पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह प्रयोग पूरे देश के किसानों के लिए एक सबक है

पूर्वी उत्तर प्रदेश के भदोही जिले में एक गांव के किसानों ने ऐसा प्रयोग किया है जो देश के दूसरे हिस्सों के किसानों के लिए एक सबक है। भदोही जिला बनारस से सटा हुआ है। भदोही जिले के बड़गांव के किसानों ने ‘गृहस्थ’ के नाम से एक ऐसा स्टार्ट अप शुरू किया है कि जो न सिर्फ किसानों से उनके उत्पाद खरीदता है बल्कि इसकी पैकिंग से लेकर आपूर्ति का काम करता है।

दरअसल, इस बदलाव के बारे में कुछ दिनों पहले हिंदुस्तान टाइम्स में एक खबर प्रकाशित हुई। इसमें यह बताया गया कि इस प्रयोग की शुरुआत कुछ महीने पहले तब हुई जब गांव की एक महिला किसान जूही सिंह ने इस दिशा में काम करना शुरू किया। उन्हें लगा कि अगर यहां के किसानों की स्थिति सुधारनी है और आसपास के ग्राहकों को खाने के लिए शुद्ध और बेहतर गुणवत्ता वाला अनाज उपलब्ध कराना है तो इसके लिए कुछ किया जाना चाहिए।

उन्होंने गांव के कुछ किसानों से इस बारे में बात की। शुरुआत में उनके साथ गांव के कुछ किसान जुड़े। शुरुआत में इनकी संख्या 50 के आसपास थी। इसके बाद इन लोगों ने ‘गृहस्थ’ के नाम से एक कृषि स्टार्ट अप रजिस्टर कराया। धीरे-धीरे इनकी यह कोशिश रंग लाने लगी और आज स्थिति यह है कि इनके साथ आसपास के क्षेत्रों के तकरीबन 200 किसान जुड़ गए हैं। इसमें अधिकांश छोटे और सीमांत किसान हैं।

अब सवाल उठता है कि इस स्टार्ट अप के जरिए किसानों का सशक्तिकरण कैसे किया जा रहा है। इस समूह के साथ जो किसान जुड़े हैं, वे कई तरह के अनाज और मसालों का उत्पादन करते हैं। इनमें गेहूं, चावल, मक्का, जौ, दाल, धनिया, लहसन, प्याज आदि शामिल हैं। किसान जो उत्पाद पैदा करते हैं, उसे गृहस्थ स्टार्ट अप खरीद लेता है।

इसने एक केंद्र बनाया है। इस केंद्र पर इन उत्पादों की छंटाई होती है। इसके बाद इसे पैक किया जाता है। इस केंद्र पर यह काम भी गांव की महिलाएं ही करती हैं। इसके लिए बाकायदा यहां कुछ मशीन लगाए गए हैं और इन महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया है। इससे गांव की महिला किसानों को रोजगार भी मिल रहा है और उनकी अतिरिक्त आमदनी भी होती है।

इन सबके साथ आसपास के चार जिलों में इन उत्पादों की आपूर्ति के लिए एक आॅनलाइन पोर्टल के जरिए ऑर्डर लिया जाता है। आॅर्डर मिलने के बाद ग्राहकों को इन उत्पादों की डिलिवरी की जाती है। इस काम में गांव के पुरुष लगते हैं। इस तरह से उन्हें भी कृषि के अतिरिक्त रोजगार मिला है और इससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी भी हो रही है।

सबसे अच्छी बात इस प्रयोग की यह है कि किसानों को उनके उत्पाद का अच्छा दाम मिल रहा है। आम तौर पर ‘गृहस्थ’ उनके उत्पाद उस दर पर खरीदता है जो न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाजार भाव से अधिक होती है। इससे भी किसानों की आमदनी बढ़ रही है। फिर महिला किसानों को पैकिंग में रोजगार मिल रहा है और पुरुषों को डिलिवरी में। इसके अलावा गृहस्थ को अंत में जितना मुनाफा होता है, उसमें भी किसानों को हिस्सेदारी दी जाती है।

