एक चौथाई स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त पानी भी नहीं!

सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का बखान करते हुए नहीं थकती हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए कार्यों का हवाला देते हुए सरकार एक सांस में कई योजनाएं गिना देती है और फिर अंत में यह भी कहती है कि उसने नई स्वास्थ्य नीति 2017 में लाई और इसके तहत पूरे देश में 1.5 लाख वेलनेस केंद्र खोले जाने हैं और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बढ़ाया जाना है। सरकार बीमा आधारित स्वास्थ्य योजनाओं को भी अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि आज भी स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना कर रहे हैं। इस वजह से यहां आने वाले लोगों का ठीक से ईलाज नहीं हो पा रहा। वहीं दूसरी तरफ बीमा आधारित योजनाओं का लाभ उठाकर निजी अस्पताल अपना कारोबार विस्तार लगातार कर रहे हैं।

इस भयावह स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तैयार की है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए वैश्विक स्तर पर अध्ययन किया गया। इसमें यह बताया गया है कि दुनिया के 25 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पर्याप्त पानी भी उपलब्ध नहीं है। वहीं 20 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां साफ-सफाई के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस वजह से दुनिया के दो अरब से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर मेडिकल कचरे को अलग-अलग करने और फिर उनके निस्तारण के लिए भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कम विकसित देशों में यह स्थिति और भी बुरी है। इन देशों में 45 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ऐसे केंद्रों पर हर साल 1.7 करोड़ महिलाएं अपने बच्चों को जन्म देती हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर किसी बच्चे का जन्म ऐसी जगह पर हो जहां न तो पर्याप्त पानी हो और न ही पर्याप्त साफ-सफाई तो बच्चे और मां पर कई बीमारियों के साथ-साथ जान से हाथ धोने का खतरा भी बना रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस वजह से हर साल तकरीबन दस लाख मौतें हो रही हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पानी और साफ-सफाई में कमी की वजह से नवजात बच्चों और बच्चों को जन्म देनी वाली महिलाओं में जो संक्रमण होता है, उससे सबसे अधिक प्रभावित कम विकसित देश और विकासशील देश हैं।

नवजात बच्चों की कुल मौतों में इस वजह से होने वाली मौतों की हिस्सेदारी 26 फीसदी है। जबकि बच्चों के जन्म देने या इसके थोड़ी ही समय बाद पूरी दुनिया में जितनी महिलाओं को जान गंवानी पड़ रही है, उसमें पर्याप्त पानी और साफ-सफाई के अभाव के माहौल में बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है।

भारत के भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पानी और साफ-सफाई का अभाव स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। अगर भारत के संदर्भ में इस तरह का कोई अध्ययन हो तो इससे भी कहीं अधिक भयावह आंकड़े सामने आ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों का तो और भी बुरा हाल है। यहां तक की प्रमुख शहरों के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त पानी और साफ-सफाई नहीं है। दूसरी बुनियादी सुविधाओं की भी यही स्थिति है।

ऐसे में इस दिशा में काम होना चाहिए कि कैसे भारत के स्वास्थ्य केंद्रोें पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। क्योंकि यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस भी समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य की बुरी स्थिति रहती है, वह समाज न तो आर्थिक तौर पर अच्छा प्रदर्शन कर पाता है और न ही मानव विकास के पैमाने पर उसका प्रदर्शन सुधरता है।

क्या देश में भयानक सूखे की आहट अभी से मिलने लगी है?

