तोमर समेत 15 मंत्रियों पर गांव-किसान के कल्याण का जिम्मा

भारी बहुमत से दोबारा सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्रालयों का बंटवारा हो गया है। अमित शाह को गृह मंत्रालय, राजनाथ सिंह को रक्षा, निर्मला सीतारमण को वित्त, नितिन गडकरी को परिवहन, एस. जयशंकर को विदेश और नरेंद्र तोमर को कृषि, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली है।

मोदी मंत्रिमंडल में सदानंद गौड़ा को रसायन एवं उर्वरक, पीयूष गोयल को रेल, धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम व इस्पात, रविशंकर प्रसाद को कानून, संचार व आईटी, स्मृति ईरानी को कपड़ा, महिला एवं बाल विकास, डॉ. हर्षवर्धन को स्वास्थ्य, विज्ञान व तकनीक और रमेश पोखरियाल निशंक को मानव संसाधन विकास मंत्रालय मिला है।

मंत्रियों के बीच कामकाज के विभाजन के साथ-साथ कई मंत्रालयों के स्वरूप में भी फेरबदल किया गया है। गांव-किसान और खेती से जुड़े मंत्रालयों का जिम्मा अब एक-दो नहीं बल्कि कुल 15 मंत्रियों के पास रहेगा। अभी तक कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत आने वाले पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग को अलग मंत्रालय का दर्जा मिल गया है।

कृषि मंत्रालय के साथ-साथ ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय की जिम्मेदारी नरेंद्र सिंह तोमर को दी गई है। इन तीनों मंत्रालय का संबंध गांंव-किसान से है इसलिए तीनों का जिम्मा एक ही कैबिनेट मंत्री के पास होना सही फैसला है। यह तोमर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बढ़ते भरोसे का भी सबूत है। उनके साथ कैलाश चौधरी और पुरुषोत्तम रूपाला को कृषि मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया है जबकि साध्वी निरंजन ज्योति ग्रामीण विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री रहेेंगी।

मध्यप्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर इस बार मुरैना से सांसद हैं। वे पिछली मोदी सरकार में भी ग्रामीण विकास मंत्रालय का कार्यभार संभाल चुके हैं। इस बार राधा मोहन सिंह की जगह उन्हें कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है।

पहली बार बने पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन मंत्रालय में बिहार के अनुभवी सांसद गिरिराज सिंह कैबिनेट मंत्री होंगे। मुजफ्फरनगर से अजित सिंह जैसे दिग्गज को हराकर दूसरी बार संसद पहुंचे डॉ. संजीव कुमार बालियान और उड़ीसा में झोपड़ी वाले सांसद के तौर पर मशहूर प्रताप चंद्र सारंगी पशुपालन मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाए गए हैं। बालियान खुद पशु चिकत्सक हैं और हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके हैं। उन्हें पिछली बार कृषि मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया था लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया था। इस बार पश्चिमी यूपी से पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर डॉ. सत्यपाल सिंह की जगह संजीव बालियान को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिली है।

पिछली बार की तरह इस बार भी खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय का जिम्मा एनडीए की घटक लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के पास रहेगा।  पासवान पिछले 30 साल से ज्यादातर सरकारों में मंत्री रहे हैं। देश में अनाज की सरकारी खरीद, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, महंगाई को काबू में रखने के उपाय और चीनी उद्योग इसी मंत्रालय के तहत आता है। इसलिए किसानों के लिहाज से यह भी कृषि जितना ही महत्वपूर्ण मंत्रालय है। महाराष्ट्र  भाजपा के अध्यक्ष और जालाना से सांसद रावसाहेब दादाराव दानवे को खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी इस बार भी अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल के पास है। असम के युवा सांसद रामेश्वर तेली इस मंत्रालय में राज्यमंत्री हैैं।

इस बार एक बड़ा बदलाव जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में दिख रहा है।  इस मंत्रालय की जगह अब सिर्फ जल शक्ति मंत्रालय रह गया है।

जोधपुर से अशोक गहलोत के बेटे को मात देने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत को जल शक्ति मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री जबकि हरियाणा के रतन लाल कटारिया को राज्यमंत्री बनाया गया है। उमा भारती और नितिन गडकरी को मौका दिए जाने के बावजूद मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में गंगा की सफाई का काम बहुत प्रभावी ढंग से नहीं हो पाया था। शायद मंत्रालय का नाम बदलने के पीछे इस नाकामी से पीछा छुड़ाने की मंशा है।

खेती-किसानी और ग्रामीण विकास से जुड़े काम कई अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों में बंटे होने को लेकर विशेषज्ञ सवाल उठाते रहे हैं। पिछली मोदी सरकार में “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” का नारा खूब गूंजा था। तब मिलते-जुलते कामकाज वाले मंत्रालयों को मिलाने या उनका कलस्टर बनाने  की काफी बातें हुई थीं, लेकिन यह काम आगे नहीं बढ़ा।

कृषि अर्थशास्त्री पीके जोशी ने हाल ही में कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालयों को मिलाने का सुझाव दिया है। इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने ग्रामीण विकास, पंचायती राज के साथ कृषि मंंत्रालय का जिम्मा नरेंद्र सिंह तोमर को देकर इस दिशा में कदम भी बढ़ाया लेकिन कृषि मंत्रालय से पशुपालन को अलग कर दिया। खाद्य और खाद्य प्रसंस्करण पहले ही अलग-अलग हैं। उर्वरक कृषि के बजाय रसायन मंत्रालय के साथ है। इस तरह केंद्र सरकार में खेती-किसानी और गांव से जुड़े पहले से ज्यादा मंत्रालय और मंत्री हो गए हैं। देखना है कि एक दर्जन से ज्यादा मंत्री गांव-किसान का कितना भला कर पाते हैं।

 

कभी कृषि मंत्रालय का हिस्सा रहा उर्वरक अब रसायन मंत्रालय का हिस्सा है, जिसमें सदानंद गौड़ा कैबिनेट मंत्री और मनसुख मंडाविया राज्यमंत्री  हैं।

इससे पहले गुरुवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल के 57 सहयोगियों के साथ पद और गोपनीयता की शपथ ली थी। मोदी सरकार का पूरा मंत्रिमंडल इस प्रकार है:

 1. नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री)

प्रधानमंत्री के पद के साथ कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष मंत्रालय. इसके अलाव वो सभी मंत्रालय जो किसी भी मंत्री को अलॉट न हुए हो

 2. राजनाथ सिंह (कैबिनेट मंत्री)

रक्षा मंत्रालय

 3. अमित शाह (कैबिनेट मंत्री)

गृह मंत्रालय

 4. नितिन गडकरी (कैबिनेट मंत्री)

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय

 5. सदानंद गौड़ा (कैबिनेट मंत्री)

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय

 6. निर्मला सीतारमण (कैबिनेट मंत्री)

वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय

 7. राम विलास पासवान (कैबिनेट मंत्री)

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय

 8. नरेंद्र सिंह तोमर (कैबिनेट मंत्री)

कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय

 9. रविशंकर प्रसाद (कैबिनेट मंत्री)

कानून एवं न्याय, संचार और इलेक्ट्रानिक एवं सूचना मंत्रालय

 10. हरसिमरत कौर बादल (कैबिनेट मंत्री)

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय

 11. एस. जयशंकर (कैबिनेट मंत्री)

विदेश मंत्रालय

 12. रमेश पोखरियाल निशंक (कैबिनेट मंत्री)

मानव संसाधन विकास मंत्रालय

 13. थावर चंद गहलोत (कैबिनेट मंत्री)

सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय

 14. अर्जुन मुंडा (कैबिनेट मंत्री)

आदिवासी मामलों का मंत्रालय

 15. स्मृति ईरानी (कैबिनेट मंत्री)

महिला एवं बाल विकास और कपड़ा मंत्रालय

 16. हर्षवर्धन (कैबिनेट मंत्री)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, विज्ञान और प्रोद्योगिकी, भूविज्ञान मंत्रालय

 17. प्रकाश जावड़ेकर (कैबिनेट मंत्री)

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय

 18. पीयूष गोयल (कैबिनेट मंत्री)

रेलवे और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

 19. धर्मेंद्र प्रधान (कैबिनेट मंत्री)

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्रालय

 20. मुख्तार अब्बास नकवी (कैबिनेट मंत्री)

अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय

 21. प्रह्लाद जोशी (कैबिनेट मंत्री)

संसदीय मामले, कोयला और खान मंत्रालय

 22. महेंद्र नाथ पांडेय (कैबिनेट मंत्री)

कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय

 23. अरविंद सावंत (कैबिनेट मंत्री)

भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्रालय

 24. गिरिराज सिंह (कैबिनेट मंत्री)

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्रालय

 25. गजेंद्र सिंह शेखावत (कैबिनेट मंत्री)

जल शक्ति मंत्रालय

 26. संतोष गंगवार (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय

 27. राव इंद्रजीत सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन और नियोजन मंत्रालय

 28. श्रीपद नाईक (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

आयुष मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार), रक्षा मंत्रालय (राज्य मंत्री)

 29. जितेंद्र सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

पूर्वोत्तर विकास (स्वतंत्र प्रभार), पीएमओ, कार्मिक, जनशिकायत और पेंशन, परमाणु उर्जा, अंतरिक्ष मंत्रालय (राज्य मंत्री)

 30. किरण रिजिजू (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

युवा मामले एवं खेल (स्वतंत्र प्रभार), अल्पसंख्यक मामले (राज्य मंत्री)

 31. प्रह्लाद सिंह पटेल (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

संस्कृति और पर्यटन (स्वतंत्र प्रभार)

 32. आरके सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

बिजली, नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा (स्वतंत्र प्रभार), कौशल विकास एवं उद्यमिता (राज्य मंत्री)