इस तरह से इन किसान परिवारों के लिए कृषि एक फायदे का काम हो गया है। इससे ग्राहकों को भी ये लाभ हो रहा है कि उन्हें शुद्ध और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद खाने के लिए मिल जा रहे हैं। ग्राहकों तक अपनी पहुंच बनाने के लिए गृहस्थ ने वेबसाइट बनाने के अलावा फेसबुक पेज और ट्विटर पेज भी बनाया है। गृहस्थ के उत्पादों की आपूर्ति भदोही के अलावा बनारस, मिर्जापुर और चंदौली में की जा रही है।

इस प्रयोग ने यह दिखाया है कि अगर किसानों की थोड़ी मदद कर दी जाए और उन्हें एक दिशा दे दी जाए तो वे खुद ही खुद को मजबूत करते हुए कृषि को एक लाभकारी कार्य बना सकते हैं। यहां के किसानों को यह मदद मुहैया कराने का काम स्काॅटलैंड के क्वीन माग्र्रेट यूनिवर्सिटी काॅलेज में पढ़ी डाॅ. दीप्ति ने किया। उन्होंने इसके रजिस्ट्रेशन से लेकर जरूरी उपकरण लगाने और प्रशिक्षण तक में यहां के किसानों की मदद की।

तेलंगाना का किसान मित्र हेल्पलाइन बचा रहा है कई किसानों की जान

तेलंगाना में एक किसान मित्र हेल्पलाइन शुरू किया गया है। इसे तेलंगाना सरकार के कृषि विभाग और सेंटर फाॅर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर ने शुरू किया है। 2017 के अप्रैल से लेकर अब तक इस हेल्पलाइन के जरिए तकरीबन 4,000 किसानों की मदद की गई है।
दरअसल, इस हेल्पलाइन को शुरू करने का मकसद यह था कि जो किसान कृषि संकट की वजह से बहुत परेशान हैं, उनकी मदद की जाए। इसके लिए 18001203244 हेल्पलाइन शुरू किया गया। इसके जरिए किसानों के सवालों का जवाब दिया जा रहा था और उनकी शिकायतों को भी दर्ज किया जा रहा था।
लेकिन जैसे-जैसे यह काम आगे बढ़ा, वैसे-वैसे इस हेल्पलाइन का इस्तेमाल खुदकुशी करने की कगार पर खड़े किसानों को बचाने के लिए होने लगा। कृषि क्षेत्र की संकट की वजह से बड़ी संख्या में किसान पिछले कई सालों से खुदकुशी कर रहे हैं।
राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो ने किसानों की खुदकुशी से संबंधित आंकड़ों को 2015 के बाद अपडेट नहीं किया है। 2015 में 8,007 किसानों और 4,595 कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की थी। 2015 के बाद से किसानों की आत्महत्या से संबंधित कोई भी आधिकारिक आंकड़ा सरकार सामने लेकर नहीं आई है। जबकि इसके बाद पूरे देश में कई किसान आंदोलन हुए हैं।
जब तक के किसानों के खुदकुशी के आंकड़े हैं, उनमें महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर तेलंगाना ही है। इसका मतलब यह हुआ कि हर साल बड़ी संख्या में तेलंगाना के किसान मौत को गले लगाने के लिए विवश हैं।
