किसानों को सस्ती बिजली, महिलाओं को मंडियों में जगह लेकिन गौमाता की उपेक्षा

शुक्रवार को हरियाणा के मुख्यमंत्री  मनोहर लाल खट्टर ने अपने दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश करते हुए खेती-किसानी से जुड़ी कई घोषणाएं की। खट्टर राज्य के वित्त मंत्री भी हैं। इस हैसियत से वित्त वर्ष 2020-21 का बजट पेश करते हुए उन्होंने किसानों को कृषि से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के लिए 4.75 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली देने का ऐलान किया है। अभी 7.50 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिजली बिल देना पड़ता है। इस तरह अब हरियाणा के किसानों को कृषि आधारित गतिविधियों जैसे फूड प्रोसेसिंग, पैकिंग, ग्रेडिंग, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन और एफपीओ द्वारा स्थापित कोल्ड स्टोरेज आदि के लिए प्रति यूनिट 2.75 रुपये सस्ती बिजली मिलेगी।

गत विधानसभा चुनाव में दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के उभार और भाजपा की सीटों में आई कमी को किसानों की नाराजगी से जोडकर देखा गया था। इसलिए उम्मीद की जा रही थी कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए बजट में बड़े ऐलान करेंगे। किसानों को सस्ती बिजली देकर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने किसानों को साधाने का प्रयास जरूर किया है, लेकिन कृषि संकट दूर करने और खेती को फायदा का सौदा बनाने की कारगर तैयारी इस बजट में भी नहीं है।

1 लाख एकड़ में जैविक व प्राकृतिक खेती का लक्ष्य, मगर बजट का आंकड़ा नदारद  

जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए हरियाणा सरकार ने अगले तीन साल में 1 लाख एकड़ क्षेत्र में जैविक व प्राकृतिक खेती के विस्तार का लक्ष्य रखा है। लेकिन इसके लिए राज्य सरकार कितना पैसा खर्च करेगी, मुख्यमंत्री ने यह नहीं बताया। कहीं इस योजना का हश्र भी केंद्र सरकार की जीरो बजट खेती की तरह न हो जाए, जिसका जिक्र तो खूब हुआ लेकिन जमीन पर कुछ खास असर नहीं दिखा।

महिला किसानों को तवज्जो

हरियाणा के बजट में महिला किसानों के लिए दो अहम घोषणाएं की गई हैं। अब राज्य की सभी सब्जी मंडियों में महिला किसानों के लिए अलग से 10 फीसदी जगह आरक्षित होगी। इसके अलावा किसान कल्याण प्राधिकरण में विशेष महिला सेल की स्थापना की जाएगी। गौरतलब है कि यह प्रावधान सिर्फ सब्जी मंडियों में लागू होगा, ना कि प्रदेश की सभी कृषि उपज मंडियों में। 

बढ़ा ब्याज मुक्त कर्ज का दायरा, लेकिन शर्त भी अजीब

मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने ब्याज मुक्त कर्ज की सुविधा को सहकारी संस्थाओं के अलावा उन किसानों को भी देने का ऐलान किया है जो किसी भी राष्ट्रीयकृत बैंक या सहकारी बैंक से प्रति एकड़ 60 हजार रुपये का अधिकतम 3 लाख रुपये का फसली कर्ज लेते हैं। लेकिन यह सुविधा किसान को तभी मिलेगा, जब वह समय पर कर्ज अदा करेगा। इसके अलावा एक अजीब शर्त यह है कि किसान की फसल खरीद की पेमेंट सीधा उस बैंक के खाते में जाएगी जिस बैंक से कर्जा लिया है। यह शर्त पुराने साहूकारी सिस्टम की याद दिलाती है।

बागवानी पर भी जोर, अनुदान बढ़ाया

हरियाणा सरकार ने 2030 तक प्रदेश में बागवानी के क्षेत्र को दोगुना और बागवानी उत्पादन तीन गुना करने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए किन्नू, अमरुद और आम के बागों की स्थापना के लिए मिलने वाले अनुदान को 16 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये प्रति एकड़ कर दिया है।

फूड प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने के लिए टमाटर, प्याज, आलू, किन्नू, अमरूद, मशरूम, स्ट्राबेरी, अदरक, गोभी, मिर्च, बेबीकॉर्न, स्टीवकॉर्न की प्रोसेसिंग के लिए प्रदेश में नई इकाइयां स्थापित की जाएंगी। खाद्य उत्पादों की पैकिंग और ब्रांडिंग के साथ बिक्री के लिए वीटा व हैफेड की तर्ज पर प्रदेश में 2 हजार आधुनिक सेंटर स्थापित किए जाएंगे।

बेसहारा गौवंश के लिए सिर्फ 50 करोड़ रुपये!

गौमाता को लेकर खूब राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी की हरियाणा सरकार ने गौशालाओं में बेसहारा पशुओं के नियंत्रण व आश्रय के लिए सिर्फ 50 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। पिछले साल तो इस मद में सिर्फ 30 करोड़ रुपये रखे गए थे। जबकि आवारा पशुओं की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। लेकिन कृषि और किसान कल्याण के लिए आवंटित 6,481 करोड़ रुपये के बजट में से बेसहारा पशुओं के हिस्से में सिर्फ 50 करोड़ रुपये आए हैं, जो बजट का 1 फीसदी भी नहीं है।

 

बजट घटाकर कैसे दोगुनी होगी किसानों की आय?

एक फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2020-21 का बजट संसद में पेश किया। इस बार भी दोहराया गया कि सरकार 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने के लक्ष्य को लेकर चल रही है। इस दृष्टि से गांव, कृषि और किसानों के लिए वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में 16 सूत्रीय योजनाओं की घोषणा भी की। इन योजनाओं के लिए किये गए धनराशि आवंटन का आंकलन अति आवश्यक है।

वर्ष 2019-20 का देश का कुल बजट लगभग 27.86 लाख करोड़ रुपये था, परन्तु संशोधित अनुमान के अनुसार इसे कम करके 26.98 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। वित्त वर्ष 2020-21 का कुल बजट लगभग 30.42 लाख करोड़ रुपये है जो इससे पिछले वर्ष के मुकाबले लगभग नौ प्रतिशत ज्यादा है। इस बजट में ग्रामीण भारत को क्या मिला और इससे किसानों की आय दोगुनी करने में कितनी मदद मिलेगी इसका विश्लेषण करते हैं।

2019-20 में कृषि मंत्रालय का बजट 138,564 करोड़ रुपये था, परन्तु इसे संशोधित बजट में कम करके 109,750 करोड़ रुपये कर दिया गया। इसका मुख्य कारण यह रहा कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) के तहत 75,000 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 54,370 करोड़ रुपये ही खर्च किये गए। इसका कारण पात्र किसानों का धीमी गति से सत्यापन होना बताया गया है।

अब तक इस योजना में कुल लक्षित लगभग 14.5 करोड़ किसानों में से केवल 9.5 करोड़ किसानों का ही पंजीकरण हुआ है। जिनमें से अभी तक केवल 7.5 करोड़ किसानों का ही सत्यापन हो पाया है। बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने राजनीतिक कारणों से अभी तक अपने एक भी किसान का पंजीकरण इस योजना में नहीं करवाया है, जो वहां के किसानों के साथ एक अन्याय है। परन्तु खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए इस वर्ष के बजट में इस योजना के अंतर्गत दी जाने वाली राशि को 6,000 रुपये से बढ़ाकर कम से कम 24,000 रुपये प्रति किसान प्रति वर्ष किया जाना चाहिए था। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में तुरन्त क्रय-शक्ति बढ़ती, खर्च बढ़ने से मांग बढ़ती और अर्थव्यवस्था की गाड़ी तेजी से आगे बढ़ जाती। परन्तु अफसोस है कि सरकार ने इस महत्वपूर्ण योजना का बजट इस वर्ष की तरह अगले वित्त वर्ष में भी 75,000 करोड़ रुपये ही रखा है।

