किसानों के साथ धोखा? कम आंकी जा रही है उपज की लागत

इन बातों पर यकीन करना मुश्किल है! लेकिन आजकल बहुत कुछ मुमकिन है। पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन क्षेत्रों में क्रांतिकारी कारनामे हुए हैं, उनमें आंकड़ेबाजी अहम है। केंद्र सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करें तो पिछले पांच वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी भले न हुई हो, लेकिन खेती की लागत बढ़ने कम हो गई है। लागत में इस ठहराव यानी कमतर लागत के आधार पर ही केंद्र सरकार खरीफ फसलों के एमएसपी में भारी बढ़ोतरी का दावा कर रही है। कई अखबारों ने इसे बजट से पहले किसानों को सरकार का तोहफा करार दिया। कुछ लोगों ने मास्टर स्ट्रोक भी बताया ही होगा।

दावा और हकीकत

खुद केंद्र सरकार का दावा है कि खरीफ सीजन 2019-20 के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी से किसानों को लागत पर 50 से लेकर 85 फीसदी का लाभ मिलेगा। सरकार लागत पर डेढ़ गुना मुनाफा देने के वादे से काफी आगे निकल चुकी है।

एमएसपी की मामूली बढ़ोतरी को सरकार का तोहफा बताने की होड़

 

अब जरा इन दावों की हकीकत भी जान लीजिए। सामान्य किस्म के धान का एमएसपी इस साल सिर्फ 65 रुपये प्रति कुंतल बढ़ा है जो 4 फीसदी से भी कम है। लेकिन दावा है कि इस मामूली बढ़ोतरी के बावजूद किसानों को लागत पर 50 फीसदी रिटर्न मिलेगा। पता है कैसे? जिस लागत के आधार पर सरकार यह दावा कर रही है वह लागत पिछले पांच साल में सिर्फ 23 फीसदी बढ़ी मानी गई है। जबकि धान की खेती की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 114 फीसदी बढ़ी थी। मतलब, सरकारी अर्थशास्त्रियों ने 2014 के बाद धान उत्पादन की लागत को बढ़ने ही नहीं दिया। लागत बढ़ाएंगे तो एमएसपी भी ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा। लागत को ही कम से कम रखें तो एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी भी ज्यादा दिखेगी। सीधा गणित है।

खरीफ फसलों की अनुमानित लागत (रुपये प्रति कुंतल में )

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ नीति रिपोर्ट  https://cacp.dacnet.nic.in/KeyBullets.aspx?pid=39

 

सरकारी अर्थशास्त्री अपनी पर आ जाएं तो आंकड़ों को अपने पक्ष में घुमाना उनके बाएं हाथ का खेल है। मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम इस मुद्दे पर पूरा रिसर्च पेपर लिख चुके हैं कि हाल के वर्षों में भारत सरकार ने कैसे जीडीपी की ग्रोथ रेट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन किसानों के मामले में उल्टा हुआ। सरकारी अर्थशास्त्री किसानों की लागत बढ़ने ही नहीं दे रहे हैं। जमीन पर भले कितनी ही महंगाई क्यों ना हो, कागजों में खेती फायदे का सौदा साबित की जा रही है।

लागत पर ब्रेक और डेढ़ गुना दाम का दावा

फसलों का एमएसपी कितना होना चाहिए और उपज की लागत क्या आंकी जाए? इस हिसाब-किताब के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग नाम की एक सरकारी संस्था है जो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत काम करती है। इसमें दिग्गज कृषि अर्थशास्त्री बैठकर तय करते हैं कि किस उपज पर कितनी लागत आती है। विभिन्न राज्यों से कृषि लागत के आंकड़े जुटाए जाते हैं। महंगाई, आयात-निर्यात, वैश्विक बाजार और मौजूदा भंडार को देखते हुए फसलों के एमएसपी तय किए जाते हैं।

2009-10 खरीफ सीजन के लिए सीएसीपी ने तुहर यानी अरहर दाल की वास्तविक उत्पादन लागत (ए2 + एफएल) 1181 रुपये प्रति कुंतल आंकी थी। (ए2 + एफएल) वह लागत है जिसमें खेती पर आने वाले तमाम वास्तविक खर्च जैसे बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनरी, ईंधन का खर्च और खेती में लगे कृषक परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है।

इस प्रकार 2009-10 में तुहर उत्पादन की जो लागत 1181 रुपये प्रति कुंतल थी, वह 2014-15 तक बढ़कर 3105 रुपये हो गई। यानी पांच साल में तुहर की लागत 163 फीसदी या ढाई गुना से ज्यादा बढ़ी। ताज्जुब की बात है कि 2014 के बाद तुहर की लागत बढ़ने का सिलसिला थम-सा गया। 2014-15 से 2019-20 के बीच पांच वर्षों में तुहर की लागत सिर्फ 17 फीसदी बढ़कर 3636 रुपये प्रति कुंतल तक ही पहुंची। कहां पहले पांच वर्षों में 163 फीसदी की वृद्धि और कहां अब पांच साल में केवल 17 फीसदी की बढ़ोतरी? है ना कमाल! एक ही फसल, एक ही देश लेकिन लागत बढ़ती इतनी कम कैसे हो गई। यह सवाल तो उठेगा।

बड़ा सवाल

यह शोध का विषय है कि जिन फसलों की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ी थी, 2014 के बाद उनकी लागत 20-30 फीसदी ही क्यों बढ़ी है? यह सिर्फ अर्थशास्त्रियों का कारनामा है या फिर इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति भी सक्रिय है?

