अब ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान देने की योजना

देश की आबादी के तकरीबन 57 फीसदी लोग जीवनयापन के लिए कृषि पर आधारित हैं। इतनी बड़ी आबादी की कृषि पर निर्भरता के बावजूद भारतीय कृषि अब भी मोटे तौर पर बारिश के पानी पर निर्भर है। बारिश के अलावा सिंचाई के दूसरे साधन अब भी काफी सीमित हैं।

ऐसे में कृषि के लिहाज से मौसम पूर्वानुमानों की भूमिका बढ़ जाती है। इसमें भी सही मौसम पूर्वानुमान आए, यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए पिछले दिनों भारत मौसम विभाग यानी आईएमडी के अधिकारियों ने यह जानकारी दी कि विभाग इस योजना पर काम कर रहा है कि अगले साल से ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराए जाएं।

भारत में अभी 660 जिले हैं। इनमें कुल ब्लाॅकों की संख्या 6,500 है। मौसम विभाग अभी 200 ब्लाॅकों में पायलट परियोजना चला रहा है। ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराने की योजन पर काम कर रहे मौसम विभाग का अनुमान है कि इससे तकरीबन 9.5 करोड़ किसानों को लाभ मिलेगा।

अभी मौसम विभाग जिला स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराता है। इससे तकरीबन चार करोड़ किसानों को लाभ मिल रहा है। जिला स्तर पर किसानों को मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध कराने के लिए एसएमएस और एमकिसान पोर्टल का सहारा लिया जा रहा है।

मौसम विभाग ने ब्लाॅक स्तर पर पूर्वानुमान उपलब्ध कराने के लिए इंडियन काउंसिल फाॅर एग्रीकल्चर रिसर्च के साथ समझौता किया है। मौसम विभाग के अधिकारियों का दावा है कि 2018 में आईसीएआर के साथ समझौता होने के बाद से इस योजना पर तेजी से काम चल रहा है। जरूरी बुनियादी ढांचा विकसित किया जा रहा है और इस काम के लिए लोगों को नियुक्त करने और उन्हें प्रशिक्षित करने का काम चल रहा है।

मौसम विभाग के पास अभी 130 जिलों में ऐसा ढांचा है जिसके जरिए मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध करने के लिए जानकारियां जुटाई जाती हैं। विभाग की योजना यह है कि ये सुविधाएं 530 अन्य जिलों में भी विकसित कर ली जाएं। विभाग यह काम कृषि विज्ञान केंद्र के तहत ग्रामीण कृषि मौसम सेवा के जरिए करने की योजना पर काम कर रहा है।

मौसम पूर्वानुमानों के सबसे बड़ी समस्या यही है कि इनके सही होने को लेकर लोगों के मन में काफी संदेह रहता है। कई मौके ऐसे आए हैं जब मौसम पूर्वानुमान पूरी तरह गलत साबित हुए हैं। ऐसे में सिर्फ ब्लाॅक स्तर पर मौसम पूर्वानुमान उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। मौसम विभाग को इस दिशा में में करना होगा कि ब्लाॅक स्तर पर और जिला स्तर पर उपलब्ध कराए जा रहे मौसम पूर्वानुमान अधिक से अधिक सही हों।

क्योंकि यह बात तो विशेषज्ञ भी मानते हैं कि मौसम पूर्वानुमान सौ फीसदी सही नहीं हो सकते। क्योंकि पूर्वानुमानों के लिए जिन मानकों का अध्ययन किया जाता है, उनमें प्रकृति कई बार बदलाव भी करती है। लेकिन साथ ही विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अधिक से अधिक सही पूर्वानुमान सुनिश्चित करने की दिशा में बढ़ा जा सकता है।

भारत में मौसम पूर्वानुमानों के साथ दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब भी किसानों में इस स्तर की जागरूकता नहीं है कि वे मौसम पूर्वानुमानों का सही ढंग से इस्तेमाल कर सकें। इसके लिए मौसम विभाग के साथ-साथ कृषि विभाग को भी कार्य करना होगा। किसानों को इसके लिए प्रशिक्षित करना होगा कि मौसम पूर्वानुमानों का वे सही इस्तेमाल कर सकें। मौसम विभाग और कृषि विभाग को किसान संगठनों और अन्य सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर किसानों को जागरूक बनाने के लिए अभियान चलाना होगा।

सूखा क्यों नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा?

लोकसभा चुनावों के चार चरण के मतदान हो गए हैं। तीन चरण के चुनाव अभी बाकी हैं। इस लिहाज से देखें तो अब भी देश के बड़े हिस्से में लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक प्रचार जोर-शोर से चल रहा है। इसमें कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं। लेकिन सूखे का मुद्दा नहीं उठ रहा है।

जबकि देश भयानक सूखे की ओर बढ़ रहा है। विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी आ रही है, उससे पता चल रहा है कि देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सूखे की स्थिति बहुत बुरी है।

इंडियास्पेंड सूखे की स्थिति के बारे में बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य सूखे से बुरी तरह से प्रभावित हैं। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण भारत के 31 जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 25 प्रतिशत ही पानी बचा हुआ है। जबकि नवंबर, 2018 में यह आंकड़ा 61 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले चार-पांच महीनों में इन जलाशयों के पानी में 36 फीसदी कमी आई।

आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के चार जिलों अनंतपुर, कुरनुल, चित्तूर और वाईएसआर कड़प्पा में बेहद भयानक सूखा है। खबरों में यह बताया जा रहा है कि यहां लगातार नौवें साल सूखा पड़ा है। 2000 से लेकर 2018 के बीच इस क्षेत्र में 15 साल ऐसे रहे हैं जब यहां सूखा पड़ा है। बताया जाता है कि सूखे की वजह से यहां के लोगों को पलायन लगातार हो रहा है। 2018 में सिर्फ सात लाख लोगों का पलायन इस क्षेत्र के गांवों से हुआ है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां सिर्फ बुजुर्ग लोग ही रह रहे हैं।

इसी तरह की खबर महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों के बारे में भी आ रही है। मराठवाड़ा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है। बीड़ जिले में तो लोग सूखे से बुरी तरह बेहाल हैं। तेलंगाना के कुछ क्षेत्र भी भयंकर सूखे की चपेट में हैं। इसके बावजूद इन राज्यों में सूखा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।

कुछ साल पहले इंडियन प्रीमियर लीग चल रहा था तो उस वक्त सूखे का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठा था। दबाव में मुंबई के मैच को कहीं और कराना पड़ा था। इस बार तो आईपीएल और लोकसभा चुनाव दोनों चल रहे हैं लेकिन सूखा कोई मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

सूखा का चुनावी मुद्दा नहीं होना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। भारत की कुल आबादी के 57 फीसदी लोग अब भी जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। कृषि पानी पर निर्भर है। ऐसे में सूखे की समस्या हर तरह से एक राष्ट्रीय समस्या है लेकिन देश के सबसे बड़े चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।

सूखे की समस्या को कोई भी दल नहीं उठा रहा है। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अगर इस मसले को नहीं उठा रही है तो समझ में आता है कि भला वह खुद अपनी नाकामी को कैसे चुनावी मुद्दा बनाए। लेकिन विपक्षी दल भी अगर सूखे की समस्या को चुनावी मुद्दा नहीं बना रहे हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है?

एक वजह यह समझ में आती है कि प्रमुख विपक्षी दलों की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वे राज्य भी कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। इसलिए इन्हें लगता है कि अगर ये सूखा को चुनावी मुद्दा बनाते हैं तो इसकी आंच इन तक भी आएगी और इन्हें भी चुनावों में नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए सभी दलों में एक तरह से यह आम सहमति दिखती है कि लोकसभा चुनाव 2019 में सूखा को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देना है।

चुनावों में कहां गायब है किसान आंदोलनों की आवाज?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यह दावा करते हुए नहीं थकती है कि उसने पिछले पांच सालों में किसानों के कल्याण के लिए काफी काम किए हैं। भारतीय जनता पार्टी की यह सरकार ये भी कहती है कि पहली बार किसानों की आय दोगुनी करने का एक लक्ष्य तय किया गया। किसानों के लिए उठाए गए कई कदमों का उल्लेख नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार करती आई है।

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले पांच सालों में पूरे देश में सबसे अधिक किसान आंदोलन हुए। ये आंदोलन किसी एक राज्य या कुछ खास राज्यों तक सीमित नहीं रहे हैं। बल्कि उन सभी राज्यों में किसान आंदोलन पिछले पांच सालों में हुए हैं, जिन राज्यों को सामान्य तौर पर कृषि प्रधान राज्य माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को आम तौर पर औद्योगिक केंद्र माना जाता है लेकिन इन राज्यों में भी किसानों ने बीते सालों में आंदोलन किए।

किसान आंदोलनों के लेकर कुछ ऐसा माहौल बना कि देश भर में काम करने वाले कई अलग-अलग किसान संगठन एक मंच पर आए। इन सभी ने मिलकर संयुक्त तौर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इन लोगों ने अपनी मांगों में एकरूपता लाई। सभी जगह के किसान आंदोलनों में उचित मूल्य, कर्ज माफी और लागत में कमी की बात समान रूप से आई।

इसके बावजूद किसान आंदोलनों की गूंज लोकसभा चुनावों में सुनाई नहीं दे रही है। इसकी वजहों के बारे में पता लगाने के लिए जब कृषि के जानकारों, इन आंदोलनों में शरीक रहे लोगों और राजनीतिक विशेषज्ञों से बात करें तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं।

सबसे पहली बात तो यह बताई जा रही है कि आजादी के बाद से अब तक जितने भी लोकसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से किसी भी चुनाव में कृषि और किसान के मुद्दे केंद्र में नहीं रहे हैं। खेती-किसानी एक मुद्दा तो रहा है लेकिन यह मूल मुद्दा कभी नहीं रहा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यह कभी ऐसा मुद्दा नहीं रहा है जिस पर वोटों का धु्रवीकरण किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसान एक वर्ग के तौर पर भारत में एकजुट नहीं रहा है। इन लोगों का कहना है कि अगर किसान को एक वर्ग मानें तो इसके अंदर कई उपवर्ग हैं। जाति का उपवर्ग है, धर्म का उपवर्ग, भाषा का उपवर्ग है और क्षेत्र का उपवर्ग है। लेकिन इन लोगों का ये कहना है कि ये उपवर्ग चुनावों में किसानों के मुख्य वर्ग बन जाते हैं और किसान वर्ग खुद उपवर्ग बनकर पीछे छूट जाता है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक किसान जब वोट देने जाता है तो उस वक्त वह बतौर किसान नहीं वोट देता है बल्कि चुनावी राजनीति में वोट देने का उसका निर्णय उसकी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से अधिक प्रभावित होती है। ऐसे में खेती-किसानी के मुद्दे उठते तो रहते हैं लेकिन चुनावों के मूल मुद्दे नहीं बन पाते।