2020-21 के लिए कृषि मंत्रालय का बजट मामूली सा बढ़ाकर 142,762 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इस वर्ष कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान एव शिक्षा विभाग का बजट 8,362 करोड़ रुपये है। कृषि अनुसंधान और विस्तार पर हम बहुत कम खर्च कर रहे हैं। भविष्य में पर्यावरण बदलाव और बढ़ते तापमान से होने वाले फसलों के नुकसान से बचने, बढ़ती आबादी के लिए भोजन उपलब्ध कराने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि अनुसंधान के बजट में भारी वृद्धि करने की आवश्यकता है। 2020-21 में कृषि ऋण का लक्ष्य 15 लाख करोड़ रुपये रखा गया है जो स्वागत योग्य कदम है।

ग्रामीण विकास मंत्रालय का बजट 122,398 करोड़ रुपये है। इसमें ग्रामीण रोजगार उपलब्ध कराने की मनरेगा योजना के लिए 61,500 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जबकि इस योजना में इस वर्ष 71,000 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इस योजना में होने वाले अपव्यय को रोकने के लिए इसको खेती किसानी से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि किसानों की कृषि-श्रम लागत कम हो और इस योजना में गैर उत्पादक कार्यों में होने वाली धन की बर्बादी को रोका जा सके। इस मंत्रालय के अंतर्गत पीएम ग्राम सड़क योजना का बजट 19,500 करोड़ रुपये, तो प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) का बजट भी 19,500 करोड़ रुपये ही प्रस्तावित है। ग्रामीण भारत के लिए ये दोनों योजनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, अतः इनके बजट को बढ़ाने की आवश्यकता है।

रसायन और उर्वरक मंत्रालय द्वारा कृषि में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक उर्वरकों के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को पिछले वर्ष के 80,035 करोड़ से घटाकर 71,345 करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसके पीछे ज़ीरो बजट खेती, जैविक खेती और परंपरागत कृषि को प्रोत्साहन देने की सोच है। यूरिया खाद पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण इस खाद का ज़रूरत से ज्यादा प्रयोग हो रहा है जिससे ज़मीन और पर्यावरण दोनों का क्षरण हो रहा है। सरकार का मानना है कि आने वाले समय में खाद सब्सिडी को भी सीधे पीएम-किसान योजना की तरह किसानों के खातों में नकद प्रति एकड़ के हिसाब से भेजा जाए तो खाद सब्सिडी में भारी बचत भी होगी और खाद का अत्यधिक मात्रा में दुरुपयोग भी नहीं होगा।

मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का बजट 3,737 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 4,114 करोड़ रुपये कर दिया गया है। पशुपालन और दुग्ध उत्पादन कृषि का अभिन्न अंग है और कृषि जीडीपी में इसकी लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है। मत्स्य उत्पादन और दुग्ध प्रसंस्करण के लिए घोषित महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को देखते हुए यह बहुत कम आवंटन है।

ग्रामीण क्षेत्र में अमूल, इफको जैसी किसानों की अपनी सहकारी संस्थाएं काम कर रही हैं। पिछले साल सरकार ने घरेलू कंपनियों के आयकर की दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया था, परन्तु इन सहकारी संस्थाओं पर आयकर पहले की तरह 30 प्रतिशत की दर से ही लग रहा था। इस विसंगति को इस बजट में दूर कर दिया गया है जो स्वागत योग्य है। परन्तु 2005-06 तक इन सहकारी संस्थाओं पर कंपनियों के मुकाबले पांच प्रतिशत कम दर से आयकर लगता था। आशा है अगले बजट में इसे 2005-06 से पहले वाली व्यवस्था के अनुरूप यानी 17 प्रतिशत कर दिया जायेगा।

किसानों और ग्रामीण भारत से सरोकार रखने वाले कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, रसायन और उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग तथा मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय का 2019-20 वित्त वर्ष का संयुक्त कुल बजट लगभग 342,000 करोड़ रुपये था जो सम्पूर्ण बजट का लगभग 12 प्रतिशत था। इस वर्ष उपरोक्त मंत्रालयों का कुल बजट 340,600 करोड़ रुपये है जो सम्पूर्ण बजट का मात्र 11 प्रतिशत है। 2020-21 के सम्पूर्ण बजट में की गई बढ़ोतरी की तरह ग्रामीण भारत के बजट में भी यदि नौ प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाती तो यह 371,000 करोड़ रुपये होता।

कुल मिलाकर बड़ी-बड़ी घोषणाओं के बावजूद ग्रामीण भारत के बजट में वास्तव में कटौती कर दी गई है। ग्रामीण भारत में बसने वाली 70 प्रतिशत आबादी के लिए केवल 11 प्रतिशत बजट कितना उपयुक्त है, और क्या सरकार इतनी कम धनराशि आवंटन से 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर पाएगी, यह चिंतन का विषय है।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

 

क्यों किसानों पर भारी पड़ेगा खाड़ी देशों का तनाव

अमेरिका द्वारा ईरान के एक सैनिक जनरल को मारे जाने और ईरान की फिलहाल सीमित जवाबी कार्यवाही के बाद खाड़ी क्षेत्र में एक तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। लगातार हो रही छिटपुट घटनाओं के कारण पश्चिम-एशियाई देशों में हालात कभी भी विस्फोटक हो सकते हैं। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए कच्चे पेट्रोलियम तेल की कीमतें जो 70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थी अब नरम होकर फिलहाल वापस लगभग 61 डॉलर पर आ गई हैं। परन्तु यह मान लेना कि खतरा पूरी तरह से टल गया है, समझदारी नहीं है। यदि फिर से तनाव बढ़ा तो इसके व्यापक असर होंगे जिनका आंकलन किया जाना चाहिए। हमारा देश अपनी मांग के लगभग 85 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात करता है।

2018-19 में हमने लगभग 8 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 22.6 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था जिसमें से लगभग 65 प्रतिशत खाड़ी देशों से आया था। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का असर हमारी तेल आपूर्ति पर पड़ सकता है। यदि कलह बढ़ी तो कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ने से हमारा आयात महंगा होगा। इससे देश का चालू खाता घाटा बढ़ेगा और रुपये की कीमत गिरेगी। इस कारण पहले से ही बेकाबू चल रही महंगाई दर और बढ़ेगी। रिज़र्व बैंक भी ब्याज़ दरें घटा नहीं पायेगा जिससे निवेश घटेगा। डीजल, पेट्रोल, गैस आदि की महंगाई का असर किसान की लागत पर सीधा या परोक्ष रूप से पड़ता है क्योंकि ट्रैक्टर, डीजल इंजन और अन्य मशीनों को चलाने की लागत बढ़ेगी। महंगाई दर बढ़ने के कारण अपने इस्तेमाल की अन्य वस्तुएं किसान को और महंगी खरीदनी होंगी।

रुपये की कीमत गिरने से आयातित खाद के दाम भी बढ़ेंगे। कच्चे तेल से प्राप्त कई उत्पादों का प्रयोग रासायनिक उर्वरकों को बनाने में भी होता है। इस कारण खाद और कच्चे तेल के दाम एक दिशा में चलते हैं। अतः कच्चे तेल के महंगा होने से देश में निर्मित और आयातित दोनों तरह के खाद के दाम बढ़ेंगे और खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी का बिल भी बढ़ेगा। तेल के दाम यदि ज्यादा बढ़ गये तो देश का राजकोषीय घाटा भी बढ़ेगा। खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख भारतीय रह रहे हैं जो 4,000 करोड़ डॉलर (लगभग 285,000 करोड़ रुपये) सालाना भारत में भेजते हैं। यदि अशांति फैली तो उनके रोजगार और आमदनी पर भी असर पड़ेगा जिससे देश में आने वाली यह विदेशी मुद्रा भी खतरे में पड़ जाएगी। उनमें से लाखों को अपना रोजगार और घर-बार छोड़कर वापस देश में लौटना पड़ सकता है जिसके अपने अलग आर्थिक व अन्य नकारात्मक प्रभाव होंगे। अतः सरकार के हाथ में संसाधन कम होंगे जिससे कृषि, ग्रामीण योजनाओं के बजट और कृषि निवेश में कटौती हो सकती है।

