गायब मुद्दे: चुनावों में पर्यावरण चुनौतियों पर चुप्पी

2019 लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान जोरों पर है। सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनावों में से चार चरण के चुनाव हो गए हैं। तीन चरणों का चुनाव बाकी है। लेकिन पर्यावरण की समस्याएं कहीं भी चुनावी मुद्दा बनते नहीं दिख रही हैं। चुप्पी

जबकि सच्चाई यह है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, घटता जलस्तर, मिट्टी की खराब होती स्थिति से लेकर कई स्तर पर भारत को पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में जब भारत में लोकसभा चुनाव हो रहे हैं तो पर्यावरण से संबंधित ये समस्याओं न तो राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा बन पा रही हैं और न ही आम लोगों के लिए।

लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि इसमें जनता से जुड़े मसलों पर बातचीत होती है। लेकिन पर्यावरण के संकट से आम लोगों के हर दिन प्रभावित होने के बावजूद ये संकट चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है। कहीं भी वोट देने के निर्णयों को प्रभावित करने वाली वजहों में पर्यावरण संकट एक वजह नहीं है।

जबकि हकीकत यह है कि भारत के शहरों में वायु प्रदूषण कभी इतना नहीं रहा जितना आज है। दिल्ली जैसे शहरों में साफ हवा में सांस लेना एक तरह से बीते जमाने की बात हो गई है। खराब हवा की वजह से भारत मंे लोग कई तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 2017 में भारत में जितने बच्चों की जान गई, उनमें से हर आठ में से एक की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई। इसी तरह से दूषित जल की वजह से भी बच्चों और बड़ों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

देश की नदियों का हाल बुरा है। 2014 में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने गंगा की साफ-सफाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। लेकिन पांच साल में गंगा की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। इस वजह से न तो सत्ता पक्ष इस बार नदियों की साफ-सफाई को चुनावी मुद्दा बना रहा है और न ही इसमें विपक्षी खेमे की कोई दिलचस्पी दिख रही है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह जरूर कहा है कि अब वह 2022 तक गंगा को साफ-सुथरा बनाने का लक्ष्य हासिल करेगी।

भूजल का गिरता स्तर और भूजल प्रदूषण देश की बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है। आधिकारिक आंकड़े बता रहे हैं कि देश के 640 जिलों में से 276 जिलों के भूजल में फ्लुराइड प्रदूषण है। जबकि 387 जिलों का भूजल नाइट्रेट की वजह से प्रदूषित हुआ है। वहीं 113 जिलों के भूजल में कई भारी धातु पाए गए हैं और 61 जिलों के भूजल में यूरेनियम प्रदूषण पाया गया है। इस वजह से इन जिलों में रहने वाले लोगों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की वजह से देश में पलायन भी देखा जा रहा है। जहां सूखे की मार अधिक है और जहां प्रदूषण की वजह से जानलेवा बीमारियां हो रही हैं, वहां से लोग दूसरी जगहों का रुख कर रहे हैं। महाराष्ट्र और बुंदेलखंड से सूखाग्रस्त इलाकों से लोगों के पलायन की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

जाहिर है कि इस स्तर पर अगर कोई समस्या लोगों को परेशान कर रही हो तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि यह चुनावी मुद्दा बनेगा। लेकिन फिर भी ये समस्याएं लोकसभा चुनावों में गायब दिख रही हैं। न तो कोई पार्टी अपनी ओर से ये मुद्दे उठाती दिख रही हैं और न ही प्रभावित लोगों द्वारा इन पार्टियों और स्थानीय उम्मीदवारों पर इन मुद्दों पर प्रतिबद्धता दिखाने और इनके समाधान की राह बताने के लिए कोई दबाव बनाया जा रहा है। न ही सिविल सोसाइटी की ओर से पार्टियों पर पर्यावरण को मुद्दा बनाने के लिए प्रभावी दबाव बनाया गया।

पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों में भी पर्यावरण के मुद्दों पर खास गंभीरता नहीं दिखती है। जो बातें पहले भी इन घोषणापत्रों में कही गई हैं, उन्हीं बातों को कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के घोषणापत्रों में दोहराया गया है। किसी निश्चित रोडमैप के साथ पर्यावरण की समस्या से निपटने ही राह भाजपा और कांग्रेस में से किसी भी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में नहीं सुझाई है।

विलुप्त होने के कगार पर 10 लाख प्रजातियां

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट 6 मई, 2019 को आने वाली है। 1,800 पन्नों की इस रिपोर्ट में पर्यावरण में हो रहे बदलावों, इसमें मनुष्य की भूमिका और इससे दूसरी प्रजातियों के लिए पैदा हो रहे खतरों के अलावा जलवायु परिवर्तन के विभिन्न आयामों पर विस्तृत चर्चा की गई है। इस पर चर्चा के लिए दुनिया के 130 देशों के वैज्ञानिक पेरिस में जमा हो रहे हैं।

अभी इस विस्तृत रिपोर्ट का ड्राफ्ट सार्वजनिक हुआ है। 44 पन्नों के इस ड्राफ्ट में बताया गया है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से तकरीबन दस लाख प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि इंसानों ने जिस तरह से सिर्फ अपने हितों का ध्यान रखते हुए संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है, उसकी वजह से इस तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं।

