नीम कोटेड यूरिया पर कैसे हुआ मिलावट का लेप?

केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में खेती-किसानी के मामले में एक चीज पर काफी जोर दिया है। नीम कोटेड यूरिया! प्रधानमंत्री के तमाम भाषाणों और सरकारी दावों में नीम कोटेड यूरिया के फायदे गिनाए गए।

दरअसल, यूरिया के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। लेकिन किसानों का तो बस नाम है। यह सब्सिडी असल में मिलती है फर्टीलाइजर कंपनियों को। हर साल करीब 65-70 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी फर्टीलाइजर कंपनियों को दी जाती है। यह रकम देश के कृषि बजट से भी बड़ी है तो घपले-घोटाले भी बड़े ही होंगे। सरकारी सब्सिडी से बने यूरिया का गैर-कृषि कार्यों जैसे नकली दूध बनाने, कैमिकल बनाने आदि में डायवर्ट होना और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में तस्करी आम बात हो गई।

देश पर यह दोहरी मार थी। एक तरफ, सब्सिडी का यूरिया देश से बाहर जाने लगा। तो दूसरी तरफ, किसानों के लिए यूरिया की किल्लत होने लगी। यूरिया की तस्करी और कालाबाजारी की यह समस्या काफी पुरानी है। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही इसका तोड़ निकाल लिया। ये तोड़ था नीम कोटेड यूरिया। हालांकि,  नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हो गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने यूरिया को 100 फीसदी नीम कोटेड करने का फैसला किया। जो बड़ा कदम था।

साल 2015 में सरकार ने देश में यूरिया के संपूर्ण उत्पादन को नीम लेपित करना अनिवार्य कर दिया। आयात होने वाले यूरिया पर भी निंबोलियों के तेल यानी नीम तेल का स्प्रे करना जरूरी था। नीम के इतने ज्यादा अच्छे दिन कभी नहीं आए थे। सरकार का दावा था कि नीम कोटेड यूरिया से मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल की पैदावार बढ़ेगी। क्योंकि नीम लेपित यूरिया धीमी गति से प्रसारित होता है जिसके कारण फसलों की जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन की खुराक मिलती रहती है। नीम कोटिंग से यूरिया के औद्याेगिक इस्तेमाल और कालाबाजारी पर अंकुश लगने का दावा भी किया गया।

सरकार का मानना है कि नीम कोटिंग के जरिए यूरिया की कालाबाजारी रुकने से सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। बेशक, आइडिया अच्छा था। लागू भी 100 परसेंट हुआ। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई।

विज्ञान और पर्यावरण की जानी-मानी पत्रिका डाउन टू अर्थ ने हिसाब-किताब लगाया है कि देश में यूरिया की जितनी खपत है उसे नीम कोटेड करने के लिए जितना नीम तेल चाहिए उतना तो देश में उत्पादन ही नहीं है। जबकि सरकार का दावा है कि आजकल 100 फीसदी यूरिया नीम कोटेड है।

अगर सरकार की बात सही मानें तो सवाल उठता है कि जब देश में यूरिया के समूचे उत्पादन और आयातित यूरिया की कोटिंग के लिए पर्याप्त नीम तेल ही उपलब्ध नहीं है तो फिर नीम कोटिंग हो कैसे रही है? अब या तो यूरिया की 100 फीसदी नीम कोटिंग का सरकारी दावा गलत है या फिर नीम कोटिंग के लिए मिलावटी नीम तेल का इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार ने जब यूरिया की नीम कोटिंग का फैसला किया, ये सवाल कुछ लोगों ने तब भी उठाया था कि यूरिया की इतनी बड़ी मात्रा पर नीम स्प्रे के लिए नीम तेल कहां से आएगा? तब सिर्फ संदेह था, अब हमारे सामने डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट है। वो भी पूरी कैलकुलेशन के साथ!

https://www.downtoearth.org.in/news/governance/towards-a-bitter-end-india-s-neem-shortage-63978

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में नीम ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि भारत में यूरिया की जितनी खपत है, उसकी कोटिंग के लिए करीब 20,000 टन नीम तेल की जरूरत है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,000 टन नीम तेल की है। मतलब, जरूरत के मुकाबले मुश्किल से 15 फीसदी नीम का तेल देश में बनता है। सवाल फिर वही है। जब देश में इतना नीम तेल ही नहीं है तो फिर नीम कोटिंग कैसे हो रही है? बाकी का 85 फीसदी नीम तेल कहां से आ रहा है?

भारत में खेती के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया का इस्तेमाल होता है। देश में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 3.15 करोड़ टन है जिसमें से 76 लाख टन यूरिया आयात होता है। नीम कोटिंग से यूरिया की खपत घटने की बात कही गई थी लेकिन हाल के वर्षों में यूरिया की खपत बढ़ी है। लिहाजा आयात भी बढ़ा है।

नीम कोटिंग में मिलावट?

नीम तेल के उत्पादन और खपत में भारी अंतर से संदेह पैदा होता है कि कहीं नकली नीम तेल का इस्तेमाल तो यूरिया में नहीं हो रहा है। यह आशंका अप्रैल, 2017 में उर्वरक मंत्रालय की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन से पुख्ता होती है जिसमें कहा गया है कि कई नीम तेल सप्लायर यूरिया कंपनियों को नीम तेल की इतनी आपूर्ति कर रहे हैं जितनी उनकी उत्पादन क्षमता भी नहीं है। मंत्रालय ने नीम तेल सप्लायरों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिनडाउन टू अर्थ की रिपोर्ट का दावा है कि सरकार के इस नोटिस के बावजूद नीम तेल में मिलावट बदस्तूर जारी है।

यह हाल तब है जबकि एक टन यूरिया में सिर्फ 600 ग्राम नीम तेल स्प्रे का मानक तय किया गया है जिसे कई विशेषज्ञ बहुत कम मानते हैं। इस मात्रा को बढ़ाकर 2 किलोग्राम करने की मांग भी उठ रही है। कहा जा रहा है है कि एक टन यूरिया में 2 किलोग्राम से कम नीम तेल के स्प्रे से मिट्टी या फसलों पर कोई खास फायदा नहीं पहुंचेगा। खैर, ये कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेकिन असली सवाल नकली नीम तेल की मिलावट और सरकारी दावे की असलियत का है। नीम तेल में मिलावट के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस मिलावट को रोकने की कोई मजबूत नियामक व्यवस्था भी नहीं है।

नीम तेल आयात की तैयारी

लेकिन एक बात साफ है कि देश में नीम तेल की कमी है। जिसे दूर करने के लिए नीम तेल के आयात की सुगबुगाहट चल रही है। बहुत जल्द हम चीन या म्यांमार से नीम तेल आयात कर रहे होंगे। मतलब, चीन का विरोध करने के लिए चीनी फुलझंडी और पिचकारी के अलावा नीम तेल का भी बहिष्कार करना पड़ेगा।

उपाय क्या है?