मार्च का महीना अभी खत्म भी नहीं हुआ। अभी भी देश के कई हिस्सों में हल्की सर्दी का अहसास बचा हुआ है। गर्मी अभी आई भी नहीं। लेकिन देश के कई हिस्सों में भयानक सूखे की आहट अभी से मिलने लगी है।

भारत में सूखे की स्थिति पर वास्तविक समय में नजर रखने का काम गांधीनगर का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान करता है। हाल ही में इसने बताया कि देश का आधा हिस्सा अभी ही सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से 18 फीसदी हिस्से में स्थिति बेहद गंभीर है। संस्थान का कहना है कि इससे गर्मियों में जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।

संस्थान का कहना है कि झारखंड, दक्षिणी आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तरी तमिलनाडु और अरुणाचल प्रदेश के हिस्से सूखे की चपेट में आ गए हैं। इस काम में लगे वैज्ञानिक मान रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है और सूखा पड़ने की वजह से भूजल स्तर पर भी काफी बुरा प्रभाव पड़ेगा। इससे अधिक जल के इस्तेमाल से पैदा होने वाली फसलों का उत्पादन मुश्किल हो जाएगा। पंजाब जैसे राज्य में धान की खेती मुश्किल हो जाएगी।

संस्थान ने अभी की सूखे की स्थिति का जो मूल्यांकन किया है, उसमें बताया है कि सूखे से सबसे अधिक परेशानी गरीब लोगों को होगी। इस अध्ययन में लगे विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए और भारत के एक बड़े हिस्से को हर साल सूखे की मार से बचाने के लिए यह जरूरी है कि सरकार दीर्घकालिक कदम उठाए। सिर्फ सूखा पड़ने पर पीड़ितों को राहत दे देने भर से काम नहीं चलेगा।

सूखे का प्रमाण नदियों की स्थिति से भी मिल रहा है। कई राज्यों में नदियों का प्रवाह न सिर्फ घटा है बल्कि कई नदियों में तो प्रवाह या तो पूरी तरह खत्म हो गया है या फिर नाम मात्र का बचा है। अगर अभी यह स्थिति है तो फिर जब भयानक गर्मी पड़ेगी तब क्या होगा, इसका अंदाज करके ही भय पैदा होता है।

पर्यावरण के लिए काम करने वाली मुदिता विद्रोही ने ट्विटर पर मध्य प्रदेश और गुजरात से संबंधित कुछ जानकारियां साझा की हैं। इसमें उन्होंने बताया है कि नर्मदा में अधिकांश जगहों पर पानी नहीं है। उनका कहना है कि अधिकांश जगहों पर नदी में एक बूंद भी पानी नहीं है। वे इस पर हैरानी जताते हुए आशंका व्यक्त करती हैं कि अभी यह स्थिति है तो गर्मी में क्या हाल होगा!

इसके अलावा उन्होंने ट्विटर पर अहमदाबाद के पास नर्मदा नदी के बारे में भी जानकारियां भी साझा की हैं। उन्होंने बताया है कि एक तरफ तो अहमदाबाद शहर में नर्मदा में कृत्रिम रूप से जल प्रवाह बनाए रखा गया है लेकिन शहर के बाहर नर्मदा की काफी खराब हालत है। उन्होंने अहमदाबाद के बाहर की नर्मदा की तस्वीरें साझा की हैं जिनमें नदी पूरी तरह से सूखी हुई दिख रही है।

मुदिता विद्रोही ने गुजरात के भावनगर जिले की भी एक तस्वीर साझा की है। इसमें पानी में समाहित रहने वाली जमीन पूरी तरह से सूखी दिख रही है और वहां प्रवासी पक्षी दिख रहे हैं। उन्होंने इन पक्षियों के बारे में कहा है कि पानी नहीं है तो फिर ये पक्षी गर्मियों में कैसे बचे रहेंगे। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि इस सूखे का सामना आम लोग कैसे करेंगे।

क्या ‘गंगा‘ का हाल 2019 लोकसभा चुनावों में चुनावी मुद्दा बन पाएगा?

