किसानों की रसीद से नदारद गेहूं बोनस की रकम

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने गेहूं की खरीद पर केंद्र द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अलावा अपनी तरफ से प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। इसके बावजूद बोनस की रकम का उल्लेख सरकारी खरीद की रसीद में नहीं है। इससे किसानों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि उन्हें बोनस मिलेगा भी या नहीं।

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों के मुद्दाें को जोरशोर से उठाया था, लेकिन सरकार बदलने के बावजूद सरकारी रवैये में ज्यादा बदलाव नहीं दिख रहा है। इस बात को गेहूं पर बोनस के मामले से समझा जा सकता है। कांग्रेस ने अपने वचन-पत्र में किसानों को बोनस देने का ऐलान किया था। पिछले महीने पांच मार्च को भोपाल में हुई प्रदेश कैबिनेट की बैठक में कमलनाथ सरकार ने गेहूं पर 160 रुपये और मक्का पर 250 रुपये प्रति क्विंटल बाेनस देने को मंजूरी दी थी। 25 मार्च से शुरू होकर 24 मई तक चलने वाली गेहूं की सरकारी खरीद में किसानों को 1840 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी के साथ 160 रुपए बाेनस भी दिया जाना था।

लेकिन सरकारी खरीद केंद्रों पर किसानों द्वारा बेचे जा रहे गेहूं के बाद दी जाने वाली रसीद पर  राज्य या केंद्र सरकार के किसी बाेनस का उल्लेख नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने गेहूं बोनस को लेकर असंमजस की स्थिति बनी हुई है। क्रय सोसायटी से दी जाने वाली पावती रसीद पर केंद्र और राज्य सरकार के बोनस की जगह शून्य लिखा है। ये शून्य किसानों की नाराजगी का सबब बना रहा है।

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसान

 

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसानमध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के टोड़ी गांव के किसान धनराज सिंह गुर्जर इस बारे में बताते हैं, “राज्य सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य पर गेहूं की तुलाई पर प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। लेकिन पावती रसीद पर न तो केंद्र सरकार का कोई बाेनस है न ही राज्य सरकार का। केवल जीरो लिखा है। किसानों को गुमराह किया जा रहा है। किसानों को सोयाबीन का 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस भी अभी नहीं मिला है।”

मध्य प्रदेश के जिस राजगढ़ में किसानों को इस समस्या का सामना करना पड़ा वहां की कलेक्टर निधि निवेदिता ने इस बारे में सरकार का पक्ष रखा है। उनका कहना है कि किसानों को पूरा बोनस दिया जा रहा है। वे कहती हैं, “सॉफ्टवेयर समस्या के कारण जो प्रिंट निकल रही थी उसमें बोनस नहीं दिख पा रहा था। जो भुगतान किसानों दिया गया है, उसमें 160 रुपये बोनस जोड़कर ही भुगतान हुआ है। अब सॉफ्टवेयर की समस्या को ठीक करवा दिया गया है जिससे समस्या नहीं होगी।”

हरियाणा में सरसों खरीद को लेकर किसान नाराज क्यों हैं?

हरियाणा में सरसों पैदा करने वाले किसान गुस्से में हैं। पिछले कई दिनों से इन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरसों की सरकारी खरीद को लेकर हरियाणा के किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

हरियाणा में इस साल सरसों की अच्छी पैदावार हुई है। इसके बावजूद सरसों किसानों को अपनी फसल के बदले उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन किसानों को इस दर से प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये कम मिल रहे हैं।

दूसरी समस्या यह हो रही है कि किसानों की कुल पैदावार की सरकारी खरीद हरियाणा के मंडियों में नहीं हो पा रही है। सरकार ने अधिकतम खरीद की सीमा तय कर रखी है। यह सीमा प्रति एकड़ 6.5 क्विंटल की है। लेकिन हरियाणा से यह जानकारी मिल रही है कि इस साल वहां प्रति एकड़ औसतन 10 से 12 क्विंटल सरसों का उत्पादन हुआ है।

