जैव-विविधता बचाने के लिए 2019 का संदेश

वर्ष 1993 में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली की दूसरी मिटिंग में विश्व के सभी देशों में जैव-विविधता के प्रति समाज को सचेत करने के लिए तय किया गया कि वर्ष में एक ऐसा भी दिन होना चाहिए जिस दिन पूरी दुनिया जैव-विवधता के संबंध में चिंतन करे और उसको बचाने के उपायों को अमल में लाने का कार्य करे। इसी चर्चा के के तहत तय किया गया कि प्रत्येक वर्ष 22 मई को विश्व जैव-विविधता दिवस मनाया जाएगा और वर्ष 2002 से लगातार यह दिवस मनाया भी जा रहा है। जिसमें कि प्रत्येक वर्ष जैव-विविधता से संबंधित एक अलग विषय रखा जाता रहा है। यूनाइटेड नेशंस के जैव-विविधता गुडविल दूत एडवर्ड नोरटन के अनुसार आज विश्व के मानव की विभिन्न पर्यावरण विरोधी गतिविधियों के कारण जंगल कम होते जा रहे हैं। ऐसे में वर्ष 2019 हमें यही संदेश देता है कि हमें अपने जंगलों पर भी ध्यान देना चाहिए।

रमन कांत त्यागी

आज बेढंगे रहन-सहन के कारण सम्पूर्ण जैव-विविधता खतरे में आ गई है। जैव-विविधता चक्र चरमराता दिख रहा है। आज जिस प्रकार डायनासोर के बारे में हम कहते हैं कि कभी ऐसा कोई जीव भी पृथ्वी पर रहा होगा। शायद इसी प्रकार आज मौजूद जीव-जन्तुओं के बारे में भी भविष्य की पीढ़ियां कहा करेंगी। गिद्ध, मोर, शेर, गुरशल, छोटी चिड़िया, कव्वे, कोयल, बगुले, तोता व और न जाने कितने छोटे-बड़े कीट-पतंगे व जीव-जन्तु बहुत-से इलाकों से लुप्त हो चुके हैं या फिर लुप्त होने के कगार पर हैं। खेतों से किसान मित्र केंचुए लगभग गायब हो चुके हैं तथा जंगलों में जानवर कम हो रहे हैं। शायद ही कोई ऐसी सड़क होगी जिस पर प्रतिदिन एक या उससे अधिक जंगली जानवर  (कुत्ता, बिल्ली, गीदड़, भेडिया व लोमड़ी आदि) वाहनों से कुचरकर न मरते हों। कृषि में मशीनों के चलते खेतों की जुताई हेतु बैल तो किसी ही विरले किसान के पास मिलते हैं। देश भर के विभिन्न सुरक्षित जंगलों में आने वाले प्रवासी पक्षियों के आवागमन में कमी आई है। कुछ अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययनों की मानें तो अंटार्कटिका में रहने वाले भालू व पेंगविन भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। जंगल का राजा शेर जंगलों में मानव की बढ़ती अवैध दखल के कारण अपना अस्तित्व बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। देश के अनेक वन क्षेत्रों से शेर समाप्त हो चुके हैं। यह दुःखद ही है कि जिन जंगलों में शेरों का राज होता था वहां शेर बाहर से लाकर छोड़े जा रहे हैं। हस्तिनापुर  के जंगल में विभिन्न दुर्लभ प्रजातियों चंदन आदि के पेड़ हुआ करते थे, लेकिन आज इस पूरे करीब 400 वर्ग किलोमीटर के जंगल में एक भी चंदन का पेड़ नहीं बचा है। सब अधिकारियों की मिलीभगत के चलते लालच की भेट चढ़ चुके हैं।

