क्यों नाकाम हुई मोदी सरकार की TOP स्कीम?

चौधरी पुष्पेंद्र सिंह

कई शहरों में प्याज की खुदरा कीमतें अब भी 120 रुपये प्रति किलोग्राम के ऊपर चल रही हैं। सरकार ने प्याज की जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए व्यापारियों पर छापेमारी के अलावा, थोक व्यापारियों की भंडारण सीमा (स्टॉक लिमिट) 500 से घटाकर 250 क्विंटल और खुदरा विक्रेताओं की सीमा 100 से घटाकर 20 क्विंटल कर दी है। पिछले दिनों केंद्रीय खाद्य मंत्री ने प्याज की बढ़ी कीमतों को काबू करने में विवशता भी जाहिर की थी।

केंद्रीय कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में प्याज उत्पादक राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ इस विषय पर चर्चा कर निर्णय लिए जा रहे हैं। केंद्र सरकार ने कीमतों को काबू करने के लिए 1.2 लाख टन प्याज आयात करने का निर्णय लिया है। इसमें से मिस्र, तुर्की आदि देशों से लगभग 50 हजार टन प्याज आयात के सौदे किए जा चुके हैं। यह प्याज धीरे-धीरे देश में आ रही है, परन्तु देश की लगभग 60 हजार टन प्रति दिन की मांग के सापेक्ष यह बहुत कम है। प्याज की कम आवक, जरूरत से कम आयात और इसमें देरी के कारण प्याज के दाम बेकाबू हैं। इस विषय में कृषि मंत्री ने भी संसद को बताया कि देश में खरीफ की प्याज का उत्पादन आशा से लगभग 16 लाख टन कम रहा हैं।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार इस वर्ष नवंबर में खुदरा महंगाई दर 5.54 प्रतिशत पर पहुंच गई जो पिछले 40 महीनों का सबसे उच्चतम स्तर है। इसका मूल कारण खाद्य पदार्थों विशेषकर सब्ज़ियों की महंगाई दर बढ़ना बताया गया है। इसी साल कुछ माह पहले इन सब्जियों को किसान कम कीमत मिलने के कारण सड़कों पर फेंकने की लिए मजबूर हुए थे।

प्याज उत्पादक राज्यों में विलंब से आये मानसून और फिर अत्यधिक बारिश के कारण देश में खरीफ की प्याज का रकबा भी पिछले साल के लगभग तीन लाख हेक्टेयर के मुकाबले इस साल लगभग 2.60 लाख हेक्टेयर रह गया। खरीफ की प्याज का उत्पादन भी पिछले साल के 70 लाख टन के मुकाबले 53 लाख टन रहने का अनुमान है। देश में सबसे ज्यादा, लगभग एक-तिहाई प्याज का उत्पादन करने वाले राज्य महाराष्ट्र में नवंबर में प्याज की आवक पिछले साल के 41 लाख टन के मुकाबले घटकर 24 लाख टन रह गई। इस कारण अब प्याज की कीमतें नई फसल आने पर जनवरी में ही कुछ कम हो पाएंगी।

तमाम कोशिशों के बावजूद आखिर सरकार सब्जियों की कीमतों को नियंत्रित रखने और उपभोक्ताओं के साथ-साथ किसानों के हितों की रक्षा करने में बार-बार नाकाम क्यों होती है? 2018-19 में देश में 18.6 करोड़ टन सब्जी उत्पादन हुआ है। 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के मोदी सरकार के लक्ष्य में बागवानी फसलों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इन फसलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अपने बजट में भी कई योजनाएं शुरू की हैं। सब्जियों में मात्रा के लिहाज से आधा उत्पादन आलू, प्याज और टमाटर का ही होता है और ये सबसे ज़्यादा उपयोग की जाने वाली सब्ज़ियाँ हैं। सब्ज़ियों में आलू सबसे बड़ी फसल है, जिसका 2108-19 में 530 लाख टन उत्पादन हुआ। इसी तरह प्याज का उत्पादन इस वर्ष 235 लाख टन और टमाटर का उत्पादन 194 लाख टन रहा।

इन तीनों फसलों का ही देश की घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन हो रहा है और हम इन फसलों के निर्यात की स्थिति में हैं। गत वर्ष प्याज का 22 लाख टन निर्यात कर हम विश्व के सबसे बड़े प्याज निर्यातक थे। तो ऐसा क्या हुआ कि अब उसी प्याज को देश मंहगे दामों पर आयात करने के लिए मजबूर है। आलू, प्याज और टमाटर की कीमतों के स्थिरकरण हेतु सरकार ने पिछले साल 500 करोड़ रुपये की ऑपरेशन ग्रीन्स टॉप’ (टोमैटो, अनियन, पोटैटो) योजना भी शुरू की थी। इसका मूल उद्देश्य एक तरफ उपभोक्ताओं को इन सब्जियों की उचित मूल्य पर साल भर आपूर्ति सुनिश्चित करना और दूसरी तरफ किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाना था।

जाहिर है कि सरकार को इसके लिए और कदम भी उठाने होंगे। सबसे पहले तो हमें इन फसलों के उचित मात्रा में खरीद, भंडारण एवं वितरण हेतु शीतगृहों तथा अन्य आधारभूत आधुनिक संरचना (इंफ्रास्ट्रक्चर) का इंतज़ाम करना होगा। हमारे देश में लगभग 8 हजार शीतगृह हैं, परंतु इनमें से 90 प्रतिशत में आलू का ही भंडारण किया जाता है। यही कारण है कि आलू की कीमतों में कभी भी अप्रत्याशित उछाल नहीं आता।

टमाटर का लंबे समय तक भंडारण संभव नहीं है परन्तु अच्छी मात्रा में प्रसंस्करण अवश्य हो सकता है। प्याज के भंडारण को भी बड़े पैमाने पर बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के हितों को संरक्षित किया जा सके। जब फसल आती है उस वक्त सरकार इन सब्जियों को खरीद कर एक बफर स्टॉक भी तैयार कर सकती है ताकि बाज़ार में इनकी आपूर्ति पूरे साल उचित मूल्यों पर बनाई रखी जा सके और किसान स्तर पर कीमतें अचानक ना गिरें।

केंद्र सरकार ने इस साल प्याज का 57 हजार टन का बफर स्टॉक तो बनाया था परन्तु यह स्टॉक देश की केवल एक दिन की मांग के बराबर ही था। इसमें से भी आधे से ज्यादा प्याज खराब हो गई। हर साल प्याज की आसमान छूती कीमतों की समस्या से देश जूझता है, अतः मांग के सापेक्ष हमें प्याज का कम से कम 10 लाख टन का बफर बनाना होगा।

