न्यू इंडिया में दो आत्महत्याएं और एक सबक

23 मई को जब 17वीं लोकसभा के नतीजे देश को चौका रहे थे, तभी मुंबई से एक युवा डॉक्टर की खुदकुशी की खबर भी आई। एक तरह जहां नरेंद्र मोदी और भाजपा की भारी जीत को जातियों की पकड़ कमजोर पड़ने का सबूत बताया जा रहा था, वहीं एक और युवा प्रतिभा जातिगत उत्पीड़न का शिकार हो गई। यह घटना हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की याद दिलाती है। ऐसी घटनाएं बताती हैं कि देश के उम्दा संस्थानों में काम करने वाले लोग भी निजी जिंदगी में कितने रूढ़िवादी और जातिवादी हैं। कमजोर सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को टॉप संस्थानों में प्रवेश पाने के बावजूद संदेह की नजर से देखा जाता है। उनकी मैरिट पर सवालिया निशान लगाया जाता है।

मुंबई के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएट की छात्रा और रेजीडेंट डॉक्टर पायल तडवी की आत्महत्या के मामले में तीन सीनियर रेजिडेंट डॉक्टरों भक्ति मेहर, हेमा आहुजा और अंकिता खंडेलवाल को गिरफ्तार किया गया है। ये तीनों पायल की सीनियर हैं और उसके साथ हॉस्टल में रहती थी। जातिगत आधार पर किसी महिला के उत्पीड़न में महिलाओं का शामिल होना और भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है। जबकि सभी समुदायों की स्त्रियां समान रूप से पितृसत्ता की सताई हुई हैं, फिर भी दलित-पिछड़ी महिलाओं के उत्पीड़न में सवर्ण महिलाएं बढ़-चढ़कर शामिल रहती हैं। इसे परवरिश या माहौल का असर मान सकते हैं लेकिन समूचे नारी विमर्श के लिए जटिल प्रश्न है।

पायल की मां आबेदा तडवी ने आरोप लगाया है कि तीनों सीनियर रेजीडेंट डॉक्टर उनकी बेटी को जातिगत आधार पर प्रताड़ित किया। वे उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करती थी। इस उत्पीड़न से तंग आकर पायल ने फांसी लगाकर जान दे दी। मुंबई पुलिस ने इस केस में अत्याचार-विरोधी, रैगिंग-विरोध और आईटी ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। फिलहाल, पूरा मामला जांच के दायरे में है। यह हत्या है या आत्म हत्या, इसे लेकर भी संदेह है।

सांस्थानिक नाकामी

इस घटना ने उच्च शिक्षण संस्थानों में व्याप्त जातिगत भेदभाव को एक बार फिर उजागर किया है। इस तरह का यह पहला मामला नहीं है। शिक्षा, रोजगार और बाजार से पैदा अवसरों के चलते दलित-पिछड़ों और आदिवासियों को जैसे-जैसे आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं, पुरानी पूर्वाग्रह और टकराव नए-नए रूपों में सामने आ रहे हैं। इन टकरावों की ताजा मिसाल है डॉ. पायल की आत्महत्या! हैरानी की बात है कि संवैधानिक प्रावधानों और कानूनी उपायों के बावजूद देश के टॉप संस्थान जातिगत भेदभाव रोकने में नाकाम हो रहे हैं।

डॉ. पायल पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल की छात्रा थी और हॉस्टल में उसके साथ होने वाले उत्पीड़न के काफी भयावह ब्यौरे सामने आ रहे हैं। कैसे उस पर जातिगत छींटाकशी की जाती थी, वाट्स एप ग्रुप में मजाक बनाया जाता था और रैगिंग होती थी, ये बातें मीडिया के बड़े हिस्से ने रिपोर्ट की हैं। पता चला है कि कॉलेज प्रशासन को लिखित शिकायत के बावजूद डॉ. पायल को लगातार परेशान किया जाता रहा। पायल की मां आबेदा तडवी का कहना है कि पायल के साथ होने वाले बुरे बर्ताव को उन्होंने अस्पताल में अपने इलाज के दौरान खुद भी महसूस किया था।

देश के उम्दा शिक्षण संस्थानों में जगह बनाने के बावजूद दलित, आदिवासी और पिछड़ी पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को किस प्रकार के मानसिक उत्पीड़न और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, यह किसी से छिपा नहीं है। जबकि आम धारणा है कि शिक्षित होने के साथ लोग जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी बुराईयों से लोग ऊपर उठ जाएंगे। लेकिन उच्च शिक्षण संस्थान इस मामले में समाज के बाकी हिस्सों से अलग या बेहतर साबित नहीं हो रहे हैं।

आरक्षित सीटों पर प्रवेश पाने वाले उम्मीदवारों को जातिवादी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें बात-बात में नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है। उनकी प्रतिभा पर सवाल खड़ा किया जाता है। इस तरह अकादमिक जगत के सर्वोच्च शिखरों पर भी जातिगत पूर्वाग्रहों की जकड़ कमजोर नहीं पड़ती। जिस आरक्षण को बरसों के भेदभाव को मिटाने का माध्यम माना गया था, वो एक नए भेदभाव का कारण बना दिया गया है। रोहित वेमुला और पायल तडवी इन दोनों ही मामलों में एक चीज समान है। दोनों के संस्थान उनका बचाव करने, उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने में नाकाम रहे। जिन संस्थानों पर मानवीय मूल्यों को बचाने का जिम्मा था, वे अपने छात्रों को जातिगत भेदभाव से भी नहीं बचा पाए।

नए संपर्क, नए टकराव

गौर करने वाले बात यह भी है कि बरसों से एक-दूसरे से दूर रहे समुदायों के लोग शिक्षा, रोजगार या आर्थिक गतिविधियों के कारण और लोकतंत्र व बाजार के दबाव में जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, उनके बीच बरसों से दबा द्वेष और टकराव भी उभर रहा है। इस तरह जातियों की पकड़ कुछ ढीली पड़ने और जातीय टकराव बढ़ने का सिलसिला साथ-साथ जारी है। इन टकरावों से बचने-बचाने के पुख्ता उपाय न तो शिक्षण संस्थानों के पास हैं और न ही कार्यस्थलों  पर दिखाई पड़ते हैं।

जातिगत उत्पीड़न के अलावा भारत में छात्रों की खुदकुशी अपने आप में एक बड़ी समस्या है। डॉ. पायल के मामले में ये दोनों समस्याएं सम्मलित रूप से सामने आती हैं। एनसीआरबी के साल 2015 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर घंटे कोई न कोई छात्र खुदकुशी कर लेता है। लैंसेट की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 15 से 29 साल के नौजवानों की सर्वाधिक आत्महत्या दर वाले देशों में शुमार है।

उच्च संस्थान में जातिगत भेदभाव

आश्चर्य की बात है कि तमाम कानूनी और संवैधानिक उपायों और समाज के कथित तौर पर आधुनिक होने के बावजूद जाति के आधार पर दलित, आदिवासी और पिछड़ों के उत्पीड़न की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जबकि दूसरी तरफ जातियों के बंधन टूटने के दावे किये जा रहे हैं। आरक्षण के खिलाफ भी जातिगत भेदभाव खत्म होने का तर्क अक्सर दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि देश में हर 16 मिनट में दलितोंं के खिलाफ कोई न कोई अपराध घटित होता है। दलितों की पिटाई के वीडियो अब आम हो चुके हैं। इसके पीछे कानून का खौफ न होना और समूचे समुदाय को डराने की मंशा नहीं तो और क्या है?