अगर ऐसा हुआ तो पहले ही मंदी से जूझ रही हमारी अर्थव्यवस्था और कमजोर हो जाएगी जिसका असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। इस अशांत माहौल का प्रभाव इन देशों में हो रहे हमारी कृषि जिंसों के निर्यात पर भी पड़ेगा। यदि अस्थिरता के कारण हम ईरान और अन्य खाड़ी देशों को अपने कृषि उत्पादों का निर्यात नहीं कर पाते हैं तो अच्छे बाज़ार के अभाव में इन कृषि जिंसों के दाम गिरेंगे जिसका नकारात्मक असर हमारे किसानों की आय पर पड़ेगा। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का असर हमारे किसानों की आय पर कैसे पड़ेगा इसे हमारे चावल के निर्यात से समझा जा सकता है। खाद्यान्न के लिहाज से धान देश की सबसे बड़ी फसल है जिसकी खेती पर करोड़ों किसानों की जीविका निर्भर है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। हम 120 से 130 लाख टन चावल का निर्यात प्रति वर्ष करते हैं। 2018-19 में हमने 471 करोड़ डॉलर मूल्य के बासमती चावल और 304 करोड़ डॉलर मूल्य के गैर-बासमती चावल का निर्यात किया था। इस प्रकार कुल मिलाकर 2018-19 में हमने लगभग 55,000 करोड़ रुपये मूल्य के चावल का निर्यात किया था। पिछले साल लगभग 33,000 करोड़ रुपये मूल्य के बासमती चावल के निर्यात में से लगभग 11,000 करोड़ रुपये की यानी एक-तिहाई हिस्सेदारी ईरान की थी। 2018-19 में हमने ईरान से लगभग 2.4 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था। परन्तु ईरान पर अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंधों के कारण मई 2019 से हमें भी ईरान से कच्चे तेल का आयात बन्द करना पड़ा। इस कारण ईरान को होने वाले हमारे निर्यात के भुगतान की समस्या खड़ी हो गई जिससे इस निर्यात पर बहुत ही नकारात्मक असर पड़ा। इसका प्रभाव बासमती चावल की कीमतों पर भी पड़ रहा है। 1121 प्रीमियम किस्म के बासमती चावल का निर्यात भाव छह-सात महीने पहले लगभग 1200 डॉलर प्रति टन था। अब यह गिरकर लगभग 900 डॉलर प्रति टन के आसपास आ गया है जो पिछले पांच साल का सबसे कम दाम है। ईरान से तेल ना खरीदने के कारण पहले ही भारतीय चावल की मांग वहां घट रही थी। अब खाड़ी देशों में अस्थिरता को देखते हुए हमारे बासमती चावल की मांग और कीमतों के और नीचे जाने की आशंका है।

चावल निर्यातकों का मानना है कि यदि हालात और बिगड़े या प्रतिबंधों के कारण हम ईरान की चावल की मांग पूरी नहीं कर पाए तो ईरान के चावल बाजार पर पाकिस्तान जैसे अन्य चावल निर्यातक देश कब्जा जमा सकते हैं। फिलहाल भारतीय चावल निर्यातक संघ ने अस्थिरता को देखते हुए चावल निर्यातकों को ईरान को चावल निर्यात ना करने की सलाह दी है।

2019 में भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में लगभग 213 लाख टन चावल और 352 लाख टन गेहूं था, यानी कुल मिलाकर इन दोनों खाद्यान्नों का स्टॉक 565 लाख टन था। जबकि 1 जनवरी को यह बफर स्टॉक 214 लाख टन होना चाहिए। इसके अलावा 260 लाख टन धान भी गोदामों में पड़ी है। परन्तु अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण निर्यात घटने और खाड़ी देशों में तनाव से चावल की कीमतों पर और दबाव बढ़ेगा।

इस साल पंजाब में किसानों को 1121 किस्म की बासमती धान का भाव 2800 से 3000 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहा है, जो पिछले साल ईरान से अच्छी मांग के चलते 3600-3800 रुपये प्रति क्विंटल था। भारत ने 2013-14 में 4,325 करोड़ डॉलर (आज के मूल्यों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था, जो 2016-17 में गिरकर 3,370 करोड़ डॉलर पर आ गया था। इसके बाद के सालों में इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई और यह 2018-19 में बढ़कर 3,920 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया। परन्तु 2019-20 में अप्रैल से सितंबर की पहली छमाही में यह केवल 1,730 करोड़ डॉलर के स्तर पर है जो 2018-19 में इस अवधि में 1,902 करोड़ डॉलर था। खाड़ी देशों में अशांति और अनिश्चितता के कारण 2019-20 की दूसरी छमाही में इसमें और गिरावट आ सकती है।

कृषि उत्पादों का निर्यात किसानों की आमदनी को बढ़ाने में भी मददगार होता है। लेकिन 2020 की शुरुआत में ही पश्चिम एशिया पर छाए अशांति के बादल हमारे देश के लिए, वहां रह रहे भारतीयों और विशेषकर हमारे किसानों के लिए अच्छी खबर नहीं है।

 (लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)


	

गुजरात-राजस्थान में टिड्डियों का आतंक, कीट नियंत्रण जुगाड़ भरोसे

देश के दो बड़े राज्यों में टिड्डी दलों ने आतंक मचा रखा है। पाकिस्तान से आए टिड्डी दल गुजरात और राजस्थान में किसानों की हजारों करोड़ रुपये की फसल तबाह कर चुकी हैं। दोनों राज्यों में किसान सरकार से कीट नियंत्रण की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कीट नियंत्रण के उपाय जुगाड़ भरोसे हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद गुरुवार को केंद्र सरकार ने टिड्डी नियंत्रण के लिए 11 टीमें गुजरात भेजी हैं। उधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने टिड्डी नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी है।

किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए प्रशासन भी टिड्डयों से बचाव के तरह-तरह के उपाय आजमा रहा है। खबर है कि गुजरात के बनासकांठा जिले में टिड्डियां भगाने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी गई है।

गुजरात और राजस्थान में पिछले कई महीनों से टिड्डी दलों के हमले जारी है, लेकिन कीट नियंत्रण के सारे प्रयास महज कागजी खानापूर्ति तक सीमित हैं। उत्तरी अफ्रीका से निकलकर सऊदी अरब और पाकिस्तान होते हुए गुजरात और राजस्थान में घुसे टिड्डी दल गुजरात के कच्छ, मेहसाणा, पाटण, और बनासकांठा तक पहुंच चुके हैं। टिड्डियों के आक्रमण की वजह से कपास, गेहूं, सरसों, जीरा समेत कई फसलों को नुकसान हुआ है।

हैरानी की बात है कि गुजरात और राजस्थान में हर साल टिड्डयों हमले में बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचता है, इसके बावजूद इससे बचाव का कोई पुख्ता उपाय न तो राज्य सरकारों के पास है और ना ही केंद्र सरकार इसमें कोई खास दिलचस्पी ले रही है। मजबूरी में किसान टिड्डियों को भगाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। थाली, ढोल और डीजे बजाकर टिड्डीयों को भगाने की कोशिश की जा रही है।

गहलोत में मांगी केंद्र से मदद

टिड्डी दलों के बढ़ते हमले के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है। उनका कहना है कि टिड्डी नियंत्रण का विषय मुख्यतः भारत सरकार के अधीन है। ऐसे में केन्द्र सरकार इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्य सरकार को अतिरिक्त संसाधन एवं सहयोग उपलब्ध कराए। राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर, चुरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और जालौर जिलों में  टिड्डी दलों का प्रकोप है।

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के फसल सुरक्षा और टिड्डी चेतावनी से जुड़े कई कार्यालय राजस्थान में होने के बावजूद सब मूकदर्शक बने हुए हैं।

 

कैसे ‘शून्य’ हुए किसानों की खुदकुशी के आंकड़े

किसानों की आमदनी दोगुनी करने का दावा करने वाले केंद्र सरकार ने किसानों की खुदकुशी के आंकड़े छापने बंद कर दिए हैं। जबकि रोजाना किसी ना किसी राज्य से किसान आत्महत्या की खबर आ ही जाती है। हैरानी की बात है कि सरकार के पास 2016 के बाद देश में किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा नहीं है। इस पर लोकसभा में उठे सवाल के जवाब में सरकार ने जो वजह बताई है, वह भी कम आश्चर्यजनक नहीं है।

