क्या गांव-किसान की सुध लेगा बजट?

एक फरवरी को पेश होने वाले बजट पर सारे देश की निगाहें लगी हैं। लगातार गिरती जीडीपी विकास दर, बढ़ती महंगाई दर और बेरोजगारी, मांग और निवेश की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक आपदा आदि की समस्याओं से वित्त मंत्री देश को कैसे निकालती हैं, यह अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय है। मंदी के बादलों को हटाने में बजट में क्या कदम उठाए जाते हैं सभी जानना चाहते हैं। परन्तु इस मंदी से उबरने का रास्ता केवल ग्रामीण भारत से होकर ही गुजरता है।

वर्तमान वित्त वर्ष का कुल बजट लगभग 27,86,349 करोड़ रुपये है। इसमें से कृषि मंत्रालय को 138,564 करोड़ रुपये, ग्रामीण विकास मंत्रालय को 117,650 करोड़ रुपये, रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी के लिए 80,000 करोड़ रुपये, तथा मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय को मात्र 3,737 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। इन सबको जोड़ दें तो ग्रामीण भारत का 2019-20 का कुल बजट लगभग 340,000 करोड़ रुपए है। यह सम्पूर्ण बजट का लगभग 12 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण भारत में लगभग 70 प्रतिशत आबादी बसती है। अब यह कितना उचित है यह बात पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं।

मार्च 2018 की तिमाही में देश की जीडीपी विकास दर 8.1 प्रतिशत थी जो सितम्बर 2019 की तिमाही में गिरकर 4.5 प्रतिशत पर आ गई है। वित्त वर्ष 2019-20 में जीडीपी विकास दर पांच प्रतिशत से कम रहने का अनुमान है। अर्थव्यवस्था में छाई मंदी का मूल कारण मांग की कमी बताया गया है। इससे उबरने के लिए हमें ग्रामीण क्षेत्र के लिए उचित मात्रा में बजट आवंटन करना होगा। इससे मांग तत्काल बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था के पहिये गति के साथ चल पड़ेंगे।

सरकार ने एक बहुत ही सराहनीय योजना- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम- किसान) शुरू की है। इस योजना का 2019-20 में 75,000 करोड़ रुपये का बजट है। परन्तु इस वर्ष इस बजट में से केवल 50,000 करोड़ रुपये ही बांटे जाने की संभावना है। इसके पीछे किसानों का धीमी गति से सत्यापन होना है। अब तक इस योजना में कुल 14.5 करोड़ किसानों में से केवल 9.5 करोड़ किसानों का ही पंचीकरण हुआ है। इनमें से अभी तक केवल 7.5 करोड़ किसानों का ही सत्यापन हो पाया है। बंगाल जैसे कुछ राज्यों ने राजनीतिक कारणों से अभी तक अपने एक भी किसान का पंजीकरण नहीं करवाया है, जो वहां के किसानों के साथ एक अन्याय है। परन्तु खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए आगामी बजट में इसमें दी जाने वाली राशि को 6,000 रुपये से बढ़ाकर 24,000 रुपये प्रति किसान प्रति वर्ष किया जाना चाहिए। भविष्य में भी इस योजना की राशि को महंगाई दर के सापेक्ष बढ़ाना चाहिए। किसानों को 24,000 रुपये मिलने से ग्रामीण क्षेत्रों में तुरन्त क्रय-शक्ति बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था की गाड़ी तेजी से आगे बढ़ेगी।

पशुपालन और दुग्ध उत्पादन कृषि का अभिन्न अंग है और कृषि जीडीपी में इसकी लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है। परन्तु पशुपालन और डेयरी कार्य हेतु बजट मात्र 2,932 करोड़ रुपये है। दुग्ध उत्पादन और पशुपालन जैसी अति महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि का बजट कृषि बजट का कम से कम 30 प्रतिशत यानी लगभग 45,000 करोड़ रुपये होना चाहिए।

पशुपालन से होने वाली आय कृषि आय की तरह आयकर से भी मुक्त नहीं है। आगामी बजट में इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए। दूध के क्षेत्र में अमूल जैसी किसानों की अपनी सहकारी संस्थाएं काम कर रही हैं। ये उपभोक्ता द्वारा खर्च की गई राशि का 75 प्रतिशत किसानों तक पहुंचाती हैं। पिछले साल सरकार ने घरेलू कंपनियों के आयकर की दर को 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत कर दिया था, परन्तु किसानों की इन सहकारी संस्थाओं पर आयकर पहले की तरह 30 प्रतिशत की दर से ही लग रहा है। जबकि 2005-06 तक इन सहकारी संस्थाओं पर कंपनियों के मुकाबले पांच प्रतिशत कम दर से आयकर लगता था। कंपनियों से भी अधिक आयकर लगाना किसानों के साथ अन्याय है, इसे तत्काल 2005-06 से पहले वाली व्यवस्था के अनुरूप यानी 17 प्रतिशत किया जाना चाहिए।

2012 तक किसानों की सहकारी संस्थाओं को मिलने वाले ऋण को रिज़र्व बैंक ‘प्राथमिक क्षेत्र कृषि ऋण’ के रूप में परिभाषित करता था। आगामी बजट में 2012 से पहले की स्थिति को बहाल कर किसानों की इन सहकारी संस्थाओं को मिलने वाले ऋण को रिज़र्व बैंक पुनः ‘प्राथमिक क्षेत्र को दिए कृषि ऋण’ के रूप में ही परिभाषित करे, ताकि किसानों की इन संस्थाओं को महंगा ऋण लेने के लिए मजबूर ना होना पड़े। सरकार को दुग्ध उत्पादन की लागत कम करने हेतु सस्ता पशु-आहार, सस्ती पशु-चिकित्सा और दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए बजट में कदम उठाने चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती आवारा पशुओं की संख्या एक विकराल समस्या बन गई है। इनकी संख्या सीमित करने और इनके आर्थिक उपयोग के लिए विशेष बजट प्रावधान करने होंगे।

ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की मनरेगा योजना का बजट 60,000 करोड़ रुपये है। इस योजना को खेती किसानी से जोड़ने की आवश्यकता है ताकि किसानों की श्रम की लागत कम हो और इस योजना में गैर उत्पादक कार्यों में होने वाली धन की बर्बादी को रोका जा सके।

कृषि हेतु रासायनिक उर्वरकों की सब्सिडी 80,000 करोड़ रुपये है। यूरिया खाद पर अत्यधिक सब्सिडी के कारण इस खाद का ज़रूरत से ज्यादा प्रयोग हो रहा है जिससे ज़मीन और पर्यावरण दोनों का क्षरण हो रहा है। इस सब्सिडी को भी सीधे किसानों के खातों में नकद भेजा जाए तो खाद सब्सिडी में भारी कमी भी होगी और रासायनिक खाद का अत्यधिक मात्रा में प्रयोग भी बंद होगा।

