‘चीनी कम’ तो क्यों नहीं बढ़े गन्ने के दाम

पिछले दिनों पूरे उत्तर प्रदेश में जगह-जगह गन्ना किसानों ने प्रदर्शन कर गन्ने की होली जलाई। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद तीन वर्षों में गन्ने के भाव में केवल 2017-18 में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी। उत्तर प्रदेश में गन्ने का एसएपी यानी राज्य परामर्शित मूल्य पिछले दो सालों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। इस साल गन्ना किसानों को सरकार से गन्ने का भाव बढ़ने की बड़ी उम्मीद थी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जबकि पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और विशाल चीनी-भंडार से परेशान चीनी उद्योग की स्थिति इस साल सुधर गई है। इस कारण सभी आर्थिक तर्क भी भाव बढ़ाने के पक्ष में थे। इस साल देश में चीनी उत्पादन कम होने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग के कारण चीनी उद्योग को तो पूरी राहत मिलेगी, परन्तु गन्ने के रेट ना बढ़ने से गन्ना किसानों की स्थिति और बिगड़ेगी।

2018-19 में देश में चीनी का आरंभिक भंडार (ओपनिंग स्टॉक) 104 लाख टन, उत्पादन 332 लाख टन, घरेलू खपत 255 लाख टन और निर्यात 38 लाख टन रहा। इस प्रकार वर्तमान चीनी वर्ष में चीनी का प्रारंभिक भंडार 143 लाख टन है। अतः हमारी लगभग सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में रखी हुई है। कुछ महीने पहले तक यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति थी जिसको देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए थे।

इस्मा (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्ष के 332 लाख टन के मुकाबले घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है, जो केवल घरेलू बाज़ार की खपत के लिए ही पर्याप्त होगा। इस गन्ना पेराई सत्र की पहली तिमाही अक्टूबर से दिसंबर 2019 के बीच चीनी का उत्पादन पिछले साल की इस अवधि के मुकाबले 30 प्रतिशत घटकर 78 लाख टन रह गया है। पिछले साल इस अवधि में देश में चीनी का उत्पादन 112 लाख टन था।

2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1756 लाख टन और मांग 1876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी उत्पादन मांग से 120 लाख टन कम होने का अनुमान है। इस कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की अच्छी मांग होगी, जिसकी आपूर्ति भारत कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी उत्पादन में संभावित कमी से हमारे पहाड़ से चीनी भंडार अचानक अच्छी खबर में बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग का इस स्थिति में सबसे ज्यादा लाभ होगा क्योंकि पिछले साल की तरह इस साल भी चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश ही रहेगा, जहां 120 लाख टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों ने 33,048 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति चीनी मिलों में की थी। परन्तु 31 दिसंबर 2019 तक इसमें से 2,163 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया है। चालू पेराई सत्र में तीन महीने बीतने के बाद भी 31 दिसंबर तक इस सीज़न का केवल 3,492 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान हुआ है, जबकि किसान लगभग 10,500 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों को दे चुके हैं। इसके अलावा विलम्बित भुगतान के लिए देय ब्याज़ का आंकड़ा भी 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इस तरह 31 दिसंबर तक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का चीनी मिलों के ऊपर 11,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान बकाया है।

इस साल गन्ना मूल्य निर्धारण से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया था। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी थी। किसानों का कहना है कि दो सालों से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाये गए हैं जबकि लागत काफी बढ़ गई है। गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर के अनुसार गन्ने की औसत उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल आ रही है। सरकार के लागत के डेढ़ गुना मूल्य देने के वायदे को भूल भी जाएं तो भी बदली परिस्थिति में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए था। यदि पिछले तीन सालों में 10 प्रतिशत की मामूली दर से भी वृद्धि की जाती तो भी इस वर्ष 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव अपने आप हो जाता।

वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़ आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं। इसके अलावा सह-उत्पादों से एथनॉल, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिये इस्तेमाल करती हैं। इस तरह चीनी मिलें अपने बैंकों के ब्याज के खर्चे की बचत भी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को चीनी बफर स्टॉक, एथनॉल क्षमता बनाने और बढ़ाने, चीनी निर्यात के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए हैं। इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया और न ही सरकार ने गन्ने का भाव बढ़ाया।

