पक्षियों की कब्रगाह बनी सांभर झील, इलाज पशु चिकित्सकों के भरोसे!

राजस्थान की मशहूर सांभर झील में हजारों पक्षियों की मौत की वजह का अभी तक पता नहीं चला है। राजस्थान हाईकोई ने भी प्रवासी पक्षियों की मौत का संज्ञान लेते हुए वन और पर्यावरण विभाग से जवाब तलब किया है।

इस मामले ने देश-दुनिया के वन्यजीव प्रेमियों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी प्रवासी पक्षियों की मौत पर चिंता जताते हुए जांच के आदेश दिए हैं। मृत पक्षियों के नमूनों को जांच के लिए भोपाल के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हाई सिक्‍योरिटी एनिमल डिजीजेज (NHISAD) भेजा गया है, जिसकी रिपोर्ट का इंतजार है। कई दिन बीत जाने के बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है।

राजस्थान के वन और पशुचिकित्सा विभाग के अधिकारी मामले को समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मौके पर पहुंची जानी-मानी पर्यावरण पत्रकार बहार दत्ता ने वहां जो देखा, वह काफी हैरान करने वाला है। बहार दत्त ने ट्वीट किया कि सांभर झील में पक्षियों की मौत का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। वन्यजीव समूह कहां हैं? यहां विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सकों और टॉक्सिकॉलजिस्ट की जरूरत है। जो डॉक्टर हैं वे मवेशियों का इलाज करते हैं। पर्यावरण से जुड़ी इतनी बड़ी घटना को लेकर यह स्थिति हैरान करने वाली है। स्थानीय लोग भी कई दिनों से पक्षियों की मौत के बावजूद वन विभाग के लापरवाह रवैया पर सवाल उठा रहे हैं।

बहार दत्त ने आगे ट्वीट किया है कि लोग दूर-दूर से पक्षियों को बचाने पहुंच रहे हैं। रेस्क्यू सेंटर में कई पक्षियों को इलाज़ देकर बचाया गया है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ भी पहुंच चुके हैं। लेकिन आसमान से बड़ी तादाद में मृत पक्षी कीड़े-मकोड़ों की तरह गिर रहे हैं।

शुरुआत में पक्षियों की मौत का आंकड़ा सैकड़ों में बताया जा रहा था। लेकिन अब तक चार हजार से ज्यादा पक्षियों को दफनाए जाने की जानकारी मिली है। इतना बड़ा मामला वन विभाग और पशुचिकित्सा विभाग के भरोसे होने का एक प्रमाण यह भी है बुधवार को ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सलीम अली पक्षीविज्ञान केंद्र से विशेषज्ञों को बुलाने की बात कही थी। यानी राज्य में ऐसे विशेषज्ञों की कमी है।

खारेपन और जहरीले पानी का संदेह 

मुख्यमंत्री गहलोत का कहना है कि इस साल भारी बारिश के कारण सांभर झील के आसपास कई वाटर बॉडिज बन गई है जिससे खारेपन का स्तर बढ़ गया। गहलोत ने पक्षियों की मौत रोकने के लिए हरसंभाव कदम उठाने का दावा किया है। जांच कर पता चलाने की कोशिश की जा रही है कि क्या पक्षियों की मौत पानी में खारापन बढ़ने से हुई या पानी के जहरीले होने से। संदेह है कि फैक्ट्री का जहरीला कैमिकल झील में पहुंचने से यह सब हुआ। पानी के सैंपल भी टेस्ट कराए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों की कमी बड़ा सवाल 

पक्षियों से जुड़े इस मामले में विशेषज्ञों की कमी बड़ा सवाल है। राजस्थान जैसा प्रदेश जहां कई नेशनल पार्क और वाइल्ड लाइफ सेंचुरी हैं, पक्षियों की मौत की जांच के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है। पूरा मामला मवेशियों के इलाज के अनुभवी डॉक्टरों और वन विभाग के फील्ड स्टाफ के भरोसे है।

करीब 200 वर्ग किलोमीटर में फैली सांभर झील में हर साल साइबेरिया, नॉर्थ एशिया और हिमालय से लाखों की तादाद में प्रवासी पक्षी आते हैं। इस साल पक्षियों के आने का सिलसिला जल्द शुरू होने को भी इनकी मौतों से जोड़कर देखा जा रहा है।

बीमारियां फैलने का खतरा 

कम से कम 20-25 प्रजातियों के पक्षी मृत पाए गए हैं। इनमें नॉदर्न शावलर, पिनटेल, कॉनम टील, रूडी शेल डक, कॉमन कूट गेडवाल, रफ, ब्लैक हेडड गल, सेंड पाइपर, मार्श सेंड पाइपर, कॉमस सेंड पाइपर, वुड सेंड पाइपर पाइड ऐबोसिट, केंटिस प्लोवर, लिटिल रिंग्स प्लोवर, लेसर सेंड प्लोवर प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं।

कभी पक्षियों के लिए जन्नत मानी जाने वाली सांभर झील इस साल उनकी कब्रगाह बन गई है। जो पक्षी झील के अंदर मरे पड़े हैं, उनसे बीमारियां फैलना का खतरा है। इन्हें पानी से कैसे बाहर निकाला जाएगा, यह भी बड़ा सवाल है।

हाउडी हंगर? भुखमरी में पाकिस्तान, बांग्लादेश से कैसे पिछड़ा भारत?