2014 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में अपने चुनावी अभियानों की शुरुआत करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मुझे मां गंगा ने बुलाया है। वे अपनी चुनावी सभाओं में गंगा को ‘मां गंगा’ और ‘गंगा मईया’ कहकर संबोधित करते हुए इसकी बुरी हालत के लिए उस समय की सत्ताधारी पार्टियों पर हमले करते थे और यह दावा करते थे कि अगर उनकी सरकार बनी तो गंगा की सेहत ठीक कर देंगे।

केंद्र में सरकार बनते हुए जब उन्होंने जल संसाधन मंत्रालय के नाम के साथ ‘गंगा पुनरुद्धार’ भी जोड़ दिया तो लोगों को लगा कि वे वाकई मां गंगा की सेहत सुधारने को लेकर संजीदा हैं। लेकिन बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच साल के कार्यकाल में गंगा की स्थिति में खास सुधार नहीं दिखता।

यह बात केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की हालिया रिपोर्ट से भी साबित होती है। इसमें यह बताया गया है कि माॅनसून खत्म होने के बाद के दिनों में जिन क्षेत्रों का उसने अध्ययन किया, उनमें सिर्फ एक क्षेत्र ऐसा था जहां का पानी पीने लायक था। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के 36 जगहों से जानकारी जुटाकर बोर्ड ने यह रिपोर्ट तैयार की है। इनमें से 25 स्थान उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें से कोई एक भी जगह ऐसी नहीं है जहां गंगा का पानी पीने लायक हो।

गंगा की स्थिति सुधारने में केंद्र सरकार की नाकाम ही वजह है कि न तो इस बार अपनी चुनावी सभाओं में नरेंद्र मोदी गंगा को लेकर अपनी कोई उपलब्धि गिनाते हुए दिख रहे हैं और न ही भविष्य से संबंधित दावे वे कर रहे हैं। भाजपा के दूसरे नेता भी गंगा को लेकर कोई बड़ी बातें नहीं कर रहे हैं।

इसी स्थिति को कांग्रेस कम से कम उत्तर प्रदेश में एक अवसर के तौर पर देख रही है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में अपने चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत गंगा नदी से ही की। प्रयागराज से बनारस की यात्रा प्रियंका गांधी ने गंगा नदी पर नाव से की।

अपनी इस यात्रा के दौरान गंगा के प्रदूषण पर तो वे बहुत आक्रामक होकर नहीं बोलीं लेकिन माना जा रहा है कि गंगा के जरिए यात्रा करके उन्होंने भाजपा को यह संकेत दे दिया है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस गंगा के प्रदूषण को मुद्दा बना सकती है।

हालांकि, उनके सामने भी दिक्कत यही है कि अगर गंगा की स्थिति की बात होगी और इसके इतने अधिक प्रदूषण की बात होगी तो सवाल सिर्फ मोदी सरकार के कार्यकाल पर नहीं उठेंगे बल्कि पहले की कांग्रेस सरकारों के कामकाज पर भी सवाल उठेंगे। भाजपा यह कहेगी कि कांग्रेस ने दशकों में गंगा में इतना प्रदूषण फैलने देने का काम किया कि उसे पांच सालों में साफ करना आसान नहीं है।

ऐसे में लोगों के मन में यही सवाल चल रहा है कि क्या गंगा का हाल इस बार के चुनावों में कोई मुद्दा बन भी पाएगा? क्या लोग राजनीतिक दलों से गंगा की इस स्थिति पर सवाल पूछेंगे? क्या लोग गंगा की इस हालत के लिए राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी तय करेंगे? क्या लोग गंगा के मुद्दे पर वोट देंगे? आने वाले दिनों में इनमें से कुछ सवालों के जवाब मिल सकते हैं।

क्या नर्मदा परियोजना से संबंधित बड़े-बड़े दावे खोखले साबित हो रहे हैं?

नर्मदा परियोजना को लेकर गुजरात में बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। पिछले छह दशकों से नर्मदा परियोजना गुजरात में एक बड़ा मुद्दा रहा है। इस परियोजना के समर्थक कहते हैं कि गुजरात की सिंचाई और पेयजल से संबंधित समस्याओं का रामबाण इलाज नर्मदा परियोजना है।

नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी वे नर्मदा परियोजना को अपनी एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी वे नर्मदा परियोजना की सफलता का जिक्र अक्सर करते हैं।

पिछले कुछ दशकों में गुजरात में नर्मदा के पानी को गुजरात में चुनावी मुद्दा भी बनाया गया है। प्रदेश का एक बड़े हिस्से में पानी की कमी बनी रहती है। इस वजह से लोगों को पानी दिलाने के वादे का चुनावी लाभ भी गुजरात के राजनीतिक दलों को मिलता है।