महंगाई के प्रभाव और बढ़ती लागत के कारण गन्ने का वास्तविक दाम घट गया है। बदली परिस्थितियों में कम चीनी उत्पादन और अच्छी अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए सरकार को लाभकारी गन्ना मूल्य दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए था। परन्तु इस स्थिति का सारा लाभ अब चीनी मिलें ही उठाएंगी और किसानों के हाथ मायूसी के अलावा कुछ नहीं लगेगा। सरकार अब भी अलग से बोनस देकर गन्ना किसानों को बदहाली से बचा सकती है।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

गुजरात-राजस्थान में टिड्डियों का आतंक, कीट नियंत्रण जुगाड़ भरोसे

देश के दो बड़े राज्यों में टिड्डी दलों ने आतंक मचा रखा है। पाकिस्तान से आए टिड्डी दल गुजरात और राजस्थान में किसानों की हजारों करोड़ रुपये की फसल तबाह कर चुकी हैं। दोनों राज्यों में किसान सरकार से कीट नियंत्रण की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कीट नियंत्रण के उपाय जुगाड़ भरोसे हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद गुरुवार को केंद्र सरकार ने टिड्डी नियंत्रण के लिए 11 टीमें गुजरात भेजी हैं। उधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने टिड्डी नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी है।

किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए प्रशासन भी टिड्डयों से बचाव के तरह-तरह के उपाय आजमा रहा है। खबर है कि गुजरात के बनासकांठा जिले में टिड्डियां भगाने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी गई है।

गुजरात और राजस्थान में पिछले कई महीनों से टिड्डी दलों के हमले जारी है, लेकिन कीट नियंत्रण के सारे प्रयास महज कागजी खानापूर्ति तक सीमित हैं। उत्तरी अफ्रीका से निकलकर सऊदी अरब और पाकिस्तान होते हुए गुजरात और राजस्थान में घुसे टिड्डी दल गुजरात के कच्छ, मेहसाणा, पाटण, और बनासकांठा तक पहुंच चुके हैं। टिड्डियों के आक्रमण की वजह से कपास, गेहूं, सरसों, जीरा समेत कई फसलों को नुकसान हुआ है।

हैरानी की बात है कि गुजरात और राजस्थान में हर साल टिड्डयों हमले में बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचता है, इसके बावजूद इससे बचाव का कोई पुख्ता उपाय न तो राज्य सरकारों के पास है और ना ही केंद्र सरकार इसमें कोई खास दिलचस्पी ले रही है। मजबूरी में किसान टिड्डियों को भगाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। थाली, ढोल और डीजे बजाकर टिड्डीयों को भगाने की कोशिश की जा रही है।

गहलोत में मांगी केंद्र से मदद

टिड्डी दलों के बढ़ते हमले के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है। उनका कहना है कि टिड्डी नियंत्रण का विषय मुख्यतः भारत सरकार के अधीन है। ऐसे में केन्द्र सरकार इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्य सरकार को अतिरिक्त संसाधन एवं सहयोग उपलब्ध कराए। राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर, चुरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और जालौर जिलों में  टिड्डी दलों का प्रकोप है।

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के फसल सुरक्षा और टिड्डी चेतावनी से जुड़े कई कार्यालय राजस्थान में होने के बावजूद सब मूकदर्शक बने हुए हैं।

 

बिहार में बांस की खेती क्यों छोड़ रहे हैं किसान

बांस की खेती पारंपरिक तौर पर भारत में होती आई है। हालांकि, इसे वृक्ष की श्रेणी में रखे जाने से इसकी व्यावसायिक खेती को उतना बढ़ावा नहीं मिला जितना मिलना चाहिए था। इसलिए केंद्र सरकार ने इसे कानून में संशोधन करके वृक्ष की श्रेणी से बाहर निकालने का काम किया है।

इसके बावजूद बांस की खेती को लेकर किसानों में उत्साह का माहौल नहीं है। बिहार से यह जानकारी मिल रही है कि राज्य के जिन इलाकों में बांस की खेती होती थी, उन इलाकों के लोग अब बांस की खेती छोड़ रहे हैं।

बिहार में पारंपरिक तौर पर कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बांस की खेती होती आई है। इस क्षेत्र में बांस से बनने वाले उत्पाद भी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होते आए हैं। बांस के उत्पाद इस क्षेत्र राज्य के दूसरे इलाकों में भी भेजे जाते हैं। लेकिन अब इस क्षेत्र के किसान बांस की खेती से किनारा कर रहे हैं।