हम तिलहन को छोड़कर बाकी लगभग सभी कृषि उत्पादों में आत्मनिर्भर हैं या घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन कर रहे हैं। अतः हमें बजट में कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण, भंडारण, शीतगृहों और वितरण प्रणाली की आधारभूत संरचना को विकसित करने हेतु उचित आवंटन करना होगा। हमें कृषि उत्पाद विपणन अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम जैसे कानूनों से भी कृषि उत्पादों के व्यापार को मुक्त करने की दिशा में बढ़ना होगा।

आज गेहूं-चावल के अत्यधिक मात्रा में भंडार होने से परेशान है। दिसंबर 2019 में भारतीय खाद्य निगम के भंडारों में लगभग 213 लाख टन चावल और 352 लाख टन गेहूं था, यानी कुल मिलाकर इन दोनों खाद्यान्नों का स्टॉक 565 लाख टन था। जबकि 1 जनवरी को यह बफर स्टॉक 214 लाख टन होना चाहिए। इसके अलावा 260 लाख टन धान भी गोदामों में पड़ी है। देश का खाद्य सब्सिडी का बिल 1.84 लाख करोड़ रुपये है जिसे तत्काल कम किया जाना चाहिए। खाद्य सब्सिडी को वास्तविक जरूरतमंदों तक ही सीमित करना होगा। इसके लिए लाभार्थियों को सीधे नकद राशि हस्तांतरण करना उचित होगा।

कृषि उत्पादों का निर्यात किसानों की आमदनी बढ़ाने में बहुत मददगार होता है। भारत ने 2013-14 में 4,325 करोड़ डॉलर (आज के मूल्यों में लगभग तीन लाख करोड़ रुपये) मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया था, परन्तु इसके बाद हम इस स्तर को कभी भी छू नहीं पाए। अतः हमें बजट में कृषि जिन्सों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विशेष बजट प्रावधान करने होंगे। अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए ग्रामीण भारत के लिए उठाए गए ये कदम अत्यधिक उपयोगी साबित होंगे।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष है)

 

क्यों घाटे में हैं दूध उत्पादक किसान?

दूध के बढ़ते दामों से चिंतित केंद्र सरकार ने पिछले दिनों सभी प्रमुख डेरियों की एक बैठक बुलाई थी। प्याज के मामले में किरकिरी होने के बाद सरकार दूध को लेकर पहले ही सतर्क रहना चाहती है। कुछ दिनों पहले ही डेयरियों ने दूध के दाम दो से तीन रुपये प्रति लीटर बढ़ाए हैं। यह पिछले सात महीनों में दूसरी बढ़ोतरी थी। दूध के दाम बढ़ने के कारणों को जानने के लिए पिछले दस वर्षों में दूध की कीमतों और सरकारी नीतियों का आंकलन करना जरूरी है।

फरवरी 2010 में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध का दाम 30 रुपये प्रति लीटर थे, जो मई 2014 में बढ़कर 48 रुपये प्रति लीटर हो गए। यानी दूध का दाम सालाना औसतन 15 प्रतिशत की दर से बढ़ा। मोदी सरकार के पांच सालों के कार्यकाल में दिल्ली में फुल-क्रीम दूध का दाम मई 2014 में 48 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर मई 2019 में 53 रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गया। यानी हर साल औसतन महज 2.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। इस अवधि में 3.3 प्रतिशत की उपभोक्ता खाद्य महंगाई दर को देखते हुए दूध के वास्तविक दाम घट गए। मतलब, जब खाने-पीने की बाकी चीजों के दाम सालाना 3.3 फीसदी की दर से बढ़े तब दूध के दाम में केवल 2.1 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। महंगाई को जोड़कर देखें तो दूध उत्पादक किसानों को नुकसान ही हुआ।

दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत और खाद्य महंगाई दर के हिसाब से दूध के दाम कम से कम 7 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ते, तब भी मई 2019 में फुल-क्रीम दूध का दाम कम से कम 65 रुपये प्रति लीटर होना चाहिए था। जबकि 15 दिसंबर को हुई बढ़ोतरी के बाद भी फुल-क्रीम दूध का दाम दिल्ली में 55 रुपये प्रति लीटर ही हैं। यानी हालिया बढ़ोतरी के बावजूद उपभोक्ताओं को दूध लगभग 10 रुपये लीटर सस्ता मिल रहा है।

डेयरी क्षेत्र में अमूल जैसी सहकारी संस्थाओं के कारण एक तरफ तो उपभोक्ताओं को दूध के बहुत अधिक दाम नहीं चुकाने पड़ते, वहीं दूसरी तरफ दूध के दाम का लगभग 75 फीसदी पैसा दूध उत्पादकों तक पहुंचता है। देश में हर साल किसान लगभग 10 करोड़ टन दूध बेचते हैं। दूध के दाम 10 रुपये प्रति लीटर कम मिलने के कारण दुग्ध उत्पादक किसान लगभग एक लाख करोड़ रुपये सालाना का नुकसान अब भी सह रहे हैं।

दुग्ध उत्पादन की बढ़ती लागत को देखते हुए किसान पशुओं को उचित आहार और चारा भी नहीं खिला पा रहे हैं। पशुओं के इलाज और रखरखाव पर होने वाले खर्चे में भी कटौती करनी पड़ी। डीज़ल के दाम और मजदूरी भी पिछले पांच सालों में काफी बढ़े हैं, जिसका प्रभाव दूध के दामों में दिख रहा है। इस बीच, ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा पशुओं की संख्या बेतहाशा बढ़ी है जो दुधारू पशुओं के हरे चारे को बड़ी मात्रा में खेतों में ही खा जाते हैं। इसका असर दुधारू पशुओं के लिए चारे और पशु-आहार की उपलब्धता पर पड़ रह है।

भारतीय चरागाह और चारा अनुसंधान संस्थान के अनुसार देश में हरे चारे की 64 प्रतिशत और सूखे चारे की 24 प्रतिशत कमी है। हाल के वर्षों में पशु-आहार जैसे खल, चूरी, छिलका आदि के दाम भी काफी बढ़े हैं जिस कारण दुग्ध उत्पादन की लागत में काफी वृद्धि हुई है।

गौरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और सरकारी नीतियों के कारण बांझ और बेकार पशुओं का व्यापार और परिवहन बहुत जोखिम भरा हो गया है। इस कारण अनुपयोगी पशुओं खासकर गौवंश का कारोबार लगभग समाप्त हो गया है। इन्हें बेचकर किसानों के हाथ में कुछ पैसा आ जाता था, जो नये पशुओं की खरीद और मौजूदा पशुओं की देखरेख पर खर्च होता था। आय का यह स्रोत लगभग समाप्त हो गया है, उल्टा आवारा पशु ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों पर बोझ बन गए हैं। इसका खामियाजा एक तरफ दुग्ध उत्पादन किसानों को तो दूसरी तरफ महंगे दूध के रूप में उपभोक्ताओं को उठाना पड़ रहा है।

