आ गया मानसून, मगर सरकार ने खारिज किया स्काइमेट का दावा

इस साल मानसून को लेकर विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। भारत सरकार का मौसम विभाग और देश की प्रमुख मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काइमेंट मानसून को लेकर अलग-अलग दावें कर रहे हैं।

स्काइमेट के अनुसार, मानसून 30 मई को केरल पहुंच चुका है। बंगाल की खाड़ी में उठे सुपर साइक्लोन अंपन के बावजूद मानसून ने दो दिन पहले ही केरल में दस्तक दे दी। राज्य में कई जगह बारिश शुरू हो चुकी है। स्काइमेट ने केरल समेत पश्चिमी तटों पर भारी बारिश की संभावना जताई है।

उधर, केंद्र सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन ने मानसून के केरल पहुंचने की खबर को गलत करार दिया है। उनका कहना है कि मानसून अभी केरल नहीं पहुंचा। मौसम विभाग के मुताबिक, एक जून से मानसून के केरल पहुंचने की स्थितियां बन जाएंगी। मौसम विभाग पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत काम करता है।

इस साल स्काइमेट ने मानसून के समय से पहले 28 मई को केरल पहुुंचने की संभावना जताई थी। कंपनी ने इसमें 2 दिन का एरर मार्जिन दिया है। जबकि मौसम विभाग ने मानसून के सामान्य रहने का अनुमान देते हुए 1 जून को केरल पहुंचने की उम्मीद जताई थी।

स्काइमेट मुताबिक, मानसून आगमन की घोषणा के लिए कुछ तय मापदंड होते हैं। इन मापदण्डों में भूमध्य रेखा के उत्तर में यानी भारत की तरफ वायुमंडलीय स्थितियों में बदलाव और लक्षद्वीप, केरल तथा कर्नाटक में बारिश प्रमुख हैं। ये सभी मापदंड पूर्ण हो रहे हैं। खासतौर पर बारिश, आउटगोइंग लॉन्गवेव रेडिएशन (ओएलआर) वैल्यू और वायुगति उस स्थिति में पहुंच चुकी हैं जब मानसून के आगमन की घोषणा की जा सके।

स्काइमेट के अनुसार, मुंबई और उपनगरीय इलाकों में 2 से 4 जून के बीच अच्छी बारिश होने के आसार हैं। इस दौरान कोंकण गोवा के तटीय भागों में भारी बारिश की भी संभावना है।

हाल के वर्षों में कई बार मौसम विभाग की बजाय प्राइवेट कंपनी का अनुमान सही निकला। यही वजह है कि मौसम पूर्वानुमान सरकारी विभाग और प्राइवेट एजेंसी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। हालांकि, सरकारी विभाग होने केे नाते अंतत: मौसम विभाग की बात ही आधिकारिक मानी जाएगी।

 

जैव-विविधता बचाने के लिए 2019 का संदेश

वर्ष 1993 में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली की दूसरी मिटिंग में विश्व के सभी देशों में जैव-विविधता के प्रति समाज को सचेत करने के लिए तय किया गया कि वर्ष में एक ऐसा भी दिन होना चाहिए जिस दिन पूरी दुनिया जैव-विवधता के संबंध में चिंतन करे और उसको बचाने के उपायों को अमल में लाने का कार्य करे। इसी चर्चा के के तहत तय किया गया कि प्रत्येक वर्ष 22 मई को विश्व जैव-विविधता दिवस मनाया जाएगा और वर्ष 2002 से लगातार यह दिवस मनाया भी जा रहा है। जिसमें कि प्रत्येक वर्ष जैव-विविधता से संबंधित एक अलग विषय रखा जाता रहा है। यूनाइटेड नेशंस के जैव-विविधता गुडविल दूत एडवर्ड नोरटन के अनुसार आज विश्व के मानव की विभिन्न पर्यावरण विरोधी गतिविधियों के कारण जंगल कम होते जा रहे हैं। ऐसे में वर्ष 2019 हमें यही संदेश देता है कि हमें अपने जंगलों पर भी ध्यान देना चाहिए।

रमन कांत त्यागी

आज बेढंगे रहन-सहन के कारण सम्पूर्ण जैव-विविधता खतरे में आ गई है। जैव-विविधता चक्र चरमराता दिख रहा है। आज जिस प्रकार डायनासोर के बारे में हम कहते हैं कि कभी ऐसा कोई जीव भी पृथ्वी पर रहा होगा। शायद इसी प्रकार आज मौजूद जीव-जन्तुओं के बारे में भी भविष्य की पीढ़ियां कहा करेंगी। गिद्ध, मोर, शेर, गुरशल, छोटी चिड़िया, कव्वे, कोयल, बगुले, तोता व और न जाने कितने छोटे-बड़े कीट-पतंगे व जीव-जन्तु बहुत-से इलाकों से लुप्त हो चुके हैं या फिर लुप्त होने के कगार पर हैं। खेतों से किसान मित्र केंचुए लगभग गायब हो चुके हैं तथा जंगलों में जानवर कम हो रहे हैं। शायद ही कोई ऐसी सड़क होगी जिस पर प्रतिदिन एक या उससे अधिक जंगली जानवर  (कुत्ता, बिल्ली, गीदड़, भेडिया व लोमड़ी आदि) वाहनों से कुचरकर न मरते हों। कृषि में मशीनों के चलते खेतों की जुताई हेतु बैल तो किसी ही विरले किसान के पास मिलते हैं। देश भर के विभिन्न सुरक्षित जंगलों में आने वाले प्रवासी पक्षियों के आवागमन में कमी आई है। कुछ अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययनों की मानें तो अंटार्कटिका में रहने वाले भालू व पेंगविन भी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। जंगल का राजा शेर जंगलों में मानव की बढ़ती अवैध दखल के कारण अपना अस्तित्व बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। देश के अनेक वन क्षेत्रों से शेर समाप्त हो चुके हैं। यह दुःखद ही है कि जिन जंगलों में शेरों का राज होता था वहां शेर बाहर से लाकर छोड़े जा रहे हैं। हस्तिनापुर  के जंगल में विभिन्न दुर्लभ प्रजातियों चंदन आदि के पेड़ हुआ करते थे, लेकिन आज इस पूरे करीब 400 वर्ग किलोमीटर के जंगल में एक भी चंदन का पेड़ नहीं बचा है। सब अधिकारियों की मिलीभगत के चलते लालच की भेट चढ़ चुके हैं।