इसकी कई वजहें हैं। सबसे पहली वजह तो यह बताई जा रही है कि यहां के किसानों को सरकार से बांस की खेती के लिए जिस तरह की मदद की उम्मीद थी, उस तरह की मदद इन्हें नहीं मिल पा रही है। इस क्षेत्र के किसानों का कहना है कि बांस की खेती को प्रोत्साहित करने की बात सरकार राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत तो करती है लेकिन जमीनी स्तर पर उन्हें सरकार की ओर कोई मदद नहीं मिल रही है।

बिहार सरकार ने इस इलाके में बांस की खेती को देखते हुए पहले यह भी कहा था कि इस क्षेत्र में बांस आधारित उद्योग स्थापित किए जाएंगे। लेकिन यह सरकारी वादा भी पूरा नहीं हो पाया। जबकि किसानों ने यह उम्मीद लगा रखी थी कि अगर बांस आधारित उद्योग लगते हैं तो इससे उन्हें लाभ होगा और इस क्षेत्र में होने वाली बांस की खेती को और प्रोत्साहन मिलेगा।

एक बात यह भी चल रही थी कि इस क्षेत्र में कागज के कारखाने लगाए जाएं। क्योंकि कागज उत्पादन में लकड़ी के पल्प के साथ-साथ बांस के पल्प का इस्तेमाल भी बड़े पैमाने पर होता है। बल्कि बांस के पल्प को कागज उत्पादन के लिए ज्यादा अच्छा माना जाता है। इस आधार पर यह कहा जा रहा था कि इस क्षेत्र में कागज उद्योग के लिए काफी संभावनाएं हैं। क्योंकि इस उद्योग के लिए बांस के रूप में कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में यहां उपलब्ध है। लेकिन इस क्षेत्र में कागज उद्योग भी विकसित नहीं हो पाया।

बांस की खेती से किसानों की बढ़ती दूरी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि अब बांस से बनने वाले उत्पादों की मांग में कमी आती जा रही है। पहले सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के साथ रोजमर्रा के कार्यों में भी बांस से बनने वाले उत्पादों का इस्तेमाल होता था। अब इनकी जगह प्लास्टिक के उत्पाद लेते जा रहे हैं।

बांस के उत्पाद पारंपरिक ढंग से बनते हैं। इसलिए इनमें श्रम लगता है। इस वजह से इनकी लागत अधिक होती है। जबकि प्लास्टिक उत्पादों का उत्पादन बड़े-बड़े कारखानों में अत्याधुनिक मशीनों के जरिए होता है। इसलिए इनका उत्पादन लागत कम होता है और बांस के उत्पादों के मुकाबले प्लास्टिक उत्पाद अपेक्षाकृत कम पैसे में लोगों को मिल जाते हैं।

बिहार के कोसी और सीमांचल क्षेत्र में बांस की खेती से किसानों के दूर होने की वजह से इस क्षेत्र में बेरोजगारी बढ़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यह भी कहा जा रहा है कि बेरोजगारी बढ़ने से इन क्षेत्रों से दिल्ली और मुंबई जैसे औद्योगिक केंद्रों की ओर पलायन भी बढ़ सकता है। क्योंकि स्थानीय स्तर पर जब बांस की खेती में लगे किसान और मजदूर बेरोजगार होंगे तो स्वाभाविक ही है कि ये रोजगार की तलाश में शहरी केंद्रों का रुख करेंगे।

बांस की खेती से किसानों के अलग होने से इस क्षेत्र में बाढ़ से और अधिक नुकसान होने की आशंका पैदा होगी। उल्लेखनीय है कि यह क्षेत्र बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शुमार किया जाता है और इस क्षेत्र को अमूमन हर साल ही बाढ़ का सामना करना पड़ता है। बांस की खेती होने से बाढ़ की स्थिति में मिट्टी का कटाव कम होता है और बाढ़ का पानी एक हद तक रोकने का काम भी बांस की खेती के जरिए होता है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र में बांस की खेती लगातार कम होती जाएगी तो इससे इस क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति में पहले के मुकाबले और अधिक नुकसान होगा।

महिला किसानों की बराबरी कब बनेगा राजनीतिक मुद्दा?