बात ये है कि देश में जितने नीम के पेड़ हैं, उस हिसाब से नीम तेल का बाजार संगठित नहीं है। इसलिए इसे संगठित करने की जरूरत है। साथ ही नीम के पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहन देना पड़ेगा। भारत का सबसे बड़े उर्वरक निर्माता इफको ने इस दिशा में पहल की है। इफको ने देश भर में निंबोली खरीद केंद्र बनाए हैं। गुजरात और राजस्थान में कहीं जगह निंबोली संग्रह जोर पकड़ रहा है। लेकिन नीम तेल में मिलावट के के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अन्यथा,यूरिया की कालाबाजारी रोकने के चक्कर में नकली नीम तेल का कारोबार चमकने लगेगा।

न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे में काम कर रहे हैं मनरेगा मजदूर

ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में सक्षम महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरों को काफी कम पैसे मिल रहे हैं
2005 में जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून पारित हुआ था तो लगा था यह योजना ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल देगी। 2006 में यह योजना लागू हुई और लागू होने के कुछ ही समय के अंदर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसने गहरी छाप छोड़ी।
बाद में इस योजना के आगे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया। उसके बाद से आम बोलचाल की भाषा में इसे मनरेगा कहा जाता है। मनरेगा ने न सिर्फ आम लोगों को अपने गांवों और अपने इलाके में रोजगार दिया बल्कि इसने दूसरे कई क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की मजदूरी में बढ़ोतरी और उनकी कामकाजी परिस्थितियों में सुधार में भी योगदान दिया।
मनरेगा की वजह से ग्रामीण भारत में बुनियादी ढांचे का भी विकास हुआ। इसके तहत सौ दिन का निश्चित रोजगार मिलने की वजह से गांवों में बहुत सारे उत्पादों की मांग बढ़ी और इससे पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति के पहिये को गतिमान बनाए रखने में मदद मिली।
लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि मनरेगा का प्रभाव धीरे-धीरे कम करने की दिशा में काम हो रहा है। केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत मजदूरी की दर में काफी कम बढ़ोतरी की है। हर राज्य का औसत निकाला जाए तो यह बढ़ोतरी सिर्फ 2.6 फीसदी की है।
कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां मनरेगा की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की बढ़ोतरी की गई है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्यों में शामिल हैं। जबकि मिजोरम में यह बढ़ोतरी 17 रुपये की है।
कुल मिलाकर छह राज्य ऐसे हैं जहां मनरेगा की मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इन राज्यों में गोवा, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। इनके अलवा अंडमान द्वीपसमूह और लक्षद्वीप में भी मनरेगा की मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
इस वजह से आज स्थिति यह है कि देश के कुल 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा के तहत मजदूरी कर रहे श्रमिकों की मजदूरी कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से भी कम के स्तर पर है। यह बात नरेगा संघर्ष मोर्चा के एक विश्लेषण में सामने आई है।
मोर्चा के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ राज्य ऐसे हैं जहां कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी और मनरेगा की मजदूरी में काफी फर्क है। गोवा में कृषि क्षेत्र की जो न्यूनतम मजदूरी है, उसके मुकाबले मनरेगा मजदूरों को सिर्फ 62 फीसदी मजदूरी ही मिल रही है।
60 से 70 फीसदी के दायरे में आने वाले राज्यों में गुजरात, बिहार और ओडिशा शामिल हैं। दूसरे कई प्रमुख राज्यों में स्थिति थोड़ी ही ठीक है। सिर्फ छह राज्य ऐसे हैं जहां मनरेगा की मजदूरी कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी के 90 फीसदी से थोड़ा अधिक है।
इस अध्ययन से यह बात भी निकलकर सामने आई कि मनरेगा के तहत सिर्फ नगालैंड ही ऐसा एकमात्र राज्य है जहां मनरेगा के मजदूरों को कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से अधिक पैसे मिल रहे हैं। नगालैंड में कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी 115 रुपये है। जबकि मनरेगा के मजदूरों को 192 रुपये की मजदूरी मिल रही है।
मनरेगा के तहत अभी सबसे अधिक मजदूरी गोवा में दी जा रही है। गोवा में मनरेगा के तहत काम करने वाले एक श्रमिक को एक दिन की मजदूरी 254 रुपये दी जा रही है। लेकिन गोवा में कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी 405 रुपये प्रति दिन है। मनरेगा के तहत सबसे कम मजदूरी बिहार में 176 रुपये प्रति दिन दी जा रही है।
एक तथ्य यह भी है कि लगातार मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाने की मांग उठी है। कई समितियों ने भी यह सिफारिश की है कि मनरेगा की मजदूरी बढ़नी चाहिए। अनूप सतपथी समिति ने यह सिफारिश की थी कि मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी 375 रुपये तय की जानी चाहिए। लेकिन अब तक इन सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया गया है।
पहले से ही मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूर भुगतान में देरी की समस्या का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मजदूरी में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं करके सरकार ने एक तरह से संकेत दिया है कि मनरेगा मजदूरों के हकों और हितों को लेकर वह कितनी गंभीर है।
कहां तो मनरेगा पर संघर्ष करने वाले संगठन 600 रुपये प्रति दिन की मजदूरी मांग रहे हैं और कहां उन्हें कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करने को बाध्य होना पड़ रहा है। ऐसे में इस महत्वकांक्षी योजना का भविष्य क्या होगा, इसे लेकर तरह-तरह के सवाल पैदा हो रहे हैं।

क्या पीएम को किसानों से कनेक्ट कर पाएगी पीएम-किसान?