इस ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह कहा गया है कि सिर्फ दस लाख प्रजातियों पर विलुप्त होने का ही खतरा नहीं मंडरा रहा बल्कि तकरीबन 25 फीसदी प्रजातियां दूसरे तरह के खतरों का सामना कर रही हैं। इसमें यह दावा किया गया है कि पिछले एक करोड़ साल में यह दौर ऐसा है जिसमें सबसे तेज गति से प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।

इसकी वजह मुख्य तौर पर मनुष्य की गतिविधियां हैं। मनुष्य की बसावट, कृषि और अन्य जरूरतों की वजह से जंगलों की अंधाधुंध ढंग से नष्ट किया जा रहा है। इससे जानवरों के रहने की जगहें सीमित हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ पेड़-पौधों की प्रजातियां भी विलुप्त होते जा रही हैं। रिपोर्ट में प्रदूषण और जानवरों के अवैध व्यापार को भी मुख्य वजहों के तौर पर रेखांकित किया गया है।

इंसान ने खुद की गतिविधियों से दूसरी प्रजातियों के लिए जो संकट पैदा किए हैं, उसकी आंच खुद उस तक आनी है। इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र की यह ड्राफ्ट रिपोर्ट भी कर रही है। इसमें यह बताया गया है कि इससे खास तौर पर वैसे लोग प्रभावित होंगे जो गरीब हैं और हाशिये पर रहते हुए अपना जीवन जी रहे हैं। क्योंकि उनके पास इन बदलावों के हिसाब से जरूरी बंदोबस्त करने के लिए संसाधन नहीं होंगे।

इसके प्रभावों के बारे में यह भी कहा जा रहा है दीर्घकालिक तौर पर इससे पीने के पानी का संकट पैदा होगा। सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा का संकट होगा। कृषि उत्पादन नीचे जाएगा। इससे खाद्यान्न की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है और दुनिया के कई हिस्सों को खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है।

इस ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इससे समुद्र के पानी में प्रदूषण बढ़ेगा और जो मछलियां निकाली जाएंगी, उनमें प्रोटीन की मात्रा कम होगी। साथ ही उनमें दूसरे तरह के जहरीले रसायन बढ़ेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि जो लोग इन मछलियों को खाएंगे, उन्हें स्वास्थ्य संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

इसमें यह भी कहा गया है कि कई वैसे कीटों पर भी विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है जो परागन का काम करते हैं। अगर ऐसा होता है तो कई पौधों और फूलों का अस्तित्व बचना मुश्किल हो जाएगा।

अब सवाल यह उठता है कि इस स्थिति के समाधान के लिए क्या किया जाए? सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि इंसानी गतिविधियां इस संकट के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए सुधार की शुरुआत भी मनुष्य की गतिविधियों से ही होनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति की विभिन्न प्रजातियों में से मनुष्य भी एक प्रजाति है और प्राकृतिक संसाधनों पर सिर्फ हमारा ही हक नहीं है।

हमें यह भी समझना होगा कि अगर संसाधनों का सही और पर्याप्त इस्तेमाल करें तो इससे प्रकृति का पूरा चक्र बना रहेगा। जब प्रकृति का चक्र सही ढंग से चलता रहेगा तभी मनुष्य भी सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ता रहेगा। लेकिन अगर मनुष्य की गतिविधियों की वजह से प्राकृतिक चक्र गड़बड़ होता है तो इससे पूरी व्यवस्था गड़बड़ हो जाएगी।

जरूरत इस बात की है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से लाखों प्रजातियों पर विलुप्त होने के खतरे को वैश्विक स्तर पर समझा जाए और इसके समाधान के लिए दुनिया के अलग-अलग देश एकजुट होकर काम करें। पर्यावरण समझौतों को लेकर विकसित देशों और विकासशील देशों में विचारों की जो दूरी है, उसे पाटने की जरूरत है।

जैव ईंधन के अपने जोखिम!

पूरी दुनिया में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की जब भी बात चलती है तो जैव ईंधन का नाम भी इसमें आता है। शुरूआत में इसे लेकर पूरी दुनिया में उत्साह का माहौल रहा। लेकिन अब इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

जट्रोफा और मक्के के जरिए ईंधन बनाने की तकनीक अपनाने के प्रति हर देश मोहग्रस्त है। भारत में भी जैव ईंधनों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों में तेजी लाने की बात की जा रही है। इसके लिए देश में नई जैव ईंधन नीति बनाई गई है। देश में जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम हो रहा है।

पर जैव ईंधन के मसले पर हालिया दिनों में हुए अध्ययन के नतीजे हैरान करने वाले हैं। इंग्लैंड के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिक शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जैव ईंधन के उत्पादन से कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की संभावना कम ही है।

जैव ईंधन के उत्पादन के मामले में ब्राजील और अमेरिका अगली कतार में हैं। ब्राजील में अमेजन के जंगल को बहुत विशाल कहा जाता है। इसकी सहायता से वहां के पर्यावरण में संतुलन कायम रहा करता है। पर जैव ईंधन के उत्पादन के लिए इन जंगलों का विनाश किया जा रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है।

वहां की सरकार ने यह एलान किया है कि इस साल जंगलों को उजाड़ने की गति को दोगुना कर दिया जाएगा। यहां यह बताना लाजिमी है कि पेड़ों की कटाई से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाता है। कार्बन उत्सर्जन के मामले में वैश्विक स्तर पर ब्राजील का स्थान चैथा है। इसके बावजूद जैव ईंधन के उत्पादन के लिए पेड़ों की कटाई करके कार्बन उत्सर्जन को कम करने के बजाए बढ़ाया ही जा रहा है।