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि किसान खुद को किसानों का एक वर्ग मानकर मतदान नहीं करता। इसलिए वे किसानी के मुद्दों को मूल मुद्दा नहीं बनाते हैं। क्योंकि अगर खेती-किसानी के मुद्दे मूल मुद्दे बन गए तो उन्हें नुकसान अधिक होगा।

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि खुद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते कि किसान एक वर्ग के तौर पर उभरे। इसकी वजह बताते हुए ये लोग कहते हैं कि देश के 57 फीसदी लोग अब भी कृषि पर जीवनयापन के लिए निर्भर हैं। अगर किसी तरह से इन 57 फीसदी लोगों का एक वर्ग बन गया और ये एक वोट बैंक की तरह वोट देने लगे तो फिर ये होगा कि किसान जैसी सरकार चाहेंगे, वैसी सरकार बनेगी। सारी नीतियां किसानों के हिसाब से बनेगी।

इसका एक असर यह भी होगा कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवार भी टूटेगी। इससे वोट बैंक की मौजूदा राजनीति को झटका लगेगा और राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।

इन लोगों का यह भी कहना है कि यह उद्योग जगत भी नहीं चाहता कि किसान एक वर्ग के तौर पर एकजुट हो जाएं। क्योंकि इन्हें लगता है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर सरकारी नीतियों को जिस तरह से वे अपने फायदे के लिए प्रभावित कर पा रहे हैं, उस तरह से वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे और किसानों के हिसाब से सारी सरकारी नीतियां बनने लगेंगी।

ऐसे में स्थिति ये दिखती है कि किसानी के सवालों को मूल चुनावी मुद्दा बनाने के पक्ष में चुनाव प्रक्रिया में अधिकांश हितधारक नहीं हैं। इसलिए हाल के सालों में किसान आंदोलनों की देशव्यापी गूंज के बावजूद लोकसभा चुनावों में इनकी धमक नहीं सुनाई दे रही है।

किसानों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के दावों में कितना दम?

देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर अपने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं। आम तौर पर यह माना जा रहा था कि दोनों पार्टियां अपने घोषणापत्र में इस बार किसानों को लेकर बड़े वादे करेंगी। ऐसा इसलिए माना जा रहा था क्योंकि पिछले दो सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े किसान आंदोलन हुए और किसानों की बुरी स्थिति बार-बार सामने आई।

उम्मीद के मुताबिक दोनों दलों ने अपने घोषणापत्र में किसानों के लिए कई वादे किए हैं। इन वादों की हकीकत क्या है, उसे जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि अगर पूरे भी हुए तो इससे किसानों की स्थिति में क्या सुधार होगा।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह किसानों को ‘कर्ज माफी’ से ‘कर्ज मुक्ति’ की राह पर ले जाएगी। इसके लिए पार्टी ने कहा है कि वह किसानों को उपज के बदले लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करेगी। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि कांग्रेस की सरकार अगर बनी तो लागत में कमी लाया जाएगा और किसानों को संस्थागत कर्ज मिले, यह सुनिश्चित किया जाएगा। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस की कर्ज मुक्ति की बात को पूरा करने के लिए पार्टी ने सांकेतिक तौर पर ही सही, एक रोडमैप बताया है। हालांकि, लाभकारी मूल्य कैसे सुनिश्चित होगा और लागत में कैसे कमी आएगी, इस पर कांग्रेस ने स्थितियों को साफ नहीं किया है।

कांग्रेस ने देश के किसानों से यह वादा भी किया है कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद उसकी सरकार हर साल अलग से ‘किसान बजट’ पेश करेगी। इसके जरिए कृषि क्षेत्र पर उसकी जरूरतों के हिसाब से विशेष जोर दिया जा सकेगा। इससे किसानों के मुद्दों पर लोगों का ध्यान तो जाएगा लेकिन अलग बजट किसान और खेती की समस्याओं का समाधान नहीं है। रेलवे के लिए आजादी से लेकर हाल तक अलग बजट पेश किया जाता था लेकिन इससे रेलवे की सेहत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। न ही अब इसका विलय आम बजट में करने से हो रहा है। इसका मतलब यह है कि अलग बजट भर कर देने से किसी समस्या के समाधान की कोई गारंटी नहीं है। असल जरूरत समस्या के समाधान को लेकर नीयत की है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया सरकार बनाने के बाद वह एक कृषि के लिए एक स्थायी आयोग बनाएगी। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय कृषि विकास एवं योजना आयोग नाम दिया है। कांग्रेस ने कहा है कि इस आयोग में किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्रियों को शामिल किया जाएगा। ये आयोग सरकार को बताएगी कि कृषि को कैसे फायदेमंद बनाया जाए। घोषणापत्र में यह कहा गया है कि इस आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि यही आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करेगा।