कृषि के सन्दर्भ में अगर देखें तो किसानों द्वारा दलहन व तिलहन की पैदावार बहुत कम कर दी गई है। यही कारण है कि दालों व तेलों का आयात दूसरे देशों से किया जा रहा है। जंगलों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां या तो समाप्त हो गई हैं या फिर उनको पहचानने वाले नहीं बचे हैं, जिस कारण से पुरातन ज्ञान भी समाज से विलुप्त हो रहा है। पहले गांव कस्बे के नीम-हकीम जंगल से अपने ज्ञान के आधार पर औषधीय पौधे चुनकर लाते थे तथा गांव-देहात के समाज को होने वाली बीमारियों का इलाज उनसे करते थे। पशुओं को जंगल में चराने ले जाया जाता था तो पशुओं द्वारा चरी गई घास से पशुओं की स्वयं की बीमारियां ठीक हो जाया करती थीं। गाय के दूध में औषधीय गुणकारी तत्व मिलते थे, लेकिन अब न तो इतने पशु बचे हैं कि उनको चराने के लिए ले जाया जाए और न ही चराने वाले।

यह सब इसलिए अधिक हो रहा है क्योंकि जिस बकरी को शेर का भोजन बताया जाता है उसे मनुष्य खा रहा है। यही नहीं मनुष्य की जीभ का स्वाद बनने से शायद ही कोई जीव-जन्तु बचा हो। ऐसे में जैव-विविधता को बचाने की आखिर कल्पना कैसे की जा सकती है? समाज द्वारा प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हुएं एक घोर पाप यह किया जा रहा है कि गाय से उसके बगैर बियाहे ही दूध निकालने की व्यवस्था की जा रही है। ऐसा पशुओं के चिकित्सकों द्वारा अपनी कथित पढ़ाई व कुछ दवाईयों के दम पर किया जा रहा है।

 अगर यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो वर्तमान में चरमरा चुका जैव-विविधता चक्र भविष्य में पूरी तरह से टूट जाएगा। जैव-विविधता को बनाए रखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि हम किसी एक चीज पर निर्भर नहीं रह सकते। हमारे चारों ओर के वातावरण में जो मौजूद विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु व पेड़-पौधे उतने ही आवश्यक हैं जितना कि हमारा दोनों समय भोजन करना और पानी पीना। लेकिन शायद हम भूल बैठे हैं कि जिन तत्वों पर हमारा जीवन टिका है, जब वे ही नहीं होंगे तो जीवन भी नहीं होगा।

 

(लेखक नैचुरल एन्वायरन्मेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक हैं)

 

 

 

पक्षियों की कब्रगाह बनी सांभर झील, इलाज पशु चिकित्सकों के भरोसे!

राजस्थान की मशहूर सांभर झील में हजारों पक्षियों की मौत की वजह का अभी तक पता नहीं चला है। राजस्थान हाईकोई ने भी प्रवासी पक्षियों की मौत का संज्ञान लेते हुए वन और पर्यावरण विभाग से जवाब तलब किया है।

इस मामले ने देश-दुनिया के वन्यजीव प्रेमियों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी प्रवासी पक्षियों की मौत पर चिंता जताते हुए जांच के आदेश दिए हैं। मृत पक्षियों के नमूनों को जांच के लिए भोपाल के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हाई सिक्‍योरिटी एनिमल डिजीजेज (NHISAD) भेजा गया है, जिसकी रिपोर्ट का इंतजार है। कई दिन बीत जाने के बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है।

राजस्थान के वन और पशुचिकित्सा विभाग के अधिकारी मामले को समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मौके पर पहुंची जानी-मानी पर्यावरण पत्रकार बहार दत्ता ने वहां जो देखा, वह काफी हैरान करने वाला है। बहार दत्त ने ट्वीट किया कि सांभर झील में पक्षियों की मौत का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। वन्यजीव समूह कहां हैं? यहां विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सकों और टॉक्सिकॉलजिस्ट की जरूरत है। जो डॉक्टर हैं वे मवेशियों का इलाज करते हैं। पर्यावरण से जुड़ी इतनी बड़ी घटना को लेकर यह स्थिति हैरान करने वाली है। स्थानीय लोग भी कई दिनों से पक्षियों की मौत के बावजूद वन विभाग के लापरवाह रवैया पर सवाल उठा रहे हैं।