ब्राजील के वुडस होल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह अमेजन के जंगलों को उजाड़ने के लिए वहां आग लगाई गई उससे इस क्षेत्र की पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ होगी जिसके परिणामस्वरूप कुछ सालों बाद यह इलाका रेगिस्तान में भी तब्दील हो सकता है। आग लगाए जाने की वजह से वहां के कई ऐसे पौधे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं जिनका इस्तेमाल औषधियों के उत्पादन में होता था। यूनिवर्सिटी आॅफ मिनेसोटा के वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि जिस तरह से वैकल्पिक ईंधन के उत्पाद के लिए जमीन तैयार की जा रही है उससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन के नुकसानों की भारपाई करने में तकरीबन चार सौ सालों का वक्त लग जाएगा।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट ने इस बात को उजागर किया है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वैश्विक स्तर पर होने वाली बढ़ोतरी में जैव ईंधन के उत्पादन पर जोर दिया जाना भी एक प्रमुख वजह है। आॅक्सफैम ने भी अपने अध्ययन में बताया है कि जैव ईंधन का माॅडल सफल साबित नहीं हुआ है। लेकिन सरकारें फिर भी इसके उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।

वैकल्पिक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले ईथाइल अल्कोहल के उत्पादन को अमेरिका ने दुगना कर दिया है। वहां की सरकार ने एक दशक के अंदर इसे पांच गुना करने का लक्ष्य रखा है। इस मामले में ब्राजील अमेरिका से आगे है। वहां किसी भी पेट्रोल पंप पर सादा गैसोलिन अब मिलता ही नहीं है। ब्राजील की सड़कों पर दौड़ने वाली 45 फीसद कारों में वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इंडोनेशिया में जंगलों को नष्ट करने के लिए आग लगा दिया गया ताकि उस जमीन से बायोडीजल का उत्पादन किया जा सके। अब इससे भविष्य में पर्यावरण को कितना लाभ पहुंचेगा यह बता पाना तो शायद किसी के लिए संभव नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि पेड़ों को जलाने से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन हुआ। जिससे पर्यावरण की सेहत और खराब होगी।

मक्के से बनाए जाने वाले इथनाल को तो बहुत पहले से ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला बताया जाता है। पर अब सेलुलोज से बनाए जा रहे इथनाल पर भी सवालिया निशान वैज्ञानिक लगा रहे हैं। ऐसे में स्थिति यह दिखती है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ अनाज उपलब्धता की दृष्टि से भी जैव ईंधन सवालों के घेरे में है। ऐसे में जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देने से पहले यह जरूरी है कि इस मामले में व्यापक अध्ययन कराए जाएं और इसके बाद ही इस बारे में आगे बढ़ने का निर्णय लिया जाए।

एक चौथाई स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त पानी भी नहीं!

सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का बखान करते हुए नहीं थकती हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए कार्यों का हवाला देते हुए सरकार एक सांस में कई योजनाएं गिना देती है और फिर अंत में यह भी कहती है कि उसने नई स्वास्थ्य नीति 2017 में लाई और इसके तहत पूरे देश में 1.5 लाख वेलनेस केंद्र खोले जाने हैं और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बढ़ाया जाना है। सरकार बीमा आधारित स्वास्थ्य योजनाओं को भी अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि आज भी स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना कर रहे हैं। इस वजह से यहां आने वाले लोगों का ठीक से ईलाज नहीं हो पा रहा। वहीं दूसरी तरफ बीमा आधारित योजनाओं का लाभ उठाकर निजी अस्पताल अपना कारोबार विस्तार लगातार कर रहे हैं।

इस भयावह स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तैयार की है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए वैश्विक स्तर पर अध्ययन किया गया। इसमें यह बताया गया है कि दुनिया के 25 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पर्याप्त पानी भी उपलब्ध नहीं है। वहीं 20 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां साफ-सफाई के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस वजह से दुनिया के दो अरब से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर मेडिकल कचरे को अलग-अलग करने और फिर उनके निस्तारण के लिए भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कम विकसित देशों में यह स्थिति और भी बुरी है। इन देशों में 45 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ऐसे केंद्रों पर हर साल 1.7 करोड़ महिलाएं अपने बच्चों को जन्म देती हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर किसी बच्चे का जन्म ऐसी जगह पर हो जहां न तो पर्याप्त पानी हो और न ही पर्याप्त साफ-सफाई तो बच्चे और मां पर कई बीमारियों के साथ-साथ जान से हाथ धोने का खतरा भी बना रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस वजह से हर साल तकरीबन दस लाख मौतें हो रही हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पानी और साफ-सफाई में कमी की वजह से नवजात बच्चों और बच्चों को जन्म देनी वाली महिलाओं में जो संक्रमण होता है, उससे सबसे अधिक प्रभावित कम विकसित देश और विकासशील देश हैं।

नवजात बच्चों की कुल मौतों में इस वजह से होने वाली मौतों की हिस्सेदारी 26 फीसदी है। जबकि बच्चों के जन्म देने या इसके थोड़ी ही समय बाद पूरी दुनिया में जितनी महिलाओं को जान गंवानी पड़ रही है, उसमें पर्याप्त पानी और साफ-सफाई के अभाव के माहौल में बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है।

भारत के भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पानी और साफ-सफाई का अभाव स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। अगर भारत के संदर्भ में इस तरह का कोई अध्ययन हो तो इससे भी कहीं अधिक भयावह आंकड़े सामने आ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों का तो और भी बुरा हाल है। यहां तक की प्रमुख शहरों के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त पानी और साफ-सफाई नहीं है। दूसरी बुनियादी सुविधाओं की भी यही स्थिति है।

ऐसे में इस दिशा में काम होना चाहिए कि कैसे भारत के स्वास्थ्य केंद्रोें पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। क्योंकि यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस भी समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य की बुरी स्थिति रहती है, वह समाज न तो आर्थिक तौर पर अच्छा प्रदर्शन कर पाता है और न ही मानव विकास के पैमाने पर उसका प्रदर्शन सुधरता है।

क्या सतत विकास लक्ष्यों को भारत हासिल कर पाएगा?