मंगलवार को लोकसभा में किसानों की खुदकुशी पर राहुल गांधी के सवालों का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि कई राज्यों ने किसानों/खेतीहरों की खुदकुशी के ‘शून्य’ आंकडे सूचित किए हैं। यानी राज्य सरकारों की मानें तो किसानों की खुदकुशी बंद हो गई है।

राहुल गांधी ने सरकार से पिछले चार वर्षों में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े मांगते हुए 2015 एनसीआरबी की आकस्मिक मृत्यु एवं आत्महत्या रिपोर्ट (एडीएसआई) प्रकाशित नहीं किए जाने का कारण पूछा था।

इसके लिखित जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया कि एनसीआरबी ने राज्यों से आंकड़ों की पुष्टि होने के बाद 2016 तक की रिपोर्ट प्रकाशित की है। वर्ष 2015 और 2016 में किसानों की आत्महत्या के जो आंकड़े सरकार ने पेश किए हैं, उनमें 15 राज्यों के आंकड़े जीरो हैं।

हैरानी की बात है कि राज्य सरकारें किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा जीरो बता रही हैं तो केंद्र सरकार ने भी से इन आंकड़ों को जुटाना जरूरी नहीं समझा। देश में कृषि संकट और किसानों की स्थिति के बारे में पुख्ता आंकड़े जुटाए बगैर ही बड़ी-बड़ी योजनाएं चलाई जा रही हैं।

राहुल गांधी ने किसानों की आत्महत्या संबंधी आंकड़ों का प्रकाशन फिर से शुरू करने की मांग करते हुए सरकारी आंकड़ों के बगैर नीति-निर्माण पर भी सवाल उठाया है।

 

क्या ‘धरती मां’ को जहर से बचा पाएगा नया कीटनाशक विधेयक

इस बार 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से धरती मां को रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के जहर से बचाने का आह्वान किया था। फिलहाल देश में कीटनाशकों से जुड़े नियम-कायदे 51 साल पुराने इंसेक्टीसाइड एक्ट, 1968 से तय होते हैं। वह हरित क्रांति का दौर था इसलिए पूरा जोर फसलों को बचाकर उत्पाद बढ़ाने पर रहा। क्योंकि करोड़ों लोगों का पेट भरना था।

अब पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर कीटनाशकों के दुष्परिणाम नजर आने लगे हैं। मगर नया कीटनाशक प्रबंधन विधेयक भी पर्यावरण और किसानों के बजाय बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों के ज्यादा अनुकूल दिख रहा है। इसका पूरा फोकस कीटनाशकों की गुणवत्ता, लाइसेंस, पंजीकरण जैसी प्रक्रियाओं पर है न कि कीटनाशकों के इस्तेमाल को कम करने और भोजन व पर्यावरण को इस जहर से बचाने पर।

11 साल से अटका मुद्दा 

कीटनाशक प्रबंधन विधेयक का मुद्दा संसद में साल 2008 से अटका हुआ है। मोदी सरकार भी 2017 से नया पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल लाने की कोशिश कर रही है। लेकिन प्रावधानों पर सहमति नहीं बन पाई। भारत दुनिया में एग्रो-कैमिकल्स का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक है और देश में कीटनाशकों का बाजार करीब 20 हजार करोड़ रुपये का है। जाहिर है इतने बड़े कारोबार को प्रभावित करने वाला कोई भी कानून तमाम तरह के दबाव से होकर गुजरेगा। यही इसमें देरी की वजह है। अब उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2019 संसद में पेश होगा।

नया मसौदा सार्वजनिक नहीं

कृषि, पर्यावरण, मानव स्वास्थ्य और समूचे पेस्टीसाइड सेक्टर को प्रभावित करने वाले इस विधेयक का नया मसौदा अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। मतलब, जिस कानून से कीटनाशकों से जुड़े नियम-कायदों में पारदर्शिता बढ़ाने की उम्मीद की जा रही है, उसके बनने की प्रक्रिया में ही पारदर्शिता का अभाव है।

करीब दो साल पहले फरवरी, 2018 में कृषि मंत्रालय ने पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2017 का मसौदा जारी करते हुए इस पर सुझाव मांगे थे। विधेयक के उस मसौदे में तमाम खामियां थी, जिन पर बहुत से सवाल उठे थे।

अब कहना मुश्किल है कि लंबे विचार-विमर्श के बाद जो विधेयक संसद में पेश होने जा रहा है, उसमें कितना सुधार हुआ है और कितनी खामियां बाकी हैं। गत 27 नवंबर को कृषि मंत्रालय को लिखे एक पत्र में अलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड हॉलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) ने नए विधेयक को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए 2017 के मसौदे पर फिर से कई सुझाव और आपत्तियां दर्ज कराई हैं। आशा की कविता कुरुघंटी ने असलीभारत.कॉम को बताया किया कि इस सत्र में पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2019 के पेश होने की खबरें आ रही हैं लेकिन मंत्रालय की वेबसाइट पर अभी तक 2017 का मसौदा उपलब्ध है, जिसमें भयंकर कमियां हैं।

विधेयक के मकसद पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि कीटनाशक प्रबंधन विधेयक पर्यावरण और किसानों की रक्षा के लिए है या बड़ी कंपनियों का हित साधने के लिए। आशा से जुड़े संगठनों की मांग है कि विधेयक का फोकस सिंथेटिक पेस्टीसाइड के दुष्प्रभावों से मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को बचाने यानी बायो-सेफ्टी और कीटनाशकों का इस्तेमाल कम करने पर होना चाहिए। 2017 के विधेयक का मसौदा इस कसौटी पर कतई खरा नहीं उतरता है।

नया मसौदा पहले से व्यापक मगर कई खामियां    

कृषि मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पेस्टीसाइड मैनेजमेंट बिल, 2019 का मसौदा तैयार हो चुका है। इस पर अनौपचारिक रूप से सलाह-मशविरा लिया जा रहा है। हालांकि, पुराने मसौदे की कई विसंगतियों नए ड्राफ्ट में भी मौजूद हैं।

कानून का दायर और परिभाषा

नए विधेयक की प्रस्तावना का विस्तार करते हुए इसमें कीटनाशकों के उत्पादन, आयात, निर्यात, पैकेजिंग, लेबलिंग, दाम, भंडारण, विज्ञापन, बिक्री, परिवहन, वितरण, प्रयोग और निपटान के नियमों के साथ-साथ मनुष्य और जीव-जंतुओं के प्रति जोखिम को कम करने और पारंपरिक ज्ञान पर आधारित जैविक कीटनाशकों को बढ़ावा देने के प्रयासों को शामिल किया गया है। यह परिभाषा पहले से ज्यादा व्यापक है। लेकिन इसमें पर्यावरण का जिक्र नहीं है।

किसान संगठनों ने कीटनाशकों की परिभाषा में फफूंदनाशी, खरपतवारनाशी आदि को शामिल करने की मांग करते हुए घरों और चिकित्सा में कीटनाशकों के इस्तेमाल को भी कानून के दायरे में लाने का सुझाव दिया है। मगर नए मसौदे में कीटनाशक, फफूंदीनाशक और खरपतवारनाशक आदि का भेद खत्म करते हुए सबको पेस्टीसाइड की परिभाषा में समेट लिया है।

भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही का कहना है कि कीटनाशक विधेयक से जुड़े उनके अधिकांश सुझावों को सरकार ने मान लिया है और अब पेश होने जा रहा विधेयक काफी व्यापक और बेहतर है।

