बिजनौर में भाकियू का धरना-प्रदर्शन, झड़प

पुलिसकर्मियों ने किसानों को रोकने का प्रयास किया लेकिन गुस्साए किसानों की भीड़ को रोका नही जा सका। किसानों ने गन्ना भुगतान, आवारा पशु, किसान नेताओं पर फर्जी मुकदमे दर्ज कर उत्पीड़न करने आदि मुद्दों को उठाया।

ताजा जानकारी के अनुसार, अपर जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक शहरी किसानों के बीच पहुँचकर वार्ता कर रहे है। पंचायत जारी है।

आज सुबह पुलिसकर्मियों के द्वारा एक ट्रैक्टर के टायर की हवा निकालने से नाराज प्रदर्शनकारी किसानों ने ट्रेक्टर को डीएम ऑफिस में घुसा दिया। इसे लेकर बिजनौर पुलिस और किसानों के बीच झड़प भी हुई। बैकफुट पर आया बिजनौर प्रशासन भाकियू नेताओं से बातचीत की कोशिशों में लगा है।


दिल में बसा गांव: आदमी बैल और सपने

अस्सी नब्बे के दशक तक ग्रामीण इलाकों में बैलगाड़ी का प्रयोग माल ढुलाई के अलावा घर की बहुओं को ससुराल पहुंचाने के लिये किया जाता था। बारात विदाई में लोकल पैसेंजर ट्रेन की भी शानदार भूमिका होती थी। भावी बहु अपने मैके से डोली में बैठकर रेलवे स्टेशन तक आती फिर डोली उठाने वाले कहार पैसेंजन ट्रेन की खिड़की के पास डोली को तजुर्बे से बांध देते।

जब ट्रेन गंतव्य पर पहुंचती पुन: कहार डोली को उतारकर प्लेटफार्म पर रखते और बहु एक बार फिर डोली में जाकर बैठ जाती। स्टेशन से बाहर निकलकर बताये स्थल पर पेड़ की छांव में बैलगाड़ी में बांस की कमानी से घेरा बना दिया जाता। एक जोड़ी बैल को जुआठ में बांधने के पहले उसके ऊपर से धोती-साड़ी या चांदनी जैसे मोटे कपड़े तान दिये जाते।

वर-वधु-सहबाला तीनों बारी-बारी से कमानी तने घरनुमा बैलगाड़ी पर सवार होते…उसके बार गाड़ीवान दोनों बैलों के कंधे पर जुआठ चढ़ाकर उनके गले को रस्सी से बांध देता….गाड़ीवान एक बार चलते के पहले दुल्हे से पूछता – सब ठीक से बैठ गये हैं न…दुल्हा की हामी के बाद गाड़ीवान पहले दाहिन बगल वाले बैल का पुट्ठा ठोकता या पैर के अंगुठा व मध्यमा उंगली से बैल के पांव के पिछले हिस्से को हल्के से ठोकता…इशारा पाते ही बैल कुछ दूर अनमने तरीके से चलने के बाद अपनी चाल रौ में चल पड़ते…बिना बोले दोनों बैल का आपसी तालमेल और उनके गले में बंधी घंटी की टन…टून…टन…टून….सुमधुर आवाज प्रकृतिक संगीत के आनंदलोक में विचरने को बाध्य करते। टूटी जर्जर सड़कों पर पहिये की खड़खड़ाहट, बांस की बाती से बने बेस एरिया की चरमराहट घंटियों के स्वर लहरियों से पूरी यात्रा में युगलबंदी करते अनूठा मंजर पेश करते।

अपने गांव/गंतव्य की यह यात्रा किस्से कहानियों में ही जिन्दा है अब। सड़कों के पक्कीकरण, विस्तार तथा आटो रिक्शा के आगमन से बैलगाड़ी गुजरे जमाने की सवारी होती चली गयी। हॉवर्ड को हॉर्डवर्क से चुनौती देने वाले चौकीदार को पता होना चाहिए कि ज्ञान बैल के अंदर भी होता है। मनुष्य ज्ञान का विभाजन विद्यागत विशिष्टता के लिये करता है, पशु के अंदर ऐसी चेतना का अभाव होता है।

रामशरण जोशी की एक किताब का शीर्षक था-आदमी बैल और सपने। हालांकि, उस किताब को मैंने पढ़ा नहीं है। इसी तरह बैल पर कवि शमशेर बहादुर सिंह की भी एक शानदार कविता है-

मैं वह गुट्ठल काली कड़ी कूबवाला बैल हूं

जो अकेले धीरे-धीरे छह मील खींचकर ले जाते हुये

ठेले के उपर लदा हुआ माल

स्टेशन से गोदाम तक 

चुपचाप धीरे-धीरे आंखे बाहर को निकली हुईं 

त्योरी चढ़ी हुई, कंधे जोर लगाते हुये

सीना और छाती आगे की ओर झुककर जोर लगाते हुये 

राने भरी हुईं गर्म पसीने से तर, मगर जोर लगती हुईं

आगे कविता में विडंबना बोध का स्वर गहराता है और बैल की स्वभाविक नाराजगी की अभिव्यक्ति में भी वह श्रम से भागता नहीं है। यथा-