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर भारत को 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना है तो उसे जीडीपी का दस फीसदी खर्च करना पड़ेगा
2015 में पूरी दुनिया ने मिलकर 17 सतत विकास लक्ष्य तय किए थे। इन्हें 2030 तक हासिल किया जाना है। इसके तहत गरीब और भूखमरी मिटाने से लेकर बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर पर्यावरण, बेहतर रोजगार, दुनिया में अमन सुनिश्चित करने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं।
इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए दुनिया के देशों के बीच आपसी सहयोग का लक्ष्य भी रखा गया था। जिन देशों ने सतत विकास लक्ष्यों ;एसडीजीद्ध को हासिल करने का लक्ष्य रखा है, वे सभी देश संयुक्त राष्ट्र को हर साल एक रिपोर्ट सौंपते हैं। इसमें यह बताया जाता है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के मोर्चे पर कितनी प्रगति हुई है।
भारत ने एसडीजी से संबंधित जो रिपोर्ट दी है, उससे अब तक की भारत की प्रगति बेहद उत्साहजनक नहीं है। कई मोर्चे ऐसे हैं जिन पर भारत को और ठोस ढंग से काम करने की जरूरत है।
वार्षिक रिपोर्ट को पिछले दिनों में संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्था यूनाइटेड नेशंस इकाॅनोमिक ऐंड सोशल कमिशन फोर एशिया ऐंड दि पैसिफिक ने जारी किया। इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अगर भारत को 2030 तक गरीबी मिटानी है तो प्रति व्यक्ति हर दिन 140 रुपये खर्च करने होंगे। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कुल खर्चे के मुकाबले दोगुना है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अगर भारत 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर गंभीर है तो उसे अपनी जीडीपी का 10 फीसदी खर्च करना होगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के पास इतने पैसे एसडीजी को हासिल करने के लिए खर्च करने को हैं?
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में इस संदर्भ में भारत का जिक्र करते हुए कहा गया है कि भारत के बैंकों की बढ़ती गैर निष्पादित संपत्तियां यानी एनपीए एक बहुत बड़ी चिंता है। क्योंकि इस वजह से देश की आर्थिक स्थिति खराब होगी और इतने पैसे नहीं रहेंगे कि भारत सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के पर्याप्त पैसे खर्च कर पाए।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जितनी गरीबी है, उसे देखते हुए भारत को अपनी जीडीपी का तकरीबन 10 फीसदी सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने पर खर्च करना होगा। जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को संयुक्त तौर पर इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जीडीपी का पांच फीसदी खर्च करना होगा।
भारत में गरीबी को लेकर अलग-अलग आंकड़े हैं। सी. रंगराजन समिति के आंकड़ों का इस्तेमाल सरकार के स्तर पर हो रहा है। इस समिति के मुताबिक देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों की संख्या 36.3 करोड़ है। जाहिर है कि अगर इतनी बड़ी आबादी की गरीबी दूर करनी है तो इसके लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा और काफी पैसे खर्च करने होंगे।
सच्चाई तो यह है कि भारत में चुनावी वादे करते वक्त हर पार्टी कहती है कि वह गरीबी के खिलाफ जंग छेड़ेगी और गरीबी से भारत को मुक्त करेगी। देश ने हर दल का शासन देख लिया है। लेकिन गरीबी से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है।
इस रिपोर्ट में भारत जैसे देशों को आगाह करते यह भी लिखा गया है कि आर्थिक विकास पर बहुत अधिक जोर देने से सतत विकास नहीं होगा और इससे भविष्य का विकास नकारात्मक ढंग से प्रभावित होगा। इससे समाज में गैरबराबरी बढ़ेगी और पर्यावरण को नुकसान होगा। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आर्थिक असमानता बढ़ने से आर्थिक विकास की अवधि कम होगी।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के नीति निर्धारक इन चेतावनियों को समझते हुए भारत को सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के मार्ग पर प्रभावी ढंग से आगे ले जाने के लिए जरूरी निर्णय लेंगे या फिर जिस तरह से इस मोर्चे पर 2015 से 2019 तक काम हुआ है, वही रवैया आगे भी बरकरार रहेगा।

जलवायु परिवर्तन कार्य योजना कितनी प्रभावी साबित हो रही है?