लेकिन अब तेलंगाना के किसानों को इस हेल्पलाइन के जरिए जो मदद मिल रही है, उससे बिल्कुल आत्महत्या करने का मन बना लेने वाले किसान भी अपना निर्णय बदल रहे हैं। इस हेल्पलाइन की सबसे बड़ी खासियत है कि स्थानीय प्रशासन के साथ इसने बेहतर तालमेल स्थापित किया है। इस वजह से जरूरत पड़ने पर तुरंत ही इसके जरिए हस्तक्षेप करके स्थितियों को संभाला जा रहा है।
इसे अगस्त 2018 के उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है। कपास उपजाने वाले एक किसान ने इस हेल्पलाइन पर फोन किया और कहा कि उसकी फसल बाढ़ में डूब गई है और अब उसे भविष्य का डर इतना सता रहा है कि वह कीटनाशक पीने जा रहा है। इस हेल्पलाइन पर उससे जो प्रतिनिधि बात कर रहे थे, उन्होंने हेल्पलाइन के एक क्षेत्र प्रतिनिधि को उस किसान के पास पहुंचने के लिए रवाना किया।
उसने वहां पहुंचते ही उस स्थानीय कृषि अधिकारी को बुलाया। किसान से उसे मिलवाया। फिर किसान को लेकर जिला अधिकारी के पास गया। किसान ने एक जमीन बेची थी। जिला अधिकारी की मदद से उसे उसके पैसे मिल गए और सरकारी योजना के तहत जिला अधिकारी ने उसे आॅटो रिक्शा लेने के लिए कर्ज दिलाया। उसके बाद खुदकुशी करने जा रहा वह किसान एक अच्छा जीवन जी रहा है।
यह हेल्पलाइन सिर्फ किसानों को खुदकुशी से रोकने के लिए ही नहीं बल्कि उन्हें बैंकों से संस्थागत कर्ज दिलाने से लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलाने तक के लिए काम कर रहा है। 2018 के खरीफ सीजन में जब कपास की कीमतें काफी कम हो गईं तो किसान मित्र के हस्तक्षेप से ही यहां के किसान अपनी फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच पाए।
लेकिन इतनी उपयोगी इस हेल्पलाइन की सीमा यह है कि इसे तेलंगाना के सिर्फ तीन जिलों में ही काम करने के लिए स्थानीय प्रशासन से सहयोग मिल पा रहा है। इसलिए इन जिलों में तो ये हेल्पलाइन प्रभावी है। लेकिन अगर इन जिलों से बाहर की कोई शिकायत इनके पास पहुंचती है तो ये इसमें कुछ खास नहीं कर पाते।  ये सिर्फ शिकायतों को संबंधित जिला प्रशासन के पास भेज देते हैं ताकि वहां से कार्रवाई हो सके।
इस हेल्पलाइन को प्रभावी बनाने के लिए न सिर्फ इसका विस्तार तेलंगाना के अन्य जिलों में होना चाहिए बल्कि किसानों को राहत देने में मददगार इस सफल माॅडल को देश के दूसरे राज्यों में भी अपनी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से बदलाव करके अपनाया जाना चाहिए। ताकि पूरे देश के किसानों को ऐसी सेवाओं का लाभ मिल सके।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस कैसे बदल सकता है कृषि की तस्वीर

पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को लेकर बहुत जोर-शोर से न सिर्फ चर्चा चल रही है बल्कि इस विषय पर व्यापक अध्ययन भी हो रहे हैं। विशेषज्ञ इसे चैथी औद्योगिक क्रांति का मूल आधार मान रहे हैं। कहा जा रहा है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस अधिकांश औद्योगिक गतिविधियों और सेवा क्षेत्र में व्यापक बदलाव ला सकता है। भारत में भी विभिन्न क्षेत्रों में इसकी संभावनाओं को लेकर चर्चा चल रही है।
इस संदर्भ में यह जानना रोचक है कि क्या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की कोई उपयोगिता भारत के कृषि में हो सकती है? क्या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करके बदहाली की मार झेल रही भारतीय कृषि की तस्वीर बदली जा सकती है? क्या इसके उपयोग से भारती किसानों की दुर्दशा दूर की जा सकती है?
इन सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश में नीति आयोग की हाल ही में आई एक रिपोर्ट उपयोगी है। यह रिपोर्ट वैसे तो कई क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की संभावित उपयोगिता और इसे लागू करने की रणनीति पर केंद्रित है। लेकिन इस रिपोर्ट में इस बात का भी विस्तार से जिक्र किया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस भारतीय कृषि के लिए कितना उपयोगी साबित हो सकता है।
भारत में कृषि क्षेत्र कितना अहम है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के कुल श्रमिकों से 49 फीसदी इसी क्षेत्र में काम करते हैं। देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 16 फीसदी है। देश की तकरीबन 1.3 अरब आबादी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में देश के कृषि क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र की स्थिति सुधारने में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस उपयोगी होता है तो इससे देश को दीर्घकालिक तौर पर कई लाभ होंगे।
नीति आयोग ने इस रिपोर्ट में बताया है कि कृषि के पूरे वैल्यू चेन में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर कृषि क्षेत्र में इसका इस्तेमाल भी हो रहा है। नीति आयोग की इस रिपोर्ट में एक्सेंचर के अध्ययन का हवाला देकर बताया गया है कि डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल से 2020 तक देश के सात करोड़ किसानों को लाभ होगा।
अब सवाल यह उठता है कि कृषि के किन क्षेत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल हो सकता है। नीति आयोग की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे पहले तो इसका इस्तेमाल मिट्टी की सेहत पर नजर रखने और इसमें सुधार के लिए किया जा सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि सेटेलाइट से जो तस्वीरें ली जाती हैं, उन तस्वीरों के साथ आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल करके मिट्टी की सेहत के बारे में जानकारियां हासिल करके मिट्टी की बेहतर सेहत सुनिश्चित की जा सकती है।
नीति आयोग ने यह भी बताया है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का इस्तेमाल फसल पर नजर रखने और इस पर आने वाले खतरों से तुरंत किसानों का आगाह करने में किया जा सकता है। इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि जमीन की नमी, फसल की सेहत और अन्य कई जानकारियों के आधार पर आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि फसल किस स्थिति में है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिए कृषि कार्यों में इस्तेमाल होने वाले मशीनों की दक्षता बढ़ाई जा सकती है और उनका अभी के मुकाबले और बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।
नीति आयोग की इस रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का एक महत्वपूर्ण इस्तेमाल यह बताया गया है कि इसके जरिए कृषि बाजारों में काफी बदलाव लाया जा सकता है। अभी सरकार ने इलैक्ट्राॅनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार यानी ई-नैम विकसित किया है। नीति आयोग को लगता है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल से ऐसे बाजारों की क्षमता बढ़ेगी और किसानों को अपनी फसल के बदले अच्छे पैसे मिल पाएंगे।
अंततः आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस भारतीय कृषि के लिए कितना उपयोगी हो पाएगा, यह कहना अभी से तो मुश्किल है लेकिन नीति आयोग जैसी संस्था इसकी संभावनाओं को लेकर जितनी आशान्वित है, अगर उस स्तर पर इसका क्रियान्वयन हो जाए तो देश की कृषि की तस्वीर बदलने में थोड़ी मदद जरूर मिल सकती है।