वह गहरा लगातार श्रम 

पुट्ठों को श्लथ कर देनेवाला श्रम 

स्वंय मेरी नींद का कब्र बन जाता है 

मालिक पर तब जो मुझे गुस्सा आता है

उससे मेरा जोर और बढ़ जाता है

बैल का अक्स कवि केदारनाथ सिंह की कविता मांझी का पुल में भी प्रतिध्वनित होता है-जब खैनी बनाते लालमोहर को बैलों की सींग के बीच एन दिख जाता है मांझी का पुल….बैल मूक पशु है, लेकिन जैसी उपमा उसे (मूर्ख ) दी जाती है….वैसा वह है नहीं…मनुष्य सपना देख सकता है बैल नहीं…उसके वारिस मानव जात में कहीं ज्यादा मिल जायेंगे हमें।

साहित्यकार रामदेव सिंह अपने अतीत की स्मृतियों के झरोखे में विचरण करते हुये कहते हैं – जबसे होश संभाला साधन के रुप में बैलगाड़ी से रुमानी रिश्ता रहा। लगभग तीन दशकों तक। 1967 से 1971 तक जब हाईस्कूल में पढ़ रहा था। हास्टल में रहता था। छुट्टियों में यही बैलगाड़ी मुझे लाने भेजी जाती थी और हास्टल पहुंचाने भी। गांव भर में हमारी बैलगाड़ी सबसे सुंदर थी। नक्काशियों वाला टप्पर था। पर से टीन वाला चदरा, ताकि बारिश में सवार भींगे नहीं। टप्पर का इस्तेमाल जनाना सवारी के लिए ज्यादा होता था। अपनी शादी में ट्रेन पकड़ने के लिए मैं बैलगाड़ी से ही स्टेशन गया था।

चार दिनों बाद जब अपनी नववधू को विदाई करवा कर अपने स्टेशन पर उतरा तो यही बैलगाड़ी हमारे इन्तजार में खड़ी थी। रास्ते में जोर की आंधी आयी। बारिश होने लगी। संयोग से वहां एक प्राइमरी स्कूल था। इसी स्कूल में तीन घंटे शरण लेना पड़ा। आप कल्पना कर सकते हैं शहर में पली-बढ़ी नयी नवेली और बैलगाड़ी की वह सवारी, लेकिन उस दिन को हम बहुत रूमानियत के साथ याद करते हैं। बैलगाड़ी की सवारी के अनगिनत अनुभव हैं मेरे पास। 1982 में रेल की नौकरी में आने के बाद भी 1990-91 तक मैं रेलवे स्टेशन से गांव आने-जाने के लिए शौकिया बैलगाड़ी मंगवाया करता था।

मोहन लाल यादव बताते हैं कि हमारे यहां इलाहाबाद में जब कुंभ मेला लगता था तो गंगा किनारे के निकटवर्ती गांव बैलगाड़ी और इक्कों से भर जाते थे। यूपी के पूरब और पूर्वोत्तर जिले जैसे गोरखपुर, जौनपुर, आजमगढ़ तथा गाजीपुर तक के तीर्थ यात्री बैलगाड़ियों से ही आते थे। वे महीनों पहले से ही यात्रा शुरू कर देते थे। रास्ते पर वे गाते बजाते चले आते थे। रात्रि किसी बाग में अथवा किसी सराय में रुकते। बचपन में हम उनके पास रात में किस्से सुनने जाते थे।

संस्कृतिकर्मी जावेद इस्लाम अपने बचपन को याद करते हुये बताते हैं कि मेरा घर जीटी रोड पर है। बचपन में सामान्य बच्चों की तरह हम भी सड़क पर गुजरने वाले बैल गाड़ी पर दौड़ के पीछे लटक जाते थे और मजा लेते हुये कुछ दूर तक जाते फिर उतर जाते थे। मजा तो तब आता था जब बैल गाड़ी पर दूल्हा व घूंघट में दुल्हनियां जा रही होती थी। बैलगाड़ी के पीछे कपड़ेे का पर्दा लगा होता था। हम बच्चे शोर मचाते बैल गाड़ी के पीछे भगते थे, पर्दा उठा कर दूल्हा-दुल्हन की एक झलक पाने के लिये। गाड़ी मान सोटा दिखाकर या हल्के तरीके से सटाकर कर हम बच्चों को भगाता था। वे भी क्या दिन थे?