इस लिहाज से देखें तो किसानों से उनकी सरसों की कुल पैदावार को मंडियों में नहीं खरीदा जा रहा है। इसके अलावा मंडियों में एक दिन में एक किसान से 25 क्विंटल सरसों खरीदने की अधिकतम सीमा भी तय की गई है। इन दोनों वजहों से किसानों को खुले बाजार में औने-पौने दाम में सरसों बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पिछले दिनों स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव ने हरियाणा की कुछ मंडियों का दौरा करके सरसों किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया है कि किसानों से खरीदी जा रही सरसों की फसल की तौल में भी किसानों के साथ धोखा किया जा रहा है। उनका आरोप है कि हर बोरी पर किसानों की फसल लूटी जा रही है। योगेंद्र यादव ने सरकार से मांग की कि इस समस्या को दूर करने के साथ खरीद पर तय की गई अधिकतम सीमा तत्काल हटाई जानी चाहिए।

सरसों किसानों की समस्या बढ़ाने का काम खरीद एजेंसी में बदलाव की वजह से भी हुआ है। पहले हरियाणा में सरसों खरीद का काम नैफेड और हैफेड के माध्यम से किया जा रहा था। लेकिन इन एजेंसियों का खरीद लक्ष्य पूरा हो गया। जबकि मंडियों में सरसों की आवक जारी रही। इस वजह से अब सरसों खरीद का काम खाद्य एवं आपूर्ति विभाग को दिया गया है। खरीद एजेंसी में हुए इस बदलाव से हरियाणा के विभिन्न मंडियों में अव्यवस्था बनी हुई है।

एजेंसी बदलने की वजह से किसानों को नए सिरे से रजिस्ट्रेशन कराना पड़ रहा है। क्योंकि बगैर रजिस्ट्रेशन के किसानों की सरसों नहीं खरीदने का प्रावधान किया गया है। एजेंसी में बदलाव किए जाने की वजह से खरीद प्रक्रिया ठीक से चल नहीं रही है। प्रदेश में कुछ जगहों पर तो नाराज किसानों ने हंगाम भी किया। कुछ जगहों पर किसानों ने सड़क जाम भी किया।

बहादुरगढ़ की मंडी में सरसों किसानों को हंगाम करने का बाध्य होना पड़ा तब जाकर सरसों खरीद शुरू हो सकी। बहादुरगढ़ मंडी में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ही गेहूं की खरीद भी कर रहा है। इस वजह से न तो मंडी में विभाग के पर्याप्त कर्मचारी थे और न ही कोई उपयुक्त व्यवस्था बन पाई।

हरियाणा की मंडियों में सरसों की सरकारी खरीद ठीक से नहीं होने की वजह से कुछ मंडियों में सरसों से लदे ट्रालियों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। रेवाड़ी में नाराज सरसों किसानों ने सड़क जाम किए। यहां किसानों से सरसों की खरीद ही शुरू नहीं हो पा रही थी। जबकि उन्हें सरसों खरीदने से संबंधित टोकन जारी हो गया था।

सरसों किसानों को इन समस्याओं का सामना तब करना पड़ा है जब केंद्र सरकार में बैठे नीति निर्धारक तिलहन के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने और खाद्य तेलों का आयात कम करने की बात लगातार कर रहे हैं। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा सत्ता में आने के बाद तिलहन मिशन शुरू करने का वादा किया है। मार्च, 2019 में भारत ने 14.46 लाख टन खाद्य और अखाद्य तेलों का आयात किया।

एक तरफ भारी आयात है तो दूसरी तरफ देश में हो रहे उत्पादन की खरीदारी ठीक से नहीं हो रही है। ऐसे में क्या ये किसान फिर से सरसों उपजाने का निर्णय लेंगे? अगर ये फिर से सरसों नहीं उपजाते हैं या उपजाते भी हैं तो अगर सरसों की खरीद ठीक ढंग से नहीं हो पाती है तो क्या देश को तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का सपना पूरा हो पाएगा।

कहीं चना तो कहीं सरसों एमएसपी के नीचे बेचने को मजबूर हैं किसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों को गिनाते हुए यह बताना नहीं भूलती कि उसने किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाकर लागत का डेढ़ गुना कर दिया है। सरकार के मंत्री और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लोग भी अक्सर ये दावे करते दिखते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सरकार जो एमएसपी तय कर रही है, उस पर किसानों का उत्पाद खरीदे जाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इस वजह से मंडियों में व्यापारी किसानों से मनमाने भाव पर उनके उत्पादों को खरीद रहे हैं।