 33. हरदीप सिंह पुरी (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

शहरी विकास और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (राज्य मंत्री)

 34. मनसुख मंडाविया (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

जहाजरानी (स्वतंत्र प्रभार), रसायन एवं उर्वरक (राज्य मंत्री)

 35. फग्गन सिंह कुलस्ते (राज्य मंत्री)

इस्पात राज्य मंत्री

 36. अश्विनी चौबे (राज्य मंत्री)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री

 37. जनरल (रिटायर) वीके सिंह (राज्य मंत्री)

सड़क, परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री

 38. कृष्ण पाल गुज्जर (राज्य मंत्री)

सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री

 39. दानवे रावसाहेब दादाराव (राज्य मंत्री)

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री

 40. जी. किशन रेड्डी (राज्य मंत्री)

गृह राज्य मंत्री

 41. पुरुषोत्तम रुपाला (राज्य मंत्री)

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री

 42. रामदास अठावले (राज्य मंत्री)

सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री

 43. साध्वी निरंजन ज्योति (राज्य मंत्री)

ग्रामीण विकास राज्य मंत्री

 44. बाबुल सुप्रियो (राज्य मंत्री)

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री

 45. संजीव कुमार बलियान (राज्य मंत्री)

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन राज्य मंत्री

 46. धोत्रे संजय शमराव (राज्य मंत्री)

मानव संसाधन विकास, संचार और इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री

 47. अनुराग सिंह ठाकुर (राज्य मंत्री)

वित्त और कॉरपोरेट मामलों के राज्य मंत्री

 48. सुरेश अंगादि (राज्य मंत्री)

रेल राज्य मंत्री

 49. नित्यानंद राय (राज्य मंत्री)

गृह राज्य मंत्री

 50. वी मुरलीधरन (राज्य मंत्री)

विदेश, संसदीय कार्य राज्य मंत्री

 51. रेणुका सिंह (राज्य मंत्री)

आदिवासी मामलों की राज्य मंत्री

 52. सोम प्रकाश (राज्य मंत्री)

वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री

 53. रामेश्वर तेली (राज्य मंत्री)

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री

 54. प्रताप चंद्र सारंगी (राज्य मंत्री)

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन राज्य मंत्री

 55. कैलाश चौधरी (राज्य मंत्री)

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री

 56. देबाश्री चौधरी (राज्य मंत्री)

महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री

57. अर्जुन राम मेघवाल (राज्य मंत्री)

संसदीय कार्य, भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम राज्य मंत्री

58. रतन लाल कटारिया (राज्य मंत्री)

जलशक्ति और सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री

 

मोदी की आंधी में कैसे गुम हुए किसान आंदोलन और उनके नेता

याद कीजिए, 2014 के बाद मोदी सरकार को पहली चुनौती कैसे मिली थी? भारी बहुमत और मजबूत इरादों के बावजूद भूमि अधिग्रहण विधेयक के मुद्दे पर मोदी सरकार को झुकना पड़ा था। क्योंकि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर लामबंद हो गया था। इसके बाद भी हर साल किसानों के आंदोलन, धरने-प्रदर्शन और महापड़ाव सुर्खियों में छाए रहे। यह एकमात्र मोर्चा था जहां मोदी सरकार लगातार घिरती नजर आई। लेकिन 2019 आते-आते यह सब हवा हो गया।

विपक्ष के तमाम समीकरणों, गठबंधनों, दिग्गजों और मंसूबों को धराशायी करने वाली नरेंद्र मोदी और उनके राष्ट्रवाद की आंधी ने किसानों आंदोलनों को भी बेअसर कर दिया। इतना बेअसर कि न तो पूरे चुनाव में किसानों के मुद्दे कहीं सुनाई पड़े और न ही नतीजों पर उनका कोई असर दिखा।

उपज का उचित दाम न मिलने के खिलाफ किसान संगठनों की ‘गांव बंद’ सरीखी मुहिम लोकसभा चुनावी में बेअसर

 

जिन सूबों की राजनीति किसान और खेती के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां भी किसान मुद्दा नहीं बन सका। यह विपक्ष की नाकामी तो है ही, मोदी का भी मैैजिक है। इसके अलावा कुछ असर किसानों के खातों में सीधे पैसे पहुंचाने की पीएम-किसान जैसी योजनाओं का भी जरूर रहा। जबकि विपक्ष और किसानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले नेता यह भरोसा पैदा करने में नाकाम रहे कि वे वाकई किसानों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

मोदी तंत्र बेहद चुस्त और चौकन्ना भी था। चुनाव से ठीक पहले किसानों के खातों में सालाना 6 हजार रुपये पहुंचाने के लिए पीएम-किसान योजना लाई गई। सरकार नेे आनन-फानन मेें सवा दो करोड़ से ज्यादा किसानों के खातों में 2,000 रुपये की पहली किस्त भी पहुंचा दी। इनमें एक करोड़ से ज्यादा किसान उत्तर प्रदेश के थे। महागठबंधन की एक काट यह भी थी, जो किसानों की नाराजगी दूर करने में मददगार साबित हुई।

अभी छह महीने भी नहीं हुए जब किसान कर्जमाफी के वादे ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी कराई थी। लेकिन तीनों राज्यों में  कांग्रेस सरकारें किसानों के मुद्दे पर अब बैकफुट पर आ चुकी हैं। आधी-अधूरी कर्जमाफी को लेकर कांग्रेस इस कदर घिरी कि कर्जमाफी का श्रेय लेना तो दूर किसानों को मुद्दा ही नहीं बना पाई। इसे यूं भी देख सकते हैं कि किसानों के जिस मुद्दे को कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भुना लिया था, उसे कुछ महीनों बाद दोबारा भुनाना मुश्किल हो गया, क्योंकि अब सवाल उसकी राज्य सरकारों पर भी उठने लगे थे।

मध्य प्रदेश जहां मंदसौर से भड़का आंदोलन किसानों के गुस्से का प्रतीक बन गया था, वहां भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। मंदसौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन भाजपा प्रत्याशी से करीब पौने चार लाख वोटों से हारी। इसी तरह खंडवा में कमलनाथ सरकार के कृषि मंत्री सचिन यादव के भाई अरुण यादव मैदान में थे, उन्हें भाजपा के नंद कुमार सिंह ने पौने तीन लाख वोटों से हराया। शहरों की बात तो छोड़ ही दीजिए, यह मध्य प्रदेश के किसान बहुल इलाकों का हाल है। विधानसभा चुनाव में 41 फीसदी वोट हासिल करने वाली कांग्रेस लोकसभा की एकमात्र छिंदवाड़ा सीट बचा सकी। जबकि वोट शेयर घटकर 34.5 फीसदी रह गया। इससे ज्यादा वोट तो कांग्रेस को 2014 में मिले थे। तब 2 सीटों पर जीती थी।

इन नतीजों के बारे में मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष केदार सिरोही का कहना है कि यह मुद्दों का चुनाव था ही नहीं। भावनाओं का चुनाव था। किसानों का गुस्सा विधानसभा चुनाव में भाजपा पर निकल चुका था। इस बीच पुलवामा हो गया। और माहौल बदल गया। सिरोही मानते हैं कि ना तो कांग्रेस ने इस चुनाव में किसानों के मुद्दों को बहुत गंभीरता से उठाया और ना ही खुद किसानों ने इन मुद्दों को खास तवज्जो दी। कांग्रेस भी भावनात्मक मुद्दों और भाजपा के एजेंडे में उलझ गई। इसलिए मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों, फसल के दाम और किसानों के मुद्दों पर बात नहीं हुई।

कमोबेश यही स्थिति छत्तीसगढ़ में रही जहां सत्ता में आते ही कांग्रेस किसानों के सवालों पर मोदी सरकार को घेरना भूलकर अपने बचाव में जुट गई। विधानसभा चुनाव में 85 में से 68 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप करने वाली कांग्रेस छत्तीसगढ़ की 11 में से केवल 2 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर पाई है।

पिछले पांच वर्षों में महाराष्ट्र केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारों के खिलाफ किसान आंदोलनों का गढ़ बना रहा। लेकिन लोकसभा चुनाव में किसानों के मुद्दों की छाया भी भाजपा और शिवसेना को छू नहीं पाई। वहां कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया और एनसीपी 4 सीटों पर ही सिमटी रही। महाराष्ट्र में किसान आंदोलनों को चेहरा रहे स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के राजू शेट्टी हातकणंगले सीट करीब 96 हजार वोटों से हार गए जबकि उन्हें कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन हासिल था। सांगली में भी कांग्रेस-एनसीपी समर्थित स्वाभिमानी पक्ष के उम्मीदवार को डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र की गन्ना बेल्ट में शरद पवार-राजू शेट्टी का गठबंधन मोदी वेव के सामने बेअसर साबित हुआ। पश्चिमी महाराष्ट्र में एनसीपी और राजू शेट्टी का गढ़ रहे कोल्हापुर, हातकंणगले, सांगली और माढा लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा और शिवसेना का परचम फैल चुका है। किसान और कॉओपरेटिव पॉलिटिक्स के दिग्गज शरद पवार के कुनबे को पहली बार हार का मुंह देखना पड़ा है। मावल लोकसभा सीट पर शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार दो लाख से ज्यादा वोटों से हार गए। कांग्रेस ने महाराष्ट्र की 48 सीटों में से एकमात्र चंद्रपुर सीट जीती है। किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष नाना पटोले को नागपुर में नितिन गडकरी ने करारी शिकस्त दी। कांग्रेस के दो पूर्व सीएम अपनी सीट भी नहीं बचा पाए।

महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और राजू शेट्टी के गठबंधन का खेल बिगाड़ने में प्रकाश अंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के गठजोड़ का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसान राजनीति पर शरद पवार की पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