कीटनाशक निरीक्षण

मौजूदा कीटनाशक अधिनियम की तरह नए कानून को लागू कराने का बड़ा दारोमदार पेस्टीसाइड इंस्पेक्टरों पर रहेगा। 2017 के विधेयक के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना कीटनाशक इंस्पेक्टर कीटनाशक की बिक्री या वितरण पर रोक नहीं लगा सकता था। इसका काफी विरोध हुआ, जिसे देखते हुए नए मसौदे में कीटनाशक निरीक्षकों को बिक्री या वितरण पर 60 दिन से अधिक समय तक रोक लगाने का अधिकार दिया गया है। लेकिन उसे 48 घंटे के अंदर कार्यकारी मजिस्ट्रेट की अनुमति लेनी होगी। कीटनाशक को जब्त करने पर भी निरीक्षकों को 14 दिन के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट को सूचित करना होगा।

कीटनाशक निरीक्षकों की शक्तियां में कुछ संशोधनों के बावजूद नया विधेयक कीटनाशकों के सुरक्षित इस्तेमाल के लिए जागरुकता बढ़ाने, कीटनाशकों के प्रयोग में कमी और पर्यावरण पर दुष्प्रभाव की निगरानी से बच रहा है। जबकि पेस्टीसाइड कंपनियां और डीलर किसान की मजबूरी का फायदा उठाकर कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग को बढ़ावा देते हैं। इसके लिए प्रचार और मार्केटिंग के हथकंडे अपनाते हैं। खेती की लागत और किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ाने में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग का बड़ा हाथ है।

नया कीटनाशक विधेयक इस तरह के हथकंडों पर अंकुश लगाने के बजाय कीटनाशकों की गुणवत्ता, प्रभाव, पंजीकरण और लाइसेंस आदि की प्रक्रियाओं पर ज्यादा केंद्रित है। हालांकि, उचित दाम पर कीटनाशकों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए केंद्र सरकार एक प्राधिकरण का गठन कर सकती है। मगर फिर भी डीलर या डिस्ट्रीब्यूटर के स्तर पर होने वाली गड़बड़ियों को रोकने में नया कानून कमजोर नजर आता है।

केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड

देश में कीटनाशकों की गुणवत्ता, उत्पादन की पद्धति और निपटान के तरीकों के बारे में केंद्र व राज्य सरकारों को परामर्श देने के लिए नए विधेयक में केंद्रीय कीटनाशी बोर्ड की स्थापना का प्रावधान है। इसमें 5 राज्यों और 2 किसान प्रतिनिधि शामिल होंगे। किसान प्रतिनिधियों में एक महिला होगी। इतने बड़े और विविधता वाले देश के लिए सिर्फ दो किसान प्रतिनिधि पर्याप्त नहीं हैं। राज्य भी इसमें प्रतिनिधित्व बढ़ाने की मांग कर सकते हैं।

कीटनाशकों का पंजीकरण और निषेध

कीटनाशकों के प्रभाव, आवश्यकता और जोखिम को ध्यान में रखकर उनका पंजीकरण किया जाएगा। इसके लिए एक पंजीकरण समिति का गठन होगा जो राष्ट्रीय कीटनाशक रजिस्टर तैयार करेगी। पंजीकृत कीटनाशकों की समय-समय पर समीक्षा की मांग को नए मझौदे में शामिल किया गया है। लेकिन विदेशों में प्रतिबंधित या अपंजीकृत कीटनाशकों के इस्तेमाल को रोकने का प्रत्यक्ष प्रावधान नए विधेयक में भी नहीं है।

नए विधेयक के अनुसार, केंद्र और राज्य सरकारें किसी कीटनाशक की सुरक्षा या प्रभाव की समीक्षा करवा सकती हैं या फिर उन पर एक साल के लिए रोक लगा सकती हैं। लेकिन कीटनाशकों के नियमन के मामले में यह विधेयक राज्य सरकारों को केंद्र से कमतर अधिकार देता है। जबकि किसी हादसे की स्थिति में पहली जवाबदेही राज्य सरकारों की ही बनती है।

2017 के मसौदे में निजी प्रयोगशालाओं को केंद्रीय कीटनाशी प्रयोगशाला के तौर पर काम करने की छूट देने के प्रावधान का काफी विरोध हुआ था। विधेयक के नए मसौदे में भी निजी प्रयोगशालाओं के लिए रास्ते खोले जा रहे हैं।

कीटनाशकों के दुष्प्रभाव

नए विधेयक के अनुसार, राज्य सरकार विषाक्तता के मामलों पर नजर रखेंंगी और केंद्र सरकार को तिमाही रिपोर्ट भेजेंगी। राज्य सरकारें ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए योजना भी बनाएंगी।

कृषि और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के जानकार श्रीधर राधाकृष्णन का कहना है कि कीटनाशक प्रबंधन विधेयक खुद पीएम मोदी की धरती मां को जहर मुक्त बनाने की मंशा के अनुरुप नहीं है। इसलिए बेहतर होगा कि व्यापक विचार-विमर्श कर नया विधेयक तैयार किया जाए जो मिट्टी, पर्यावरण और भोजन को जहर मुक्त बनाने की दिशा में ज्यादा कारगर हो।

अपराध और दंड

नए विधेयक में नियमों का उल्लंघन करने पर 25 हजार रुपये से 40 लाख रुपये तक जुर्माने या 3 साल तक की जेल या दोनों का प्रावधान है। कीटनाशकों के इस्तेमाल से किसी मृत्यु होने पर 10 लाख रुपये से 50 लाख रुपये तक जुर्माना या 5 साल की जेल अथवा दोनों हो सकते हैं। मौजूदा कानून में सिर्फ 500-75000 रुपये तक जुर्माने और 6 महीने से 2 साल तक जेल या दोनों का प्रावधान है।

हालांकि, किसी व्यक्ति द्वारा खुद के घरेलू इस्तेमाल या बगीचे या खेती में कीटनाशक के प्रयोग के लिए मुकदमा नहीं चलाया जाएगा। ऐसे लोग सजा भी के पात्र नहीं होंगे, जिन्होंने कीटनाशक का आयात या उत्पादन नहीं किया है। बशर्ते, उन्होंने वैध लाइसेंसधारक से कीटनाशक खरीदा हो। कीटनाशक का भंडारण सही तरीके से किया गया हो और उसे कीटनाशक के नकली या अमानक होने की जानकारी न हो।

मुआवजा कंज्यूमर कोर्ट भरोसे

हाल के वर्षों में कीटनाशकों की वजह से सैकड़ों किसानों की मौत के बावजूद नए विधेयक में कीटनाशकों के प्रत्याशित परिणाम न देने या किसी प्रकार की क्षति होने पर प्रभावित किसान या व्यक्ति उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत ही मुआवजे का दावा कर सकेंगे। यह इस कानून की सबसे कमजोर कड़ी है। बस ऐसे मामलों की शिकायत की व्यवस्था की गई है। लेकिन मुआवजा कंज्यूमर कोर्ट से ही मिलेगा। केंद्र सरकार एक निधि की व्यवस्था जरूर करेगी जिसका प्रयोग विषाक्तता की घटनाओं से प्रभावित लोगों को अनुग्रह अनुदान देने के लिए किया जाएगा।

अगर केंद्र सरकार वाकई धरती मां को कीटनाशकों के जहर से बचाना चाहती है तो वास्तव में ऐसे कानून की जरूरत है जो न सिर्फ कीटनाशकों की गुणवत्ता सुनिश्चित करे बल्कि पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर इनके दुष्प्रभावों को कम करने के साथ-साथ किसी प्रकार की क्षति की जवाबदेही भी तय करे। फिलहाल कीटनाशक विधेयक का जो मसौदा सामने है या नए मसौदे की जितनी जानकारी उपलब्ध है, उस हिसाब से नया कानून धरती मां को शायद ही जहरमुक्त बनाने में मददगार साबित हो सके।

 

 

जीडीपी ग्रोथ 6 साल में सबसे कम, एग्रीकल्चर ग्रोथ साल भर में हुई आधी   

अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई-सितंबर तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की ग्रोथ घटकर 4.5 फीसदी रह गई है जो पिछले छह वर्षों में सबसे कम है। पिछले साल इसी अवधि में जीडीपी ग्रोथ 7 फीसदी जबकि इससे पहली तिमाही में यह 5 फीसदी थी। जीडीपी ग्रोथ में गिरावट का सिलसिला पिछली 6 तिमाही से जारी है। डेढ़ साल पहले वित्त वर्ष 2017-18 की आखिरी तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 8.1 फीसदी थी जो अब 4.5 फीसदी रह गई है। इससे पहले इतनी कम जीडीपी ग्रोथ साल 2012-13 की आखिरी तिमाही में 4.3 फीसदी रही थी।

सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर में कमी से अर्थव्यवस्था के अलग-अलग क्षेत्रों और उद्योगों की हालात को समझा जा सकता है। देश की आधी से ज्यादा आबादी की निर्भरता वाले कृषि क्षेत्र की ग्रोथ महज 2.1 फीसदी है जो पिछले साल की समान अवधि में 4.9 फीसदी थी। यानी एक साल में कृषि क्षेत्र की ग्रोथ घटकर आधी से भी कम रह गई है।

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भी कृषि क्षेत्र की ग्रोथ (जीवीए) 2 फीसदी थी। जबकि साल 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए कम से कम 10 फीसदी की ग्रोथ होनी चाहिए। लेकिन कृषि क्षेत्र की ग्रोथ बढ़ने के बजाय लगातार कम होती जा रही है। कुल मिलाकर ये आंकड़े गहराते कृषि संकट को बयान करते हैं।

इस समय सबसे बुरा हाल मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का है। मेक इन इंडिया के तमाम दावों के बावजूद जुलाई-सितंबर के दौरान मैन्युफैक्चरिंग की ग्रोथ -1.0 फीसदी रही जबकि पिछले साल इसी दौरान मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 6.9 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई थी। इसी तरह कंस्ट्रक्शन सेक्टर की ग्रोथ भी 8.5 फीसदी से घटकर 3.3 फीसदी रह गई है।

जीडीपी ग्रोथ में कमी का कारण कृषि, खनन और विनिर्माण जैसे अहम क्षेत्रों का फीका प्रदर्शन है। इस आर्थिक सुस्ती को उपभोक्ता मांग और निजी निवेश में कमी के अलावा वैश्विक सुस्ती से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हाल के महीनों में केंद्र सरकार ने अर्थव्यवस्था को सुस्ती से उबारने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती जैसी कई राहतों और रियायतों को ऐलान किया है जिसका असर दिखना अभी बाकी है। आर्थिक चुनौतियों से उबरने के लिए मोदी सरकार कई सरकारी उपक्रमों का निजीकरण भी करने जा रही है।

देश की अर्थव्यवस्था को दोबारा 8-9 फीसदी की रफ्तार देना मोदी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निगेटिव ग्रोथ उपभोक्ता मांग में कमी की ओर इशारा कर रही है। इसका असर रोजगार के मौकों पर पड़ना तय है। इस आर्थिक चुनौती से उबरने के लिए सरकार को कुछ बड़े कदम उठाने पड़ेंगे, लेकिन सरकार पहले ही वित्तीय घाटे से जूझ रही है। नोटबंदी की मार और जीएसटी के भंवर में फंसी अर्थव्यवस्था कुछ बड़े उपायों का इंतजार कर रही है।

एमपी में यूरिया के लिए मारामारी, थाने से मिल रहे हैं टोकन

मध्य प्रदेश की जिस चंबल नदी के नाम पर देश की प्रमुख फर्टीलाइजर कंपनी का नाम पड़ा, उसी राज्य में यूरिया के लिए ऐसी मारामारी मची है कि किसानों को पुलिस थाने से टोकन बांटे जा रहे हैं। यूरिया के लिए पुलिस के डंडे खाते किसानों का एक वीडियो भी सामने आया है।

रबी की बुवाई के दौरान यूरिया की किल्लत ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक-दो बोरी यूरिया के लिए भी किसानों को सुबह 4-5 बजे से लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है। इसके बावजूद मुश्किल से 2-4 बोरी यूरिया मिल पा रहा है। यह सब उस सरकार कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हो रहा है जो किसानों के मुद्दों पर सत्ता में आई है।

यूरिया की किल्लत के चलते हरदा, होशंगाबाद, रायसेन, विदिशा, गुना, सागर, नीमच समेत कई जिलों से कालाबाजारी की खबरें भी आने लगी हैं। कहीं 267 रुपये में मिलने वाली  यूरिया की बोरी 350-400 रुपये में मिल रही है तो कहीं किसानों को यूरिया के साथ 1,200 रुपये की डीएपी की बोरी लेने को मजबूर किया जा रहा है। राज्य सरकार और कृषि विभाग की ओर से पर्याप्त यूरिया होने के दावे तो जरूर किए जा रहे हैं मगर जमीन हालात अलग हैं।

इस यूरिया संकट के लिए मांग के अनुरुप आपूर्ति न होने को वजह माना जा रहा है। कई जिलों में अभी तक जरूरत के मुकाबले 50-60 फीसदी यूरिया ही पहुंचा है। जिसके चलते रबी की बुवाई में देरी हो रही है और बुवाई कर चुके किसानों को दुकानदारों से महंगा यूरिया खरीदना पड़ रहा है। इस साल अच्छी बारिश और गेहूं का रकबा बढ़ने की वजह से यूरिया की मांग बढ़ी है। इससे भी यूरिया की किल्लत बढ़ी है।

पिछले साल भी मध्य प्रदेश और राजस्थान में यूरिया को लेकर इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा था। तब विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकारों को इस मुद्दे पर खूब घेरा था। अब सरकारें बदल चुकी हैं लेकिन हालत नहीं बदले।

रबी बुवाई के दौरान यूरिया संकट को लेकर किसान संगठनों ने कमलनाथ सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। आम किसान यूनियन के समस्या का समाधान नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है।

भाजपा का किसान मोर्चा राज्य सरकार को इस मुद्दे पर घेरने में जुटा है तो मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष केदार सिरोही ने भी कृषि विभाग पर सवाल खड़े किए हैं। सिरोही का कहना है कि एमपी में यूरिया की किल्लत होती तो 400 रुपये में यूरिया कैसे मिल पा रहा है। यानी कृषि विभाग की नीयत और मैनेजमेंट ठीक नहीं है। विभाग को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। यूरिया की लाइनें खत्म होनी चाहिए।

इस यूरिया संकट के पीछे सरकार की बदइंतजामी के अलावा यूरिया की किल्लत के बहाने डीएपी बेचने की फर्टिलाइजर कंपनियों और डीलरों की कारगुजारी का भी बड़ा हाथ माना जा रहा है। पिछले एक सप्ताह में कालाबाजारी करने वाले कई खाद विक्रेताओं पर छापेमारी हुई है।

हाउडी हंगर? भुखमरी में पाकिस्तान, बांग्लादेश से कैसे पिछड़ा भारत?

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद दुनिया में भारत का डंका बज रहा है। यह दावा अक्सर राजनीति चर्चाओं में उछलता है। इसके पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्क हैं, जिनमें हंगर इंडेक्स का जिक्र बार-बार आता है। इस साल ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत 117 देशों के बीच 102वें स्थान पर है और इसे ‘गंभीर स्थिति’ वाले देशों की श्रेणी में रखा गया है। जबकि पाकिस्तान 94वें, बांग्लादेश 88वें, नेपाल 73वें और श्रीलंका 66वें स्थान पर है।

हंगर इंडेक्स में जिन 17 देशों को सामूहिक रूप से पहले पायदान पर रखा गया है उनमें क्यूबा, तुर्की, यूक्रेन, कुवैत, रोमानिया, चिली और बेलारूस शामिल हैं। इस फेहरिस्त में नाइजर, रवांडा, इथोपिया, मोजांबिक, तंजानिया और नाइजीरिया जैसे अफ्रीकी देशों की स्थिति भी भारत से बेहतर है।

5 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहे देश के लिए यह असहज करने वाला आंकड़ा है, जिसे आयरलैंड और जर्मनी की दो संस्थाएं प्रकाशित करती हैं। दोनों विदेशी संस्थाएं हैं। इनकी भी अपनी राजनीति और भुखमरी के अपने पैमाने हैं। इन सब पर बहस की पूरी गुंजाइश है। फिर भी दुनिया की एक जानी-मानी रिपोर्ट में भारत का सबसे ज्यादा भुखमरी वाले देशों में शुमार होना चिंताजनक है।

क्या है भुखमरी का पैमाना

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में सबसे कम भुखमरी वाले देश को शून्य और सबसे ज्यादा भुखमरी वाले देश को 100 अंक दिए जाते हैं। इस प्रकार कम स्कोर वाले देश इंडेक्स में ऊंचा स्थान पाते हैं। इस इंडेक्स को अल्पपोषण, चाइल्ड वेस्टिंग (उम्र के हिसाब से कम वजन वाले 5 साल से कम उम्र के बच्चों का अनुपात), चाइल्ड स्टंटिंग (उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले 5 साल से कम उम्र के बच्चों का अनुपात) और बाल मृत्यु दर के आधार पर तैयार किया जाता है।

5 साल में कहां पहुंचा भारत?

हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट आते ही मोदी विरोधियों ने केंद्र सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया। केरल के वित्तमंत्री थॉमस आइसैक ने ट्वीट किया, “2019 का ग्लोबल हंगर इंडेक्स आ चुका है। भारत 102वें स्थान पर आ गया है। यह गिरावट प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता में आने के साथ शुरू हुई थी। वर्ष 2014 में भारत 55वें स्थान पर था। 2017 में 100वें स्थान पर आया, और अब नाइजर व सिएरा लियोन के स्तर पर पहुंच गया है। विश्व के भूखों का बड़ा हिस्सा अब भारत में है।”

हालांकि, यह पूरा सत्य नहीं है। हाल के वर्षों में ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति कुछ इस प्रकार रही है

साल   भारत का स्थान      कुल देश

2014            55                 76

2016            97                118

2017            100              119

2018            103              119

2019            102              117

जाहिर है कि हंगर इंडेक्स में भारत पिछड़ रहा है। लेकिन हर साल कुल देशों की संख्या अलग-अलग होने की वजह से पिछले वर्षों से आंख मूंदकर तुलना करना उचित नहीं है। ऐसी तुलना करते हुए कुल देशों की संख्या को भी ध्यान में रखना चाहिए।

चाइल्ड वेस्टिंग भारत में सर्वाधिक

हंगर इंडेक्स में भारत न सिर्फ पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से पीछे है बल्कि यहां चाइल्ड वेस्टिंग यानी उम्र के हिसाब से कम वजन वाले बच्चों का अनुपात विश्व में सर्वाधिक 20.1 फीसदी है। भारत में चाइल्ड स्टंटिंग यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई वाले बच्चों का अनुपात 37.9 फीसदी है जो चिंताजनक है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 6-23 महीने के केवल 9.6 फीसदी बच्चों को न्यूनतम आहार मिल पाता है। यानी 90 फीसदी से ज्यादा बच्चे न्यूनतम आहार से भी वंचित हैं।

ये तथ्य देश में कुपोषण की भयावह तस्वीर उजागर करते हैं। हमारे बच्चे कुपोषित हैं।

नेपाल, बांग्लदेश से सबक लेने की जरूरत 

पिछले साल तक पाकिस्तान हंगर इंडेक्स में भारत से नीचे 106वें स्थान पर था, लेकिन इस साल भारत को पीछे छोड़ चुका है। नेपाल और बांग्लादेश की स्थिति लगातार भारत से बेहतर बनी हुई है। साल 2000 में नेपाल का स्कोर 36.6 था जो इस साल 20.8 है। इसी तरह बांग्लादेश का स्कोर 36.1 था जो अब 25.2 है। जबकि इस दौरान भारत 38.8 से 30.3 तक ही पहुंचा। यह स्कोर जितना कम होता है, भुखमरी के पैमाने पर किसी देश की स्थिति उतनी ही बेहतर मानी जाती है।

रिपोर्ट में भुखमरी दूर करने के बांग्लादेश के प्रयासों की तारीफ करते हुए इसका श्रेय वहां की आर्थिक प्रगति के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और साफ-सफाई पर ध्यान दिए जाने को दिया गया है। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश में चाइल्ड स्टंटिंग दर 1997 में 58.5 फीसदी थी जो 2011 में घटकर 40.2 रह गई। इसी तरह नेपाल में चाइल्ड स्टंटिंग दर 2001 में 56.6 फीसदी से घटकर 2011 में 40 फीसदी के आसपास रह गई।

भारत में सुधार की रफ्तार धीमी  

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान भले ही नीचे गिरा है लेकिन भुखमरी के स्तर में सुधार यहां भी हुआ है। साल 2000 के हंगर इंडेक्स में भारत का स्कोर 38.8 था जो 2019 में 30.3 है। लेकिन सुधार की रफ्तार धीमी होने की वजह से भारत का स्थान पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश से नीचे हैं। हालांकि, भारत के साथ इन देशों की तुलना करते हुए आकार, आबादी और भौगोलिक अंतर को ध्यान में रखना चाहिए।

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2000 के बाद वैश्विक स्तर पर भुखमरी और कुपोषण के स्तर में गिरावट आई है। इसका सीधा संबंध दुनिया में कम हुए गरीबी के स्तर से है। फिर भी जीरो हंगर का लक्ष्य अभी बहुत दूर है। इस साल की रिपोर्ट में भुखमरी मिटाने के प्रयासों में जलवायु परिवर्तन को खास चुनौती के तौर पर पेश किया गया है।

 

नोबेल विजेता बैनर्जी कैसे मिटाते हैं गरीबी? क्या हैं उनके प्रयोग?

पुरस्कारों से गरीबी मिटती तो कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलते ही बाल श्रम मिट जाता। जाहिर है पुरस्कारों की अपनी राजनीति है। अपनी सीमाएं हैं। फिर भी किसी व्यक्ति को नोबेल जैसा पुरस्कार मिलना बड़ी बात है। खासतौर पर अगर वह व्यक्ति भारत जैसे देश से हो। गरीबी पर रिसर्च करता हो। एंटी-नेशनल कहे गए जेएनयू से पढ़ा हो। मोदी सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता हो। कांग्रेस को न्याय योजना बनाने और अरविंद केजरीवाल को स्कूलों की दशा सुधारने में मदद करता हो। तो मानकर चलिए कि उसके काम के अलावा हर बात की चर्चा होगी।

इस साल का सेवरिग्स रिक्सबैंक पुरस्कार यानी अर्थशास्त्र का नोबेल भारतीय मूल के अमेरिकी अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी के साथ-साथ फ्रांसिसी मूल की उनकी संगिनी एस्थर डुफ्लो और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से दिया गया है। बैनर्जी और डुफ्लो अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एमआईटी में प्रोफेसर हैं। इन तीनों को यह पुरस्कार दुनिया भर में गरीबी मिटाने के लिए उनके प्रयोगात्मक दृष्टिकोण के लिए दिया गया है, जो गरीबी से निपटने में मददगार है। इस दृष्टिकोण की पहचान है रैंडमाइज्ड कंट्रोल ट्रायल यानी आरटीसी मेडिकल साइंस की तर्ज पर होने वाले इन प्रयोगों को गरीबी दूर करने में कारगर टूल माना जा रहा है। हालांकि, इसके आलोचक भी कम नहीं हैं।

क्या है यह नया दृष्टिकोण?

पुरस्कार की घोषणा करते हुए द रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने कहा है कि पिछले दो दशकों में बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर के प्रयोगात्मक दृष्टिकोण ने विकास अर्थशास्त्र का कायाकल्प कर दिया है। वैश्विक गरीबी से निपटने का वे नया तरीका लाए हैं, जिसके तहत बड़ी समस्या को छोटे-छोटे टुकड़ों या सवालों में तोड़कर देखा जाता है। फिर सोचे-समझे प्रयोगों के जरिए इन सवालों या समस्याओं के समाधान तलाशे जाते हैं। इन तीनों के शोध से वैश्विक गरीबी से निपटने की क्षमता में इजाफा हुआ है।

जिस तरह लैब में चूहों पर दवाओं का ट्रायल होते हैं, वैसे ही बैनर्जी और उनके साथी गरीबों पर प्रयोग करते हैं। ताकि पता लगे कि गरीबी से निपटने का कौन-सा उपाय सबसे कारगर है। ऐसे प्रयोगों में लोगों को अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है। इनमें से कुछ पर उपाय आजमाए जाते हैं, जबकि कुछ लोगों को इससे वंचित रखकर प्रभाव की तुलना की जाती है। भारत गरीबी पर ऐसे प्रयोगों की बड़ी प्रयोगशाला बन चुका है। मतलब, गरीबी नेताओं के भाषण से निकलकर लैब में पहुंच चुकी है। गरीब वहीं का वहीं है!

