन है। इस मिशन के जरिए कृषि के विभिन्न आयामों पर ध्यान देते हुए उन्हें सुधारा जाना है। प्राक्कलन समिति ने इस बात पर सवाल उठाया है कि इसमें किसानों की आय सुरक्षा को क्यों नहीं शामिल किया गया। समिति ने यह भी कहा कि फसल बीमा योजनाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था से खेती लाभकारी नहीं बनी है।
समिति ने कहा है कि सरकार उसकी चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के क्रियान्वयन को ठीक करने के लिए जरूरी कदम उठाए और इसके बारे में समिति को अवगत कराए। कुल मिलाकर इस रिपोर्ट से यही पता चलता है कि बड़ी उम्मीदों से बनी जलवायु परिवर्तन कार्य योजना ने अपने पहले दस साल के सफर में कोई बड़ी उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हासिल की है।

  • प्रियंका राय