दूसरा, इन तीनों सब्ज़ियों का बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण करने हेतु उद्योग स्थापित करने होंगे। अभी आलू की फसल का केवल 7 प्रतिशत, प्याज का 3 प्रतिशत और टमाटर का मात्र 1 प्रतिशत प्रसंस्करण हो पा रहा है। उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के लिए इनके मूल्यों को स्थिर रखने, ऑफ-सीजन में उपलब्धता सुनिश्चित करने और निर्यात बढ़ाने के लिए इन फसलों का कम से कम 20 प्रतिशत प्रसंस्करण करने का लक्ष्य होना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को प्रोत्साहित करने के लिए इनके उत्पादों पर जीएसटी का शुल्क भी कम लगना चाहिए।

तीसरा, घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन की सूरत में हमें एक भरोसेमंद निर्यातक देश के रूप में भी अपने आप को स्थापित करना होगा। अभी इन फसलों का लगभग 5500 करोड़ रुपये मूल्य का ही निर्यात हो पा रहा है, जिसे तीन-चार गुना बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए उपरोक्त भंडारण और प्रसंस्करण संबंधी दोनों कदम काफी कारगर होंगे। बार-बार न्यूनतम निर्यात मूल्य या स्टॉक लिमिट लगाने से भी व्यापारी भंडारण, प्रसंस्करण और निर्यात की व्यवस्था में निवेश करने से पीछे हट जाते हैं। अतः इन विषयों में स्थिर सरकारी नीतियों तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानूनों में सुधार करने की आवश्यकता है।

नाबार्ड के एक अध्ययन के अनुसार आलू, प्याज, टमाटर की फसलों में उपभोक्ता द्वारा चुकाए गए मूल्य का 25-30 प्रतिशत ही किसानों तक पहुंच पाता है। अतः हमें इन फसलों में अमूल मॉडल’ को लागू करना होगा, जहां दूध के उपभोक्ता-मूल्य का 75-80 प्रतिशत किसानों को मिलता है। कृषि उत्पाद बाज़ार समिति अधिनियम में सुधार कर बिचौलियों की भूमिका को भी सीमित करना होगा। ऐसी संस्थाएं स्थापित करनी होंगी जो किसानों से सीधे खरीदकर उपभोक्ताओं तक इन सब्जियों को बिचौलियों के हस्तक्षेप के बिना पहुंचाने का काम करें।

इन फसलों की खेती में लगे करोड़ों किसानों की मांग है कि इन तीनों फसलों को एमएसपी व्यवस्था के अंतर्गत लाकर इनकी उचित खरीद, भंडारण और प्रसंस्करण की व्यवस्था सरकार करे। जिससे एक तरफ इन फसलों को फेंकने की नौबत ना आये तो दूसरी तरफ आम आदमी की जेब भी ना कटे।

(लेखक कृषि मामलों के जानकार और किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

नीम कोटेड यूरिया पर कैसे हुआ मिलावट का लेप?

केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में खेती-किसानी के मामले में एक चीज पर काफी जोर दिया है। नीम कोटेड यूरिया! प्रधानमंत्री के तमाम भाषाणों और सरकारी दावों में नीम कोटेड यूरिया के फायदे गिनाए गए।

दरअसल, यूरिया के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। लेकिन किसानों का तो बस नाम है। यह सब्सिडी असल में मिलती है फर्टीलाइजर कंपनियों को। हर साल करीब 65-70 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी फर्टीलाइजर कंपनियों को दी जाती है। यह रकम देश के कृषि बजट से भी बड़ी है तो घपले-घोटाले भी बड़े ही होंगे। सरकारी सब्सिडी से बने यूरिया का गैर-कृषि कार्यों जैसे नकली दूध बनाने, कैमिकल बनाने आदि में डायवर्ट होना और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में तस्करी आम बात हो गई।

देश पर यह दोहरी मार थी। एक तरफ, सब्सिडी का यूरिया देश से बाहर जाने लगा। तो दूसरी तरफ, किसानों के लिए यूरिया की किल्लत होने लगी। यूरिया की तस्करी और कालाबाजारी की यह समस्या काफी पुरानी है। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही इसका तोड़ निकाल लिया। ये तोड़ था नीम कोटेड यूरिया। हालांकि,  नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हो गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने यूरिया को 100 फीसदी नीम कोटेड करने का फैसला किया। जो बड़ा कदम था।

साल 2015 में सरकार ने देश में यूरिया के संपूर्ण उत्पादन को नीम लेपित करना अनिवार्य कर दिया। आयात होने वाले यूरिया पर भी निंबोलियों के तेल यानी नीम तेल का स्प्रे करना जरूरी था। नीम के इतने ज्यादा अच्छे दिन कभी नहीं आए थे। सरकार का दावा था कि नीम कोटेड यूरिया से मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल की पैदावार बढ़ेगी। क्योंकि नीम लेपित यूरिया धीमी गति से प्रसारित होता है जिसके कारण फसलों की जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन की खुराक मिलती रहती है। नीम कोटिंग से यूरिया के औद्याेगिक इस्तेमाल और कालाबाजारी पर अंकुश लगने का दावा भी किया गया।

सरकार का मानना है कि नीम कोटिंग के जरिए यूरिया की कालाबाजारी रुकने से सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। बेशक, आइडिया अच्छा था। लागू भी 100 परसेंट हुआ। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई।

विज्ञान और पर्यावरण की जानी-मानी पत्रिका डाउन टू अर्थ ने हिसाब-किताब लगाया है कि देश में यूरिया की जितनी खपत है उसे नीम कोटेड करने के लिए जितना नीम तेल चाहिए उतना तो देश में उत्पादन ही नहीं है। जबकि सरकार का दावा है कि आजकल 100 फीसदी यूरिया नीम कोटेड है।

अगर सरकार की बात सही मानें तो सवाल उठता है कि जब देश में यूरिया के समूचे उत्पादन और आयातित यूरिया की कोटिंग के लिए पर्याप्त नीम तेल ही उपलब्ध नहीं है तो फिर नीम कोटिंग हो कैसे रही है? अब या तो यूरिया की 100 फीसदी नीम कोटिंग का सरकारी दावा गलत है या फिर नीम कोटिंग के लिए मिलावटी नीम तेल का इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार ने जब यूरिया की नीम कोटिंग का फैसला किया, ये सवाल कुछ लोगों ने तब भी उठाया था कि यूरिया की इतनी बड़ी मात्रा पर नीम स्प्रे के लिए नीम तेल कहां से आएगा? तब सिर्फ संदेह था, अब हमारे सामने डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट है। वो भी पूरी कैलकुलेशन के साथ!

https://www.downtoearth.org.in/news/governance/towards-a-bitter-end-india-s-neem-shortage-63978

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में नीम ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि भारत में यूरिया की जितनी खपत है, उसकी कोटिंग के लिए करीब 20,000 टन नीम तेल की जरूरत है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,000 टन नीम तेल की है। मतलब, जरूरत के मुकाबले मुश्किल से 15 फीसदी नीम का तेल देश में बनता है। सवाल फिर वही है। जब देश में इतना नीम तेल ही नहीं है तो फिर नीम कोटिंग कैसे हो रही है? बाकी का 85 फीसदी नीम तेल कहां से आ रहा है?