यूपीए सरकार के दौरान सुखदेव थोराट कमेटी ने एम्स में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न कलई खोल दी थी। थोराट समिति को एम्स के 72 फीसदी दलित और आदिवासी छात्रों ने बताया कि वे जातिगत भेदभाव का शिकार हैं। 76 फीसदी छात्रों ने बताया कि परीक्षा में छात्रों का मूल्यांकन भी उनकी जाति से प्रभावित होता है। प्रोफेसर उनके प्रति उदासीन रहते हैं और जाति की वजह से उनकी अनदेखी करते थे। दलित और आदिवासी शिक्षकों का सही प्रतिनिधित्व न होना भी इसकी बड़ी वजह है।

जाति के अलावा कमजोर अंग्रेजी और कम्युनिकेशन स्किल की वजह से भी कैंपसों में कमजोर पृष्ठभूमि वाले छात्रों को मानसिक उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है। क्लासरूम से लेकर हॉस्टल और आपसी मेलजोल में जातिगत भेदभाव कई रूपों में सामने आता है। कुछ साल पहले यूजीसी ने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समान अवसर सेल स्थापित करने की गाइडलाइन जारी की थी लेकिन ज्यादातर मेडिकल कॉलेज यूजीसी के दिशानिर्देशों को लेकर बेपरवाह बने रहे।

दलित-पिछड़ों पर बढ़ते हमले 

डॉ. पायल की खुदकुशी को देश में नफरत के माहौल और दलित उत्पीड़न की बढ़ती घटनाओं से जोड़कर देखा जा सकता है। उत्तराखंड में एक विवाह समारोह के दौरान कुर्सी पर बैठने को लेकर दलित युवक पर जानलेवा हमला हुआ तो गुजरात में दलित युवक को घोड़ी पर चढ़ने से रोकने के थरसक प्रयास किए गए। अलवर में दलित युवती के साथ गैंगरेप और जातिसूचक टिप्पणियों वाला वीडियो वायरल होना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मिंदगी का सबब होना चाहिए। लेकिन हो रहा है इसका उलटा। जातिगत भेदभाव, छुआछूत और उत्पीड़न को नकारने के बजाय दलित-आदिवासियों के सुरक्षा कवच संविधान और एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) कानून को ही कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

ये सब घटनाएं उस दौर में हो रही हैं जब गोडसे को देशभक्त बताने वाले संसद में हैं और ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़ी जा रही है। जबकि इस दौर में देश की कथित ऊंची जातियों को आत्म-मूल्यांकन करने और जाति, धर्म, रंग, क्षेत्र के आधार पर भेदभाव से ऊपर उठने की जरूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो राजनीति में भले ही जातियों के समीकरण ध्वस्त हो जाएं, समाज में डॉ. पायल और रोहित वेमुला जैसी प्रतिभाएं अपना गला घोंटने को मजबूर होती रहेंगी।

(डॉ. के. वेेलेंटीना समाज विज्ञानी और दिल्ली की अम्बेडकर यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

मजाक और मजबूरियों के बीच गायब मुद्दे

एक पुरानी लोक कथा है जिसमें एक तपस्वी की कड़ी तपस्या के बाद भगवान उसकी प्रार्थना से खुश होकर उसके समक्ष प्रकट हुए। भगवान ने वरदान देने से पहले एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि भगवान तपस्वी को जो भी देंगे, उसके घनिष्ट दोस्त को उसका दुगना मिलेगा। तपस्वी ने कुछ देर सोचने के बाद भगवान से अपनी एक आंख को निकाल लेने को कहा। उसका दोस्त पूरी तरह से अंधा हो गया।

आज के भारत में यह कोई लोक कथा नहीं रही। यह वर्तमान शासन प्रणाली का एक तरीका बन चुका है जहां किसी ‘अन्य’ के दुःख और असहायता से हम अपने सुख और सम्पन्नता को तोलने लगे हैं। जहां दूसरों की विफलता, हमारी सफलता का पैमाना हो गई है। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोग गौरक्षा के नाम पर मुस्लिमों पर हमले करने, उनकी हत्या तक कर देने को भी जायज ठहराने लगते हैं। यह विकृत सोच हिंदुस्तान के संविधान और सभ्यता के विपरीत है। एक तरफ लीक हुए सरकारी आंकड़ों से संकेत मिलता है कि बेरोजगारी पिछले 45 साल में सबसे ऊंचाई पर है, वहां दूसरी तरफ प्रज्ञा ठाकुर जैसे आतंक के आरोपियों को लोकसभा का टिकट दिया जाता है। मकसद साफ है, हिंदुत्व के परदे से जनता के असल मुद्दों को ढक दो। देखते ही देखते ‘सबका साथ’ काल्पनिक बन गया और ‘सबका विकास’ केवल नारा और मजाक बनकर रह गया।

इस दौर का सबसे घिनौना मजाक नोटबंदी था। सूचना के अधिकार कानून द्वारा पता चला है कि आरबीआई ने नोटबंदी करने से मना किया था। लेकिन आरबीआई की इस सलाह को नकारते हुए नोटबंदी का ऐलान किया गया। नोटबंदी का 99% से ज्यादा पैसा आरबीआई को वापस मिल गया। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 (एसडब्ल्यूआई) एक गंभीर स्थिति को दर्शाती है – (1) नोटबंदी के बाद कम से कम 55 लाख पुरुषों का रोजगार छिन गया (2) 20-24 वर्ष की आयु के लगभग हर 5 में से 3 पुरुष बेरोजगार हैं। केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया आकड़ों को दबाने या फिर ईपीएफओ और मुद्रा जैसे अधूरे डेटा को दिखाकर लोगों को बहकाने की रही।

नोटबंदी के बाद गरीबों को यह भरोसा दिलाया गया कि इससे जो काला धन मिलेगा, उससे उनके जनधन खातों में 15 लाख रुपये जमा होंगे। लेकिन ना काला धन मिला और न ही किसी के जनधन खाते में कोई पैसा आया। जो सरकार काला धन लाने की बात करती थी उसकी निगाहों के सामने 36 बड़े व्यापारी हाल के दिनों में बैंकों का पैसा लेकर देश छोड़कर भाग गए हैं।

अब मजाक का कारवां निकल चुका था। कहा गया कि आधार कार्ड का मकसद उन्हें पहचान देना है जिनके पास और कोई पहचान पत्र नहीं है। परंतु जितने लोगों ने आधार बनवाया उनमें से 99.97% ने कोई मौजूदा पहचान पत्र जैसे – राशन कार्ड या वोटर कार्ड का उपयोग किया। यानी उनके पास कोई न कोई पहचान पत्र पहले से था। तो फिर उन्हें आधार की क्या जरूरत थी? फिर कहा गया कि आधार का उपयोग सही लाभार्थी तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। परंतु सच तो यह है कि आधार गलत तरीके से जुड़ने के कारण कई लोगों को छात्रवृत्ति, गैस सब्सिडी, आवास योजना का पैसा इत्यादि पाने में अत्यंत परेशानी हुई है। बायोमेट्रिक पहचान की प्रक्रिया में विफलताओं के कारण राशन और पेंशन से वंचित कम से कम 75 लोगों की भूख से मौत हो चुकी है। हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस ने झारखंड के पिछले 4 सालों के एक करोड़ मनरेगा मजदूरी भुगतानों का अध्ययन किया तो पता चला कि जो मजदूरी भुगतान आधार से जुड़े थे, उनमें से 38% किसी अन्य मजदूर के खाते में जमा हुए।

मनरेगा के तहत हर साल करीब 7.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। पिछले पांच साल में हर साल वित्त मंत्री ऐलान करते आये हैं कि इस साल मनरेगा का आवंटन सर्वाधिक है। मगर महंगाई को समायोजित करते हुए देखा जाए तो पिछले पांच साल में हर साल का आवंटन 2010-11 के आवंटन से भी कम था। जबकि हर साल करीब 20 फीसदी आवंटन पिछले सालों का लंबित भुगतान है। केंद्र सरकार का दावा है कि 90 फीसदी भुगतान 15 दिन में हुए हैं लेकिन वास्तव में केवल 21 फीसदी भुगतान 15 दिनों में हुए हैं। यह लंबित भुगतान सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। बेरोजगारी की समस्या को हल करने में मनरेगा के शक्तिकरण के साथ शहरी रोजगार कानून की जरूरत है। एसडब्ल्यूआई की रिपोर्ट में भी इसकी सिफारिश की गई है।

मोदी सरकार के पांच साल के कामकाज और दावों में अंतर की लंबी फेहरिस्त है। मिसाल के तौर पर, वर्ष 2019-20 में आयुष्मान भारत के तहत 10 करोड़ परिवारों के लिए 6 हजार करोड़ रुपये के आवंटन का दावा किया गया। परंतु हिसाब लगाईये तो पता चलेगा कि इस पैसे में देश के सिर्फ 1.20 लाख परिवार ही 5 लाख की बीमा का फायदा उठा पाएंगे। यह मजाक नही तो क्या है?