वित्त वर्ष 2019-20 के अंतरिम बजट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम किसान) की घोषणा की। इस योजना के तहत किसानों को हर साल 6,000 रुपये की आर्थिक मदद देगी। ये पैसे 2,000 रुपये के तीन किस्तों में दिए जाएंगे। मोदी सरकार ने भले ही इस योजना की घोषणा 1 फरवरी, 2019 को की हो लेकिन वह इसे 1 दिसंबर, 2018 से ही लागू कर रही है। सरकार ने इसके लिए 20,000 करोड़ रुपये आवंटित भी कर दिए हैं। यही वजह है कि लोकसभा चुनावों के पहले ही किसानों के खाते में 2,000 रुपये की पहली किस्त पहुंचने लगी है।
मोदी सरकार के मंत्री, भारतीय जनता पार्टी के नेता और कई स्वतंत्र विश्लेषक भी यह मानते हैं कि अगर पीएम-किसान योजना ठीक से लागू हो गई तो लोकसभा चुनावों में यह ‘गेमचेंजर’ साबित हो सकती है. यह बात कहे जाने के पीछे ठोस वजहें हैं। रियायती दर पर रसोई गैस का कनेक्शन देने वाली उज्जवला योजना के बारे में माना जाता है कि इसने 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आम तौर पर यह माना जाता है कि जिस योजना से जमीनी स्तर पर लोगों को प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ होता है, वह योजना चुनावों में उसे लागू करने वाली पार्टी का फायदा कराती है। यही वजह है कि पीएम-किसान योजना के बारे में भी कहा जा रहा है कि यह नरेंद्र मोदी के दोबारा सत्ता वापसी में उपयोगी साबित हो सकती है।
लेकिन इस योजना का चुनावी लाभ भाजपा और उसके सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के कितना मिलेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि इसका क्रियान्वयन कितनी सफलता से होता है। वैसे यह योजना है तो केंद्र सरकार की लेकिन इसका क्रियान्वयन काफी हद तक राज्य सरकारों की कार्यकुशलता और इच्छाशक्ति पर भी निर्भर करता है। क्योंकि इस योजना का लाभ लोगों तक पहुंचाने में जमीन से संबंधित रिकाॅर्ड का सही होना बेहद जरूरी है। इसमें राज्य सरकार की प्रमुख भूमिका होती है। क्रियान्वयन में और भी कई स्तर पर राज्य सरकारों की अहम भूमिका रहती है। इसलिए अगर राज्य सरकारों ने क्रियान्वयन में अपेक्षित सहयोग नहीं किया तो यह योजना उतनी प्रभावी नहीं साबित हो पाएगी जितनी उम्मीद केंद्र सरकार लगाए बैठी है।
पीएम-किसान के क्रियान्वयन में बैंकों की अहम भूमिका है। इसी तरह की एक योजना ओडिशा में भी चलाई जा रही है। जब उस योजना के तहत आर्थिक सहयोग किसानों के खाते में पहुंचा तो बैंकों ने यह पैसा किसानों पर बकाया कर्ज का हवाला देकर काट लिया। अगर बैंकों ने यही रुख पीएम-किसान योजना के लाभार्थियों के मामले में भी अपनाया तो पहले से कर्ज के बोझ तले दबे किसानों को इस योजना से कोई लाभ नहीं होगा और अंततः सरकार के प्रति उनका गुस्सा बढ़ेगा। अगर बैंकों के स्तर पर इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो चुनाव में इसका नुकसान भाजपा को हो सकता है।
पीएम-किसान योजना ने भी बटाई पर खेती करने वाले किसानों की समस्याओं का समाधान नहीं किया है। इस योजना में अब तक स्पष्ट तौर पर इस बात का उल्लेख नहीं है कि इसका लाभ बटाई पर खेती करने वाले किसानों को मिलेगा या नहीं। जबकि ऐसे किसानों की बड़ी संख्या है। जिस जमीन पर ये किसान बटाई पर खेती करते हैं, उन पर अगर उनके मालिकों को इस योजना का लाभ मिलता है और खेती करने वाले बटाई किसानों को नहीं मिलता है तो इससे इन किसानों में इस योजना को लेकर गुस्सा बढ़ सकता है। इससे इस योजना से भाजपा को हो सकता है कि अपेक्षित लाभ नहीं मिले और फायदा के बजाए नुकसान उठाना पड़ा।
इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि अगर पीएम-किसान योजना का ठीक से क्रियान्वयन नहीं हो पाया तो यह योजना भी पहले से चल रही दूसरी योजनाओं की श्रेणी में जा सकती है और जरूरतमंद किसान इसके फायदे से वंचित रह सकते हैं।

गुजरात: राजनीति और इंजीनियरिंग के लिहाज से क्‍यों खास है सौनी प्रोजेक्‍ट?

अपने महत्‍वाकांक्षी सौनी प्रोजेक्‍ट के जरिये गुजरात की सियासी इंजीनियरिंग को साधने में जुटे हैं नरेंद्र मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को गुजरात के जामनगर पहुंचे और ‘सौराष्ट्र नर्मदा अवतरण फॉर इरिगेशन’ (SAUNI) यानी सौनी प्रोजेक्‍ट के पहले चरण का लोकार्पण किया। साल 2012 में विधानसभा चुनाव से पहले बतौर सीएम नरेंद्र मोदी ने ही इस सिंचाई परियोजना का ऐलान किया था। एक बार फिर चुनाव से पहले 12 हजार करोड़़ रुपये की यह महत्‍वाकांक्षी परियोजना सुर्खियों में है। उम्‍मीद की जा रही है कि यह प्रोजेेक्‍ट सौराष्‍ट्र से सूखा पीड़‍ि़त किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आएगा। लेकिन इसका सियासी महत्‍व भी कम नहीं है। विपक्षी दल कांग्रेस ने परियोजना पूरी होने से पहले ही प्रथम चरण के लोकार्पण और प्रधानमंत्री की जनसभा को चुनावी हथकंंड़ा करार दिया है। पीएम बनने के बाद नरेंद्र मोदी की आज गुजरात में पहली सभा थी।

जामनगर, राजकोट और मोरबी जिले की सीमाओं से सटे सणोसरा गांव मेंं एक जनसभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सौनी प्रोजेक्ट पर हर गुजराती को गर्व होगा। किसान को जहां भी पानी मिलेगा, वह चमत्‍कार करके दिखाएगा। गुजरात के मुख्‍यमंत्री विजय रूपाणी का कहना है कि सौनी प्रोजेक्‍ट सूखे की आशंका वाले सौराष्‍ट्र के 11 जिलों की प्‍यास बुझाएगा। परियोजना के पहले चरण में राजकोट, जामनगर और मोरबी के 10 बांधों में नर्मदा का पानी पहुंचेेगा। अनुमान है कि सौराष्‍ट्र की करीब 10 लाख हेक्‍टेअर से अधिक कृषि भूमि को फायदा होगा।