इस बीच सहकारी और निजी डेयरियों द्वारा किसानों से खरीदे जाने वाले दूध की मात्रा पिछले साल के मुकाबले 5-6 प्रतिशत कम हुई है। इस वर्ष विलंब से आये मानसून के कारण कई राज्यों में पहले तो सूखा पड़ा, फिर बाद में अत्यधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बन गई। इस कारण भी चारे की उपलब्धता घटी है। अक्टूबर से मार्च के बीच का समय दूध के अधिक उत्पादन का सीजन होता है जिसे ‘फ्लश सीज़न’ कहते हैं। इस दौरान दूध के दाम बढ़ने की संभावना ना के बराबर होती है। लेकिन इस बार सर्दियों में दाम बढ़ाने के बावजूद डेरियों की दूध की खरीद में गिरावट आना अच्छा संकेत नहीं है।

पिछले साल जब देश में दूध पाउडर का काफी स्टॉक था और इसके दाम गिरकर 150 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर पर आ गए थे, तब सरकार ने दूध पाउडर के निर्यात के लिए 50 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी दी थी। अब दूध पाउडर के दाम दोगुने होकर 300 रुपये प्रति किलोग्राम हो गए हैं। यदि पिछले साल सरकार दूध पाउडर का बफर स्टॉक बना लेती तो उस वक्त किसानों को दूध की कम कीमत मिलने से नुकसान नहीं होता और आज उपभोक्ताओं को भी बहुत अधिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

 

प्याज, लहसुन के बाद क्यों बढ़ने लगे खाद्य तेलों के दाम

इस साल तिलहन की कम बुवाई और भारी बारिश से फसलों को नुकसान के चलते देश में सोयाबीन का उत्पादन 18-20 फीसदी गिरने की आशंका है। सरसों और मूंगफली की बुवाई भी पिछले साल से कम है। यही वजह है कि इस साल आयातित खाद्य तेलों पर देश की निर्भरता बढ़ गई है और महंगे आयात की वजह से खाद्य तेलों के दाम बढ़ रहे हैं। चालू सीजन में सोयाबीन का आयात बढ़कर तीन लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले फसल सीजन में 1.80 लाख टन का आयात हुआ था।

अभी तक रबी तिलहन की बुआई 71.79 लाख हेक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 73.08 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन आफ इंडिया (सोपा) के अनुसार चालू फसल सीजन में सोयाबीन का उत्पादन घटकर 89.84 लाख टन रहने का अनुमान है जो पिछले साल 109.33 लाख टन था। उत्पादन में कमी और आयात महंगा होने की वजह से खाद्य तेलों के दाम आने वाले दिनों में और बढ़ सकते हैं।

देश में घरेलू खपत के मुकाबले तिलहन का उत्पादन कम होता है, जिसकी भरपाई के लिए इंडोनेशिया, मलेशिया और दक्षिण अमेरिकी देशों से खाद्य तेलों खासकर पाम ऑयल का आयात किया जाता है। भारत दुनिया में खाद्य तेलों का सबसे बड़ा इंपोर्टर है। सरकार तिलहन फसलों को बढ़ावा और उचित दाम दे तो खाद्य तेलों के आयात पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रुपये किसानों की जेब में जा सकते हैं।

 

प्याज 165 रुपये किलो! ममता नाराज, “केंद्र ने भेजा सड़ा प्याज”

प्याज की बढ़ती कीमतों के बीच इसे लेकर केंद्र और राज्यों के बीच तकरार तेज हो गई है। शुक्रवार को देश में प्याज का अधिकतम खुदरा दाम 165 रुपये किलो तक पहुंच गया। केंद्र सरकार प्याज का आयात कर दाम काबू में लाने की कोशिशों में जुटी है। लेकिन इन कोशिशों का असर दिखने में  एक से डेढ़ महीने का समय लग सकता है।

देश के ज्यादातर महानगरों में प्याज के दाम 100 रुपये किलो से ऊपर हैं। यहां तक कि महाराष्ट्र के नासिक के खुदरा बाजार में भी प्याज 75 रुपये किलो बिक रहा है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के अनुसार, शुक्रवार को देश में प्याज का सर्वाधिक खुदरा भाव गोवा के पणजी में 165 रुपये किलो रहा। दिल्ली से सटे गुडगांव में प्याज 120 रुपये किलो बिक रहा है तो ओडिशा के कटक व भुवनेश्वर में प्याज का खुदरा भाव 130 रुपये किलो तक पहुंच गया है। राजधानी दिल्ली में प्याज की कीमतें 100 रुपये किलो के आसपास हैं।

केंद्र पर निकला ममता बनर्जी का गुस्सा

कोलकाता में प्याज का दाम 140 रुपये किलो पहुंच चुका है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसके लिए केंद्र सरकार पर जमकर निशाना साधा। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने बंगाल को 200 टन के बजाय सिर्फ 20 टन प्याज भेजा, जिसमें से 10 टन प्याज सड़ा हुआ था। इस मुद्दे पर उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सड़कों पर उतरने को कहा है। इससे पहले दिल्ली की केजरीवाल सरकार भी प्याज आपूर्ति के मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेर चुकी है।

बारिश ने बिगाड़ा खेल

इस साल मानसून में देरी और फिर कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में ज्यादा बारिश की वजह से प्याज का उत्पादन 26 फीसदी कम है। इस बार बुवाई भी पिछले साल से कम रकबे में हुई थी, जिसके कारण उत्पादन घटा।

इस संकट को दूर करने के लिए केंद्र सरकार प्याज का आयात करवा रही है। राज्य सभा को दी जानकारी में सरकार ने बताया कि विदेशी प्याज 20 जनवरी तक पहुंचना शुरू होगा। यानी प्याज की कीमतें कम होने में समय लगेगा। इस साल केंद्र सरकार ने 1.2 लाख टन प्याज के आयात की मंजूरी दी है। आयात की प्रक्रिया में कई तरह की रियायतें दी गई हैं।

मिस्र और तुर्की की प्याज का इंतजार

गुरुवार को खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने ट्वीट किया था कि प्याज की उपलब्धता बढ़ाने के लिए 6090 टन प्याज मिस्र और 11000 टन प्याज तुर्की से मंगाया है जो 15 दिसंबर से 15 जनवरी के बीच उपलब्ध हो जाएगा। तुर्की से और 4000 टन प्याज जनवरी के मध्य तक बाजार में आ जाएगा।

 

 

 