कृषि के सन्दर्भ में अगर देखें तो किसानों द्वारा दलहन व तिलहन की पैदावार बहुत कम कर दी गई है। यही कारण है कि दालों व तेलों का आयात दूसरे देशों से किया जा रहा है। जंगलों में पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां या तो समाप्त हो गई हैं या फिर उनको पहचानने वाले नहीं बचे हैं, जिस कारण से पुरातन ज्ञान भी समाज से विलुप्त हो रहा है। पहले गांव कस्बे के नीम-हकीम जंगल से अपने ज्ञान के आधार पर औषधीय पौधे चुनकर लाते थे तथा गांव-देहात के समाज को होने वाली बीमारियों का इलाज उनसे करते थे। पशुओं को जंगल में चराने ले जाया जाता था तो पशुओं द्वारा चरी गई घास से पशुओं की स्वयं की बीमारियां ठीक हो जाया करती थीं। गाय के दूध में औषधीय गुणकारी तत्व मिलते थे, लेकिन अब न तो इतने पशु बचे हैं कि उनको चराने के लिए ले जाया जाए और न ही चराने वाले।

यह सब इसलिए अधिक हो रहा है क्योंकि जिस बकरी को शेर का भोजन बताया जाता है उसे मनुष्य खा रहा है। यही नहीं मनुष्य की जीभ का स्वाद बनने से शायद ही कोई जीव-जन्तु बचा हो। ऐसे में जैव-विविधता को बचाने की आखिर कल्पना कैसे की जा सकती है? समाज द्वारा प्रकृति के साथ खिलवाड़ करते हुएं एक घोर पाप यह किया जा रहा है कि गाय से उसके बगैर बियाहे ही दूध निकालने की व्यवस्था की जा रही है। ऐसा पशुओं के चिकित्सकों द्वारा अपनी कथित पढ़ाई व कुछ दवाईयों के दम पर किया जा रहा है।

 अगर यह सिलसिला इसी प्रकार चलता रहा तो वर्तमान में चरमरा चुका जैव-विविधता चक्र भविष्य में पूरी तरह से टूट जाएगा। जैव-विविधता को बनाए रखना इसलिए आवश्यक है क्योंकि हम किसी एक चीज पर निर्भर नहीं रह सकते। हमारे चारों ओर के वातावरण में जो मौजूद विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु व पेड़-पौधे उतने ही आवश्यक हैं जितना कि हमारा दोनों समय भोजन करना और पानी पीना। लेकिन शायद हम भूल बैठे हैं कि जिन तत्वों पर हमारा जीवन टिका है, जब वे ही नहीं होंगे तो जीवन भी नहीं होगा।

 

(लेखक नैचुरल एन्वायरन्मेंटल एजुकेशन एंड रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक हैं)

 

 

 

पक्षियों की कब्रगाह बनी सांभर झील, इलाज पशु चिकित्सकों के भरोसे!

राजस्थान की मशहूर सांभर झील में हजारों पक्षियों की मौत की वजह का अभी तक पता नहीं चला है। राजस्थान हाईकोई ने भी प्रवासी पक्षियों की मौत का संज्ञान लेते हुए वन और पर्यावरण विभाग से जवाब तलब किया है।

इस मामले ने देश-दुनिया के वन्यजीव प्रेमियों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है। राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी प्रवासी पक्षियों की मौत पर चिंता जताते हुए जांच के आदेश दिए हैं। मृत पक्षियों के नमूनों को जांच के लिए भोपाल के नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हाई सिक्‍योरिटी एनिमल डिजीजेज (NHISAD) भेजा गया है, जिसकी रिपोर्ट का इंतजार है। कई दिन बीत जाने के बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है।

राजस्थान के वन और पशुचिकित्सा विभाग के अधिकारी मामले को समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मौके पर पहुंची जानी-मानी पर्यावरण पत्रकार बहार दत्ता ने वहां जो देखा, वह काफी हैरान करने वाला है। बहार दत्त ने ट्वीट किया कि सांभर झील में पक्षियों की मौत का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। वन्यजीव समूह कहां हैं? यहां विशेषज्ञ वन्यजीव चिकित्सकों और टॉक्सिकॉलजिस्ट की जरूरत है। जो डॉक्टर हैं वे मवेशियों का इलाज करते हैं। पर्यावरण से जुड़ी इतनी बड़ी घटना को लेकर यह स्थिति हैरान करने वाली है। स्थानीय लोग भी कई दिनों से पक्षियों की मौत के बावजूद वन विभाग के लापरवाह रवैया पर सवाल उठा रहे हैं।

बहार दत्त ने आगे ट्वीट किया है कि लोग दूर-दूर से पक्षियों को बचाने पहुंच रहे हैं। रेस्क्यू सेंटर में कई पक्षियों को इलाज़ देकर बचाया गया है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ भी पहुंच चुके हैं। लेकिन आसमान से बड़ी तादाद में मृत पक्षी कीड़े-मकोड़ों की तरह गिर रहे हैं।

शुरुआत में पक्षियों की मौत का आंकड़ा सैकड़ों में बताया जा रहा था। लेकिन अब तक चार हजार से ज्यादा पक्षियों को दफनाए जाने की जानकारी मिली है। इतना बड़ा मामला वन विभाग और पशुचिकित्सा विभाग के भरोसे होने का एक प्रमाण यह भी है बुधवार को ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया और सलीम अली पक्षीविज्ञान केंद्र से विशेषज्ञों को बुलाने की बात कही थी। यानी राज्य में ऐसे विशेषज्ञों की कमी है।