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। यह दावा अक्सर राजनीति चर्चाओं में उछलता है। इसके पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क हैं, जिनमें हंगर इंडेक्स का जिक्र बार-बार आता है। इस साल ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 117 देशों के बीच 102वें स्थान पर है और इसे ‘गंभीर स्थिति’ वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। जबकि पाकिस्तान 94वें, बांग्लादेश 88वें, नेपाल 73वें और श्रीलंका 66वें स्थान पर है।

हंगर इंडेक्स में जिन 17 देशों को सामूहिक रूप से पहले पायदान पर रखा गया है उनमें क्यूबा, तुर्की, यूक्रेन, कुवैत, रोमानिया, चिली और बेलारूस शामिल हैं। इस फेहरिस्त में नाइजर, रवांडा, इथोपिया, मोजांबिक, तंजानिया और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों की स्थिति भी भारत से बेहतर है।

5 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहे देश के लिए यह असहज करने वाला आंकड़ा है, जिसे आयरलैंड और जर्मनी की दो संस्थाएं प्रकाशित करती हैं। दोनों विदेशी संस्थाएं हैं। इनकी भी अपनी राजनीति और भुखमरी के अपने पैमाने हैं। इन सब पर बहस की पूरी गुंजाइश है। फिर भी दुनिया की एक जानी-मानी रिपोर्ट में भारत का सबसे ज्यादा भुखमरी वाले देशों में शुमार होना चिंताजनक है।

क्या है भुखमरी का पैमाना

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में सबसे कम भुखमरी वाले देश को शून्य और सबसे ज्यादा भुखमरी वाले देश को 100 अंक दिए जाते हैं। इस प्रकार कम स्कोर वाले देश इंडेक्स में ऊंचा स्थान पाते हैं। इस इंडेक्स को अल्पपोषण, चाइल्ड वेस्टिंग (उम्र के हिसाब से कम वजन वाले 5 साल से कम उम्र के बच्चों का अनुपात), चाइल्ड स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले 5 साल से कम उम्र के बच्चों का अनुपात) और बाल मृत्यु दर के आधार पर तैयार किया जाता है।

5 साल में कहां पहुंचा भारत?

हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आते ही मोदी विरोधियों ने केंद्र सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। केरल के वित्तमंत्री थॉमस आइसैक ने ट्वीट किया, “2019 का ग्लोबल हंगर इंडेक्स आ चुका है। भारत 102वें स्थान पर आ गया है। यह गिरावट प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के साथ शुरू हुई थी। वर्ष 2014 में भारत 55वें स्थान पर था। 2017 में 100वें स्थान पर आया, और अब नाइजर व सिएरा लियोन के स्तर पर पहुंच गया है। विश्व के भूखों का बड़ा हिस्सा अब भारत में है।”

हालांकि, यह पूरा सत्य नहीं है। हाल के वर्षों में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति कुछ इस प्रकार रही है

साल   भारत का स्थान      कुल देश

2014            55                 76

2016            97                118

2017            100              119

2018            103              119

2019            102              117

जाहिर है कि हंगर इंडेक्स में भारत पिछड़ रहा है। लेकिन हर साल कुल देशों की संख्या अलग-अलग होने की वजह से पिछले वर्षों से आंख मूंदकर तुलना करना उचित नहीं है। ऐसी तुलना करते हुए कुल देशों की संख्या को भी ध्यान में रखना चाहिए।

चाइल्ड वेस्टिंग भारत में सर्वाधिक

हंगर इंडेक्स में भारत न सिर्फ पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से पीछे है बल्कि यहां चाइल्ड वेस्टिंग यानी उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों का अनुपात विश्व में सर्वाधिक 20.1 फीसदी है। भारत में चाइल्ड स्टंटिंग यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले बच्चों का अनुपात 37.9 फीसदी है जो चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 6-23 महीने के केवल 9.6 फीसदी बच्चों को न्यूनतम आहार मिल पाता है। यानी 90 फीसदी से ज्यादा बच्चे न्यूनतम आहार से भी वंचित हैं।

ये तथ्य देश में कुपोषण की भयावह तस्वीर उजागर करते हैं। हमारे बच्चे कुपोषित हैं।

नेपाल, बांग्लदेश से सबक लेने की जरूरत 

पिछले साल तक पाकिस्तान हंगर इंडेक्स में भारत से नीचे 106वें स्थान पर था, लेकिन इस साल भारत को पीछे छोड़ चुका है। नेपाल और बांग्लादेश की स्थिति लगातार भारत से बेहतर बनी हुई है। साल 2000 में नेपाल का स्कोर 36.6 था जो इस साल 20.8 है। इसी तरह बांग्लादेश का स्कोर 36.1 था जो अब 25.2 है। जबकि इस दौरान भारत 38.8 से 30.3 तक ही पहुंचा। यह स्कोर जितना कम होता है, भुखमरी के पैमाने पर किसी देश की स्थिति उतनी ही बेहतर मानी जाती है।

रिपोर्ट में भुखमरी दूर करने के बांग्लादेश के प्रयासों की तारीफ करते हुए इसका श्रेय वहां की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई पर ध्यान दिए जाने को दिया गया है। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में चाइल्ड स्टंटिंग दर 1997 में 58.5 फीसदी थी जो 2011 में घटकर 40.2 रह गई। इसी तरह नेपाल में चाइल्ड स्टंटिंग दर 2001 में 56.6 फीसदी से घटकर 2011 में 40 फीसदी के आसपास रह गई।

भारत में सुधार की रफ्तार धीमी  

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान भले ही नीचे गिरा है लेकिन भुखमरी के स्तर में सुधार यहां भी हुआ है। साल 2000 के हंगर इंडेक्स में भारत का स्कोर 38.8 था जो 2019 में 30.3 है। लेकिन सुधार की रफ्तार धीमी होने की वजह से भारत का स्थान पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से नीचे हैं। हालांकि, भारत के साथ इन देशों की तुलना करते हुए आकार, आबादी और भौगोलिक अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद वैश्विक स्तर पर भुखमरी और कुपोषण के स्तर में गिरावट आई है। इसका सीधा संबंध दुनिया में कम हुए गरीबी के स्तर से है। फिर भी जीरो हंगर का लक्ष्य अभी बहुत दूर है। इस साल की रिपोर्ट में भुखमरी मिटाने के प्रयासों में जलवायु परिवर्तन को खास चुनौती के तौर पर पेश किया गया है।

 

नोबेल विजेता बैनर्जी कैसे मिटाते हैं गरीबी? क्या हैं उनके प्रयोग?