इस परियोजना के अब तक के क्रियान्वयन से संबंधित जो अध्ययन हुए हैं, उनमें यह माना गया है कि इस परियोजना ने पेयजल से संबंधित समस्याओं का काफी हद तक समाधान करने में सफलता हासिल की है। खास तौर पर उत्तरी गुजरात और सौराष्ट्र में रहने वाले लोगों की पेयजल आपूर्ति संबंधित जरूरतों को इस परियाजना ने पूरा किया है।

लेकिन सिंचाई संबंधित जरूरतों को पूरा करने से संबंधित जो दावे किए गए थे, उन्हें अब तक पूरा नहीं किया जा सका है। अभी भी बड़ी संख्या ऐसे गांवों की है जिन्हें अब भी नर्मदा के पानी का इंतजार है।

इस परियोजना के तहत लक्ष्य यह रखा गया था कि 17.92 लाख हेक्टेयर को सिंचाई की सुविधा मुहैया कराई जाएगी। लेकिन अभी तक सिर्फ 6.4 लाख हेक्टेयर जमीन को ही सिंचाई की सुविधा मिल रही है। इसका मतलब यह हुआ कि कुल लक्ष्य के मुकाबले सिर्फ एक तिहाई जमीन की ही सिंचाई इस परियोजना के जरिए हो रही है।

नर्मदा नहर परियोजना द्वारा सिंचाई संबंधित जरूरतों को नहीं पूरा किया जाने की एक प्रमुख वजह यह बताई जा रही है कि नर्मदा नदी में जल का प्रवाह कम हुआ है। खास तौर पर पिछले दो साल में कम बारिश होने की वजह से यह कमी और अधिक दिख रही है।

वहीं इसकी दूसरी वजह यह बताई जा रही है कि मध्य प्रदेश ने अपने नहर नेटवर्क को बेहतर किया है। इस वजह से पहले जो पानी गुजरात के इस्तेमाल के लिए बच रहा था, उसके एक हिस्से का इस्तेमाल पहले ही मध्य प्रदेश कर ले रहा है।

हाल के अध्ययनों में यह बात भी सामने आई है कि सरदार सरोवर बांध और नर्मदा नहर का काम तो करीब-करीब पूरा हो गया है लेकिन सिंचाई के लिए खेतों तक पानी के लिए जो जल नेटवर्क विकसित किया जाना था, उसका काफी काम अब भी बचा हुआ है। इस वजह से भी मुख्य नहर से पानी गांवों तक नहीं पहुंच पा रहा है।

नर्मदा नदी गुजरात की जीवनरेखा है। अनुमान है कि प्रदेश की 6.5 करोड़ आबादी में से 4.5 करोड़ लोग नर्मदा के पानी पर आश्रित हैं। ऐसे में अगर नर्मदा का प्रवाह बाधित होता है और यह सूखने की ओर बढ़ती है तो इससे गुजरात को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा। न सिर्फ सिंचाई के पानी का संकट पैदा होगा बल्कि जिन इलाकों में पेयजल की स्थिति सुधरी है, उन इलाकों में फिर से पीने के पानी का संकट पैदा हो सकता है। ऐसे में प्रदेश की एक बड़ी आबादी के सामने कई तरह की मुश्किलें पैदा हो जाएंगी।

असल सवाल यही है कि नर्मदा नदी की सेहत सुधारने के साथ नर्मदा परियोजना की समस्याओं को दूर करने के लिए सरकार क्या करती है। क्योंकि अगर जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो यह जानबूझकर मुश्किलों को दावत देने सरीखा होगा।

सूखा – सच का या सोच का ?