खुले में शौच से मुक्ति पर भी इस सरकार का खूब जोर रहा है। इसी के चलते कई जिलों को खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया गया। लेकिन अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में शोध कर रहे आशीष गुप्ता की टीम के अध्ययन से पता चला कि गांवों को खुले में शौच से मुक्त (ODF) होने के दावे पूरी तरह झूठे हैं। जबकि खुले में शौच रोकने के लिए सरकार जोर-जबरदस्ती की रणनीति अपना रही है। इसके लिए ‘निगरानी समितियां’ बनाई गई हैं जो शौच करते लोगों से लोटा छीनकर, उनकी तस्वीरें लेकर सार्वजनिक रूप से पोस्टर बनवाकर गांव में चिपकाती हैं। कहीं शौचालय बनने तक राशन रोक दिया गया तो कहीं ड्रोन का इस्तेमाल कर खुले में शौच करने वालों के वीडियो बनाए गए। क्या यह एक सभ्य समाज की निशानी है?

बीते पांच साल गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और मॉब लिचिंग की वजह से भी भुलाए नहीं जा सकेंगे। झारखंड के गुमला जिले में 11 अप्रैल, 2019 को कुछ लोगों ने आदिवासी समुदाय के चार व्यक्तियों को गोहत्या के शक में बेरहमी से मारा-पीटा था जिनमें से एक प्रकाश लकड़ा की मौत हो गई। हैरानी की बात है कि जिन गरीब आदिवासियों की पिटाई हुई उन्हीं के ऊपर झारखण्ड गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम, 2005 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया, जबकि अपराधी फरार हैं। इसी तरह राजस्थान में अलवर के रहने वाले उमर खान भी 2017 में मॉब लिंचिंग के शिकार हुए थे। यहां भी पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के बजाय उमर के बेटे मकसूद को गोतस्करी के आरोप में जेल में डाल दिया गया।

कश्मीर के बडगाम जिले में मेजर नितिन गोगोई द्वारा सेना की जीप के बोनट से बंधे फारुख अहमद दार की छवि हमारी मानवता के पतन का स्थायी गवाह बनी रहेगी। दार तब से अत्यधिक न्यूनता और अनिद्रा से पीड़ित हैं। समाज को नफरत, विकृति, और हिंसा की आग में धकेला जा रहा है। सरकार कहती है सेना को खुली छूट दी है, परन्तु सच यह है कि देश में दहशत फैलाने वालों को खुली छूट मिल रही है। जबकि भारत को एक शांतिप्रिय, समावेशी, न्यायसंगत, पारदर्शी और जवाबदेह सरकार की जरुरत है।

राजेंद्रन (@rajendran_naray) अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु और शयानदेब (@sayandeb) अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली में पढ़ाते हैं।)

झारखंड के अनूठे वाद्य यंत्र और सांस्कृतिक उपेक्षा की टीस

झारखंड के बारे में एक कहावत प्रचलित है कि यहां चलना नृत्य है और बोलना ही गीत है। यहां हजारों सालों से अखड़ा की एक समृद्ध परंपरा रही है। अखड़ा गांव में वह स्थान होता है जहां रात्रि पहर में उम्र की सीमाओं के बंधन को छोड़कर निश्चछल, सरल, अबोध ग्रामीण मांदर की थाप और लोकगीतों की तान पर समूह में नृत्य करते हैं। इसकी अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रही है जो आदिवासी समुदाय को अपनी परंपरा एवं संस्कृति के और करीब लाती है। लेकिन इस संगीतमय प्रदेश की अपनी त्रासदी भी  है जो सत्ता के दावों से इतर कला-संस्कृति के प्रति सही दृष्टिकोण की कमी या आदिवासी संस्कृति के प्रति समझ का अभाव अथवा उसकी उपेक्षा से उपजी है।

आलम यह है कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के नाम पर उनकी परंपरा, संस्कृति और प्रकृति से दूर किया जाने का प्रयास होता रहा है। यह किसी एक राज्य की समस्या अथवा उनके लिए चुनौती नहीं है। कमोवेश यह जनजातीय बहुल सूबों की त्रासदगाथा का अंतहीन सिलसिल बन चुका है। इस विडंबनाबोध से मुक्ति की राह आसान नहीं है।

बहरहाल, झारखंड के लोक गीत-संगीत की बात परंपरागत वाद्ययंत्रों के बिना अधूरी है। इन वाद्य यंत्रों को निम्न श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है।

तत्वाद्य 2- सुषिर वाद्य 3- अवनद्ध 4- घनवाद्य

तत्वाद्य इस श्रेणी के तहत केंदरी, एकतारा, सारंगी, टूईला, भुआंग और आनन्द लहरी आदि वाद्य यंत्र आते हैं। इनमें एकतारा, टुईला, केंदरी और तरंगी स्वर वाद्य हैं, जो कंठ संगीत के साथ बजाये जाते हैं। कभी-कभी इनका प्रयोग बिना कंठ संगीत के सिर्फ धुनों के तौर पर भी की जाता है। एकतारा का प्रयोग ताल और स्वर आधार दोनों के लिए किया जाता है। भुआंग और आनंद लहरी ताल के लिए प्रयोग किये जाते हैं।

केंदरी वाद्ययंत्र की शैली वायलिन वादन से मिलती जुलती है। इसे वायलिन का झारखंडी स्वरुप भी माना जाता है। संथाल जनजाति में केंदरी का प्रयोग आमतौर पर किया जाता है। इसका तुंबा कछुआ के मजबूत खोल या नारियल के खोल से बनाया जाता है जिसमें गोही का चमड़ा मढ़ा जाता है। तुंबा से बांस या लकड़ी का दंड जुड़ा रहता है और उसके ऊपर तीन तार बंधे रहते हैं और इसके गज में घोड़े की पूंछ के बाल लगाये जाते हैं।

एकतारा बहुधा फकीर, भिक्षुक, योगी या साधुओं के द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है इसमें एक ही तार का प्रयोग होता है। एकतारा को गुपिजंतर भी कहा जाता है। इसके नीचे का हिस्सा लौकी या ककड़ी लकड़ी से बना होता है, जो खोखला होता है और इसके मुंह पर चमड़ा मढ़ा होता है। दोनों तरफ से तीन फुट लंबे बांस की खमचिया जुड़ी रहती हैं। एक लकड़ी की खूंटी बांस के ऊपरी हिस्से में होती है और नीचे से ऊपर की ओर खूंटी तक एक तार बंधा होता है। इसे बजाने के लिए दाहिनी तर्जनी में तांबा या पीतल से टोपीनुमा त्रिकोण पहना जाता है। इसी त्रिकोण से तार को बजाया जाता है।