अक्टूबर 2018 में भाकियू की किसान क्रांति यात्रा

 

महाराष्ट्र की तरह कृषि प्रधान होते हुए भी उत्तर प्रदेश की कहानी अलग है। यहां मुख्य विपक्षी दलों सपा और बसपा ने पांच साल किसानों के मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिल्ली में होने वाले किसानों के धरने-प्रदर्शन को कभी समर्थन नहीं दिया। हालांकि, गठबंधन की तीसरी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल किसान राजनीति करने का दम भरती है। लेकिन उसके धरने-प्रदर्शनों की गूंज पश्चिमी यूपी के 4-5 जिलों से बाहर नहीं निकली। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन बस परंपरागत वोट बैंक और उसके गठजोड़ के भरोसे था, जो गच्चा दे गया।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत संभाल रही भारतीय किसान यूनियन ने पिछले साल किसान क्रांति यात्रा ज़रूर निकाली थी। लेकिन टिकैत बंधु भी मोदी सरकार के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं कर पाए। 2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच हुए संघर्ष से ज्यादा किसान यात्रा की अचानक समाप्ति का ऐलान चर्चाओं में रहा। इस तरह किसानों की खुदकुशी, गहराते कृषि संकट और किसान के बार-बार सड़कों पर उतरने के बावजूद किसान राजनीति नेतृत्व और भरोसे की कमी का शिकार हो गई। कृषक जातियों का बड़ा हिस्सा भी मोदी लहर को प्रचंड बनाने में जुटा रहा।

कैराना और नूरपुर उपचुनाव में “जिन्ना नहीं गन्ना” नारे के साथ गठबंधन की उम्मीदें जगाने वाली रालोद के दोनों बड़े नेता अजित सिंह और जयंत चौधरी सपा-बसपा और कांग्रेस के समर्थन के बावजूद चुनाव हार गए हैं। पांच साल में कोई बड़ा किसान आंदोलन खड़ा न करना और किसानों के मुद्दे पर ढुलमुल रवैया इस गठबंधन की खामियों में गिना जाएगा। तभी तो देश को चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेता देने वाले उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में फिलहाल गहरा सन्नाटा है।

कमोबेश यही स्थिति हरियाणा की है जहां इंडियन नेशनल लोकदल पारिवारिक कलह में बिखर गई तो कांग्रेस किसानों के मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय जातिगत घेराबंद में लगी रही। इस बीच, छोटे-छोटे संगठन अपने स्तर पर किसानों के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन चुनाव में उनका कोई असर नहीं दिखा। जबकि जाट ध्रुवीकरण और मोदी ब्रांड के सहारे भाजपा हरियाणा की सभी 10 सीटें भारी अंतर से जीतने में कामयाब रही। किसान कार्यकर्ता रमनदीप सिंह मान का कहना है कि 2019 की लोकसभा में 38% सांसद खुद को किसान बता रहे हैं, लेकिन किसान के असल मुद्दे अछूते ही रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी किसानों की अनदेखी की है। किसान खुद भी अपनी परेशानियां भूलकर चुनाव के समय जात-धर्म  में बंट जाता है।

मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों के मुद्दे जोर-शोर से उठे थे। उससे पहले शेखावाटी में सीपीएम की ऑल इंडिया किसान सभा ने एक बड़ा आंदोलन किया था। लेकिन यहां भी लोकसभा चुनाव पूरी तरह मोदी और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। सीकर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के किसान नेता अमरा राम महज 31 हजार वोट पा सके। उधर, भाजपा ने राजस्थान में तेजी से उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल को साध लिया। इससे जाटों का साथ तो मिला ही, किसानों के मुद्दों पर मोदी सरकार को भी घिरने से बचा लिया। विधानसभा चुनाव में भी बेनीवाल ने कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।

लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए का दामन थामने वाले राजस्थान के उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल

 

पंजाब में सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी अकाली दल एक-दूसरे पर कृषि संकट का ठीकरा तो फोड़ते रहे लेकिन चुनाव में इन मुद्दों का खास असर वहां भी नहीं दिखा। भाजपा सिर्फ एक सीट पर मुकाबले में थी, जहां सनी देओल के हैंडपंप और मोदी ब्रांड के अलावा किसी मुद्दे की जरूरत नहीं पड़ी।

पिछले बार पंजाब में 30 फीसदी वोट 4 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी की तरफ से सिर्फ भगवंत मान लोकसभा में पहुंचे हैं। आप का वोट बैंक घटकर 7.4 फीसदी रह गया, बाकी कांग्रेस, अकाली और भाजपा में बंट गया। हालांकि, भगवंत मान किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे है, लेकिन आप भी किसानों के लिए संघर्ष करने के बजाय अपने ही झगड़ों में उलझी रही। जबकि खुद को गैर-राजनीतिक कहने वाली पंजाब की कई किसान यूनियनें नोटा के फेर में पड़ गईं। पंजाब में डेढ़ लाख से ज्यादा करीब 1.12 फीसदी वोट नोटा को गया। यानी विकल्प की कमी साफ नजर आई।

मोदी की आंधी में देवगौड़ा जैसे दिग्गज भी धराशायी

 

उत्तर भारत ही नहीं दक्षिण भारत में भी मोदी वेव के सामने किसान राजनीति कहीं टिक नहीं पाई। कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा को तुमकुर सीट पर और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के पुत्र निखिल को मांड्या सीट पर करारी शिकस्त मिली है। देवगौड़ा की छवि जमीन से जुड़े किसान नेता की रही है। लेकिन इस बार उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट पर जीती। कर्नाटक में कांग्रेेेस भी 9 सेे घटकर 1 सीट पर आ गई है।

लोकसभा चुनावों में बेअसर किसान आंदोलनों और जमीनी मुद्दों के सन्नाटे पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि मतदाताओं पर हिंदुत्ववादी भावनाएं हावी रही। किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले पार्टियां भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही। हालांकि, इस बीच किसानों की समस्याओं को लेकर जागरुकता बढ़ी है और डायरेक्ट इनकम सपोर्ट का मुद्दा सरकारों और राजनीतिक दलों के एजेंडे में आ चुका है। इसे वे अच्छा संकेत मानते हैं।

किसान संगठनों को लामबंद करने के लिए 2017 में निकली किसान मुक्ति यात्रा

 

पिछले दो साल के दौरान स्वराज इंडिया पार्टी के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने किसान संगठनों को लामबंद करने के काफी प्रयास किये। लेकिन ये कोशिशें चुनाव में असर दिखाने लायक ताकत हासिल नहीं कर पाई। चुनाव आते-आते योगेंंद्र यादव और वीएम सिंह नोटा का राग अलापने लगे। इस तरह राष्ट्रीय तो क्या क्षेत्रीय स्तर पर भी किसानों का कोई प्रभावी मोर्चा नहीं बन पाया।

कांग्रेस ने किसानों के लिए अलग बजट जैसे वादे ज़रूर किये, लेकिन पुलवामा के बाद किसानों के मुद्दों से भटक गई। राहुल गांधी किसानों के सवाल उठाते रहे, लेकिन उनकी अपनी कमियां और कमजोरियां हैं। आज की तारीख में कांग्रेस के पास कोई बड़ा किसान नेता नहीं है। ऐसी कोई कोशिश भी नहीं है। इसलिए लेफ्ट और किसान संगठनों के आंदोलनों से मोदी सरकार को मिली चुनौती लोकसभा चुनाव तक बिखर चुकी थी।

वैसे, भाजपा ने यह चुनाव जिस धनबल, सत्ता तंत्र, दुष्प्रचार और मजबूत संगठन के बूते लड़ा है, उसे भी नहीं भूलना चाहिए। विपक्ष की आवाज और असल मुद्दों को ना उठने देने में मीडिया के बड़े हिस्से ने पूरा जोर लगा दिया था। बाकी कसर निष्प्रभावी और बिखरे हुए विपक्ष ने पूरी कर दी।

बहरहाल, जमीनी मुद्दों पर सन्नाटे के बीच इन चुनावों में एक अनूठा उदाहरण भी सामने आया है। तेलंगाना की निजामाबाद सीट से मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी कविता के खिलाफ 179 निर्दलीय उम्मीदवारों ने मोर्चा खोल दिया था, इनमें से ज्यादातर सरकार से नाराज हल्दी उगाने वाले किसान थे। इन निर्दलीय उम्मीदवारों को कुल मिलाकर एक लाख से ज्यादा वोट मिले और कविता 70 हजार वोटों से चुनाव हार गईं। मुद्दों पर चुप्पी के बीच विरोध जताने का एक नायाब तरीका यह भी है।

 

 

किसानों के सामने ऐसी झुकी पेप्सिको, बेदम था कंपनी का दावा    

कानून की आड़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों का कैसे उत्पीड़न कर सकती हैं इसकी झलक पिछले दिनों देखने को मिली। कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के 11 किसानों के खिलाफ कथित गैर-कानूनी तरीके से एक खास किस्म का आलू उगाने और बेचने के खिलाफ केस कर दिया। कंपनी का दावा था कि उसने भारतीय पेेेेटेंट कानून के तहत आलू की एफएल-2027 वैरायटी का रजिस्ट्रेशन कराया हुआ है जिसे वह एफसी-5 ब्रांड से बेचती है। बगैर अनुमति यह आलू उगाने वाले किसानों से पेप्सिको ने 20 लाख रुपये से लेकर 1.05 करोड़ रुपये तक का हर्जाना मांगा। साबरकांठा, बनासकांठा और अरावली जिले के इन किसानों के खिलाफ अलग-अलग अदालतों में तीन केस दर्ज कराए गए।