भारत में खेती के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया का इस्तेमाल होता है। देश में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 3.15 करोड़ टन है जिसमें से 76 लाख टन यूरिया आयात होता है। नीम कोटिंग से यूरिया की खपत घटने की बात कही गई थी लेकिन हाल के वर्षों में यूरिया की खपत बढ़ी है। लिहाजा आयात भी बढ़ा है।

नीम कोटिंग में मिलावट?

नीम तेल के उत्पादन और खपत में भारी अंतर से संदेह पैदा होता है कि कहीं नकली नीम तेल का इस्तेमाल तो यूरिया में नहीं हो रहा है। यह आशंका अप्रैल, 2017 में उर्वरक मंत्रालय की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन से पुख्ता होती है जिसमें कहा गया है कि कई नीम तेल सप्लायर यूरिया कंपनियों को नीम तेल की इतनी आपूर्ति कर रहे हैं जितनी उनकी उत्पादन क्षमता भी नहीं है। मंत्रालय ने नीम तेल सप्लायरों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिनडाउन टू अर्थ की रिपोर्ट का दावा है कि सरकार के इस नोटिस के बावजूद नीम तेल में मिलावट बदस्तूर जारी है।

यह हाल तब है जबकि एक टन यूरिया में सिर्फ 600 ग्राम नीम तेल स्प्रे का मानक तय किया गया है जिसे कई विशेषज्ञ बहुत कम मानते हैं। इस मात्रा को बढ़ाकर 2 किलोग्राम करने की मांग भी उठ रही है। कहा जा रहा है है कि एक टन यूरिया में 2 किलोग्राम से कम नीम तेल के स्प्रे से मिट्टी या फसलों पर कोई खास फायदा नहीं पहुंचेगा। खैर, ये कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेकिन असली सवाल नकली नीम तेल की मिलावट और सरकारी दावे की असलियत का है। नीम तेल में मिलावट के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस मिलावट को रोकने की कोई मजबूत नियामक व्यवस्था भी नहीं है।

नीम तेल आयात की तैयारी

लेकिन एक बात साफ है कि देश में नीम तेल की कमी है। जिसे दूर करने के लिए नीम तेल के आयात की सुगबुगाहट चल रही है। बहुत जल्द हम चीन या म्यांमार से नीम तेल आयात कर रहे होंगे। मतलब, चीन का विरोध करने के लिए चीनी फुलझंडी और पिचकारी के अलावा नीम तेल का भी बहिष्कार करना पड़ेगा।

उपाय क्या है?

बात ये है कि देश में जितने नीम के पेड़ हैं, उस हिसाब से नीम तेल का बाजार संगठित नहीं है। इसलिए इसे संगठित करने की जरूरत है। साथ ही नीम के पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहन देना पड़ेगा। भारत का सबसे बड़े उर्वरक निर्माता इफको ने इस दिशा में पहल की है। इफको ने देश भर में निंबोली खरीद केंद्र बनाए हैं। गुजरात और राजस्थान में कहीं जगह निंबोली संग्रह जोर पकड़ रहा है। लेकिन नीम तेल में मिलावट के के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अन्यथा,यूरिया की कालाबाजारी रोकने के चक्कर में नकली नीम तेल का कारोबार चमकने लगेगा।

न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे में काम कर रहे हैं मनरेगा मजदूर

ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में सक्षम महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरों को काफी कम पैसे मिल रहे हैं
2005 में जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून पारित हुआ था तो लगा था यह योजना ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल देगी। 2006 में यह योजना लागू हुई और लागू होने के कुछ ही समय के अंदर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसने गहरी छाप छोड़ी।
बाद में इस योजना के आगे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया। उसके बाद से आम बोलचाल की भाषा में इसे मनरेगा कहा जाता है। मनरेगा ने न सिर्फ आम लोगों को अपने गांवों और अपने इलाके में रोजगार दिया बल्कि इसने दूसरे कई क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की मजदूरी में बढ़ोतरी और उनकी कामकाजी परिस्थितियों में सुधार में भी योगदान दिया।
मनरेगा की वजह से ग्रामीण भारत में बुनियादी ढांचे का भी विकास हुआ। इसके तहत सौ दिन का निश्चित रोजगार मिलने की वजह से गांवों में बहुत सारे उत्पादों की मांग बढ़ी और इससे पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति के पहिये को गतिमान बनाए रखने में मदद मिली।
लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि मनरेगा का प्रभाव धीरे-धीरे कम करने की दिशा में काम हो रहा है। केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत मजदूरी की दर में काफी कम बढ़ोतरी की है। हर राज्य का औसत निकाला जाए तो यह बढ़ोतरी सिर्फ 2.6 फीसदी की है।
कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां मनरेगा की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की बढ़ोतरी की गई है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्यों में शामिल हैं। जबकि मिजोरम में यह बढ़ोतरी 17 रुपये की है।
कुल मिलाकर छह राज्य ऐसे हैं जहां मनरेगा की मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इन राज्यों में गोवा, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। इनके अलवा अंडमान द्वीपसमूह और लक्षद्वीप में भी मनरेगा की मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
इस वजह से आज स्थिति यह है कि देश के कुल 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा के तहत मजदूरी कर रहे श्रमिकों की मजदूरी कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से भी कम के स्तर पर है। यह बात नरेगा संघर्ष मोर्चा के एक विश्लेषण में सामने आई है।
मोर्चा के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ राज्य ऐसे हैं जहां कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी और मनरेगा की मजदूरी में काफी फर्क है। गोवा में कृषि क्षेत्र की जो न्यूनतम मजदूरी है, उसके मुकाबले मनरेगा मजदूरों को सिर्फ 62 फीसदी मजदूरी ही मिल रही है।
60 से 70 फीसदी के दायरे में आने वाले राज्यों में गुजरात, बिहार और ओडिशा शामिल हैं। दूसरे कई प्रमुख राज्यों में स्थिति थोड़ी ही ठीक है। सिर्फ छह राज्य ऐसे हैं जहां मनरेगा की मजदूरी कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी के 90 फीसदी से थोड़ा अधिक है।
इस अध्ययन से यह बात भी निकलकर सामने आई कि मनरेगा के तहत सिर्फ नगालैंड ही ऐसा एकमात्र राज्य है जहां मनरेगा के मजदूरों को कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से अधिक पैसे मिल रहे हैं। नगालैंड में कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी 115 रुपये है। जबकि मनरेगा के मजदूरों को 192 रुपये की मजदूरी मिल रही है।
मनरेगा के तहत अभी सबसे अधिक मजदूरी गोवा में दी जा रही है। गोवा में मनरेगा के तहत काम करने वाले एक श्रमिक को एक दिन की मजदूरी 254 रुपये दी जा रही है। लेकिन गोवा में कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी 405 रुपये प्रति दिन है। मनरेगा के तहत सबसे कम मजदूरी बिहार में 176 रुपये प्रति दिन दी जा रही है।
एक तथ्य यह भी है कि लगातार मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाने की मांग उठी है। कई समितियों ने भी यह सिफारिश की है कि मनरेगा की मजदूरी बढ़नी चाहिए। अनूप सतपथी समिति ने यह सिफारिश की थी कि मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी 375 रुपये तय की जानी चाहिए। लेकिन अब तक इन सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया गया है।
पहले से ही मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूर भुगतान में देरी की समस्या का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मजदूरी में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं करके सरकार ने एक तरह से संकेत दिया है कि मनरेगा मजदूरों के हकों और हितों को लेकर वह कितनी गंभीर है।
कहां तो मनरेगा पर संघर्ष करने वाले संगठन 600 रुपये प्रति दिन की मजदूरी मांग रहे हैं और कहां उन्हें कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करने को बाध्य होना पड़ रहा है। ऐसे में इस महत्वकांक्षी योजना का भविष्य क्या होगा, इसे लेकर तरह-तरह के सवाल पैदा हो रहे हैं।