पुरस्कारों से गरीबी मिटती तो कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलते ही बाल श्रम मिट जाता। जाहिर है पुरस्कारों की अपनी राजनीति है। अपनी सीमाएं हैं। फिर भी किसी व्यक्ति को नोबेल जैसा पुरस्कार मिलना बड़ी बात है। खासतौर पर अगर वह व्यक्ति भारत जैसे देश से हो। गरीबी पर रिसर्च करता हो। एंटी-नेशनल कहे गए जेएनयू से पढ़ा हो। मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता हो। कांग्रेस को न्याय योजना बनाने और अरविंद केजरीवाल को स्कूलों की दशा सुधारने में मदद करता हो। तो मानकर चलिए कि उसके काम के अलावा हर बात की चर्चा होगी।

इस साल का सेवरिग्स रिक्सबैंक पुरस्कार यानी अर्थशास्त्र का नोबेल भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के साथ-साथ फ्रांसिसी मूल की उनकी संगिनी एस्थर डुफ्लो और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से दिया गया है। बैनर्जी और डुफ्लो अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी में प्रोफेसर हैं। इन तीनों को यह पुरस्कार दुनिया भर में गरीबी मिटाने के लिए उनके प्रयोगात्मक दृष्टिकोण के लिए दिया गया है, जो गरीबी से निपटने में मददगार है। इस दृष्टिकोण की पहचान है रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल यानी आरटीसी मेडिकल साइंस की तर्ज पर होने वाले इन प्रयोगों को गरीबी दूर करने में कारगर टूल माना जा रहा है। हालांकि, इसके आलोचक भी कम नहीं हैं।

क्या है यह नया दृष्टिकोण?

पुरस्कार की घोषणा करते हुए द रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने कहा है कि पिछले दो दशकों में बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर के प्रयोगात्मक दृष्टिकोण ने विकास अर्थशास्त्र का कायाकल्प कर दिया है। वैश्विक गरीबी से निपटने का वे नया तरीका लाए हैं, जिसके तहत बड़ी समस्या को छोटे-छोटे टुकड़ों या सवालों में तोड़कर देखा जाता है। फिर सोचे-समझे प्रयोगों के जरिए इन सवालों या समस्याओं के समाधान तलाशे जाते हैं। इन तीनों के शोध से वैश्विक गरीबी से निपटने की क्षमता में इजाफा हुआ है।

जिस तरह लैब में चूहों पर दवाओं का ट्रायल होते हैं, वैसे ही बैनर्जी और उनके साथी गरीबों पर प्रयोग करते हैं। ताकि पता लगे कि गरीबी से निपटने का कौन-सा उपाय सबसे कारगर है। ऐसे प्रयोगों में लोगों को अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है। इनमें से कुछ पर उपाय आजमाए जाते हैं, जबकि कुछ लोगों को इससे वंचित रखकर प्रभाव की तुलना की जाती है। भारत गरीबी पर ऐसे प्रयोगों की बड़ी प्रयोगशाला बन चुका है। मतलब, गरीबी नेताओं के भाषण से निकलकर लैब में पहुंच चुकी है। गरीब वहीं का वहीं है!

प्रयोगों और साक्ष्यों पर जोर

बैनर्जी और उनके साथी पिछले 25 वर्षों से गरीबी पर प्रयोग कर रहे हैं और अब यह पद्धति विकास अर्थशास्त्र में धूम मचा रही है। इससे लोगों की आदतों और व्यवहार के अध्ययन के जरिए गरीबी दूर करने का एक नया औजार मिला है। इन प्रयोगों से प्राप्त साक्ष्य नीतिगत फैसलों को वैज्ञानिक आधार देते हैं। आज दुनिया भर में ऐसे प्रयोगों के जरिए सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की जा रही है।

इस पद्धति के तौर-तरीकों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का काम गरीब और जन कल्याण पर केंद्रित है। उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने से विकास अर्थशास्त्र और नए दृष्टिकोण की अहमियत बढ़ेगी।

जिस दौर में दुनिया आर्थिक संकटों से जूझ रही है। नव उदारवादी पूंजीवादी नीतियां और वैश्विकरण के परिणाम सवालों से घिरे हैं। ऐसे में अर्थशास्त्र को भी प्रसांगिक बने रहने के लिए ज्यादा तार्किक, कल्याणकारी और जमीनी वास्तविकता के करीब होने की जरूरत है। बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का काम इन आवश्यकताओं के अनुरूप है।

गरीबी पर अपने प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने साल 2003 में एक पावट्री एक्शन लैब की स्थापना की। जिसके साथ 2005 में सऊदी शेख अब्दुल लतीफ जमील का नाम और पैसा जुड़ गया। इस सऊदी कनेक्शन पर बहुत से लोग सवाल उठाते हैं। फिर बैनर्जी का नाता दुनिया के सबसे प्रभावशाली थिंक टैंक फोर्ड फाउंडेशन से भी है। बैनर्जी और उनके साथियों के काम को मिली स्वीकृति और सम्मान को इन संबंधों से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

किताबें जरूरी या भोजन?

गरीब मुल्कों में शिक्षा का स्तर खराब है। यह बात सभी जानते हैं। इसे सुधारने के लिए ज्यादा किताबें बांटी जाएं या स्कूल में मुफ्त भोजन मुहैया कराया जाए? इस तरह के सवालों का जवाब खोजने के लिए बैनजी, डुफ्लो और क्रेमर लोगों के बीच जाकर प्रयोग करते हैं। कीनिया में हुए ऐसे ही प्रयोग में स्कूलों के एक समूह को ज्यादा किताबें दी गईं, जबकि दूसरे समूह के स्कूलों में मुफ्त भोजन। प्रयोग से पता चला कि ना ही अधिक किताबों से और ना ही मुफ्त भोजन से पढ़ाई के नतीजों में कोई खास सुधार आया है।

आगे चलकर कई प्रयोगों में सामने आया कि गरीब देशों में संसाधनों की कमी उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी छात्रों की जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई न होना।

इसी तरह के प्रयोग शिक्षकों पर भी किए गए। कुछ शिक्षकों को थोड़े समय के लिए प्रदर्शन आधारित अनुबंध पर रखा गया जबकि दूसरी तरफ स्थायी शिक्षकों पर छात्रों को बोझ कम कर दिया गया। अनुबंध पर रखे शिक्षकों ने बेहतर परिणाम दिए जबकि छात्रों की संख्या घटाने पर भी स्थायी शिक्षकों के प्रदर्शन में कोई खास सुधार नहीं आया। इन प्रयोगों के आधार पर कई राज्यों में शिक्षण सुधार कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