आज सूखे की मार से दस राज्यों के 256 जिले और देश की एक तिहाई आबादी ग्रस्त है। कामधेनु की तरह सबका पोषण करने वाली धरती का सीना मोटी-मोटी दरारों से चिरा पड़ा है। सूखे पेड़-पौधे, प्यासे जानवर और पक्षियों का रुदन राग भविष्य के महाविनाश का संकेत दे रहे हैं। किसान अपनी आंखों के सामने कुम्हलाती खेती, मवेशियों की चारा-पानी के लिए तड़पन, अपनी घर-गृहस्थी को उजड़ता देख, निराशा-हताशा में डूब, उस रास्ते की ओर बढ़ चला है, जहां से कोई लौटकर नहीं आता। इन परिस्थितियों का सही-सही विश्लेषण कर, विचार करने की आवश्यकता है, ताकि समझदारी के साथ समाधान खोजने में सही दिशा की ओर बढ़ चलेंं।

विश्व के अन्य देशों की तरह अपने देश में भी प्राकृतिक आपदाएं आना कोई नई बात नहीं है। किसी ना किसी क्षेत्र में सूखा-बाढ़, चक्रवात, तूफान, अकाल, महामारी और भूकंप आदि घटनाएं होती रहीं हैं होती रहेंगी। हर भू-भाग में रहने वाली आबादी ने उन्ही परिस्थितियों में रहने का कौशल विकसित कर लिया था और आज भी कई देश ऐसा कर पाने में सफल हैं। जैसे हर मिनट किसी ना किसी भूकंप की कंपन सहने वाले जापान के क्रांतिकारी भवन डिजाइन, इजराइल में पानी की कमी है, लेकिन सिंचाई के सभी उन्नत टेक्नोलाॅजी के साथ-साथ डेयरी में भी इजराइल काफी ऊपर है। इसके अलावा दुनिया के ठंडे रेगिस्तान में गिने जाने वाले लाहौल-स्पिति में भी वहां के पांरपरिक ज्ञान के कारण ही पानी की उपलब्धता है और फल व सब्जी उत्पादन भी हो रहा है, ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हैं। तीन ओर समुद्र और उत्तर में हिमालय से घिरे इस देश में अनगिनत नदियां, झील, तालाब और मानव निर्मि त बड़े-बड़े बांध हैं, लेकिन इन सबके बावजूद देश जल-संकट से जूझ रहा है, यहां विचारणीय बिंदु यह है कि क्या ये स्थितियां अचानक पैदा हुई हैं या फिर इन्हे हमने धीरे-धीरे पैदा किया है। भौतिक समृद्धि पाने की अंधी दौड़ में, हमने सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा कर, जिस तरह की जीवन पद्धति को अपनाया है वह ही जिम्मेदार है। विकास और प्रकृति के बीच सहज सामंजस्य को भुलाकर, विकास के जिस मार्ग को हमने चुना है, क्या वोो मार्ग मानव सभ्यता को सुख और समृद्धि की ओर ने जाने में सक्षम है? या महाविनाश की ओर!

जिस तरह गरमाती धरती पर जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसे वैज्ञानिक भी सामान्य नहीं मान रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र में दो दशक से अधिक समय काम कर चुके वैज्ञानिकों ने आशंका जताई है कि हिमालय में सूखा चक्र की शुरूआत हो चुकी है। भूगर्भ वैज्ञानिकों का कहना है कि 50 वर्ष में हिमालयी क्षेत्र का तापमान और बढ़ेेगा, जिससे शुरूआत में बाढ़ आएगी और फिर सूखा बढ़ेगा, अनियमित तेज बारिश होगी। इन बदलावों के चलते ना तो हिमालय में पानी रुकेगा और ना ही ग्लेशियरों के पिघलने से फिर बर्फ जम सकेगी। हिमालय के बाहरी वातावरण और नीचे भूगर्भ में हो रहे बदलाव अच्छे संकेत नहीं दे रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इंडियन प्लेट प्रतिवर्ष दो सेंटीमीटर हिमालय के नीचे सरक रही है, जिससे हर वर्ष हिमालय भी ऊंचा उठता जा रहा है। हिमालय अपने संक्रमणकाल से गुजर रहा है। कम से कम पचास हजार साल सेे अधिक चलने वाले इस चक्र को हिमालय एक बार पहले भी झेल चुका है। इन वैज्ञानिकों की बातें सुन इस देश के नीति-निर्माता जाने-समझे कि उन्हे क्या करना है।