इसे दो उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है। अभी चना देश की विभिन्न मंडियों में आना शुरू हुआ है। चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने 4,620 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन इस मूल्य पर सरकार ने चने की खरीद शुरू नहीं की है।

अब जाहिर है कि सरकार खरीद नहीं करेगी तो मंडियों में किसानों को व्यापारियों के तय किए गए दर पर चना बेचना पड़ेगा। यही हो रहा है। मध्य प्रदेश की मंडियों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां चना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले ही 4,620 रुपये प्रति क्विंटल का हो लेकिन किसानों को 3,800 रुपये प्रति क्विंटल का दर हासिल करने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। वहां यह दर भी जिन्हें मिल जा रहा है, वे खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं। किसानों को औसतन प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये का नुकसान हो रहा है।

अब इसके मुकाबले बाजार भाव देख लीजिए। इससे पता चलेगा कि किसानों को क्या दर मिल रहा है और आम उपभोक्ताओं को कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। जिस दिन मध्य प्रदेश की मंडियों से यह खबर आई कि वहां चना 3,800 रुपये प्रति क्विंटल यानी 38 रुपये प्रति किलो बेचने के लिए किसाना विवश हैं, उसी दिन दिल्ली में चना का खुदरा भाव पता करने पर यह बात सामने आई कि आम दिल्लीवासियों को एक किलो चने के लिए 105 रुपये से लेकर 115 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों से जिस भाव पर चना खरीदा जा रहा है, उससे तीन गुना अधिक कीमत पर उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि बीच का जो अंतर है, वह कौन खा रहा है?

सरसों का उत्पादन करने वाले किसानों को भी एमएसपी नहीं मिल रही है। सरसों के पैदावार के लिहाज से राजस्थान का देश में बेहद अहम स्थान है। यहां सरसों की पैदावार मंडियों में आने लगी है। सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

लेकिन राजस्थान के श्रीगंगानगर मंडी से यह खबर आ रही है कि 4,200 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी के मुकाबले उन्हें सिर्फ 3,400 रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 3,600 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो किसानों को एमएसपी के मुकाबले 600 से 800 रुपये कम में एक क्विंटल सरसों बेचना पड़ रहा है।

इन स्थितियों को देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ एमएसपी की घोषणा कर देना भर पर्याप्त नहीं है बल्कि इसे लागू कराने का एक उपयुक्त तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है। तब ही बढ़ी हुई एमएसपी का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच पाएगा।

अप्रैल में गेहूं समर्थन मूल्‍य से नीेचे बि‍कने की नौबत

नई दिल्ली। चालू सीजन में अभी तक करीब 30 लाख टन गेहूं का आयात हो चुका है तथा 28 फरवरी तक कुल आयात 40 लाख टन होने का अनुमान है। ऐसे में अगर केंद्र सरकार ने जल्दी ही आयात को रोकने के लिए आयात शुल्क नहीं लगाया तो गेहूं की नई फसल आने पर अप्रैल में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में गेहूं न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे बिकने की आशंका है।

इस समय दक्षिण भारत में गेहूं का भारी मात्रा में आस्ट्रेलिया, यूक्रेन और फ्रांस से आयात हो रहा है तथा अभी तक करीब 30 लाख गेहूं भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच चुका है। आयातक 28 फरवरी 2017 से पहले की शिपमेंट के आयात सौदे कर रहे हैं, क्योंकि आयातकों को डर है कि केंद्र सरकार आयात को रोकने के लिए 28 फरवरी 2017 के बाद आयात शुल्क लगायेंगी। ऐसे में 28 फरवरी 2017 तक कुल 40 लाख टन गेहूं का आयात होने का अनुमान है। ऐसे में दक्षिण भारत की फ्लोर मिलों के पास मार्च-अप्रैल तक की पिसाई का गेहूं उपलब्ध रहेगा, जिस कारण इनकी मांग उत्तर प्रदेष, राजस्थान और मध्य प्रदेश से कम रहेगी। जिसका असर गेहूं की कीमतों पर पड़ेगा। माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1,450 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल रह जायेगा, जबकि रबी विपणन सीजन 2017-18 के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 1,625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

