किसानों ने प्रधानमंत्री को जेवर हवाईअड्डे की आधारशिला नहीं रखने दी

10 मार्च, 2019 को जब शाम पांच बचे चुनाव आयोग ने 2019 के लोकसभा चुनावों की घोषणा की तो उसके कुछ वक्त पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन कर रहे थे। इसके ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से सटे नोएडा में मेट्रो लाइन के विस्तार का उद्घाटन किया था। इसके पहले उन्होंने ग्रेटर नोएडा में कई परियोजनाओं की शुरुआत की थी। प्रधानमंत्री की योजना में ग्रेटर नोएडा से सटे जेवर में प्रस्तावित नए हवाई अड्डे की आधारशिला रखना भी शामिल था। लेकिन यहां के किसानों के विरोध ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री जब विभिन्न परियोजनाओं की शुरुआत के लिए ग्रेटर नोएडा पहुंचे तो भले ही वे जेवर हवाई अड्डे की आधारशिला नहीं रख पाए लेकिन उन्होंने अपने संबोधन में नए हवाई अड्डे के फायदों को गिनाया। उन्होंने बताया कि नवा हवाई अड्डा बन जाने से स्थानीय लोगों को कितना फायदा होगा।
हवाई अड्डे की आधारशिला प्रधानमंत्री के हाथों रखवाना भारतीय जनता पार्टी की योजना में कितना अहम था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय सांसद महेश शर्मा सार्वजनिक तौर पर पहले यह कह चुके थे कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उनके लिए जेवर हवाई अड्डे का काम शुरू करवाना एक बड़ी कामयाबी होगी।
अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर राजनीतिक दृष्टि से इतनी महत्वपूर्ण परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री क्यों नहीं रख पाए? दरअसल, जेवर हवाई अड्डा बनाने में जिन किसानों की जमीन जा रही है, उनमें से 200 से अधिक किसान सरकार द्वारा तय दर पर अपनी जमीन नहीं देना चाह रहे हैं। ये किसान 170 दिनों से अधिक से अपना विरोध जाहिर करने के लिए धरने पर बैठे हैं। इनका कहना है कि ग्रामीण जमीन के अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि ऐसी जमीन के लिए सर्किल रेट से चार गुना अधिक पैसे किसानों को दिए जाएंगे लेकिन सरकार उन्हें जमीन के बदले इतने पैसे नहीं दे रही है।
सरकार पर विभिन्न स्तर पर गुहार लगाने के बावजूद जेवर हवाई अड्डा परियोजना से प्रभावित किसानों की मांग नहीं मानी गई। इसके बाद इन किसानों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया। वहां इन किसानों ने जमीन अधिग्रहण के संबंध में याचिका डाली है। इससे जेवर हवाई अड्डे के लिए जमीन अधिग्रहण में देरी हो रही है। यही वजह है कि आखिरी समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस हवाई अड्डे की आधारशिला रखने की अपनी योजना को छोड़ना पड़ा।
जेवर हवाई अड्डा परियोजना में जिन किसानों की जमीन जा रही है, उन किसानों ने सरकार से अपनी जमीन की सही कीमत हासिल करने के लिए जेवर हवाई अड्डा संघर्ष समिति बनाई है। इसी समिति के बैनर तले जेवर के किशोरपुर गांव में 200 से अधिक किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन किसानों ने जो याचिका दायर की है, उस पर तकरीबन 250 किसानों के दस्तखत हैं।
इस परियोजना के लिए पहले जिन किसानों ने जमीन देने को लेकर अपनी सहमति दी थी, उनमें से भी कई किसानों ने अपनी सहमति वापस ले ली है। यहां असल विवाद जमीन की कीमत को लेकर है। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि हवाई अड्डा बनाने में जो जमीन जा रही है, वह उत्तर प्रदेश सरकार की अधिसूचना के हिसाब से शहरी जमीन है। इसलिए सरकार का कहना है कि वह सर्किल दर से तीन गुना अधिक कीमत मुआवजा के तौर पर देगी। जबकि संघर्ष कर रहे किसानों का कहना है कि हमारे गांव की जमीन शहरी कैसे हो सकती है, हमें तो भूमि अधिग्रहण कानून के हिसाब से ग्रामीण जमीन के लिए सर्किल दर से चार गुना अधिक पैसे चाहिए।
इस संघर्ष के अंत में इन किसानों से सरकार किस दर पर समझौता करती है, यह तो भविष्य में ही पता चलेगा। लेकिन यह जरूर सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी बड़ी परियोजना अगर विकसित हो रही है और उसमें किसानों की खेती की जमीन जा रही हो तो उन्हें कानून के हिसाब से उचित मुआवजा मिलना चाहिए। ऐसा न हो कि सरकार के स्तर पर नियमों में फेरबदल करके किसानों को उनका हक नहीं मिले।