सिविल इंजीनियरिंग का कमाल

सिविल इंजीनियरिंग के लिहाज से भी सौनी प्रोजेेक्‍ट काफी मायने रखता है। इसके तहत 1,126 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी, जिसके जरिये सरदार सरोवर बांध का अतिरिक्‍त पानी सौराष्ट्र के छोटे-बड़े 115 बांधों में डाला जाएगा। पहले चरण में 57 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाई गई है जिससे सौराष्‍ट्र में तीन जिलों के 10 बांधों में पानी पहुंचने लगा है। गुजरात सरकार का दावा है कि सभी 115 बांधों के भरने से करीब 5 हजार गांव के किसानों को फायदा होगा। गौरतलब है कि सौराष्‍ट्र के ये इलाके अक्‍सर सूखे की चपेट में रहते हैं। नर्मदा का पानी पहुंचने से यहां के किसानों को राहत मिल सकती है।

मोदी की रैली के सियासी मायने

हालांकि, सौनी प्रोजेक्‍ट 2019 तक पूरा होना है लेकिन अगले साल गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा और राज्‍य सरकार अभी से इसका श्रेय लेने में जुट गई है। आनंदीबेन पटेल के सीएम की कुर्सी से हटने और विजय रूपाणी के मुख्‍यमंत्री बनने के बाद यह पीएम मोदी की पहली गुजरात यात्रा है। उधर, पाटीदार आरक्षण और दलित आंदोलन भी भाजपा के लिए खासी चुनौती बना हुआ हैै। इसलिए भी पीएम मोदी के कार्यक्रम और जनसभा के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। सौराष्‍ट्र कृषि प्रधान क्षेत्र है और यहां पटेल आरक्षण और दलित आंदोलन का काफी असर है।

परंपरागत सिंचाई योजना से कैसे अलग है सौनी

देखा जाए तो सौनी प्रोजेेक्‍ट नर्मदा प‍रियोजना का ही विस्‍तार है। लेकिन परंपरागत सिंचाई परियोजनाओं की तरह सौनी प्रोजेक्‍ट में नए बांध, जलाशयों और खुली नहरों के निर्माण के बजाय पहले से मौजूद बाधों में पानी पहुंंचाया जाएगा। इसके लिए खुली नहरों की जगह पाइपलाइन बिछाई जा रही है। उल्‍लेखनीय है कि भूमि अधिग्रहण के झंझटों को देखते हुए गुजरात सरकार ने खुली नहरों के बजाय भूमिगत पाइपलाइन का विकल्‍प चुना था। इसी पाइपलाइन के जरिये नर्मदा का पानी सौराष्‍ट्र के 115 बांधों तक पहुंचााने की योजना है। भूमिगत पाइपलाइन से बांधों में पानी डालने के लिए बड़े पैमाने पर पंपिंग की जरूरत होगी। इस पर आने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।

परियोजना पर सवाल भी कम नहीं

12 हजार करोड़ रुपये केे सौनी प्रोजेक्‍ट पर सवाल भी कम नहीं हैं। दरअसल, राज्‍य सरकार का अनुमान है कि नर्मदा से करीब 1 मिलियन एकड़ फीट अतिरिक्‍त पानी सौराष्‍ट्र के 115 बांधों को मिल सकता है। गुजरात विधानसभा में विपक्ष के नेता शंकर सिंह वाघेला का कहना है कि सौनी प्रोजेक्‍ट की सच्‍चाई दो महीने बाद सामने आएगी। अभी तो बरसात की वजह से अधिकांश बांधों में बारिश का पानी पहुंंच रहा है। दो-तीन महीने बाद जब बांध सूख जाएंगे तब पता चलेगा सौनी प्रोजेक्‍ट से कितना पानी पहुंचता है। सरकार को कम से कम दो महीने का इंतजार करना चाहिए था।

किसान और खेती की आउटसोर्सिंग से किसका भला होगा?

कृषि प्रधान भारत की विडंबना यह है कि एक के बाद एक सरकारों की नीतियों, लागत व मूल्‍य नीति की खामियों और घटती जोत के आकार के चलते किसान और समूचा कृषि क्षेत्र मुश्किल में उलझा हुआ है।

इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण यह है कि पिछले 20 साल के दौरान हर रोज औसतन 2035 किसान मुख्‍य खेतीहर का दर्जा खो रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि सभी सरकारें महंगाई पर काबू करने के नाम पर किसानों को उनकी उपज का पूरा दाम देने से बचती रही हैं। यह सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। किसान की बदकिस्‍मती देखिए कि वह हर चीज फुटकर में खरीदता है, थोक में बेचता है और दोनों तरफ का भाड़ा भी खुद ही उठाता है।

एनएसएसओ के 70वें राउंड के आंकड़े बताते हैं कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कृषक परिवार की औसत मासिक आमदनी महज 6426 रुपये है। इस औसत आमदनी में खेती से प्राप्‍त आय का हिस्‍सा महज 47.9 फीसदी है जबकि 11.9 फीसदी आय मवेशियों से, 32.2 फीसदी मजदूरी या वेतन से और 8 फीसदी आय गैर-कृषि कार्यों से होती है।

बढ़ती लागत के चलते किसान का मुनाफ लगातार घटता जा रहा है। वर्ष 2015 में पंजाब के कृषि विभाग ने बढ़ती लागत के मद्देनजर गेहूं का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य 1950 रुपये प्रति कुंतल तय करने की सिफारिश की थी। खुद पंजाब के मुख्‍यमंत्री ने कृषि लागत एवं मूल्‍य आयोग यानी सीएसीपी और केंद्र सरकार से गेहूं का एमएसपी 1950 रुपये करने की मांग की थी। लेकिन नतीजा क्‍या हुआ? गेहूं का एमएसपी महज 1525 रुपये तय किया गया। अब बताईये 425 रुपये प्रति कुंतल का नुकसान किसान कैसे उठाएगा?

केंद्र में नई सरकार आने के बाद किसानों को उम्‍मीद जगी थी कि स्‍वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू किया जाएगा। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी चुनावी सभाओं में किसानों को लागत पर 50 फीसदी मुनाफा दिलाने का वादा किया था। लेकिन ये उम्‍मीदें भी फरवरी, 2015 ने चकनाचूर हो गईं जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह कृषि उपज का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य लागत से 50 फीसदी ज्‍यादा बढ़ाने में सक्षम नहीं है। केंद्र सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि लागत पर 50 फीसदी बढ़ोतरी बाजार में उथलपुथल ला सकती है। तर्क यह है कि 60 करोड़ लोगों सिर्फ इसलिए वाजिब दाम से वंचित रखा जाए ताकी बाजार न बिगड़े। इस तरह की नीतियां लागू करने वाले सरकारी अधिकारी क्‍या 30 दिन काम कर 15 दिन का वेतन लेने को तैयार हैं? फिर किसान के साथ ये खिलवाड़ क्‍यों?