आस्ट्रेलिया से आयातित गेहूं का भाव तुतीकोरन बंदरगाह पर 1,700 से 1,780 रुपये प्रति क्विंटल क्वालिटीनुसार है जबकि यूक्रेन से आयातित गेहूं का भाव 1,650 रुपये प्रति क्विंटल है। दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें गुजरात की मंडियों से एमएसपी पर गेहूं की खरीद करती हैं तो मिल पहुंच भाव 1,950 से 2,000 रुपये प्रति क्विंटल बैठेंगे, तथा अगर उत्तर प्रदेश या राजस्थान से खरीद करेंगी तो लागत बढ़कर 2,200 से 2,300 रुपये प्रति क्विंटल हो जायेगी। इसलिए दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें आयातित गेहूं का स्टॉक कम रही है ताकि अगले अगले दो-तीन महीने उनको घरेलू मार्किट से खरीद ना करनी पड़े। दक्षिण भारत की मिलों को लगता है कि केंद्र सरकार 28 फरवरी 2017 के बाद आयात शुल्क लगा देगी, लेकिन अगर केंद्र सरकार ने ऐसा नहीं किया तो फिर आयात बढ़कर 50 से 60 लाख टन के स्तर पर भी पहुंच सकता है।

इस साल बुवाई ज्‍यादा

चालू रबी में मध्य प्रदेश के साथ ही उत्तर प्रदेश में गेहूं की बुवाई में भारी बढ़ोतरी हुई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 315.55 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 292.52 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में बुवाई 100.52 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 94.99 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। इसी तरह मध्य प्रदेश में बुवाई बढ़कर 62.23 लाख हैक्टेयर में हुई जबकि पिछले साल 51.84 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
चालू रबी में बुबाई में हुई बढ़ोतरी के साथ ही मौसम भी अनुकूल होने से गेहूं का बंपर उत्पादन होने का अनुमान है। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में गेहूं की एमएसपी पर खरीद होगी, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में खरीद सीमित मात्रा में होने के कारण इन राज्यों की मंडियों में गेहूं का भाव एमएसपी से नीचे बिकेगा।

पासवान ने मिलों पर फिर बनाया चीनी कीमतें कम रखने का दबाव

गन्‍ना किसानों को उचित दाम और बकाया भुगतान दिलाने में नाकाम रहने वाली केंद्र सरकार चीनी मिलों पर लगातार कीमतेंं काबू में रखने का दबाव बना रही है। पिछले वर्षों के दौरान चीनी की कीमतों में गिरावट के चलते ही न तो किसानों को उपज का सही दाम मिल पाया और न ही चीनी मिलें समय पर भुगतान कर पा रही हैं। घाटे के बोझ में कई चीनी मिलें बंद होने के कगार पर हैं जबकि किसानों का भी गन्‍ने से मोहभंग होने लगा है।

शुक्रवार को खाद्य एवं उपभोक्‍ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि चीनी के दाम मौजूदा स्तर से बढ़तेे हैं तो सरकार आवश्यक कार्रवाई करेगी। चीनी की कीमतों पर नजर रखी जा रही है। हालांकि, देश में चीनी की कमी नहीं है और आगे कीमतों में वृद्धि के आसार भी कम हैं। लेकिन किसान काेे अक्‍सर बाजार के हवाले छोड़ने वाली सरकार चीनी के मामले में जबरदस्‍त हस्‍तक्षेप करने पर आमादा है। पासवान ने मिलों से चीनी कीमतों में स्थिरता बनाए रखने की अपील की है। जबकि जगजाहिर है कि चीनी कीमतों में कमी की सबसे ज्‍यादा मार किसानों पर पड़ती है।