बहार दत्त ने आगे ट्वीट किया है कि लोग दूर-दूर से पक्षियों को बचाने पहुंच रहे हैं। रेस्क्यू सेंटर में कई पक्षियों को इलाज़ देकर बचाया गया है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ भी पहुंच चुके हैं। लेकिन आसमान से बड़ी तादाद में मृत पक्षी कीड़े-मकोड़ों की तरह गिर रहे हैं।

शुरुआत में पक्षियों की मौत का आंकड़ा सैकड़ों में बताया जा रहा था। लेकिन अब तक चार हजार से ज्यादा पक्षियों को दफनाए जाने की जानकारी मिली है। इतना बड़ा मामला वन विभाग और पशुचिकित्सा विभाग के भरोसे होने का एक प्रमाण यह भी है बुधवार को ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सलीम अली पक्षीविज्ञान केंद्र से विशेषज्ञों को बुलाने की बात कही थी। यानी राज्य में ऐसे विशेषज्ञों की कमी है।

खारेपन और जहरीले पानी का संदेह 

मुख्यमंत्री गहलोत का कहना है कि इस साल भारी बारिश के कारण सांभर झील के आसपास कई वाटर बॉडिज बन गई है जिससे खारेपन का स्तर बढ़ गया। गहलोत ने पक्षियों की मौत रोकने के लिए हरसंभाव कदम उठाने का दावा किया है। जांच कर पता चलाने की कोशिश की जा रही है कि क्या पक्षियों की मौत पानी में खारापन बढ़ने से हुई या पानी के जहरीले होने से। संदेह है कि फैक्ट्री का जहरीला कैमिकल झील में पहुंचने से यह सब हुआ। पानी के सैंपल भी टेस्ट कराए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों की कमी बड़ा सवाल 

पक्षियों से जुड़े इस मामले में विशेषज्ञों की कमी बड़ा सवाल है। राजस्थान जैसा प्रदेश जहां कई नेशनल पार्क और वाइल्ड लाइफ सेंचुरी हैं, पक्षियों की मौत की जांच के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है। पूरा मामला मवेशियों के इलाज के अनुभवी डॉक्टरों और वन विभाग के फील्ड स्टाफ के भरोसे है।

करीब 200 वर्ग किलोमीटर में फैली सांभर झील में हर साल साइबेरिया, नॉर्थ एशिया और हिमालय से लाखों की तादाद में प्रवासी पक्षी आते हैं। इस साल पक्षियों के आने का सिलसिला जल्द शुरू होने को भी इनकी मौतों से जोड़कर देखा जा रहा है।

बीमारियां फैलने का खतरा 

कम से कम 20-25 प्रजातियों के पक्षी मृत पाए गए हैं। इनमें नॉदर्न शावलर, पिनटेल, कॉनम टील, रूडी शेल डक, कॉमन कूट गेडवाल, रफ, ब्लैक हेडड गल, सेंड पाइपर, मार्श सेंड पाइपर, कॉमस सेंड पाइपर, वुड सेंड पाइपर पाइड ऐबोसिट, केंटिस प्लोवर, लिटिल रिंग्स प्लोवर, लेसर सेंड प्लोवर प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं।

कभी पक्षियों के लिए जन्नत मानी जाने वाली सांभर झील इस साल उनकी कब्रगाह बन गई है। जो पक्षी झील के अंदर मरे पड़े हैं, उनसे बीमारियां फैलना का खतरा है। इन्हें पानी से कैसे बाहर निकाला जाएगा, यह भी बड़ा सवाल है।

जैव ईंधन के अपने जोखिम!