यह एक सांस्थानिक हस्तक्षेप होगा। अगर कांग्रेस की सरकार बनती है और अगर वह यह काम कर देती है तो इससे दीर्घकालिक तौर पर कृषि और किसानों की समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी। यह प्रस्ताव तो ऐसा है जिस पर किसी भी सरकार को अमल करना चाहिए। दरअसल, देश में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए जो उपाय हुए हैं, उनमें अधिकांश तात्कालिक ही रहे हैं। ऐसे में अगर इस आयोग को बनाने का सांस्थानिक काम होता है तो इससे किसानों का लंबे समय तक लाभ मिलेगा और इससे कृषि को जो मजबूती मिलेगी, उसका लाभ देश की अर्थव्यवस्था को होगा। ऐसे ही सीमांत किसानों के लिए एक नया आयोग बनाने का कांग्रेस का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को भी संशोधित करने की बात कही है। पार्टी ने कहा है कि अभी यह योजना किसानों की कीमत पर बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचा रही है। इस बीमा योजना के क्रियान्वयन में खामी का संकेत भाजपा के घोषणापत्र से भी मिलता है। भाजपा ने भी कहा है कि वह इस योजना को स्वैच्छिक बनाएगी। इसके बाद से कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जिन खामियों की ओर वे लगातार संकेत कर रहे थे, अब उसे खुद इस योजना को लागू करने वाली पार्टी ने मान लिया है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का जो लक्ष्य रखा है उसे पूरा करने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे। पहली बार इसकी घोषणा 2016-17 के बजट में हुई थी। लेकिन तब से लेकर हाल में भाजपा के घोषणापत्र जारी करने तक, कभी भी यह रोडमैप देश के सामने नहीं रखा गया जिस पर चलकर इस लक्ष्य को हासिल किया जाना है। इस वजह से अब तो आम लोगों को भी 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर संदेह होने लगा है।

चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार ने दो हेक्टेयर तक जमीन वाले किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत हर परिवार को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि जीतने के बाद वह इस योजना का दायरा बढ़ाकर इसे देश के सभी किसानों के लिए लागू करेगी। भाजपा लगातार कांग्रेस की प्रस्तावित ‘न्याय’ योजना पर सवाल उठा रही जिसके तहत देश के सबसे गरीब परिवारों को 72,000 सालाना की आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव है। भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि इसके लिए पैसे कहां हैं। लेकिन भाजपा खुद यह जवाब नहीं दे रही है कि पीएम-किसान के तहत हर किसान परिवार को प्रति वर्ष वह 6,000 रुपये कहां से देगी।

भाजपा ने यह घोषणा भी की है कि वह छोटे और सीमांत किसानों के लिए पेंशन की योजना लाएगी जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस पेंशन के लिए किसानों को एक निश्चित अंश दान करना होगा या फिर उन्हें कोई आर्थिक योगदान नहीं देना होगा और यह काम खुद सरकार करेगी। क्योंकि इस सरकार ने कई पेंशन योजनाएं ऐसी लाई हैं जिनमें लाभार्थियों को भी अंशदान करना है। इसलिए किसानों के लिए प्रस्तावित पेंशन योजना पर भााजपा और स्पष्टता रखती तो ज्यादा ठीक रहता।

भाजपा ने घोषणापत्र में किसानों से यह वादा भी किया है कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि किफायती दरों पर बेहतर बीज किसानों को समय पर उपलब्ध हो सकें और घर के पास ही उनकी जांच की सुविधा उपलब्ध हो। लेकिन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के बढ़ते दबदबे के बीच यह काम कैसे किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टता नहीं है।

तिलहन के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के मकसद से भाजपा ने नए तिलहन मिशन की शुरुआत करने का वादा भी किया है। इसे लागू करने का रोडमैप तो नहीं बताया गया है लेकिन अगर यह मिशन ठीक से लागू हो तो इससे देश का काफी भला होगा। क्योंकि खाद्य तेल के मामले में आयात पर निर्भरता की वजह से देश को कई स्तर पर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसके अलावा भाजपा ने पूरे देश में कृषि भंडारण की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए यह वादा किया है कि वह पूरे देश में वेयरहाउस का नेटवर्क विकसित करेगी। भाजपा ने इस संदर्भ में अपने संकल्प पत्र में कहा है, ‘किसानों को अपनी उपज का भंडारण अपने गांव के निकट करने तथा उचित समय पर उसे लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए सक्षम करने के उद्देश्य से हम कृषि उत्पादों के लिए नई ग्राम भंडारण योजना आरंभ करेंगे। हम कृषि उत्पादों की भंडारण रसीद के आधार पर किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराएंगे।’ अगर सही ढंग से इसे लागू कर दिया जाए तो यह भी कृषि में दीर्घकालिक बदलाव लाने वाला कदम साबित होगा। क्योंकि गांवों के स्तर पर भंडारण एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है।

देखा जाए तो देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में किसानों के लिए कई उपयोगी घोषणाएं हैं। लेकिन अधिकांश घोषणाओं के साथ यह नहीं बताया गया है कि इसे कैसे पूरा किया जाएगा। इस वजह से इन चुनावी घोषणाओं पर किसानों को बहुत भरोसा नहीं हो रहा है। अच्छा तो यह होता कि हर घोषणा के साथ ये पार्टियां उसे लागू करने की कार्ययोजना भी बतातीं। इससे लोगों में इन बातों को लेकर विश्वास भी आता और फिर इस आधार पर लोग उन्हें वोट भी देते।