पेप्सिको का दावा शुरुआत में जितना दमदार समझा जा रहा था, असल में उतना मजबूत था नहीं। किसान संगठनों के दबाव और मामले को लेकर बढ़ी जागरूकता ने पेप्सिका को कदम वापस खींचने पर मजबूर कर दिया। 2 मई को कंपनी ने किसानों के खिलाफ केस वापस लेने का ऐलान किया और 5 मई को दो किसानों फूलचंद कछावा और सुरेशचंद कछावा के खिलाफ गुजरात की डीसा कोर्ट में चल रहा मामला वापस ले लिया। बाकी मुकदमे भी जल्द वापस होने की उम्मीद है।

कम नमी वाला एफसी-5 आलू खासतौर पर पेप्सी के लेज चिप्स के लिए उगाया जाता है। पेप्सिको का दावा था कि बिना अनुमति इस आलू की खेती और बिक्री कर किसानों ने उसके पेटेंट अधिकारों का उल्लंघन किया और कारोबार को नुकसान पहुंचाया। लेकिन ऐसा लगता है कि कंपनी को जल्द ही अपना कानूनी पक्ष कमजोर होने और भारतीय कानून में किसान के अधिकारों का अहसास हो गया। इसलिए केस से पीछे हटना मुनासिब समझा। देश भर के तमाम किसान संगठनों के अलावा भाजपा समर्थक स्वदेशी जागरण मंच ने भी पेप्सिको के रवैये पर कड़ा एतराज जताया था।

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि गुजरात सरकार से पेप्सिको की क्या बात हुई और किसानों से मुकदमे किन शर्तों पर वापस लिए जा रहे हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने बीजों पर किसानों के अधिकार को लेकर नई बहस छेड़ दी है। बीजों पर किसान के हक की आवाजें कई साल से उठ रही हैं, लेकिन इस मामले ने कृषि से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकार कानून के धुंधलेपन और पेचीदगियों को भी उजागर किया है।

फ्लैशबैक

यह मामला पिछले तीन दशक में आर्थिक उदारीकरण की राह पर चलने, भटकने और ठिठकने के भारत के तजुर्बे से जुड़ा है। जिसके सिरे अस्सी के दशक के उस दौर से जुड़ते जब भारतीय सॉफ्ट ड्रिंक्स बाजार पर पारले जैसी  घरेलू कंपनियों का दबदबा था। राजीव गांधी, जो आजकल काफी चर्चाओं में हैं, तब उनके सत्ता संभालने के दिन थे। अर्थव्यवस्था को नेहरू दौर की समाजवादी जकड़न से निजात दिलाने के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोले जाने लगे।

इन्हीं दरवाजों पर 1985 में अमेरिकी सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी पेप्सिको ने दस्तक दी थी। पेप्सिको ने पंजाब में एग्रो रिसर्च सेंटर स्थापित कर फसलों की नई वैरायटी विकसित करने, आलू चिप्स और टमाटर कैचप के लिए फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने और किसानों के कल्याण के सब्जबाग दिखाए। बदले में कंपनी भारत में कोल्ड ड्रिंक बेचने की अनुमति चाहती थी। इन्हीं मंसूबों के साथ 1986 में पेप्सिको ने पंजाब सरकार और टाटा की वोल्टास के साथ एक ज्वाइंट वेंचर  किया।

 

देश में पेप्सिको की एंटी का घरेलू कंपनियों और स्वदेशी के लंबरदारों ने खूब विरोध किया। आखिरकार 1988 में भारत सरकार ने पेप्सिको को पंजाब में बॉटलिंग और फूड प्रोसिसंग प्लांट शुरू करने की इजाजत दे दी और 1990 में स्वदेशी की लहर के बीच पेप्सिको के तीन ब्रांड पेप्सी, 7-अप और मिरिंडा जयपुर से लांच हुए।

इस तरह आलू चिप्स के साथ पेप्सिको का भारत से नाता करीब तीन दशक पुराना है जिसमें पहली बार कंपनी और किसान आमने-सामने आए।  

एफसी-5 आलू की एंट्री

साल 2009 में पेप्सिको आलू की एफसी-5 वैरायटी भारत लेकर आई। ताकी लेज चिप्स को खास स्वाद और पहचान दी जा सके। इसकी शुरुआत भी पंजाब से हुई। अनुबंध के तहत कंपनी ने किसानों को एफसी-5 आलू का बीज दिया और उनसे उपज खरीदने लगी। आगे चलकर यही मॉडल गुजरात में अपनाया गया जहां साबरकांठा जिले के हजारों किसान यह आलू उगाने लगे।

इस बीच, 2016 में पेप्सिको ने भारत के प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटिज एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट, 2001 (पीपीवी एंड एफआरए) के तहत आलू की एफसी-5 वैरायटी को रजिस्टर्ड करा लिया। लेकिन चूंकि बरसों से यह आलू देश में उगाया जा रहा है इसलिए जिन किसानों के साथ कंपनी का अनुबंध नहीं है, उन तक भी यह किस्म पहुंची और वे भी इसकी खेती करने लगे।

क्या ऐसा करना गैर-कानूनी है? नहीं!

जानिए कैसे?

जिस पीपीवी एंड एफआर एक्ट को आधार बनाकर पेप्सिको ने किसानों के खिलाफ केस किया, उसी कानून का सेक्शन 39 किसानों को रजिस्टर्ड वैरायटी की उपज अपने पास बचाकर रखने, इसे दोबारा उगाने और बेचने की छूट देता है। बशर्ते किसान रजिस्टर्ड वैरायटी के ब्रांडेड बीज ना बेचें। मतलब किसान रजिस्टर्ड बीज उगा सकते हैं। आपस में इसका लेन-देन और बिक्री कर सकते हैं लेकिन उसकी खुद ब्रांडिंग कर नहीं बेच सकते।

यह कहना मुश्किल है कि गुजरात के किसानों ने इस प्रावधान का उल्लंघन किया है या नहीं। लेकिन एक बात साफ हे कि पेप्सिको के पास एफसी-5 आलू का ऐसा कोई पेटेंट नहीं है कि उसकी अनुमति के बिना कोई दूसरा इस आलू को उगा ही ना पाए। यह एक गलत धारणा थी जो शुरुआत में मीडिया के जरिए फैलाई गई।  

पीपीवी एंड एफआर एक्ट का सेक्शन 42 कहता है कि अगर किसान को किसी प्रावधान के उल्लंघन के वक्त उसकी जानकारी नहीं है तो उसे उक्त उल्लंघन का दोषी नहीं माना जाना चाहिए। यह बात भी पेप्सिको के रवैये के खिलाफ जाती है क्योंकि सभी रजिस्टर्ड किस्मों की जानकारी किसानों को होना जरूरी नहीं है।

तीसरी बात यह है कि एफसी-5 वैरायटी के आलू की खोज 2016 में नहीं हुई थी। भारत में यह आलू 2009 से उगाया जा रहा है। पेटेंट कानून के तहत इसका रजिस्ट्रेशन भी पहले से प्रचलित किस्म की श्रेणी में ही हुआ है। संभवत: इस पहलू को भी पेप्सिको ने नजरअंदाज किया।

वैसे, सामान्य जानकारी वाली प्रचलित किस्मों के रजिस्ट्रेशन के साथ भी कई दिक्कतें हैं।2001 में जब पीपीवी एंड एफआर एक्ट बना तब भी कई विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि  कंपनियां अपनी पुरानी किस्मों का रजिस्ट्रेशन कराकर किसानों को इनके इस्तेमाल से रोक सकती हैं या उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं। करीब 20 साल बाद यह आशंका सही साबित हुई।

बहरहाल एक बात साफ है जो पेटेंट कानून पेप्सिको जैसी कंपनियों को अपने बीज पंजीकृत कराने की सहूलियत देता है, उसी कानून से किसानों को भी कई अधिकार मिले हुए हैं। इस लिहाज से भारतीय कानून अमेरिका और यूरोपीय देशों के कानूनों से अलग है।

सभी किसान बाजार से बीज नहीं खरीदते। बहुत से किसान पुरानी उपज का एक हिस्सा बीज के लिए बचाकर रख लेते हैं या फिर आपस में बीजों का लेनदेन करते हैं। बीजों के इस्तेमाल की यह आजादी किसानों के साथ-साथ जैव-विविधता और देश की खाद्य संप्रभुता के लिए भी जरूरी है। इसलिए पीपीवी एंड एफआर एक्ट किसानों को रजिस्टर्ड बीज के इस्तेमाल की आजादी और अधिकार भी देता है।

इस विवाद का एक पहलू उस आरोप से भी जुड़ा है जिसके मुताबिक, एफसी-5 आलू उगाने वाले गुजरात के किसान लेज के प्रतिद्वंद्वी ब्रांड को इसकी आपूर्ति करते हैं जो पेप्सिको के हितों के खिलाफ है। ऐसे किसानों पर शिकंजा कसकर कंपनी लोकल कॉपीटिशन को मात देना चाहता है। इस तरह यह एक कॉरपोरेट जंग है जिसमें एक बहुराष्ट्रीय कंपनी और उसको टक्कर देने वाली स्थानीय ब्रांड आमने-सामने हैं और किसान बीच में पिस रहे हैं।