तीन साल में केडिया बना बिहार का पहला जैविक गांव

बिहार के जमुई जिले में एक गांव है केडिया। जैसा कि देश के अधिकांश गांवों की कृषि की स्थिति है, वही स्थिति इस गांव की भी थी। यहां के किसान रसायनिक खाद का इस्तेमाल अच्छी फसल की उम्मीद में कर रहे थे। इसके बावजूद अपेक्षित उत्पादन नहीं हो रहा था। इस वजह से किसानों की आमदनी कम थी। देश के दूसरे गांवों की तरह इस गांव के किसानों का भी खेती से मन भरने लगा था और ये सारी उम्मीदें छोड़ने लगे थे।
ऐसे ही समय में बिहार के इस गांव में एक तरह की ‘कृषि क्रांति’ का सूत्रपात हुआ। गैर सरकारी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय किसानों और उनमें भी खास तौर पर महिलाओं की भागीदारी के साथ यहां की खेती को प्रकृति केंद्रीत बनाने के लिए एक जीवित माटी अभियान की शुरुआत हुई। यह तय किया गया कि खेती के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करनी है।
इसके बाद यह गांव के लोगों ने जैविक खेती की ओर रुख किया। यह काम इतना आसान नहीं था। लेकिन केडिया के किसानों ने हार नहीं मानी और लगातार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए काम करते रहे।
इन कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि केडिया गांव पूरे बिहार राज्य का पहला जैविक गांव बन गया। 17 नवंबर, 2018 को केडिया को बिहार सरकार ने राज्य के पहले जैविक ग्राम के तौर पर मान्यता दे दी। आम तौर पर यह धारणा है कि जैविक खेती करने से खेती लागत बढ़ जाती है। इस गांव में उलटा हुआ। यहां काम कर रहे सामाजिक संगठनों के मानें तो इस गांव में खेती की लागत जैविक खेती की ओर बढ़ने से 60 फीसदी तक कम हो गई।
केडिया गांव की जैविक खेती की इस यात्रा में गांव में जल संरक्षण को लेकर भी जागरूकता आई। यहां के लोगों ने बारिश के पानी के संरक्षण का रास्ता निकाला। साथ ही खाना बनाने के लिए बायोगैस के इस्तेमाल करने की तरकीब भी इस गांव के लोगों ने अपनाई। जैविक खेती से पैदा होने वाले कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाला एक कोल्ड स्टोरेज बनाया गया। इससे यहां के कृषि उत्पाद लंबे समय तक खराब नहीं होते हैं और इन्हें बाजार तक पहुंचाने के लिए किसानों को पर्याप्त समय मिल जाता है। इन उपायों से इस गांव में न सिर्फ खेती प्रकृति केंद्रित हुई बल्कि स्थानीय लोगों का जीवन भी प्रकृति केंद्रित बनता गया।
केडिया गांव की इस सफलता ने न सिर्फ प्रदेश स्तर के बल्कि बाहर के शोधार्थियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। लोग यहां का सफल प्रयोग देखने आ रहे हैं। बिहार सरकार के कृषि मंत्री भी इस गांव का दौरा कर चुके हैं। बिहार का कृषि मंत्रालय राज्य के दूसरे हिस्से में जैविक खेती करने वाले लोगों को केडिया गांव लाकर यहां के सफल प्रयोग को दिखाने की एक योजना चला रहा है।
अब इस गांव के लोग दूसरे गांवों के लोगों को भी अपनी सफलता की कहानियां बता रहे हैं। ये दूसरे गांवों के लोगों को भी जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस काम के लिए केडिया गांव के लोग दूसरे गांवों के लोगों को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। जमुई से सटे जिलों के तकरीबन 500 किसानों ने केडिया गांव में आकर जैविक खेती से संबंधित प्रशिक्षण हासिल किया है।
इसका असर यह हो रहा है कि जो लोग प्रशिक्षण लेकर जा रहे हैं, वे भी अपने गांव में केडिया माॅडल को अपनाने की कोशिश करते हुए जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। जमुई जिला प्रशासन ने पिछले दिनों यह निर्णय लिया है कि जिले के सभी दस प्रखंडों में कम से कम एक गांव केडिया माॅडल के आधार पर विकसित किए जाएं। सरकार के स्तर पर भी और कुछ गैर सरकारी संगठनों के स्तर पर भी यह कोशिश हो रही है कि राज्य के दूसरे जिलों में केडिया की तर्ज पर जैविक गांव विकसित किए जाएं।

किसानों की युवा पीढ़ी ने ट्विटर पर दिखाई अपनी ताकत

2019 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष जहां ‘चौकीदार चोर है’ के नाम से अभियान चला रहा तो इसके जवाब में केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान चला रखा है। इसके तहत सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत उनके तमाम मंत्रियों, भाजपा नेताओं और पार्टी के समर्थकों ने ट्विटर पर अपने नाम से पहले चौकीदार शब्द जोड़ लिया है। भाजपा के लोग मिलकर इसे ट्विटर पर ट्रेंड भी करा रहे हैं।