जलवायु परिवर्तन को लेकर पूरी दुनिया में चिंता जताई जा रही है। कई स्तर पर इससे निपटने के प्रयास हो भी रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इससे निपटने के लिए कुछ समझौते हुए हैं। इन समझौतों के तहत विभिन्न देश अपने-अपने स्तर पर भी इस समस्या से निपटने के प्रयास कर रहे रहे हैं और आपस में मिलकर भी।
इस समस्या से निपटने के लिए कई देशों ने अपनी एक कार्ययोजना बनाई है। भारत ने जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए जून, 2008 में जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना को लागू करने का काम किया था।
उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा शुरू की गई इस कार्य योजना के तहत आठ मिशन तय किए गए थे। इनमें राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन और राष्ट्रीय हरित भारत मिशन प्रमुख हैं।
अब सवाल यह उठता है कि इस कार्य योजना के लागू होने के दस साल से भी अधिक वक्त गुजरने पर इसके तहत कितना काम हुआ है। क्या इस योजना के तहत जिन लक्ष्यों को हासिल करने किए जाने की उम्मीद थी, उन्हें हासिल किया जा सका है?
इन सवालों का जवाब तलाशने के लिए इस मामले की पड़ताल संसद की प्राक्कलन समिति ने की। पिछले दिनों इस समिति की रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट में विभिन्न मिशन के तहत हुई प्रगति के बारे में विस्तार से बताया गया है।
सौर मिशन के संदर्भ में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सूर्य की किरणों से 2021-22 तक एक लाख मेगावाॅट बिजली बनाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसे हासिल करने के लिए जितने निवेश की जरूरत है उतना निवेश नहीं हो पा रहा है। समिति का अनुमान है कि इस लक्ष्य को हासिल करने में तकरीबन छह लाख करोड़ रुपये का निवेश होना है लेकिन इसके मुकाबले अब तक निवेश का स्तर काफी नीचे है।
जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत चल रहे राष्ट्रीय जल मिशन के जरिए देश भर में जल की स्थिति को लेकर एक व्यापक डाटाबेस तैयार किया जाना था। लेकिन प्राक्कलन समिति ने इस मिशन के तहत हासिल किए गए लक्ष्यों को लेकर सवाल उठाए हैं। इसका कहना है कि इस मिशन के तहत जल और इसके भंडारण से संबंधित जो आंकड़े जमा किए जा रहे हैं, उनके जमा करने की तकनीक इतनी पुरानी है कि इन आंकड़ों पर यकीन करना मुश्किल है। समिति ने यह भी कहा कि जानकारियां जुटाने की पुरानी तकनीक की वजह से न सिर्फ संसाधनों की बर्बादी हो रही है बल्कि इससे समय भी खराब हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के तहत स्थायी कृषि के लिए भी एक राष्ट्रीय मिशन है। इस मिशन के जरिए कृषि के विभिन्न आयामों पर ध्यान देते हुए उन्हें सुधारा जाना है। प्राक्कलन समिति ने इस बात पर सवाल उठाया है कि इसमें किसानों की आय सुरक्षा को क्यों नहीं शामिल किया गया। समिति ने यह भी कहा कि फसल बीमा योजनाएं और न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था से खेती लाभकारी नहीं बनी है।
समिति ने कहा है कि सरकार उसकी चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए जलवायु परिवर्तन पर बनी राष्ट्रीय कार्य योजना के क्रियान्वयन को ठीक करने के लिए जरूरी कदम उठाए और इसके बारे में समिति को अवगत कराए। कुल मिलाकर इस रिपोर्ट से यही पता चलता है कि बड़ी उम्मीदों से बनी जलवायु परिवर्तन कार्य योजना ने अपने पहले दस साल के सफर में कोई बड़ी उल्लेखनीय उपलब्धि नहीं हासिल की है।

पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड इतिहास के सबसे उच्चतम स्तर पर

पर्यावरण की बिगड़ती सेहत को लेकर पूरी दुनिया में चिंता जताई जा रही है। इस समस्या से निपटने के लिए बड़ी-बड़ी बातें भी की जा रही हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए कई अंतरराष्ट्रीय समझौते भी हुए हैं। सबसे हालिया और महत्वकांक्षी समझौता पेरिस समझौता है। इसके तहत विभिन्न देशों ने अपने-अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में कमी के साथ-साथ अन्य जरूरी उपाय अपनाकर पर्यावरण को बचाने की बात कही है।
लेकिन अमेरिका के इस समझौते के बाहर होने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या पेरिस समझौता पर्यावरण की सेहत सुधारने की दिशा में उपयोगी साबित हो पाएगा। अंतरराष्ट्रीय पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर चिंता की एक वजह यह भी है कि विकसित देशों ने पर्यावरण की रक्षा के लिए विकासशील देशों को जो आर्थिक सहयोग देने की बात कही थी, वह वादा ठीक से पूरा होता नहीं दिख रहा है।
पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों को इस रवैये को देखते हुए ऐसा लगता है कि दुनिया के बड़े देश अब भी इस मसले पर उतने गंभीर नहीं हैं जितना होना चाहिए। इंसान और देश चाहे गंभीर हो या नहीं लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि पर्यावरण की सेहत बेहद गंभीर हो गई है।
इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा पर्यावरण में बढ़कर इतनी अधिक हो गई है जितनी अधिक कभी नहीं थी। अमेरिका की एक संस्था स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन आॅफ ओसियानोग्राफी ने पिछले दिनों यह घोषणा की कि हवाई में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ते 411.66 पीपीएम हो गया।
इस संस्था ने बताया कि पिछले साल हरित गैसों का उत्सर्जन रिकाॅर्ड मात्रा में हुआ था। पिछले साल जितना उत्सर्जन हुआ था, उतना इतिहास में पहले किसी और साल में नहीं हुआ। इस वजह से लोगों को यह डर सता रहा था कि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच सकती है। अब यह डर सही साबित हुआ।
जिस अमेरिकी संस्था ने यह पता लगाया है कि कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ाने में अहम योगदान जीवाश्म ईंधन का है। इस संस्था का यह भी कहना है कि पिछले साल हरित गैस के रिकाॅर्ड उत्सर्जन के बावजूद दुनिया ने सबक नहीं लिया। इस वजह से संस्था को अंदेशा है कि कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर बढ़ते हुए 415 के पार जा सकता है।
पहले वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड इतनी भारी मात्रा में नहीं थी। कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में उल्लेखनीय बढ़ोतरी आज के 10,000 साल पहले कृषि के विकास के साथ शुरू हुई। लेकिन उस वक्त भी इसकी वृद्धि की गति इतनी अधिक नहीं थी कि यह प्रकृति के लिए खतरा बन जाए।
कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा सबसे तेज गति से तब बढ़ी जब दुनिया में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी और पूरी दुनिया तेजी से औद्योगिक विकास की ओर बढ़ी तो कार्बन डाइआॅक्साइड की मात्रा भी तेजी से बढ़ने लगी। एक बार जो तेजी कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में आई तो फिर यह घटने का नाम नहीं ले रही है।
हाल के सालों में में इससे काफी तेजी आई है। इस वजह से वैज्ञानिक कह रहे हैं कि पूरा ब्रह्मांड उस ओर बढ़ रहा है जहां से वापसी संभव नहीं है और अगर इस प्रक्रिया को नहीं रोका गया तो कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा मानवता के लिए खतरा बन जाएगी। जाहिर है कि अगर इस स्थिति को बदलना है और कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा एक ऐसे स्तर पर रखनी है कि प्रकृति का चक्र अपने हिसाब से चलता रहे तो पूरी दुनिया को एक स्वर में पूरी ताकत से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना होगा।