अब आगे

भारत के लिए यह मामला खतरे की घंटी है। देखने वाली बात यह है कि क्या भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के समझौतों के तहत कृषि क्षेत्र में लागू हुए बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनों में किसानों के अधिकार और अपनी खाद्य संप्रभुता को सुरक्षित रख पाता है या नहीं। कृषि से जुड़े पेटेंट कानून के कई प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। जिनका फायदा उठाकर पेप्सिको जैसी दिग्गज कंपनियां किसानों का उत्पीड़न कर सकती हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ प्रो. बिश्वजीत धर का मानना है कि इस मामले ने पीपीवी एंड एफआर एक्ट से जुड़ी कई समस्याओं को उभारा है जो इसके विवादित प्रावधानों और इन्हें लागू करने के तरीकों से जुड़ी हैं। अगर इन मुद्दों को इस कानून की मूल भावना और कृषक समुदाय पर असर को ध्यान में रखते हुए नहीं सुलझाया गया तो भारतीय कृषि क्षेत्र के समक्ष मौजूदा संकट और गंभीर हो जाएगा।

किसान अधिकारों की पैरवी करने वाले संगठन आशा की सह-संयोजक कविता कुरूगंटी ने एक बयान जारी कर किसानों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के पेप्सिको के फैसले को भारतीय किसानों की जीत बताया है। उनका कहना है कि भारतीय कानून से किसानों को मिली बीज स्वतंत्रता बरकरार रहनी चाहिए। किसानों का उत्पीड़न करने वाली पेप्सिको को माफी मांगकर और किसानों को हर्जाना देना चाहिए। भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हो इसके लिए सरकार को भी पुख्ता व्यवस्था बनानी होगी।

पेप्सिको द्वारा किसानों से केस वापस लेना ही काफी नहीं है। जिन दलीलों के साथ कंपनी ने किसानों पर एक-एक करोड़ रुपये के मुकदमे ठोके थेे उनमें कानूनी स्पष्टता आनी जरूरी है। बेहतर होता अगर यह मामला अदालत के निर्णय से सुलझता और भविष्य के लिए नजीर बनता।

 

मौसम की मार से कैसे बचाएंगे सरकार के गोलमोल पूर्वानुमान?

पिछले तीन-चार दिनों के दौरान राजस्‍थान, गुजरात और मध्‍य प्रदेश समेत देश के कई इलाकों में बेमौसम बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि से कम से कम 57 लोगों की जान चली गई। मध्‍य प्रदेश में 22, राजस्‍थान में 25 और गुजरात में 10 लोगों के मारे जाने की खबर है। तैयार फसलों पर मौसम की मार कहर बनकर टूटी है। किसानों की तबाही और मंडियों  में भीगते अनाज की दिल दुखाने वाली तस्‍वीरें सामने आ रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या 21वी सदी में किसानों को मौसम की मार से बचाने का कोई उपाय नहीं है?

मौसम अक्सर किसान का ऐसे ही इम्तिहान लेता है। लेकिन जिस दौर में सरकार अंतरिक्ष में सर्जिकल स्ट्राइक की वाहवाही लूट रही है, क्या मौसम का सही पूर्वानुमान लोगों तक नहीं पहुंचना चाहिए?

फिलहाल किस तरह के मौसम पूर्वानुमान लोगों तक पहुंच रहे हैं, जरा गौर कीजिए

मौसम विभाग ने अगले पांच दिनों यानी 18 अप्रैल से 22 अप्रैल के लिए देश के कई हिस्सों में बारिश, आंधी, गरज-चमक और ओलावृष्टि की चेतावनी जारी की है।

18 अप्रैल के लिए जारी चेतावनी में कहा गया है कि तमिलनाडु, रायलसीमा, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, झारखंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मेघालय, नगालैंड, मणिपुर, मिजोरम, केरल, दक्षिणी कर्नाटक, तटीय आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और त्रिपुरा के अलग-अलग इलाकों में आंधी-तूफान से साथ बिजली गरज सकती है।

http://www.imd.gov.in/pages/allindiawxwarningbulletin.php

इस अनुमान से कोई क्या समझेगा? तकरीबन आधे भारत के अलग-अलग इलाकों में, कहीं-कहीं आंधी-तूफान, गरज-चमक की चेतावनी दी गई है। इसी तरह 22 अप्रैल को राजस्थान के कुछ इलाकों में हीट वेव यानी लू चलने की चेतावनी है। इन कुछ इलाकों में कौन-कौन से इलाके आते हैं, मौसम विभाग ही जाने!

करीब 3.42 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले राजस्थान के कुछ इलाकों में लू चलने के अनुमान से किसी को क्या समझ आएगा? ऐसे अस्पष्ट और अनिश्चित अनुमान मौसम विभाग की साख पर तो बट्टा लगा ही रहे हैं साथ ही मौसम पूर्वानुमान की गंभीरता और विश्वसनीयता को भी कमजोर कर रहे हैं।

http://www.imd.gov.in/pages/allindiawxwarningbulletin.php

मौसम के अचानक करवट बदलने और उत्तर, मध्य व पश्चिमी भारत के राज्यों में बेमौसम बारिश, आंधी-तूफान और ओलावृष्टि के  लिए पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर के ऊपर उत्पन्न  Western Disturbance यानी पश्चिमी विक्षोभ को वजह बताया जा रहा है।

मौसम विभाग का अनुमान है कि 22 अप्रैल से एक नया पश्चिमी विक्षोभ पश्चिमी हिमालय क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है। लेकिन इसका असर हिमाचल प्रदेश में होगा या उत्तराखंड में यह अभी स्पष्ट नहीं है। जिलेवार जानकारी मिलना तो दूर राज्यवार भी मौसम के पूर्वानुमान बहुत सटीक नहीं हैं।

23 और 25 अप्रैल के बारे में मौसम विभाग का वेदर आउटलुक बताता है कि पश्चिमी हिमालय क्षेत्र के बहुत से इलाकों और पूर्वी तथा उत्तर-पूर्वी भारत में कहीं-कहीं बारिश या गरज-बौछार की संभावना है। जबकि उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानों और दक्षिणी प्रायद्वीप में कहीं-कहीं बारिश या गरज-बौछार हो सकती है। देश के बाकी हिस्सों में मौसम शुष्क रहेगा। अब आप पता कीजिए कि उत्तर, पूर्वी, पश्चिमी भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप के अलावा देश में कौन-से हिस्से बचते हैं जहां मौसम शुष्क रहेगा।

मध्य प्रदेश या राजस्थान के किसी गांव में बैठे व्यक्ति को ऐसे पूर्वानुमान से कैसे अंदाजा लगेगा कि उसके जिले में बारिश की संभावना है या नहीं?

http://www.imd.gov.in/pages/allindiawxfcbulletin.php

 

इसी तरह 18 अप्रैल के बारे में मौसम विभाग का अनुमान था कि पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बंगाल में कहीं-कहीं बारिश हो सकती है। यूपी में ही 75 जिले हैं। सहारनपुर से बलिया तक 1000 किलोमीटर की दूरी है। ऐसे में गोलमोल पूर्वानुमानों का मतलब?

मौसम के तमाम अनुमान “कहीं-कहीं”, “अलग-अलग”, “कुछ-कुछ” इलाके जैसे शब्दों से बयान होते हैं जिससे सटीक अनुमान लगाना बेहद मुश्किल है। 

संभवत: गलत साबित होने से बचने के लिए मौसम विभाग इतने अस्पष्ट और गोलमोल अनुमान पेश करता है। दीर्घअवधि पूर्वानुमानों को लेकर मौसम विभाग पर काफी सवाल उठते रहे हैं, लेकिन कम अवधि के अनुमान भी बहुत सटीक या उपयोगी नहीं हैं।

उदाहरण के तौर पर, 4 अप्रैल को जारी वेदर आउटलुक में मौसम विभाग ने 11 से 17 अप्रैल के बीच पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, उत्तरी केरल में सामान्य से अधिक जबकि दक्षिणी केरल, दक्षिणी तमिलनाडु, पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में सामान्य से कम और देश के बाकी हिस्सों में सामान्य बारिश की संभावना जताई थी।

जाहिर है कि 15 से 17 अप्रैल के दौरान गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में आंधी-तूफान, ओलावृष्टि और बारिश का मौसम विभाग के 4 अप्रैल को जारी आउटलुक से बहुत अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। क्योंकि यह अनुमान बहुत जेनरिक था।

http://www.imd.gov.in/pages/weeklyweatherreport.php

हालांकि, 14 और 15 अप्रैल को मौसम विभाग ने पश्चिमी विक्षोभ के सक्रिय होने तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के कुछेक इलाकों में भारी बारिश या ओले पड़ने की चेतावनी जारी की थी। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के कुछ इलाकों में भी आंंधी-तूफान, ओलावृष्टि के साथ हल्की से सामान्य बारिश की संभावना जताई गई। गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र, मराठवाडा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में भी गरज-चमक और अंधड़ के साथ कहीं-कहीं बारिश और बिजली गिरने का अलर्ट था।

http://www.imd.gov.in/pages/press_release_view.php?ff=20190415_pr_450

लेकिन एक तो यह चेतावनी 14 और 15 अप्रैल को तब जारी की गई जब मौसम की मार पड़ने लगी थी। मंडियों में पड़े अनाज या कट चुकी फसलों के बचाव के लिए ज्यादा समय नहीं था। दूसरा, इस चेतावनी में राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में ओलावृष्टि होने का जिक्र नहीं था। पंजाब, हरियाणा में ओलावृष्टि की आशंका ज़रूर जताई गई थी।

सब जानते हैं देश की अर्थव्यवस्था किस हद तक मौसम पर निर्भर है। किसान के अलावा कई दूसरे काम-धंधों और जान-माल की सुरक्षा के लिए समय रहते मौसम की सटीक जानकारी मिलना जरूरी है। लेकिन यहां तो मौसम के सारे अनुमान गोलमोल तकनीकी शब्दावली की भेंट चढ़ते दिख रहे हैं।

सबसे बड़ा सवालिया निशान भारत सरकार के उस मौसम विभाग पर है जिस पर प्राइवेट एजेंसियों के अनुमान भी कई बार भारी पड़ जाते हैं।