8 मार्च, 2019 को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर केंद्र सरकार के कई मंत्रियों ने जगह-जगह पर महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए इस सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का जिक्र किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अपने संदेश में कहा, ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर हम अपनी अदम्य नारी शक्ति को सलाम करते हैं। हमें हमने उन फैसलों पर गर्व है जिन्होंने महिला सशक्तिकरण को और मजबूत किया है। विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की शानदार उपलब्धियों पर प्रत्येक भारतीय को गर्व है।’
मोदी सरकार के कार्यकाल में महिला किसानों के लिए किए गए कामों का जिक्र कुछ दिन पहले केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने भी किया। उन्होंने यह जानकारी दी कृषि मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं के तहत आवंटित किए गए कुल फंड में से 30 फीसदी का आवंटन महिलाओं को कृषि की मुख्यधारा में लाने के लिए किया है। उन्होंने यह भी कहा कि 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए केंद्र सरकार जो काम कर रही है, उसके मूल में महिला किसानों की स्थिति में सुधार शामिल है। राधामोहन सिंह ने महिला किसानों के लिए मोदी सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए यह भी कहा कि इस सरकार ने 2016 से हर साल 15 अक्टूबर को ‘राष्ट्रीय महिला किसान दिवस’ मनाना शुरू किया है।
लेकिन क्या प्रधानमंत्री मोदी द्वारा महिलाओं के अदम्य साहस को सलाम कर देने और कृषि मंत्री द्वारा राष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत की बात कह देने भर से देश की किसानी में लगी महिलाओं की स्थिति सुधरेगी? अगर तथ्यों की बातें करें तो पिछले कुछ सालों में महिला किसानों की स्थिति लगातार खराब हो रही है। मुख्यधारा की महिला विमर्श में महिलाओं की सशक्तिकरण की बात तो चलती है लेकिन महिला किसानों के सशक्तिकरण को इस विमर्श में भी जगह नहीं मिलती।
महिला किसानों की बदहाली को कुछ तथ्यों के जरिए समझने की कोशिश करते हैं। भारत के गांवों में रहने वाली कुल महिलाओं में से तकरीबन 85 फीसदी महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं। कृषि क्षेत्र में जितने श्रमिक हैं उनमें एक तिहाई से अधिक महिलाएं हैं। लेकिन आज भी किसानी के माम में लगी इन महिला श्रमिकों को पुरुष श्रमिकों के मुकाबले कम मजदूरी मिलती है।
कृषि क्षेत्र में 85 फीसदी ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी के बावजूद इनमें से सिर्फ 13 फीसदी महिलाओं के पास अपनी जमीन है। महिलाओं नाम पर जमीन नहीं होने की वजह से इन्हें बैंक कर्ज का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। वैश्विक स्तर पर खाद्य और खेती के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था फूड ऐंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि अगर जमीन के स्वामित्व के मामले में महिलाओं को बराबरी दी जाती है तो इससे कृषि उत्पादकता में 30 फीसदी की बढ़ोतरी हो सकती है। इस संस्था का यह भी मानना है कि इससे कुपोषण और भूख की समस्या के समाधान में भी मदद मिल सकती है।
इन तथ्यों के बावजूद भारत में महिला किसानों की स्थिति सुधारने की दिशा में सरकारी स्तर पर कोई खास प्रयास नहीं दिखता। भारत में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं लेकिन यह किसी भी दल के लिए चुनावी मुद्दा नहीं है।
महिलाओं की स्थिति सुधारने की दिशा में एक कोशिश संयुक्त राष्ट्र के इंटरनैशनल फंड फाॅर एग्रीकल्चर डेवलपेेंट ने की है। इस संस्था ने पूरी दुनिया में कृषि क्षेत्र में काम कर रही 1.7 अरब महिलाओं को किसानी के क्षेत्र में बराबरी दिलाने के लिए एक खास अभियान की शुरुआत की है। इसके तहत यह संस्था न सिर्फ जागरूकता अभियान चलाएगी बल्कि दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारों को यह समझाने की कोशिश भी करेगी कि महिला किसानों की स्थिति ठीक करने के लिए किस तरह का निवेश करने की जरूरत है।

बुवाई पर पड़ा मूंग की कीमतों में गिरावट का असर

नई दिल्ली। चालू रबी बुवाई सीजन में मूंग की बुवाई में कमी आई है। उत्पादक मंडियों में मूंग के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे होने के कारण किसानों ने बुवाई कम की है। कृषि मंत्रालय के अनुसार चालू रबी मूंग की बुवाई 4.28 लाख हैक्टेयर में ही हो पाई है जबकि पिछले साल की समान अवधि में इसकी बुवाई 4.33 लाख हैक्टेयर में हो चुकी थी।