इन नीति-निर्माताओं से जो हम समझे उसकी चर्चा भी कर लेते हैं, हरित क्रांति ने गेहूं- धान के भंडार तो जरूर भरे, लेकिन तिलहन-दलहन और मोटे अनाजों की स्थिति क्या है? पारंपरिक फसल चक्र के बदले फसल कुचक्र ने मिट्टी-पानी-बीज और पर्यावरण आदि को किस स्थिति में पहुंचाया है हम सब जानते हैं। इन नीति निर्माताओं ने देश की कृषि को गर्त में और किसान को मौत के मुंह में धकेल दिया है। अभी सूखे की परिस्थिति पर ही चर्चा करें तो ठीक रहेगा। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1951 में भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 5177 घनमीटर थी जो आज घटकर 1650 घनमीटर रह गई है। वर्ष 2050 तक ये आंकड़ा 1447 घनमीटर या उससे भी कम होने की संभावना है। प्रति व्यक्ति कम जल उपलब्धता का बड़ा कारण बढ़ती आबादी है। देश में प्रति वर्ष बारिश और हिमनदों से 4000 अरब घनमीटर प्राप्त जल में से 2131 अरब घनमीटर यों ही बह जाता है, शेष 1869 में से मात्र 1123 अरब घनमीटर जल को हम सतही उपयोग या धरती के पेट में उतार पाते हैं। बड़े-बड़े बांध और नदी जोड़ने जैसी महत्वाकांक्षी महंगी परियोजनाओं की सोच रखने वाले नीति निर्माताओं की देन है सूखा।

इन अदूरदर्शी नीति निर्माताओं के पास न तो टिकाऊ कृषि नीति है ना ही प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की समझ और ना ही जल-प्रबंधन का सहूर। अगर ठीक से प्रबंधन कर लें तो अकेले 86,140 वर्ग किलोमीटर में फैला गंगा बेसिन ही 47 फीसद खेतों और 35 फीसद आबादी की सूखे से मुक्ति में सक्षम है। प्रबंधन की ही बात करें तो दिल्ली में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता करीब 250 लीटर प्रति दिन है, जबकि मैक्सिको में प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता लगभग 150 लीटर है और इजराइल में प्रति व्यक्ति प्रति दिन पानी की उपलब्धता करीब 100 लीटर है, फिर भी पानी वहां की मारामारी नहीं है जबकि दिल्ली में पानी के लिए त्राहि-त्राहि है। इजराइल में ये सिर्फ पानी के सही प्रबंधन से ही संभव हुआ है।

मानकों के अनुसार अगर पानी की उपलब्धता प्रति वर्ष 1000 घनमीटर प्रति व्यक्ति हो तो ठीक माना जाता है। इजराइल में ये आंकड़ा करीब 461 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष का है। यानी तय मानकों से बेहद कम पानी की उपलब्धता होने के बावजूद इजराइल में पानी की कमी नहीं है और भारत 1650 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष पानी की उपलब्धता के बावजूद पानी की समस्या से जूझ रहा है। ये कुप्रबंधन का ही नतीजा है कि देश की जहां 40 फीसद आबादी पानी की कमी से जूझ रही है, वहीं दूसरी बड़ी समस्या जल संदूषण की है, जिसे कई लोग जल प्रदूषण भी कह देते हैं। भू-जल हो या गंगा और यमुना जैसी पवित्र अविरल बहती नदियां, भयानक रूप से संदूषण की शिकार हैं। उदाहरण लें तो गंगा नदी के 100 मिलीलीटर जल में 60 हजार मल जीवाणु यानी ईकोलाई बैक्टिरिया पाए गए हैं। देश में लाखों लोगों की मौत जल-जनित रोगों के कारण हो रही है।