खुद सीएसीपी के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों की लागत 66 से 163 फीसदी तक बढ़ी थी। धान की लागत 114 फीसदी तो ज्वार की लागत 122 फीसदी बढ़ी थी। लेकिन 2014-15 के बाद के पांच वर्षों में खरीफ फसलों की लागत 5 से 43 फीसदी ही बढ़ी है। इस दौरान सबसे ज्यादा 43 फीसदी लागत सोयाबीन की बढ़ी जबकि सबसे कम 5 फीसदी लागत मूंगफली की बढ़ी है। यहां सबसे बड़ा सवालिया निशान खेती की लागत और एमएसपी तय करने की सरकारी प्रक्रिया पर है, जिसमें किसानों की हिस्सेदारी नाममात्र की रहती है।

किसानों पर दोहरी मार, फार्मूला और लागत का खेल

सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देना का शॉर्टकट ढूंढ़ लिया है। जब कमतर लागत को आधार बनाया जाएगा तो एमएसपी में थोड़ी बढ़ोतरी भी डेढ़ गुना बताई जा सकती है। यह बहस तब भी खड़ी हुई थी जब केंद्र सरकार ने समग्र लागत (सी2), जिसमें किसान की अपनी जमीन का अनुमानित किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है, की बजाय वास्तविक लागत (ए2 + एफएल) के आधार पर डे़ढ़ गुना एमएसपी देने का वादा किया था। पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि जिस कमतर लागत को सरकार आधार मान रही है, उनमें भी साल दर साल बेहद कम बढ़ोतरी आंकी जा रही है। यह किसानों पर दोहरी मार है।

जाहिर है कमतर लागत के आधार पर ही सरकार एमएसपी में बढ़ोतरी की वाहवाही बटोरना चाहती है। जबकि तथ्य यह है कि 2014 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों के एमएसपी 2014 के बाद पांच वर्षों के मुकाबले ज्यादा बढ़े थे। 2014 से 2019 के बीच केवल बाजरा, रागी, नाइजर बीज और कपास (लंबा रेशा) के एमएसपी में पहले 5 सालों के मुकाबले अधिक वृद्धि हुई है। जबकि 2009 से 2014 के बीच मुख्य खरीफ फसलों जैसे – धान, ज्वार, मक्का, तुहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, कपास और सोयाबीन के एमएसपी पिछले पांच वर्षों के मुकाबले अधिक बढ़े थे। खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के लिहाज से डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल पिछले पांच वर्षों से कमतर नहीं बल्कि बेहतर ही था।

खरीफ फसलों के एमएसपी में 1 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी

इस साल खरीफ फसलों के एमएसपी में जो मामूली बढ़ोतरी हुई है, उसे छिपा पाना मुश्किल है। खरीफ सीजन 2019-20 के लिए उपज एमएसपी में 1.1 फीसदी से लेकर 9.1 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। सबसे कम 1.1 फीसदी यानी 75 रुपये का इजाफा मूंग के एमएसपी में हुआ है। जबकि सबसे अधिक 9.1 फीसदी यानी 311 रुपये की वृद्धि सोयाबीन के एमएसपी में की गई है। खरीफ की प्रमुख फसल धान का एमएसपी सिर्फ 65 रुपये यानी 3.7 फीसदी ही बढ़ा है। कपास के एमएसपी में भी 1.8 – 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है। किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने और आमदनी दोगुनी के सरकारी दावे की फिलहाल यही असलियत है।

खरीफ फसलों के एमएसपी  (रुपये प्रति कुंतल)

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ रिपोर्ट, सीएसीपी के आंकड़े https://cacp.dacnet.nic.in/ViewContents.aspx?Input=1&PageId=36&KeyId=0 और पीआईबी की विज्ञप्ति http://pib.nic.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1576842

 

किसानों को उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से निकली यह बात 2014 में भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र तक पहुंच गई थी। मोदी सरकार ने सैद्धांतिक रूप से डेढ़ गुना दाम की नीति को अपनाया था। मगर इस पर अमल करने के तरीके में कई झोल हैं।

जिस लागत के आधार पर डेढ़ गुना दाम दिलना का दावा किया जा रहा है कि सरकार उस लागत को ही कम आंक रही है। इसलिए किसान के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है। जबकि लगातार सूखे और घाटे की मार झेल रहे किसानों को आंकड़ों की इस बाजीगर के बजाय कारगर राहत और ईमानदार कोशिशों की दरकार है।

 

AC में सूखे का पता ही नहीं चला? जानिए, कितने भीषण हैं हालत

जब तक फ्रीज में पानी की बोतलें भरी हैं और नल में पानी आ रही है, तब तक देश में सूखे का अहसास होना मुश्किल है। ठीक उसी तरह जैसे जब तक दिल्ली का दम स्मॉग में नहीं घुटने लगा, तब तक बहुत कम लोगों को वायु प्रदूषण की गंभीरता का अहसास था।

बहरहाल, देश के तकरीबन आधे हिस्से में सूखे के हालत हैं। इस स्थिति का अंदाजा तो मार्च-अप्रैल से ही होने लगा था, मगर तब पूरा देश चुनावी चर्चा में मशगूल था। अब मानसून का इंतजार करते-करते एक-एक दिन गुजर रहा है तो सूखे की तरफ ध्यान गया। हालांकि, देश में नए बने जल शक्ति मंत्रालय के मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जल संकट की खबरों को “मीडिया हाइप” करार दे चुके हैं। फिर भी जान लीजिए, देश में सूखे की स्थिति कितनी गंभीर है।