MSP बढ़ाने से दूर होगा दाल संकट, आर्थिक सलाहकार की सिफारिश

नई दिल्ली। देश में दाल संकट दूर करने के लिए सरकार अब गंभीर प्रयास करने के मूड में दिख रही है। दालों का उत्‍पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों को वाजिब कीमत दिलाने, खरीद, भंडारन आदि के लिए अब नए सिरे से तैयारी की जा रही है। इसके लिए केंद्र सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर अरविंद सुब्रमण्यन की अगुआई में बनाई गई समिति ने ट्रेडर्स के लिए स्टॉक लिमिट खत्म करने, एक्सपोर्ट से बैन हटाने और चना-उड़द सहित कई दालों का एमएसपी बढ़ाने सहित कई सिफारिशें की हैं।

ताकि बनी रहे किसानों की रूचि

सुब्रमण्‍यन के अनुसार इस साल अच्‍छे प्रयास हुए तो किसानों ने दाल की ओर रुख किया और बहुत हद तक दाल की इस कमी को दूर किया जा सकता है। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि कुछ ऐसे प्रयास किए जाएं, जिनसे किसानों और ट्रेडर्स का मोह दोबारा से दाल से भंग न हो। उन्‍होंने दालों को एपीएमसी यानी एग्रीकल्‍चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी से बाहर करने की सिफारिश की। इससे लाभ होगा कि किसान सीधे अपनी फसल को बेच पाएंगे। बिचौलियों और ट्रेडर्स की मनमानी से उन्‍हें बचाया जा सकेगा। उन्‍होंने कहा कि देश में कम से कम 20 लाख टन भंडारण की क्षमता को विकसित करना चाहिए। हालांकि, कुछ दिन पहले सरकार ने भी दालों की बफर स्‍टॉक लिमिट को 20 लाख टन करने का निर्णय लिया है।

ये हैं मुख्‍य सिफारिशें

-दलहन बुआई पर किसानों को 10 से 15 रुपए प्रति किलोग्राम की सब्सिडी मिले।

-दालों के एक्‍सपोर्ट से बैन हटाया जाए।

-दालों की सप्‍लाई 8 फीसदी बढ़ाई जाए।

-दालों की खरीद-बिक्री की साप्‍ताहिक समीक्षा की जाए।

-एक्‍सपोर्ट पर बैन की बजाय टैक्‍स का प्रावधान होना चाहिए।

-उड़द का 2 लाख और तुअर का 3.5 लाख टन का बफर स्‍टॉक बनाया जाए।

-एमएसपी गणना एक बेहतर तरीका होना चाहिए।

-दालों का उत्‍पादन वृद्धि को 3 फीसदी से बढ़ाकर 8 फीसदी किया जाए।

6 हजार रुपए हो उड़द का एमएसपी

सीईए ने सिफारिश की है कि देश मे दालों की स्थिति के लिए एक प्रधान सचिवों की कमेटी बनाई जाए जो समय समय पर खरीद, बिक्री और इंपोर्ट एक्‍सपोर्ट का रिव्‍यू कर सके। उन्‍होंने कहा कि खरीफ 2017 में उड़द का एमएसपी कम से कम 6000 रुपए प्रति क्विंटल होना चाहिए। जोकि इस साल 425 रुपए बोनस के साथ 5000 रुपए प्रति क्विंटल है। इसके अलावा उन्‍होंने आने वाले रबी सीजन में चने का एमएसपी को 4000 रुपए प्रति क्विंटल करने की सिफारिश की है। पिछले साल चने का एमएसपी 75 रुपए प्रति क्विंटल के बोनस के साथ 3500 रुपए था। इसके साथ ही उन्‍होंने तुअर की एमएसपी को बढ़ाकर 7 हजार रुपए प्रति क्विंटल करने की सिफारिश भी की है।

पीपीपी मॉडल पर बने कंपनी

सुब्रमण्यन ने सरकारी खरीद, बिक्री, भंडारण आदि को भी मजबूत बनाने की सिफारिश की है। उन्‍होंने कहा कि फिलहाल नाफेड जैसी संस्‍थाएं दालों की खरीद कर रही हैं। निकट भविष्‍य में प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर एक कंपनी बननी चाहिए, जो सरकारी खरीद, बिक्री, एक्‍सपोर्ट-इंपोर्ट और वितरण सुनिश्चित करा सके। साथ ही उन्‍होंने अगले सीजन में दालों के एक्‍सपोर्ट बैन को भी हटाने की सिफारिश की है। सीईए का मानना है कि दालों के एक्‍सपोर्ट से देश में भी किसानों को और अच्‍छे दाम मिल सकेंगे।