विश्व के करीब ढ़ाई फीसद भू-भाग पर लगभग अट्टारह फीसद आबादी को लेकर रहने वाले भारत के पास समस्त प्रकार की जलवायु क्षेत्र मौजूद है। यहां बर्फ से ढंकी चोटियां…ध्रुव प्रदेश जैसा दृश्य! दक्षिणी प्रायद्वीप का भूमध्य रेखा के निकट सूर्य भी सीधी किरणों के कारण भीषण गर्मी वाला क्षेत्र भी भारत में है और कभी चेरापूंजी जैसा क्षेत्र 16000 मिलीमीटर बारिश के साथ अधिकतम वार्षिक वर्षापात वाला क्षेत्र है, तो शून्य से 50 मिलीलीटर वर्ष का थार मरूस्थल वाला राजस्थान या लेह, लद् दाख, करगिल और लाहौल स्पिति के शुष्क क्षेत्र भी यहीं हैं। जहां आसमान से बरसीं एक-एक बूंदों को संजोने की वे पारंपरिक तकनीके, जिनके चलते ये कम वर्षा वाले क्षेत्र भी बेपानी नहीं हुए। अगर, यहां पानी को संजोने की स्थानीय कौशल ना होता, तो यहां आबादी भी ना होती।

देश की प्रभावित आबादी का बड़ा हिस्सा अपने घर और पशुओं को भगवान भरोसे छोड़ पलायन कर गया है। सच तो ये है कि, सरकारें भाग-दौड़ कर के भी पीने का पानी, पशुओं के लिए चारा, जरूरतमंदों को अनाज की व्यवस्था और फसल बर्बाद होने पर रोजगार मुहैया नहीं करा पाईं हैं। लेकिन ये वक्त सूखे से उभरी चुनौतियों से निपटने का है, कोसने का नहीं। हम सबको मिल बैठकर तत्कालिक व दीर्घकालिन योजना पर विचार कर उनको क्रियानवित करने का मार्ग प्रशस्त करना होगा। इसके लिए सरकार की सहभागिता के साथ-साथ जनभागिता भी जरूरी है। स्कूलों के पाठ्यक्रमों में बच्चों को बचपन से ही जल संरक्षण, संवर्ध न और विवेकपूर्ण उपयोग के पाठ पढ़ाने होंगे, तभी इन आपदाओं से निपटने में हम फिर से सक्षम हो सकेंगे। और इसके लिए संचार माध्यमों को भी कारगर, रचनात्मक भूमिका निभानी होगी।

हरित क्रांति के शुुरूआती दौर से चले आ रहे फसल चक्र ने देश के 264 जिलों को डार्कजोन में पहुंचा दिया है। अभी तक औसतन 11 मीटर जल स्तर नीचे गिर चुका है। हमारे यहां भूजल का 70 से 80 फीसदी उपयोग अकेले सिंचाई के लिए होता है। हमें योजनाएं बनाते वक्त भौगोलिक और प्राकृतिक स्थितियों को ध्यान में रखना होगा। हमें मिट्टी, मौसम और उपलब्ध जल के अनुसार फसल और फसल चक्र का चुनाव करना चाहिए। कम पानी वाले क्षेत्रों में गन्ना और धान जैसी फसलों के बजाए कम पानी में होने वाले मोटे अनाज, दलहन, तिलहन आदि की पैदावार ले सकते हैं। जलवायु परिस्थिति के अनुसार बीजों का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया में तीन ‘‘आर‘‘ यानी ‘रीड्यूज़, रिसाइकल और रीयूज़‘ की बात कही जा रही है। सही भी है हमें पानी और अन्य संसाधनों के उपभोग में कमी करनी है, फिर उनका पुनःचक्रण करना है, यानी अपशिष्ट जल को उपचारित करके सिंचाई, सफाई या अन्य कार्यों में दोबारा उपयोग करना आदि। इससे शहरी क्षेत्र में 60 फीसद के अधिक जल की खपत कम की जा सकती है।