किसानों ने प्रधानमंत्री को जेवर हवाईअड्डे की आधारशिला नहीं रखने दी

10 मार्च, 2019 को जब शाम पांच बचे चुनाव आयोग ने 2019 के लोकसभा चुनावों की घोषणा की तो उसके कुछ वक्त पहले तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन कर रहे थे। इसके ठीक एक दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से सटे नोएडा में मेट्रो लाइन के विस्तार का उद्घाटन किया था। इसके पहले उन्होंने ग्रेटर नोएडा में कई परियोजनाओं की शुरुआत की थी। प्रधानमंत्री की योजना में ग्रेटर नोएडा से सटे जेवर में प्रस्तावित नए हवाई अड्डे की आधारशिला रखना भी शामिल था। लेकिन यहां के किसानों के विरोध ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया।
यही वजह है कि प्रधानमंत्री जब विभिन्न परियोजनाओं की शुरुआत के लिए ग्रेटर नोएडा पहुंचे तो भले ही वे जेवर हवाई अड्डे की आधारशिला नहीं रख पाए लेकिन उन्होंने अपने संबोधन में नए हवाई अड्डे के फायदों को गिनाया। उन्होंने बताया कि नवा हवाई अड्डा बन जाने से स्थानीय लोगों को कितना फायदा होगा।
हवाई अड्डे की आधारशिला प्रधानमंत्री के हाथों रखवाना भारतीय जनता पार्टी की योजना में कितना अहम था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि स्थानीय सांसद महेश शर्मा सार्वजनिक तौर पर पहले यह कह चुके थे कि 2019 के लोकसभा चुनावों में उनके लिए जेवर हवाई अड्डे का काम शुरू करवाना एक बड़ी कामयाबी होगी।
अब यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर राजनीतिक दृष्टि से इतनी महत्वपूर्ण परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री क्यों नहीं रख पाए? दरअसल, जेवर हवाई अड्डा बनाने में जिन किसानों की जमीन जा रही है, उनमें से 200 से अधिक किसान सरकार द्वारा तय दर पर अपनी जमीन नहीं देना चाह रहे हैं। ये किसान 170 दिनों से अधिक से अपना विरोध जाहिर करने के लिए धरने पर बैठे हैं। इनका कहना है कि ग्रामीण जमीन के अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि ऐसी जमीन के लिए सर्किल रेट से चार गुना अधिक पैसे किसानों को दिए जाएंगे लेकिन सरकार उन्हें जमीन के बदले इतने पैसे नहीं दे रही है।
सरकार पर विभिन्न स्तर पर गुहार लगाने के बावजूद जेवर हवाई अड्डा परियोजना से प्रभावित किसानों की मांग नहीं मानी गई। इसके बाद इन किसानों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया। वहां इन किसानों ने जमीन अधिग्रहण के संबंध में याचिका डाली है। इससे जेवर हवाई अड्डे के लिए जमीन अधिग्रहण में देरी हो रही है। यही वजह है कि आखिरी समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस हवाई अड्डे की आधारशिला रखने की अपनी योजना को छोड़ना पड़ा।
जेवर हवाई अड्डा परियोजना में जिन किसानों की जमीन जा रही है, उन किसानों ने सरकार से अपनी जमीन की सही कीमत हासिल करने के लिए जेवर हवाई अड्डा संघर्ष समिति बनाई है। इसी समिति के बैनर तले जेवर के किशोरपुर गांव में 200 से अधिक किसान विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इन किसानों ने जो याचिका दायर की है, उस पर तकरीबन 250 किसानों के दस्तखत हैं।
इस परियोजना के लिए पहले जिन किसानों ने जमीन देने को लेकर अपनी सहमति दी थी, उनमें से भी कई किसानों ने अपनी सहमति वापस ले ली है। यहां असल विवाद जमीन की कीमत को लेकर है। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि हवाई अड्डा बनाने में जो जमीन जा रही है, वह उत्तर प्रदेश सरकार की अधिसूचना के हिसाब से शहरी जमीन है। इसलिए सरकार का कहना है कि वह सर्किल दर से तीन गुना अधिक कीमत मुआवजा के तौर पर देगी। जबकि संघर्ष कर रहे किसानों का कहना है कि हमारे गांव की जमीन शहरी कैसे हो सकती है, हमें तो भूमि अधिग्रहण कानून के हिसाब से ग्रामीण जमीन के लिए सर्किल दर से चार गुना अधिक पैसे चाहिए।
इस संघर्ष के अंत में इन किसानों से सरकार किस दर पर समझौता करती है, यह तो भविष्य में ही पता चलेगा। लेकिन यह जरूर सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई भी बड़ी परियोजना अगर विकसित हो रही है और उसमें किसानों की खेती की जमीन जा रही हो तो उन्हें कानून के हिसाब से उचित मुआवजा मिलना चाहिए। ऐसा न हो कि सरकार के स्तर पर नियमों में फेरबदल करके किसानों को उनका हक नहीं मिले।