टूईला का प्रयोग झूमर, टूसु, करम, बान्धना आदि गीतों के लिए किया जाता है। यह एक स्वर प्रधान और कठिन शैली का वाद्य यंत्र है। टूईला में स्वर स्थानों को नाखूनों के सहारे से निकालना पड़ता है जो मुश्किल काम होता है लेकिन इसमें पारंगत कलाकार इसे बखूबी बजाते है।

भूआंग तत्वाद्य श्रेणी का यह वाद्ययंत्र सामान्यतया दशहरा के समय दासाई नृत्य में प्रयोग में लाया जाता है। तार वाद्य होते हुए भी वादन प्रक्रिया के कारण इसमें एक से अधिक स्वर निकालने की गुंजाइश नहीं रहती है। इसमें दो भाग होते है धनुष और तुंबा। धनुष की लकड़ी वाले हिस्से के ठीक बीच में कद्दू से बना लगभग 2 फीट लंबा तुंबा नीचे की ओर लटका रहता है। नीचे की तरफ तुंबा का मुंह खुला रहता है जो रस्सी के सहारे कंधे से लटका लिया जाता है। यह संथालियों का प्रिय वाद्य यंत्र है।

सुषिर वाद्य शहनाई, बांसुरी, मदनभेरी, शंख और सिंगा, सुषिर वाद्य की श्रेणी में आते हैं। इनका प्राण फूंक है। सानाई और बांसुरी मुख्यत: स्वर वाद्य हैं। खास अवसरों इनकी धुनें काफी लोकप्रिय हैं।

सानाई का आकार बांसुरी की भांति होता है। सामान्य बोल-चाल की भाषा में इस वाद्ययंत्र को शहनाई भी कहा जाता है। पर्व -त्यौहार, पूजा-पाठ और विवाह जैसे शुभ अवसर पर सानाई की मंगलध्वनि पूरे वातावरण को मंत्रमुग्ध कर देती है। मंगल वाद्य सानाई, नटुआ, छऊ, पाईका, नचनी आदि नृत्य के साथ बजाई जाती है। इसकी लम्बाई लगभग 10 इंच की होती है। इसके तीन हिस्से क्रमश: माउथपीस, लकड़ी की नली और कांसा धातु से बना गोलाकार मुंह होता है। माउथपीस में ताड़ के पत्ते की पेपती रहती है। लकड़ी की नली में छ: छेद होते हैं। पेंपती और माउथपीस में फूंक भरी जाती है और छिद्रों पर अंगुली का संचालन करके स्वर को निकाला जाता है। कांसा धातु से बने मुंह के कारण इसकी आवाज काफी तेज होती है।

मदन भेरी शहनाई, बांसुरी और ढोल आदि के साथ इसे एक सहायक वाद्य के रूप में बजाया जाता है। शिकार के समय और पशुओं को खदेड़ने के लिए भी मदन भेरी का प्रयोग किया जाता है। नृत्य के साथ विवाह के समय भी इस यंत्र का को बजाया जाता है। मदन भेरी 4 फुट लंबा और सीधा वाद्य यंत्र है।

शंख एक शुभ वाद्य यंत्र है। विवाह पूजा आदि मंगल अवसरों के समय शंख का प्रयोग किया जाता है। पहले किसी संकेत का ऐलान करने या संदेश भेजने के लिए शंख की ध्वनि की जाती थी। यह सामुद्रिक जीव का सफेद खोल होता है जिसे फूंक मारकर बजाया जाता है।

सिंगा भैंस के सींग से बने होने के कारण इसका नाम सिंगा पड़ा। इसके नुकीले छोर की तरफ से फूंक मारा जाता है। चौड़ा वाला हिस्सा आगे की तरफ मुड़ा होता है। देर तक स्वर को टिकाए रखने के लिए इसमें दमदार फूक भरी जाती है। कभी रुक-रुक कर भी स्वर आता है। पर्व त्यौहार और शिकार के समय तथा पशुओं को खदेड़ने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

वाद्य यंत्रों के हिसाब से मुंडा और उरांव समाज में नगाड़ा बहुत लोकप्रिय है तो संथालों में तमक को बजाता हुआ देखा जा सकता है। वहीं मांदर को लगभग हर पारंपरिक उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल किया जाता है। बांसुरी का भी इन वाद्य यंत्रों में एक महत्वपुर्ण स्थान है। अर्से से बांसुरी को ज्यादातर बैकग्राउंड म्यूजिक के रूप में लोकगीतों में प्रयोग किया जाता रहा है।

जब मिटता भाषाई सरहदों का भेद 

पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित लोक गायक मुकुंद नायक बताते हैं कि दिनभर गांव के खेत-खलिहान में काम करने के बाद लोग शाम को अखरा में बैठते थे और अपना सुख-दुख बतियाते थे। भावी योजनाओं की रूपरेखा भी बनाते थे। यह सब मौखिक परंपरा के जरिये होता आया है। अखड़ा में ज्ञान का संचार कहानियों और गीतों के माध्यम से होता था। लोक गायकों की स्वर साधना तथा गायन पद्धति हुआ करती थी। वह चाहे कुड़ूख हो, मुण्डारी, खोरठा या पंच परगनिया कोई भी भाषा क्यों न रही हो। अखड़ा में गायकों का साथ ढोल, नगाड़ा व अन्य वाद्ययंत्रों के माध्यम से वाद्यय कलाकार देते थे। वे बताते हैं कि नागपुरी भाषा यहां के नागवंशी राजाओं के काल में एक हजार नौ सौ पचास साल तक राजभाषा रही है। अखड़ा की एक खूबसूरती यह भी थी कि अलग-अलग भाषाओं में गायन तथा कथा कहने वालों का यहां सामूहिक जुटान होता था। इसमें भाषाई सरहदों का कोई सवाल नहीं होता था न ही किसी किस्म का अन्य विभेद देखने को मिलता है।

सांस्कृतिक चेतना का क्षरण

प्रसिद्ध गायक-गीतकार मधु मंसूरी के गीत झारखंड आंदोलन में जान फूंकते थे। आज वो सरकारी तंत्र में सांस्कृतिक चेतना के अभाव को लेकर चिंतित हैं। फोटो साभार: यूट्यूब

 

लोक गायक मधु मंसूरी बताते हैं कि मुुरली, टोहिला, ठेचका, केंद्रा, सारंगी, झाल-मंजीरा, शहनाई (शास्त्रीय वाद्यय नहीं) लुप्तप्राय वाद्ययंत्रों की श्रेणी में शुमार किये जाने वाले वाद्यय यंत्र हैं। यहां के नेताओं के अंदर राम दयाल मुंडा और विश्वेश्वर प्रसाद केसरी की तरह वैसी सांस्कृतिक चेतना नहीं है और न ही उनमें परंपरा को लेकर गंभीरता का भाव है।दिवंगत मुण्डा और स्व. केसरी राजनीतिक आंदोलनकारी होने के साथ साथ सांस्कृतिक चेतना संपन्न शख्सियत के मालिक थे।

लोक प्रस्तुति में वैभव के प्रवेश पर मधु मंसूरी कहते हैं कि 1960 ई. से पूर्व तक नचनी का अखड़ा था, लेकिन आज के जैसा शिष्ट मंच नहीं था। अतीत को याद करते हुए वे कहते हैं, “1960 में अपने खर्च से मैंने मुड़मा जतरा और जगरन्नाथपुर रथयात्रा में शिष्ट सांस्कृतिक मंच को स्थापित किया। अन्य प्रांतों में संस्कृतिकर्मियों को जैसी तरजीह दी जाती है उसका यहां अभाव है।” वे सवालिया लहजे में बताते हैं, “संपूर्ण भारत में संस्कृतिकर्मियों को  राजनीतिक दल टिकट देते हैं, लेकिन यहां कोई राजनीतिक दल नहीं देते? अपरवाद स्वरूप अब तक सत्तर साल के इतिहास में सिर्फ दो व्यक्तियों को प्रमुख राजनीतिक दलों से टिकट मिला। एकीकृत बिहार में शिक्षामंत्री रहे करमचंद भगत और दूसरे राम दयाल मुण्डा को।”