आकाशवाणी के पूर्व कार्यक्रम अधिशासी अनिल किशोर सहाय बचपन की स्मृतियों में डूबकर बताते हैं कि हम भी बचपन में बैलगाड़ी में सवार होकर ननिहाल जाते थे। बस से सड़क पर उतरने के बाद आठ किलोमीटर का सफर कच्चे रास्ते की सवारी बैलगाड़ी के जरिये ही तय करते थे। मेरी मां कुछ जरूरी चीजें बैलगाड़ी में रख लेती और हम पैदल खेतों के रास्ते…. क्या दिन थे… रास्ते में एक छोटी नदी भी पड़ती थी, पर गाड़ीवान इतना सिद्धहस्त था कि वह जोर से हकारते हुये नदी पार….. अब सब सपना सा लगता है। वहां पक्की सड़क बन गयी है और गांव तक बस जाने लगी है। पूर्वोत्तर भारत का मुझे नहीं पता, लेकिन शेष भारत में बैलगाड़ी कृषि कार्यों में अनाज ढूलाई के अलावा आवागमन का एक महत्वपूर्ण साधन था। जिसके दरवाजे पर दो तीन थोड़ी बैल हों उसे अच्छा कृषक माना जाता था।

बहरहाल, दौर बदल रहा है और बदलते वक्त की रफ्तार में बैलगाड़ी पीछे छूट चुकी है। लेकिन शहर के बियाबान में भी उस गांव की याद तो आती है जो दिल के किसी कोने में बसा है। वहां बैलगाड़ी के चलने और बैलों के झूमने का संगीत हमेशा सुनाई देता रहेगा।

 

 

भारत की हर चार महिला में से तीन के पास काम नहीं है

सरकारें अक्सर यह दावा करती हैं कि महिलाओं की सशक्तिकरण के लिए बहुत काम किए गए हैं। हर सरकार यह कहती है कि उसके लिए महिलाओं का उत्थान और कार्यबल में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना प्राथमिकता का काम है। सरकारें ये भी कहती हैं कि महिलाओं के साथ किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं हो, यह भी सुनिश्चित किया जाएगा।

लेकिन जमीनी हकीकत अब भी इन दावों से काफी दूर है। यह बात लगातार कई रिपोर्ट साबित कर रहे हैं। हाल ही में दुनिया की प्रतिष्ठित गैर सरकारी संस्था ऑक्सफैम ने एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें बताया गया है कि श्रम बल में भागीदारी से लेकर भुगतान तक के मामले में महिलाओं की स्थिति बेहद बुरी है।

भारत में रोजगार के संदर्भ में अगर बात की जाए तो महिलाओं के लिए पहली मुसीबत तो यह है कि उन्हें कहीं रोजगार मिले। अगर कहीं उन्हें काम मिल भी जाता है तो फिर समस्या यह आती है कि उन्हें पुरुषों के मुकाबले कम पैसे मिलते हैं।

ऑक्सफैम की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि पुरुषों और महिलाओं द्वारा किए जा रहे एक ही काम के बदले महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 34 फीसदी कम पैसे मिलते हैं। ऑक्सफैम ने अपने इस अध्ययन के लिए 2011-12 के राष्ट्रीय नमून सर्वेक्षण संगठन के आंकड़ों को आधार बनाया है। इसके बाद उस सर्वेक्षण के आंकड़ों को 2018 की अपनी असमानता रिपोर्ट के आंकड़ों के साथ जोड़ा है।

ऑक्सफैम ने इन आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष भी निकाला है कि उच्च पदों पर काम करने वाली महिलाओं को भी अपने पुरुष समकक्षों के मुकाबले कम पैसे मिल रहे हैं। लेकिन इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यहां यह अंतर सिर्फ एक फीसदी का है। क्योंकि उच्च पदों पर काम करने वाली महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं।

दैनिक आधार पर मजदूरी करने वाले पुरुषों और महिलाओं के मजदूरी भुगतान का फर्क सबसे अधिक है। इसमें भी यह बताया गया है कि जो नियमित श्रमिक हैं, उनमें यह अंतर कम है ओर जो कैजुअल यानी ठेके के मजदूर हैं, उनमें यह फर्क अधिक है।

इस रिपोर्ट में एक अच्छी बात यह है कि रोजगार के स्तर पर भले ही गैरबराबरी बढ़ी हो लेकिन शिक्षा के स्तर पर लड़कों और लड़कियों के बीच का अंतर कम हुआ है। लेकिन रोजगार के अवसरों में कमी और रोजगार हासिल करने से लेकर पगार पाने तक में हो रहे भेदभावों की वजह से शिक्षा के स्तर पर हुई प्रगति का खास लाभ महिलाओं को नहीं मिल पा रहा है।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पूरे कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारती की स्थिति पूरी दुनिया में सबसे खराब है। देश की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी आधी है लेकिन कार्यबल में उनकी हिस्सेदारी एक चैथाई से भी कम ही है। इसका मतलब यह हुआ कि भारत की चार महिलाओं में से तीन के पास कोई काम नहीं है।

इन आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया है कि भारत के आर्थिक विकास की यात्रा में क्या देश ने महिलाओं को भुला दिया है? क्योंकि अगर उनका ध्यान रखा जाता तो आज यह स्थिति नहीं होती। देश के कुल कार्यबल में हिस्सेदारी के मामले में महिलाओं की स्थिति थोड़ी बेहतर होती और इससे पूरी अर्थव्यवस्था का लाभ होता।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर है। ग्रामीण महिलाओं की कुल संख्या में से 75 फीसदी महिलाएं किसी ने किसी रूप में खेतों में काम कर रही हैं।