इंडियन शुगर मिल्‍स एसोसिएशन (इस्‍मा) के डायरेक्‍टर जनरल अबिनाश वर्मा ने असलीभारत.कॉम को बताया कि पहले सरकार को यह देखना चाहिए क्‍या चीनी के दाम वाकई अत्‍यधिक बढ़ गए हैं। इस समय दिल्‍ली के खुदरा बाजार में चीनी का दाम 42 रुपये किलो है। चीनी मिलों के गेट पर दाम 35.5-36 रुपये किलो के आसपास है जबकि चीनी उत्‍पादन की लागत करीब 33 रुपये प्रति किलोग्राम आ रही है। अगर मिलों को दस फीसदी मार्जिन भी नहीं मिलेगा तो कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। वर्मा का कहना है कि पिछले साल चीनी के दाम बुरी तरह टूट गए थे और जिसके चलते मिलों पर कर्ज का बोझ है। इससे उबरने के लिए भी जरूरी है कि चीनी के दाम ठीक रहें। वर्मा के मुताबिक, इस साल चीनी की कीमतों में जो थोड़ा सुधार दिखा है दरअसल वह पिछले साल का करेक्‍शन है और दो साल पुराना दाम है। सरकार खुद मान रही है देश में चीनी की कमी है। ऐसे में इतनी जल्‍दी पैनिक होने की जरूरत नहीं है।

एथनॉल एक्‍साइज ड्यूटी पर छूट खत्‍म, चीनी मिलों का झटका

इस बीच, केंद्र सरकार ने चीनी मिलों को एथनॉल पर दी जा रही एक्‍साइज ड्यूटी की छूट वापस ले ली है। सरकार का यह कदम भी चीनी मिलों को चुभ रहा है। घाटे से जूझ रही मिलों को उबारने के लिए केंद्र सरकार ने यह रियायत दी थी, जो पेराई सीजन खत्‍म होनेे से पहले ही वापस ले ली गई है।

किसानों का अब भी 4 हजार करोड़ बकाया

चीनी के दाम का सीधा संबंध किसान से है। इस साल मार्च से चीनी के दाम करीब 10-12 फीसदी बढ़े हैं। दूसरी तरहगन्‍ना किसानों का बकाया भुगतान घटकर करीब 4 हजार करोड़़ रुपये गया है जो पिछले साल इसी समय 18 हजार करोड़ रुपये से ज्‍यादा था। यह हालत तब हैै कि जबकि पिछले तीन साल से गन्‍नाा मूल्‍य में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई। पिछले तीन-चार साल से उत्‍तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्‍ना उत्‍पादक राज्‍य में गन्‍नाा मूल्‍य 260-280 रुपये कुंतल के आसपास है। इस स्थिर मूल्‍य का भुगतान पाने के लिए भी किसानों को कई महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है।

दिखने लगा महाराष्‍ट्र के मंडी कानून में बदलाव का असर

मंडी कानून में बदलाव कर किसानो को ये अधिकार दे दिया गया की वे चाहें तो अपना उत्पाद डायरेक्ट उपभोक्ता या रिटेलर को बेच सकते हैं।

टमाटर 30 रुपया किलो खीरा 15 रुपया किलो भिन्डी और करेला 40 रुपय किलो! सब्जियों के ये दाम मुंबई में हैंं। मात्र 20 दिन पहले ये सभी सब्जियां 80 से 100 रुपया किलो बिक रही थीं। आम तौर पर बरसात के मौसम में सप्लाई की किल्‍लत रहती है। कभी फसल नुकसान के नाम पर तो कभी ट्रांसपोर्टेशन में दिक्कत के नाम पर अगस्त-सितम्बर में सब्जियां महँगी बिकती थीं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं है।

दरअसल पिछले महीने महराष्ट्र सरकार ने फल और सब्जियों को APMC यानी कृषि उत्‍पादन मंडी समिति की लिस्ट से बहार कर दिया। मंडी कानून में बदलाव कर किसानो को ये अधिकार दे दिया गया की वे चाहें तो अपना उत्पाद सीधे उपभोक्ता या रिटेलर को बेच सकते हैं। ठीक वैसे ही जैसे गाँव और छोटे कस्बों के बाज़ार में किसान सब्जी बाज़ार में अपना उत्पाद ले जाकर सीधे ग्राहकों को बेचते हैं। ऐसा ही कुछ हो रहा है मुंबई और उपनगरीय इलाकों में जहाँ किसान सीधे रिटेलर को अपना उत्पाद बेच रहे हैं इससे मार्केट में सप्लाई अचानक बढ़ गई है।