सरकारी रवैया निराशाजनक 

दरअसल कला-संस्कृति की बदहाली के पीछे गैर-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अधिकारियों की संस्कृति विभाग में मौजूदगी का होना भी है। पिछले दौर को याद करते हुए मधु मंसूरी याद दिलाते हैं कि कैसे झारखंड के कला-संस्कृति विभाग में एक ऐसे महानुभाव को सांस्कृतिक संयोजक नियुक्त कर दिया गया था जिन्हें झारखंड की एक भी स्थानीय भाषा मसलन मुण्डारी, खड़िया, हो, पंचपरगनिया व अन्य बोलियों का कोई ज्ञान नहीं था। वे न गाते है, न बजाते हैं और न ही नाचते हैं।

मधु मंसूरी आगे कहते हैं कि साल 1962 से लेकर 1980 तक के करीब दो दशक के लंबे कालखंड में जब रामदयाल मुण्डा अमेरिका प्रवास पर थे तब इस इलाके में सांस्कृतिक कर्म की जमीन को पुख्ता करने में उनके जैसे नौजवानों की भूमिका थी। बहरहाल, कुछ पुरस्कार प्राप्त लोक कालाकारों को अखड़ा की चिंता पुरस्कार मिलने के बाद आयी! उसके पहले अखड़ा का उनके सांस्कृतिक जीवन में कोई मोल नहीं था! यह कला के विद्रूप होते जाने की स्थितियों से हमें रूबरू कराता है।

 

गायब मुद्दे: अपने एजेंडे पर भी वोट नहीं मांग पाया विपक्ष

चुनाव का  पांचवा चरण खत्म हो गया, विद्वान मित्र चिंतित हैं कि देश की अगले 5 वर्ष में क्या दिशा-दशा होगी? चुनाव लड़ रही पार्टियां (किसी एक गठबंधन को तो आना ही है), अगर सत्ता में आई तो उनका किसानों के लिए क्या एजेंडा होगा? वो शिक्षा के क्षेत्र में क्या पहल करेंगी? स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण, पेयजल, शहरी नीति, ग्रामीण नीति, विदेश नीति और आर्थिक नीति  क्या होगी? आखिर राजनीतिक दल क्या कहकर वोट मांग रहे हैं? अगर एक सामान्य नागरिक अपने सूझबूझ से मतदान करना चाहे तो किसे वोट दे?

ये प्रश्न पूरे चुनावी संवाद में अनुत्तरित रहे हैं, और विद्वान मित्र परेशान।

हालांकि, विद्वानों के परेशान होने का कोई खास कारण नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र और भीड़तंत्र में कोई विशेष फर्क नहीं होता। भले ही आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्री हों, वैज्ञानिक हों, प्रोफेसर हों या दिन भर शराब के नशे में धुत्त अनपढ़ और कामचोर हो, वोट की कीमत तो सबकी बराबर ही है।

आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर, जब यह प्रधानमंत्री जी से पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण सवाल बन गया हो तो फिर देश की प्रसिद्ध महिला कार्यकर्ताओं द्वारा पूछे गए 56 सवालों (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला नीति, महिला आरक्षण, किसान आत्महत्या, कृषि नीति) को कौन पूछेगा?  अगर सिर्फ दिल्ली की सात सीटों के बारे में ही बात करें तो एक तरफ आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा,  आतिशी जैसे विद्वान नौजवानों को टिकट दिया है तो वहीँ एक ऐसा व्यक्ति भी चुनावी मैदान में है 1971 की भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश बनने का पता ही नहीं है। क्योंकि तब वह बहुत छोटा था। ठीक से कुछ याद नहीं है!

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विदेश नीति और अर्थव्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री की सोच और नजरिये से ज्यादा खुद उनकी शैक्षिक योग्यता चर्चा का विषय बनी हुई है। इस तरह पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हर चुनाव में शैक्षिक योग्यता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हट जाती हैं। एक अन्य फिल्म स्टार और चुनावी उम्मीदवार की 2014 से 2019 के पांच वर्षो में उम्र तो 7 साल बढ़ गई लेकिन शैक्षिक योग्यता बीए से घटकर इंटर पास हो गई है। ऐसे माहौल में मुद्दों पर क्या खाक चर्चा होगी! मजेदार बात यह है कि ये सभी लोग प्रमुख राजनैतिक दल के लोग हैं और शायद चुनाव जीत भी जाएं क्योंकि इनमें से कोई गाता अच्छा है तो कोई एक्टिंग अच्छी करता है और कोई बड़ा खिलाड़ी है।

शायद जनता भी यही चाहती है इसलिए तो डॉक्टर मनमोहन सिंह जैसे अंतरराष्ट्रीय छवि के अर्थशास्त्री दक्षिणी दिल्ली जैसी पढ़े-लिखे लोगों वाली लोकसभा सीट से चुनाव हार जाते हैं। स्वर्गीय नरसिम्हा राव, जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी और मुल्क को आर्थिक संकट से उबारा  वे आर्थिक उदारीकरण के फायदे गिनाते हुए चुनावी राजनीति में कूदे और इतिहास हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी जो अपनी वाकपटुता, ईमानदारी और स्वच्छ छवि के लिए जाने जाते थे, इंडिया शाइनिंग के बावजूद फीके पड़ गए। तब सोशल मीडिया भी नहीं था, लेकिन देश तो यही था।

ध्यान से देखा जाय तो 21वीं के पहले 19 वर्षों में देश में  कोई बड़ा राजनैतिक आंदोलन नहीं हुआ है। चुनावी रैलियों के अलावा किसी बड़े मुद्दे पर राजनैतिक दल देश को एकजुट करने या दिशा देने में नाकाम रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं के नेतृत्व में विरोध-प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे किसानों को राजधानी में घुसने से रोका गया और लाठीचार्ज कर तितर-बितर कर दिया गया। तमिलनाडु के किसान अपने मुद्दे उठाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। शिक्षामित्रों और बेरोजगारों के पुलिस से पिटने पर अब किसी को फर्क नहीं पड़ता। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी साल भर संघर्षरत रहती हैं। सरकारी कर्मचारी और पूर्व सैनिक भी अपनी मांगों को लेकर हर वक्त सरकार से सींग लड़ाये रहते हैं। ताज्जुब की बात है कि चुनाव के वक्त से सारे मुद्दे सिरे से गायब हैं। या कहना चाहिए गायब कर दिए गए हैं।

मुद्दों की इन गुमशुदगी का एक बड़ा कारण है सत्ताधारी भाजपा की तनखैया और अवैतनिक ट्रोल आर्मी जो व्हाट्सअप विश्वविद्यालय से ज्ञान पाते ही किसी का भी मुंह काला कर सकती है। किसी पर जूता फेंक सकती है। इनके डर से ज्यादातर विद्वान और समझदार लोगों ने अपने मुंह पर ताला लगा लिया है।  यह ट्रोल आर्मी एक फौजी को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए तीन दिन के अंदर उसे देशद्रोही, विदेशी जासूस, अय्याश और  आतंकवाद की  आरोपी को राष्ट्रभक्त घोषित कर सकती है। शहीद पुलिस अफसर स्वर्गीय हेमंत करकरे की शहादत को बदनाम करना इनके लिए चुटकी बजाने जितना आसान काम है।