किसानों के साथ धोखा? कम आंकी जा रही है उपज की लागत

इन बातों पर यकीन करना मुश्किल है! लेकिन आजकल बहुत कुछ मुमकिन है। पिछले पांच वर्षों के दौरान जिन क्षेत्रों में क्रांतिकारी कारनामे हुए हैं, उनमें आंकड़ेबाजी अहम है। केंद्र सरकार के आंकड़ों पर भरोसा करें तो पिछले पांच वर्षों में किसानों की आमदनी दोगुनी भले न हुई हो, लेकिन खेती की लागत बढ़ने कम हो गई है। लागत में इस ठहराव यानी कमतर लागत के आधार पर ही केंद्र सरकार खरीफ फसलों के एमएसपी में भारी बढ़ोतरी का दावा कर रही है। कई अखबारों ने इसे बजट से पहले किसानों को सरकार का तोहफा करार दिया। कुछ लोगों ने मास्टर स्ट्रोक भी बताया ही होगा।

दावा और हकीकत

खुद केंद्र सरकार का दावा है कि खरीफ सीजन 2019-20 के लिए फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में हुई बढ़ोतरी से किसानों को लागत पर 50 से लेकर 85 फीसदी का लाभ मिलेगा। सरकार लागत पर डेढ़ गुना मुनाफा देने के वादे से काफी आगे निकल चुकी है।

एमएसपी की मामूली बढ़ोतरी को सरकार का तोहफा बताने की होड़

 

अब जरा इन दावों की हकीकत भी जान लीजिए। सामान्य किस्म के धान का एमएसपी इस साल सिर्फ 65 रुपये प्रति कुंतल बढ़ा है जो 4 फीसदी से भी कम है। लेकिन दावा है कि इस मामूली बढ़ोतरी के बावजूद किसानों को लागत पर 50 फीसदी रिटर्न मिलेगा। पता है कैसे? जिस लागत के आधार पर सरकार यह दावा कर रही है वह लागत पिछले पांच साल में सिर्फ 23 फीसदी बढ़ी मानी गई है। जबकि धान की खेती की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 114 फीसदी बढ़ी थी। मतलब, सरकारी अर्थशास्त्रियों ने 2014 के बाद धान उत्पादन की लागत को बढ़ने ही नहीं दिया। लागत बढ़ाएंगे तो एमएसपी भी ज्यादा बढ़ाना पड़ेगा। लागत को ही कम से कम रखें तो एमएसपी में मामूली बढ़ोतरी भी ज्यादा दिखेगी। सीधा गणित है।

खरीफ फसलों की अनुमानित लागत (रुपये प्रति कुंतल में )

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ नीति रिपोर्ट  https://cacp.dacnet.nic.in/KeyBullets.aspx?pid=39

 

सरकारी अर्थशास्त्री अपनी पर आ जाएं तो आंकड़ों को अपने पक्ष में घुमाना उनके बाएं हाथ का खेल है। मोदी सरकार के आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम इस मुद्दे पर पूरा रिसर्च पेपर लिख चुके हैं कि हाल के वर्षों में भारत सरकार ने कैसे जीडीपी की ग्रोथ रेट को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। लेकिन किसानों के मामले में उल्टा हुआ। सरकारी अर्थशास्त्री किसानों की लागत बढ़ने ही नहीं दे रहे हैं। जमीन पर भले कितनी ही महंगाई क्यों ना हो, कागजों में खेती फायदे का सौदा साबित की जा रही है।

लागत पर ब्रेक और डेढ़ गुना दाम का दावा

फसलों का एमएसपी कितना होना चाहिए और उपज की लागत क्या आंकी जाए? इस हिसाब-किताब के लिए कृषि लागत एवं मूल्य आयोग नाम की एक सरकारी संस्था है जो भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत काम करती है। इसमें दिग्गज कृषि अर्थशास्त्री बैठकर तय करते हैं कि किस उपज पर कितनी लागत आती है। विभिन्न राज्यों से कृषि लागत के आंकड़े जुटाए जाते हैं। महंगाई, आयात-निर्यात, वैश्विक बाजार और मौजूदा भंडार को देखते हुए फसलों के एमएसपी तय किए जाते हैं।

2009-10 खरीफ सीजन के लिए सीएसीपी ने तुहर यानी अरहर दाल की वास्तविक उत्पादन लागत (ए2 + एफएल) 1181 रुपये प्रति कुंतल आंकी थी। (ए2 + एफएल) वह लागत है जिसमें खेती पर आने वाले तमाम वास्तविक खर्च जैसे बीज, खाद, मजदूरी, सिंचाई, मशीनरी, ईंधन का खर्च और खेती में लगे कृषक परिवार के श्रम का अनुमानित मूल्य शामिल होता है।

इस प्रकार 2009-10 में तुहर उत्पादन की जो लागत 1181 रुपये प्रति कुंतल थी, वह 2014-15 तक बढ़कर 3105 रुपये हो गई। यानी पांच साल में तुहर की लागत 163 फीसदी या ढाई गुना से ज्यादा बढ़ी। ताज्जुब की बात है कि 2014 के बाद तुहर की लागत बढ़ने का सिलसिला थम-सा गया। 2014-15 से 2019-20 के बीच पांच वर्षों में तुहर की लागत सिर्फ 17 फीसदी बढ़कर 3636 रुपये प्रति कुंतल तक ही पहुंची। कहां पहले पांच वर्षों में 163 फीसदी की वृद्धि और कहां अब पांच साल में केवल 17 फीसदी की बढ़ोतरी? है ना कमाल! एक ही फसल, एक ही देश लेकिन लागत बढ़ती इतनी कम कैसे हो गई। यह सवाल तो उठेगा।

बड़ा सवाल

यह शोध का विषय है कि जिन फसलों की लागत 2014 से पहले पांच वर्षों में 100 फीसदी से ज्यादा बढ़ी थी, 2014 के बाद उनकी लागत 20-30 फीसदी ही क्यों बढ़ी है? यह सिर्फ अर्थशास्त्रियों का कारनामा है या फिर इसके पीछे राजनीतिक इच्छाशक्ति भी सक्रिय है?