खारेपन और जहरीले पानी का संदेह 

मुख्यमंत्री गहलोत का कहना है कि इस साल भारी बारिश के कारण सांभर झील के आसपास कई वाटर बॉडिज बन गई है जिससे खारेपन का स्तर बढ़ गया। गहलोत ने पक्षियों की मौत रोकने के लिए हरसंभाव कदम उठाने का दावा किया है। जांच कर पता चलाने की कोशिश की जा रही है कि क्या पक्षियों की मौत पानी में खारापन बढ़ने से हुई या पानी के जहरीले होने से। संदेह है कि फैक्ट्री का जहरीला कैमिकल झील में पहुंचने से यह सब हुआ। पानी के सैंपल भी टेस्ट कराए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों की कमी बड़ा सवाल 

पक्षियों से जुड़े इस मामले में विशेषज्ञों की कमी बड़ा सवाल है। राजस्थान जैसा प्रदेश जहां कई नेशनल पार्क और वाइल्ड लाइफ सेंचुरी हैं, पक्षियों की मौत की जांच के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है। पूरा मामला मवेशियों के इलाज के अनुभवी डॉक्टरों और वन विभाग के फील्ड स्टाफ के भरोसे है।

करीब 200 वर्ग किलोमीटर में फैली सांभर झील में हर साल साइबेरिया, नॉर्थ एशिया और हिमालय से लाखों की तादाद में प्रवासी पक्षी आते हैं। इस साल पक्षियों के आने का सिलसिला जल्द शुरू होने को भी इनकी मौतों से जोड़कर देखा जा रहा है।

बीमारियां फैलने का खतरा 

कम से कम 20-25 प्रजातियों के पक्षी मृत पाए गए हैं। इनमें नॉदर्न शावलर, पिनटेल, कॉनम टील, रूडी शेल डक, कॉमन कूट गेडवाल, रफ, ब्लैक हेडड गल, सेंड पाइपर, मार्श सेंड पाइपर, कॉमस सेंड पाइपर, वुड सेंड पाइपर पाइड ऐबोसिट, केंटिस प्लोवर, लिटिल रिंग्स प्लोवर, लेसर सेंड प्लोवर प्रजातियों के पक्षी शामिल हैं।

कभी पक्षियों के लिए जन्नत मानी जाने वाली सांभर झील इस साल उनकी कब्रगाह बन गई है। जो पक्षी झील के अंदर मरे पड़े हैं, उनसे बीमारियां फैलना का खतरा है। इन्हें पानी से कैसे बाहर निकाला जाएगा, यह भी बड़ा सवाल है।

AC में सूखे का पता ही नहीं चला? जानिए, कितने भीषण हैं हालत

जब तक फ्रीज में पानी की बोतलें भरी हैं और नल में पानी आ रही है, तब तक देश में सूखे का अहसास होना मुश्किल है। ठीक उसी तरह जैसे जब तक दिल्ली का दम स्मॉग में नहीं घुटने लगा, तब तक बहुत कम लोगों को वायु प्रदूषण की गंभीरता का अहसास था।

बहरहाल, देश के तकरीबन आधे हिस्से में सूखे के हालत हैं। इस स्थिति का अंदाजा तो मार्च-अप्रैल से ही होने लगा था, मगर तब पूरा देश चुनावी चर्चा में मशगूल था। अब मानसून का इंतजार करते-करते एक-एक दिन गुजर रहा है तो सूखे की तरफ ध्यान गया। हालांकि, देश में नए बने जल शक्ति मंत्रालय के मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत जल संकट की खबरों को “मीडिया हाइप” करार दे चुके हैं। फिर भी जान लीजिए, देश में सूखे की स्थिति कितनी गंभीर है।