मुफ्त दाल से बढ़ा टीकाकरण

बैनर्जी और उनके साथियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई दिलचस्प प्रयोग किए हैं। राजस्थान में उदयपुर के जिन गांवों में मोबाइल वैक्सीनेशन वैन पहुंची, वहां टीकाकरण की दर तीन गुना बढ़ गई। टीकाकरण के साथ परिवारों को एक किलो दाल मुफ्त दी गई तो टीकाकरण की दर 18 फीसदी से बढ़कर 39 फीसदी तक पहुंच गई। जबकि दाल बांटने के बाद भी टीकाकरण की लागत आधी रह गई थी।

नकद हस्तांतरण को बढ़ावा

आरसीटी सरीखे प्रयोगों से टाइगेटेड एप्रोच यानी जरूरतमंदों को सीधी मदद के दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की पीएम-किसान और कांग्रेस की न्याय योजना के पीछे यही सोच है।

खास बात यह है कि बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का प्रयोगात्मक दृष्टिकोण लोगों के बीच जाकर समस्याओं का हल खोजने, सीमित संसाधनों के मद्देनजर कारगर उपाय तलाशने और सरकारी व्यय के बेहतर इस्तेमाल पर जोर देता है। बड़ी समस्याओं में उलझने के बजाय जो आसानी से किया जा सकता है, पहले उसे करने की सोच को भी इससे बल मिला है। इस तरह के उपाय लोक-लुभावने होते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को भी पसंद आते हैं।

इंसाफों पर चूहों तक तरह शोध कितना जायज?

बड़ी समस्या को हल करने के बजाय छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान खोजने का यह दृष्टिकोण काफी लोकप्रिय हो रहा है। क्योंकि मूल समस्या को हल करने के बजाय चीजों को टुकड़ों में देखना, छोटी-मोटी राहतें या रियायतें देना सरकारों के लिए ज्यादा आसान है। इसलिए नीति-निर्माताओं ने इसे हाथोंहाथ लिया।

लेकिन दिक्कत यह है कि यह दृष्टिकोण गरीबी निवारण के प्रयासों को छोटी-मोटी राहतों तक सीमित रखता है। गरीबी के लिए जिम्मेदार ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक कारणों, शोषणकारी व्यवस्था और पूंजीवाद की नाकामियों को नजरअंदाज किया जाता है। फिर इन प्रयोगों के तौर-तरीकों पर भी कई सवाल हैं।

एक जगह हुए प्रयोगों को दूसरे जगह कैसे लागू किया जा सकता है? क्या इस प्रकार का सामान्यीकरण उचित है? इंसानों पर चूहों की तरह प्रयोग कहां तक जायज है? कुछ लोगों को इलाज या राहतों से वंचित रखना अनैतिक नहीं है? दो लोगों या समूहों को एक समान कैसे माना जा सकता है? प्रयोग के दौरान अन्य कारक भी प्रभावी होते हैं, उन्हें कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? इस तरह के कई सवाल आरसीटी पर उठते रहे हैं।

ये सवाल अपनी जगह हैं लेकिन अभिजीत बैनर्जी, एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर को दुनिया का ध्यान गरीबी और विकास अर्थशास्त्र के नए दृष्टिकोण की तरफ खींचने का श्रेय तो मिलना ही चाहिए।

काश! भारत में इस तरह के प्रयोग नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लागू करने से पहले किए गए होते। क्या पता हार्डवर्क के साथ हार्वर्ड का मेल बेहतर परिणाम देता!

 

 

किसानों के साथ धोखा? कम आंकी जा रही है उपज की लागत

इन बातों पर यकीन करना मुश्किल है! लेकिन आजकल बहुत कुछ मुमकिन है। पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन क्षेत्रों में क्रांतिकारी कारनामे हुए हैं, उनमें आंकड़ेबाजी अहम है। केंद्र सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करें तो पिछले पांच वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी भले न हुई हो, लेकिन खेती की लागत बढ़ने कम हो गई है। लागत में इस ठहराव यानी कमतर लागत के आधार पर ही केंद्र सरकार खरीफ फसलों के एमएसपी में भारी बढ़ोतरी का दावा कर रही है। कई अखबारों ने इसे बजट से पहले किसानों को सरकार का तोहफा करार दिया। कुछ लोगों ने मास्टर स्ट्रोक भी बताया ही होगा।

दावा और हकीकत

खुद केंद्र सरकार का दावा है कि खरीफ सीजन 2019-20 के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी से किसानों को लागत पर 50 से लेकर 85 फीसदी का लाभ मिलेगा। सरकार लागत पर डेढ़ गुना मुनाफा देने के वादे से काफी आगे निकल चुकी है।

एमएसपी की मामूली बढ़ोतरी को सरकार का तोहफा बताने की होड़

 

अब जरा इन दावों की हकीकत भी जान लीजिए। सामान्य किस्म के धान का एमएसपी इस साल सिर्फ 65 रुपये प्रति कुंतल बढ़ा है जो 4 फीसदी से भी कम है। लेकिन दावा है कि इस मामूली बढ़ोतरी के बावजूद किसानों को लागत पर 50 फीसदी रिटर्न मिलेगा। पता है कैसे? जिस लागत के आधार पर सरकार यह दावा कर रही है वह लागत पिछले पांच साल में सिर्फ 23 फीसदी बढ़ी मानी गई है। जबकि धान की खेती की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 114 फीसदी बढ़ी थी। मतलब, सरकारी अर्थशास्त्रियों ने 2014 के बाद धान उत्पादन की लागत को बढ़ने ही नहीं दिया। लागत बढ़ाएंगे तो एमएसपी भी ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा। लागत को ही कम से कम रखें तो एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी भी ज्यादा दिखेगी। सीधा गणित है।

खरीफ फसलों की अनुमानित लागत (रुपये प्रति कुंतल में )