अब सरकार की नाकामियों के लिए देश के आम लोग भी इसी तरीके को अपना रहे हैं। बीते दिनों किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश में कुछ युवा किसानों के एक समूह ने ट्विटर पर ‘कर्जदार किसान’ हैशटैग करा दिया।

जिस ट्विटर का इस्तेमाल राजनीतिक दल के लोग अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए करते आए हैं, उसका बहुत अच्छा इस्तेमाल कुछ युवा किसानों ने किया। इनकी कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि ट्विटर पर दो-तीन दिनों तक ‘कर्जदार किसान’ सबसे अधिक ट्रेंड में रहे हैशटैग में से एक रहा।

इसके जरिए इन युवा किसानों ने ट्विटर के माध्यम से लोगों का ध्यान किसान और किसानी की समस्याओं की ओर खींचने की कोशिश की। इसके जरिए इन लोगों बताया कि कैसे मौजूदा केंद्र सरकार खेती-किसानी की समस्याओं के समाधान में नाकाम रही है।

इस दौरान कर्जदार किसान हैशटैग के साथ हुए हजारों ट्विट के जरिए देश में किसानों द्वारा की जा रही खुदुकुशी, सूखे की मार झेल रहे किसानों की समस्या और उपज का पर्याप्त नहीं मिलने जैसी समस्याओं को भी लोगों के सामने लाने में इन्हें सफलता हासिल हुई। इससे वैसे लोगों को भी किसानों की समस्याओं के बारे में पता चला जिन्हें इस बारे में कुछ खास मालूम नहीं था।

कर्जदार किसान हैशटैग के साथ बड़ी संख्या में ऐसे ट्विट हुए जिनमें यह बताया गया कि किसानों की कर्ज की समस्या कितनी विकराल है। यह बात सामने आई कि किसानों को संस्थागत कर्ज देने के दावे कितने खोखले हैं और किसानों को अब भी अपनी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने के लिए स्थानीय साहूकारों से अधिक ब्याज दर पर कर्ज लेने के लिए बाध्य होना पड़ता है। यह मांग भी उठी कि स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट को ठीक से लागू किया जाए।

कर्जदार किसान हैशटैग ट्रेंड करने के बाद ट्विटर पर कई युवा किसानों और किसानों की समस्याओं से हमदर्दी रखने वाले कई लोगों ने अपने नाम के आगे ‘कर्जदार किसान’ उसी तरह जोड़ लिया जिस तरह भाजपा के नेताओं ने अपने नाम के आगे ‘चौकीदार’ शब्द जोड़ लिया है। अपने नाम के आगे कर्जदार किसान जोड़ने वाले लोग किसानों से यह अपील करते हुए नजर आए कि किसी राजनीतिक दल के पक्ष में खड़ा होने के बजाए किसान खुद को जागरूक करने पर अधिक ध्यान दें।

किसानों के हक और हित में काम करने वाले आम किसान यूनियन के सामाजिक कार्यकर्ता राम इनानिया ने ट्विट किया कि अब किसान के एक हाथ में ट्रैक्टर का स्टीयरिंग है तो दूसरे हाथ में ट्विटर हैंडल। उन्होंने यह भी बताया कि 22 मार्च, 2019 को शाम पांच बचे ट्विटर पर कई जगहों से किसान एक साथ ट्विटर पर सक्रिय हुए और हमने कर्जदार किसान हैशटैग ट्रेंड कराया। किसानों ने अपने खेतों में बैठकर, ट्रैक्टर पर बैठकर और बाजार की मंडियों में अपना उत्पाद बेचने के इंतजार में बैठे हुए ट्विट करना शुरू कर दिया।

मान तो यह भी जा रहा है कि ऐसा करके युवा किसानों ने राजनीतिक दलों को अपनी ताकत का अहसास कराया है और उन्हें यह संदेश देने की कोशिश की है कि अगर किसान और किसानी की समस्याओं के समाधान की बात उन्होंने नहीं की तो इसका खामियाजा उन्हें लोकसभा चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।