खुद सीएसीपी के आंकड़े बताते हैं कि 2014-15 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों की लागत 66 से 163 फीसदी तक बढ़ी थी। धान की लागत 114 फीसदी तो ज्वार की लागत 122 फीसदी बढ़ी थी। लेकिन 2014-15 के बाद के पांच वर्षों में खरीफ फसलों की लागत 5 से 43 फीसदी ही बढ़ी है। इस दौरान सबसे ज्यादा 43 फीसदी लागत सोयाबीन की बढ़ी जबकि सबसे कम 5 फीसदी लागत मूंगफली की बढ़ी है। यहां सबसे बड़ा सवालिया निशान खेती की लागत और एमएसपी तय करने की सरकारी प्रक्रिया पर है, जिसमें किसानों की हिस्सेदारी नाममात्र की रहती है।

किसानों पर दोहरी मार, फार्मूला और लागत का खेल

सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि केंद्र सरकार ने किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा देना का शॉर्टकट ढूंढ़ लिया है। जब कमतर लागत को आधार बनाया जाएगा तो एमएसपी में थोड़ी बढ़ोतरी भी डेढ़ गुना बताई जा सकती है। यह बहस तब भी खड़ी हुई थी जब केंद्र सरकार ने समग्र लागत (सी2), जिसमें किसान की अपनी जमीन का अनुमानित किराया और पूंजी पर ब्याज भी शामिल होता है, की बजाय वास्तविक लागत (ए2 + एफएल) के आधार पर डे़ढ़ गुना एमएसपी देने का वादा किया था। पिछले पांच साल के आंकड़े बताते हैं कि जिस कमतर लागत को सरकार आधार मान रही है, उनमें भी साल दर साल बेहद कम बढ़ोतरी आंकी जा रही है। यह किसानों पर दोहरी मार है।

जाहिर है कमतर लागत के आधार पर ही सरकार एमएसपी में बढ़ोतरी की वाहवाही बटोरना चाहती है। जबकि तथ्य यह है कि 2014 से पहले पांच वर्षों में अधिकांश खरीफ फसलों के एमएसपी 2014 के बाद पांच वर्षों के मुकाबले ज्यादा बढ़े थे। 2014 से 2019 के बीच केवल बाजरा, रागी, नाइजर बीज और कपास (लंबा रेशा) के एमएसपी में पहले 5 सालों के मुकाबले अधिक वृद्धि हुई है। जबकि 2009 से 2014 के बीच मुख्य खरीफ फसलों जैसे – धान, ज्वार, मक्का, तुहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सूरजमुखी, कपास और सोयाबीन के एमएसपी पिछले पांच वर्षों के मुकाबले अधिक बढ़े थे। खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी के लिहाज से डॉ. मनमोहन सिंह का कार्यकाल पिछले पांच वर्षों से कमतर नहीं बल्कि बेहतर ही था।

खरीफ फसलों के एमएसपी में 1 से 9 फीसदी की बढ़ोतरी

इस साल खरीफ फसलों के एमएसपी में जो मामूली बढ़ोतरी हुई है, उसे छिपा पाना मुश्किल है। खरीफ सीजन 2019-20 के लिए उपज एमएसपी में 1.1 फीसदी से लेकर 9.1 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है। सबसे कम 1.1 फीसदी यानी 75 रुपये का इजाफा मूंग के एमएसपी में हुआ है। जबकि सबसे अधिक 9.1 फीसदी यानी 311 रुपये की वृद्धि सोयाबीन के एमएसपी में की गई है। खरीफ की प्रमुख फसल धान का एमएसपी सिर्फ 65 रुपये यानी 3.7 फीसदी ही बढ़ा है। कपास के एमएसपी में भी 1.8 – 2.0 फीसदी की मामूली वृद्धि हुई है। किसान को लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने और आमदनी दोगुनी के सरकारी दावे की फिलहाल यही असलियत है।

खरीफ फसलों के एमएसपी  (रुपये प्रति कुंतल)

स्रोत: सीएसीपी की सालाना खरीफ रिपोर्ट, सीएसीपी के आंकड़े https://cacp.dacnet.nic.in/ViewContents.aspx?Input=1&PageId=36&KeyId=0 और पीआईबी की विज्ञप्ति http://pib.nic.in/PressReleseDetail.aspx?PRID=1576842

 

किसानों को उपज की लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से निकली यह बात 2014 में भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र तक पहुंच गई थी। मोदी सरकार ने सैद्धांतिक रूप से डेढ़ गुना दाम की नीति को अपनाया था। मगर इस पर अमल करने के तरीके में कई झोल हैं।

जिस लागत के आधार पर डेढ़ गुना दाम दिलना का दावा किया जा रहा है कि सरकार उस लागत को ही कम आंक रही है। इसलिए किसान के हाथ सिर्फ मायूसी लग रही है। जबकि लगातार सूखे और घाटे की मार झेल रहे किसानों को आंकड़ों की इस बाजीगर के बजाय कारगर राहत और ईमानदार कोशिशों की दरकार है।

 

अमेरिकी बादाम-अखरोट कैसे पचा लेती है हमारी देशभक्ति?

देश के किसान जो कुछ भी उगाते हैं, उसका बड़ा हिस्सा दूसरे देशों को बेचा जाता है। इसी तरह हम अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में खाने-पीने की चीजों खासकर फलों, दालों और खाद्य तेलों का आयात करते हैं। कृषि व्यापार का यह दस्तूर बरसों से चला आ रहा है, लेकिन इसके नियम-कायदे और तौर-तरीके बदलते रहते हैं। किसानों को उनकी उपज का क्या दाम मिलेगा, यह बहुत हद तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग-पूर्ति और दाम पर निर्भर करता है। आयात-निर्यात से जुड़ी नीतियां और फैसले इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

हाल ही में भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले सेब, बादाम, अखरोट समेत कुल 28 उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है। यानी, अमेरिका से इन चीजों का आयात महंगा पड़ेगा। यह कदम अमेरिका की उस कार्रवाई के विरोध में उठाया गया, जिसके तहत भारत से ड्यूटी फ्री एक्सपोर्ट जैसी रियायतें खत्म कर दी गई हैं। व्यापार मोर्चे पर अमेरिका के साथ इस तनातनी के अलावा भारत का बढ़ता कृषि आयात और घटता निर्यात अपने आप में चिंताजनक है।

साल 2013-14 से 2018-19 के बीच पांच वर्षों के दौरान भारत के कृषि निर्यात में सालाना 2.1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। मतलब, कृषि निर्यात बढ़ने के बजाय घट गया है। जबकि इसी अवधि में कृषि आयात सालाना 6.7 फीसदी की दर से बढ़ा है। जब देश में खाद्यान्न, फल, सब्जियों और दूध का रिकॉर्ड उत्पादन हो रहा है, उसी दौर में हम दूसरे देशों से खाने-पीने की चीजों का खूब आयात करते जा रहे हैं। इसकी मार आखिरकार किसानों पर ही पड़ रही है। इस पूरे खेल के पीछे एग्री कमोडिटी ट्रेडिंग के बड़े खिलाड़ियों का हाथ है जो सरकारी नीतियों और फैसलों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

इस खेल के चलते जो चीजें भारत में आसानी से पैदा हो सकती हैं, उनके लिए भी हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। जो पैसा देश के किसानों की जेब में जा सकता है, वो देश से बाहर जा रहा है। उफनते राष्ट्रवाद के इस दौर में किसानों और देश के हितों पर यह चोट जारी है मगर कहीं कोई चर्चा ही नहीं! किसी को इसकी चिंता ही नहीं! ना ही किसी की राष्ट्रवादी भावनाएं आहत हो रही हैं।