प्रयोगों और साक्ष्यों पर जोर

बैनर्जी और उनके साथी पिछले 25 वर्षों से गरीबी पर प्रयोग कर रहे हैं और अब यह पद्धति विकास अर्थशास्त्र में धूम मचा रही है। इससे लोगों की आदतों और व्यवहार के अध्ययन के जरिए गरीबी दूर करने का एक नया औजार मिला है। इन प्रयोगों से प्राप्त साक्ष्य नीतिगत फैसलों को वैज्ञानिक आधार देते हैं। आज दुनिया भर में ऐसे प्रयोगों के जरिए सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों की रूपरेखा तय की जा रही है।

इस पद्धति के तौर-तरीकों से सहमत या असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं कि बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का काम गरीब और जन कल्याण पर केंद्रित है। उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने से विकास अर्थशास्त्र और नए दृष्टिकोण की अहमियत बढ़ेगी।

जिस दौर में दुनिया आर्थिक संकटों से जूझ रही है। नव उदारवादी पूंजीवादी नीतियां और वैश्विकरण के परिणाम सवालों से घिरे हैं। ऐसे में अर्थशास्त्र को भी प्रसांगिक बने रहने के लिए ज्यादा तार्किक, कल्याणकारी और जमीनी वास्तविकता के करीब होने की जरूरत है। बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का काम इन आवश्यकताओं के अनुरूप है।

गरीबी पर अपने प्रयोगों को आगे बढ़ाने के लिए अभिजीत बनर्जी और एस्थर डुफ्लो ने साल 2003 में एक पावट्री एक्शन लैब की स्थापना की। जिसके साथ 2005 में सऊदी शेख अब्दुल लतीफ जमील का नाम और पैसा जुड़ गया। इस सऊदी कनेक्शन पर बहुत से लोग सवाल उठाते हैं। फिर बैनर्जी का नाता दुनिया के सबसे प्रभावशाली थिंक टैंक फोर्ड फाउंडेशन से भी है। बैनर्जी और उनके साथियों के काम को मिली स्वीकृति और सम्मान को इन संबंधों से भी जोड़कर देखा जा सकता है।

किताबें जरूरी या भोजन?

गरीब मुल्कों में शिक्षा का स्तर खराब है। यह बात सभी जानते हैं। इसे सुधारने के लिए ज्यादा किताबें बांटी जाएं या स्कूल में मुफ्त भोजन मुहैया कराया जाए? इस तरह के सवालों का जवाब खोजने के लिए बैनजी, डुफ्लो और क्रेमर लोगों के बीच जाकर प्रयोग करते हैं। कीनिया में हुए ऐसे ही प्रयोग में स्कूलों के एक समूह को ज्यादा किताबें दी गईं, जबकि दूसरे समूह के स्कूलों में मुफ्त भोजन। प्रयोग से पता चला कि ना ही अधिक किताबों से और ना ही मुफ्त भोजन से पढ़ाई के नतीजों में कोई खास सुधार आया है।

आगे चलकर कई प्रयोगों में सामने आया कि गरीब देशों में संसाधनों की कमी उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी छात्रों की जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई न होना।

इसी तरह के प्रयोग शिक्षकों पर भी किए गए। कुछ शिक्षकों को थोड़े समय के लिए प्रदर्शन आधारित अनुबंध पर रखा गया जबकि दूसरी तरफ स्थायी शिक्षकों पर छात्रों को बोझ कम कर दिया गया। अनुबंध पर रखे शिक्षकों ने बेहतर परिणाम दिए जबकि छात्रों की संख्या घटाने पर भी स्थायी शिक्षकों के प्रदर्शन में कोई खास सुधार नहीं आया। इन प्रयोगों के आधार पर कई राज्यों में शिक्षण सुधार कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

मुफ्त दाल से बढ़ा टीकाकरण

बैनर्जी और उनके साथियों ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई दिलचस्प प्रयोग किए हैं। राजस्थान में उदयपुर के जिन गांवों में मोबाइल वैक्सीनेशन वैन पहुंची, वहां टीकाकरण की दर तीन गुना बढ़ गई। टीकाकरण के साथ परिवारों को एक किलो दाल मुफ्त दी गई तो टीकाकरण की दर 18 फीसदी से बढ़कर 39 फीसदी तक पहुंच गई। जबकि दाल बांटने के बाद भी टीकाकरण की लागत आधी रह गई थी।

नकद हस्तांतरण को बढ़ावा

आरसीटी सरीखे प्रयोगों से टाइगेटेड एप्रोच यानी जरूरतमंदों को सीधी मदद के दृष्टिकोण को बढ़ावा मिला है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) की पीएम-किसान और कांग्रेस की न्याय योजना के पीछे यही सोच है।

खास बात यह है कि बैनर्जी, डुफ्लो और क्रेमर का प्रयोगात्मक दृष्टिकोण लोगों के बीच जाकर समस्याओं का हल खोजने, सीमित संसाधनों के मद्देनजर कारगर उपाय तलाशने और सरकारी व्यय के बेहतर इस्तेमाल पर जोर देता है। बड़ी समस्याओं में उलझने के बजाय जो आसानी से किया जा सकता है, पहले उसे करने की सोच को भी इससे बल मिला है। इस तरह के उपाय लोक-लुभावने होते हैं। इसलिए राजनीतिक दलों को भी पसंद आते हैं।

इंसाफों पर चूहों तक तरह शोध कितना जायज?

बड़ी समस्या को हल करने के बजाय छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान खोजने का यह दृष्टिकोण काफी लोकप्रिय हो रहा है। क्योंकि मूल समस्या को हल करने के बजाय चीजों को टुकड़ों में देखना, छोटी-मोटी राहतें या रियायतें देना सरकारों के लिए ज्यादा आसान है। इसलिए नीति-निर्माताओं ने इसे हाथोंहाथ लिया।

लेकिन दिक्कत यह है कि यह दृष्टिकोण गरीबी निवारण के प्रयासों को छोटी-मोटी राहतों तक सीमित रखता है। गरीबी के लिए जिम्मेदार ऐतिहासिक-सामाजिक-राजनीतिक कारणों, शोषणकारी व्यवस्था और पूंजीवाद की नाकामियों को नजरअंदाज किया जाता है। फिर इन प्रयोगों के तौर-तरीकों पर भी कई सवाल हैं।

एक जगह हुए प्रयोगों को दूसरे जगह कैसे लागू किया जा सकता है? क्या इस प्रकार का सामान्यीकरण उचित है? इंसानों पर चूहों की तरह प्रयोग कहां तक जायज है? कुछ लोगों को इलाज या राहतों से वंचित रखना अनैतिक नहीं है? दो लोगों या समूहों को एक समान कैसे माना जा सकता है? प्रयोग के दौरान अन्य कारक भी प्रभावी होते हैं, उन्हें कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? इस तरह के कई सवाल आरसीटी पर उठते रहे हैं।

ये सवाल अपनी जगह हैं लेकिन अभिजीत बैनर्जी, एस्थर डुफ्लो और माइकल क्रेमर को दुनिया का ध्यान गरीबी और विकास अर्थशास्त्र के नए दृष्टिकोण की तरफ खींचने का श्रेय तो मिलना ही चाहिए।

काश! भारत में इस तरह के प्रयोग नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लागू करने से पहले किए गए होते। क्या पता हार्डवर्क के साथ हार्वर्ड का मेल बेहतर परिणाम देता!