MSP बढ़ाने से दूर होगा दाल संकट, आर्थिक सलाहकार की सिफारिश

देश में दाल संकट दूर करने के लिए सरकार अब गंभीर प्रयास करने के मूड में दिख रही है। दालों का उत्‍पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों को वाजिब कीमत दिलाने, खरीद, भंडारन आदि के लिए अब नए सिरे से तैयारी की जा रही है

http://www.publicdomainpictures.net/pictures/190000/velka/pulses-particles-2.jpg
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नई दिल्ली। देश में दाल संकट दूर करने के लिए सरकार अब गंभीर प्रयास करने के मूड में दिख रही है। दालों का उत्‍पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों को वाजिब कीमत दिलाने, खरीद, भंडारन आदि के लिए अब नए सिरे से तैयारी की जा रही है।  इसके लिए केंद्र सरकार के चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर अरविंद सुब्रमण्यन की अगुआई में बनाई गई समिति ने ट्रेडर्स के लिए स्टॉक लिमिट खत्म करने, एक्सपोर्ट से बैन हटाने और चना-उड़द सहित कई दालों का एमएसपी बढ़ाने सहित कई सिफारिशें की हैं।

ताकि बनी रहे किसानों की रूचि

सुब्रमण्‍यन के अनुसार इस साल अच्‍छे प्रयास हुए तो किसानों ने दाल की ओर रुख किया और बहुत हद तक दाल की इस कमी को दूर किया जा सकता है। लेकिन, इसके लिए जरूरी है कि कुछ ऐसे प्रयास किए जाएं, जिनसे किसानों और ट्रेडर्स का मोह दोबारा से दाल से भंग न हो। उन्‍होंने दालों को एपीएमसी यानी एग्रीकल्‍चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी से बाहर करने की सिफारिश की। इससे लाभ होगा कि किसान सीधे अपनी फसल को बेच पाएंगे। बिचौलियों और ट्रेडर्स की मनमानी से उन्‍हें बचाया जा सकेगा। उन्‍होंने कहा कि देश में कम से कम 20 लाख टन भंडारण की क्षमता को विकसित करना चाहिए। हालांकि, कुछ दिन पहले सरकार ने भी दालों की बफर स्‍टॉक लिमिट को 20 लाख टन करने का निर्णय लिया है।

ये हैं मुख्‍य सिफारिशें

-दलहन बुआई पर किसानों को 10 से 15 रुपए प्रति किलोग्राम की सब्सिडी मिले।

-दालों के एक्‍सपोर्ट से बैन हटाया जाए।

-दालों की सप्‍लाई 8 फीसदी बढ़ाई जाए।

-दालों की खरीद-बिक्री की साप्‍ताहिक समीक्षा की जाए।

-एक्‍सपोर्ट पर बैन की बजाय टैक्‍स का प्रावधान होना चाहिए।

-उड़द का 2 लाख और तुअर का 3.5 लाख टन का बफर स्‍टॉक बनाया जाए।

-एमएसपी गणना एक बेहतर तरीका होना चाहिए।

-दालों का उत्‍पादन वृद्धि को 3 फीसदी से बढ़ाकर 8 फीसदी किया जाए।

6 हजार रुपए हो उड़द का एमएसपी

सीईए ने सिफारिश की है कि देश मे दालों की स्थिति के लिए एक प्रधान सचिवों की कमेटी बनाई जाए जो समय समय पर खरीद, बिक्री और इंपोर्ट एक्‍सपोर्ट का रिव्‍यू कर सके। उन्‍होंने कहा कि खरीफ 2017 में उड़द का एमएसपी कम से कम 6000 रुपए प्रति क्विंटल होना चाहिए। जोकि इस साल 425 रुपए बोनस के साथ 5000 रुपए प्रति क्विंटल है।  इसके अलावा उन्‍होंने आने वाले रबी सीजन में चने का एमएसपी को 4000 रुपए प्रति क्विंटल करने की सिफारिश की है। पिछले साल चने का एमएसपी 75 रुपए प्रति क्विंटल के बोनस के साथ 3500 रुपए था। इसके साथ ही उन्‍होंने तुअर की एमएसपी को बढ़ाकर 7 हजार रुपए प्रति क्विंटल करने  की सिफारिश भी की है।

पीपीपी मॉडल पर बने कंपनी

सुब्रमण्यन ने सरकारी खरीद, बिक्री, भंडारण आदि  को भी मजबूत बनाने की सिफारिश की है। उन्‍होंने कहा कि फिलहाल नाफेड जैसी संस्‍थाएं दालों की खरीद कर रही हैं। निकट भविष्‍य में प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल पर एक कंपनी बननी चाहिए, जो सरकारी खरीद, बिक्री, एक्‍सपोर्ट-इंपोर्ट और वितरण  सुनिश्चित करा सके। साथ ही उन्‍होंने अगले सीजन में दालों के एक्‍सपोर्ट बैन को भी हटाने की सिफारिश की है। सीईए का मानना है कि दालों के एक्‍सपोर्ट से देश में भी किसानों को और अच्‍छे दाम मिल सकेंगे।

 

किसान और खेती की आउटसोर्सिंग से किसका भला होगा?