हालत यह है कि भारत अमेरिकी बादाम का सबसे बड़ा खरीदार बन चुका है। अमेरिका से हर साल भारत करीब 3,800 करोड़ रुपये का बादाम आयात करता है। इसी तरह भारत अमेरिका के सेब का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और हर साल करीब 1100 करोड़ रुपये का सेब अमेरिका से मंगाता है। देखा जाए तो अमेरिका के सेब, बादाम, अखरोट उगाने वाले किसान भारत के लिए खेती कर रहे हैं। हमारा किसान सही दाम के लिए टमाटर, प्याज  सड़क पर फेंकने से आगे सोच ही नहीं पा रहा है।

सिर्फ सेब और बादाम को ही जोड़ लें तो हर साल करीब 5 हजार करोड़ रुपये का आयात हम अमेरिका से करते हैं। जबकि सेब और बादाम भारत के कई राज्यों में पैदा होता है। किसानों को प्रोत्साहित किया जाए तो इन चीजों का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के बजाय भारत अमेरिका और अन्य देशों पर निर्भरता बढ़ाता जा रहा है। खाद्य तेलों और दालों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। आत्मनिर्भरता के बजाय देश ने आयात निर्भरता का रास्ता चुना है।

पिछले 5 वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। देश का कृषि आयात बढ़ता जा रहा है जबकि निर्यात घटा है। साल 2013-14 में भारत का कृषि आयात करीब 15 अरब डॉलर था जो 2018-19 में बढ़कर 19 अरब डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है। दूसरी तरफ, 2013-14 में भारत का कृषि निर्यात 42.86 अरब डालर था जो 2018-19 में घटकर 38.49 अरब डालर रह गया है। कृषि आयात और निर्यात का अंतर लगातर सिकुड़ रहा है। यानी ट्रेड सरप्लस कम होता जा रहा है। किसानों के साथ-साथ सरकारी खजाने के लिए भी नुकसानदेह है।

कृषि में वर्षों की मेहनत से हासिल आत्मनिर्भरता को हम आयात निर्भरता में गंवाते जा रहे हैं। जबकि पूरी दुनिया व्यापार युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। अमेरिका, चीन जैसे ताकतवर देश अपनी व्यापार नीतियों से दूसरे देशों पर वार करने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। लेकिन विदेशी सेब, बादाम और अखरोट खाकर भी हमारा राष्ट्रप्रेम खूब फल-फूल रहा है। राष्ट्रवाद के समूचे नैरेटिव से स्वदेशी के स्वर लुप्तप्राय हैं। जबकि स्वेदशी के पेरोकार प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में हैं। लेकिन चीन की पिचकारियों और झालर, फुलझड़ियों के अलावा शायद ही किसी चीज के आयात का विरोध हाल के वर्षों में हुआ है।

माना कि देश के दरवाजे अमेरिका या दूसरे देशों के लिए बंद नहीं किए जा सकते हैं। विश्व व्यापार की अपनी मजबूरियां हैं। लेकिन जिन चीजों का हर साल हजारों करोड़ रुपये का आयात हो रहा है, उनकी पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित तो कर ही सकती है। कृषि आयात को कम से कम रखना देश और किसानों दोनों के हित में है। आयात शुल्क में बढ़ोतरी इसका सीधा, सरल उपाय है। लेकिन अक्सर होता इसके उलट है। देश के दरवाजे सस्ते आयात के लिए खोल दिए जाते हैं।

हिमाचल के सेब उगाने वाले किसान कई साल से आयात की मार झेल रहे हैं। इसी तरह कश्मीर और दूसरे राज्यों के किसान भी अमेरिकन ड्राईफ्रूट के आयात से परेशान हैं। कम से कम आयात की मार झेल रहे इन किसानों के हित में ही सरकार कुछ मददगार कदम उठा ले। कृषि आयात को हतोत्साहित करे। वैसे भी दुनिया में व्यापार युद्ध के हालात बन रहे हैं। बेहतर होगा, हम समय रहते संभल जाएं।

 

 

किसानों की रसीद से नदारद गेहूं बोनस की रकम

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने गेहूं की खरीद पर केंद्र द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के अलावा अपनी तरफ से प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। इसके बावजूद बोनस की रकम का उल्लेख सरकारी खरीद की रसीद में नहीं है। इससे किसानों के सामने असमंजस की स्थिति पैदा हो गई कि उन्हें बोनस मिलेगा भी या नहीं।

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों के मुद्दाें को जोरशोर से उठाया था, लेकिन सरकार बदलने के बावजूद सरकारी रवैये में ज्यादा बदलाव नहीं दिख रहा है। इस बात को गेहूं पर बोनस के मामले से समझा जा सकता है। कांग्रेस ने अपने वचन-पत्र में किसानों को बोनस देने का ऐलान किया था। पिछले महीने पांच मार्च को भोपाल में हुई प्रदेश कैबिनेट की बैठक में कमलनाथ सरकार ने गेहूं पर 160 रुपये और मक्का पर 250 रुपये प्रति क्विंटल बाेनस देने को मंजूरी दी थी। 25 मार्च से शुरू होकर 24 मई तक चलने वाली गेहूं की सरकारी खरीद में किसानों को 1840 रुपए प्रति क्विंटल एमएसपी के साथ 160 रुपए बाेनस भी दिया जाना था।

लेकिन सरकारी खरीद केंद्रों पर किसानों द्वारा बेचे जा रहे गेहूं के बाद दी जाने वाली रसीद पर  राज्य या केंद्र सरकार के किसी बाेनस का उल्लेख नहीं है। ऐसे में किसानों के सामने गेहूं बोनस को लेकर असंमजस की स्थिति बनी हुई है। क्रय सोसायटी से दी जाने वाली पावती रसीद पर केंद्र और राज्य सरकार के बोनस की जगह शून्य लिखा है। ये शून्य किसानों की नाराजगी का सबब बना रहा है।

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसान

 

गेहूं खरीद की रसीद दिखाते राजगढ़ जिले के धनराज सिंह गुर्जर, दरियाव सिंह, जितेंद्र पंवार व अन्य किसानमध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के टोड़ी गांव के किसान धनराज सिंह गुर्जर इस बारे में बताते हैं, “राज्य सरकार ने किसानों को समर्थन मूल्य पर गेहूं की तुलाई पर प्रति क्विंटल 160 रुपए बोनस देने की घोषणा की थी। लेकिन पावती रसीद पर न तो केंद्र सरकार का कोई बाेनस है न ही राज्य सरकार का। केवल जीरो लिखा है। किसानों को गुमराह किया जा रहा है। किसानों को सोयाबीन का 500 रुपये प्रति क्विंटल बोनस भी अभी नहीं मिला है।”

मध्य प्रदेश के जिस राजगढ़ में किसानों को इस समस्या का सामना करना पड़ा वहां की कलेक्टर निधि निवेदिता ने इस बारे में सरकार का पक्ष रखा है। उनका कहना है कि किसानों को पूरा बोनस दिया जा रहा है। वे कहती हैं, “सॉफ्टवेयर समस्या के कारण जो प्रिंट निकल रही थी उसमें बोनस नहीं दिख पा रहा था। जो भुगतान किसानों दिया गया है, उसमें 160 रुपये बोनस जोड़कर ही भुगतान हुआ है। अब सॉफ्टवेयर की समस्या को ठीक करवा दिया गया है जिससे समस्या नहीं होगी।”

हरियाणा में सरसों खरीद को लेकर किसान नाराज क्यों हैं?