कृषि के मामले में नीतिगत खामियों का सिलसिला उपज के दाम तक सीमि‍त नहीं है। और भी तमाम उदाहरण हैं। सरकार ने 5 लाख टन ड्यूटी फ्री मक्‍का का आयात किया था जिससे कीमतों में जबरदस्‍त गिरावट आई। अब इसमें मक्‍का उगाने वाले किसान का क्‍या दोष जो समर्थन मूल्‍य से कम से उपज बेचने को मजबूर हुआ? क्‍या ऐसे स्थितियों में सरकार को किसान के नुकसान की भरपाई नहीं करनी चाहिए? क्‍या इसी तरह के हालत किसान को कर्ज के जाल में नहीं उलझाते हैं? मांग और आपूर्ति की स्थिति को देखते हुए कृषि उपज के आयात या निर्यात के फैसले सरकार को लेने होते हैं लेकिन इन फैसलों में किसान के हितों की रक्षा भी तो होनी चाहिए।

हाल ही में केंद्र सरकार ने मोजांबिक से दाल आयात के लिए दीर्घकालीन समझौता किया है। इसके तहत वर्ष 2021 तक 2 लाख टन दालों का आयात किया जाएगा। भारत सरकार मोजांबिक में कॉपरेटिव फार्मिंग का नेटवर्क खड़ा करेगी और किसानों को दलहन उत्‍पादन के लिए अच्‍छे बीज और सहायता दी जाएगी। इन किसानों की उपज को सरकार न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर खरीदेगी।

हैरानी की बात यह है कि सरकारी एजेंसियां भारत में सिर्फ 1 फीसदी दालों की खरीद न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य पर कर पाती हैं। जबकि यही सरकार अफ्रीका के किसानों को 100 फीसदी खरीद एमएसपी पर करने का भरोसा दिला रही है। ऐसा भरोसा भारत के किसानों को दिया जाए तो यहां भी दलहन उत्‍पादन बढ़ सकता है। इसका सबूत यह है कि इस साल दलहन के समर्थन मूल्‍य में सरकार ने 425 रुपये प्रति कुंतल तक की बढ़ोतरी की है और 15 जुलाई तक दलहन की बुवाई में गत वर्ष के मुकाबले 40 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की जा चुकी है। अधिकांश कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खेती की आउटसोर्सिंग भारतीय किसानों के हितों के खिलाफ है।

हालांकि, सरकार ने मुख्‍य आर्थिक सलाहकार के नेतृत्‍व में दलहन पर नीति बनाने के लिए एक समिति का गठन किया है जो एमएसपी, बोनस और दालों के उत्‍पादन के लिए किसानों को रियायतें आदि देने जैसे विकल्‍पों पर विचार करेगी। लेकिन दिक्‍कत यह है कि सरकार अपनी नीतिगत खामियों की तरफ तभी ध्‍यान देती है जबकि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर बवाल खड़ा हो जाए। जबकि कामचलाऊ उपायों के बजाय दीर्घकालीन नीतियों और उपायों के जरिये किसान को सहारा देने की जरूरत है।

कैसे उठाएंं प्रधानमंत्री बीमा योजना का फायदा? क्‍या हैं दिक्‍कतें?

योजना के व्‍यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी बहुत-से किसानों को जानकारी नहीं है कि फसल बीमा कैसे कराएं और क्‍लेम कैसे मिलेगा?

करीब चार महीने पहले किसानों को प्रकृति की मार और अचानक होने वाले नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का ऐलान किया था। इस खरीफ सीजन से किसानों को इस नई योजना का लाभ मिलना शुरू हो जाएगा। लगातार दो साल से सूखे की मार झेल रहे किसानों को बेसब्री से इस योजना का इंतजार है। योजना के बारे में व्‍यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद अभी भी बहुत-से किसानों को जानकारी नहीं है कि फसल बीमा कैसे कराएं और क्‍लेम कैसे मिलेगा?

नई योजना में क्‍या है नया? 

  • पुरानी फसल बीमा योजनाओं में किसानों को 15 फीसदी तक प्रीमियम देना पड़ता था लेकिन नई बीमा योजना में किसानों के लिए प्रीमियम की राशि महज डेढ से 2 फीसदी रखी गई है। बागवानी फसलों के लिए किसानों को 5 फीसदी प्रीमियम देना होगा। बीमा का बाकी खर्च केंद्र और राज्‍य सरकारें मिलकर वहन करेंगी।
  • सरकारी सब्सिडी पर कोई ऊपरी सीमा नहीं है। भले ही शेष प्रीमियम 90% हो, यह सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। पुरानी बीमा योजनाओं में सरकारी सब्सिडी की ऊपरी सीमा तय होती थी। जिसके चलते नुकसान की पूरी भरपाई नहीं हो पाती थी। नई स्कीम में बीमित राशि का पूरा क्‍लेम मिल सकेगा।
  • अभी तक देश में करीब 23 फीसदी किसान ही फसल बीमा के दायरे में आ पाए हैं। सरकार ने इस साल कम से कम 50 फीसदी किसानों तक फसल बीमा पहुंचाने का लक्ष्‍य रखा है।

-बैंकों से कर्ज लेने वाले किसानों के लिए फसल बीमा अनिवार्य है। यानी बैंक से कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा बैंकों के जरिये हो जाएगा। लेकिन जिन किसानों ने बैंकों से कर्ज नहीं लिया, उन्‍हें बीमा के दायरे में लाने सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।

– ओलाबारी, जलभराव और भू-स्‍खलन जैसी आपदाओं को स्थानीय आपदा माना जाएगा। स्थानीय आपदाओं और फसल कटाई के बाद नुकसान के मामले में किसान को इकाई मानकर नुकसान का आकलन किया जाएगा।

किस तरह के नुकसान कवर होंगे

बुवाई/रोपण में रोक संबंधित जोखिम: कम बारिश या प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण बुवाई/ रोपण में उत्पन्न रोक।

खड़ी फसल (बुवाई से कटाई तक के लिए): सूखा, अकाल, बाढ़, सैलाब, कीट एवं रोग, भूस्खलन, प्राकृतिक आग और बिजली, तूफान, ओले, चक्रवात, आंधी, टेम्पेस्ट, तूफान और बवंडर आदि के कारण उपज के नुकसान।

कटाई के उपरांत नुकसान: नई बीमा योजना में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई हो पाएगी। अगर फसल कटाई के 14 दिन तक यदि चक्रवात, चक्रवाती बारिश और बेमौसम बारिश से उपज को नुकसान पहुंचता है तो किसान को बीमा क्‍लेम मिल सकता है।