पिछले 20 साल के दौरान हर रोज औसतन 2035 किसान मुख्‍य खेतीहर का दर्जा खो रहे हैं।

 

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कृषि प्रधान भारत की विडंबना यह है कि एक के बाद एक सरकारों की नीतियों, लागत व मूल्‍य नीति की खामियों और घटती जोत के आकार के चलते किसान और समूचा कृषि क्षेत्र मुश्किल में उलझा हुआ है।

इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण यह है कि पिछले 20 साल के दौरान हर रोज औसतन 2035 किसान मुख्‍य खेतीहर का दर्जा खो रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि सभी सरकारें महंगाई पर काबू करने के नाम पर किसानों को उनकी उपज का पूरा दाम देने से बचती रही हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। किसान की बदकिस्‍मती देखिए कि वह हर चीज फुटकर में खरीदता है, थोक में बेचता है और दोनों तरफ का भाड़ा भी खुद ही उठाता है।

एनएसएसओ के 70वें राउंड के आंकड़े बताते हैं कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कृषक परिवार की औसत मासिक आमदनी महज 6426 रुपये है। इस औसत आमदनी में खेती से प्राप्‍त आय का हिस्‍सा महज 47.9 फीसदी है जबकि 11.9 फीसदी आय मवेशियों से, 32.2 फीसदी मजदूरी या वेतन से और 8 फीसदी आय गैर-कृषि कार्यों से होती है।

बढ़ती लागत के चलते किसान का मुनाफ लगातार घटता जा रहा है। वर्ष 2015 में पंजाब के कृषि विभाग ने बढ़ती लागत के मद्देनजर गेहूं का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य 1950 रुपये प्रति कुंतल तय करने की सिफारिश की थी। खुद पंजाब के मुख्‍यमंत्री ने कृषि लागत एवं मूल्‍य आयोग यानी सीएसीपी और केंद्र सरकार से गेहूं का एमएसपी 1950 रुपये करने की मांग की थी। लेकिन नतीजा क्‍या हुआ? गेहूं का एमएसपी महज 1525 रुपये तय किया गया। अब बताईये 425 रुपये प्रति कुंतल का नुकसान किसान कैसे उठाएगा?

केंद्र में नई सरकार आने के बाद किसानों को उम्‍मीद जगी थी कि स्‍वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाएगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा दिलाने का वादा किया था। लेकिन ये उम्‍मीदें भी फरवरी, 2015 ने चकनाचूर हो गईं जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह कृषि उपज का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य लागत से 50 फीसदी ज्‍यादा बढ़ाने में सक्षम नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि लागत पर 50 फीसदी बढ़ोतरी बाजार में उथलपुथल ला सकती है। तर्क यह है कि 60 करोड़ लोगों सिर्फ इसलिए वाजिब दाम से वंचित रखा जाए ताकी बाजार न बिगड़े। इस तरह की नीतियां लागू करने वाले सरकारी अधिकारी क्‍या 30 दिन काम कर 15 दिन का वेतन लेने को तैयार हैं? फिर किसान के साथ ये खिलवाड़ क्‍यों?

कृषि के मामले में नीतिगत खामियों का सिलसिला उपज के दाम तक सीमि‍त नहीं है। और भी तमाम उदाहरण हैं। सरकार ने 5 लाख टन ड्यूटी फ्री मक्‍का का आयात किया था जिससे कीमतों में जबरदस्‍त गिरावट आई। अब इसमें मक्‍का उगाने वाले किसान का क्‍या दोष जो समर्थन मूल्‍य से कम से उपज बेचने को मजबूर हुआ? क्‍या ऐसे स्थितियों में सरकार को किसान के नुकसान की भरपाई नहीं करनी चाहिए? क्‍या इसी तरह के हालत किसान को कर्ज के जाल में नहीं उलझाते हैं? मांग और आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए कृषि उपज के आयात या निर्यात के फैसले सरकार को लेने होते हैं लेकिन इन फैसलों में किसान के हितों की रक्षा भी तो होनी चाहिए।

हाल ही में केंद्र सरकार ने मोजांबिक से दाल आयात के लिए दीर्घकालीन समझौता किया है। इसके तहत वर्ष 2021 तक 2 लाख टन दालों का आयात किया जाएगा। भारत सरकार मोजांबिक में कॉपरेटिव फार्मिंग का नेटवर्क खड़ा करेगी और किसानों को दलहन उत्‍पादन के लिए अच्‍छे बीज और सहायता दी जाएगी। इन किसानों की उपज को सरकार न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर खरीदेगी।

हैरानी की बात यह है कि सरकारी एजेंसियां भारत में सिर्फ 1 फीसदी दालों की खरीद न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर कर पाती हैं। जबकि यही सरकार अफ्रीका के किसानों को 100 फीसदी खरीद एमएसपी पर करने का भरोसा दिला रही है। ऐसा भरोसा भारत के किसानों को दिया जाए तो यहां भी दलहन उत्‍पादन बढ़ सकता है। इसका सबूत यह है कि इस साल दलहन के समर्थन मूल्‍य में सरकार ने 425 रुपये प्रति कुंतल तक की बढ़ोतरी की है और 15 जुलाई तक दलहन की बुवाई में गत वर्ष के मुकाबले 40 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। अधिकांश कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खेती की आउटसोर्सिंग भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है।

हालांकि, सरकार ने मुख्‍य आर्थिक सलाहकार के नेतृत्‍व में दलहन पर नीति बनाने के लिए एक समिति का गठन किया है जो एमएसपी, बोनस और दालों के उत्‍पादन के लिए किसानों को रियायतें आदि देने जैसे विकल्‍पों पर विचार करेगी। लेकिन दिक्‍कत यह है कि सरकार अपनी नीतिगत खामियों की तरफ तभी ध्‍यान देती है जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बवाल खड़ा हो जाए। जबकि कामचलाऊ उपायों के बजाय दीर्घकालीन नीतियों और उपायों के जरिये किसान को सहारा देने की जरूरत है।