क्या पीएम को किसानों से कनेक्ट कर पाएगी पीएम-किसान?

वित्त वर्ष 2019-20 के अंतरिम बजट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान) की घोषणा की। इस योजना के तहत किसानों को हर साल 6,000 रुपये की आर्थिक मदद देगी। ये पैसे 2,000 रुपये के तीन किस्तों में दिए जाएंगे। मोदी सरकार ने भले ही इस योजना की घोषणा 1 फरवरी, 2019 को की हो लेकिन वह इसे 1 दिसंबर, 2018 से ही लागू कर रही है। सरकार ने इसके लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित भी कर दिए हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनावों के पहले ही किसानों के खाते में 2,000 रुपये की पहली किस्त पहुंचने लगी है।
मोदी सरकार के मंत्री, भारतीय जनता पार्टी के नेता और कई स्वतंत्र विश्लेषक भी यह मानते हैं कि अगर पीएम-किसान योजना ठीक से लागू हो गई तो लोकसभा चुनावों में यह ‘गेमचेंजर’ साबित हो सकती है. यह बात कहे जाने के पीछे ठोस वजहें हैं। रियायती दर पर रसोई गैस का कनेक्शन देने वाली उज्जवला योजना के बारे में माना जाता है कि इसने 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आम तौर पर यह माना जाता है कि जिस योजना से जमीनी स्तर पर लोगों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होता है, वह योजना चुनावों में उसे लागू करने वाली पार्टी का फायदा कराती है। यही वजह है कि पीएम-किसान योजना के बारे में भी कहा जा रहा है कि यह नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता वापसी में उपयोगी साबित हो सकती है।
लेकिन इस योजना का चुनावी लाभ भाजपा और उसके सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के कितना मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका क्रियान्वयन कितनी सफलता से होता है। वैसे यह योजना है तो केंद्र सरकार की लेकिन इसका क्रियान्वयन काफी हद तक राज्य सरकारों की कार्यकुशलता और इच्छाशक्ति पर भी निर्भर करता है। क्योंकि इस योजना का लाभ लोगों तक पहुंचाने में जमीन से संबंधित रिकाॅर्ड का सही होना बेहद जरूरी है। इसमें राज्य सरकार की प्रमुख भूमिका होती है। क्रियान्वयन में और भी कई स्तर पर राज्य सरकारों की अहम भूमिका रहती है। इसलिए अगर राज्य सरकारों ने क्रियान्वयन में अपेक्षित सहयोग नहीं किया तो यह योजना उतनी प्रभावी नहीं साबित हो पाएगी जितनी उम्मीद केंद्र सरकार लगाए बैठी है।
पीएम-किसान के क्रियान्वयन में बैंकों की अहम भूमिका है। इसी तरह की एक योजना ओडिशा में भी चलाई जा रही है। जब उस योजना के तहत आर्थिक सहयोग किसानों के खाते में पहुंचा तो बैंकों ने यह पैसा किसानों पर बकाया कर्ज का हवाला देकर काट लिया। अगर बैंकों ने यही रुख पीएम-किसान योजना के लाभार्थियों के मामले में भी अपनाया तो पहले से कर्ज के बोझ तले दबे किसानों को इस योजना से कोई लाभ नहीं होगा और अंततः सरकार के प्रति उनका गुस्सा बढ़ेगा। अगर बैंकों के स्तर पर इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो चुनाव में इसका नुकसान भाजपा को हो सकता है।
पीएम-किसान योजना ने भी बटाई पर खेती करने वाले किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं किया है। इस योजना में अब तक स्पष्ट तौर पर इस बात का उल्लेख नहीं है कि इसका लाभ बटाई पर खेती करने वाले किसानों को मिलेगा या नहीं। जबकि ऐसे किसानों की बड़ी संख्या है। जिस जमीन पर ये किसान बटाई पर खेती करते हैं, उन पर अगर उनके मालिकों को इस योजना का लाभ मिलता है और खेती करने वाले बटाई किसानों को नहीं मिलता है तो इससे इन किसानों में इस योजना को लेकर गुस्सा बढ़ सकता है। इससे इस योजना से भाजपा को हो सकता है कि अपेक्षित लाभ नहीं मिले और फायदा के बजाए नुकसान उठाना पड़ा।
इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अगर पीएम-किसान योजना का ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पाया तो यह योजना भी पहले से चल रही दूसरी योजनाओं की श्रेणी में जा सकती है और जरूरतमंद किसान इसके फायदे से वंचित रह सकते हैं।

गुजरात: राजनीति और इंजीनियरिंग के लिहाज से क्‍यों खास है सौनी प्रोजेक्‍ट?