यह सब एक सोची-समझी चुनावी रणनीति के तहत किया गया है। धर्म, जाति और क्षेत्रीय संकीर्णताओं में बंटे भारतीय समाज के मनोविज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया गया। प्रधानमंत्री के भाषणों में तमाम गैर-जरूरी और हल्की बातों (राजीव गांधी भ्रष्टाचारी नंबर वन बनकर मरा, कांग्रेस मुझे मरवाना चाहती है, मैं भिक्षा मांगता था, मेरी मां दूसरे के घर वर्तन धोती थी, चेतक घोड़े की मां गुजराती थी) को शुमार किया। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों को दूर से ही नमस्ते कर दी।

पिछले पांच वर्ष में तमाम योजनाओं, परियोजनाओं को गेम चेंजर कहा जा रहा था। जीएसटी, नोटबंदी, तीन तलाक, विदेश नीति, एफडीआई और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे गेम चेंजर मुद्दे भी इस चुनाव में गुम हैं।

ऐसा भी नहीं है कि आम जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को दफन करने का काम सिर्फ भाजपा ने किया है। कांग्रेस सहित लगभग सभी क्षेत्रीय दल सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, अकाली दल मुद्दाविहीन चुनाव ही लड़ रहे हैं।  चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियां जो किसानों की लड़ाई लड़ने का दावा करती हैं, वे भी किसानों के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन छेड़ने में नाकाम रही हैं। कैराना उपचुनाव में जयंत चौधरी ने जरूर जिन्ना नहीं गन्ना का नारा दिया था जो कारगर भी रहा लेकिन लोकसभा चुनाव में गन्ना किसानों के भुगतान का मुद्दा ज्यादा नहीं उठ पाया। मुद्दों के इस नैरेटिव को बनाने, मिटाने में मुख्यधारा के मीडिया की बड़ी भूमिका है। भाजपा के पक्ष में मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी इस भूमिका को पूरी तरह सरेंडर कर दिया।

आज कृषि और किसान एक बड़े संकट से गुजर रहे हैं। लागत बढ़ रही है, आमदनी घट रही है, नई पीढ़ी खेती किसानी से दूर भाग रही है, ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की मार अलग है। लेकिन देश की तकरीबन आधी आबादी की रोजी-रोटी का सहारा खेती और किसान चुनावी चर्चा से गायब हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में कई अहम मुद्दों को जगह दी और कहा है कि कृषि पर अलग से बजट लाएंगे, लेकिन घोषणा-पत्र की ऐसी ज्यादातर बातों पर कांग्रेस वोट मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। घोषणा पत्र में लिखे अपने वायदों पर भी कांग्रेस वोट मांगने से कतरा रही है।

राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर की अनेक रिपोर्ट बता रही है कि भारत के शहरों की गिनती दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में होती है। शुद्ध पेयजल तो अब धीरे-धीरे लग्जरी बनता जा रहा है। यमुना, गंगा  और हिंडन  सहित अनेक छोटी बड़ी नदियां नाले में परिवर्तित हो चुकी  हैं लेकिन इस पर भी चुनाव में कोई चर्चा नहीं है, उल्टे मथुरा की वर्तमान सांसद शुद्ध पेयजल और शुद्ध हवा की मशीनों के प्रचार में लीन हैं। नदियों को मां का दर्जा देने वाले समाज की संवेदनाएं इन्हें गंदा नाला बनते देख कतई आहत नहीं होती हैं।

(लेखक समाजशास्त्री हैं और कांग्रेस का घोषणा-पत्र बनाने वाली टीम में शामिल रहे हैं) 

 

खेती-किसानी पर चर्चा के बिना गुजरता चुनाव

राजनैतिक दल चुनाव जीतने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों की समस्याएं उठाने के साथ-साथ सरकार बनने के बाद उन समस्याओं को दूर करने का वायदा भी करते हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में हिस्सेदारी कम होने के बावजूद खेती-किसानी आज भी भारत की आबादी को प्रत्यक्ष रोजगार देती है और अप्रत्यक्ष रूप से औद्योगिक तथा सर्विस सेक्टर को कच्चा माल व बाजार उपलब्ध कराती है। रोजगार और बाजार को सर्वाधिक प्रभावित करने वाली आर्थिक गतिविधि खेती-किसानी की समस्याएं और उनके समाधान के उपाय इस बार चुनावी चर्चा से यदि गायब नही हैं तो प्रमुखता में भी नही हैं।

अगर वर्ष 2014 से तुलना करें तो तब कृषि एवं किसानों के लिए भाजपा की चिन्ता व प्रतिबद्धता आज के मुकाबले अधिक दिखाई देती थी। सार्वजनिक सभाओं में नरेंद्र मोदी यूपीए सरकार पर तंज करते हुए दोहराते थे कि कांग्रेस की नीति ‘मर जवान, मर किसान’ की हैं और यदि उनकी सरकार बनती है तो वे किसानो की बहुप्रतिक्षित मांग ‘स्वामीनाथन आयोग’ की संस्तुतियों को लागू कर किसानों को उनकी लागत पर 50% लाभ देंगे, कृषि बाजार में आमूल-चूल परिवर्तन कर बिचौलियों को कृषि बाजार से बाहर करेंगे, कृषि में सार्वजनिक निवेश बढ़ाएंगे, मध्यम एवं दीर्घकालिक सिंचाई योजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा कर ‘पर ड्राप-मोर क्राप’ की व्यवस्था करेंगे।

2014 के चुनावों में किसानों ने भाजपा के वायदों पर भरोसा वोट दिए और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। लेकिन खेती और किसान सरकार की प्राथमिकता में नहीं आ पाए। मोदी सरकार ने मध्यप्रदेश सरकार को गेहूं पर दिए जा रहे बोनस को समाप्त करने के लिए लिखा तथा सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से बताया गया कि किसानों को लागत पर 50% लाभ देने वाली स्वामीनाथन कमेंटी की रिपोर्ट लागू करना संभव नहीं है।

सरकार के पहले दो वर्षों 2014-15 और 2015-16 में किसानों को सूखे का भी सामना करना पड़ा जिससे उसकी आमदनी प्रभावित हुई। लेकिन बाद के तीन वर्षों में रिकार्ड उत्पादन तथा सरकार की महंगाई नियन्त्रण की नीतियों के कारण किसानों की आमदनी में कमी आई। चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने स्वामीनाथन की रिपोर्ट के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का दावा तो किया लेकिन उससे कोई बहुत फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसकी गणना में भूमि का किराया सम्मिलित नही किया गया था।

मोदी सरकार की बड़ी-बड़ी घोषणाओं जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री किसान सिंचाई योजना, मृदा स्वास्थ्य योजना, गन्ने का 14 दिनों में भुगतान आदि जमीन पर असफल होने के बाद भाजपा को उत्तर प्रदेश एवं अन्य राज्यों में चुनाव जीतने के लिए कृषि ऋण माफी  का वायदा करना पड़ा। विभिन्न राज्यों में आधे-अधूरे तरीके से कृषि ऋण माफी योजना लागू भी की गई।

आखिरकार तमाम संरचनात्मक सुधारों को भूलकर भाजपा ने तेलंगाना और उड़ीसा सरकार के 2 हेक्टेयर तक जोत वाले किसानों के लिए 6000 रुपये/वार्षिक की प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना लागू कर चुनाव से पहले किसानों के खाते में 2000 रुपये हस्तांतरित करने का दांव चला। जो खेती-किसानी के मोर्चे पर सरकार की नाकामी को साबित करता है।

विपक्षी दल कांग्रेस के अलावा सपा-बसपा-रालोद गठबंधन ने भी किसानों से कर्ज माफी का वायदा तो किया है लेकिन यह चुनाव भी खेती-किसानी पर बिना किसी गंभीर विमर्श और कार्य योजना के बिना गुजर रहा है।

(लेखक उत्तर प्रदेश योजना के पूर्व सदस्य और कृषि से जुड़े मामलों के जानकार हैं)

 

हमें जीएम सरसों की जरूरत ही क्‍या है?