  1. मौसम विभाग ने इस साल मानसून में सामान्य के मुकाबले 96 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया है। प्राइवेट एजेंसी स्काईमेट का अनुमान और भी कम है। स्काईमेट के अनुसार, इस बार मानसून सीजन में 93 फीसदी बारिश होगी। यानी मानकर चलिए इस बार बहुत से इलाके बारिश के लिए तरस जाएंगे।
  2. पिछले पांच वर्षों में 2017 को छोड़कर हर साल मानसून में बारिश सामान्य से कम रही। लेकिन इस साल मानसून से पहले ही सूखे की मार पड़नी शुरू हो गई थी। बीते 1 मार्च से 31 मई के दौरान देश में सामान्य से 25 फीसदी कम यानी 99 मिलीमीटर हुई है। पिछले 65 वर्षों में यह दूसरा मौका है जब मानसून से पहले इतनी कम बारिश हुई और प्री-मानसून सूखे की स्थिति पैदा हो गई।
  3. आईआईटी, गांधीनगर की सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली के मुताबिक, देश का 44.41 फीसदी हिस्सा सूखे की स्थितियों का सामना कर रहा है जबकि पिछले साल इसी समय देश के 33.24 फीसदी हिस्से में सूखे के हालात थे। यानी पिछले साल के मुकाबले स्थिति काफी खराब है।
  4. इस साल मानसून देरी से पहुंचने के बाद बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इस बीच, अरब सागर में उठे ‘वायु’ चक्रवात ने भी इसकी गति को बाधित किया है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि 20 जून के बाद मानसून जोर पकड़ेगा।
  5. इस मानसून सीजन में 1-19 जून के दौरान देश में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश हुई है। देश के 36 मौसम क्षेत्रों में से 30 क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश है जबकि केवल 6 मौसम क्षेत्रों में सामान्य या इससे अधिक बारिश हुई है। विदर्भ में सामान्य से 89 फीसदी, मराठवाडा में 75 फीसदी, पश्चिमी यूपी में 73 फीसदी, पूर्वी यूपी में 84 फीसदी और झारखंड में 71 फीसदी कम बारिश से सूखे के खतरे को समझा जा सकता है।
  6. महाराष्ट्र और कर्नाटक के ज्यादातर जिले सूखे के संकट से जूझ रहे हैं। 47 साल का सबसे भीषण सूखा झेल रहे महाराष्ट्र की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पश्चिमी महाराष्ट्र के कई गांवों से लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। कई जिलों में टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। राज्य के 35 बड़े बांध लगभग खाली हो चुके हैं, नदियां सूखी हैं और करीब 20 हजार गांव सूखे की चपेट में हैं।
  7. यूपी के बुंदेलखंड से भी सूखे के चलते लोग गांव छोड़नेे को मजबूूूर हैं। बिहार में लू लगने से 108 लोगों के मरने की पुष्टि खुद राज्य सरकार कर चुकी है। अकेले गया जिले में लू लगने से 33 लोगों की मौत हो चुकी है। भीषण गर्मी को देखते हुए बिहार के 6 जिलों में धारा 144 लगा दी गई है।
  8. सूखे के इस संकट का सीधा संबंध बढ़ती गर्मी और मरुस्थलीकरण से है। इस साल पहली बार दिल्ली का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया, जबकि 50.8 डिग्री तापमान के साथ राजस्थान के चुरू में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट गए।
  9. नीति आयोग की एक रिपोर्ट देश में भीषण जल संकट से आगाह करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद जैसे 21 महानगरों में भूजल समाप्त हो जाएगा और 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी पेयजल के लिए तरसेगी। फिलहाल, भारत में करीब 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं।
  10. नीति आयोग की आशंका चेन्नई में सच साबित होती दिख रही है। शहर में पानी की इतनी किल्लत है कि कई आईटी कंपनियों ने कर्मचारियों को दफ्तर आने से मना कर घर से काम करने को कहा है। चेन्नई को जलापूर्ति करने वाले चार प्रमुख जलाशय लगभग सूख चुके हैं। शहर में हाहाकार मचा है। देश-विदेश का मीडिया चेन्नई के जल संकट को कवर कर रहा है।
  11. केंद्रीय भूजल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। दक्षिण और पश्चिमी भारत के जलाशयों में जलस्तर 10 साल के औसत यानी सामान्य स्तर से नीचे चला गया है। हालांकि, देश में कुल मिलाकर जलाशयों में जलस्तर पिछले साल से बेहतर है लेकिन देश के 91 में से 71 जलाशयों में पानी घट रहा है।
  12. देश के बड़े हिस्से में सूखे का असर सोयाबीन, कपास, धान और मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुवाई पर भी पड़ रहा है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, 14 जून तक खरीफ की बुवाई पिछले साल की तुलना में 9 फीसदी कम है। असिंचित क्षेत्रों में किसान खरीफ की बुवाई के लिए बारिश की आस लगाए बैठे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों में सूखे की वजह से चीनी का उत्पादन 15 फीसदी घट सकता है। विदर्भ में संतरे के आधे से ज्यादा बगीचे सूखकर बर्बाद होने की खबरें आ रही हैं।

 

 

अमेरिकी बादाम-अखरोट कैसे पचा लेती है हमारी देशभक्ति?

देश के किसान जो कुछ भी उगाते हैं, उसका बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को बेचा जाता है। इसी तरह हम अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाने-पीने की चीजों खासकर फलों, दालों और खाद्य तेलों का आयात करते हैं। कृषि व्यापार का यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है, लेकिन इसके नियम-कायदे और तौर-तरीके बदलते रहते हैं। किसानों को उनकी उपज का क्या दाम मिलेगा, यह बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग-पूर्ति और दाम पर निर्भर करता है। आयात-निर्यात से जुड़ी नीतियां और फैसले इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

हाल ही में भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले सेब, बादाम, अखरोट समेत कुल 28 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। यानी, अमेरिका से इन चीजों का आयात महंगा पड़ेगा। यह कदम अमेरिका की उस कार्रवाई के विरोध में उठाया गया, जिसके तहत भारत से ड्यूटी फ्री एक्सपोर्ट जैसी रियायतें खत्म कर दी गई हैं। व्यापार मोर्चे पर अमेरिका के साथ इस तनातनी के अलावा भारत का बढ़ता कृषि आयात और घटता निर्यात अपने आप में चिंताजनक है।

साल 2013-14 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों के दौरान भारत के कृषि निर्यात में सालाना 2.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। मतलब, कृषि निर्यात बढ़ने के बजाय घट गया है। जबकि इसी अवधि में कृषि आयात सालाना 6.7 फीसदी की दर से बढ़ा है। जब देश में खाद्यान्न, फल, सब्जियों और दूध का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है, उसी दौर में हम दूसरे देशों से खाने-पीने की चीजों का खूब आयात करते जा रहे हैं। इसकी मार आखिरकार किसानों पर ही पड़ रही है। इस पूरे खेल के पीछे एग्री कमोडिटी ट्रेडिंग के बड़े खिलाड़ियों का हाथ है जो सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस खेल के चलते जो चीजें भारत में आसानी से पैदा हो सकती हैं, उनके लिए भी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। जो पैसा देश के किसानों की जेब में जा सकता है, वो देश से बाहर जा रहा है। उफनते राष्ट्रवाद के इस दौर में किसानों और देश के हितों पर यह चोट जारी है मगर कहीं कोई चर्चा ही नहीं! किसी को इसकी चिंता ही नहीं! ना ही किसी की राष्ट्रवादी भावनाएं आहत हो रही हैं।