कटहल खाने पर छिड़ा विवाद, ब्रिटेन के अखबार ने बताया भद्दा

कटहल खाने को सेहत के लिए कई लिहाज से फायदेमंद माने जाता है। लेकिन ब्रिटेन के प्रमुख अखबारों में शुमार किए जाने वाले ‘दि गार्डियन’ अखबार में 27 मार्च, 2019 को कटहल से संबंधित एक लेख प्रकाशित हुआ। इसे लिखा है जो विलियम्स ने। विलियम्स ने अपने लेख में कटहल को भद्दा और बदसूरत बताया गया है।

जो विलियम्स ने इस लेख में यह भी कहा है कि भारत के लोग इस फल को पेड़ों पर सड़ने के लिए छोड़ देते थे। उनका कहना है कि भारत में सिर्फ वही लोग खाते थे जिनके पास इससे बेहतर खाने के लिए कुछ नहीं होता था।

लेखक ने यह भी कहा है कि भारत में लोग पहले इसे नहीं खाते थे और अब लोग मांस के विकल्प के तौर पर इसे खा रहे हैं। लेखक ने कहा है कि कटहल की अब लाॅटरी लग गई है। विलियम्स ने यह भी दावा किया है कि पांच साल पहले तक कटहल उपजाया भी नहीं जाता था। लोग इसे पेड़ों पर सड़ने के लिए छोड़ देते थे लेकिन अब भारत से इसका निर्यात हो रहा है।

दि गार्डियन के इस लेख में कटहल से संबंधित कई तथ्यात्मक गलतियां हैं। लेखक ने कटहल को फल बताया है। लेकिन भारत में कटहल का इस्तेमाल सब्जी के तौर पर होता आया है। कटहल वैसे लोग नहीं खाते आए हैं, जिनके पास खाने को कुछ नहीं था बल्कि इसे सामान्य लोग ही खाते आए हैं।

सामान्यतः एक सब्जी के तौर पर बाजार में दूसरी सब्जियों के मुकाबले कटहल की कीमत अधिक होती है। इससे पता चलता है कि कटहल विकल्पहीनता की सब्जी नहीं बल्कि शौक की सब्जी रही है। उत्तर भारत में होली के त्योहार पर अधिकांश घरों में कटहल की सब्जी बनती है। कटहल का अचार भी लोग बहुत पसंद से खाते हैं।

इस लेख को लेकर ‘दि गार्डियन’ और लेखक को सोशल मीडिया पर काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। कुछ लोग इसे ब्रिटेन के अखबार की ओर से खाने-पीने की चीजों के लिए चलाया जा रहा ‘नस्लवाद’ कहा है।

वहीं कुछ लोग लेखक के इस दावे पर सवाल उठा रहे हैं कि सिर्फ पांच साल से इसे उपजाया जा रहा है। भारत में ही काफी पहले से लोग कटहल खाते रहे हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक में कटहल को लोग बड़े चाव से खाते रहे हैं। केरल में हमेशा से कटहल की बहुत अच्छी पैदावार होती थी। कटहल केरल का राजकीय फल है। श्रीलंका के लोगों के खान-पान में भी कटहल का प्रमुख स्थान रहा है।

दरअसल, जिस कटहल को ब्रिटेन का अखबार भद्दा और बदबूदार बता रहा है, उस कटहल के कई औषधीय गुण भी हैं। इस वजह से कुछ खास स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान के लिए कटहल खाने की सलाह डाॅक्टर भी देते हैं।

कटहल में कई पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं। इसमें विटामिन-ए, विटामिन-सी, थाइमिन, पोटैशियम, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, आयरन, नियासिन, जिंक और ढेर सारा फाइबर होता है। इस वजह से कटहल स्वास्थ्य के लिए बेहद गुणकारी है।

कटहल में कैलोरी नहीं होने की वजह से इसे दिल के रोगियों के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है। कटहल में पोटैशियम होने से यह रक्तचाप नियंत्रित रखता है। इससे भी दिल के मरीजों को लाभ मिलता है। एनीमिया की समस्या से पार पाने में भी कटहल सहायक होता है। क्योंकि इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में होती है।

कटहल खाने से पाचन तंत्र को स्वस्थ्य रखने में भी मदद मिलती है। कब्ज की समस्या के समाधान के लिए भी कटहल उपयोगी है। अस्थमा और थायराॅयड में भी कटहल खाना फायदेमंद रहता है। हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में भी कटहल खाना फायदेमंद साबित होता है। डाॅक्टर कहते हैं कि ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या से भी कटहल बचाता है। जोड़ों के दर्द में भी कटहल खाने की सलाह डाॅक्टर देते हैं।

कांग्रेस ने किया ‘कर्ज मुक्ति’ और ‘किसान बजट’ का वादा

2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने अपना घोषणापत्र जारी कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी के घोषणापत्र को ‘जनता की आवाज’ बताते हुए यह कहा है कि इसमें किसानों के संकट को दूर करने वाले वादे किए गए हैं और सत्ता में आने के बाद हर वादा कांग्रेस पूरा करेगी।

राहुल गांधी के इन दावों के बीच कांग्रेस घोषणापत्र में किसानों के लिए किए गए वादों के बारे में जानना प्रासंगिक है। दरअसल, देश के किसान पिछले कई सालों से गंभीर परेशानियों का सामना कर रहे हैं। वे न सिर्फ कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं बल्कि उन्हें न तो अपनी उपज का सही दाम मिल पा रहा है और न ही लागत में कमी लाने की लिए सरकार के ओर से कोई उपाय किया जा रहा है। इससे किसानों की आमदनी बढ़ नहीं पा रही है।

ऐसे में कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र के जरिए किसान और किसानी की इन समस्याओं को दूर करने के वादे किए हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह किसानों को ‘कर्ज माफी’ से ‘कर्ज मुक्ति’ की राह पर ले जाएगी। इसके लिए पार्टी ने कहा है कि वह किसानों को उपज के बदले लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करेगी। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि कांग्रेस की सरकार अगर बनी तो लागत में कमी लाया जाएगा और किसानों को संस्थागत कर्ज मिले, यह सुनिश्चित किया जाएगा।

कांग्रेस ने देश के किसानों से यह वादा भी किया है कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद उसकी सरकार हर साल अलग से ‘किसान बजट’ पेश करेगी। इसके जरिए कृषि क्षेत्र पर उसकी जरूरतों के हिसाब से विशेष जोर दिया जा सकेगा।

घोषणापत्र जारी करने के अवसर पर राहुल गांधी ने यह भी कहा कि अगर किसी वजह से किसान कर्ज नहीं चुका पाएंगे तो इसे सिविल मामला माना जाएगा न कि आपराधिक। राहुल गांधी ने यह भी कहा कि ऐसा करना एक ऐतिहासिक कदम होगा। कांग्रेस के घोषणापत्र में यह कहा गया है कि कर्ज नहीं चुका पाने वाले किसानों के खिलाफ आपराधिक मामले वाली कार्रवाई नहीं होगी।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया सरकार बनाने के बाद वह एक कृषि के लिए एक स्थायी आयोग बनाएगी। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय कृषि विकास एवं योजना आयोग नाम दिया है। कांग्रेस ने कहा है कि इस आयोग में किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्रियों को शामिल किया जाएगा। ये आयोग सरकार को बताएगी कि कृषि को कैसे फायदेमंद बनाया जाए। घोषणापत्र में यह कहा गया है कि इस आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि यही आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करेगा।

कांग्रेस ने अपतने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को भी संशोधित करने की बात कही है। पार्टी ने कहा है कि अभी यह योजना किसानों की कीमत पर बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचा रही है।

कांग्रेस ने यह भी कहा है कि सत्ता में आने के बाद वह राज्य सरकारों के साथ मिलकर जमीन से संबंधित रिकाॅर्ड को डिजिटल बनाने का काम करेगी। साथ ही वह खेती की जमीन पर महिलाओं के स्वामित्व और बटाई की खेती के हकों को संरक्षित करने के लिए भी काम करेगी। पार्टी ने कहा है कि ऐसा करने से विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत महिला लाभार्थियों को लाभ मिल पाएगा।

कांग्रेस ने घोषणापत्र में यह भी कहा है कि वह कृषि की लागत को कम करने की दिशा में काम करेगी। साथ ही पार्टी ने यह वादा भी किया है कि वह एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमिटि कानून को खत्म करके कृषि व्यापार को सारी बंदिशों से मुक्त करने का काम करेगी। पार्टी ने यह वादा भी कहा है कि कृषि उत्पादों के निर्यात और आयात से संबंधित नई नीतियां वह लेकर आएगी।

अपने घोषणापत्र में कांग्रेस ने यह भी कहा है कि वह सीमांत किसानों के लिए भी एक नया आयोग स्थापित करेगी ताकि उनकी आमदनी बढ़ाने की दिशा में काम हो सके। कांग्रेस ने यह भी कहा है कि वह स्थानीय उत्पादों के उत्पादन को बढ़ावा देगी।

कांग्रेस ने घोषणापत्र में एक अहम वादा यह किया है कि वह अगले पांच साल में कृषि से संबंधित शोध और अध्ययन पर होने वाले खर्च को दोगुना करेगी। कांग्रेस का कहना है कि इससे कृषि को लाभकारी बनाने में काफी मदद मिलेगी।

ये वादे तो अच्छे लगते हैं कि लेकिन भारत में घोषणापत्र में किए गए वादों का जो हश्र होता है, उससे हर कोई वाकिफ है। इसलिए अच्छे वादों के बावजूद कांग्रेस घोषणापत्र में किसानों से संबंधित वादों पर किसानों का कितना विश्वास जमेगा, यह कहना मुश्किल है। लेकिन अगर इन वादों पर वाकई अमल हुआ तो देश के कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है।

कर्जमाफी के बावजूद पंजाब के किसान गुस्से में क्यों हैं?