हरियाणा में सरसों पैदा करने वाले किसान गुस्से में हैं। पिछले कई दिनों से इन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरसों की सरकारी खरीद को लेकर हरियाणा के किसानों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

हरियाणा में इस साल सरसों की अच्छी पैदावार हुई है। इसके बावजूद सरसों किसानों को अपनी फसल के बदले उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने इस सीजन के लिए सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन किसानों को इस दर से प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये कम मिल रहे हैं।

दूसरी समस्या यह हो रही है कि किसानों की कुल पैदावार की सरकारी खरीद हरियाणा के मंडियों में नहीं हो पा रही है। सरकार ने अधिकतम खरीद की सीमा तय कर रखी है। यह सीमा प्रति एकड़ 6.5 क्विंटल की है। लेकिन हरियाणा से यह जानकारी मिल रही है कि इस साल वहां प्रति एकड़ औसतन 10 से 12 क्विंटल सरसों का उत्पादन हुआ है।

इस लिहाज से देखें तो किसानों से उनकी सरसों की कुल पैदावार को मंडियों में नहीं खरीदा जा रहा है। इसके अलावा मंडियों में एक दिन में एक किसान से 25 क्विंटल सरसों खरीदने की अधिकतम सीमा भी तय की गई है। इन दोनों वजहों से किसानों को खुले बाजार में औने-पौने दाम में सरसों बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है।

पिछले दिनों स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक योगेंद्र यादव ने हरियाणा की कुछ मंडियों का दौरा करके सरसों किसानों की समस्याओं को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की थी। उन्होंने आरोप लगाया है कि किसानों से खरीदी जा रही सरसों की फसल की तौल में भी किसानों के साथ धोखा किया जा रहा है। उनका आरोप है कि हर बोरी पर किसानों की फसल लूटी जा रही है। योगेंद्र यादव ने सरकार से मांग की कि इस समस्या को दूर करने के साथ खरीद पर तय की गई अधिकतम सीमा तत्काल हटाई जानी चाहिए।

सरसों किसानों की समस्या बढ़ाने का काम खरीद एजेंसी में बदलाव की वजह से भी हुआ है। पहले हरियाणा में सरसों खरीद का काम नैफेड और हैफेड के माध्यम से किया जा रहा था। लेकिन इन एजेंसियों का खरीद लक्ष्य पूरा हो गया। जबकि मंडियों में सरसों की आवक जारी रही। इस वजह से अब सरसों खरीद का काम खाद्य एवं आपूर्ति विभाग को दिया गया है। खरीद एजेंसी में हुए इस बदलाव से हरियाणा के विभिन्न मंडियों में अव्यवस्था बनी हुई है।

एजेंसी बदलने की वजह से किसानों को नए सिरे से रजिस्ट्रेशन कराना पड़ रहा है। क्योंकि बगैर रजिस्ट्रेशन के किसानों की सरसों नहीं खरीदने का प्रावधान किया गया है। एजेंसी में बदलाव किए जाने की वजह से खरीद प्रक्रिया ठीक से चल नहीं रही है। प्रदेश में कुछ जगहों पर तो नाराज किसानों ने हंगाम भी किया। कुछ जगहों पर किसानों ने सड़क जाम भी किया।

बहादुरगढ़ की मंडी में सरसों किसानों को हंगाम करने का बाध्य होना पड़ा तब जाकर सरसों खरीद शुरू हो सकी। बहादुरगढ़ मंडी में खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ही गेहूं की खरीद भी कर रहा है। इस वजह से न तो मंडी में विभाग के पर्याप्त कर्मचारी थे और न ही कोई उपयुक्त व्यवस्था बन पाई।

हरियाणा की मंडियों में सरसों की सरकारी खरीद ठीक से नहीं होने की वजह से कुछ मंडियों में सरसों से लदे ट्रालियों की लंबी कतारें लगी हुई हैं। रेवाड़ी में नाराज सरसों किसानों ने सड़क जाम किए। यहां किसानों से सरसों की खरीद ही शुरू नहीं हो पा रही थी। जबकि उन्हें सरसों खरीदने से संबंधित टोकन जारी हो गया था।

सरसों किसानों को इन समस्याओं का सामना तब करना पड़ा है जब केंद्र सरकार में बैठे नीति निर्धारक तिलहन के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने और खाद्य तेलों का आयात कम करने की बात लगातार कर रहे हैं। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा सत्ता में आने के बाद तिलहन मिशन शुरू करने का वादा किया है। मार्च, 2019 में भारत ने 14.46 लाख टन खाद्य और अखाद्य तेलों का आयात किया।

एक तरफ भारी आयात है तो दूसरी तरफ देश में हो रहे उत्पादन की खरीदारी ठीक से नहीं हो रही है। ऐसे में क्या ये किसान फिर से सरसों उपजाने का निर्णय लेंगे? अगर ये फिर से सरसों नहीं उपजाते हैं या उपजाते भी हैं तो अगर सरसों की खरीद ठीक ढंग से नहीं हो पाती है तो क्या देश को तिलहन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का सपना पूरा हो पाएगा।

कहीं चना तो कहीं सरसों एमएसपी के नीचे बेचने को मजबूर हैं किसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार किसानों के लिए किए गए अपने कार्यों को गिनाते हुए यह बताना नहीं भूलती कि उसने किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को बढ़ाकर लागत का डेढ़ गुना कर दिया है। सरकार के मंत्री और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लोग भी अक्सर ये दावे करते दिखते हैं।

लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। सरकार जो एमएसपी तय कर रही है, उस पर किसानों का उत्पाद खरीदे जाने की कोई ठोस व्यवस्था नहीं है। इस वजह से मंडियों में व्यापारी किसानों से मनमाने भाव पर उनके उत्पादों को खरीद रहे हैं।

इसे दो उदाहरणों के जरिए समझा जा सकता है। अभी चना देश की विभिन्न मंडियों में आना शुरू हुआ है। चने का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार ने 4,620 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन इस मूल्य पर सरकार ने चने की खरीद शुरू नहीं की है।