स्थानीय आपदायें: अधिसूचित क्षेत्र में मूसलधार बारिश, भूस्खलन और बाढ़ जैसे स्थानीय जोखिम से खेतों को हानि/क्षति।

बीमा कराने पर कितना खर्च आएगा 

उदाहरण के तौर पर, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में 30 हजार का बीमा कराने पर अगर प्रीमियम 22 प्रतिशत तय किया गया है तो किसान 600 रुपए प्रीमियम देगा और सरकार 6000 हजार रुपए का प्रीमियम देगी। शत-प्रतिशत नुकसान की दशा में किसान को 30 हजार रुपए की पूरी दावा राशि प्राप्त होगी।

-अगर किसी ग्राम पंचायत में 75 फीसदी किसान बुवाई नहीं कर पाएं तो योजना के तहत बीमित राशि का 25 फीसदी भुगतान मिलेगा।

25 फीसदी राशि तुरंत खातों में पहुंचााने का दावा 

सरकार का दावा है कि बीमा क्‍लेम के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा। प्राकृतिक आपदा के बाद 25 फीसदी राशि किसान के खाते में तुरंत पहुंचेगीी जबकि बाकी भुगतान नुकसान के आकलन के बाद किया जाएगा।

किन किसानों को मिलेगा बीमा का लाभ?

सभी पट्टेदार/ जोतदार किसानों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ मिल सकता है। योजना के तहत पंजीकरण कराने के लिए किसानों कों भूमि रिकॉर्ड अधिकार (आरओआर), भूमि कब्जा प्रमाण पत्र (एल पी सी) आदि आवश्यक दस्तावेजी प्रस्तुत करने होंगे।

गैर ऋणी किसानों के लिए यह योजना वैकल्पिक होगी।

कैसे कराएं फसल बीमा?

कृषि ऋण लेने वाले किसानों का बीमा उनके बैंक के जरिये होगा। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज नहीं लिया है वे भी नोडल बैंक या भारतीय कृषि बीमा कंपनी (एआईसी) के स्‍थानीय प्रतिनिधि अथवा संबंधित पंचायत सचिव, ब्‍लाॅक के कृषि विकास अधिकारी या जिला कृषि अधिकारी के माध्‍यम से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में अपना पंजीकरण करा सकते हैं।

भारत सरकार ने किसानों तक बीमा योजना को पहुंचाने के लिए एक बीमा पोर्टल भी शुरू किया है। जिसका वेब पता  है http://www.agri-insurance.gov.in/Farmer_Details.aspx

इसके अलावा एक एंड्रॉयड आधारित “फसल बीमा ऐप्प” भी शुरू किया गया है जो फसल बीमा, कृषि सहयोग और किसान कल्याण विभाग (डीएसी एवं परिवार कल्याण) की वेबसाइट से डाउनलोड किया जा सकता है।

फसल बीमा कराने के लिए जरुरी दस्‍तावेज?

-सरकारी पहचान-पत्र

-निवास प्रमाण-पत्र

-खसरा/खाता संख्या की प्रमाणित प्रति (बोये गए क्षेत्र के दस्तावेज़)

-बैंक खाता संख्या और रद्द किया गया चेक (बैंक विवरण के लिए)

  • एक हस्ताक्षरित भरा हुआ प्रस्ताव फॉर्म

फसल बीमा की पूरी प्रकिया ऑनलाइन होने और स्‍थानीय स्‍तर पर कर्मचारियों की कमी के चलते किसानों को फसल बीमा करवाने में कई तरह की दिक्‍कतें आ रही हैं। जनधन खाते खोलने के लिए बैंकों ने जिस प्रकार अभियान चलाए, वैसे तत्‍परता फसल बीमा को लेकर देखने में नहीं आ रही है।

फसल बीमा में असल दिक्‍कतें क्‍लेम लेते वक्‍त आनी शुरू होंगे। तभी नई योजना की खूबियां और खामियां पूरी तरह उजागर होंगी।

हरियाणा: मक्‍का की बुवाई के लिए मुफ्त मिलेगा बीज, जानिए कैसे?

हरियाणा में किसानों को मक्‍का के बीज मुफ्त दिए जाएंगे। हरियाणा सरकार प्रति एकड़ 2,000 रुपये के हिसाब से अधिकतम 4 एकड़ के लिए मक्‍का के बीज मुफ्त उपलब्‍ध कराएगी।

ज्‍यादा पानी लेने वाली धान के बजाय मक्‍का की खेती को बढ़ावा देने के लिए कई राज्‍य प्रयासरत हैं। हरियाणा में मक्‍का के बीज किसानोंं को मुफ्त दिए जाएंगे।

फसल विविधिकरण योजना के तहत हरियाणा में किसानों को प्रति एकड़ 2 हजार रुपये के अनुदान पर मक्‍का का संकर बीज मुहैया कराया जाएगा। यह अनुदान अधिकतम 4 एकड़ के लिए मिलेगा। इस तरह मक्‍का की बुवाई के लिए अधिकतम 8 हजार रुपये तक अनुदान मिल सकता है। पंजाब में भी मक्‍का के उन्‍नत बीजों पर 84 रुपये प्रति किलोग्राम की सब्सिडी दी जा रही है।

मक्‍का के बीज पर अनुदान हासिल करने के लिए किसान हरियाणा कृषि विभाग की वेबसाइट http://agriharyana.in/ पर पंजीकरण करा सकते हैं जिसकी अंतिम तिथि 20 जून है। सब्सिडी का पैसा सीधे किसानों के खातों में पहुंचेगा। योजना का लाभ उठाने के लिए किसान अपने जिले के कृषि विकास अधिकारी या संबंधित ब्‍लॉक कृषि अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं।

गौरतलब है मक्‍का की बुवाई का उपयुक्‍त समय 20 जून से 25 जुलाई के बीच होता है। मक्का कार्बोहाइड्रेट का बहुत अच्छा स्रोत है और यह एक बहुुपयोगी फसल है। इसलिए मक्‍का का आद्यौगिक महत्‍व लगातार बढ़ता जा रहा है।

धान की सीधी रोपाई पर भी अनुदान
हरियाणा सरकार धान की सीधी रोपाई को बढ़ावा देनेे के लिए किसानों को प्रति एकड़ 3 हजार रुपये का अनुुदान देगी। यह अनुदान अधिकतम 5 एकड़ के लिए मिलेगा। धान की सीधी रोपाई से पानी, बिजली और मजदूरी की बचत होती है। इसके लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 25 जून है। राज्‍य सरकार ने 15 जून से पहले धान की रोपाई पर पूरी तरह रोक लगाई है।