व्‍यापारियों की तरफ से पहले तो इस बदलाव का काफी विरोध हुआ। खास करके कमीशन एजेंटों ने इसका विरोध किया और सरकार पर दबाव बनाने के लिए तीन चार दिन के लिए राज्य भर की मंडियों को बंद कर दिया। नतीजा सब्जियों के दाम आसमान पर चढ़ने लगे। यह अफवाह भी फैलाई गई कि बगैर एजेंटों के कृषि बाज़ार का अस्तित्व ही नहीं रहेगा। दरअसल नए कानून के तहत किसानों से अब वे 4 से 6% का कमीशन नहीं ले सकते। बल्कि खरीददारों से उन्हें ये कमीशन लेना होगा। यहाँ ये बात बतानी ज़रूरी है कि अगर किसान डायरेक्ट अपना माल रिटेलर या कंजूमर को बेचता है तो कमीशन एजेंटों को कुछ भी वसूलने का हक़ नहीं होगा।

हालाँकि अभी यह बदलाव शुरूआती चरण में है। कमीशन एजेंट अभी भी दखल बनाने की कोशिश मेंं हैं लेकिन खबरे ये भी आ रही हैंं कि किसान अपना ग्रुप या अग्रीगेटर बना रहे हैं जो पूरे समूह की सब्जी को लेकर मुंबई जैसे बड़े बाजारों तक जायेंगे। अगर यह व्यवस्था सफल होती है तो पूूरे देश के लिए एक मिसाल कायम होगी। फिलहाल महाराष्ट्र के आलावा मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक में इस तरह की व्यवस्था है। लेकिन महाराष्ट्र में मुबई जैसे बड़े बाजार में ये ज्यादा असरदार दिख रही है। केंद्र सरकार ने पिछले साल ही फल और सब्जियों को APMC से बहार कर दिया था लेकिन कृषि बाजार राज्यों की सूची में होने की वजह से इसे लागू करने का अधिकार राज्यों पर ही है।

11 महीने में 17 कॉटन मिलें बंद, ‘मेक इन इंडिया’ को चुनौती

‘मेक इन इंडिया’ और उद्योगों को बढ़ावा देने के तमाम दावों के बावजूद 11 महीनों के दौरान देश में 17 कॉटन मिल्‍स बंद हो गई हैं। ये मिलें नकदी की कमी, घटते मुनाफे और बढ़ती उत्‍पादन लागत से जूझ रही थीं और आखिरकार अपना वजूद बचाने में नाकाम रहीं। यह स्थिति देश के टेक्‍सटाइल सेक्‍टर की चुनौतियों को उजागर करती है।

लोकसभा में सांसद राजू शेेट्टी और प्रो॰ यविन्द्र विश्‍वनाथ गायकवाड़ द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में कपड़ा राज्‍य मंत्री अजय टम्‍टा ने जून, 2016 से मई, 2016 के दौरान देश में 17 सूती/मानव निर्मित फाइबर टेक्‍सटाइल मिलों (गैर-एसएसआई) के बंद होने की जानकारी दी है। टम्‍टा ने बताया कि इन सूती मिलों के बंद होने की प्रमुख वजह पूंजी की कमी, नकदी का अभाव, बढ़ती उत्‍पादन लागत और घटना मुनाफा है।

हैरानी की बात तो यह है कि ‘मेक इन इंडिया’ और उद्योगों को बढ़ावा देनेे का दावा कर रही केंद्र सरकार के पास बंद कॉटन मिलों के पुनरूद्धार के लिए वित्‍त और तकनीकी सहायता की कोई योजना नहीं है। यह बात भी कपड़ा राज्‍य मंत्री अजय टम्‍टा ने लोकसभा में दिए अपने जवाब में स्‍वीकार की है।

सांसदों ने यह भी पूछा था कि क्‍या सरकार नए टेक्‍सटाइल/स्पिनिंग मिल्‍स कलस्‍टरों की स्‍थापना करने जा रही है? इसके जवाब में टम्‍टा ने बताया कि सरकार आमतौर पर नई टेक्‍सटाइल यूनिटें स्‍थापित नहीं करती। बल्कि उद्याेेगों और निजी उद्यमियों को बढ़ावा देने वाली नीतियां और माहौल सुनिश्चित करती है।