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ नीति रिपोर्ट  https://cacp.dacnet.nic.in/KeyBullets.aspx?pid=39

 

सरकारी अर्थशास्त्री अपनी पर आ जाएं तो आंकड़ों को अपने पक्ष में घुमाना उनके बाएं हाथ का खेल है। मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम इस मुद्दे पर पूरा रिसर्च पेपर लिख चुके हैं कि हाल के वर्षों में भारत सरकार ने कैसे जीडीपी की ग्रोथ रेट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन किसानों के मामले में उल्टा हुआ। सरकारी अर्थशास्त्री किसानों की लागत बढ़ने ही नहीं दे रहे हैं। जमीन पर भले कितनी ही महंगाई क्यों ना हो, कागजों में खेती फायदे का सौदा साबित की जा रही है।

लागत पर ब्रेक और डेढ़ गुना दाम का दावा

फसलों का एमएसपी कितना होना चाहिए और उपज की लागत क्या आंकी जाए? इस हिसाब-किताब के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग नाम की एक सरकारी संस्था है जो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत काम करती है। इसमें दिग्गज कृषि अर्थशास्त्री बैठकर तय करते हैं कि किस उपज पर कितनी लागत आती है। विभिन्न राज्यों से कृषि लागत के आंकड़े जुटाए जाते हैं। महंगाई, आयात-निर्यात, वैश्विक बाजार और मौजूदा भंडार को देखते हुए फसलों के एमएसपी तय किए जाते हैं।

2009-10 खरीफ सीजन के लिए सीएसीपी ने तुहर यानी अरहर दाल की वास्तविक उत्पादन लागत (ए2 + एफएल) 1181 रुपये प्रति कुंतल आंकी थी। (ए2 + एफएल) वह लागत है जिसमें खेती पर आने वाले तमाम वास्तविक खर्च जैसे बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनरी, ईंधन का खर्च और खेती में लगे कृषक परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है।

इस प्रकार 2009-10 में तुहर उत्पादन की जो लागत 1181 रुपये प्रति कुंतल थी, वह 2014-15 तक बढ़कर 3105 रुपये हो गई। यानी पांच साल में तुहर की लागत 163 फीसदी या ढाई गुना से ज्यादा बढ़ी। ताज्जुब की बात है कि 2014 के बाद तुहर की लागत बढ़ने का सिलसिला थम-सा गया। 2014-15 से 2019-20 के बीच पांच वर्षों में तुहर की लागत सिर्फ 17 फीसदी बढ़कर 3636 रुपये प्रति कुंतल तक ही पहुंची। कहां पहले पांच वर्षों में 163 फीसदी की वृद्धि और कहां अब पांच साल में केवल 17 फीसदी की बढ़ोतरी? है ना कमाल! एक ही फसल, एक ही देश लेकिन लागत बढ़ती इतनी कम कैसे हो गई। यह सवाल तो उठेगा।

बड़ा सवाल

यह शोध का विषय है कि जिन फसलों की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ी थी, 2014 के बाद उनकी लागत 20-30 फीसदी ही क्यों बढ़ी है? यह सिर्फ अर्थशास्त्रियों का कारनामा है या फिर इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति भी सक्रिय है?

खुद सीएसीपी के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों की लागत 66 से 163 फीसदी तक बढ़ी थी। धान की लागत 114 फीसदी तो ज्वार की लागत 122 फीसदी बढ़ी थी। लेकिन 2014-15 के बाद के पांच वर्षों में खरीफ फसलों की लागत 5 से 43 फीसदी ही बढ़ी है। इस दौरान सबसे ज्यादा 43 फीसदी लागत सोयाबीन की बढ़ी जबकि सबसे कम 5 फीसदी लागत मूंगफली की बढ़ी है। यहां सबसे बड़ा सवालिया निशान खेती की लागत और एमएसपी तय करने की सरकारी प्रक्रिया पर है, जिसमें किसानों की हिस्सेदारी नाममात्र की रहती है।

किसानों पर दोहरी मार, फार्मूला और लागत का खेल

सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देना का शॉर्टकट ढूंढ़ लिया है। जब कमतर लागत को आधार बनाया जाएगा तो एमएसपी में थोड़ी बढ़ोतरी भी डेढ़ गुना बताई जा सकती है। यह बहस तब भी खड़ी हुई थी जब केंद्र सरकार ने समग्र लागत (सी2), जिसमें किसान की अपनी जमीन का अनुमानित किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है, की बजाय वास्तविक लागत (ए2 + एफएल) के आधार पर डे़ढ़ गुना एमएसपी देने का वादा किया था। पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि जिस कमतर लागत को सरकार आधार मान रही है, उनमें भी साल दर साल बेहद कम बढ़ोतरी आंकी जा रही है। यह किसानों पर दोहरी मार है।

जाहिर है कमतर लागत के आधार पर ही सरकार एमएसपी में बढ़ोतरी की वाहवाही बटोरना चाहती है। जबकि तथ्य यह है कि 2014 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों के एमएसपी 2014 के बाद पांच वर्षों के मुकाबले ज्यादा बढ़े थे। 2014 से 2019 के बीच केवल बाजरा, रागी, नाइजर बीज और कपास (लंबा रेशा) के एमएसपी में पहले 5 सालों के मुकाबले अधिक वृद्धि हुई है। जबकि 2009 से 2014 के बीच मुख्य खरीफ फसलों जैसे – धान, ज्वार, मक्का, तुहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, कपास और सोयाबीन के एमएसपी पिछले पांच वर्षों के मुकाबले अधिक बढ़े थे। खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के लिहाज से डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल पिछले पांच वर्षों से कमतर नहीं बल्कि बेहतर ही था।

खरीफ फसलों के एमएसपी में 1 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी

इस साल खरीफ फसलों के एमएसपी में जो मामूली बढ़ोतरी हुई है, उसे छिपा पाना मुश्किल है। खरीफ सीजन 2019-20 के लिए उपज एमएसपी में 1.1 फीसदी से लेकर 9.1 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। सबसे कम 1.1 फीसदी यानी 75 रुपये का इजाफा मूंग के एमएसपी में हुआ है। जबकि सबसे अधिक 9.1 फीसदी यानी 311 रुपये की वृद्धि सोयाबीन के एमएसपी में की गई है। खरीफ की प्रमुख फसल धान का एमएसपी सिर्फ 65 रुपये यानी 3.7 फीसदी ही बढ़ा है। कपास के एमएसपी में भी 1.8 – 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है। किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने और आमदनी दोगुनी के सरकारी दावे की फिलहाल यही असलियत है।

खरीफ फसलों के एमएसपी  (रुपये प्रति कुंतल)

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ रिपोर्ट, सीएसीपी के आंकड़े https://cacp.dacnet.nic.in/ViewContents.aspx?Input=1&PageId=36&KeyId=0 और पीआईबी की विज्ञप्ति http://pib.nic.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1576842

 

किसानों को उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से निकली यह बात 2014 में भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र तक पहुंच गई थी। मोदी सरकार ने सैद्धांतिक रूप से डेढ़ गुना दाम की नीति को अपनाया था। मगर इस पर अमल करने के तरीके में कई झोल हैं।

जिस लागत के आधार पर डेढ़ गुना दाम दिलना का दावा किया जा रहा है कि सरकार उस लागत को ही कम आंक रही है। इसलिए किसान के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है। जबकि लगातार सूखे और घाटे की मार झेल रहे किसानों को आंकड़ों की इस बाजीगर के बजाय कारगर राहत और ईमानदार कोशिशों की दरकार है।

 

अमेरिकी बादाम-अखरोट कैसे पचा लेती है हमारी देशभक्ति?

देश के किसान जो कुछ भी उगाते हैं, उसका बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को बेचा जाता है। इसी तरह हम अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाने-पीने की चीजों खासकर फलों, दालों और खाद्य तेलों का आयात करते हैं। कृषि व्यापार का यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है, लेकिन इसके नियम-कायदे और तौर-तरीके बदलते रहते हैं। किसानों को उनकी उपज का क्या दाम मिलेगा, यह बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग-पूर्ति और दाम पर निर्भर करता है। आयात-निर्यात से जुड़ी नीतियां और फैसले इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

हाल ही में भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले सेब, बादाम, अखरोट समेत कुल 28 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। यानी, अमेरिका से इन चीजों का आयात महंगा पड़ेगा। यह कदम अमेरिका की उस कार्रवाई के विरोध में उठाया गया, जिसके तहत भारत से ड्यूटी फ्री एक्सपोर्ट जैसी रियायतें खत्म कर दी गई हैं। व्यापार मोर्चे पर अमेरिका के साथ इस तनातनी के अलावा भारत का बढ़ता कृषि आयात और घटता निर्यात अपने आप में चिंताजनक है।

साल 2013-14 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों के दौरान भारत के कृषि निर्यात में सालाना 2.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। मतलब, कृषि निर्यात बढ़ने के बजाय घट गया है। जबकि इसी अवधि में कृषि आयात सालाना 6.7 फीसदी की दर से बढ़ा है। जब देश में खाद्यान्न, फल, सब्जियों और दूध का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है, उसी दौर में हम दूसरे देशों से खाने-पीने की चीजों का खूब आयात करते जा रहे हैं। इसकी मार आखिरकार किसानों पर ही पड़ रही है। इस पूरे खेल के पीछे एग्री कमोडिटी ट्रेडिंग के बड़े खिलाड़ियों का हाथ है जो सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस खेल के चलते जो चीजें भारत में आसानी से पैदा हो सकती हैं, उनके लिए भी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। जो पैसा देश के किसानों की जेब में जा सकता है, वो देश से बाहर जा रहा है। उफनते राष्ट्रवाद के इस दौर में किसानों और देश के हितों पर यह चोट जारी है मगर कहीं कोई चर्चा ही नहीं! किसी को इसकी चिंता ही नहीं! ना ही किसी की राष्ट्रवादी भावनाएं आहत हो रही हैं।

हालत यह है कि भारत अमेरिकी बादाम का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। अमेरिका से हर साल भारत करीब 3,800 करोड़ रुपये का बादाम आयात करता है। इसी तरह भारत अमेरिका के सेब का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और हर साल करीब 1100 करोड़ रुपये का सेब अमेरिका से मंगाता है। देखा जाए तो अमेरिका के सेब, बादाम, अखरोट उगाने वाले किसान भारत के लिए खेती कर रहे हैं। हमारा किसान सही दाम के लिए टमाटर, प्याज  सड़क पर फेंकने से आगे सोच ही नहीं पा रहा है।

सिर्फ सेब और बादाम को ही जोड़ लें तो हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपये का आयात हम अमेरिका से करते हैं। जबकि सेब और बादाम भारत के कई राज्यों में पैदा होता है। किसानों को प्रोत्साहित किया जाए तो इन चीजों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बजाय भारत अमेरिका और अन्य देशों पर निर्भरता बढ़ाता जा रहा है। खाद्य तेलों और दालों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। आत्मनिर्भरता के बजाय देश ने आयात निर्भरता का रास्ता चुना है।

पिछले 5 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। देश का कृषि आयात बढ़ता जा रहा है जबकि निर्यात घटा है। साल 2013-14 में भारत का कृषि आयात करीब 15 अरब डॉलर था जो 2018-19 में बढ़कर 19 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। दूसरी तरफ, 2013-14 में भारत का कृषि निर्यात 42.86 अरब डालर था जो 2018-19 में घटकर 38.49 अरब डालर रह गया है। कृषि आयात और निर्यात का अंतर लगातर सिकुड़ रहा है। यानी ट्रेड सरप्लस कम होता जा रहा है। किसानों के साथ-साथ सरकारी खजाने के लिए भी नुकसानदेह है।