फसल बीमा का फायदा किसानों तक पहुंचाने की कोशिशें तेज

केंद्र सरकार की महत्‍वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू होने के बाद अब इसे ज्‍यादा से ज्‍यादा किसानों तक पहुंचाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए राज्‍य सरकारों और कृषि से जुड़ी विभिन्‍न एजेंसियों के साथ मिलकर प्रयास किए जा रहे हैं।

नई दिल्‍ली। केंद्र सरकार की महत्‍वाकांक्षी प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू होने के बाद अब इसे ज्‍यादा से ज्‍यादा किसानों तक पहुंचाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। इसके लिए राज्‍य सरकारों और कृषि से जुड़ी विभिन्‍न एजेंसियों के साथ मिलकर प्रयास किए जा रहे हैं।

सूखे की मार झेल रहे किसानों को फसल बीमा योजना से काफी उम्‍मीदे हैं। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के व्‍यापक प्रचार के चलते भी किसानों में फसल बीमा को लेकर जागरुकता बढ़ी है। कृषि मंत्रालय से मिली जानकारी के अनुसार, इस साल गुजरात में 50 हजार किसानों ने ऑनलाइन माध्‍यम से खुद को प्रधानमंत्रीी फसल बीमा योजना के लिए पंजीकृत किया है। गौरतलब है कि गुजरात में ऑनलाइन पोर्टल के जरिये फसल बीमा के लिए किसानों का पंजीकरण किया जा रहा है। जबकि अन्‍य राज्‍यों में बैंकों और सहकारी संस्‍थाओं के जरिये किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलाया जा रहा है।

गौरतलब हैै कि नई फसल बीमा योजना में पुरानी योजनाओं की खामियों को दूर करने का प्रयास किया गया है और प्रीमियम काफी कम कर दिया है। अब खाद्यान्न एवं तिलहन फसलों के लिए प्रीमियम 1.5 से दो प्रतिशत के बीच तथा बागवानी एवं कपास फसलों के लिए पांच प्रतिशत तक रखा गया है।

सूखाग्रस्‍त यवतमाल के 3.5 लाख किसानों को मिलेगा बीमा का लाभ

सरकारी अधिकारियों का दावा है कि महाराष्ट्र्र के सूखा-ग्रस्त यवतमाल जिले के करीब 3.53 लाख किसानों को विभिन्न बीमा योजनाओं के तहत 191 करोड़ रुपये का लाभ मिलेगा।

जिला प्रशासन अधिकारियों ने कहा कि बीमा कंपनियों ने कुल 191 करोड़ रपए में से 117 करोड़ रुपये राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना और 74 करोड़ रुपये मौसम आधारित योजना के लिए दिए है। जिला कृषि निरीक्षक अधिकारी दत्तात्रोय गायकवाड़ ने बताया कि बीमा कंपनियों से दो योजनाओं के लिए 191 करोड़ रुपये की राशि मिली है और यह धन किसानों के बैंक खातों में जल्दी हस्तांतरित कर दिया जाएगा।

सूखे के संकट में मनरेगा की लाचारी

इस साल देश में 12 राज्‍यों के 256 जिले सूखे की मार झेल रहे हैं। करीब 33 करोड़ लोग सूखे की चपेट में हैं। ताज्‍जुब की बात है कि यह जानकारी हमें सुप्रीम कोर्ट के जरिए मिली है। कई इलाकों में तो सूखे का यह लगातार दूसरा या तीसरा साल है। जिस आपदा की चेतावनी सरकार को समय रहते खुद ही देनी चाहिए थी, उससे केंद्र और राज्‍य सरकारें लगातार मंह चुराती रहीं। सरकारों को सूखे की गंभीरता का अहसास कराने के लिए स्‍वराज अभियान को जनहित याचिका लगानी पड़ी। एक राष्‍ट्रीय स्‍तर की आपदा को लेकर सरकारों की ऐसी बेपरवाही अपने आप में एक त्रासदी है!

सूूखा राहत पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक ऐतिहासिक फैसला आया है। अदालत ने कहा है कि सरकारों का शुतुरमुर्ग वाला रवैया बड़े अफ़सोस की बात है। निश्चित रूप से अंतिम जिम्मेदाारी केंद्र सरकार की है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को “धन की कमी के परदे” के पीछे नहीं छिपने और देश के 12 राज्यों में सूखा प्रभावित लोगों के लिए व्यापक राहत प्रदान करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को मानना पड़ा कि सूखे से निपटने के लिए जो राष्ट्रीय योजना बनानी चाहिए थी वह नहीं बनाई गई। राष्ट्रीय आपदा राहत कोष की राशि के आवंटन में देरी हुई और मनरेगा के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध करवाने में सरकार पूरी तरह सफल नहीं रही है। नेशनल डिजास्‍ट रेस्‍पॉन्‍स फोर्स यानी एनडीआरएफ के पास सूखे की आपादा से निपटने के लिए कोई विशेषज्ञता ही नहीं है।

सूखे को लेकर सरकारी उदासीनता इतनी है कि अदालत की फटकार के बाद राज्‍यों से सूखाग्रस्‍त जिलों की जानकारियों जुटाई गईं। सूखे की सबसे ज्‍यादा मार खेती, किसान, मवेशियों और मजदूरी व रोजगार के मौकों पर पड़ती है। इस‍ लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना मनरेगा सूखाग्रस्‍त इलाकों को इस संकट से उबारने में मददगार साबित हो सकती है। लेकिन मनरेगा खुद कई वर्षों से सरकारी उपेक्षा का शिकार है।

मनरेगा एक सरकारी योजना मात्र नहीं है बल्कि इसका एक कानूनी आधार भी है। सरकार मनमाने तरीके से इसके फंड में कटौती या देरी नहीं कर सकती। लेकिन मनरेगा से जुड़े सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलेगा कि कैसे मनरेगा जैसे कानूनी अधिकार को कमजोर किया जा रहा है। सूखे के संकट में मनरेगा की इस लाचारी को इन तथ्‍यों के जरिये समझा जा सकता है-

मनरेगा बजट में कटौती 

वर्ष 2010-11 में मनरेगा का फंड देश की जीडीपी का 0.6 फीसदी था जो वर्ष 2016-17 में घटकर सिर्फ 0.26 फीसदी रह गया। वर्ष 2010-11 में मनरेगा को सर्वाधिक 40,100 करोड़ रुपये का बजट मिला था।