पूरी दुनिया में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की जब भी बात चलती है तो जैव ईंधन का नाम भी इसमें आता है। शुरूआत में इसे लेकर पूरी दुनिया में उत्साह का माहौल रहा। लेकिन अब इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

जट्रोफा और मक्के के जरिए ईंधन बनाने की तकनीक अपनाने के प्रति हर देश मोहग्रस्त है। भारत में भी जैव ईंधनों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों में तेजी लाने की बात की जा रही है। इसके लिए देश में नई जैव ईंधन नीति बनाई गई है। देश में जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम हो रहा है।

पर जैव ईंधन के मसले पर हालिया दिनों में हुए अध्ययन के नतीजे हैरान करने वाले हैं। इंग्लैंड के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिक शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जैव ईंधन के उत्पादन से कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की संभावना कम ही है।

जैव ईंधन के उत्पादन के मामले में ब्राजील और अमेरिका अगली कतार में हैं। ब्राजील में अमेजन के जंगल को बहुत विशाल कहा जाता है। इसकी सहायता से वहां के पर्यावरण में संतुलन कायम रहा करता है। पर जैव ईंधन के उत्पादन के लिए इन जंगलों का विनाश किया जा रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है।

वहां की सरकार ने यह एलान किया है कि इस साल जंगलों को उजाड़ने की गति को दोगुना कर दिया जाएगा। यहां यह बताना लाजिमी है कि पेड़ों की कटाई से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाता है। कार्बन उत्सर्जन के मामले में वैश्विक स्तर पर ब्राजील का स्थान चैथा है। इसके बावजूद जैव ईंधन के उत्पादन के लिए पेड़ों की कटाई करके कार्बन उत्सर्जन को कम करने के बजाए बढ़ाया ही जा रहा है।

ब्राजील के वुडस होल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह अमेजन के जंगलों को उजाड़ने के लिए वहां आग लगाई गई उससे इस क्षेत्र की पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ होगी जिसके परिणामस्वरूप कुछ सालों बाद यह इलाका रेगिस्तान में भी तब्दील हो सकता है। आग लगाए जाने की वजह से वहां के कई ऐसे पौधे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं जिनका इस्तेमाल औषधियों के उत्पादन में होता था। यूनिवर्सिटी आॅफ मिनेसोटा के वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि जिस तरह से वैकल्पिक ईंधन के उत्पाद के लिए जमीन तैयार की जा रही है उससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन के नुकसानों की भारपाई करने में तकरीबन चार सौ सालों का वक्त लग जाएगा।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट ने इस बात को उजागर किया है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वैश्विक स्तर पर होने वाली बढ़ोतरी में जैव ईंधन के उत्पादन पर जोर दिया जाना भी एक प्रमुख वजह है। आॅक्सफैम ने भी अपने अध्ययन में बताया है कि जैव ईंधन का माॅडल सफल साबित नहीं हुआ है। लेकिन सरकारें फिर भी इसके उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।

वैकल्पिक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले ईथाइल अल्कोहल के उत्पादन को अमेरिका ने दुगना कर दिया है। वहां की सरकार ने एक दशक के अंदर इसे पांच गुना करने का लक्ष्य रखा है। इस मामले में ब्राजील अमेरिका से आगे है। वहां किसी भी पेट्रोल पंप पर सादा गैसोलिन अब मिलता ही नहीं है। ब्राजील की सड़कों पर दौड़ने वाली 45 फीसद कारों में वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इंडोनेशिया में जंगलों को नष्ट करने के लिए आग लगा दिया गया ताकि उस जमीन से बायोडीजल का उत्पादन किया जा सके। अब इससे भविष्य में पर्यावरण को कितना लाभ पहुंचेगा यह बता पाना तो शायद किसी के लिए संभव नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि पेड़ों को जलाने से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन हुआ। जिससे पर्यावरण की सेहत और खराब होगी।

मक्के से बनाए जाने वाले इथनाल को तो बहुत पहले से ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला बताया जाता है। पर अब सेलुलोज से बनाए जा रहे इथनाल पर भी सवालिया निशान वैज्ञानिक लगा रहे हैं। ऐसे में स्थिति यह दिखती है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ अनाज उपलब्धता की दृष्टि से भी जैव ईंधन सवालों के घेरे में है। ऐसे में जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देने से पहले यह जरूरी है कि इस मामले में व्यापक अध्ययन कराए जाएं और इसके बाद ही इस बारे में आगे बढ़ने का निर्णय लिया जाए।

जलवायु परिवर्तन कार्य योजना कितनी प्रभावी साबित हो रही है?

जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरी दुनिया में चिंता जताई जा रही है। कई स्तर पर इससे निपटने के प्रयास हो भी रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे निपटने के लिए कुछ समझौते हुए हैं। इन समझौतों के तहत विभिन्न देश अपने-अपने स्तर पर भी इस समस्या से निपटने के प्रयास कर रहे रहे हैं और आपस में मिलकर भी।
इस समस्या से निपटने के लिए कई देशों ने अपनी एक कार्ययोजना बनाई है। भारत ने जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए जून, 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना को लागू करने का काम किया था।
उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा शुरू की गई इस कार्य योजना के तहत आठ मिशन तय किए गए थे। इनमें राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन और राष्ट्रीय हरित भारत मिशन प्रमुख हैं।
अब सवाल यह उठता है कि इस कार्य योजना के लागू होने के दस साल से भी अधिक वक्त गुजरने पर इसके तहत कितना काम हुआ है। क्या इस योजना के तहत जिन लक्ष्यों को हासिल करने किए जाने की उम्मीद थी, उन्हें हासिल किया जा सका है?
इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए इस मामले की पड़ताल संसद की प्राक्कलन समिति ने की। पिछले दिनों इस समिति की रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट में विभिन्न मिशन के तहत हुई प्रगति के बारे में विस्तार से बताया गया है।
सौर मिशन के संदर्भ में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सूर्य की किरणों से 2021-22 तक एक लाख मेगावाॅट बिजली बनाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसे हासिल करने के लिए जितने निवेश की जरूरत है उतना निवेश नहीं हो पा रहा है। समिति का अनुमान है कि इस लक्ष्य को हासिल करने में तकरीबन छह लाख करोड़ रुपये का निवेश होना है लेकिन इसके मुकाबले अब तक निवेश का स्तर काफी नीचे है।
जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत चल रहे राष्ट्रीय जल मिशन के जरिए देश भर में जल की स्थिति को लेकर एक व्यापक डाटाबेस तैयार किया जाना था। लेकिन प्राक्कलन समिति ने इस मिशन के तहत हासिल किए गए लक्ष्यों को लेकर सवाल उठाए हैं। इसका कहना है कि इस मिशन के तहत जल और इसके भंडारण से संबंधित जो आंकड़े जमा किए जा रहे हैं, उनके जमा करने की तकनीक इतनी पुरानी है कि इन आंकड़ों पर यकीन करना मुश्किल है। समिति ने यह भी कहा कि जानकारियां जुटाने की पुरानी तकनीक की वजह से न सिर्फ संसाधनों की बर्बादी हो रही है बल्कि इससे समय भी खराब हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत स्थायी कृषि के लिए भी एक राष्ट्रीय मिशन है। इस मिशन के जरिए कृषि के विभिन्न आयामों पर ध्यान देते हुए उन्हें सुधारा जाना है। प्राक्कलन समिति ने इस बात पर सवाल उठाया है कि इसमें किसानों की आय सुरक्षा को क्यों नहीं शामिल किया गया। समिति ने यह भी कहा कि फसल बीमा योजनाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था से खेती लाभकारी नहीं बनी है।
समिति ने कहा है कि सरकार उसकी चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के क्रियान्वयन को ठीक करने के लिए जरूरी कदम उठाए और इसके बारे में समिति को अवगत कराए। कुल मिलाकर इस रिपोर्ट से यही पता चलता है कि बड़ी उम्मीदों से बनी जलवायु परिवर्तन कार्य योजना ने अपने पहले दस साल के सफर में कोई बड़ी उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हासिल की है।