वेटनरी कॉलेज खोलना होगा आसान, एक्‍ट में संशोधन की तैयारी 

देश में पशु चिकित्‍सकों की कमी दूर करने के लिए केंद्र सरकार वेटनरी कॉलेज खोलने की प्रक्रिया को आसान बनाने जा रही है।

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नई दिल्‍ली। देश में पशु चिकित्‍सकों कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार वेटनरी कॉलेज खोलने की राह आसान बनाने जा रही है। नए काॅलेज खाेलने के‍ लिए जमीन जैसे मानदंडों में छूट दी जाएगी। इसके लिए तीन दशक से ज्‍यादा पुराने भारतीय पशु चिकित्‍सा परिषद अधिनियम में संशोधन होगा। इस समय देश में पशु चिकित्‍सों की काफी कमी है और विश्‍व में मवेशियों की स
र्वाधिक आबादी होने के बावजूद पूरे भारत में सिर्फ 52 वेटनरी कॉलेज हैं। इनमें से भी 16 कॉलेज पिछले दो साल में खुले हैं।

कृषि एवं किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री डॉ. संजीव कुमार बालियान ने मंगलवार को ऑल इंडिया प्री-वेटेेनरी टेस्‍ट (एआईपीवीटी)- 2016 के परिणामों की घोषणा करते हुए बताया कि भारतीय पशुचिकित्‍सा परिषद अधिनियम, 1984 में संशोधन का प्रस्‍ताव रखा गया है ताकि नए काॅलेज खोलने की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके। बालियान का मानना है कि देश में पशु चिकित्‍सकों की कमी को दूर करने के लिए सरकारी और प्राईवेट कॉलेजों की संख्‍या बढ़ानी जरूरी है।

जमीन सहित कई मानकों में मिलेगी छूट 

फिलहाल वेटनरी कॉलेज खोलने के लिए संस्‍थान के पास 45 एकड़ कृषि भूमि होनी जरूरी है। संजीव बालियान का कहना है कि आजकल शहरों में इतनी जमीन मिलना मुश्किल है। इतने सख्‍त मानदंडों के चलते निजी क्षेत्र के लोग वेटनरी कॉलेज खोलने के लिए आगे नहीं आ पाते हैं। उम्‍मीद है कि आईवीसी एक्‍ट में संशोधन के बाद नए कॉलेज खोलने की राह आसान हो जाएगी।

दो साल में खुले 16 नए कॉलेज

वर्ष 2014 तक देश में कुल 36 वेटनरी कॉलेज थे। जबकि पिछले दो वर्षो के दौरान 16 नए वेटनरी कॉलेज खोले गए हैं। इनमें निजी क्षेत्र के दो और 14 सरकारी कॉलेज हैं। पिछले दो साल में वेटनरी कॉलेजों में सीटों की संख्‍या 2311 से बढ़ाकर 3427 कर दी गई है।

 

 

National Seminar on “Liberating the Farmers from Debt Trap”

The question is how do we revitalize the health of our economy and liberate the farmers from the debt trap. Have we failed on the policy front?

gadkariAccording to 70th round of NSS data for the year 2012-13, majority of the farmers in India do not earn enough even to meet their consumption needs. In years of drought or floods, their condition becomes miserable and desperate. The small and marginal farmers are the most vulnerable in this respect. During the past one and a half decade, about 3 lakh farmers have committed suicide.

The question is how do we revitalize the health of our economy and liberate the farmers from the debt trap. Have we failed on the policy front? What kind of policy reforms are needed to improve the socio-economic conditions of farmers in various regions? What are the key challenges to implement the needed policy reforms? We sincerely feel that there is a need to discuss in an integrated manner, all the relevant issues relating to the present agrarian distress and find out the ways to overcome the challenges.

To initiate a debate on this crucial agricultural policy challenge The Council for Social Development, New Delhi, Centre for Agricultural Policy Dialogue, New Delhi and Swabhimani Shetkari Sanghtana of Maharashtra are jointly organizing a National Seminar on “Liberating the Farmers from Debt Trap: Challenges of Policy Reforms in India” at the India International Centre, Annexe, New Delhi on June 14, 2016.

Participants in the inaugural session of the seminar include Sri. Nitin Gadkari, Union Minister of Surface Transport, Highways and Shipping, Prof. Arvind Panagariya, Vice Chairman, NITI Aayog, Sri. Sanjeev Balyan, Minister of State, Agriculture, Sri. Om Prakash Singh Dhankar, Minister of Agriculture Haryana, Sri. Feroze Varun Gandhi, M.P and Dr. Dalwai, Additional Sec. Ministry of Agriculture, Govt. of India.

About 70 persons including technical experts, Members of Parliament, senior government officials and representatives of NGOs and Farmers’ organisations are expected to participate in the seminar. The seminar will discuss the following issues:

(i) Alternative Models of Income and Social Security for the farmers;
(ii) Challenges of Agricultural Policy Reforms, including Agricultural Price and Market Reforms, Technology, Land Policy, Subsidies, Crop Insurance, Credit Sector Reforms etc.
(iii) Challenges of Climate change – Risk Mitigation and Adaptation Strategies.