हालांकि, रिपोर्ट में भी यह भी कहा गया है कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी थोड़ी बढ़ी हुई इसलिए भी दिख रही है क्योंकि पुरुष रोजगार के बेहतर अवसरों की तलाश में शहरों का रुख कर रहे हैं। वहीं दूसरी वजह यह बताई गई है कि आज भी जीवनयापन के स्रोतों की उपलब्धता के मामले में कृषि क्षेत्र ही सबसे आगे है।

ऑक्सफैम की यह रिपोर्ट हकीकत से वाकिफ कराने वाली है। सरकारों को ऐसी जानकारियों को आधार बनाकर स्थितियों में बदलाव की दिशा में परिणामकारी कदम उठाने चाहिए।

तीन साल में केडिया बना बिहार का पहला जैविक गांव

बिहार के जमुई जिले में एक गांव है केडिया। जैसा कि देश के अधिकांश गांवों की कृषि की स्थिति है, वही स्थिति इस गांव की भी थी। यहां के किसान रसायनिक खाद का इस्तेमाल अच्छी फसल की उम्मीद में कर रहे थे। इसके बावजूद अपेक्षित उत्पादन नहीं हो रहा था। इस वजह से किसानों की आमदनी कम थी। देश के दूसरे गांवों की तरह इस गांव के किसानों का भी खेती से मन भरने लगा था और ये सारी उम्मीदें छोड़ने लगे थे।
ऐसे ही समय में बिहार के इस गांव में एक तरह की ‘कृषि क्रांति’ का सूत्रपात हुआ। गैर सरकारी संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय किसानों और उनमें भी खास तौर पर महिलाओं की भागीदारी के साथ यहां की खेती को प्रकृति केंद्रीत बनाने के लिए एक जीवित माटी अभियान की शुरुआत हुई। यह तय किया गया कि खेती के लिए रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करनी है।
इसके बाद यह गांव के लोगों ने जैविक खेती की ओर रुख किया। यह काम इतना आसान नहीं था। लेकिन केडिया के किसानों ने हार नहीं मानी और लगातार इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए काम करते रहे।
इन कोशिशों का नतीजा यह हुआ कि केडिया गांव पूरे बिहार राज्य का पहला जैविक गांव बन गया। 17 नवंबर, 2018 को केडिया को बिहार सरकार ने राज्य के पहले जैविक ग्राम के तौर पर मान्यता दे दी। आम तौर पर यह धारणा है कि जैविक खेती करने से खेती लागत बढ़ जाती है। इस गांव में उलटा हुआ। यहां काम कर रहे सामाजिक संगठनों के मानें तो इस गांव में खेती की लागत जैविक खेती की ओर बढ़ने से 60 फीसदी तक कम हो गई।
केडिया गांव की जैविक खेती की इस यात्रा में गांव में जल संरक्षण को लेकर भी जागरूकता आई। यहां के लोगों ने बारिश के पानी के संरक्षण का रास्ता निकाला। साथ ही खाना बनाने के लिए बायोगैस के इस्तेमाल करने की तरकीब भी इस गांव के लोगों ने अपनाई। जैविक खेती से पैदा होने वाले कृषि उत्पादों के भंडारण के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाला एक कोल्ड स्टोरेज बनाया गया। इससे यहां के कृषि उत्पाद लंबे समय तक खराब नहीं होते हैं और इन्हें बाजार तक पहुंचाने के लिए किसानों को पर्याप्त समय मिल जाता है। इन उपायों से इस गांव में न सिर्फ खेती प्रकृति केंद्रित हुई बल्कि स्थानीय लोगों का जीवन भी प्रकृति केंद्रित बनता गया।
केडिया गांव की इस सफलता ने न सिर्फ प्रदेश स्तर के बल्कि बाहर के शोधार्थियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया है। लोग यहां का सफल प्रयोग देखने आ रहे हैं। बिहार सरकार के कृषि मंत्री भी इस गांव का दौरा कर चुके हैं। बिहार का कृषि मंत्रालय राज्य के दूसरे हिस्से में जैविक खेती करने वाले लोगों को केडिया गांव लाकर यहां के सफल प्रयोग को दिखाने की एक योजना चला रहा है।
अब इस गांव के लोग दूसरे गांवों के लोगों को भी अपनी सफलता की कहानियां बता रहे हैं। ये दूसरे गांवों के लोगों को भी जैविक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। इस काम के लिए केडिया गांव के लोग दूसरे गांवों के लोगों को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। जमुई से सटे जिलों के तकरीबन 500 किसानों ने केडिया गांव में आकर जैविक खेती से संबंधित प्रशिक्षण हासिल किया है।
इसका असर यह हो रहा है कि जो लोग प्रशिक्षण लेकर जा रहे हैं, वे भी अपने गांव में केडिया माॅडल को अपनाने की कोशिश करते हुए जैविक खेती की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। जमुई जिला प्रशासन ने पिछले दिनों यह निर्णय लिया है कि जिले के सभी दस प्रखंडों में कम से कम एक गांव केडिया माॅडल के आधार पर विकसित किए जाएं। सरकार के स्तर पर भी और कुछ गैर सरकारी संगठनों के स्तर पर भी यह कोशिश हो रही है कि राज्य के दूसरे जिलों में केडिया की तर्ज पर जैविक गांव विकसित किए जाएं।