भारत का पारंपरिक ज्ञान एक नहीं पांच साल सूूखा और अकाल में भी सुख से रहने का गुर जानता था। लेकिन आधुनिकता की चकाचैंध ने जल को सहज कर रखने, बीजों को बचाने और पशुओं की नस्ल सुधार के हुनर को भुला दिया है। सूखे से निपटने में पशुधन की बड़ी भूमिका है। अगर इनके लिए पर्याप्त पानी और चारे का इंतजाम हो तो पशु भी बचेगा और उनके दूध से हमारी सेहत भी बनी रहेगी। बरसात के दिनों में जंगलों और खेतों में घास की और पतझड़ में पत्ते की भरमार होती है। पहले इन्हे सहज कर रखने का चलन था, जो सूखे के दिनों में चारे के रूप में काम आता था। बागवानी भी सूखे के प्रभाव से निपटने में बड़ी भूमिका निभाती है। हुनरमंद हाथों की अहमियत को समझना होगा, सूखे के समय पूरे परिवार को रोजगार तो मिलता ही है, लेकिन उस समय भी सृजनशीलता की उड़ान दुखभरे वक्त को कैसे बिता देती है, इसकी गहराई को समझना होगा। फिर से पारंपरिक ज्ञान की अहमियत को समझना होगा…गांवों में कुटीर धन्धों, हाथों के हुनरमंदों से जीवन जीने के हुनर को सीखना होगा।

हाल ही के दिनों में महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में कर्जत के निकट खाडवे गांव जाना हुआ। यहां अशोक गायकर और उनके मित्रों ने मिलकर दोनो ओर पहाड़ों से घिरे साठ एकड़ भूमि पर वनदेवता डेयरी एंव कृषि फार्म विकसित किया है। यहां वर्षा जल संरक्षण के लिए चैकडैम तथा पहाड़ों से बहकर आए जल को एक एकड़ तालाब में एकत्र किया जाता है। यहां पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के उपयोग का अद्भुत संगम देखने को मिला। दस भारतीय नस्लों की 150 गायों का संरक्षण और संवर्धन, दूध के अलावा गोबर-गोमूत्र से बने उत्पाद, गोबर गैस का उपयोग तथा कंपोस्ट खाद आदि द्वारा जैविक कृषि, बकरी पालन, मुर्गीपालन और मत्स्य पालन भी यहां हो रहा है। बेमौसमी फल, फूल, सब्जी आदि पैदा करने के लिए पालीहाऊस तथा सूखे के मौसम में भी हाइड्रोपोनिक्स विधि द्वारा पशुओं के लिए हरेे और पौष्टिक चारे का उत्पादन। आम, आंवला, चिकू सहित अन्य बागवानी फसलें हो रही है। खेतों में सिंचाई के लिए बूंद-बूंद या टपक (ड्रिप सिंचाई पद्धति) तकनीक का प्रयोग हो रहा है। यहां प्रधानमंत्री के ‘मोर क्राप पर ड्राप‘ के नारे को साकार होते देखा जा सकता है। अगर दो साल वर्षा ना भी हो तो यहां 60 एकड़ खेती और 150 गायों के लिए पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध है। देश के अलग-अलग भागों में उत्तराखंड में उफरेखाल में सच्चिदानंद भारती, बुंदेलखंड में मंगल सिंह, जयपुर के लापोड़िया के लक्ष्मण सिंह, मध्यप्रदेश के आईएएस उमाकांत उमराव जैसे आर्थिक और सामाजिक महाशक्ति के अनेक उदाहरण हैं, जो हमें सूखे में सुख से रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

आर्थिक महाशक्ति की चाह तभी पूरी होगी, जब आर्थिक स्थिति को गिरने से रोकने के उपायों के साथ-साथ गिरते भूजल के स्तर के उपाय भी हों। जब भू-जल का स्तर गिरता है तो जीवन की गुणवत्ता का स्तर भी गिर जाता है। जल की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा के बीच गहरा संबंध है…और बिन पानी खाद्य सुुरक्षा की बात भी बेमानी है। हमें जरूरत है…भारतीय पारंपरिक ज्ञान के अनुभवों के आधार पर शोध और अनुसंधान की छूटी कड़ी को फिर से जोड़, आगे बढ़ने की…