हालत यह है कि भारत अमेरिकी बादाम का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। अमेरिका से हर साल भारत करीब 3,800 करोड़ रुपये का बादाम आयात करता है। इसी तरह भारत अमेरिका के सेब का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और हर साल करीब 1100 करोड़ रुपये का सेब अमेरिका से मंगाता है। देखा जाए तो अमेरिका के सेब, बादाम, अखरोट उगाने वाले किसान भारत के लिए खेती कर रहे हैं। हमारा किसान सही दाम के लिए टमाटर, प्याज  सड़क पर फेंकने से आगे सोच ही नहीं पा रहा है।

सिर्फ सेब और बादाम को ही जोड़ लें तो हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपये का आयात हम अमेरिका से करते हैं। जबकि सेब और बादाम भारत के कई राज्यों में पैदा होता है। किसानों को प्रोत्साहित किया जाए तो इन चीजों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बजाय भारत अमेरिका और अन्य देशों पर निर्भरता बढ़ाता जा रहा है। खाद्य तेलों और दालों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। आत्मनिर्भरता के बजाय देश ने आयात निर्भरता का रास्ता चुना है।

पिछले 5 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। देश का कृषि आयात बढ़ता जा रहा है जबकि निर्यात घटा है। साल 2013-14 में भारत का कृषि आयात करीब 15 अरब डॉलर था जो 2018-19 में बढ़कर 19 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। दूसरी तरफ, 2013-14 में भारत का कृषि निर्यात 42.86 अरब डालर था जो 2018-19 में घटकर 38.49 अरब डालर रह गया है। कृषि आयात और निर्यात का अंतर लगातर सिकुड़ रहा है। यानी ट्रेड सरप्लस कम होता जा रहा है। किसानों के साथ-साथ सरकारी खजाने के लिए भी नुकसानदेह है।

कृषि में वर्षों की मेहनत से हासिल आत्मनिर्भरता को हम आयात निर्भरता में गंवाते जा रहे हैं। जबकि पूरी दुनिया व्यापार युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका, चीन जैसे ताकतवर देश अपनी व्यापार नीतियों से दूसरे देशों पर वार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। लेकिन विदेशी सेब, बादाम और अखरोट खाकर भी हमारा राष्ट्रप्रेम खूब फल-फूल रहा है। राष्ट्रवाद के समूचे नैरेटिव से स्वदेशी के स्वर लुप्तप्राय हैं। जबकि स्वेदशी के पेरोकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में हैं। लेकिन चीन की पिचकारियों और झालर, फुलझड़ियों के अलावा शायद ही किसी चीज के आयात का विरोध हाल के वर्षों में हुआ है।

माना कि देश के दरवाजे अमेरिका या दूसरे देशों के लिए बंद नहीं किए जा सकते हैं। विश्व व्यापार की अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन जिन चीजों का हर साल हजारों करोड़ रुपये का आयात हो रहा है, उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित तो कर ही सकती है। कृषि आयात को कम से कम रखना देश और किसानों दोनों के हित में है। आयात शुल्क में बढ़ोतरी इसका सीधा, सरल उपाय है। लेकिन अक्सर होता इसके उलट है। देश के दरवाजे सस्ते आयात के लिए खोल दिए जाते हैं।

हिमाचल के सेब उगाने वाले किसान कई साल से आयात की मार झेल रहे हैं। इसी तरह कश्मीर और दूसरे राज्यों के किसान भी अमेरिकन ड्राईफ्रूट के आयात से परेशान हैं। कम से कम आयात की मार झेल रहे इन किसानों के हित में ही सरकार कुछ मददगार कदम उठा ले। कृषि आयात को हतोत्साहित करे। वैसे भी दुनिया में व्यापार युद्ध के हालात बन रहे हैं। बेहतर होगा, हम समय रहते संभल जाएं।

 

 

मोदी की आंधी में कैसे गुम हुए किसान आंदोलन और उनके नेता

याद कीजिए, 2014 के बाद मोदी सरकार को पहली चुनौती कैसे मिली थी? भारी बहुमत और मजबूत इरादों के बावजूद भूमि अधिग्रहण विधेयक के मुद्दे पर मोदी सरकार को झुकना पड़ा था। क्योंकि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर लामबंद हो गया था। इसके बाद भी हर साल किसानों के आंदोलन, धरने-प्रदर्शन और महापड़ाव सुर्खियों में छाए रहे। यह एकमात्र मोर्चा था जहां मोदी सरकार लगातार घिरती नजर आई। लेकिन 2019 आते-आते यह सब हवा हो गया।

विपक्ष के तमाम समीकरणों, गठबंधनों, दिग्गजों और मंसूबों को धराशायी करने वाली नरेंद्र मोदी और उनके राष्ट्रवाद की आंधी ने किसानों आंदोलनों को भी बेअसर कर दिया। इतना बेअसर कि न तो पूरे चुनाव में किसानों के मुद्दे कहीं सुनाई पड़े और न ही नतीजों पर उनका कोई असर दिखा।

उपज का उचित दाम न मिलने के खिलाफ किसान संगठनों की ‘गांव बंद’ सरीखी मुहिम लोकसभा चुनावी में बेअसर

 

जिन सूबों की राजनीति किसान और खेती के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां भी किसान मुद्दा नहीं बन सका। यह विपक्ष की नाकामी तो है ही, मोदी का भी मैैजिक है। इसके अलावा कुछ असर किसानों के खातों में सीधे पैसे पहुंचाने की पीएम-किसान जैसी योजनाओं का भी जरूर रहा। जबकि विपक्ष और किसानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले नेता यह भरोसा पैदा करने में नाकाम रहे कि वे वाकई किसानों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