कभी पूरे देश में खेती-किसानी में शीर्ष पर रहे राज्य पंजाब के किसान गुस्से में हैं। वे अपने गुस्से को जाहिर करते हुए अपनी मांगों को मनवाने के लिए पिछले कुछ दिनों से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। पंजाब के किसानों ने अपने विरोध प्रदर्शन के तहत रेल रोको अभियान भी चलाया। इस वजह से कई ट्रेनों को रद्द करना पड़ा और कई ट्रेनों का मार्ग बदलना पड़ा।
पंजाब के किसानों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान जो तस्वीरें आईं, वे हैरान और परेशान करने वाली हैं। इन तस्वीरों में ये किसान रेल की पटरियों पर लेटे हुए दिखे। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि पंजाब का अन्नदाता आज इस तरह के विरोध-प्रदर्शन करने को मजबूर है? पंजाब के संदर्भ में यह बात और महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि यहां कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने किसानों का कर्ज माफ कर दिया है। तो फिर भी पंजाब के किसान विरोध प्रदर्शन करते हुए ‘जेल भरो आंदोलन’ चलाने को क्यों मजबूर हुए।
इन सवालों के जवाब में पंजाब किसान आंदोलन में लगी मजूदर किसान संघर्ष समिति ने एक बयान जारी करके पंजाब के किसानों की मांग के बारे में बताया। पंजाब के किसानों की मांग है कि पूर्ण कर्ज माफी की जाए। दरअसल, जिस भी राज्य में कर्ज माफी हुई है, उसमें कई तरह की शर्तें विभिन्न राज्य सरकारों ने लगाई है। इससे छोटे और हाशिये के किसानों के एक बड़े वर्ग को कर्ज माफी का लाभ नहीं मिल पा रहा है। पंजाब भी इसका अपवाद नहीं है। ऐसे में पंजाब के किसान यह मांग कर रहे हैं कि सूबे में पूर्ण कर्ज माफी लागू की जाए।
पंजाब के किसानों की दूसरी मांग यह है कि स्वामिनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाए। कई साल पहले आई इस रिपोर्ट में किसानों के कल्याण के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे। पंजाब में पिछले कुछ समय में यह देखा जा रहा है कि कर्ज नहीं चुका पाने वाले कुछ किसानों की जमीन की नीलामी हो रही है और कुछ किसानों की गिरफ्तारियों की खबरें भी आ रही है। इसलिए विरोध प्रदर्शन कर रहे पंजाब के किसानों की मांग है कि जमीन की नीलामी और किसानों की गिरफ्तारी पर तत्काल रोक लगे।
इसके अलावा पंजाब के किसानों की एक मांग यह भी है कि गन्ना के बकाये का भुगतान हो। इसमें भी ये संघर्षरत किसान यह मांग कर रहे हैं कि उनके बकाया पैसे का भुगतान 15 प्रतिशत की ब्याज दर के साथ हो।
पंजाब से कई मामले ऐसे भी आ रहे हैं जहां बैंक कर्ज देने से पहले ही किसानों से ब्लैंक चेक ले रहे हैं। जब किसान समय पर कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं तो फिर इन ब्लैंक चेक में बैंक अपने हिसाब से रकम भरकर किसानों पर चेक बाउंस के मामले दर्ज करा रहे हैं। इसके बाद किसानों की गिरफ्तारी हो जा रही है। कुछ खबरों में तो यह दावा किया गया है कि पिछले कुछ महीने में पंजाब में ऐसी तकरीबन 350 गिरफ्तारियां हुई हैं।
बैंक न सिर्फ कर्ज देने से पहले ब्लैंक चेक मांग रहे हैं बल्कि जमीन भी गिरवी रखवा रहे हैं और गारंटर भी मांग रहे हैं। इन परेशानियों की वजह से किसान फिर से कर्ज लेने के लिए साहूकारों के पास जा रहे हैं। ये साहूकार और अधिक ब्याज दर पर कर्ज दे रहे हैं। किसानों के लिए यह कर्ज चुका पाना बेहद मुश्किल होता जा रहा है। कुल मिलाकर देखें तो पंजाब का किसान कर्ज के एक दुष्चक्र में फंस गया है।
कभी खेती-किसानी में देश में सबसे आगे रहे पंजाब में आज किसानों की हालत अच्छी नहीं है। इस बात की पुष्टि पंजाब के तीन विश्वविद्यालयों द्वारा कराए गए एक अध्ययन से भी होती है। इसमें यह बताया गया है कि पंजाब में 2017 से अब तक कर्ज नहीं चुका पाने की वजह से 900 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। वहीं 2000 से 2015 के बीच पंजाब में तकरीबन 16,000 किसानों को किसानी की समस्याओं की वजह से मौत को गले लगाने को मजबूर होना पड़ा है। इनमें से तकरीबन 9,100 किसान थे और बाकी खेतों में काम करने वाले मजदूर। इसका एक मतलब यह है कि सिर्फ पंजाब का किसान ही परेशान नहीं है बल्कि खेतों में काम करने वाले मजदूर भी काफी परेशान हैं।
इन तथ्यों से यह पता चलता है कि पंजाब में कृषि की हालत अच्छी नहीं है। हाल के दिनों में पंजाब में किसानों का यह कोई पहला प्रदर्शन नहीं है। बल्कि पिछले कुछ महीनों में ही अलग-अलग संगठनों के नेतृत्व में प्रदेश में किसानों ने कई विरोध-प्रदर्शन किए हैं। लगातार हो रहे ये विरोध-प्रदर्शन बता रहे हैं कि आधे-अधूर मन से की गई कर्जमाफी से किसानों का संकट नहीं दूर होने वाला बल्कि इसके लिए और व्यापक कमद उठाने की जरूरत है।

राशन के लिए रात भर लाइन में लगे रहने की मजबूरी

2018 के दिसंबर में मध्य प्रदेश की सत्ता में आई कमलनाथ सरकार ने कुछ ही दिनों के अंदर किसानों की कर्ज माफी की घोषणा की। इससे प्रदेश में कर्ज के बोझ तले दबे काफी किसानों को राहत तो मिली लेकिन प्रदेश के गरीब और वंचित लोगों को अब भी राशन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

पिछले दिनों मध्य प्रदेश के सतना जिले से एक ऐसी खबर आई जो किसी को भी हैरत में डाल सकती है। यहां लोगों को 20 किलो राशन लेने के लिए रात-रात भर लाइन में लगकर इंतजार करना पड़ रहा है। राजस्थान पत्रिका ने इस संबंध में एक खबर प्रकाशित की।

इसमें यह बताया गया कि सतना जिले में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की एक दुकान के सामने 50 से अधिक महिलाएं और बुजुर्ग लोग राशन लेने के लिए पूरी रात दुकान के बाहर खड़े रहे। इस खबर में यह भी बताया गया है कि जब सुबह हुई तो यह लाइन और बढ़ती गई।

दिन के नौ बजे से अनाज बंटने की शुरुआत इस केंद्र से हुई। इस बीच दोपहर के 12 बज गए। तब तक कुछ ही लोगों को अनाज मिल पाया था। इतने में इस दुकान पर बैठे सेल्समैन ने यह कहते हुए दुकान बंद कर दी कि अभी सर्वर डाउन है और ऐसे में राशन का वितरण नहीं किया जा सकता है।

यहां आने वाली महिलाओं को कोई पहली बार लाइन में नहीं लगना पड़ा है। बल्कि इन महिलाओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि हर महीने इन्हें इसी तरह से रात भर लाइन में लगने के बाद राशन मिल पाता है। सर्दी के मौसम में ठिठुरन वाली ठंढ में भी इन्हें अनाज के लिए रात भर लाइन में खड़ा रहना पड़ता है।

यहां आने वाली महिलाएं और बुजुर्ग लोग रात भर इंतजार करने की तैयारी से ही आते हैं। रात में सोने के लिए ये बोरी अपने साथ लेते हैं। उसे ये यहीं बिछाकर सो जाते हैं। ओढ़ने के लिए भी ये चादर या कंबल अपने साथ लेकर आते हैं।

इन महिलाओं की त्रासदी यह भी है कि कई बार इन्हें रात भर लाइन में लगने के बाद भी राशन नहीं मिलता। कभी इस राशन दुकान का सर्वर डाउन हो जाता है तो कभी कोई और परेशानी सामने आ जाती है। ऐसी स्थिति में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले इन लोगों के लिए राशन लेना और संघर्ष का काम बन जाता है।

राशन की यह दुकान चलाने वाले का इन महिलाओं में इतना खौफ है कि जब रिपोर्टर ने इन महिलाओं से कैमरे पर बात करने की कोशिश की तो इन्होंने अपना चेहरा छिपा लिया। इन लोगों ने राशन दुकान के संचालक का नाम बताने से भी इनकार कर दिया। इन्हें इस बात का डर है कि अगर दुकान चलाने वाले को उनकी पहचान का पता चल गया तो राशन लेने का उनका संघर्ष और जटिल हो जाएगा।

जब रिपोर्टर ने दूसरे स्थानीय लोगों से बात की तो पता चला कि इस दुकान की संचालक शिवराज कुमारी सिंह हैं। स्थानीय लोगों ने यह भी बताया कि इस दुकान से हर महीने सिर्फ दस दिन ही राशन का वितरण किया जाता है। इस बीच जिसे राशन नहीं मिला उन्हें अगले महीने आने के लिए कह दिया जाता है।

स्थानीय लोगों ने इस दुकान को चलाने वाली शिवराज कुमारी सिंह के बारे में यह भी बताया कि इनकी मनमानी के खिलाफ कई बार शिकायतें संबंधित विभाग में की गई हैं। यहां तक की स्थानीय विधायक और सांसद के समक्ष भी इस मसले को उठाया गया है। इसके बावजूद उनके खिलाफ कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस दुकान में चाहे जितने भी लोग राशन लेने आ जाएं लेकिन यहां एक दिन में सिर्फ 60 लोगों को ही राशन दिया जा रहा है। अगर इन 60 लोगों में किसी का नंबर नहीं आया तो उसे फिर पूरी रात वहीं रहकर अगले दिन अपने नंबर का इंतजार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार को सार्वजनिक वितरण प्रणाली की ऐसी दुकानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि गरीबों और वंचितों को उनके हक का राशन पूरे सम्मान के साथ एक निश्चित समय पर मिले। गरीबों को जो राशन दिया जा रहा है, वह उनका हक है। कोई भी दुकान संचालक उन्हें राशन देकर उन पर अहसान नहीं कर रहा है। लेकिन गलती कर रहे दुकान संचालकों को यह बात तब समझ में आएगी जब प्रदेश सरकार ऐसे कुछ केंद्रों पर कड़ी कार्रवाई करेगी।

खेती-किसानी की समस्याएं जो हर पार्टी के मुद्दे होने चाहिए?