  1. मौसम विभाग ने इस साल मानसून में सामान्य के मुकाबले 96 फीसदी बारिश का अनुमान लगाया है। प्राइवेट एजेंसी स्काईमेट का अनुमान और भी कम है। स्काईमेट के अनुसार, इस बार मानसून सीजन में 93 फीसदी बारिश होगी। यानी मानकर चलिए इस बार बहुत से इलाके बारिश के लिए तरस जाएंगे।
  2. पिछले पांच वर्षों में 2017 को छोड़कर हर साल मानसून में बारिश सामान्य से कम रही। लेकिन इस साल मानसून से पहले ही सूखे की मार पड़नी शुरू हो गई थी। बीते 1 मार्च से 31 मई के दौरान देश में सामान्य से 25 फीसदी कम यानी 99 मिलीमीटर हुई है। पिछले 65 वर्षों में यह दूसरा मौका है जब मानसून से पहले इतनी कम बारिश हुई और प्री-मानसून सूखे की स्थिति पैदा हो गई।
  3. आईआईटी, गांधीनगर की सूखा पूर्व चेतावनी प्रणाली के मुताबिक, देश का 44.41 फीसदी हिस्सा सूखे की स्थितियों का सामना कर रहा है जबकि पिछले साल इसी समय देश के 33.24 फीसदी हिस्से में सूखे के हालात थे। यानी पिछले साल के मुकाबले स्थिति काफी खराब है।
  4. इस साल मानसून देरी से पहुंचने के बाद बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। इस बीच, अरब सागर में उठे ‘वायु’ चक्रवात ने भी इसकी गति को बाधित किया है। अब उम्मीद जताई जा रही है कि 20 जून के बाद मानसून जोर पकड़ेगा।
  5. इस मानसून सीजन में 1-19 जून के दौरान देश में सामान्य से 43 फीसदी कम बारिश हुई है। देश के 36 मौसम क्षेत्रों में से 30 क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश है जबकि केवल 6 मौसम क्षेत्रों में सामान्य या इससे अधिक बारिश हुई है। विदर्भ में सामान्य से 89 फीसदी, मराठवाडा में 75 फीसदी, पश्चिमी यूपी में 73 फीसदी, पूर्वी यूपी में 84 फीसदी और झारखंड में 71 फीसदी कम बारिश से सूखे के खतरे को समझा जा सकता है।
  6. महाराष्ट्र और कर्नाटक के ज्यादातर जिले सूखे के संकट से जूझ रहे हैं। 47 साल का सबसे भीषण सूखा झेल रहे महाराष्ट्र की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। पश्चिमी महाराष्ट्र के कई गांवों से लोग पलायन करने पर मजबूर हैं। कई जिलों में टैंकरों से पानी पहुंचाया जा रहा है। राज्य के 35 बड़े बांध लगभग खाली हो चुके हैं, नदियां सूखी हैं और करीब 20 हजार गांव सूखे की चपेट में हैं।
  7. यूपी के बुंदेलखंड से भी सूखे के चलते लोग गांव छोड़नेे को मजबूूूर हैं। बिहार में लू लगने से 108 लोगों के मरने की पुष्टि खुद राज्य सरकार कर चुकी है। अकेले गया जिले में लू लगने से 33 लोगों की मौत हो चुकी है। भीषण गर्मी को देखते हुए बिहार के 6 जिलों में धारा 144 लगा दी गई है।
  8. सूखे के इस संकट का सीधा संबंध बढ़ती गर्मी और मरुस्थलीकरण से है। इस साल पहली बार दिल्ली का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया, जबकि 50.8 डिग्री तापमान के साथ राजस्थान के चुरू में गर्मी के सारे रिकॉर्ड टूट गए।
  9. नीति आयोग की एक रिपोर्ट देश में भीषण जल संकट से आगाह करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 तक दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई और हैदराबाद जैसे 21 महानगरों में भूजल समाप्त हो जाएगा और 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी पेयजल के लिए तरसेगी। फिलहाल, भारत में करीब 60 करोड़ लोग पानी की किल्लत का सामना कर रहे हैं।
  10. नीति आयोग की आशंका चेन्नई में सच साबित होती दिख रही है। शहर में पानी की इतनी किल्लत है कि कई आईटी कंपनियों ने कर्मचारियों को दफ्तर आने से मना कर घर से काम करने को कहा है। चेन्नई को जलापूर्ति करने वाले चार प्रमुख जलाशय लगभग सूख चुके हैं। शहर में हाहाकार मचा है। देश-विदेश का मीडिया चेन्नई के जल संकट को कवर कर रहा है।
  11. केंद्रीय भूजल आयोग की रिपोर्ट के अनुसार महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं। दक्षिण और पश्चिमी भारत के जलाशयों में जलस्तर 10 साल के औसत यानी सामान्य स्तर से नीचे चला गया है। हालांकि, देश में कुल मिलाकर जलाशयों में जलस्तर पिछले साल से बेहतर है लेकिन देश के 91 में से 71 जलाशयों में पानी घट रहा है।
  12. देश के बड़े हिस्से में सूखे का असर सोयाबीन, कपास, धान और मक्का जैसी खरीफ फसलों की बुवाई पर भी पड़ रहा है। कृषि मंत्रालय के अनुसार, 14 जून तक खरीफ की बुवाई पिछले साल की तुलना में 9 फीसदी कम है। असिंचित क्षेत्रों में किसान खरीफ की बुवाई के लिए बारिश की आस लगाए बैठे हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों में सूखे की वजह से चीनी का उत्पादन 15 फीसदी घट सकता है। विदर्भ में संतरे के आधे से ज्यादा बगीचे सूखकर बर्बाद होने की खबरें आ रही हैं।

 

 

गायब मुद्दे: चुनावों में पर्यावरण चुनौतियों पर चुप्पी

2019 लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान जोरों पर है। सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनावों में से चार चरण के चुनाव हो गए हैं। तीन चरणों का चुनाव बाकी है। लेकिन पर्यावरण की समस्याएं कहीं भी चुनावी मुद्दा बनते नहीं दिख रही हैं। चुप्पी

जबकि सच्चाई यह है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, घटता जलस्तर, मिट्टी की खराब होती स्थिति से लेकर कई स्तर पर भारत को पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में जब भारत में लोकसभा चुनाव हो रहे हैं तो पर्यावरण से संबंधित ये समस्याओं न तो राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा बन पा रही हैं और न ही आम लोगों के लिए।

लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि इसमें जनता से जुड़े मसलों पर बातचीत होती है। लेकिन पर्यावरण के संकट से आम लोगों के हर दिन प्रभावित होने के बावजूद ये संकट चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है। कहीं भी वोट देने के निर्णयों को प्रभावित करने वाली वजहों में पर्यावरण संकट एक वजह नहीं है।

जबकि हकीकत यह है कि भारत के शहरों में वायु प्रदूषण कभी इतना नहीं रहा जितना आज है। दिल्ली जैसे शहरों में साफ हवा में सांस लेना एक तरह से बीते जमाने की बात हो गई है। खराब हवा की वजह से भारत मंे लोग कई तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 2017 में भारत में जितने बच्चों की जान गई, उनमें से हर आठ में से एक की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई। इसी तरह से दूषित जल की वजह से भी बच्चों और बड़ों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

देश की नदियों का हाल बुरा है। 2014 में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने गंगा की साफ-सफाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। लेकिन पांच साल में गंगा की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। इस वजह से न तो सत्ता पक्ष इस बार नदियों की साफ-सफाई को चुनावी मुद्दा बना रहा है और न ही इसमें विपक्षी खेमे की कोई दिलचस्पी दिख रही है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह जरूर कहा है कि अब वह 2022 तक गंगा को साफ-सुथरा बनाने का लक्ष्य हासिल करेगी।

भूजल का गिरता स्तर और भूजल प्रदूषण देश की बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है। आधिकारिक आंकड़े बता रहे हैं कि देश के 640 जिलों में से 276 जिलों के भूजल में फ्लुराइड प्रदूषण है। जबकि 387 जिलों का भूजल नाइट्रेट की वजह से प्रदूषित हुआ है। वहीं 113 जिलों के भूजल में कई भारी धातु पाए गए हैं और 61 जिलों के भूजल में यूरेनियम प्रदूषण पाया गया है। इस वजह से इन जिलों में रहने वाले लोगों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की वजह से देश में पलायन भी देखा जा रहा है। जहां सूखे की मार अधिक है और जहां प्रदूषण की वजह से जानलेवा बीमारियां हो रही हैं, वहां से लोग दूसरी जगहों का रुख कर रहे हैं। महाराष्ट्र और बुंदेलखंड से सूखाग्रस्त इलाकों से लोगों के पलायन की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

जाहिर है कि इस स्तर पर अगर कोई समस्या लोगों को परेशान कर रही हो तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि यह चुनावी मुद्दा बनेगा। लेकिन फिर भी ये समस्याएं लोकसभा चुनावों में गायब दिख रही हैं। न तो कोई पार्टी अपनी ओर से ये मुद्दे उठाती दिख रही हैं और न ही प्रभावित लोगों द्वारा इन पार्टियों और स्थानीय उम्मीदवारों पर इन मुद्दों पर प्रतिबद्धता दिखाने और इनके समाधान की राह बताने के लिए कोई दबाव बनाया जा रहा है। न ही सिविल सोसाइटी की ओर से पार्टियों पर पर्यावरण को मुद्दा बनाने के लिए प्रभावी दबाव बनाया गया।

पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों में भी पर्यावरण के मुद्दों पर खास गंभीरता नहीं दिखती है। जो बातें पहले भी इन घोषणापत्रों में कही गई हैं, उन्हीं बातों को कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के घोषणापत्रों में दोहराया गया है। किसी निश्चित रोडमैप के साथ पर्यावरण की समस्या से निपटने ही राह भाजपा और कांग्रेस में से किसी भी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में नहीं सुझाई है।

विलुप्त होने के कगार पर 10 लाख प्रजातियां

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट 6 मई, 2019 को आने वाली है। 1,800 पन्नों की इस रिपोर्ट में पर्यावरण में हो रहे बदलावों, इसमें मनुष्य की भूमिका और इससे दूसरी प्रजातियों के लिए पैदा हो रहे खतरों के अलावा जलवायु परिवर्तन के विभिन्न आयामों पर विस्तृत चर्चा की गई है। इस पर चर्चा के लिए दुनिया के 130 देशों के वैज्ञानिक पेरिस में जमा हो रहे हैं।

अभी इस विस्तृत रिपोर्ट का ड्राफ्ट सार्वजनिक हुआ है। 44 पन्नों के इस ड्राफ्ट में बताया गया है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से तकरीबन दस लाख प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा पैदा हो गया है। इसमें यह भी कहा गया है कि इंसानों ने जिस तरह से सिर्फ अपने हितों का ध्यान रखते हुए संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया है, उसकी वजह से इस तरह के खतरे पैदा हो रहे हैं।

इस ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह कहा गया है कि सिर्फ दस लाख प्रजातियों पर विलुप्त होने का ही खतरा नहीं मंडरा रहा बल्कि तकरीबन 25 फीसदी प्रजातियां दूसरे तरह के खतरों का सामना कर रही हैं। इसमें यह दावा किया गया है कि पिछले एक करोड़ साल में यह दौर ऐसा है जिसमें सबसे तेज गति से प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं।

इसकी वजह मुख्य तौर पर मनुष्य की गतिविधियां हैं। मनुष्य की बसावट, कृषि और अन्य जरूरतों की वजह से जंगलों की अंधाधुंध ढंग से नष्ट किया जा रहा है। इससे जानवरों के रहने की जगहें सीमित हो रही हैं। वहीं दूसरी तरफ पेड़-पौधों की प्रजातियां भी विलुप्त होते जा रही हैं। रिपोर्ट में प्रदूषण और जानवरों के अवैध व्यापार को भी मुख्य वजहों के तौर पर रेखांकित किया गया है।

इंसान ने खुद की गतिविधियों से दूसरी प्रजातियों के लिए जो संकट पैदा किए हैं, उसकी आंच खुद उस तक आनी है। इसकी पुष्टि संयुक्त राष्ट्र की यह ड्राफ्ट रिपोर्ट भी कर रही है। इसमें यह बताया गया है कि इससे खास तौर पर वैसे लोग प्रभावित होंगे जो गरीब हैं और हाशिये पर रहते हुए अपना जीवन जी रहे हैं। क्योंकि उनके पास इन बदलावों के हिसाब से जरूरी बंदोबस्त करने के लिए संसाधन नहीं होंगे।

इसके प्रभावों के बारे में यह भी कहा जा रहा है दीर्घकालिक तौर पर इससे पीने के पानी का संकट पैदा होगा। सांस लेने के लिए स्वच्छ हवा का संकट होगा। कृषि उत्पादन नीचे जाएगा। इससे खाद्यान्न की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हो सकती है और दुनिया के कई हिस्सों को खाद्य संकट का सामना करना पड़ सकता है।

इस ड्राफ्ट रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इससे समुद्र के पानी में प्रदूषण बढ़ेगा और जो मछलियां निकाली जाएंगी, उनमें प्रोटीन की मात्रा कम होगी। साथ ही उनमें दूसरे तरह के जहरीले रसायन बढ़ेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि जो लोग इन मछलियों को खाएंगे, उन्हें स्वास्थ्य संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ेगा।

इसमें यह भी कहा गया है कि कई वैसे कीटों पर भी विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है जो परागन का काम करते हैं। अगर ऐसा होता है तो कई पौधों और फूलों का अस्तित्व बचना मुश्किल हो जाएगा।

अब सवाल यह उठता है कि इस स्थिति के समाधान के लिए क्या किया जाए? सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि इंसानी गतिविधियां इस संकट के लिए जिम्मेदार हैं, इसलिए सुधार की शुरुआत भी मनुष्य की गतिविधियों से ही होनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति की विभिन्न प्रजातियों में से मनुष्य भी एक प्रजाति है और प्राकृतिक संसाधनों पर सिर्फ हमारा ही हक नहीं है।

हमें यह भी समझना होगा कि अगर संसाधनों का सही और पर्याप्त इस्तेमाल करें तो इससे प्रकृति का पूरा चक्र बना रहेगा। जब प्रकृति का चक्र सही ढंग से चलता रहेगा तभी मनुष्य भी सामाजिक और आर्थिक रूप से आगे बढ़ता रहेगा। लेकिन अगर मनुष्य की गतिविधियों की वजह से प्राकृतिक चक्र गड़बड़ होता है तो इससे पूरी व्यवस्था गड़बड़ हो जाएगी।

जरूरत इस बात की है कि इंसानी गतिविधियों की वजह से लाखों प्रजातियों पर विलुप्त होने के खतरे को वैश्विक स्तर पर समझा जाए और इसके समाधान के लिए दुनिया के अलग-अलग देश एकजुट होकर काम करें। पर्यावरण समझौतों को लेकर विकसित देशों और विकासशील देशों में विचारों की जो दूरी है, उसे पाटने की जरूरत है।

जैव ईंधन के अपने जोखिम!

पूरी दुनिया में बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से ऊर्जा उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की जब भी बात चलती है तो जैव ईंधन का नाम भी इसमें आता है। शुरूआत में इसे लेकर पूरी दुनिया में उत्साह का माहौल रहा। लेकिन अब इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

जट्रोफा और मक्के के जरिए ईंधन बनाने की तकनीक अपनाने के प्रति हर देश मोहग्रस्त है। भारत में भी जैव ईंधनों के उत्पादन को बढ़ावा देने वाले प्रयासों में तेजी लाने की बात की जा रही है। इसके लिए देश में नई जैव ईंधन नीति बनाई गई है। देश में जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में काम हो रहा है।

पर जैव ईंधन के मसले पर हालिया दिनों में हुए अध्ययन के नतीजे हैरान करने वाले हैं। इंग्लैंड के पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिक शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि जैव ईंधन के उत्पादन से कार्बन उत्सर्जन में कमी आने की संभावना कम ही है।

जैव ईंधन के उत्पादन के मामले में ब्राजील और अमेरिका अगली कतार में हैं। ब्राजील में अमेजन के जंगल को बहुत विशाल कहा जाता है। इसकी सहायता से वहां के पर्यावरण में संतुलन कायम रहा करता है। पर जैव ईंधन के उत्पादन के लिए इन जंगलों का विनाश किया जा रहा है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई हो रही है।

वहां की सरकार ने यह एलान किया है कि इस साल जंगलों को उजाड़ने की गति को दोगुना कर दिया जाएगा। यहां यह बताना लाजिमी है कि पेड़ों की कटाई से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाता है। कार्बन उत्सर्जन के मामले में वैश्विक स्तर पर ब्राजील का स्थान चैथा है। इसके बावजूद जैव ईंधन के उत्पादन के लिए पेड़ों की कटाई करके कार्बन उत्सर्जन को कम करने के बजाए बढ़ाया ही जा रहा है।

ब्राजील के वुडस होल रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों का मानना है कि जिस तरह अमेजन के जंगलों को उजाड़ने के लिए वहां आग लगाई गई उससे इस क्षेत्र की पारिस्थितिक तंत्र गड़बड़ होगी जिसके परिणामस्वरूप कुछ सालों बाद यह इलाका रेगिस्तान में भी तब्दील हो सकता है। आग लगाए जाने की वजह से वहां के कई ऐसे पौधे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं जिनका इस्तेमाल औषधियों के उत्पादन में होता था। यूनिवर्सिटी आॅफ मिनेसोटा के वैज्ञानिकों का अध्ययन बताता है कि जिस तरह से वैकल्पिक ईंधन के उत्पाद के लिए जमीन तैयार की जा रही है उससे होने वाले कार्बन उत्सर्जन के नुकसानों की भारपाई करने में तकरीबन चार सौ सालों का वक्त लग जाएगा।

विश्व बैंक की एक रिपोर्ट ने इस बात को उजागर किया है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वैश्विक स्तर पर होने वाली बढ़ोतरी में जैव ईंधन के उत्पादन पर जोर दिया जाना भी एक प्रमुख वजह है। आॅक्सफैम ने भी अपने अध्ययन में बताया है कि जैव ईंधन का माॅडल सफल साबित नहीं हुआ है। लेकिन सरकारें फिर भी इसके उत्पादन को बढ़ावा दे रही है।

वैकल्पिक ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले ईथाइल अल्कोहल के उत्पादन को अमेरिका ने दुगना कर दिया है। वहां की सरकार ने एक दशक के अंदर इसे पांच गुना करने का लक्ष्य रखा है। इस मामले में ब्राजील अमेरिका से आगे है। वहां किसी भी पेट्रोल पंप पर सादा गैसोलिन अब मिलता ही नहीं है। ब्राजील की सड़कों पर दौड़ने वाली 45 फीसद कारों में वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इंडोनेशिया में जंगलों को नष्ट करने के लिए आग लगा दिया गया ताकि उस जमीन से बायोडीजल का उत्पादन किया जा सके। अब इससे भविष्य में पर्यावरण को कितना लाभ पहुंचेगा यह बता पाना तो शायद किसी के लिए संभव नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि पेड़ों को जलाने से भारी मात्रा में कार्बन का उत्सर्जन हुआ। जिससे पर्यावरण की सेहत और खराब होगी।

मक्के से बनाए जाने वाले इथनाल को तो बहुत पहले से ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला बताया जाता है। पर अब सेलुलोज से बनाए जा रहे इथनाल पर भी सवालिया निशान वैज्ञानिक लगा रहे हैं। ऐसे में स्थिति यह दिखती है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ अनाज उपलब्धता की दृष्टि से भी जैव ईंधन सवालों के घेरे में है। ऐसे में जैव ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा देने से पहले यह जरूरी है कि इस मामले में व्यापक अध्ययन कराए जाएं और इसके बाद ही इस बारे में आगे बढ़ने का निर्णय लिया जाए।

सूखा क्यों नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा?

लोकसभा चुनावों के चार चरण के मतदान हो गए हैं। तीन चरण के चुनाव अभी बाकी हैं। इस लिहाज से देखें तो अब भी देश के बड़े हिस्से में लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक प्रचार जोर-शोर से चल रहा है। इसमें कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं। लेकिन सूखे का मुद्दा नहीं उठ रहा है।

जबकि देश भयानक सूखे की ओर बढ़ रहा है। विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी आ रही है, उससे पता चल रहा है कि देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सूखे की स्थिति बहुत बुरी है।

इंडियास्पेंड सूखे की स्थिति के बारे में बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य सूखे से बुरी तरह से प्रभावित हैं। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण भारत के 31 जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 25 प्रतिशत ही पानी बचा हुआ है। जबकि नवंबर, 2018 में यह आंकड़ा 61 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले चार-पांच महीनों में इन जलाशयों के पानी में 36 फीसदी कमी आई।

आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के चार जिलों अनंतपुर, कुरनुल, चित्तूर और वाईएसआर कड़प्पा में बेहद भयानक सूखा है। खबरों में यह बताया जा रहा है कि यहां लगातार नौवें साल सूखा पड़ा है। 2000 से लेकर 2018 के बीच इस क्षेत्र में 15 साल ऐसे रहे हैं जब यहां सूखा पड़ा है। बताया जाता है कि सूखे की वजह से यहां के लोगों को पलायन लगातार हो रहा है। 2018 में सिर्फ सात लाख लोगों का पलायन इस क्षेत्र के गांवों से हुआ है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां सिर्फ बुजुर्ग लोग ही रह रहे हैं।

इसी तरह की खबर महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों के बारे में भी आ रही है। मराठवाड़ा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है। बीड़ जिले में तो लोग सूखे से बुरी तरह बेहाल हैं। तेलंगाना के कुछ क्षेत्र भी भयंकर सूखे की चपेट में हैं। इसके बावजूद इन राज्यों में सूखा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।

कुछ साल पहले इंडियन प्रीमियर लीग चल रहा था तो उस वक्त सूखे का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठा था। दबाव में मुंबई के मैच को कहीं और कराना पड़ा था। इस बार तो आईपीएल और लोकसभा चुनाव दोनों चल रहे हैं लेकिन सूखा कोई मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

सूखा का चुनावी मुद्दा नहीं होना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। भारत की कुल आबादी के 57 फीसदी लोग अब भी जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। कृषि पानी पर निर्भर है। ऐसे में सूखे की समस्या हर तरह से एक राष्ट्रीय समस्या है लेकिन देश के सबसे बड़े चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।

सूखे की समस्या को कोई भी दल नहीं उठा रहा है। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अगर इस मसले को नहीं उठा रही है तो समझ में आता है कि भला वह खुद अपनी नाकामी को कैसे चुनावी मुद्दा बनाए। लेकिन विपक्षी दल भी अगर सूखे की समस्या को चुनावी मुद्दा नहीं बना रहे हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है?

एक वजह यह समझ में आती है कि प्रमुख विपक्षी दलों की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वे राज्य भी कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। इसलिए इन्हें लगता है कि अगर ये सूखा को चुनावी मुद्दा बनाते हैं तो इसकी आंच इन तक भी आएगी और इन्हें भी चुनावों में नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए सभी दलों में एक तरह से यह आम सहमति दिखती है कि लोकसभा चुनाव 2019 में सूखा को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देना है।

एक चौथाई स्वास्थ्य केंद्रों पर पर्याप्त पानी भी नहीं!

सरकारें स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों का बखान करते हुए नहीं थकती हैं। केंद्र की मौजूदा सरकार भी इसकी अपवाद नहीं है। स्वास्थ्य क्षेत्र में किए गए कार्यों का हवाला देते हुए सरकार एक सांस में कई योजनाएं गिना देती है और फिर अंत में यह भी कहती है कि उसने नई स्वास्थ्य नीति 2017 में लाई और इसके तहत पूरे देश में 1.5 लाख वेलनेस केंद्र खोले जाने हैं और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च बढ़ाया जाना है। सरकार बीमा आधारित स्वास्थ्य योजनाओं को भी अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश करती है।

लेकिन सच्चाई तो यह है कि आज भी स्वास्थ्य केंद्र बुनियादी सुविधाओं की कमी का सामना कर रहे हैं। इस वजह से यहां आने वाले लोगों का ठीक से ईलाज नहीं हो पा रहा। वहीं दूसरी तरफ बीमा आधारित योजनाओं का लाभ उठाकर निजी अस्पताल अपना कारोबार विस्तार लगातार कर रहे हैं।

इस भयावह स्थिति के बारे में विस्तृत जानकारी देने वाली एक रिपोर्ट हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तैयार की है। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए वैश्विक स्तर पर अध्ययन किया गया। इसमें यह बताया गया है कि दुनिया के 25 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पर्याप्त पानी भी उपलब्ध नहीं है। वहीं 20 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां साफ-सफाई के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि इस वजह से दुनिया के दो अरब से अधिक लोग प्रभावित हो रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इन स्वास्थ्य केंद्रों पर मेडिकल कचरे को अलग-अलग करने और फिर उनके निस्तारण के लिए भी पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कम विकसित देशों में यह स्थिति और भी बुरी है। इन देशों में 45 फीसदी स्वास्थ्य केंद्र ऐसे हैं जहां पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक ऐसे केंद्रों पर हर साल 1.7 करोड़ महिलाएं अपने बच्चों को जन्म देती हैं।

रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर किसी बच्चे का जन्म ऐसी जगह पर हो जहां न तो पर्याप्त पानी हो और न ही पर्याप्त साफ-सफाई तो बच्चे और मां पर कई बीमारियों के साथ-साथ जान से हाथ धोने का खतरा भी बना रहता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि इस वजह से हर साल तकरीबन दस लाख मौतें हो रही हैं। इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पानी और साफ-सफाई में कमी की वजह से नवजात बच्चों और बच्चों को जन्म देनी वाली महिलाओं में जो संक्रमण होता है, उससे सबसे अधिक प्रभावित कम विकसित देश और विकासशील देश हैं।