जेनेटिक तौर पर संवर्धित (जीएम) सरसों को व्‍यवसायिक मंजूरी देने का मामला टालेे जाने के 13 साल बाद यह जिन्‍न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है। इस बार जीएम सरसों सरकारी भेष में व्‍यवसायिक खेती की मंंजूरी के लिए आई है। इस पर टैक्‍सपेयर का 70 करोड़ रुपया खर्च हुआ है, जिस पैसे से बहुत से स्‍कूल खुल सकते थे।

इस बार भी वही दावे हैं, वही भाषा है और हमारी आशंकाएं भी वही हैं। 13 साल पहले एग्रो-कैमिकल क्षेत्र की दिग्गज बहुराष्‍ट्रीय कंपनी बायर की सहायक प्रो-एग्रो सीड्स इंडिया लिमिटेड ने दावा किया था कि उसकी जीएम सरसों वैरायटी में चार विदेशी जीन हैं जो सरसों की उत्‍पादकता 20-25 फीसदी तक बढ़ा सकतेे हैंं और तेल की गुणवत्‍ता भी सुधरेगी। नई जीएम सरसों को दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्‍लांट्स ने विकसित किया है जिसमें तीन विदेशी जीन – बार, बारनेस और बारस्‍टार हैं। इस बार भी जीएम सरसों को लेकर वैसेे ही दावे किए जा रहे हैं जैसेे प्रो-एग्रो सीड्स ने किये थे। जीएम सरसों के ये दोनों पैरोकार, पहले प्रो-एग्रो सीड्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और अब दिल्ली विश्वविद्यालय, हर्बिसाइड रिज़िस्टेेन्स यानी खरपतवार प्रतिरोध होने से इंकार करतेे हैं जबकि दोनों ने इसके लिए ज्ञात जीन का इस्‍तेमाल किया है।

जीएम समर्थन और तथ्‍यों से खिलवाड़

भारत हर साल करीब 60 हजार करोड़ रुपये के खाद्य तेलों का आयात करता है इसलिए तत्‍काल सरसों का उत्‍पादन बढ़ाना जरूरी है। खाद्य तेेलों का उत्‍पादन बढ़ेने से विदेशी मुद्रा की बचत होगी। इस विषय पर कई परिचर्चाओं और सर्वजनिक बहसों में मैंने दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति और नई जीएम सरसों विकसित करने वालों में अग्रणी डॉ. दीपक पेंटल को बार-बार जोर देते हुए सुना कि खाद्य तेलों के आयात पर खर्च हो रही विदेशी मुद्रा में कटौती की आवश्‍यकता हैै और भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह कितनी बड़ी बचत होगी! यह बिल्‍कुल वही दावा है जो 13 साल पहले प्रो-एग्रो की जीएम सरसों के पैरोकार किया करते थे। उस समय खाद्य तेलों का आयात घरेलू खपत का करीब 50 फीसदी था, जिस पर 12 हजार करोड़ रुपयेे खर्च होते थे।

कोई भी पढ़ा-लिखा व्‍यक्ति इस बात से सहमत होगा कि खाद्य तेलों के आयात पर होने वाले भारी खर्च में कमी आनी चाहिए। लेकिन जीएम लॉबी ने बड़ी चतुराई से इस तर्क का इस्‍तेमाल यह आभास दिलाने में किया है जैसे सरसों के उत्‍पादन में कमी की वजह से ही खाद्य तेलों का इतना अधिक आयात करना पड़ता है। जबकि असलियत में ऐसा नहीं है। खाद्य तेल के इतनी अधिक मात्रा में आयात के पीछे कई और भी कारण हैं। मिसाल के तौर पर, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी देश के बढ़ते आयात को लेकर चिंतित रहते थे। वह चालू खाते के घाटे को कम करने को बेताब थे। उस समय ईंधन, उर्वरक और खाद्य तेल का सबसे ज्‍यादा आयात होता था। खाद्य तेलों का सालाना आयात 1500 से 3000 हजार करोड़ रुपए के आसपास रहता था। यह बात समझते हुए कि भारत में घरेलू तिलहन उत्‍पादन बढ़ाने की क्षमता है और खाद्य तेलों का आयात कम किया जा सकता है उन्‍होंने 1985 में तिलहन में एक प्रौद्योगिकी मिशन आरंभ किया।

दस साल से भी कम समय यानी 1986 से 1993 के बीच देश में तिलहन उत्पादन दोगुना हो गया जो उल्लेखनीय वृद्धि है। खाद्य तेल आयात करने वाला भारत इस मामले लगभग आत्मनिर्भर हो गया। खाद्य तेल में देश की 97 प्रतिशत आत्मनिर्भरता थी और मात्र 3 फीसदी तेल आयात करने की जरूरत रह गई थी। लेकिन कुछ साल बाद भारत ने जानबूझकर आयात शुल्क घटाना शुरू किया और सस्ते व सब्सिडी वाले खाद्य तेल के बाजार में आने का रास्‍ता खोल दिया। जैसे-जैसे खाद्य तेल का आयात बढ़ा घरेलू ऑयल प्रोसेसिंग उद्योग बंद होते गए।

दरअसल खाद्य तेलों के आयात पर खर्च बढ़ने का कारण तिलहन के उत्पादन में गिरावट नहीं है। बल्कि यह सब आयात नीति की खामियों का नतीजा है। विदेशी खाद्य तेलों पर आयात शुल्क को लगभग शून्य़ कर दिया गया जबकि यह 70 फीसदी या इससे भी ज्‍यादा होना चाहिए था। (डब्ल्यूटीओ भारत को खाद्य तेलों पर आयात शुल्क अधिकतम 300 प्रतिशत करने की अनुमति देता है)। तिलहन का सही दाम और बाजार मुहैया कराया जाता तो हमारे किसान तेल की सारी कमी दूर कर देते।

दावा किया जा रहा है कि जीएम सरसों से उत्पादन में 20 से 25 फीसदी तक बढ़ोतरी होगी। यह एकदम बेतुुकी बात है। कहना पड़ेगा कि इस दावे के पीछे स्‍वार्थ निहित हैं। पहली बात तो यह है कि ऐसा कोई ज्ञात जीन (या जीन समूह) नहीं है जो उत्पादकता बढ़ा सकता है। दूसरी बात, कोई भी जीएम वैरायटी उतनी ही अच्छी होती है जितनी संकर किस्म जिसमें विदेशी जीन डाला जाता है। यदि कोई जीन संकरण की प्रक्रिया को सरल करता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह उत्पादकता बढ़ा देगा।

पिछले 13 वर्षों में मैंने उपलब्ध सरसों के तेल की गुणवत्ता से कोई शिकायत नहीं सुनी है। हमारे देश में पारंपरिक रूप से सरसों का इस्तेमाल भोजन के लिए किया जाता है। इसकी पत्तियों को सरसों का साग के रूप में पकाया जाता है। इसलिए सरसों को केवल खाद्य तेल के रूप में ही नहीं देखा जाना चाहिए। मैं कभी-कभी सरसों तेल का उपयोग कान और नाक के रोगों के उपचार और शरीर की मालिश के लिए भी करता हूं। इसके अलावा सरसों के तेल का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में भी किया जाता है। इसलिए बीटी बैंगन पर रोक लगाते हुए 2010 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा व्‍यक्‍त की गई चिंताओं और जीएम फसलों पर संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट व सुप्रीम कोर्ट की तकनीकी समिति की सिफारिशों का पूरी तरह पालन करना आवश्यरक है।

मुझे समझ नहीं आ रहा है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा जीएम फसलों पर रोक के समय पेश की गई 19 पेजों की रिपोर्ट को नतीजों को दरकिनार क्यों कर रही है? क्या जीएम इंडस्‍ट्री इतनी ताकतवर है कि जीईएसी एक पूर्व मंत्री के नेतृत्व में आरंभ हुई एक वैज्ञानिक बहस को नजरअंदाज कर देना चाहती है? जीएम सरसों का कोई प्रत्‍यक्ष लाभ न होने के बावजूद स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की ऐसी अनदेखी?