केंद्र सरकार ने चालू खरीफ विपणन सीजन 2016-17 के लिए मूंग का एमएसपी 5,225 रुपये प्रति क्विंटल (बोनस सहित) तय किया हुआ है जबकि उत्पादक मंडियों में इसके भाव 4,600 से 4,800 रुपये प्रति क्विंटल चल रहे हैं। सोमवार को मध्य प्रदेश की इंदौर मंडी में मूंग का भाव 4,700 रुपये, राजस्थान की मेड़ता सिटी मंडी में 4,600 रुपये, जयपुर मंडी में 4,600 रुपये और महाराष्ट्र की अकोला मंडी में 4,800 रुपये प्रति क्विंटल रहे।

मूंग के भाव में आई कमी को देखते हुए केंद्र सरकार सार्वजनिक कंपनियों के माध्यम से मूंग की एमएसपी पर खरीद भी कर रही है, लेकिन उत्पादन के मुकाबले खरीद नाममात्र की होने के कारण किसानों को अपनी उपज एमएसपी से 400 से 600 रुपये प्रति क्विंटल नीचे भाव में बेचनी पड़ रही है। चालू सीजन में नेफैड ने एमएसपी पर पांच जनवरी 2017 तक केवल 1,03,011 टन मूंग की ही खरीद की है। कृषि मंत्रालय के पहले आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2016-17 खरीफ सीजन में मूंग की पैदावार बढ़कर 13.5 लाख टन होने का अनुमान है जबकि पिछले साल इसका उत्पादन 10.2 लाख टन का ही हुआ था।

मूंग की दैनिक आवक उत्पादक मंडियों में पहले की तुलना में कम हुई है, इसलिए माना जा रहा है कि मौजूदा कीमतों में 100 से 150 रुपये प्रति क्विंटल की गिरावट तो आ सकती है, लेकिन मौजूदा भाव में ज्यादा मंदा नहीं आयेगा मार्च में रबी मूंग की आवक चालू हो जायेगी, इसलिए कीमतों में तेजी की संभावना भी नहीं है।

डेढ़ दशक के अभियान के बाद भी जानलेवा खुरपका-मुंहपका रोग

ICAR के संस्थानों में वैक्सीन लगाने के बाद भी यह बीमारी फैलती है और सैकड़ों पशु मौत के मुंह में चले जाते हैं। इसके बावजूद सरकार वैक्‍सीन सप्‍लाई करने वाली कंपनी पर कोई कार्रवाई नहीं करती।

मवेशियों के लिए जानलेवा खुरपका व मुंहपका रोग (FMD) तमाम सरकारी कोशिशों और हजारों करोड़ रुपये के खर्च के बावजूद पूरी तरह काबू में नहीं आ पाया है। दो साल पहले खुरपका-मुंहपका रोग रोकथाम कार्यक्रम के तहत दी जाने वाली वैक्सिन की गुणवत्‍ता पर गंभीर सवाल खड़े हुए थे। पशु कल्‍याण और गौरक्षा का दावा करने वाले राजनैतिक दल और संगठन भी मवेशियों की रक्षा से जुड़े इस मुद्दे को लेकर चुप्‍पी साधे हुए हैं।

वर्ष 2014 में बागपत स्थित चौधरी चरण सिंह नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ एनीमल हेल्‍थ के वैज्ञानिकों की एक टीम ने खुरपका-मुंहपका रोोकथाम कार्यक्रम के तहत दी जाने वाले वैक्‍सीन के नमूनों की जांच की थी। इस जांच में 10 नमूनों के गुणवत्‍ता मानकों पर फेल होने का दावा किया गया था। हालांकि, बाद में कृषि मंत्रालय की ओर से गठित एक पैनल ने वैक्‍सीन पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट को ही दोषपूर्ण करार दिया और जांच टीम का नेतृत्‍व करने वाले वैज्ञानिक डॉ. भोगराज सिंह के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की।

खुरपका-मुंहपका रोग रोकथाम कार्यक्रम केंद्र सरकार ने वर्ष 2004 में शुरू किया था। हर साल इस कार्यक्रम के तहत सैकड़ों करोड़ रुपये की वैक्‍सीन का इस्‍तेमाल होता है जिनकी सप्‍लाई कई प्राइवेट कंपनियां करती हैं। करीब डेढ़ दशक से चल रहे इस कार्यक्रम के बावजूद पशुओं की जानलेवा बीमारी पर पूरी तरह अंकुश नहीं लग पाया है। वर्ष 2013-14 में देश में खुरपका-मुंहपका रोग ने महामारी को रूप लिया और हजारों मवेशियों की मौत का कारण बना। वर्ष 2015 में भी देश भर में इस रोग के फैलने के 450 से ज्‍यादा मामले दर्ज किए गए थे।