गौरतलब है कि इस समय देश में 1420 सेती/मानव निर्मित फाइबर टेक्‍सटाइल मिलें हैं। बंद हुईं 17 मिलों में से 6 तमिलनाडु, 3 आंध्र प्रदेश, 3 कर्नाटक और एक-एक तेलंगाना, हरियाणा, महाराष्‍ट्र, राजस्‍थान और उत्तर प्रदेश में हैं। फिलहाल देश में 14 सौ से ज्‍यादा कॉटन या मैन मेड फाइबर टेक्‍सटाइल मिल्स हैं।

जारी रहेगा कपास की कीमतों में तेजी का रुख

घरेलू उत्‍पादन में कमी के चलते इस साल कपास का भाव करीब 30-35 फीसदी ज्‍यादा हैं। अक्‍टूबर में नई फसल आने तक कपास की कीमतों में तेजी का रुख बने रहने के आसार हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने कॉटन कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया को अपना सारा कॉटन स्‍टॉक छोटे व लघु उद्योगों को बेचने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद क्रेडिट एजेंसी इंडिया रेटिंग का मानना है कि नई कपास बाजार में आने तक कीमतों में तेज गिरावट के आसार नहीं हैं।

गौरतलब है कि इस साल कपास की उपज का क्षेत्र कम रहने की आशंका जताई जा रही है। इसके अलावा पंजाब सहित कई क्षेत्रों में सफेद कीट के प्रकोप की वजह से उत्‍पादन में कमी आ सकती है। इस वजह से भी कपास की कीमतों में तेजी रह सकती है।

इंडिया रेटिंग की रिपोर्ट के अनुसार, लगातार दो वर्षों से कमजोर मानसून और कई राज्‍यों में कपास पर कीटों के प्रकोप की वजह से कपास उत्‍पादन गिरा है। वर्ष 2015-16 सीजन में देश का कपास उत्‍पादन 7.4 फीसदी घटकर 352 करोड़ बेल्‍स रहने का अनुमान है। विश्‍व स्‍तर पर भी कपास उत्‍पादन 18 फीसदी गिरने के आसार हैं।

टमाटर की महंगाई के बावजूद क्‍यों घाटे में रहा किसान?

अत्‍यधिक गर्मी के कारण इस साल टमाटर की फसल कई तरह की बीमारियों की चपेट में रही। जिससे उत्‍पादन पर असर पड़ा।

टमाटर की कीमतों में आए उछाल ने देश की राजनीति को गरमा दिया। थोक मंडियों में आवक कम होने से कई शहरों में टमाटर की कीमतें 100 रुपये तक पहुंच गईंं। हालांकि, अब टमाटर की कीमतें काबू में आने लगी है। लेकिन खुदरा कीमतों में जबरदस्‍त उछाल के बावजूद किसानों को इसका फायदा मिल। आईये समझते हैं आखिर क्‍यों महंगा हुआ टमाटर-

सूखे की मार, वायरस का हमला

देश के विभिन्‍न राज्‍यों में टमाटर की पैदावार घटने से कीमतें अचानक चढ़ गईं। इस साल सूखे के कारण महाराष्‍ट्र और मध्‍य प्रदेश में टमाटर की काफी फसल बर्बाद हो गई। अत्‍यधिक गर्मी के कारण टमाटर की फसल कई तरह की बीमारियों और कीटों की चपेट में रही।  उत्‍पादन गिरने का सीधा असर मंडियों में टमाटर की आवक पर पड़ा जिसके बाद दाम बढ़ने लगे।

प्रति एकड़ 50 हजार तक का नुकसान

इस साल देश के 13 राज्‍यों में पड़े भयंकर सूखे की मार टमाटर की फसल पर भी पड़ी है। टमाटर उत्‍पादक आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्‍ट्र, मध्‍य प्रदेश, कर्नाटक और केरल में इस साल उत्‍पादन कम है। दरअसल, अप्रैल से ही भीषण गर्मी और गर्म हवाओं के चलते टमाटर में फूल ही नहीं आए। टमाटर उत्‍पादक राज्‍यों में सिंचाई की कमी के चलते भी इस साल उत्‍पादन पर असर पड़ा। एक एकड़ में टमाटर की फसल पर करीब 70 हजार रुपए का खर्च आता है। जबकि लागत निकालने के बाद किसान के हाथ में 30 से 40 हजार रुपए ही आ रहे हैं।