अपने महत्‍वाकांक्षी सौनी प्रोजेक्‍ट के जरिये गुजरात की सियासी इंजीनियरिंग को साधने में जुटे हैं नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को गुजरात के जामनगर पहुंचे और ‘सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण फॉर इरिगेशन’ (SAUNI) यानी सौनी प्रोजेक्‍ट के पहले चरण का लोकार्पण किया। साल 2012 में विधानसभा चुनाव से पहले बतौर सीएम नरेंद्र मोदी ने ही इस सिंचाई परियोजना का ऐलान किया था। एक बार फिर चुनाव से पहले 12 हजार करोड़़ रुपये की यह महत्‍वाकांक्षी परियोजना सुर्खियों में है। उम्‍मीद की जा रही है कि यह प्रोजेेक्‍ट सौराष्‍ट्र से सूखा पीड़‍ि़त किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। लेकिन इसका सियासी महत्‍व भी कम नहीं है। विपक्षी दल कांग्रेस ने परियोजना पूरी होने से पहले ही प्रथम चरण के लोकार्पण और प्रधानमंत्री की जनसभा को चुनावी हथकंंड़ा करार दिया है। पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी की आज गुजरात में पहली सभा थी।

जामनगर, राजकोट और मोरबी जिले की सीमाओं से सटे सणोसरा गांव मेंं एक जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सौनी प्रोजेक्ट पर हर गुजराती को गर्व होगा। किसान को जहां भी पानी मिलेगा, वह चमत्‍कार करके दिखाएगा। गुजरात के मुख्‍यमंत्री विजय रूपाणी का कहना है कि सौनी प्रोजेक्‍ट सूखे की आशंका वाले सौराष्‍ट्र के 11 जिलों की प्‍यास बुझाएगा। परियोजना के पहले चरण में राजकोट, जामनगर और मोरबी के 10 बांधों में नर्मदा का पानी पहुंचेेगा। अनुमान है कि सौराष्‍ट्र की करीब 10 लाख हेक्‍टेअर से अधिक कृषि भूमि को फायदा होगा।

सिविल इंजीनियरिंग का कमाल

सिविल इंजीनियरिंग के लिहाज से भी सौनी प्रोजेेक्‍ट काफी मायने रखता है। इसके तहत 1,126 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी, जिसके जरिये सरदार सरोवर बांध का अतिरिक्‍त पानी सौराष्ट्र के छोटे-बड़े 115 बांधों में डाला जाएगा। पहले चरण में 57 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है जिससे सौराष्‍ट्र में तीन जिलों के 10 बांधों में पानी पहुंचने लगा है। गुजरात सरकार का दावा है कि सभी 115 बांधों के भरने से करीब 5 हजार गांव के किसानों को फायदा होगा। गौरतलब है कि सौराष्‍ट्र के ये इलाके अक्‍सर सूखे की चपेट में रहते हैं। नर्मदा का पानी पहुंचने से यहां के किसानों को राहत मिल सकती है।

मोदी की रैली के सियासी मायने

हालांकि, सौनी प्रोजेक्‍ट 2019 तक पूरा होना है लेकिन अगले साल गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा और राज्‍य सरकार अभी से इसका श्रेय लेने में जुट गई है। आनंदीबेन पटेल के सीएम की कुर्सी से हटने और विजय रूपाणी के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद यह पीएम मोदी की पहली गुजरात यात्रा है। उधर, पाटीदार आरक्षण और दलित आंदोलन भी भाजपा के लिए खासी चुनौती बना हुआ हैै। इसलिए भी पीएम मोदी के कार्यक्रम और जनसभा के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सौराष्‍ट्र कृषि प्रधान क्षेत्र है और यहां पटेल आरक्षण और दलित आंदोलन का काफी असर है।

परंपरागत सिंचाई योजना से कैसे अलग है सौनी

देखा जाए तो सौनी प्रोजेेक्‍ट नर्मदा प‍रियोजना का ही विस्‍तार है। लेकिन परंपरागत सिंचाई परियोजनाओं की तरह सौनी प्रोजेक्‍ट में नए बांध, जलाशयों और खुली नहरों के निर्माण के बजाय पहले से मौजूद बाधों में पानी पहुंंचाया जाएगा। इसके लिए खुली नहरों की जगह पाइपलाइन बिछाई जा रही है। उल्‍लेखनीय है कि भूमि अधिग्रहण के झंझटों को देखते हुए गुजरात सरकार ने खुली नहरों के बजाय भूमिगत पाइपलाइन का विकल्‍प चुना था। इसी पाइपलाइन के जरिये नर्मदा का पानी सौराष्‍ट्र के 115 बांधों तक पहुंचााने की योजना है। भूमिगत पाइपलाइन से बांधों में पानी डालने के लिए बड़े पैमाने पर पंपिंग की जरूरत होगी। इस पर आने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

परियोजना पर सवाल भी कम नहीं

12 हजार करोड़ रुपये केे सौनी प्रोजेक्‍ट पर सवाल भी कम नहीं हैं। दरअसल, राज्‍य सरकार का अनुमान है कि नर्मदा से करीब 1 मिलियन एकड़ फीट अतिरिक्‍त पानी सौराष्‍ट्र के 115 बांधों को मिल सकता है। गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता शंकर सिंह वाघेला का कहना है कि सौनी प्रोजेक्‍ट की सच्‍चाई दो महीने बाद सामने आएगी। अभी तो बरसात की वजह से अधिकांश बांधों में बारिश का पानी पहुंंच रहा है। दो-तीन महीने बाद जब बांध सूख जाएंगे तब पता चलेगा सौनी प्रोजेक्‍ट से कितना पानी पहुंचता है। सरकार को कम से कम दो महीने का इंतजार करना चाहिए था।

किसान और खेती की आउटसोर्सिंग से किसका भला होगा?

कृषि प्रधान भारत की विडंबना यह है कि एक के बाद एक सरकारों की नीतियों, लागत व मूल्‍य नीति की खामियों और घटती जोत के आकार के चलते किसान और समूचा कृषि क्षेत्र मुश्किल में उलझा हुआ है।

इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण यह है कि पिछले 20 साल के दौरान हर रोज औसतन 2035 किसान मुख्‍य खेतीहर का दर्जा खो रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि सभी सरकारें महंगाई पर काबू करने के नाम पर किसानों को उनकी उपज का पूरा दाम देने से बचती रही हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। किसान की बदकिस्‍मती देखिए कि वह हर चीज फुटकर में खरीदता है, थोक में बेचता है और दोनों तरफ का भाड़ा भी खुद ही उठाता है।

एनएसएसओ के 70वें राउंड के आंकड़े बताते हैं कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कृषक परिवार की औसत मासिक आमदनी महज 6426 रुपये है। इस औसत आमदनी में खेती से प्राप्‍त आय का हिस्‍सा महज 47.9 फीसदी है जबकि 11.9 फीसदी आय मवेशियों से, 32.2 फीसदी मजदूरी या वेतन से और 8 फीसदी आय गैर-कृषि कार्यों से होती है।

बढ़ती लागत के चलते किसान का मुनाफ लगातार घटता जा रहा है। वर्ष 2015 में पंजाब के कृषि विभाग ने बढ़ती लागत के मद्देनजर गेहूं का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य 1950 रुपये प्रति कुंतल तय करने की सिफारिश की थी। खुद पंजाब के मुख्‍यमंत्री ने कृषि लागत एवं मूल्‍य आयोग यानी सीएसीपी और केंद्र सरकार से गेहूं का एमएसपी 1950 रुपये करने की मांग की थी। लेकिन नतीजा क्‍या हुआ? गेहूं का एमएसपी महज 1525 रुपये तय किया गया। अब बताईये 425 रुपये प्रति कुंतल का नुकसान किसान कैसे उठाएगा?