मोदी तंत्र बेहद चुस्त और चौकन्ना भी था। चुनाव से ठीक पहले किसानों के खातों में सालाना 6 हजार रुपये पहुंचाने के लिए पीएम-किसान योजना लाई गई। सरकार नेे आनन-फानन मेें सवा दो करोड़ से ज्यादा किसानों के खातों में 2,000 रुपये की पहली किस्त भी पहुंचा दी। इनमें एक करोड़ से ज्यादा किसान उत्तर प्रदेश के थे। महागठबंधन की एक काट यह भी थी, जो किसानों की नाराजगी दूर करने में मददगार साबित हुई।

अभी छह महीने भी नहीं हुए जब किसान कर्जमाफी के वादे ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी कराई थी। लेकिन तीनों राज्यों में  कांग्रेस सरकारें किसानों के मुद्दे पर अब बैकफुट पर आ चुकी हैं। आधी-अधूरी कर्जमाफी को लेकर कांग्रेस इस कदर घिरी कि कर्जमाफी का श्रेय लेना तो दूर किसानों को मुद्दा ही नहीं बना पाई। इसे यूं भी देख सकते हैं कि किसानों के जिस मुद्दे को कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भुना लिया था, उसे कुछ महीनों बाद दोबारा भुनाना मुश्किल हो गया, क्योंकि अब सवाल उसकी राज्य सरकारों पर भी उठने लगे थे।

मध्य प्रदेश जहां मंदसौर से भड़का आंदोलन किसानों के गुस्से का प्रतीक बन गया था, वहां भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। मंदसौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन भाजपा प्रत्याशी से करीब पौने चार लाख वोटों से हारी। इसी तरह खंडवा में कमलनाथ सरकार के कृषि मंत्री सचिन यादव के भाई अरुण यादव मैदान में थे, उन्हें भाजपा के नंद कुमार सिंह ने पौने तीन लाख वोटों से हराया। शहरों की बात तो छोड़ ही दीजिए, यह मध्य प्रदेश के किसान बहुल इलाकों का हाल है। विधानसभा चुनाव में 41 फीसदी वोट हासिल करने वाली कांग्रेस लोकसभा की एकमात्र छिंदवाड़ा सीट बचा सकी। जबकि वोट शेयर घटकर 34.5 फीसदी रह गया। इससे ज्यादा वोट तो कांग्रेस को 2014 में मिले थे। तब 2 सीटों पर जीती थी।

इन नतीजों के बारे में मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष केदार सिरोही का कहना है कि यह मुद्दों का चुनाव था ही नहीं। भावनाओं का चुनाव था। किसानों का गुस्सा विधानसभा चुनाव में भाजपा पर निकल चुका था। इस बीच पुलवामा हो गया। और माहौल बदल गया। सिरोही मानते हैं कि ना तो कांग्रेस ने इस चुनाव में किसानों के मुद्दों को बहुत गंभीरता से उठाया और ना ही खुद किसानों ने इन मुद्दों को खास तवज्जो दी। कांग्रेस भी भावनात्मक मुद्दों और भाजपा के एजेंडे में उलझ गई। इसलिए मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों, फसल के दाम और किसानों के मुद्दों पर बात नहीं हुई।

कमोबेश यही स्थिति छत्तीसगढ़ में रही जहां सत्ता में आते ही कांग्रेस किसानों के सवालों पर मोदी सरकार को घेरना भूलकर अपने बचाव में जुट गई। विधानसभा चुनाव में 85 में से 68 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप करने वाली कांग्रेस छत्तीसगढ़ की 11 में से केवल 2 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर पाई है।

पिछले पांच वर्षों में महाराष्ट्र केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारों के खिलाफ किसान आंदोलनों का गढ़ बना रहा। लेकिन लोकसभा चुनाव में किसानों के मुद्दों की छाया भी भाजपा और शिवसेना को छू नहीं पाई। वहां कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया और एनसीपी 4 सीटों पर ही सिमटी रही। महाराष्ट्र में किसान आंदोलनों को चेहरा रहे स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के राजू शेट्टी हातकणंगले सीट करीब 96 हजार वोटों से हार गए जबकि उन्हें कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन हासिल था। सांगली में भी कांग्रेस-एनसीपी समर्थित स्वाभिमानी पक्ष के उम्मीदवार को डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र की गन्ना बेल्ट में शरद पवार-राजू शेट्टी का गठबंधन मोदी वेव के सामने बेअसर साबित हुआ। पश्चिमी महाराष्ट्र में एनसीपी और राजू शेट्टी का गढ़ रहे कोल्हापुर, हातकंणगले, सांगली और माढा लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा और शिवसेना का परचम फैल चुका है। किसान और कॉओपरेटिव पॉलिटिक्स के दिग्गज शरद पवार के कुनबे को पहली बार हार का मुंह देखना पड़ा है। मावल लोकसभा सीट पर शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार दो लाख से ज्यादा वोटों से हार गए। कांग्रेस ने महाराष्ट्र की 48 सीटों में से एकमात्र चंद्रपुर सीट जीती है। किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष नाना पटोले को नागपुर में नितिन गडकरी ने करारी शिकस्त दी। कांग्रेस के दो पूर्व सीएम अपनी सीट भी नहीं बचा पाए।

महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और राजू शेट्टी के गठबंधन का खेल बिगाड़ने में प्रकाश अंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के गठजोड़ का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसान राजनीति पर शरद पवार की पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

अक्टूबर 2018 में भाकियू की किसान क्रांति यात्रा

 

महाराष्ट्र की तरह कृषि प्रधान होते हुए भी उत्तर प्रदेश की कहानी अलग है। यहां मुख्य विपक्षी दलों सपा और बसपा ने पांच साल किसानों के मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिल्ली में होने वाले किसानों के धरने-प्रदर्शन को कभी समर्थन नहीं दिया। हालांकि, गठबंधन की तीसरी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल किसान राजनीति करने का दम भरती है। लेकिन उसके धरने-प्रदर्शनों की गूंज पश्चिमी यूपी के 4-5 जिलों से बाहर नहीं निकली। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन बस परंपरागत वोट बैंक और उसके गठजोड़ के भरोसे था, जो गच्चा दे गया।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत संभाल रही भारतीय किसान यूनियन ने पिछले साल किसान क्रांति यात्रा ज़रूर निकाली थी। लेकिन टिकैत बंधु भी मोदी सरकार के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं कर पाए। 2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच हुए संघर्ष से ज्यादा किसान यात्रा की अचानक समाप्ति का ऐलान चर्चाओं में रहा। इस तरह किसानों की खुदकुशी, गहराते कृषि संकट और किसान के बार-बार सड़कों पर उतरने के बावजूद किसान राजनीति नेतृत्व और भरोसे की कमी का शिकार हो गई। कृषक जातियों का बड़ा हिस्सा भी मोदी लहर को प्रचंड बनाने में जुटा रहा।

कैराना और नूरपुर उपचुनाव में “जिन्ना नहीं गन्ना” नारे के साथ गठबंधन की उम्मीदें जगाने वाली रालोद के दोनों बड़े नेता अजित सिंह और जयंत चौधरी सपा-बसपा और कांग्रेस के समर्थन के बावजूद चुनाव हार गए हैं। पांच साल में कोई बड़ा किसान आंदोलन खड़ा न करना और किसानों के मुद्दे पर ढुलमुल रवैया इस गठबंधन की खामियों में गिना जाएगा। तभी तो देश को चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेता देने वाले उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में फिलहाल गहरा सन्नाटा है।

कमोबेश यही स्थिति हरियाणा की है जहां इंडियन नेशनल लोकदल पारिवारिक कलह में बिखर गई तो कांग्रेस किसानों के मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय जातिगत घेराबंद में लगी रही। इस बीच, छोटे-छोटे संगठन अपने स्तर पर किसानों के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन चुनाव में उनका कोई असर नहीं दिखा। जबकि जाट ध्रुवीकरण और मोदी ब्रांड के सहारे भाजपा हरियाणा की सभी 10 सीटें भारी अंतर से जीतने में कामयाब रही। किसान कार्यकर्ता रमनदीप सिंह मान का कहना है कि 2019 की लोकसभा में 38% सांसद खुद को किसान बता रहे हैं, लेकिन किसान के असल मुद्दे अछूते ही रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी किसानों की अनदेखी की है। किसान खुद भी अपनी परेशानियां भूलकर चुनाव के समय जात-धर्म  में बंट जाता है।

मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों के मुद्दे जोर-शोर से उठे थे। उससे पहले शेखावाटी में सीपीएम की ऑल इंडिया किसान सभा ने एक बड़ा आंदोलन किया था। लेकिन यहां भी लोकसभा चुनाव पूरी तरह मोदी और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। सीकर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के किसान नेता अमरा राम महज 31 हजार वोट पा सके। उधर, भाजपा ने राजस्थान में तेजी से उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल को साध लिया। इससे जाटों का साथ तो मिला ही, किसानों के मुद्दों पर मोदी सरकार को भी घिरने से बचा लिया। विधानसभा चुनाव में भी बेनीवाल ने कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।

लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए का दामन थामने वाले राजस्थान के उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल

 

पंजाब में सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी अकाली दल एक-दूसरे पर कृषि संकट का ठीकरा तो फोड़ते रहे लेकिन चुनाव में इन मुद्दों का खास असर वहां भी नहीं दिखा। भाजपा सिर्फ एक सीट पर मुकाबले में थी, जहां सनी देओल के हैंडपंप और मोदी ब्रांड के अलावा किसी मुद्दे की जरूरत नहीं पड़ी।

पिछले बार पंजाब में 30 फीसदी वोट 4 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी की तरफ से सिर्फ भगवंत मान लोकसभा में पहुंचे हैं। आप का वोट बैंक घटकर 7.4 फीसदी रह गया, बाकी कांग्रेस, अकाली और भाजपा में बंट गया। हालांकि, भगवंत मान किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे है, लेकिन आप भी किसानों के लिए संघर्ष करने के बजाय अपने ही झगड़ों में उलझी रही। जबकि खुद को गैर-राजनीतिक कहने वाली पंजाब की कई किसान यूनियनें नोटा के फेर में पड़ गईं। पंजाब में डेढ़ लाख से ज्यादा करीब 1.12 फीसदी वोट नोटा को गया। यानी विकल्प की कमी साफ नजर आई।

मोदी की आंधी में देवगौड़ा जैसे दिग्गज भी धराशायी

 

उत्तर भारत ही नहीं दक्षिण भारत में भी मोदी वेव के सामने किसान राजनीति कहीं टिक नहीं पाई। कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा को तुमकुर सीट पर और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के पुत्र निखिल को मांड्या सीट पर करारी शिकस्त मिली है। देवगौड़ा की छवि जमीन से जुड़े किसान नेता की रही है। लेकिन इस बार उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट पर जीती। कर्नाटक में कांग्रेेेस भी 9 सेे घटकर 1 सीट पर आ गई है।

लोकसभा चुनावों में बेअसर किसान आंदोलनों और जमीनी मुद्दों के सन्नाटे पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि मतदाताओं पर हिंदुत्ववादी भावनाएं हावी रही। किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले पार्टियां भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही। हालांकि, इस बीच किसानों की समस्याओं को लेकर जागरुकता बढ़ी है और डायरेक्ट इनकम सपोर्ट का मुद्दा सरकारों और राजनीतिक दलों के एजेंडे में आ चुका है। इसे वे अच्छा संकेत मानते हैं।

किसान संगठनों को लामबंद करने के लिए 2017 में निकली किसान मुक्ति यात्रा

 

पिछले दो साल के दौरान स्वराज इंडिया पार्टी के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने किसान संगठनों को लामबंद करने के काफी प्रयास किये। लेकिन ये कोशिशें चुनाव में असर दिखाने लायक ताकत हासिल नहीं कर पाई। चुनाव आते-आते योगेंंद्र यादव और वीएम सिंह नोटा का राग अलापने लगे। इस तरह राष्ट्रीय तो क्या क्षेत्रीय स्तर पर भी किसानों का कोई प्रभावी मोर्चा नहीं बन पाया।