अब जाहिर है कि सरकार खरीद नहीं करेगी तो मंडियों में किसानों को व्यापारियों के तय किए गए दर पर चना बेचना पड़ेगा। यही हो रहा है। मध्य प्रदेश की मंडियों से ये खबरें आ रही हैं कि वहां चना का न्यूनतम समर्थन मूल्य भले ही 4,620 रुपये प्रति क्विंटल का हो लेकिन किसानों को 3,800 रुपये प्रति क्विंटल का दर हासिल करने के लिए नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। वहां यह दर भी जिन्हें मिल जा रहा है, वे खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं। किसानों को औसतन प्रति क्विंटल 800 से 900 रुपये का नुकसान हो रहा है।

अब इसके मुकाबले बाजार भाव देख लीजिए। इससे पता चलेगा कि किसानों को क्या दर मिल रहा है और आम उपभोक्ताओं को कितने पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। जिस दिन मध्य प्रदेश की मंडियों से यह खबर आई कि वहां चना 3,800 रुपये प्रति क्विंटल यानी 38 रुपये प्रति किलो बेचने के लिए किसाना विवश हैं, उसी दिन दिल्ली में चना का खुदरा भाव पता करने पर यह बात सामने आई कि आम दिल्लीवासियों को एक किलो चने के लिए 105 रुपये से लेकर 115 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसका मतलब यह हुआ कि किसानों से जिस भाव पर चना खरीदा जा रहा है, उससे तीन गुना अधिक कीमत पर उपभोक्ताओं को बेचा जा रहा है। सवाल यह उठता है कि बीच का जो अंतर है, वह कौन खा रहा है?

सरसों का उत्पादन करने वाले किसानों को भी एमएसपी नहीं मिल रही है। सरसों के पैदावार के लिहाज से राजस्थान का देश में बेहद अहम स्थान है। यहां सरसों की पैदावार मंडियों में आने लगी है। सरकार ने सरसों का न्यूनतम समर्थन मूल्य 4,200 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

लेकिन राजस्थान के श्रीगंगानगर मंडी से यह खबर आ रही है कि 4,200 रुपये प्रति क्विंटल की एमएसपी के मुकाबले उन्हें सिर्फ 3,400 रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 3,600 रुपये प्रति क्विंटल मिल रहे हैं। इस तरह से देखा जाए तो किसानों को एमएसपी के मुकाबले 600 से 800 रुपये कम में एक क्विंटल सरसों बेचना पड़ रहा है।

इन स्थितियों को देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ एमएसपी की घोषणा कर देना भर पर्याप्त नहीं है बल्कि इसे लागू कराने का एक उपयुक्त तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है। तब ही बढ़ी हुई एमएसपी का वास्तविक लाभ किसानों तक पहुंच पाएगा।

अप्रैल में गेहूं समर्थन मूल्‍य से नीेचे बि‍कने की नौबत

नई दिल्ली। चालू सीजन में अभी तक करीब 30 लाख टन गेहूं का आयात हो चुका है तथा 28 फरवरी तक कुल आयात 40 लाख टन होने का अनुमान है। ऐसे में अगर केंद्र सरकार ने जल्दी ही आयात को रोकने के लिए आयात शुल्क नहीं लगाया तो गेहूं की नई फसल आने पर अप्रैल में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में गेहूं न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे बिकने की आशंका है।

इस समय दक्षिण भारत में गेहूं का भारी मात्रा में आस्ट्रेलिया, यूक्रेन और फ्रांस से आयात हो रहा है तथा अभी तक करीब 30 लाख गेहूं भारतीय बंदरगाहों पर पहुंच चुका है। आयातक 28 फरवरी 2017 से पहले की शिपमेंट के आयात सौदे कर रहे हैं, क्योंकि आयातकों को डर है कि केंद्र सरकार आयात को रोकने के लिए 28 फरवरी 2017 के बाद आयात शुल्क लगायेंगी। ऐसे में 28 फरवरी 2017 तक कुल 40 लाख टन गेहूं का आयात होने का अनुमान है। ऐसे में दक्षिण भारत की फ्लोर मिलों के पास मार्च-अप्रैल तक की पिसाई का गेहूं उपलब्ध रहेगा, जिस कारण इनकी मांग उत्तर प्रदेष, राजस्थान और मध्य प्रदेश से कम रहेगी। जिसका असर गेहूं की कीमतों पर पड़ेगा। माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं का भाव घटकर 1,450 से 1,500 रुपये प्रति क्विंटल रह जायेगा, जबकि रबी विपणन सीजन 2017-18 के लिए केंद्र सरकार ने गेहूं का एमएसपी 1,625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है।

आस्ट्रेलिया से आयातित गेहूं का भाव तुतीकोरन बंदरगाह पर 1,700 से 1,780 रुपये प्रति क्विंटल क्वालिटीनुसार है जबकि यूक्रेन से आयातित गेहूं का भाव 1,650 रुपये प्रति क्विंटल है। दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें गुजरात की मंडियों से एमएसपी पर गेहूं की खरीद करती हैं तो मिल पहुंच भाव 1,950 से 2,000 रुपये प्रति क्विंटल बैठेंगे, तथा अगर उत्तर प्रदेश या राजस्थान से खरीद करेंगी तो लागत बढ़कर 2,200 से 2,300 रुपये प्रति क्विंटल हो जायेगी। इसलिए दक्षिण भारत की फ्लोर मिलें आयातित गेहूं का स्टॉक कम रही है ताकि अगले अगले दो-तीन महीने उनको घरेलू मार्किट से खरीद ना करनी पड़े। दक्षिण भारत की मिलों को लगता है कि केंद्र सरकार 28 फरवरी 2017 के बाद आयात शुल्क लगा देगी, लेकिन अगर केंद्र सरकार ने ऐसा नहीं किया तो फिर आयात बढ़कर 50 से 60 लाख टन के स्तर पर भी पहुंच सकता है।

इस साल बुवाई ज्‍यादा

चालू रबी में मध्य प्रदेश के साथ ही उत्तर प्रदेश में गेहूं की बुवाई में भारी बढ़ोतरी हुई है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी में गेहूं की बुवाई बढ़कर 315.55 लाख हैक्टेयर में हो चुकी है जबकि पिछले साल इस समय तक 292.52 लाख हैक्टेयर में ही हुई थी। सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में बुवाई 100.52 लाख हैक्टेयर में हुई है जबकि पिछले साल इस समय तक 94.99 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी। इसी तरह मध्य प्रदेश में बुवाई बढ़कर 62.23 लाख हैक्टेयर में हुई जबकि पिछले साल 51.84 लाख हैक्टेयर में बुवाई हुई थी।
चालू रबी में बुबाई में हुई बढ़ोतरी के साथ ही मौसम भी अनुकूल होने से गेहूं का बंपर उत्पादन होने का अनुमान है। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और राजस्थान में गेहूं की एमएसपी पर खरीद होगी, लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में खरीद सीमित मात्रा में होने के कारण इन राज्यों की मंडियों में गेहूं का भाव एमएसपी से नीचे बिकेगा।