भयंकर कृषि संकट का सामना कर रहे हैं गांव

इंटरनैशनल फूड पाॅलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की है। इसमें इस संस्था ने बताया है कि दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के गांव भयंकर कृषि संकट का सामना कर रहे हैं। संस्था ने यह भी कहा है कि अगर स्थितियों को नहीं सुधारा गया तो इससे और भी कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

संस्था ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों के ग्रामीण इलाकों की स्थिति और वहां के भयंकर कृषि संकट का अध्ययन करके बताया है कि इस वजह से इन क्षेत्रों में भूखमरी, कुपोषण, गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। साथ ही पर्यावरण को लेकर भी नए तरह की चुनौतियां पैदा हो रही हैं।

इस रिपोर्ट में इस स्थिति के खतरों से भी पूरी दुनिया को आगाह करने की कोशिश की गई है। रिपोर्ट मंे बताया गया है कि अगर स्थिति को नहीं सुधारा गया तो दुनिया की खाद्य सुरक्षा खतरे में आएगी। इसके अलावा सतत विकास लक्ष्यों को 2030 तक हासिल करना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर स्थितियों में सुधार नहीं लाया गया तो पेरिस समझौते के लक्ष्यों को भी हासिल करना मुश्किल हो जाएगा।

इस रिपोर्ट में अफ्रीका, भारत और चीन के ग्रामीण इलाकों के संकट की खास तौर पर चर्चा की गई है और कहा गया है कि इन क्षेत्रों के शहरी इलाकों में जो सुविधाएं हैं, उनके मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में काफी कम सुविधाएं हैं। चीन के ग्रामीण इलाके पर्यावरण से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे हैं। वहीं अफ्रीका के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी बड़ी समस्या है। जबकि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि संकट कई और समस्याओं के मूल में है।

अब भी गांवों में सबसे ज्यादा गरीब लोग रहते हैं। पूरी दुनिया की आबादी में गांवों की हिस्सेदारी 45.3 प्रतिशत है। जबकि दुनिया के 70 फीसदी गरीब लोग गांवों में ही रहते हैं। शहरी इलाकों में गरीबी की दर सात फीसदी है। जबकि गांवों के लिए यह आंकड़ा वैश्विक स्तर पर 17 फीसदी का है।

समाधान की राह सुझाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण इलाकों पर खास जोर देते हुए उनका विकास करने की जरूरत है। नीतिगत मामलों में ग्रामीण इलाकों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रामीण विकास को व्यापक दायरे में देखने की जरूरत है।

रिपोर्ट में नीति निर्धारकों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि उन्हें यह भी देखने की जरूरत है कि अगर गांवों का विकास होगा तो इससे पूरी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ेगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, वैश्विक विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सकेगा और पर्यावरण संरक्षण संबंधित लक्ष्यों को पूरा करना भी आसान होगा।

इस रिपोर्ट में यह भी सिफारिश की गई है कि समस्या के समाधान के लिए गांवों और शहरों की अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ना होगा। इससे कृषि और गैर-कृषि क्षेत्र में सामंजस्य बनेगा और इसका असर न सिर्फ आर्थिक स्तर पर पड़ेगा बल्कि सामाजिक जीवन में भी इससे सुधार होगा।

इस रिपोर्ट में ग्रामीण इलाकों की स्थिति में सुधार के लिए पांच उपाय अलग से बताए गए हैं। ये उपाय हैंः गांवों में कृषि और गैर-कृषि रोजगार सृजन, लैंगिक समानता, पर्यावरण चुनौतियों का समाधान, उर्जा स्रोतों तक पहुंच में सुधार और सुशासन में निवेश। जाहिर है कि अगर इन मोर्चो पर काम होता है तो इससे न पूरी दुनिया के ग्रामीण इलाकों की तस्वीर बदल सकती है।

इस रिपोर्ट में पहली बार कुछ अच्छे प्रयोगों के बारे में भी बताया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे यूरोप के कुछ देशों ने अपने यहां के गांवों को संकट को दूर करने का सफल प्रयोग किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इन प्रयोगों में से कुछ बातें दुनिया के वैसे देश अपनी जरूरत के हिसाब से अपना सकते हैं, जहां के ग्रामीण क्षेत्र संकटों का सामना कर रहे हैं।

गांव की यादें और शहरों में अजनबी

समय आगे बढ़ता है और हम जैसे लोग अपने जीवन में हर वक्त इस विरोधाभास को सामने खड़ा पाते हैं। बल्कि, गांव जाकर अपने भाई-बंधुओं को यह बताने लगते हैं कि अपने भरोसे रहो, जो करो खुद करो, किसी की मदद न लो, अपने बल पर आगे बढ़ो। पर, वे नहीं समझते कि उन्हें ‘क्या’ समझाया जा रहा है। बल्कि ‘क्या’ से अधिक बड़ा ‘क्यों’ होता है, उन्हें ‘क्यों’ समझाया जा रहा है। समझाने की यह प्रक्रिया खुद के लिए किसी दिलासा से कम नहीं होती। तब लगता है कि हमने गांव के प्रति, अपनी धरती के प्रति और वहां रह रहे (छूट गए) लोगों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर लिया है।