कांग्रेस ने किसानों के लिए अलग बजट जैसे वादे ज़रूर किये, लेकिन पुलवामा के बाद किसानों के मुद्दों से भटक गई। राहुल गांधी किसानों के सवाल उठाते रहे, लेकिन उनकी अपनी कमियां और कमजोरियां हैं। आज की तारीख में कांग्रेस के पास कोई बड़ा किसान नेता नहीं है। ऐसी कोई कोशिश भी नहीं है। इसलिए लेफ्ट और किसान संगठनों के आंदोलनों से मोदी सरकार को मिली चुनौती लोकसभा चुनाव तक बिखर चुकी थी।

वैसे, भाजपा ने यह चुनाव जिस धनबल, सत्ता तंत्र, दुष्प्रचार और मजबूत संगठन के बूते लड़ा है, उसे भी नहीं भूलना चाहिए। विपक्ष की आवाज और असल मुद्दों को ना उठने देने में मीडिया के बड़े हिस्से ने पूरा जोर लगा दिया था। बाकी कसर निष्प्रभावी और बिखरे हुए विपक्ष ने पूरी कर दी।

बहरहाल, जमीनी मुद्दों पर सन्नाटे के बीच इन चुनावों में एक अनूठा उदाहरण भी सामने आया है। तेलंगाना की निजामाबाद सीट से मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी कविता के खिलाफ 179 निर्दलीय उम्मीदवारों ने मोर्चा खोल दिया था, इनमें से ज्यादातर सरकार से नाराज हल्दी उगाने वाले किसान थे। इन निर्दलीय उम्मीदवारों को कुल मिलाकर एक लाख से ज्यादा वोट मिले और कविता 70 हजार वोटों से चुनाव हार गईं। मुद्दों पर चुप्पी के बीच विरोध जताने का एक नायाब तरीका यह भी है।

 

 

बाबा टिकैत: किसानों को सत्ता से भिड़ने की ताकत देने वाला नेता

पिछले साल 2 अक्‍टूबर को जब देश गांधी जयंती मना रहा था तो दिल्‍ली पुलिस किसानों पर लाठियां बरसा रही थी। लाठियां बरसाने वाले जवान भी ज्यादातर किसानों के ही बेटे थे। इस तरह जवान और किसान आमने-सामने थे। राजधानी से अपने मन की बात कहने चले किसानों को सरकार ने यूपी बॉर्डर पर ही रोक दिया तो टकराव होना ही था। लेकिन इस टकराव के बीच उभरी इस तस्वीर को कौन भूल सकता है? एक बुजुर्ग किसान पुलिसवालों से भिड़ गया! इस तस्वीर के पीछे जिस आदमी का दिया हौसला है उस बाबा टिकैत की आज 8वीं पुण्यतिथि है।

2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली में प्रवेश करते किसानों के साथ पुलिस का टकराव

 

यह तस्वीर हाल के दशकों में किसानों की सबसे सशक्त आवाज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत मानी जा सकती है। किसानों में जो हौसला टिकैत भर गए थे, वह आज भी कहीं ना कहीं दिख जाता है। अगर चौधरी चरण सिंह के रूप में एक किसान प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा तो महेंद्र सिंह टिकैत ने सरकारों को किसान के आगे झुकना सिखाया।

खुद को गरीब मां का बेटा कहकर लंबी-लंबी फेंकने वाले आज के नेताओं से उलट चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का देसी अंदाज, सादा जीवन, जमीनी पकड़ और अक्खड़ मिजाज ही था जो हुकूमत को हिलाने की कुव्वत रखता था। इस आवाज ने कितनी ही बार किसानों के बिजली बिल माफ करवाए, मुआवजे और उचित दाम की मांगें पूरी करवाई। कई बार कुछ नहीं भी करवा पाए तो एक हिम्मत दिलाई कि सरकार को झुकाया जा सकता है। कोई तो है जो किसानों के साथ खड़ा है।

80 के दशक में जब चौधरी चरण सिंह और देवीलाल जैसे किसान नेताओं की सक्रियता के दिन बीत रहे थे और हरित क्रांति के सुनहरे दावे बोझ बनने लगे, तब टिकैत आते हैं। जब फसल की लागत और कीमत का अंतर घटने लगा और किसान नेतृत्व का खालीपन बढ़ रहा था, तब टिकैत खड़े हुए।

17 अक्टूबर, 1986 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले (अब शामली) के सिसौली गांव में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बनी भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) देश भर के किसानों की आवाज बन गई। भाकियू का यूपी, हरियाणा और पंजाब के अलावा राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी काफी असर था।

अस्सी के दशक में तब देश और प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें थीं। सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार, बिजली के दाम में बढ़ोतरी और फसलों के दाम को लेकर किसान खासे परेशान थे। इस दौरान जनवरी, 1987 में शामली के करमूखेडी बिजली घर पर किसानों का एक धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ जिसकी अगुवाई महेंद्र सिंह टिकैत कर रहे थे। किसान ट्यूब वैल की बिजली दरें बढ़ाए जाने से परेशान थे। इस आंदोलन से निपटने हेतु पुलिस ने किसानों पर गोलियां चला दी जिसमें लिसाढ़ गांव के किसान जयपाल सिंह व सिंभालका के अकबर अली की मौत हो गई। इस टकराव में पीएसी का एक जवान भी मारा गया। इस घटना ने एक बड़े किसान आंदोलन को जन्म दिया।

आखिरकार, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने टिकैत की ताकत को पहचाना और खुद सिसौली गांव जाकर किसानों को राहत का ऐलान किया। टिकैत ने घर आए मुख्यमंत्री को भी मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर किसानों का दिल जीत लिया। यह ठेट अंदाज उनकी पहचान बन गया। वे खुद भी ऐसे ही थे। एकदम साधारण किसान।