सरकारी संस्‍थान भी खुरपका-मुंहपका से मुक्‍त नहीं 

खुरपका-मुंहपका रोग की वैक्‍सीन के निर्माण और प्रमाणन प्रक्रिया में कथित खामियां उजागर करने वाले भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आइवीआरआई) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. भोजराज सिंह ने हाल ही में अपने फेसबुक पोस्‍ट में दावा किया है कि देश के प्रमुख डेयरी संस्‍थान एनडीआरआई, करनाल में वर्ष 2011 में FMD के फैलनेे की जानकारी मिली है जिससे 271 पशु प्रभावित हुए और 10 जानवरों की मौत हुई थी। जबकि पूरे फार्म में रोग फैलने से दो महीने पहले ही वैक्‍सीन दिए गए थे। देश का नामी पशुविज्ञान संस्‍थान आईवीआरआई भी अपनी जानवरों को खुरपका-मुंहपका रोग से नहीं बचा पाया था।

देश भर में इस बीमारी की रोकथाम के व्‍यापक कार्यक्रम के बावजूद इसका शिकार होने वाले पशुओं की तादाद वर्ष 2008 में 278 से बढ़कर 2013 में 8843 तक पहुंच गई। ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मिलना वाकई मुश्किल है जहां रोकथाम हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद मरने वाले पशुओं की संख्‍या 40 गुना तक बढ़ी। व्‍यापक वैक्सीनेशन के बावजूद वर्ष 2013-14 में कर्नाटक और दक्षिण भारत के दूसरे भागों में यह बीमारी फैली। उत्तर प्रदेश में 10 में से 7 प्रकोपों का टीकाकृत पशुओं में होना कई सवाल खड़े करता है।

अपने ही वैज्ञानिक के खिलाफ खड़ा कृषि मंत्रालय 

हैरानी की बात है कि ICAR के संस्थानों (IVRI, इज़्ज़त नगर; NDRI करनाल, IGFRI झाँसी आदि) में FMD वैक्सीन के बाद भी यह बीमारी फैलती है और हज़ारों पशुओं के उत्पादन को ठप्प कर देती है। सैकड़ों पशु मौत के मुंह में चले जाते हैं। इसके बावजूद सरकार वैक्‍सीन सप्‍लाई करने वाली कंपनी पर कार्रवाई नहीं करती बल्कि वैक्‍सीन की गुणवत्‍ता पर सवाल उठाने वाले वैज्ञानिक के खिलाफ ही 102 करोड़ रुपये की मानहानि का मुकदमा दायर कराया जाता है।

एफएमडी वैक्‍सीन की गुणवत्‍ता पर रिपोर्ट देने वाले डॉ. भोजराज सिंह को कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है। उन पर गलत तरीके से जांच करने, रिपोर्ट सार्वजनिक करने और सरकारी कार्यक्रम की छवि धूमिल करने के आरोप हैं। एक वैक्‍सीन निर्माता कंपनी ने भी उन पर मानहानि का दावा किया है। विडंबना देखिए, वैक्‍सीन में कथित खामियां उजाकर करने वाले वैज्ञानिक का बचाव करने के बजाय कृषि मंत्रालय उन्‍हीं के खिलाफ खड़ा नजर आता है। जबकि यह मामला देश के लाखों-करोड़ों मवेशियों की सेहत से जुड़ा है।

मक्‍का की खेती पर ये सब्सिडी दे रही है पंजाब सरकार

पंजाब सरकार ज्‍यादा पानी लेने वाली धान की फसल के बजाय मक्‍का की खेती को बढ़ावा दे रही है। इसके लिए राज्‍य सरकार मक्‍का के बीज पर सब्सिडी देगी। 

पंजाब सरकार के कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अच्‍छी पैदावार देने वाली मक्‍का की कई किस्‍मों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बीज और कीटनाशकोंं पर दी जाने वाली सब्सिडी सीधे किसानों के खातों में पहुंचाई जा सकती है। पंजाब में मक्‍का के बीज पर प्रति किलोग्राम 84 रुपये की सब्सिडी दी जाएगी।

मक्‍का बीज के लिए कहां संपर्क करें किसान?

पंजाब के किसान मक्‍का के बीज प्राप्‍त करने के लिए अपने जिले के मुख्‍य कृषि अधिकारी या ब्‍लॉक कृषि अधिकारी या कृषि विकास अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं। मक्‍का की विभिन्‍न उन्‍नत प्रजातियों के बीज राज्‍य में 168 रुपये प्रति किलोग्राम से लेकर 375 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर उपलब्‍ध हैं।