टस्‍पा वायरस का प्रकोप

देश के प्रमुख टमाटर उत्‍पादक राज्‍य महाराष्‍ट्र में तकरीबन सवा लाख हेक्‍टेअर क्षेत्र में टमाटर की खेती होती है। इसमें से करीब 30 हजार हेक्‍टेयर क्षेत्र में सिजेंटा कंपनी का बीज टीओ-1057 को लगाया गया था।  मिली जानकारी के अनुसार, सिजेंटा के बीजों पर टस्‍पा वायरस का प्रकोप काफी रहा। इस वायरस से टमाटर तीन रंग लाल, पीला और हरा पड़कर खराब हो जाता है। इसके अलावा बाकी किस्‍म के टमाटर में भी किसी में टस्‍पा और किसी में पत्तियां सिकुड़ने का रोग लगा। नतीजा यह हुआ कि प्रति हेक्‍टेअर टमाटर का उत्‍पादन 60-70 टन से घटकर 10-20 टन पर आ गया।

महाराष्‍ट्र सरकार ने बीज पर लगाया प्रतिबंध 

सिजेंटा कंपनी ने फसल खराब होने की दशा में किसानों को इसकी क्षतिपूर्ति दिए जाने का वादा किया था। लेकिन कंपनी अपने वादे से मुकर गई। किसानों की शिकायत पर राज्‍य सरकार ने सिजेंटा की टीओ-1857 प्रजाति के बीज पर प्रतिबंध लगा दिया है।

गेहूं पर आयात शुल्‍क वापस लेने की तैयारी, जानिए क्‍या होगाा असर?

केंद्र सरकार गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी के मद्देनजर आयात शुल्‍क वापस ले सकती है।

केंद्र सरकार गेहूं की कीमतों में बढ़ोतरी के मद्देनजर आयात शुल्‍क वापस ले सकती है। फिलहाल गेहूं पर 25 फीसदी आयात शुल्‍क है जिसकी वजह से विदेश से गेहूं का आयात करना महंगा साबित होता है। आयात शुल्‍क हटने के बाद सरकारी एजेंसियों और व्‍यापारियों के लिए विदेशी गेहूं मंगाने की राह आसान हो जाएगी।

उल्‍लेखनीय है कि इस साल गेहूं की सरकारी खरीद काफी कम रही है। पिछले साल इस अवधि तक कुल 280 लाख टन गेहूं की सरकारी खरीद हुई थी जबकि इस साल यह आंकड़ा सिर्फ 229 लाख टन रह पाया है। इस साल सूखे के कारण गेहूं उत्‍पादन में कमी और अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में नरमी के रुख को भांपते हुए कई व्‍यापारियों ने विदेश से गेहूं खरीद के सौदे किए हैं।

11 फीसदी घट सकता है चीनी उत्‍पादन

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा का अनुमान है कि पेराई वर्ष 2015-16 में घरेलू चीनी उत्‍पादन 11 फीसदी घटकर 252 लाख टन रह सकता है।

नई दिल्‍ली। पिछले कई वर्षों में गन्‍ना मूल्‍य में हुई मामूली वृद्ध‍ि और भुगतान में देरी का असर देश में चीनी उत्‍पादन पर भी पड़ रहा है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इक्रा का अनुमान है कि पेराई वर्ष 2015-16 में घरेलू चीनी उत्‍पादन 11 फीसदी घटकर 252 लाख टन रह सकता है। गौरतलब है कि देश के प्रमुख गन्‍ना उत्‍पादन राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में किसानों का गन्‍ने से मोहभंग होना शुरू हो गया है। इसका असर गन्‍ने की खेती और चीनी उत्‍पादन पर पड़ना तय है।

बकाया भुगतान और उचित मूल्‍य के लिए गन्‍ना किसानों को आंदोलन और धरना-प्रदर्शन करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हालांकि, पिछले कुछ महीनों में चीनी की कीमत सुधरने से गन्‍ने किसानों को बेहतर दाम मिलने की आस जगी है। कई राज्‍यों में सूखे के हालात, चीनी के निर्यात और अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में चीनी की कमी के चलते पिछले साल अगस्‍त से चीनी के दाम बढ़ रहे हैं।

इससे पहले भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) ने आगामी पेराई सत्र में चीनी उत्‍पादन 4 प्रतिशत घटकर करीब 240 लाख टन रह जाने की संभावना जताई थी।