कृषि में वर्षों की मेहनत से हासिल आत्मनिर्भरता को हम आयात निर्भरता में गंवाते जा रहे हैं। जबकि पूरी दुनिया व्यापार युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका, चीन जैसे ताकतवर देश अपनी व्यापार नीतियों से दूसरे देशों पर वार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। लेकिन विदेशी सेब, बादाम और अखरोट खाकर भी हमारा राष्ट्रप्रेम खूब फल-फूल रहा है। राष्ट्रवाद के समूचे नैरेटिव से स्वदेशी के स्वर लुप्तप्राय हैं। जबकि स्वेदशी के पेरोकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में हैं। लेकिन चीन की पिचकारियों और झालर, फुलझड़ियों के अलावा शायद ही किसी चीज के आयात का विरोध हाल के वर्षों में हुआ है।

माना कि देश के दरवाजे अमेरिका या दूसरे देशों के लिए बंद नहीं किए जा सकते हैं। विश्व व्यापार की अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन जिन चीजों का हर साल हजारों करोड़ रुपये का आयात हो रहा है, उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित तो कर ही सकती है। कृषि आयात को कम से कम रखना देश और किसानों दोनों के हित में है। आयात शुल्क में बढ़ोतरी इसका सीधा, सरल उपाय है। लेकिन अक्सर होता इसके उलट है। देश के दरवाजे सस्ते आयात के लिए खोल दिए जाते हैं।

हिमाचल के सेब उगाने वाले किसान कई साल से आयात की मार झेल रहे हैं। इसी तरह कश्मीर और दूसरे राज्यों के किसान भी अमेरिकन ड्राईफ्रूट के आयात से परेशान हैं। कम से कम आयात की मार झेल रहे इन किसानों के हित में ही सरकार कुछ मददगार कदम उठा ले। कृषि आयात को हतोत्साहित करे। वैसे भी दुनिया में व्यापार युद्ध के हालात बन रहे हैं। बेहतर होगा, हम समय रहते संभल जाएं।

 

 

बाबा टिकैत: किसानों को सत्ता से भिड़ने की ताकत देने वाला नेता

पिछले साल 2 अक्‍टूबर को जब देश गांधी जयंती मना रहा था तो दिल्‍ली पुलिस किसानों पर लाठियां बरसा रही थी। लाठियां बरसाने वाले जवान भी ज्यादातर किसानों के ही बेटे थे। इस तरह जवान और किसान आमने-सामने थे। राजधानी से अपने मन की बात कहने चले किसानों को सरकार ने यूपी बॉर्डर पर ही रोक दिया तो टकराव होना ही था। लेकिन इस टकराव के बीच उभरी इस तस्वीर को कौन भूल सकता है? एक बुजुर्ग किसान पुलिसवालों से भिड़ गया! इस तस्वीर के पीछे जिस आदमी का दिया हौसला है उस बाबा टिकैत की आज 8वीं पुण्यतिथि है।

2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली में प्रवेश करते किसानों के साथ पुलिस का टकराव

 

यह तस्वीर हाल के दशकों में किसानों की सबसे सशक्त आवाज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत मानी जा सकती है। किसानों में जो हौसला टिकैत भर गए थे, वह आज भी कहीं ना कहीं दिख जाता है। अगर चौधरी चरण सिंह के रूप में एक किसान प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा तो महेंद्र सिंह टिकैत ने सरकारों को किसान के आगे झुकना सिखाया।

खुद को गरीब मां का बेटा कहकर लंबी-लंबी फेंकने वाले आज के नेताओं से उलट चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का देसी अंदाज, सादा जीवन, जमीनी पकड़ और अक्खड़ मिजाज ही था जो हुकूमत को हिलाने की कुव्वत रखता था। इस आवाज ने कितनी ही बार किसानों के बिजली बिल माफ करवाए, मुआवजे और उचित दाम की मांगें पूरी करवाई। कई बार कुछ नहीं भी करवा पाए तो एक हिम्मत दिलाई कि सरकार को झुकाया जा सकता है। कोई तो है जो किसानों के साथ खड़ा है।

80 के दशक में जब चौधरी चरण सिंह और देवीलाल जैसे किसान नेताओं की सक्रियता के दिन बीत रहे थे और हरित क्रांति के सुनहरे दावे बोझ बनने लगे, तब टिकैत आते हैं। जब फसल की लागत और कीमत का अंतर घटने लगा और किसान नेतृत्व का खालीपन बढ़ रहा था, तब टिकैत खड़े हुए।

17 अक्टूबर, 1986 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले (अब शामली) के सिसौली गांव में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बनी भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) देश भर के किसानों की आवाज बन गई। भाकियू का यूपी, हरियाणा और पंजाब के अलावा राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी काफी असर था।

अस्सी के दशक में तब देश और प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें थीं। सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार, बिजली के दाम में बढ़ोतरी और फसलों के दाम को लेकर किसान खासे परेशान थे। इस दौरान जनवरी, 1987 में शामली के करमूखेडी बिजली घर पर किसानों का एक धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ जिसकी अगुवाई महेंद्र सिंह टिकैत कर रहे थे। किसान ट्यूब वैल की बिजली दरें बढ़ाए जाने से परेशान थे। इस आंदोलन से निपटने हेतु पुलिस ने किसानों पर गोलियां चला दी जिसमें लिसाढ़ गांव के किसान जयपाल सिंह व सिंभालका के अकबर अली की मौत हो गई। इस टकराव में पीएसी का एक जवान भी मारा गया। इस घटना ने एक बड़े किसान आंदोलन को जन्म दिया।

आखिरकार, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने टिकैत की ताकत को पहचाना और खुद सिसौली गांव जाकर किसानों को राहत का ऐलान किया। टिकैत ने घर आए मुख्यमंत्री को भी मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर किसानों का दिल जीत लिया। यह ठेट अंदाज उनकी पहचान बन गया। वे खुद भी ऐसे ही थे। एकदम साधारण किसान।