नवजात बच्चों की कुल मौतों में इस वजह से होने वाली मौतों की हिस्सेदारी 26 फीसदी है। जबकि बच्चों के जन्म देने या इसके थोड़ी ही समय बाद पूरी दुनिया में जितनी महिलाओं को जान गंवानी पड़ रही है, उसमें पर्याप्त पानी और साफ-सफाई के अभाव के माहौल में बच्चों को जन्म देने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 11 फीसदी है।

भारत के भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर पानी और साफ-सफाई का अभाव स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है। अगर भारत के संदर्भ में इस तरह का कोई अध्ययन हो तो इससे भी कहीं अधिक भयावह आंकड़े सामने आ सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों का तो और भी बुरा हाल है। यहां तक की प्रमुख शहरों के प्रमुख स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त पानी और साफ-सफाई नहीं है। दूसरी बुनियादी सुविधाओं की भी यही स्थिति है।

ऐसे में इस दिशा में काम होना चाहिए कि कैसे भारत के स्वास्थ्य केंद्रोें पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। क्योंकि यह एक स्थापित तथ्य है कि जिस भी समाज में शिक्षा और स्वास्थ्य की बुरी स्थिति रहती है, वह समाज न तो आर्थिक तौर पर अच्छा प्रदर्शन कर पाता है और न ही मानव विकास के पैमाने पर उसका प्रदर्शन सुधरता है।

क्या सतत विकास लक्ष्यों को भारत हासिल कर पाएगा?

संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर भारत को 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना है तो उसे जीडीपी का दस फीसदी खर्च करना पड़ेगा
2015 में पूरी दुनिया ने मिलकर 17 सतत विकास लक्ष्य तय किए थे। इन्हें 2030 तक हासिल किया जाना है। इसके तहत गरीब और भूखमरी मिटाने से लेकर बेहतर स्वास्थ्य, बेहतर पर्यावरण, बेहतर रोजगार, दुनिया में अमन सुनिश्चित करने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं।
इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए दुनिया के देशों के बीच आपसी सहयोग का लक्ष्य भी रखा गया था। जिन देशों ने सतत विकास लक्ष्यों ;एसडीजीद्ध को हासिल करने का लक्ष्य रखा है, वे सभी देश संयुक्त राष्ट्र को हर साल एक रिपोर्ट सौंपते हैं। इसमें यह बताया जाता है कि इन लक्ष्यों को हासिल करने के मोर्चे पर कितनी प्रगति हुई है।
भारत ने एसडीजी से संबंधित जो रिपोर्ट दी है, उससे अब तक की भारत की प्रगति बेहद उत्साहजनक नहीं है। कई मोर्चे ऐसे हैं जिन पर भारत को और ठोस ढंग से काम करने की जरूरत है।
वार्षिक रिपोर्ट को पिछले दिनों में संयुक्त राष्ट्र की सहयोगी संस्था यूनाइटेड नेशंस इकाॅनोमिक ऐंड सोशल कमिशन फोर एशिया ऐंड दि पैसिफिक ने जारी किया। इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अगर भारत को 2030 तक गरीबी मिटानी है तो प्रति व्यक्ति हर दिन 140 रुपये खर्च करने होंगे। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कुल खर्चे के मुकाबले दोगुना है।
इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि अगर भारत 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने को लेकर गंभीर है तो उसे अपनी जीडीपी का 10 फीसदी खर्च करना होगा। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के पास इतने पैसे एसडीजी को हासिल करने के लिए खर्च करने को हैं?
संयुक्त राष्ट्र की इस रिपोर्ट में इस संदर्भ में भारत का जिक्र करते हुए कहा गया है कि भारत के बैंकों की बढ़ती गैर निष्पादित संपत्तियां यानी एनपीए एक बहुत बड़ी चिंता है। क्योंकि इस वजह से देश की आर्थिक स्थिति खराब होगी और इतने पैसे नहीं रहेंगे कि भारत सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के पर्याप्त पैसे खर्च कर पाए।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में जितनी गरीबी है, उसे देखते हुए भारत को अपनी जीडीपी का तकरीबन 10 फीसदी सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने पर खर्च करना होगा। जबकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र को संयुक्त तौर पर इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जीडीपी का पांच फीसदी खर्च करना होगा।
भारत में गरीबी को लेकर अलग-अलग आंकड़े हैं। सी. रंगराजन समिति के आंकड़ों का इस्तेमाल सरकार के स्तर पर हो रहा है। इस समिति के मुताबिक देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों की संख्या 36.3 करोड़ है। जाहिर है कि अगर इतनी बड़ी आबादी की गरीबी दूर करनी है तो इसके लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा और काफी पैसे खर्च करने होंगे।
सच्चाई तो यह है कि भारत में चुनावी वादे करते वक्त हर पार्टी कहती है कि वह गरीबी के खिलाफ जंग छेड़ेगी और गरीबी से भारत को मुक्त करेगी। देश ने हर दल का शासन देख लिया है। लेकिन गरीबी से मुक्ति मिलती नहीं दिख रही है।
इस रिपोर्ट में भारत जैसे देशों को आगाह करते यह भी लिखा गया है कि आर्थिक विकास पर बहुत अधिक जोर देने से सतत विकास नहीं होगा और इससे भविष्य का विकास नकारात्मक ढंग से प्रभावित होगा। इससे समाज में गैरबराबरी बढ़ेगी और पर्यावरण को नुकसान होगा। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आर्थिक असमानता बढ़ने से आर्थिक विकास की अवधि कम होगी।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत के नीति निर्धारक इन चेतावनियों को समझते हुए भारत को सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के मार्ग पर प्रभावी ढंग से आगे ले जाने के लिए जरूरी निर्णय लेंगे या फिर जिस तरह से इस मोर्चे पर 2015 से 2019 तक काम हुआ है, वही रवैया आगे भी बरकरार रहेगा।