केंद्र में नई सरकार आने के बाद किसानों को उम्‍मीद जगी थी कि स्‍वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाएगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा दिलाने का वादा किया था। लेकिन ये उम्‍मीदें भी फरवरी, 2015 ने चकनाचूर हो गईं जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह कृषि उपज का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य लागत से 50 फीसदी ज्‍यादा बढ़ाने में सक्षम नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि लागत पर 50 फीसदी बढ़ोतरी बाजार में उथलपुथल ला सकती है। तर्क यह है कि 60 करोड़ लोगों सिर्फ इसलिए वाजिब दाम से वंचित रखा जाए ताकी बाजार न बिगड़े। इस तरह की नीतियां लागू करने वाले सरकारी अधिकारी क्‍या 30 दिन काम कर 15 दिन का वेतन लेने को तैयार हैं? फिर किसान के साथ ये खिलवाड़ क्‍यों?

कृषि के मामले में नीतिगत खामियों का सिलसिला उपज के दाम तक सीमि‍त नहीं है। और भी तमाम उदाहरण हैं। सरकार ने 5 लाख टन ड्यूटी फ्री मक्‍का का आयात किया था जिससे कीमतों में जबरदस्‍त गिरावट आई। अब इसमें मक्‍का उगाने वाले किसान का क्‍या दोष जो समर्थन मूल्‍य से कम से उपज बेचने को मजबूर हुआ? क्‍या ऐसे स्थितियों में सरकार को किसान के नुकसान की भरपाई नहीं करनी चाहिए? क्‍या इसी तरह के हालत किसान को कर्ज के जाल में नहीं उलझाते हैं? मांग और आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए कृषि उपज के आयात या निर्यात के फैसले सरकार को लेने होते हैं लेकिन इन फैसलों में किसान के हितों की रक्षा भी तो होनी चाहिए।

हाल ही में केंद्र सरकार ने मोजांबिक से दाल आयात के लिए दीर्घकालीन समझौता किया है। इसके तहत वर्ष 2021 तक 2 लाख टन दालों का आयात किया जाएगा। भारत सरकार मोजांबिक में कॉपरेटिव फार्मिंग का नेटवर्क खड़ा करेगी और किसानों को दलहन उत्‍पादन के लिए अच्‍छे बीज और सहायता दी जाएगी। इन किसानों की उपज को सरकार न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर खरीदेगी।

हैरानी की बात यह है कि सरकारी एजेंसियां भारत में सिर्फ 1 फीसदी दालों की खरीद न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर कर पाती हैं। जबकि यही सरकार अफ्रीका के किसानों को 100 फीसदी खरीद एमएसपी पर करने का भरोसा दिला रही है। ऐसा भरोसा भारत के किसानों को दिया जाए तो यहां भी दलहन उत्‍पादन बढ़ सकता है। इसका सबूत यह है कि इस साल दलहन के समर्थन मूल्‍य में सरकार ने 425 रुपये प्रति कुंतल तक की बढ़ोतरी की है और 15 जुलाई तक दलहन की बुवाई में गत वर्ष के मुकाबले 40 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। अधिकांश कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खेती की आउटसोर्सिंग भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है।

हालांकि, सरकार ने मुख्‍य आर्थिक सलाहकार के नेतृत्‍व में दलहन पर नीति बनाने के लिए एक समिति का गठन किया है जो एमएसपी, बोनस और दालों के उत्‍पादन के लिए किसानों को रियायतें आदि देने जैसे विकल्‍पों पर विचार करेगी। लेकिन दिक्‍कत यह है कि सरकार अपनी नीतिगत खामियों की तरफ तभी ध्‍यान देती है जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बवाल खड़ा हो जाए। जबकि कामचलाऊ उपायों के बजाय दीर्घकालीन नीतियों और उपायों के जरिये किसान को सहारा देने की जरूरत है।

वेटनरी कॉलेज खोलना होगा आसान, एक्‍ट में संशोधन की तैयारी 

देश में पशु चिकित्‍सकों की कमी दूर करने के लिए केंद्र सरकार वेटनरी कॉलेज खोलने की प्रक्रिया को आसान बनाने जा रही है।

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नई दिल्‍ली। देश में पशु चिकित्‍सकों कमी को दूर करने के लिए केंद्र सरकार वेटनरी कॉलेज खोलने की राह आसान बनाने जा रही है। नए काॅलेज खाेलने के‍ लिए जमीन जैसे मानदंडों में छूट दी जाएगी। इसके लिए तीन दशक से ज्‍यादा पुराने भारतीय पशु चिकित्‍सा परिषद अधिनियम में संशोधन होगा। इस समय देश में पशु चिकित्‍सों की काफी कमी है और विश्‍व में मवेशियों की स
र्वाधिक आबादी होने के बावजूद पूरे भारत में सिर्फ 52 वेटनरी कॉलेज हैं। इनमें से भी 16 कॉलेज पिछले दो साल में खुले हैं।

कृषि एवं किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री डॉ. संजीव कुमार बालियान ने मंगलवार को ऑल इंडिया प्री-वेटेेनरी टेस्‍ट (एआईपीवीटी)- 2016 के परिणामों की घोषणा करते हुए बताया कि भारतीय पशुचिकित्‍सा परिषद अधिनियम, 1984 में संशोधन का प्रस्‍ताव रखा गया है ताकि नए काॅलेज खोलने की प्रक्रिया को सरल बनाया जा सके। बालियान का मानना है कि देश में पशु चिकित्‍सकों की कमी को दूर करने के लिए सरकारी और प्राईवेट कॉलेजों की संख्‍या बढ़ानी जरूरी है।

जमीन सहित कई मानकों में मिलेगी छूट 

फिलहाल वेटनरी कॉलेज खोलने के लिए संस्‍थान के पास 45 एकड़ कृषि भूमि होनी जरूरी है। संजीव बालियान का कहना है कि आजकल शहरों में इतनी जमीन मिलना मुश्किल है। इतने सख्‍त मानदंडों के चलते निजी क्षेत्र के लोग वेटनरी कॉलेज खोलने के लिए आगे नहीं आ पाते हैं। उम्‍मीद है कि आईवीसी एक्‍ट में संशोधन के बाद नए कॉलेज खोलने की राह आसान हो जाएगी।

दो साल में खुले 16 नए कॉलेज

वर्ष 2014 तक देश में कुल 36 वेटनरी कॉलेज थे। जबकि पिछले दो वर्षो के दौरान 16 नए वेटनरी कॉलेज खोले गए हैं। इनमें निजी क्षेत्र के दो और 14 सरकारी कॉलेज हैं। पिछले दो साल में वेटनरी कॉलेजों में सीटों की संख्‍या 2311 से बढ़ाकर 3427 कर दी गई है।

 

 

कैसे उठाएंं प्रधानमंत्री बीमा योजना का फायदा? क्‍या हैं दिक्‍कतें?