पिछले साल मनरेगा के तहत कुल 235 करोड़ दिनों का रोजगार सृजित हुआ था। एक दिन के काम पर आने वाले खर्च के हिसाब से मनरेगा को इस साल कम से कम 50 हजार करोड़ रुपये का बजट मिलना चाहिए था लेकिन सरकार ने दिए सिर्फ 38,500 करोड़ रुपये। इसमें भी करीब 12 हजार करोड़ रुपये पिछले साल का बकाया है। मनरेगा के बजट में कटौती का सीधा मतलब है कि सूखे की मार झेल रहे इलाकों में मनरेगा के तहत भी काम मिलने में दिक्‍कत आएगी। काम मिला भी तो भुगतान अटक सकता है।

मनरेगा के तहत प्रस्‍तावित कार्यदिवसों में कटौती 

केंद्र सरकार के पास मनरेगा खर्च में कटौती के कई रास्‍ते हैं। सबसे सरल तरीका यह है कि राज्‍यों की तरफ से जितने दिनों के काम की मांग हो उसी में कटौती कर दी जाए। मिसाल के तौर पर वर्ष 2016-17 के लिए राज्‍यों ने केंद्र सरकार से मनरेगा के तहत 315 करोड़ दिनों (पर्सन डेज) का काम मांगा था। लेकिन केंद्र ने राज्‍यों को 217 करोड़ दिनों का काम ही मंजूर किया। सीधे तौर पर 98 करोड़ दिन यानी एक तिहाई काम की कटौती। जबकि पिछले साल ही मनरेगा में 235 करोड़ दिनों का काम हो चुका है। इससे पहले वर्ष 2012-13 में तो 278 करोड़ दिनों के काम को मंजूरी दी गई थी।

सिर्फ 10 फीसदी परिवारों को 100 दिन का काम

मनरेगा कानून के तहत जरूरतमंद परिवारों को साल में 100 दिन का रोजगार मिलना चाहिए। सरकार ने सूखाग्रस्‍त राज्‍यों में 100 के बजाय 150 दिनों का रोजगार देने की घोषणा की है। लेकिन इस घोषणा का फायदा शायद ही जमीनी स्‍तर पर पहुंच पाए। क्‍योंकि पिछले साल जिन 4.8 करोड़ परिवारों को मनरेगा के जरिये रोजगार मिला उसमें से 100 दिन का रोजगार मात्र 10 फीसदी परिवारों को ही मिल पाया था। इसलिए 150 दिन रोजगार देने का दावा दूर की कौड़ी नजर आता है। मनरेगा की एक कड़वी सच्‍चाई यह भी है कि इसके तहत औसतन एक परिवार को साल में 48 दिन का रोजगार ही मिल पाता है।

सूखा प्रभावित इलाकों में केंद्र सरकार ने 50 दिन का अतिरिक्‍त काम देने का ऐलान किया है लेकिन इसके लिए अतिरिक्‍त फंड का कोई इंतजाम नहीं किया। जबकि इस पर अंदाजन 15 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्‍त खर्च आएगा।

60 फीसदी भुगतान में देरी 

मनरेगा के तहत 15 दिन के भीतर मजदूरी का भुगतान हो जाना चाहिए। लेकिन वर्ष 2015-16 में सिर्फ 37.31 फीसदी भुगतान ही 15 दिन के भीतर हुआ। यानी 60 फीसदी से ज्‍यादा भुगतान में विलंब हुआ है। सूखे की मार झेल रही देश की सबसे गरीब जनता को मनरेगा जैसी योजनाओं से मदद की आस रहती है लेकिन यहां भी सरकारी लेटलतीफी हावी है।

सिर्फ 1.5 फीसदी मुआवजे का भुगतान 

मनरेगा के भुगतान में देरी को लेकर केंद्र का रवैया कितना ढुलमुल है इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि भुगतान में देरी के एवज में 207 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाना था लेकिन फंड की कमी का हवाला देते हुए सिर्फ 3 करोड़ रुपये का भुगतान हुआ। यानी सिर्फ 1.5 फीसदी मुआवजे का भुगतान हो पाया।

10 राज्‍यों में न्‍यूनतम मजदूरी से भी कम है मनरेगा की मजदूरी 

इसी तरह मनरेगा के तहत न्‍यूनतम मजदूरी की अनदेखी कर मजदूरी की दरें निर्धारित की जा रही हैं। देश के 10 राज्‍यों में मनरेगा मजदूरी की दरें न्‍यूनतम मजदूरी से कम रखी गई हैं। कर्नाटक में न्‍यूनतम मजदूरी 288.66 रुपये है जबकि मनरेगा मजदूरी 224 रुपये निधारित की गई है।

तमाम खामियों के बावजूद मनरेगा क्‍यों जरुरी?

•  मनरेगा से रोजगार पाने वालों में 50 फीसदी से ज्‍यादा महिलाएं और 40 फीसदी से ज्‍यादा अनुसूचित जाति या जनजाति के लोग हैं। समाज के कमजोर वर्गों तक मदद पहुंचाने के मामले में मनरेगा कारगार साबित हो रही है।

•  मनरेगा के 97 फीसदी से ज्‍यादा फंड का इस्‍तेमाल हो रहा है। हर साल करीब 5 करोड़ परिवारों को इस योजना का लाभ मिल रहा है। बड़े पैमाने पर मनरेगा के तहत रोजगार की मांग की जा रही है और काम हो रहे हैं। हालांकि, इनमें बड़े पैमाने पर भ्रष्‍टाचार की शिकायतें भी हैं लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि मनरेगा का असर जमीनी स्‍तर पर पहुंचा है।

•  मनरेगा का 60 फीसदी से ज्‍यादा फंड कृषि व संबंधित कार्यों पर खर्च हुआ है। इसलिए मनरेगा सूखे की मार झेल रहे किसान व मजदूरों तक मदद पहुंचाना का बेहतर जरिया साबित हो सकती है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सूखा राहत पर अपने ऐतिहासिक फैसले में सरकार को गर्मी की छुट्टीयों के दौरान मिड-डे मील को जारी रखने, मिड-डे मील में अंडा या दूध को शामिल करनेे, खाद्यान्न राशन को सार्वभौमिक बनाने के साथ-साथ मनरेगा के लिए समय पर एवं पर्याप्त फंड रिलीज करने को कहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह मनरेगा के दायरे को सीमित रखने और इस योजना पर अंकुश लगाने की कोशिशें चल रही हैं, उसने देश की सबसे गरीब आबादी को सूखे की मार से बचाने का एक अहम रास्‍ता तंग कर दिया है।