अगले साल यानी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी तादाद में किसान मेरठ कमिश्नरी का घेराव करने पहुंचे। मुद्दे तब भी वही थे। फसल का दाम, बिजली की महंगी दरें, महंगा खाद-पानी आदि। तब देश में कांग्रेस विरोधी लहर और जनता दल की अगुवाई में विपक्षी दलों के लामबंद होने के दिन थे। भाकियू के कमिश्नरी घेराव को समर्थन देने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ मच गई। लेकिन टिकैत ने अपने संगठन और आंदोलन को अराजनीतिक कहलाना पसंद किया। हालांकि, मोदी के गैर-राजनीतिक इंटरव्यू की तरह इस पर भी मतभेद हैं कि ऐसे किसान आंदोलन या संगठन कितने अराजनैतिक हो सकते हैं। मुख्यधारा की राजनीति के साथ संबंधों को लेकर ऊहापोह की यह स्थिति आज तक भाकियू और इससे टूटे धड़ों का पीछा नहीं छोड़ रही है।

शुरुआत से ही टिकैत और भारतीय किसान यूनियन पर जाट समुदाय और खाप का दबदबा था। लेकिन टिकैत को सभी धर्म-जात-खाप के लोगों को साथ लेकर चलने का श्रेय मिलना चाहिए। उनके सबसे पहले आंदोलन में जान देने वाले दो किसानों में से एक मुस्लिम था। जाट, गुर्जर और मुस्लिम और अन्य जातियों के किसान उनकी रैलियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। किसान के तौर पर अपनी पहचान को गले लगाते थे।

1988 में टिकैत ने मेरठ कमिश्नरी का ऐतिहासिक घेराव किया तो मंदिर आंदोलन और सांप्रदायिक राजनीतिक का जोर था। मेरठ दंगों की आग मेंं झुलस रहा था। लेकिन बाबा टिकैत के भाईचारे के नारों ने उस माहौल को बदल दिया। जात-धर्म भूलकर लोग खुद को किसान मानने लगे। हालांकि, नफरत की राजनीति के सामने यह दौर ज्यादा दिनों तक नहीं टिका। फिर भी भाईचारे की एक आवाज टिकैत की शक्ल में पश्चिमी यूपी में मौजूद थी जिसकी कमी आज खल रही है।

1989 में मुजफ्फरनगर के भोपा कस्बे में एक मुस्लिम युवती का अपहरण और हत्याकांड हुआ तो भाकियू ने इंसाफ के लिए नहर किनारे हफ्तों तक आंदोलन किया। उस आंदोलन की धुंधली-सी याद अब भी मेरे जेहन में है। नहर के दोनों किनारे पर दूर तक ट्रैक्टरों और किसानों का हुजूम था। पुलिस ने ट्रैक्टर नहर में धकेल दिए मगर किसान पीछे नहीं हटे। आखिर में एनडी तिवारी की सरकार को झुकना पड़ा और किसानों की मांगे मानने के अलावा ट्रैक्टर भी वापस दिलाने पड़े।

इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को तो मजबूत किया ही, भाकियू को उत्तर भारत के गांव-गांव में पहुंचा दिया। हरी टोपी किसान चेतना का प्रतीक बन गई। देश में एक नए किसान नेता का उभार राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बनने लगा।

महेंद्र सिंह टिकैत की 1988 में प्रसिद्ध बोट क्लब रैली

 

मेरठ कमिशनरी घेराव की कामयाबी के बाद महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में किसान पंचायत का ऐलान किया। 25 अक्टूबर 1988 को लाखों की तादाद में किसान नई दिल्‍ली के बोट क्लब पर आ डटे। पिछले तीस-चालीस साल में वह संभवत: सबसे बड़ी किसान रैली थी। दिल्ली पर किसानों का कब्जा-सा हो गया था। मजबूरी में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इन्दिरा गांधी की पुण्यतिथि का कार्यक्रम लाल किले के पीछे शिफ्ट करना पड़ा। टिकैत का यह अड़ियल रवैया किसानों को आत्मविश्वास से भर देता था। उन्हें अपनी ताकत का अहसास कराता था।

राजीव गांधी को इसलिए भी झुकना पड़ा क्योंकि टिकैत के साथ-साथ देश भर के तमाम किसान संगठन भी एकजुट होने लगे थे। तब कर्नाटक में नंजुंदास्वामी, आन्ध्र प्रदेश पी. शंकर रेड्डी, पंजाब के भूपेन्द्र सिंह मान और अजमेर सिंह लाखोवाल, महाराष्ट्र में नेता शरद जोशी, हरियाणा में घासीराम नैन, प्रेम सिंह दहिया किसानों की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे थे। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर किसान संगठनों के समन्वय की कोशिशें बहुत कामयाब नहीं रही। लेकिन टिकैत के साथ इन सभी किसान नेताओं ने सरकारों पर दबाव बनाए रखा।

आज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर कुछ बातें खासतौर गौर करने लायक हैं। जिस उत्तर प्रदेश में नेताओं की भरमार थी और एक के बाद एक प्रधानमंत्री सूबे से निकले रहे थे, वहां टिकैत ने आम किसान को ताकत दी। हर किसान खुद को टिकैत मानने लगा। हरी टोपी किसान स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। यह लोगों को “मैं भी अन्ना” लिखी टोपियां पहनाए जाने से काफी पहले की बात है। इन हरी टोपियों का असर आज तक कायम है।

हालांकि, टिकैत के आखिरी दिनों में जैसे-जैसे सांप्रदायिक राजनीति देश पर हावी होती गई, किसान आंदोलनों का असर भी घटने लगा था। किसान आंदोलन के बिखराव की कई दूसरी वजह भी हैं। लेकिन किसानों के हक की लड़ाई लड़ने और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने का जज्बा टिकैत में आखिरी सांस तक रहा। यह उनके आंदोलनों की ताकत ही थी कि पश्चिमी यूपी के सिसौली जैसे गांव को किसान राजनीति का केंद्र बना दिया। उनके हुक्के की गुडगुडाहट सरकार के पसीने छुड़ा देती थी। फसल के दाम, खाद-बिजली-पानी और जमीन के मुआवजे जैसे मुद्दों को लेकर वे जीवन भर किसानों के साथ डटे रहे।

सन 2010 में अलीगढ़ के टप्पल में किसानों के भूमि अधिग्रहण का आंदोलन उनकी आखिरी लड़ाई थी। 76 साल की उम्र में भी बाबा टिकैत किसानों की ताकत बने रहे। कभी अपनी जमीन नहीं छोड़ी!