क्या भारत में सौर ऊर्जा क्षमता विस्तार की गति धीमी हो रही है?

भारत ने 2022 तक 1,75,000 मेगावाॅट बिजली का उत्पादन नवीकरणीय स्रोतों से करने का लक्ष्य रखा है। इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी 1,00,000 मेगावाॅट रखी गई है। इसका मतलब यह हुआ कि भारत ने अपने नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को हासिल करने की योजना कें केंद्र में सौर ऊर्जा को रखा है।

यह बात सच है कि पिछले कुछ सालों में सौर ऊर्जा के उत्पादन में तेजी भी देखी गई। जहां कुछ साल पहले तक सौर ऊर्जा का उत्पादन काफी कम हो रहा था, वह बढ़ते हुए 2018 के दिसंबर में बढ़कर 25,000 मेगावाॅट के पार चला गया। ऐसे में कुछ लोगों को यह लग सकता है कि इस मामले में भारत प्रगति कर रहा है और 2022 तक सौर ऊर्जा से 1,00,000 मेगावाॅट बिजली उत्पादन का लक्ष्य हासिल कर सकता है।

लेकिन सौर ऊर्जा के मामले में क्षमता विस्तार की गति को देखते हुए 2022 के लक्ष्यों को भारत द्वारा हासिल किए जाने को लेकर वैश्विक स्तर पर काम करने वाली विश्लेषण एजेंसियां अब सवाल खड़े कर रही हैं। हाल ही में ऐसी एक एजेंसी क्रिसिल ने एक रिपोर्ट जारी की है।

किसिल की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2022 तक भारत सौर ऊर्जा से 1,00,000 मेगावाॅट बिजली उत्पादन के लक्ष्य से तकरीबन 40 फीसदी तक पीछे रह सकता है। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जिस गति से सौर ऊर्जा का क्षमता विस्तार हो रहा है, उससे 2022 तक भारत के सौर ऊर्जा उत्पादन में अभी के स्तर से 44,000 से 46,000 मेगावाॅट का अतिरिक्त उत्पादन होगा। लेकिन इस स्थिति में भी 1,00,000 मेगावाॅट के उत्पादन लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा सकेगा।

भारत में सौर ऊर्जा क्षमता विस्तार में आई कमी का अंदाज पिछले दो साल के आंकड़ों की तुलना से लगाया जा सकता है। 2017-18 में जहां सौर ऊर्जा में 9,000 मेगावाॅट का क्षमता विस्तार हुआ था। वहीं 2018-19 में यह आंकड़ा 7,000 मेगावाॅट पर रहने की उम्मीद है।

क्रिसिल ने भारत में सौर ऊर्जा में क्षमता विस्तार की धीमी गति के लिए केंद्र सरकार की कुछ नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। जुलाई, 2018 में केंद्र सरकार ने आयातित सोलर सेल पर एंटी-डंपिंग कदम उठाते हुए सुरक्षा कर लगाया। इसके तहत पहले एक साल में आयातित सौर सेल पर 25 फीसदी की दर पर कर वसूला जाएगा। इसके बाद के छह महीने के लिए यह दर 20 फीसदी होगी और इसके बाद के छह मीने के लिए 15 फीसदी।

क्रिसिल की रिपोर्ट बताती है कि सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया था क्योंकि भारत के बाजारों में सोलर सेल वाली कंपनियों की सुरक्षा हो सके। दरअसल, हो यह रहा था कि चीन और मलेशिया से आने वाले सोलर सेल भारत में उत्पादित सोलर सेल के मुकाबले भारत के बाजारों में सस्ते बिक रहे थे। जाहिर है कि इससे भारत की कंपनियों को नुकसान हो रहा था।

क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है आने वाले समय में इस कर में कमी आएगी और इस वजह से सौर ऊर्जा उत्पादन के क्षमता विस्तार में तेजी आ सकती है। क्रिसिल का मानना है कि सरकार द्वारा लगाए गए इस शुल्क की वजह से सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए इकाइयों को लगाने में 10 से 15 फीसदी अतिरिक्त खर्च हो रहे हैं। इस क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां इस अतिरिक्त बोझ को उठाने से बच रही हैं।