योजना के व्‍यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी बहुत-से किसानों को जानकारी नहीं है कि फसल बीमा कैसे कराएं और क्‍लेम कैसे मिलेगा?

करीब चार महीने पहले किसानों को प्रकृति की मार और अचानक होने वाले नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का ऐलान किया था। इस खरीफ सीजन से किसानों को इस नई योजना का लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। लगातार दो साल से सूखे की मार झेल रहे किसानों को बेसब्री से इस योजना का इंतजार है। योजना के बारे में व्‍यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी बहुत-से किसानों को जानकारी नहीं है कि फसल बीमा कैसे कराएं और क्‍लेम कैसे मिलेगा?

नई योजना में क्‍या है नया? 

  • पुरानी फसल बीमा योजनाओं में किसानों को 15 फीसदी तक प्रीमियम देना पड़ता था लेकिन नई बीमा योजना में किसानों के लिए प्रीमियम की राशि महज डेढ से 2 फीसदी रखी गई है। बागवानी फसलों के लिए किसानों को 5 फीसदी प्रीमियम देना होगा। बीमा का बाकी खर्च केंद्र और राज्‍य सरकारें मिलकर वहन करेंगी।
  • सरकारी सब्सिडी पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। भले ही शेष प्रीमियम 90% हो, यह सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। पुरानी बीमा योजनाओं में सरकारी सब्सिडी की ऊपरी सीमा तय होती थी। जिसके चलते नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो पाती थी। नई स्कीम में बीमित राशि का पूरा क्‍लेम मिल सकेगा।
  • अभी तक देश में करीब 23 फीसदी किसान ही फसल बीमा के दायरे में आ पाए हैं। सरकार ने इस साल कम से कम 50 फीसदी किसानों तक फसल बीमा पहुंचाने का लक्ष्‍य रखा है।

-बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों के लिए फसल बीमा अनिवार्य है। यानी बैंक से कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा बैंकों के जरिये हो जाएगा। लेकिन जिन किसानों ने बैंकों से कर्ज नहीं लिया, उन्‍हें बीमा के दायरे में लाने सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

– ओलाबारी, जलभराव और भू-स्‍खलन जैसी आपदाओं को स्थानीय आपदा माना जाएगा। स्थानीय आपदाओं और फसल कटाई के बाद नुकसान के मामले में किसान को इकाई मानकर नुकसान का आकलन किया जाएगा।

किस तरह के नुकसान कवर होंगे

बुवाई/रोपण में रोक संबंधित जोखिम: कम बारिश या प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण बुवाई/ रोपण में उत्पन्न रोक।

खड़ी फसल (बुवाई से कटाई तक के लिए): सूखा, अकाल, बाढ़, सैलाब, कीट एवं रोग, भूस्खलन, प्राकृतिक आग और बिजली, तूफान, ओले, चक्रवात, आंधी, टेम्पेस्ट, तूफान और बवंडर आदि के कारण उपज के नुकसान।

कटाई के उपरांत नुकसान: नई बीमा योजना में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई हो पाएगी। अगर फसल कटाई के 14 दिन तक यदि चक्रवात, चक्रवाती बारिश और बेमौसम बारिश से उपज को नुकसान पहुंचता है तो किसान को बीमा क्‍लेम मिल सकता है।

स्थानीय आपदायें: अधिसूचित क्षेत्र में मूसलधार बारिश, भूस्खलन और बाढ़ जैसे स्थानीय जोखिम से खेतों को हानि/क्षति।

बीमा कराने पर कितना खर्च आएगा 

उदाहरण के तौर पर, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 30 हजार का बीमा कराने पर अगर प्रीमियम 22 प्रतिशत तय किया गया है तो किसान 600 रुपए प्रीमियम देगा और सरकार 6000 हजार रुपए का प्रीमियम देगी। शत-प्रतिशत नुकसान की दशा में किसान को 30 हजार रुपए की पूरी दावा राशि प्राप्त होगी।

-अगर किसी ग्राम पंचायत में 75 फीसदी किसान बुवाई नहीं कर पाएं तो योजना के तहत बीमित राशि का 25 फीसदी भुगतान मिलेगा।

25 फीसदी राशि तुरंत खातों में पहुंचााने का दावा 

सरकार का दावा है कि बीमा क्‍लेम के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। प्राकृतिक आपदा के बाद 25 फीसदी राशि किसान के खाते में तुरंत पहुंचेगीी जबकि बाकी भुगतान नुकसान के आकलन के बाद किया जाएगा।

किन किसानों को मिलेगा बीमा का लाभ?

सभी पट्टेदार/ जोतदार किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ मिल सकता है। योजना के तहत पंजीकरण कराने के लिए किसानों कों भूमि रिकॉर्ड अधिकार (आरओआर), भूमि कब्जा प्रमाण पत्र (एल पी सी) आदि आवश्यक दस्तावेजी प्रस्तुत करने होंगे।

गैर ऋणी किसानों के लिए यह योजना वैकल्पिक होगी।

कैसे कराएं फसल बीमा?

कृषि ऋण लेने वाले किसानों का बीमा उनके बैंक के जरिये होगा। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज नहीं लिया है वे भी नोडल बैंक या भारतीय कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) के स्‍थानीय प्रतिनिधि अथवा संबंधित पंचायत सचिव, ब्‍लाॅक के कृषि विकास अधिकारी या जिला कृषि अधिकारी के माध्‍यम से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में अपना पंजीकरण करा सकते हैं।

भारत सरकार ने किसानों तक बीमा योजना को पहुंचाने के लिए एक बीमा पोर्टल भी शुरू किया है। जिसका वेब पता  है http://www.agri-insurance.gov.in/Farmer_Details.aspx

इसके अलावा एक एंड्रॉयड आधारित “फसल बीमा ऐप्प” भी शुरू किया गया है जो फसल बीमा, कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग (डीएसी एवं परिवार कल्याण) की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

फसल बीमा कराने के लिए जरुरी दस्‍तावेज?

-सरकारी पहचान-पत्र

-निवास प्रमाण-पत्र

-खसरा/खाता संख्या की प्रमाणित प्रति (बोये गए क्षेत्र के दस्तावेज़)

-बैंक खाता संख्या और रद्द किया गया चेक (बैंक विवरण के लिए)

  • एक हस्ताक्षरित भरा हुआ प्रस्ताव फॉर्म

फसल बीमा की पूरी प्रकिया ऑनलाइन होने और स्‍थानीय स्‍तर पर कर्मचारियों की कमी के चलते किसानों को फसल बीमा करवाने में कई तरह की दिक्‍कतें आ रही हैं। जनधन खाते खोलने के लिए बैंकों ने जिस प्रकार अभियान चलाए, वैसे तत्‍परता फसल बीमा को लेकर देखने में नहीं आ रही है।

फसल बीमा में असल दिक्‍कतें क्‍लेम लेते वक्‍त आनी शुरू होंगे। तभी नई योजना की खूबियां और खामियां पूरी तरह उजागर होंगी।

हरियाणा: मक्‍का की बुवाई के लिए मुफ्त मिलेगा बीज, जानिए कैसे?

हरियाणा में किसानों को मक्‍का के बीज मुफ्त दिए जाएंगे। हरियाणा सरकार प्रति एकड़ 2,000 रुपये के हिसाब से अधिकतम 4 एकड़ के लिए मक्‍का के बीज मुफ्त उपलब्‍ध कराएगी।

ज्‍यादा पानी लेने वाली धान के बजाय मक्‍का की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई राज्‍य प्रयासरत हैं। हरियाणा में मक्‍का के बीज किसानोंं को मुफ्त दिए जाएंगे।

फसल विविधिकरण योजना के तहत हरियाणा में किसानों को प्रति एकड़ 2 हजार रुपये के अनुदान पर मक्‍का का संकर बीज मुहैया कराया जाएगा। यह अनुदान अधिकतम 4 एकड़ के लिए मिलेगा। इस तरह मक्‍का की बुवाई के लिए अधिकतम 8 हजार रुपये तक अनुदान मिल सकता है। पंजाब में भी मक्‍का के उन्‍नत बीजों पर 84 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी दी जा रही है।

मक्‍का के बीज पर अनुदान हासिल करने के लिए किसान हरियाणा कृषि विभाग की वेबसाइट http://agriharyana.in/ पर पंजीकरण करा सकते हैं जिसकी अंतिम तिथि 20 जून है। सब्सिडी का पैसा सीधे किसानों के खातों में पहुंचेगा। योजना का लाभ उठाने के लिए किसान अपने जिले के कृषि विकास अधिकारी या संबंधित ब्‍लॉक कृषि अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं।

गौरतलब है मक्‍का की बुवाई का उपयुक्‍त समय 20 जून से 25 जुलाई के बीच होता है। मक्का कार्बोहाइड्रेट का बहुत अच्छा स्रोत है और यह एक बहुुपयोगी फसल है। इसलिए मक्‍का का आद्यौगिक महत्‍व लगातार बढ़ता जा रहा है।

धान की सीधी रोपाई पर भी अनुदान
हरियाणा सरकार धान की सीधी रोपाई को बढ़ावा देनेे के लिए किसानों को प्रति एकड़ 3 हजार रुपये का अनुुदान देगी। यह अनुदान अधिकतम 5 एकड़ के लिए मिलेगा। धान की सीधी रोपाई से पानी, बिजली और मजदूरी की बचत होती है। इसके लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 25 जून है। राज्‍य सरकार ने 15 जून से पहले धान की रोपाई पर पूरी तरह रोक लगाई है।

फसल बीमा का फायदा किसानों तक पहुंचाने की कोशिशें तेज

केंद्र सरकार की महत्‍वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू होने के बाद अब इसे ज्‍यादा से ज्‍यादा किसानों तक पहुंचाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए राज्‍य सरकारों और कृषि से जुड़ी विभिन्‍न एजेंसियों के साथ मिलकर प्रयास किए जा रहे हैं।

नई दिल्‍ली। केंद्र सरकार की महत्‍वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू होने के बाद अब इसे ज्‍यादा से ज्‍यादा किसानों तक पहुंचाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए राज्‍य सरकारों और कृषि से जुड़ी विभिन्‍न एजेंसियों के साथ मिलकर प्रयास किए जा रहे हैं।

सूखे की मार झेल रहे किसानों को फसल बीमा योजना से काफी उम्‍मीदे हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के व्‍यापक प्रचार के चलते भी किसानों में फसल बीमा को लेकर जागरुकता बढ़ी है। कृषि मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, इस साल गुजरात में 50 हजार किसानों ने ऑनलाइन माध्‍यम से खुद को प्रधानमंत्रीी फसल बीमा योजना के लिए पंजीकृत किया है। गौरतलब है कि गुजरात में ऑनलाइन पोर्टल के जरिये फसल बीमा के लिए किसानों का पंजीकरण किया जा रहा है। जबकि अन्‍य राज्‍यों में बैंकों और सहकारी संस्‍थाओं के जरिये किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाया जा रहा है।

गौरतलब हैै कि नई फसल बीमा योजना में पुरानी योजनाओं की खामियों को दूर करने का प्रयास किया गया है और प्रीमियम काफी कम कर दिया है। अब खाद्यान्न एवं तिलहन फसलों के लिए प्रीमियम 1.5 से दो प्रतिशत के बीच तथा बागवानी एवं कपास फसलों के लिए पांच प्रतिशत तक रखा गया है।

सूखाग्रस्‍त यवतमाल के 3.5 लाख किसानों को मिलेगा बीमा का लाभ

सरकारी अधिकारियों का दावा है कि महाराष्ट्र्र के सूखा-ग्रस्त यवतमाल जिले के करीब 3.53 लाख किसानों को विभिन्न बीमा योजनाओं के तहत 191 करोड़ रुपये का लाभ मिलेगा।

जिला प्रशासन अधिकारियों ने कहा कि बीमा कंपनियों ने कुल 191 करोड़ रपए में से 117 करोड़ रुपये राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और 74 करोड़ रुपये मौसम आधारित योजना के लिए दिए है। जिला कृषि निरीक्षक अधिकारी दत्तात्रोय गायकवाड़ ने बताया कि बीमा कंपनियों से दो योजनाओं के लिए 191 करोड़ रुपये की राशि मिली है और यह धन किसानों के बैंक खातों में जल्दी हस्तांतरित कर दिया जाएगा।