अपने गांव में आउटसाइडर

मेरे परिचित एक इंजीनियर साहब कुछ साल पहले रिटायर होने के बाद स्थायी तौर पर गांव चले गए। उनके मन में वैसे ही ऊंचे आदर्श थे, जैसे कि गांव से उजड़े हम जैसे ज्यादातर लोगों के मन में हैं या होते हैं। कुछ दिन गांव में उन्हें खूब तवज्जो मिली, हर कोई सलाह-मशवरे के लिए उनके पास जाता था। इंजीनियर साहब को अपनी विवेक-बुद्धि पर पूरा भरोसा था। लेकिन, वक्त ने जल्द ही उन्हें बता दिया कि अब वे ‘आउटसाइडर’ हैं। हुआ यह कि इंजीनियर साहब के परिवार के एक व्यक्ति ने दूसरे की जमीन पर कब्जा कर लिया और जिसकी जमीन हड़पी उसी पर मुकदमा भी करा दिया। पीड़ित आदमी सिर पटक कर रह गया, कहीं से कोई मदद नहीं मिली। इस पूरी घटना से इंजीनियर साहब की न्याय-बुद्धि को झटका लगा, उन्होंने अपने परिवार के लोगों को भला-बुरा कहा और पीड़ित की जमीन लौटाने पर जोर दिया। अगले दिन परिवार के लोगों ने इंजीनियर साहब को कुनबे से बाहर कर दिया और ये भी समझा दिया कि अब ज्यादा दिन गांव में रहोगे तो किसी दिन लौंडे-लफाड़े हाथ रवा कर देंगे! इंजीनियर दोबारा शहर में आ गए हैं और गांव में अपने हिस्से की जमीन को बेचने की तैयारी में हैं! क्या ये ही था सपनों का गांव!

जवाब बेहद मुश्किल है। क्योंकि इंजीनियर साहब एक सपना लेकर गए थे, गांव में एक अच्छे स्कूल का, एक डिस्पेंसरी का और जवान होती पीढ़ी के लिए एक स्किल एंड काउंसलिंग सेंटर का। इनमें से एक भी सपना पूरा नहीं हुआ क्योंकि गांव की जिंदगी उस 30-40 साल पहले के दौर में नहीं है, जब किसी एक पीढ़ी के कुछ उत्साही युवाओं ने अपने सपनों के लिए गांव की धरती छोड़ी थी। इस उम्मीद के साथ छोड़ी थी कि एक दिन फिर लौट कर आएंगे और इस धरती को सूद समेत उसका हक अदा करेंगे। लेकिन, कुछ भी अदा नहीं होता क्योंकि आप जिस धरातल पर लौटना चाहते हैं, उस धरातल का लेवल बदल चुका है। तब, सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि उस लेवल के साथ खुद को किस प्रकार एडजस्ट करें। इस पूरी प्रक्रिया में ‘सत्य’ ऐसे विरोधाभास का सामना करना है, जिसकी कोई काट आमतौर पर हमारे सामने नहीं होती।

नये जमानेे से कदमताल की जटिलता

यह सच है कि गांव की नई पीढ़ी को कॅरियर और शैक्षिक परामर्श की जरूरत है। उन्हें नहीं पता कि शहर में रहने वाले उनके जैसे युवा बहुत तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, उनसे प्रतिस्पर्धा के लिए यह जरूरी है कि गांव के युवाओं को काउंसलिंग और गाइडेंस मिले। कोई उन्हें यह बता सके कि वे अगर बीए भी करना चाहते हैं तो किन विषयों के साथ करें और किस काॅलेज या विश्वविद्यालय करें! जब वे बीटेक के पीछे दौड़ रहे होते हैं तब उन्हें पता चलता है कि फैक्ट्रियों में तो पाॅलीटेक्निक डिप्लोमा वालों की मांग है और जब वे बार-बार इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल होते हैं तो तब उन्हें शायद पता ही नहीं होता कि आईटीआई की किसी ट्रेड में दाखिल होकर भविष्य में ठीक-ठाक नौकरी पा सकते थे। यह विरोधाभास सतत रूप से गांव की जिंदगी का हिस्सा बना रहता है।

अपवाद हर जगह हो सकते हैं कि लेकिन यह सच्चाई है कि गांव में अब भी सबसे बड़ा कॅरियर या तो इंजीनियर बनना है या फिर डाॅक्टरी की पढ़ाई करना है। जब तक उन्हें नए जमाने की पढ़ाई के बारे में पता चलता है तब तक ‘नया जमाना’ और आगे जा चुका होता है। यही आज के गांव का सच है और उस गांव में आप चारों तरफ एक परेशान पीढ़ी को पाएंगे, यह पीढ़ी खेतों में खट रही है। उन खेतों में खट रही है जहां पूरे परिवार को साल भर की सतत मेहनत के बावजूद न्यूनतम मजदूरी जितनी आय भी नहीं होती। ये सब कुछ जानते हुए भी कोई व्यक्ति गांव के साथ अपने रिश्ते को किस प्रकार पुनर्निधारित और पुनर्परिभाषित करेगा, यह काफी चुनौतीपूर्ण है। चुनौती इसलिए भी बहुत बड़ी है क्योंकि शहर की जिंदगी का बाहरी पक्ष काफी प्रभावपूर्ण है और यह पक्ष गांव की नई पीढ़ी को आकर्षित करता है।

जब भी गांव में जाता हूं तो नई पीढ़ी वो शाॅर्टकट जानना चाहती है, जिस पर चलकर वह भी शहर की चमकीली दुनिया में खुद के लिए जगह पा सके। काश, ऐसा कोई शाॅर्टकट होता और उस शाॅर्टकट का मुझे भी पता होता! जारी…..

समाज और पर्यावरण के बीच से गुम होते घराट

घराट सिर्फ आटा पीसने या धान कूटने का यन्त्र नहीं है बल्कि अादिवासी/पर्वतीय क्षेत्र की एक संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के बीच सामंजस्य का एक अनूठा नमूना है। हिन्द कुश हिमालय क्षेत्र मे 2 लाख घराटो का इतिहास मिलता है जो धीरे-धीरे समाप्त हो गए हैं।

हिंंदुुकुश-हिमालय क्षेत्र मेंं 2 लाख घराटोंं का इतिहास मिलता है जो धीरे-धीरे समाप्त हो गए हैं। हालांकि इन्‍हें बचाने के लिए कुछ सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर प्रयास भी हुए हैं लेकिन ज्‍यादातर अपनी पीठ थपथपाने तक ही सीमित रहे हैं ..।।

घराट जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) और ग्लोबल वार्मिंग का एक सरल जबाब भी है। आज पूरी दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज के खतरे से सहमी हुई है। कहींं बाढ़ तो कहींं बेमौसम बारिश या ओलावृष्टि मुसीबत बनकर आते हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर विद्वानोंं में दो मत हो सकते हैंं लेकिन यह मानव सभ्यता और पृथ्‍वी पर जनजीवन के लिए एक खतरा है इस पर किसी को भी संदेह नहीं है।

पूरी दुनिया के वैज्ञानिक और राजनैतिक नेतृत्व इस खतरे को कम करने या टालने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैंं। जहां एक तरफ ग्रीन टेक्नोलॉजी (green technology), फ्यूल एफिशिएंसी (fuel efficiency), रिन्यूअल एनर्जी ( renewable energy) और न जाने कितने नए-नए शब्द सुनाई दे रहे हैं। वहींं दूसरी तरफ प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाले किसी भी कार्य को करने में इन्सान जरा भी झिझक नहींं रहा है।

गेहूं पीसकर आटा बनाने या धान से चावल निकालने जैसे बेहद साधारण कामों के लिए भी बिजली/डीजल जैसे ऊर्जा के उच्चतम स्रोतों का प्रयोग कर रहा है, जबकि मानव सभ्यता के प्रथम चरण से ही आटा बनाने या धान कूटने जैसे साधारण कार्योंं के लिए ऊर्जा के न्यूनतम स्रोतों का सफलतापूर्वक प्रयोग मनुष्य करता आ रहा है।

घराट अर्थात पानी से चलने वाली चक्की या पनचक्की मानव निर्मित एक बेहद साधारण और प्राथमिक तकनीक है, जिसमें पानी की धारा को थोड़ा-सा मोड़कर काइनेटिक एनर्जी अर्थात गतिक ऊर्जा को मैकेनिकल एनर्जी अर्थात मशीनी ऊर्जा मेंं परिवर्तित किया जाता है। इस कार्य मेंं न तो पर्यावरण का कोई नुकसान होता है ओर न ही पानी मेंं किसी भी प्रकार का प्रदूषण। इस तरह प्रकृति को बिना नुकसान पहुंचाए प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाते हुए कुदरती शक्ति का इस्तेमाल किया जाता है।

पूरे हिंंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में लगभग 2 लाख घराटोंं का इतिहास मिलता है जो धीरे –धीरे सरकारों की उदासीनता, गलत तकनीक के चयन और ऊर्जा के उच्‍चतम स्रोत के अंधाधुंंध इस्तेमाल के परिणामस्वरूप अाज लगभग समाप्त हो रहे हैंं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह किसी समाज और संस्कृति को गुलाम बनाने की मानसिकता का परिणाम है कि समाज से उसका ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति छीन लो और फिर उसे अपने पर पूरी तरह से अाश्रित बना डालो। जिससे कि अाटा पीसने, धान कूटने और तिलहन से तेल निकालने जैसे साधारण कार्यों के लिए भी वो दूसरों पर अाश्रित रहे ताकि विकास के नाम पर उनके साथ मनमानी की जा सके।

तकनीकी इतिहास के जानकार मानते है कि तकनीक का उदय अचानक से नहीं होता है बल्कि तकनीक एक स्टेज (स्तर) से दूसरे स्टेज की तरफ जाती है, अर्थात तकनीक का विकास एक सतत प्रकिया है, बशर्ते उस पर ध्यान दिया जाए। लेकिन अफसोस ज्यादातर घराट अाज भी पुरानी तकनीक से ही चल रहे हैं और इसी कारण समय के साथ कदम ताल नही कर पा रहे हैं। लेकिन मामला सिर्फ गति का नहीं है, गति तो बढ़ाई भी जा सकती है।

घराटों को व्यापारिक तौर पर लाभप्रद भी बनाया जा सकता है, इसके लिए थोड़ा नीति में और थोड़ा तकनीकीी में बदलाव करना होगा। पहाडी क्षेत्रों में जो राशन जाता है उसमें आटे की जगह गेंहूं जाए। सरकारे घराट के आटे को प्रथमिकता देंं। इससे न सिर्फ स्वास्‍थवर्धक आटा मिलेगा बल्कि पर्यावरण की रक्षा भी होगी और पहाड़ोंं से पलायन रोकने में भी मदद मिलेगी।

हालांकि कुछ स्थानोंं पर घराट मेंं तकनीकी सुधार के लिए कुछ प्रयास भी किए गए हैं, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। यह तभी संभव है जब मुख्य धारा की राजनीति और तथाकथित मुख्य धारा का समाज अपनी साम्राज्यवादी सोच को बदलेंगे और उन तकनीक, विचारों ओर संस्कृतियों को आगे बढ़ने का मौका देंगे जो अाज किसी वजह से पीछे छूट गए हैं। घराटों का पुनर्जीवन इन समाजों को तकनीकी और अर्थिक तौर पर न सिर्फ सामर्थ्यवान बनाएगा, बल्कि आत्मनिर्भर भी बनाएगा। यही ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज जैसे सवालों का भी जबाब है।

 

 

मप्र: कर्ज तले दबे किसान ने एसिड पीकर दी जान

देश में कर्ज के बोझ तले किसानों की खुदकुशी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। अब मध्‍य के इंदौर जिले में कथित तौर पर कर्ज के बोझ से परेशान 41 वर्षीय किसान ने एसिड पी लिया।

देश में कर्ज के बोझ तले किसानों की खुदकुशी का सिलसिला थमने का नाम  नहीं ले रहा है। अब मध्‍य के इंदौर जिले में कथित तौर पर कर्ज के बोझ से परेशान 41 वर्षीय किसान ने एसिड पी लिया। अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गयी।

बड़गोंदा क्षेत्र के कैलोद गांव में रहने वाले , 41 की इलाज के दौरान कल रात मौत हो गयी। सुनील के बडे़ भाई माखनलाल ने कहा कि उनके अनुज ने पंजाब नेशनल बैंक से ढाई लाख रपये का कर्ज ले रखा था। इसके अलावा, उसने एक साहूकार से भी कुछ रकम उधार ले रखी थी। उन्होंने कहा, खेती में नुकसान के कारण सुनील कर्ज चुका नहीं पा रहा था। इस पर आये दिन कर्जदाताओं के तगादों के कारण वह मानसिक रूप से बेहद परेशान चल रहा था।

इस बीच, पुलिस ने इस बात को सिरे से खारिज किया कि किसान ने कर्ज न चुका पाने के कारण जान दी। बड़गोंदा थाने के प्रभारी मोहनलाल मीणा ने कहा कि इजारदार ने पुलिस को मृत्यु से पूर्व दिये बयान में खुद पर किसी तरह कर्ज बकाया होने की कोई बात नहीं की है। मीणा ने कहा, इजारदार ने 16 जून को एसिड पी लिया, जब वह घर में अकेला था। वह मानसिक रूप से परेशान था।

उन्होंने बताया कि इजारदार ने खाद भरने की प्लास्टिक की थैलियां बनाने का छोटी..सी इकाई भी शुरू की थी। लेकिन इस काम में उसे नुकसान हो गया था। इसके बाद उसने रेडीमेड कपड़ों की दुकान खोली। लेकिन यह दुकान भी नहीं चल सकी थी।

महाराष्ट्र: किसानों के खिलाफ दर्ज पुलिस केस होंगे वापस

मुंबई। महाराष्ट्र में सूखे की मार झेल रहे किसानों के आक्रोश को कम करने के लिए राज्‍य सरकार ने एक अहम फैसला लिया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है कि राज्य में अनेक आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों में शामिल किसानों के खिलाफ दर्ज पुलिस मामले वापस लिए जाएंगे।

फडणवीस ने विधानसभा में कहा, किसान पहले ही सूखे से परेशान हैं। उनके खिलाफ मामलों को वापस लिया जाएगा ताकि उन्हें थाने के चक्कर नहीं लगाने पड़ें। गौरतलब है कि इस साल महाराष्‍ट्र के विदर्भ के अलावा मराठवाडा क्षेत्र भी सूखे की मार झेल रहा है। किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा भी इस साल तेजी से बढ़ा है किसानों के मुद्दे पर राज्‍य की भाजपा सरकार बुरी तरह घिरी हुई है। ऐसे में किसानों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने का फडणवीस का कदम अपनी सरकार को किसान हितैषी साबित करने की कोशिश माना जा रहा है।