क्रिसिल ने अपनी रिपोर्ट में आने वाले सालों में सौर ऊर्जा के उत्पादन को लेकर जो तस्वीर पेश की है, उसके मुताबिक 2019-20 में 10,000 मेगावाॅट का क्षमता विस्तार संभावित है। क्रिसिल का मानना है कि 2020-21 में यह आंकड़ा 12,000 मेगावाॅट पर पहुंच सकता है।

लेकिन इसके बावजूद 2022 तक 1,00,000 मेगावाॅट की सौर ऊर्जा क्षमता को हासिल करना संभव नहीं हो पाएगा। ऐसे में अगर सरकार सौर ऊर्जा उत्पादन के अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है तो उसे सौर ऊर्जा उत्पादन में आई सुस्ती के कारणों का विश्लेषण करके इसके समाधान की दिशा मे ठोस कदम उठाना होगा।

क्योंकि सौर ऊर्जा से संबंधित लक्ष्यों को हासिल करना सिर्फ एक लक्ष्य को पूरा करने भर नहीं है बल्कि इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ भारत ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में बढ़ेगा। इससे पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करना तो आसान होगा ही साथ ही साथ इससे ऊर्जा संबंधित जरूरतों के लिए भारत की पारंपरिक स्रोतों पर निर्भरता घटेगी।

क्या देश में भयानक सूखे की आहट अभी से मिलने लगी है?

मार्च का महीना अभी खत्म भी नहीं हुआ। अभी भी देश के कई हिस्सों में हल्की सर्दी का अहसास बचा हुआ है। गर्मी अभी आई भी नहीं। लेकिन देश के कई हिस्सों में भयानक सूखे की आहट अभी से मिलने लगी है।

भारत में सूखे की स्थिति पर वास्तविक समय में नजर रखने का काम गांधीनगर का भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान करता है। हाल ही में इसने बताया कि देश का आधा हिस्सा अभी ही सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से 18 फीसदी हिस्से में स्थिति बेहद गंभीर है। संस्थान का कहना है कि इससे गर्मियों में जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।

संस्थान का कहना है कि झारखंड, दक्षिणी आंध्र प्रदेश, गुजरात, उत्तरी तमिलनाडु और अरुणाचल प्रदेश के हिस्से सूखे की चपेट में आ गए हैं। इस काम में लगे वैज्ञानिक मान रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है और सूखा पड़ने की वजह से भूजल स्तर पर भी काफी बुरा प्रभाव पड़ेगा। इससे अधिक जल के इस्तेमाल से पैदा होने वाली फसलों का उत्पादन मुश्किल हो जाएगा। पंजाब जैसे राज्य में धान की खेती मुश्किल हो जाएगी।

संस्थान ने अभी की सूखे की स्थिति का जो मूल्यांकन किया है, उसमें बताया है कि सूखे से सबसे अधिक परेशानी गरीब लोगों को होगी। इस अध्ययन में लगे विशेषज्ञों का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए और भारत के एक बड़े हिस्से को हर साल सूखे की मार से बचाने के लिए यह जरूरी है कि सरकार दीर्घकालिक कदम उठाए। सिर्फ सूखा पड़ने पर पीड़ितों को राहत दे देने भर से काम नहीं चलेगा।

सूखे का प्रमाण नदियों की स्थिति से भी मिल रहा है। कई राज्यों में नदियों का प्रवाह न सिर्फ घटा है बल्कि कई नदियों में तो प्रवाह या तो पूरी तरह खत्म हो गया है या फिर नाम मात्र का बचा है। अगर अभी यह स्थिति है तो फिर जब भयानक गर्मी पड़ेगी तब क्या होगा, इसका अंदाज करके ही भय पैदा होता है।

पर्यावरण के लिए काम करने वाली मुदिता विद्रोही ने ट्विटर पर मध्य प्रदेश और गुजरात से संबंधित कुछ जानकारियां साझा की हैं। इसमें उन्होंने बताया है कि नर्मदा में अधिकांश जगहों पर पानी नहीं है। उनका कहना है कि अधिकांश जगहों पर नदी में एक बूंद भी पानी नहीं है। वे इस पर हैरानी जताते हुए आशंका व्यक्त करती हैं कि अभी यह स्थिति है तो गर्मी में क्या हाल होगा!

इसके अलावा उन्होंने ट्विटर पर अहमदाबाद के पास नर्मदा नदी के बारे में भी जानकारियां भी साझा की हैं। उन्होंने बताया है कि एक तरफ तो अहमदाबाद शहर में नर्मदा में कृत्रिम रूप से जल प्रवाह बनाए रखा गया है लेकिन शहर के बाहर नर्मदा की काफी खराब हालत है। उन्होंने अहमदाबाद के बाहर की नर्मदा की तस्वीरें साझा की हैं जिनमें नदी पूरी तरह से सूखी हुई दिख रही है।

मुदिता विद्रोही ने गुजरात के भावनगर जिले की भी एक तस्वीर साझा की है। इसमें पानी में समाहित रहने वाली जमीन पूरी तरह से सूखी दिख रही है और वहां प्रवासी पक्षी दिख रहे हैं। उन्होंने इन पक्षियों के बारे में कहा है कि पानी नहीं है तो फिर ये पक्षी गर्मियों में कैसे बचे रहेंगे। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि इस सूखे का सामना आम लोग कैसे करेंगे।