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(देविंदर शर्मा कृषि और खाद्य नीति से जुड़े मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ हैं।)

यहां प्रस्‍तुत लेख मूलत: biospectrum पत्रिका में प्रकाशित हुआ था जो यहां पढ़ा जा सकता है http://www.biospectrumindia.com/biospecindia/views/223161/why-india-gm-mustard

गांव को याद करते गांव के अजनबी

रोजी रोटी की तलाश में गांव से विस्थापित होकर शहर में आए हम जैसे लोग अक्सर गांव के साथ अपने रिश्ते को वक्त-बेवक्त परिभाषित करने की कोशिश करते रहते हैं। इस कोशिश में अक्सर निराशा हाथ लगती है।

ये कड़वा सच है कि हम जैसे लोगों की पीढ़ी न तो शहरी है और न ही अब गांव की रह गई है। शहर में होते वक्त दिमाग में गांव होता है और गांव पहुंचने पर ऐसा अजनबीपन घेर लेता है जिसकी कोई काट दिखाई नहीं पड़ती। गांव छोड़ते वक्त कोई भी किशोर या युवा पीछे मुड़कर देखता रहता है। उसे लगता है कि उसका गांव, उसकी धरती उसे पुकार रही है। यह पुकार बरसों-बरस तक सुनाई देती है। शुरु के बरसों में लगातार गांव आना-जाना बना रहता है, लेकिन बीतता समय इस बात की ज्यादा अनुमति नहीं देता कि आप बार-बार गांव जाएं। धीरे-धीरे रिश्ता पुराना पड़ने लगता है और हम गांव के किस्सों के साथ शहर में जीने लगते हैं।

गांव की दहलीज पर दस्तक देने का सिलसिला होली-दिवाली या शादी-ब्याह तक सीमित रह जाता है। और जब किसी दिन जोड़ लगाने बैठते हैं तो पता चलता है कि गांव छोड़े तो 20, 25 या 30 साल हो गए हैं। फिर किसी दिन गांव जाते हैं तो पाते हैं कि अब उन युवाओं की संख्या बढ़ रही जो आपको सीधे तौर पर नहीं पहचानते क्योंकि जब गांव छोड़ा था तो उनमें से कई का तो जन्म भी नहीं हुआ था और कुछ बच्चे ही थे। जबकि, अब वे निर्णायक स्थिति में हैं और जो परिचय हम जैसों के साथ नत्थी थे अब वे बुजुर्ग हो गए हैं। इस पूरी प्रक्रिया में शहर को लगातार नकारने और गांव को छाती से चिपटाए रखने का सिलसिला चलता रहता है। कुल मिलाकर दिमाग में एक गुंझल मौजूद रहती है कि आप का जुड़ाव किस जगह से है! जहां पर रोटी खा-कमा रहे हैं, वो बेगाना लगता है और जिससे भावात्मक रिश्ता है, वहां का होने की पहचान या तो खत्म हो गई है या फिर बेहद सिकुड़ गई हैै।

जिन लोगों के साथ मैंने प्राइमरी और हाईस्कूल स्तर की पढ़ाई की, उनमें से ज्यादातर अब भी गांव में हैं। खेती करते हैं या फिर बड़े किसानों के साथ मजदूरी करते हैं। इनमें मेरे कुनबे के लोग भी हैं, पड़ोसी भी हैं और वे लोग भी है जिन्हें मैं अपने मां-पिता के निकटतम दोस्तों-परिचितों में शामिल करता हूं। ऐसा भी नहीं है कि गांव ने पूरी तरह मुझे या मेरे जैसे लोगों को नकार दिया हो, वहां स्वीकार्यता तो है, लेकिन उसका स्तर बदल गया है। एक ऐसे सम्मान का दर्जा मिल जाता है, जिसे परिभाषिक करना प्रायः मुश्किल होता है। जिनके साथ बचपन में यारी-दोस्ती का नाता रहा है, उनके बच्चे अब बड़े हो गए हैं। ज्यादातर के सामने रोजगार का संकट है। खेती की जमीन सिकुड़ गई है। बड़े परिवारों के बीच जमीन इस तरह बंटी है कि दो पीढ़ी पहले जिस परिवार के पास 200-250 बीघा जमीन थी, अब तीसरी पीढ़ी के लोगों के पास 10-15 बीघा रह गई है। इस जमीन के भरोसे कैसे नई पीढ़ी जिंदा रहेगी? इस सवाल से मेरे वे दोस्त जूझते हैं जो गांव में रह गए हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि किसी भी तरह एक बच्चे को शहर में नौकरी मिल जाए। उनमें से ज्यादातर का जोर सरकारी नौकरी पर है। वे नौकरी के स्तर की बात नहीं करते, चपरासी, चैकीदार, बेलदार, डेजीवेजिज……………कुछ भी हो, बस सरकारी नौकरी मिल जाए।

न वे जानते, न समझते कि अब सरकारी दफ्तरों में चपरासियों की भर्ती बंद है। उन्हें यही लगता है कि हम जैसे लोग भी रिश्वत के आदी हो गए हैं। इसलिए वे धीरे-धीरे पैसों की बात करते हैं। फिर जिंदगी भर की जमा पूंजी को सामने रखकर नौकरी दिलाने के लिए गुहार लगाते हैं। क्या जवाब दिया जाए ऐसे हालात में ? कोई जवाब बनता ही नहीं! बस, यही कहना पड़ता है कि, मैं देखता हूं, जो भी हो सकेगा पैसों के बिना ही होगा। एक बार तो मामला टल जाता है, लेकिन अगली मुलाकात में फिर वही सवाल, वही गुहार! अंततः रिश्ते सिमट जाते हैं, बचपन की दोस्ती संदेह में बदल जाती है। दुआ-सलाम घटती जाती है। एक दूरी और दुराव जैसे हालात बन जाते हैं।

वक्त के साथ आप अपने गांव में ‘अजनबी’ हो जाते हैं, खुद को सैलानी की तरह पाते हैं। रिश्तों में ठंडापन पसर जाता है। फिर आप चाहें या न चाहें, आपको गांव बिसरा देना पड़ता है। मन के अनंत कोनों में पछतावा विराट आकार लेता रहता है। जिन दुश्वारियों से खुद निकलकर आए हैं, वे ही तमाम दुश्वारियां लोगों को घेरे हुए हैं। उनकी जिंदगी को मुश्किल बना रही हैं, लेकिन आपके पास सीधे तौर पर कोई समाधान नहीं होता। आप केवल सुन सकते हैं, कोई सैद्धांतिक रास्ता बता सकते हैं, लेकिन धरातल पर कुछ कर पाना उतना आसान नहीं होता, जितना कि कई बार लगता है। कभी-कभी उपदेश दे सकते हैं कि बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दो, जिले के सरकारी अस्पताल में मां का ईलाज करा लो, बेटी की शादी में ज्यादा दहेज मत देना, बैंक से बेमतलब कर्ज मत लेना…………………पर, ये उपदेश किसी काम नहीं आते।

गांव के लोग सच्चाई को ज्यादा गहरे तक जानते-समझते हैं, उन्होंने सिस्टम की ज्यादा मार झेली हुई है, उन्हें किसी उपदेश और दिलासा पर यकीन नहीं होता। उन्हें ज्यादातर बातें झूठी लगने लगती हैं, उनका विश्वास उठने लगता है और इस उठते हुए विश्वास की एक वजह हम जैसे लोग भी होते हैं। जारी…………….