सिंगुर फैसला: किसानों को बिना मुआवजा लौटाए वापस मिलेगी जमीन

किसान विरोधी भूमि-अधिग्रहण नीतियों को पश्चिम बंगाल में बड़ा झटका लगा है। टाटा मोटर्स के लिए सिंगुर में हुए भूमि अधिग्रहण को सुुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। साल 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य की वामपंथी सरकार ने टाटा के नैनो प्रोजेक्‍ट के लिए एक हजार एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था। हालांकि, मामले के तूल पकड़ने और किसानों के भारी विरोध के चलते टाटा मोटर्स को अपना प्‍लांट गुजरात के साणंद में शिफ्ट करना पड़ा। लेकिन जमीन का मामला सुप्रीम कोर्ट में था।
आज सुप्रीम कोर्ट ने सिंगुर में हुए भूमि अधिग्रहण को पब्लिक परपज यानी जनहित में नहीं माना और टाटा मोटर्स को 12 हफ्तों के अंदर किसानों को जमीन वापस लौटाने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि किसी कंप‍नी के लिए सरकार की ओर से भूमि अधिग्रहण ‘जन उद्देश्य’ नहीं माना जाएगा। फैसले की खास बात यह है कि किसानों को उनकी जमीन तो वापस मिलेगी लेकिन उनसे मुआवजा वापस नहीं लिया जाएगा। अदालत का मानना है कि ये किसान पिछले 10 वर्षों से अपनी जमीन से वंचित है इसलिए उन्‍हें मिला मुआवजा वापस नहीं लिया जाना चाहिए। सिंगुर के किसानों के साथ-साथ यह ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के लिए भी बड़ी कामयाबी है। ममता बनर्जी ने ही सिंगुर को लेकर आंदोलन छेड़ा था जो बंगाल से वामपंथी सरकार की विदाई का कारण बना।

प्राइवेट कंपनी के लिए भूमि अधिग्रहण ‘जन उद्देश्य’ नहीं!

सिंगुर मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भूमि अधिग्रहण से जुड़े कई अन्‍य मामलों में भी नज़ीर बन सकता है जहां सरकारें जनहित के नाम पर प्राइवेट कंपनियों के लिए भूमि अधिग्रहण करती हैं। हाईवे, रियल एस्‍टेट और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर से जुड़ी परियोजनाओं में ‘जन उद्देश्य’ के नाम पर होने वाले भूमि अधिग्रहण का फायदा निजी कंपनियां उठा जाती हैं। लेकिन अब ऐसे मामलों में कमी आने की उम्‍मीद जगी है।
सिंगुर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि किसी कंपनी के कार प्‍लांट के लिए किसानों से भूमि अधिग्रहण पब्लिक परपज के दायरे में नहीं आता है। यह अधिग्रहण निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए हुआ था। गौरतलब है कि इस मामले में टाटा मोटर्स को राहत देते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने अधिग्रहण को सही ठहराया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश से न सिर्फ टाटा मोटर्स को झटका लगा है बल्कि मार्क्‍सवादी कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (सीपीएम) के लिए स्थिति और भी असहज हो गई है। सिंगुर आंदोलन के बाद ही ममता बनर्जी बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरींं जबकि वामपंथी दलों की सियासी जमीन लगातार खिसक रही है।

सिंगुर भूमि अधिग्रहण में कई खामियां

सुप्रीम कोर्ट ने टाटा मोटर्स की नैनो परियोजना के लिए सिंगुर में हुए भूमि अधिग्रहण में कई खामियां पायी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि किसानों की आपत्तियों और शिकायतों की सही तरीके से जांच नहीं हुई। गैर-कानूनी तरीके से किसानों की जमीन लेने को लेकर अदालत ने तत्‍कालीन वामपंथी सरकार और टाटा मोटर्स को फटकार भी लगाई।

यह किसानों की जीत है: ममता बनर्जी

सिंगुर पर सर्वोच्‍च अदालत के फैसले को पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने ऐतिहासिक निर्णय और किसानों की जीत बताया है। एक पत्रकार वार्ता में उन्‍होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय को किस तरह लागू किया जाए, इस पर विचार करने के लिए कल एक रणनीतिक बैठक होगी। किसानों को जमीन लौटाने के लिए एक व्यवस्था बनाने पर काम करेंगे।