अगले साल यानी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी तादाद में किसान मेरठ कमिश्नरी का घेराव करने पहुंचे। मुद्दे तब भी वही थे। फसल का दाम, बिजली की महंगी दरें, महंगा खाद-पानी आदि। तब देश में कांग्रेस विरोधी लहर और जनता दल की अगुवाई में विपक्षी दलों के लामबंद होने के दिन थे। भाकियू के कमिश्नरी घेराव को समर्थन देने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ मच गई। लेकिन टिकैत ने अपने संगठन और आंदोलन को अराजनीतिक कहलाना पसंद किया। हालांकि, मोदी के गैर-राजनीतिक इंटरव्यू की तरह इस पर भी मतभेद हैं कि ऐसे किसान आंदोलन या संगठन कितने अराजनैतिक हो सकते हैं। मुख्यधारा की राजनीति के साथ संबंधों को लेकर ऊहापोह की यह स्थिति आज तक भाकियू और इससे टूटे धड़ों का पीछा नहीं छोड़ रही है।

शुरुआत से ही टिकैत और भारतीय किसान यूनियन पर जाट समुदाय और खाप का दबदबा था। लेकिन टिकैत को सभी धर्म-जात-खाप के लोगों को साथ लेकर चलने का श्रेय मिलना चाहिए। उनके सबसे पहले आंदोलन में जान देने वाले दो किसानों में से एक मुस्लिम था। जाट, गुर्जर और मुस्लिम और अन्य जातियों के किसान उनकी रैलियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। किसान के तौर पर अपनी पहचान को गले लगाते थे।

1988 में टिकैत ने मेरठ कमिश्नरी का ऐतिहासिक घेराव किया तो मंदिर आंदोलन और सांप्रदायिक राजनीतिक का जोर था। मेरठ दंगों की आग मेंं झुलस रहा था। लेकिन बाबा टिकैत के भाईचारे के नारों ने उस माहौल को बदल दिया। जात-धर्म भूलकर लोग खुद को किसान मानने लगे। हालांकि, नफरत की राजनीति के सामने यह दौर ज्यादा दिनों तक नहीं टिका। फिर भी भाईचारे की एक आवाज टिकैत की शक्ल में पश्चिमी यूपी में मौजूद थी जिसकी कमी आज खल रही है।

1989 में मुजफ्फरनगर के भोपा कस्बे में एक मुस्लिम युवती का अपहरण और हत्याकांड हुआ तो भाकियू ने इंसाफ के लिए नहर किनारे हफ्तों तक आंदोलन किया। उस आंदोलन की धुंधली-सी याद अब भी मेरे जेहन में है। नहर के दोनों किनारे पर दूर तक ट्रैक्टरों और किसानों का हुजूम था। पुलिस ने ट्रैक्टर नहर में धकेल दिए मगर किसान पीछे नहीं हटे। आखिर में एनडी तिवारी की सरकार को झुकना पड़ा और किसानों की मांगे मानने के अलावा ट्रैक्टर भी वापस दिलाने पड़े।

इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को तो मजबूत किया ही, भाकियू को उत्तर भारत के गांव-गांव में पहुंचा दिया। हरी टोपी किसान चेतना का प्रतीक बन गई। देश में एक नए किसान नेता का उभार राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बनने लगा।

महेंद्र सिंह टिकैत की 1988 में प्रसिद्ध बोट क्लब रैली

 

मेरठ कमिशनरी घेराव की कामयाबी के बाद महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में किसान पंचायत का ऐलान किया। 25 अक्टूबर 1988 को लाखों की तादाद में किसान नई दिल्‍ली के बोट क्लब पर आ डटे। पिछले तीस-चालीस साल में वह संभवत: सबसे बड़ी किसान रैली थी। दिल्ली पर किसानों का कब्जा-सा हो गया था। मजबूरी में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इन्दिरा गांधी की पुण्यतिथि का कार्यक्रम लाल किले के पीछे शिफ्ट करना पड़ा। टिकैत का यह अड़ियल रवैया किसानों को आत्मविश्वास से भर देता था। उन्हें अपनी ताकत का अहसास कराता था।

राजीव गांधी को इसलिए भी झुकना पड़ा क्योंकि टिकैत के साथ-साथ देश भर के तमाम किसान संगठन भी एकजुट होने लगे थे। तब कर्नाटक में नंजुंदास्वामी, आन्ध्र प्रदेश पी. शंकर रेड्डी, पंजाब के भूपेन्द्र सिंह मान और अजमेर सिंह लाखोवाल, महाराष्ट्र में नेता शरद जोशी, हरियाणा में घासीराम नैन, प्रेम सिंह दहिया किसानों की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे थे। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर किसान संगठनों के समन्वय की कोशिशें बहुत कामयाब नहीं रही। लेकिन टिकैत के साथ इन सभी किसान नेताओं ने सरकारों पर दबाव बनाए रखा।

आज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर कुछ बातें खासतौर गौर करने लायक हैं। जिस उत्तर प्रदेश में नेताओं की भरमार थी और एक के बाद एक प्रधानमंत्री सूबे से निकले रहे थे, वहां टिकैत ने आम किसान को ताकत दी। हर किसान खुद को टिकैत मानने लगा। हरी टोपी किसान स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। यह लोगों को “मैं भी अन्ना” लिखी टोपियां पहनाए जाने से काफी पहले की बात है। इन हरी टोपियों का असर आज तक कायम है।

हालांकि, टिकैत के आखिरी दिनों में जैसे-जैसे सांप्रदायिक राजनीति देश पर हावी होती गई, किसान आंदोलनों का असर भी घटने लगा था। किसान आंदोलन के बिखराव की कई दूसरी वजह भी हैं। लेकिन किसानों के हक की लड़ाई लड़ने और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने का जज्बा टिकैत में आखिरी सांस तक रहा। यह उनके आंदोलनों की ताकत ही थी कि पश्चिमी यूपी के सिसौली जैसे गांव को किसान राजनीति का केंद्र बना दिया। उनके हुक्के की गुडगुडाहट सरकार के पसीने छुड़ा देती थी। फसल के दाम, खाद-बिजली-पानी और जमीन के मुआवजे जैसे मुद्दों को लेकर वे जीवन भर किसानों के साथ डटे रहे।

सन 2010 में अलीगढ़ के टप्पल में किसानों के भूमि अधिग्रहण का आंदोलन उनकी आखिरी लड़ाई थी। 76 साल की उम्र में भी बाबा टिकैत किसानों की ताकत बने रहे। कभी अपनी जमीन नहीं छोड़ी!