पिछले दो-तीन साल में पूरे देश में किसानों ने अपनी समस्याओं को लेकर देश में कई आंदोलन किए। ऐसा कम ही होता है कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने वाले किसान संगठन एक साथ आएं और किसानी के मुद्दों पर मिलकर संघर्ष करें। लेकिन हाल के समय में ऐसा होते देखा गया।

देश भर में 200 से अधिक किसान संगठन एक साथ आए और इन सबने मिलकर अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति बनाकर देश के विभिन्न हिस्सों से अपने हक और हित की बात उठाने की कोशिश की। इसके बावजूद 2019 के लोकसभा चुनावों में किसान और किसानी का संकट चुनावी मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

देश भर में किसानों का जो संघर्ष चला, उसका असर यह तो हुए कि कुछ राज्यों में कर्ज माफी हुई। तेलंगाना और ओडिशा जैसे राज्यों ने जब किसानों को सीधी आर्थिक मदद देने वाली योजनाओं की घोषणा कर दी तो दबाव में केंद्र सरकार को भी प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना की घोषणा करनी पड़ी। इसके तहत किसानों को सालाना 6,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी।

इन सबके बावजूद कृषि क्षेत्र की मूल समस्याएं चुनावों में मुद्दा नहीं बन पा रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि किसान और किसानी से संबंधित वे मुद्दे कौन से हैं जिन्हें इन चुनावों में उठाया जाना चाहिए था लेकिन जिन पर अभी तक कोई खास चुनावी चर्चा नहीं हो रही है।

इसमें सबसे पहली दो बातें ध्यान में आती हैं। सबसे पहली बात कि किसानों को उनकी उपज के बदले उचित मूल्य मिले। केंद्र सरकार ने यह घोषणा तो कर दी है कि उसने न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत से 50 फीसदी अधिक तय कर दिया है। लेकिन न तो इसे तय करने में केंद्र सरकार द्वारा इस्तेमाल किए गए फाॅर्मूले पर जानकारों को यकीन है और न ही जमीनी स्तर पर किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना पैसा अपनी उपज के बदले मिल रहा है।

वहीं दूसरी तरफ किसानों की कर्ज की समस्या बहुत बड़ी है। बैंकों के जरिए किसानों को दिए जाने वाले कर्ज का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है लेकिन आम किसानों तक संस्थागत कर्ज इस अनुपात में काफी कम पहुंच पा रहा है। ऐसी स्थिति में किसानों को अब भी साहूकारों के पास अधिक ब्याज दर पर कर्ज लेने के लिए जाना पड़ रहा है। जो लोग बैंक से कर्ज रहे हैं और जो साहूकारों से ले रहे हैं, उन दोनों की समस्या यही है कि उन्हें अपनी उपज की उचित कीमत नहीं मिल रही है और इस वजह से कर्ज के दुष्चक्र से निकल पाना इनके लिए संभव नहीं हो पा रहा है।

किसानी का एक और बड़ा संकट लागत में लगातार बढ़ोतरी के तौर पर दिख रहा है। कृषि में इस्तेमाल होने वाला इनपुट लगातार महंगा हो रहा है। वह चाहे बीज हो, खाद हो, कीटनाशक हो या फिर श्रम बल। इस वजह से बाजार में किसानों पर दोहरी मार पड़ रही है। एक तो उनका लागत बढ़ गया है और दूसरी तरफ उन्हें उचित कीमत भी नहीं मिल पा रहा है।

हाल के समय में यह भी देखा जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन का असर भी कृषि पर हो रहा है। इस वजह से मौसम को लेकर किसानों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। अधिकांश क्षेत्रों में जलस्तर नीचे जा रहा है। अभी भी जल और दूसरे संसाधनों के इस्तेमाल के मामले में कृषि पर उद्योगों को तरजीह दी जा रही है। इस वजह से जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर और अधिक पड़ने की आशंका खुद सरकारी दस्तावेजों में जताई जा रही है। आर्थिक समीक्षा में इस संबंध में लगातार चर्चा हो रही है।

ये मुद्दे ऐसे हैं जो भारत के कृषि क्षेत्र को बेहद नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर रहे हैं। इन वजहों से देश का किसान बेहाल है। लेकिन इसके बावजूद भारत जैसे देश में जहां की 57 फीसदी आबादी अब भी जीवनयापन के लिए निर्भर है, वहां कृषि का संकट चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है।

क्या राहुल गांधी की ‘न्याय’ योजना से बदलेगी गांवों की तस्वीर?

2019 के लोकसभा चुनावों के पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के द्वारा जनता को अपने पक्ष में लाने के लिए तरह-तरह की घोषणाएं हो रही हैं। वह चाहे केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी हो या फिर मुख्य विपक्षी कांग्रेस, दोनों तरफ से इस बार घोषणाओं की झड़ी लगी हुई है।

कुछ दिनों पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक चुनावी सभा में कहा था कि अगर केंद्र में कांग्रेस की सरकार आती है तो वह गरीबों के लिए न्यूनतम आय गारंटी सुनिश्चित करने वाली एक योजना लाएगी। गुजरात में जब कांग्रेस कार्यसमिति आयोजित हुई तो उस बैठक में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने इस योजना का नाम सुझाया। उन्होंने इसके लिए ‘न्याय’ नाम सुझाया जिसके अंग्रेजी के अक्षरों को विस्तार देने पर न्यूनतम आय योजना नाम बनता है।

इसके बाद पिछले दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बाकायदा प्रेस वार्ता करके ‘न्याय’ योजना की घोषणा कर दी। इसके तहत राहुल गांधी ने कहा है कि अगर केंद्र में उनकी सरकार बनती है तो चरणबद्ध तरीके से देश के 20 फीसदी सबसे गरीब लोगों को 6,000 रुपये प्रति महीने की आर्थिक मदद सरकार करेगी। इसका मतलब यह हुआ कि हर ऐसे परिवार को पूरे साल के 72,000 रुपये मिलेंगे।

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि इस योजना के जरिए गरीब से गरीब परिवार को प्रति महीने 12,000 रुपये की आय गारंटी दी जाएगी। उन्होंने इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि अगर किसी गरीब परिवार की आय 12,000 रुपये से कम है तो उसकी आय और 12,000 रुपये के अंतर की पूर्ति इस योजना के तहत की जाएगी। इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई ऐसा परिवार 4,000 रुपये प्रति महीने कमा रहा है तो उसे कांग्रेस की इस प्रस्तावित योजना के तहत 8,000 रुपये की आर्थिक मदद मिलेगी।

कांग्रेस पार्टी ने यह भी कहा है कि इस योजना के लिए जरूरी धन की व्यवस्था कैसे होगी, इसके लिए विस्तृत रूपरेखा तैयार कर ली गई है। इस प्रस्तावित योजना पर कांग्रेस पार्टी ने जिस बैठक में निर्णय लिया, उस बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी थे। उनके जैसे अर्थशास्त्री की मौजूदगी में लिया गया निर्णय बताकर कांग्रेस यह संकेत दे रही है कि उसकी न्याय योजना पर आर्थिक व्यावहार्यता पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

अब सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रस्तावित योजना से ग्रामीण भारत का कुछ भला हो पाएगा? कांग्रेस की इस न्याय योजना पर अर्थशास्त्रियों की ओर से जो शुरुआती प्रतिक्रिया आई है, उसमें इसके आर्थिक व्यावहार्यता पर तो चिंता जताई गई है लेकिन साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में तेजी आ सकती है।

ये अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि तकरीबन पांच करोड़ परिवार यानी तकरीबन 25 करोड़ लोगों को अगर सीधी आर्थिक मदद मिलती है तो इससे कृषि की उत्पादकता पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। क्योंकि इस पैसे का एक हिस्सा गरीब परिवार के लोग खेती में निवेश करेंगे।

इन अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि अधिकांश गरीब गांवों में हैं तो अगर न्याय योजना के तहत उन तक पैसे पहुंचते हैं तो इससे ग्रामीण भारत में कई तरह के उत्पादों और सेवाओं की मांग बढ़ेगी। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ सकती है। वहीं रोजमर्रा के उत्पादों की मांग भी बढ़ सकती है। कुल मिलाकर आर्थिक विशेषज्ञों को लग रहा है कि अगर कोई भी सरकार ऐसी योजना को ठीक से लागू करने के लिए धन की व्यवस्था कर पाती है और इसे ठीक से लागू करने में सफल हो जाती है तो इससे भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई गति मिलेगी। इसका सकारात्मक असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिखेगा।