आ गया मानसून, मगर सरकार ने खारिज किया स्काइमेट का दावा

इस साल मानसून को लेकर विचित्र स्थिति पैदा हो गई है। भारत सरकार का मौसम विभाग और देश की प्रमुख मौसम पूर्वानुमान एजेंसी स्काइमेंट मानसून को लेकर अलग-अलग दावें कर रहे हैं।

स्काइमेट के अनुसार, मानसून 30 मई को केरल पहुंच चुका है। बंगाल की खाड़ी में उठे सुपर साइक्लोन अंपन के बावजूद मानसून ने दो दिन पहले ही केरल में दस्तक दे दी। राज्य में कई जगह बारिश शुरू हो चुकी है। स्काइमेट ने केरल समेत पश्चिमी तटों पर भारी बारिश की संभावना जताई है।

उधर, केंद्र सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम. राजीवन ने मानसून के केरल पहुंचने की खबर को गलत करार दिया है। उनका कहना है कि मानसून अभी केरल नहीं पहुंचा। मौसम विभाग के मुताबिक, एक जून से मानसून के केरल पहुंचने की स्थितियां बन जाएंगी। मौसम विभाग पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत काम करता है।

इस साल स्काइमेट ने मानसून के समय से पहले 28 मई को केरल पहुुंचने की संभावना जताई थी। कंपनी ने इसमें 2 दिन का एरर मार्जिन दिया है। जबकि मौसम विभाग ने मानसून के सामान्य रहने का अनुमान देते हुए 1 जून को केरल पहुंचने की उम्मीद जताई थी।

स्काइमेट मुताबिक, मानसून आगमन की घोषणा के लिए कुछ तय मापदंड होते हैं। इन मापदण्डों में भूमध्य रेखा के उत्तर में यानी भारत की तरफ वायुमंडलीय स्थितियों में बदलाव और लक्षद्वीप, केरल तथा कर्नाटक में बारिश प्रमुख हैं। ये सभी मापदंड पूर्ण हो रहे हैं। खासतौर पर बारिश, आउटगोइंग लॉन्गवेव रेडिएशन (ओएलआर) वैल्यू और वायुगति उस स्थिति में पहुंच चुकी हैं जब मानसून के आगमन की घोषणा की जा सके।

स्काइमेट के अनुसार, मुंबई और उपनगरीय इलाकों में 2 से 4 जून के बीच अच्छी बारिश होने के आसार हैं। इस दौरान कोंकण गोवा के तटीय भागों में भारी बारिश की भी संभावना है।

हाल के वर्षों में कई बार मौसम विभाग की बजाय प्राइवेट कंपनी का अनुमान सही निकला। यही वजह है कि मौसम पूर्वानुमान सरकारी विभाग और प्राइवेट एजेंसी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। हालांकि, सरकारी विभाग होने केे नाते अंतत: मौसम विभाग की बात ही आधिकारिक मानी जाएगी।

 

किसान को नकद मदद चाहिए, ‘डिरेगुलेशन’ का झुनझुना नहीं

हमारे किसानों को स्वतंत्र करें। वो कोविड-19 के प्रभाव को कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं। यहां पर स्वतंत्र करने का मतलब है कि उनकी सप्लाई चेन की रुकावटों को दूर किया जाए। जी हां, वही ‘सप्लाई चेन’ जिसका उल्लेख प्रधानमंत्री जी ने 12 मई को दिए अपने भाषण में 9 बार किया था। इसके बाद, वित्त मंत्री ने ‘फार्म-गेट इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए 1 लाख करोड़ रु. के एग्री इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड’ तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम एवं एपीएमसी एक्ट में संशोधन के लिए एक ‘लीगल फ्रेमवर्क’ के निर्माण की घोषणा की। कागजों पर देखें, तो ये सही दिशा में उठाए गए साहसी कदम मालूम पड़ते हैं, लेकिन आज फैली महामारी के संदर्भ में इनसे किसानों को कोई राहत नहीं मिलेगी।

कृषि सेक्टर में जान फूंकने का मौजूदा सरकार का पिछला रिकॉर्ड काफी निराशाजनक रहा है। साल 2004-05 से 2013-14 के बीच भारत की औसत कृषि जीडीपी वृद्धि 4 प्रतिशत थी, जो 2014-15 से 2018-19 के बीच गिरकर 2.9 प्रतिशत रह गई।

कृषि देश का सबसे बड़ा निजी क्षेत्र है, लेकिन केंद्र सरकार ने अनेक पाबंदियां लगाकर कृषि क्षेत्र को पूरी क्षमता का इस्तेमाल करने से रोक रखा है। कृषि को नियंत्रित करने की मानसिकता दो ऐतिहासिक कारणों से है। पहला, जब तक हरित क्रांति ने हमें आत्मनिर्भर नहीं बनाया, तब तक भारत खाद्यान्न के लिए विकसित देशों पर निर्भर था। हमारे किसान सूखा, बारिश जैसी हर चुनौती का सामना करते हैं फिर भी हर साल खाद्यान्न उत्पादन में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। अनाज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सरकार का दायित्व है, ताकि किसानों को ‘कृषि उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि’ होने पर भी स्थिर व उचित दाम मिल सके।

दूसरा, भारत की राजनैतिक अर्थव्यवस्था में किसानों को उचित दाम 1960 के बाद एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया क्योंकि बड़े किसान राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो चुके थे। किसानों ने अपनी नवअर्जित राजनैतिक शक्ति का उपयोग सरकारी हस्तक्षेप से ऊंचे व ज्यादा स्थिर दाम पाने के लिए किया, जिससे भारत दुनिया में खाद्यान्न का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। इस प्रकार सालों से खाद्यान्न आयात करने की भारत की समस्या का अंत हुआ। हमारे लिए रिकॉर्ड स्तर पर खाद्यान्न का उत्पादन गर्व की बात है क्योंकि इसके साथ इतिहास जुड़ा हुआ है। किसी भी कृषि रिपोर्ट में सरकार सबसे पहले इसी का उल्लेख करती है।

खेत से लेकर खाने की मेज तक कृषि सेक्टर पर वास्तविक नियंत्रण सरकार के हाथ में है। प्रतिबंधात्मक स्वामित्व, लीज़ एवं टीनेंसी कानून के रूप में सरकार का पूरा ‘कैपिटल कंट्रोल’ है। अपनी जमीन निजी लोगों को बेचने या किराये पर देने में किसान के सामने कई बाधाएं हैं। खाद-बीज के दाम और पानी-बिजली पर सब्सिडी पर सरकारी नियंत्रण के रूप में सरकार का ‘इनपुट कंट्रोल’ रहता है। कृषि उपकरणों एवं कलपुर्जों पर जीएसटी भी एक तरह का नियंत्रण ही है।

आवश्यक वस्तु अधिनियम कृषि उत्पाद का मूल्य और मात्रा को नियंत्रित करता है। एपीएमसी एक्ट कृषि उपजों की खरीद-फरोख्त की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें एकाधिकार, बिचौलिये और कमीशनबाजी हावी है। दुनिया के साथ भारत के किसानों के स्वतंत्र व्यापार को बाधित करने के लिए अनेक व्यापारिक प्रतिबंध हैं।

किसानों के कल्याण के लिए काम करने वाले अनेक विशेषज्ञ एवं नीति-निर्माताओं का मानना है कि भारतीय कृषि को धीरे-धीरे खोला जाना चाहिए। देश की आधी आबादी की आर्थिक स्थिति और पूरे देश की खाद्य सुरक्षा कृषि पर निर्भर है। इसलिए इस सेक्टर के लिए एक स्थिर व संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, न कि डिरेगुलेशन के झुनझुने की। वित्त मंत्री की हाल की घोषणाओं में न तो किसानों को स्वतंत्र करने के लिए कोई ठोस प्रगतिशील नीतिगत उपाय दिए गए और न ही किसी सुधार का रोड मैप है। इन घोषणाओं में सुर्खियां बटोरने के लिए केवल ‘पैकेज’ दिए जाने की औपचारिकता पूरी कर दी।

इसके अनेक कारण हैं। कृषि राज्य का विषय है। केंद्र सरकार ज्यादा से ज्यादा एक ‘मॉडल कानून’ बना सकती है, जिसे सभी राज्य अपनाएं। लेकिन इन्हें अपनाना है या नहीं, यह राज्यों के ऊपर है। केंद्र सरकार ने ‘लिबरलाईज़िंग लैंड लीज़ मार्केट्स एंड इंप्लीमेंटेशन ऑफ मॉडल एग्रीकल्चरल लैंड लीज़ एक्ट, 2016’ पारित करके ऐसा किया भी था। लेकिन यह कानून सत्ताधारी दल के नेतृत्व वाले राज्यों सहित बहुत कम राज्यों ने अपनाया। इसलिए ‘कैपिटल कंट्रोल’ हटाए जाने का उपाय सफल नहीं हो सका।

कृषि वस्तुओं की मार्केटिंग भी राज्य का विषय है। ‘केंद्र सरकार द्वारा किसान को अपना उत्पाद आकर्षक मूल्य में बेच पाने के पर्याप्त विकल्प प्रदान करने के लिए एक कानून बनाए जाने’ तथा ‘स्वतंत्र अंतर्राज्यीय व्यापार की बाधाओं’ को दूर किए जाने की घोषणा करते हुए, वित्तमंत्री जी यह बताना भूल गईं कि यह केवल एक मॉडल कानून होगा, जिसे अपनाना या न अपनाना राज्य के ऊपर निर्भर करेगा, जैसा कि लैंड लीज़ एक्ट में हुआ था।

केंद्र सरकार के लिए दूसरा विकल्प ‘समवर्ती सूची’ की वस्तुओं में आश्रय लिया जाना है, जिसमें ‘खाद्य सामग्री’, ‘रॉ कॉटन’, ‘रॉ जूट’ एवं ‘पशु आहार’ सूचीबद्ध हैं। उसके लिए भी संविधान के अनुच्छेद 301 के तहत एक और कानून को पारित करना होगा।

वित्तमंत्री ने घोषणा की है कि किसानों को प्रोसेसर्स, एग्रीगेटर्स, बड़े रिटेलर्स, एक्सपोर्टर्स आदि से जुड़ने के लिए एक सुविधाजनक कानूनी ढांचा बनाया जाएगा। यह कागज पर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन यह एक विस्तृत नीतिगत घोषणा है, जिसका कोई विवरण, रोडमैप या संस्थागत फ्रेमवर्क नहीं दिया गया है।

देश में फैली इस महामारी के दौरान, संसद या इसकी स्टैंडिंग कमेटी वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से भी काम नहीं कर रही हैं। कोई संवैधानिक निगरानी नहीं है। कोई भी विधेयक जन परामर्श के लिए नहीं रखा गया। इसलिए अध्यादेश लाने से कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं होगा। सरकार को संसद के मानसून सत्र में संपूर्ण कानूनी प्रारूप प्रस्तुत करना होगा। यह राज्यों से परामर्श लिए नहीं हो सकेगा। बिना संस्थागत प्रारूप के आनन-फानन में नीति थोपने का परिणाम वही होगा, जो बिना योजना के त्रुटिपूर्ण जीएसटी लागू करने का हुआ है।

‘प्राईस एवं ट्रेड कंट्रोल’ को आंशिक रूप से हटाया जाना भी आधा अधूरा उपाय है। कृषि को नियंत्रण मुक्त करने के लिए संपूर्ण ढांचा बदलना होगा। साथ ही लागत और पूंजी संबंधी नियंत्रणों को समाप्त करना होगा। इसके लिए काफी व्यापक योजना और संस्थागत ढांचे की जरूरत होगी। केंद्र सरकार द्वारा प्रारंभ की गई ई-नाम मंडियां बुनियादी ढांचे की योजना के अभाव में विफल साबित हुई हैं।

कोविड-19 के संकट में जब अर्थव्यवस्था संकट में है और किसानों को लागत के लिए पैसे की जरूरत है, ऐसे में उन्हें पुख्ता मदद दिए बिना अधूरी स्वतंत्रता देना उनका उपहास उड़ाने के बराबर है। अच्छा तो यह होता कि पहले उन्हें आर्थिक सहयोग दिया जाए और उसके बाद संस्थागत सुधारों की शुरुआत की जाए।

(लेखक तक्षशिला इंस्टीट्यूट, बैंगलोर में पब्लिक पॉलिसी का अध्ययन कर रहे हैं। लेख में अभिव्यक्त किए गए विचार उनके अपने हैं। लेख का इंग्लिश रूपांतरण सीएनएन न्यूज़18 में प्रकाशित हुआ था।)

 

चिलचिलाती धूम में सड़कों पर क्यों निकला किसानों का रेला?

मई की चिलचिलाती धूप में हरियाणा के किसानों का पार चढ़ गया है। राज्य के कई इलाकों में धान की खेती पर पाबंदियों के खिलाफ किसानों का गुस्सा सड़कों पर नजर आने लगा है। सोमवार को 45 डिग्री सेल्सियस  की गरमी में फतेहाबाद जिले के रतिया ब्लॉक में बड़ी संख्या में किसानों ने ट्रैक्टर मार्च निकाला। ट्रैक्टर पर काले झंड़े लगाकर निकले किसान धान की खेती पर आंशिक रोक का विरोध कर रहे थे।

इसी मुद्दे पर कांग्रेस ने भी किसानों को लामबंद करना शुरू कर दिया है। सोमवार को गुहला (कैथल) में कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला इसी मुद्दे पर किसानों के धरने में शामिल हुए। सुरजेवाला का कहना है कि खट्टर सरकार ने कुरुक्षेत्र और कैथल के किसानों की खेती उजाड़ने और आढ़ती व दुकानदार का धंधा बंद का फैसला कर लिया है। तानाशाही रवैया अपनाते हुए सरकार ने राज्य के 19 ब्लॉकों में धान की खेती पर पाबंदियां लगा दी हैं।

धान की खेती पर कहां-कितनी रोक?

हरियाणा सरकार ने भूजल स्तर में कमी वाले विकास खंडों में धान की बजाय मक्का, कपास, बाजरा और दलहन की खेती को बढ़ावा देने का फैसला किया है। इसके लिए गत 9 मई को मेरा पानी, मेरी विरासत” नाम की योजना शुरू की गई है। इस योजना के जरिए जिन ब्लॉकों में जलस्तर 40 मीटर से भी नीचे है, वहां एक लाख हेक्टेअर भूमि में धान की बजाय मक्का, कपास, बाजरा और दलहन की खेती करवाने का लक्ष्य रखा गया है।

मतलब, जल संकट को देखते हुए राज्य सरकार ने तय कर लिया कि किन इलाकों में पानी बचाना है और धान की खेती कुछ पाबंदियां लगानी पड़ेगी। मगर किसानों के साथ कोई राय-मशविरा किए बगैर!

40 मीटर से नीचे जलस्तर वाले ब्लॉक 

कैथल जिले के गुहला चीकासीवन ब्लॉक में किसान अपनी 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान की खेती नहीं कर सकेंगे। यही पाबंदी कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद, पीपली, बबैन, इस्माईलाबाद, फतेहाबाद जिले के रतिया और सिरसा जिले के सिरसा ब्लॉक में भी लगाई गई है।

40 मीटर से नीचे जलस्तर वाले 19 ब्लॉकों में किसान 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान की खेती नहीं कर सकेंगे। यानी पिछले साल जितनी भूमि में धान बोया था, इस साल उससे आधी जमीन में ही धान की खेती कर सकते हैं। इन ब्लॉकों में अगर किसानों ने 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान बोया तो कृषि विभाग से मिलने वाली कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी और न ही उनके धान की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद होगी। जबकि धान की जगह मक्का, बाजरा और दलहन उगाने के लिए सरकार एमएसपी पर खरीद की गारंटी दे रही है।

35 मीटर से नीचे जलस्तर वाले ब्लॉक

हरियाणा के जिन 26 ब्लॉकों में पानी 35 मीटर से नीचे है, वहां पंचायती जमीन पर धान की खेती की अनुमति नहीं मिलेगी। इनमें छह ब्लॉक कुरुक्षेत्र, तीन फतेहाबाद और दो कैथल जिले में हैं।

इतना ही नहीं, जिस भूमि पर पिछले साल धान की खेती नहीं हुई थी, वहां इस साल धान बोने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके अलावा जो किसान 50 हार्स पावर इलेक्ट्रिक मोटर से ट्यूबवैल चलाते हैं, वे भी धान की खेती नहीं कर सकेंगे।

पंचायती जमीन पट्टे पर लेने वाले जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला, यमुनानगर और सोनीपत के 8 ब्लॉकों के किसान भी धान की खेती नहीं कर सकेंगे।

धान छोड़ने पर प्रति एकड़ 7,000 रुपये का अनुदान  

धान छोड़कर अन्य फसलें उगाने के लिए हरियाणा सरकार किसानों को 7,000 रुपये प्रति एकड़ का अनुदान देगी। लेकिन यह अनुदान केवल उन किसानों को मिलेगा जो 50 फीसदी से कम क्षेत्र में धान की खेती करेंगे। अगर अन्य ब्लॉक के किसान भी धान की खेती छोडऩा चाहते हैं तो वे इसके लिए आवेदन कर सकते हैं। उन्हें भी अनुदान मिलेगा। लेकिन 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान छोड़कर कुछ और उगाना होगा। इसके लिए सरकार ड्रिप इरीगेशन सिस्टम पर 85 फीसद सब्सिडी दे रही है।

पिछले साल ही फेल हो चुकी है योजना- सुरजेवाला

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि ऐसी जालिम तो अंग्रेज सल्तनत भी नही थी जैसी BJP-JJP सरकार बन गई है। एक तरफ खट्टर सरकार दादूपुर नलवी रिचार्ज नहर परियोजना को बंद करती है, तो दूसरी ओर गिरते भूजल की दुहाई देकर उत्तरी हरियाणा खासकर कुरुक्षेत्र और कैथल के किसानों की खेती और चावल उद्योग को उजाड़ना चाहती है।

हरियाणा सरकार की योजना पर सवाल उठाते हुए सुरजेवाला कहते हैं कि पिछले साल भी धान की फसल की जगह मक्का उगाने की योजना 7 ब्लॉकों में शुरू की थी। इसके लिए प्रति एकड़ 2000 रुपये अनुदान, 766 रुपये बीमा प्रीमियम और हाईब्रिड सीड देने का वादा किया था। परंतु न तो किसान को मुआवज़ा मिला, न बीमा हुआ बल्कि हाईब्रिड सीड फेल हो गया।

अनुदान और भरोसा दोनों ही कम

उधर, फतेहाबाद जिले में उपायुक्त कार्यालय पर धरना देने पहुंचे किसानों का आरोप है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद सरकार ने धान की खेती पर रोक का फरमान जारी कर दिया है। धान की बजाय सरकार मक्का उगाने पर जोर दे रही है जबकि इन क्षेत्रों की मिट्टी और जलवायु मक्का के अनुकूल नहीं है। साथ ही राज्य सरकार ने 7,000 रुपये के अनुदान का ऐलान किया है जो बेहद कम है। भारतीय किसान यूनियन (अम्बावता) के अध्यक्ष ऋषिपाल अम्बावता का कहना है कि राज्य सरकार यह आदेश वापस ले नहीं तो बड़े आंदोलन के लिए तैयार रहे।

पिछले साल के अनुभवों की वजह से ही किसान धान की खेती छोड़ने को तैयार नहीं है जबकि राज्य सरकार का दावा है कि मक्का उगाने में प्रति एकड़ 5450 रुपये का फायदा है। किसानों की नाराजगी की एक वजह यह भी है कि हरियाणा सरकार ने किसानों के साथ विचार-विमर्श किए बिना ही धान पर पाबंदियां लगाने का निर्णय ले लिया। किसानों की इस नाराजगी को भुनाने के लिए कांग्रेस के नेता इस मुद्दे को जोरशोर से उठ रहे हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

लॉकडाउन में 84% तक गिरे टमाटर के भाव, मिट्टी में किसान की मेहनत

किसानों को परंपरागत फसलें छोड़कर फल-सब्जियां उगाने की सलाह बहुत दी जाती है। लेकिन इस साल टमाटर की जो दुर्दशा हुई है, उसे देखकर कोई भी किसान सब्जियां उगाने से पहले कई बार सोचेगा। हरियाणा सहित देश के कई राज्यों में टमाटर मिट्टी के मोल बिक रहा है तो कहीं मिट्टी में मिल रहा है। हालत ये है कि हरियाणा के भिवानी जिले के किसान लॉकडाउन के बीच अपने खेत में ही धरना देने को मजबूर हैं।

भिवानी जिले के खरकड़ी माखवान गांव में हफ्ते भर से धरने पर  बैठे किसानों में रमेश कुमार भी शामिल हैं जो कई वर्षों से टमाटर की खेती कर रहे हैं और बहुत से किसानों को इसके लिए प्रेरित कर चुके हैं। इस साल उन्हें नुकसान की भरपाई के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

आदर्श किसान माने जाने वाले रमेश कुमार असलीभारत.कॉम को दिल्ली की मंडी में बिके टमाटर की रसीद दिखाते हैं। उनका 131 कुंतल टमाटर 42 हजार रुपये में बिका। यानी 3.21 रुपये प्रति किलोग्राम। रमेश बताते हैं कि टमाटर की ढुलाई व अन्य खर्च जोड़ें तो प्रति किलोग्राम सिर्फ 1.82 रुपया हाथ में आया। छह महीने की मेहनत और प्रति एकड़ करीब 60 हजार रुपये की लागत का यह परिणाम किसी सदमे से कम नहीं है। ऐसे में धरने पर बैठने के अलावा उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझा। स्थानीय विधायक किरण चौधरी और इनेलो नेता अभय चौटाला ने धरनास्थल पर पहुंचकर इन किसानों को समर्थन दिया है। चौटाला कहते हैं कि वे इन मुद्दे को उठाएंगे।

हरियाणा के भिवानी जिले में टमाटर किसानों के धरने में पहुंचे इनेलो के नेता अभय चौटाला

नुकसान का गणित

टमाटर की खेती में नुकसान का गणित समझाते हुए किसान रमेश कुमार बताते हैं कि तुड़ाई, छंटाई और ढुलाई में ही करीब 4-5 रुपये प्रति किलोग्राम का खर्च आ जाता है। ऐसे में अगर मंडी में इतना ही भाव मिलेगा तो किसान खेतों से टमाटर तुड़वाएगा ही क्यों? यही हो रहा है। खरकड़ी माखवान क्षेत्र में करीब 600 एकड़ में टमाटर की खेती है, जिसमें से करीब 40 फीसदी फसल ही मंडी तक पहुंची और 15 फीसदी फसल ही बिक पाई। मजबूरी में किसानों को टमाटर की ट्रॉली वापस खेतों में ही खाली करनी पड़ी या फिर खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाना पड़ा।

दिल्ली की मंडी में किसान रमेश की टमाटर बिक्री की रसीद

आधे से ज्यादा गिरे दाम

हरियाणा ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना से भी टमाटर के कौड़ियों के भाव बिकने की खबरें आ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा में पिछले साल मई के महीने में टमाटर का औसत मंडी भाव 1514 रुपये प्रति कुंतल था जो इस साल मई में घटकर 773 रुपये प्रति कुंतल रह गया। यानी पिछले साल से आधा!

पिछले साल मई में मध्य प्रदेश में टमाटर का औसत भाव 1481 रुपये प्रति कुंतल था जबकि इस साल मई में औसत भाव 619 रुपये कुंतल है। यानी 58 फीसदी की गिरावट! यही हाल दिल्ली का है जहां पिछले साल मई में टमाटर का मंडी भाव 1570 रुपये प्रति कुंतल था जबकि इस साल मई में भाव रहा सिर्फ 720 रुपये। यानी 55 फीसदी से भी कम।

टमाटर का सबसे बुरा हाल तेलंगाना में है जहां पिछले साल मई में टमाटर औसत मंडी भाव 2729 रुपये प्रति कुंतल था जो इस साल मई में महज 435 रुपये कुंतल है। यानी 4.35 रुपये किलो!  पिछले साल से करीब 84 फीसदी कम। इसमें से खेती की लागत, ढुलाई और मंडी खर्च निकाल दें तो सोचिये किसानों को क्या बचा होगा?

स्रोत: https://agmarknet.gov.in

 

लॉकडाउन की मार

पिछले दो महीने से जारी लॉकडाउन के लिए देश भर में वस्तुओं की मांग और आपूर्ति प्रभावित हुई है। हालांकि, कृषि कार्यों और मंडियों को लॉकडाउन से छूट दी गई है लेकिन फिर भी सप्लई चेन प्रभावित हुई है जिसका असर टमाटर जैसी जल्द खराब होने वाली वस्तुओं पर ज्यादा पड़ रहा है। यही कारण है कि  फल-सब्जियां और फूल उगाने वाले किसानों का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। जबकि खरीद सुनिश्चित होने की वजह से गेहूं, धान और गन्ना उगाने वाले किसानों  की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है।

एक्सपर्ट कह सकते हैं कि टमाटर की खेती के साथ-साथ प्रोसिसंग यूनिट लगनी चाहिए। टमाटर के भंडारण की व्यवस्था होनी चाहिए। या फिर किसानों को सीधे उपभोक्ता तक पहुंच बनानी चाहिए। सुझाव के स्तर पर ये बातें अच्छी हैं लेकिन फिलहाल घाटा झेल रहे किसानों के किसी काम की नहीं हैं।

मंडियों से टमाटर वापस ले जाने को मजबूर किसान

टॉप और भावांतर दोनों फेल

केंद्र सरकार ने दो साल पहले टमाटर, आलू और प्याज के किसानों को कीमतों की मार से बचाने के लिए टॉप स्कीम का ऐलान किया था। लेकिन योजना बुरी तरह नाकाम रही है। हाल में कोराना राहत पैकेज के तहत टॉप स्कीम में सभी फल-सब्जियों को शामिल करते हुए 500 करोड़ रुपये की व्यवस्था की गई है। अब देखना है रमेश जैसे किसानों को इस योजना से कितनी मदद मिल पाती है।

दूसरी तरफ, हरियाणा सरकार भी भावांतर योजना के तहत किसानों के नुकसान की भरपाई कर रही है। इस योजना के तहत टमाटर के लिए 500 रुपये कुंतल का भाव तय किया गया है। यानी इससे कम भाव मिलने पर अंतर की भरपाई राज्य सरकार करेगी। किसान एक्टिविट रमनदीप सिंह मान का कहना है कि भावांतर योजना का फायदा किसानों तक पहुंचने में कई दिक्क्तें हैं। ना तो सभी किसानों को योजना की जानकारी है और फिर भावांतर के लिए टमाटर का भाव सिर्फ 500 रुपये प्रति कुंतल तय किया गया है। जो बहुत कम है। इसके लिए भी रजिस्ट्रेशन और तमाम प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

मतलब किसान को अगर 400 रुपये कुंतल का दाम मिला तो बाकी 100 रुपये कुंतल की भरपाई राज्य सरकार करेगी। यह मदद सिर्फ एक रुपये किलो बैठती है। जबकि किसान का नुकसान इससे कहीं ज्यादा है। यही वजह है कि भावांतर से हरियाणा के टमाटर किसानों को कोई खास मदद नहीं मिल पा रही है।

किसानों से कौड़ियों के भाव बिकने के बावजूद उपभोक्ताओं को टमाटर 15-20 रुपये किलो मिल रहा है। कृषि संकट का यह ऐसा पहलू है जहां किसान जागरूक भी है। मंडी तक पहुंच भी है। लेकिन सही दाम न मिल पाने की वजह से बेबस है।

 

 

गेहूं खरीद में पंजाब सबसे आगे, लॉकडाउन में भी 77% खरीद पूरी

पूरी दुनिया कोरोना संकट से जूझ रही है। महामारी की रोकथाम के लिए लागू हुए लॉकडाउन ने काम-धंधे ठप कर दिए हैं। लेकिन ऐसी विकट परिस्थतियों में खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था लोगों को सहारा दे रही है। देश के खाद्यान्न भंडार भरे पड़े हैं। यह संभव हो पाया है 60 के दशक में सुधरनी शुरू हुई सरकारी वितरण और खरीद प्रणाली के बूते।

लोगों को सस्ती दरों पर अनाज मुहैया कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की एजेंसियां किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी पर गेहूं व धान जैसी कई फसलों की खरीद करती हैं। इससे किसानों को फसल का उचित दाम और देश को खाद्य सुरक्षा मिलती है। इसमें राज्यों के साथ-साथ केंद्र सरकार की भी इसमें बड़ी भूमिका है।

इस साल जब महामारी फैलनी शुरू हुई तब गेहूं, धान व सरसों जैसे रबी फसलों की कटाई जोरों पर थी। लॉकडाउन के चलते सरकारी खरीद देर से शुरू हुई। हालांकि, कृषि और मंडी से जुड़े कामों को छूट दी गई थी। लेकिन जब सब कुछ बंद था तो फसल कटाई और सरकारी खरीद में भी कई अड़चनें आईं। फिर सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल भी रखना था।

आधी से ज्यादा गेहूं खरीद पूरी 

किसानों के साथ-साथ सरकारी खरीद तंत्र और मंडी व्यापारियों की तारीफ करनी होगी, जिनकी मदद से लॉकडाउन के बावजूद गेहूं खरीद का 56 फीसदी लक्ष्य पूरा हो चुका है। वह भी तब जबकि पूरा देश महामारी के खौफ, लॉकडाउन की मार और लेबर की किल्लत से जूझ रहा है।

चालू रबी सीजन के दौरान देश में 407 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें से 227 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है। इसमें सबसे बड़ा योगदान पंजाब और हरियाणा का है। अब तक हुई गेहूं खरीद में इन दो राज्यों ने 70% योगदान किया है, जबकि देश के कुल गेहूं उत्पादन में इनकी हिस्सेदारी करीब 30% है।

लॉकडाउन के बावजूद पंजाब में 104 लाख टन गेहूं खरीदा गया है जो 185 करोड़ टन के अनुमानित उत्पादन का करीब 56% और 135 लाख टन के खरीद लक्ष्य का 77% है।

5 दिन बाद खरीद शुरू करने वाले हरियाणा में करीब 56 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है, जो 115 लाख टन के अनुमानित उत्पादन का करीब 49% और 95 लाख टन के खरीद लक्ष्य का 59% है।

दरअसल, पंजाब-हरियाणा की मजबूत खरीद प्रणाली और मंडी व्यवस्था ही इन्हें इस मामले में बाकी राज्यों से अलग करती है। यह इन राज्यों में किसानों के लंबे संघर्ष का नतीजा है। सरकारी खरीद की वजह से किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिल पाता है। ऐसे समय जब किसान अपनी उपज कौड़ियों के भाव बेचने को मजबूर है, सरकारी खरीद प्रणाली पर दारोमदार बढ़ जाता है।

यूपी पिछड़ा, बिहार जीरो  

देश में सबसे ज्यादा गेहूं पैदा करने वाले उत्तर प्रदेश में अब तक 11 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है जो राज्य के कुल उत्पादन का महज 3% और 55 लाख टन के खरीद लक्ष्य का करीब 20% है। इससे भी बुरा हाल बिहार का है जहां गेहूं की खरीद जीरो है।

यूपी में जूट बोरियों की कमी को खरीद पिछड़ने की वजह बतायाा जा रहा है। इस वजह को नजरअंदाज भी कर दें तो इस साल उत्तर प्रदेश ने 55 लाख टन गेहूं की खरीद का लक्ष्य रखा है जो अनुमानित उत्पादन का सिर्फ 15% है। जबकि पंजाब में उत्पादन के मुकाबले 73% और हरियाणा में 83% गेहूं की खरीद का लक्ष्य रखा गया है। गेहूं खरीद के मामले में यूपी मध्य प्रदेश से भी पीछे है। 

मध्य प्रदेश में करीब 45 लाख टन गेहूं की खरीद हो चुकी है जो 190 लाख टन के अनुमानित उत्पादन का 24% और 100 लाख टन के खरीद लक्ष्य का 45% है। उधर, राजस्थान में अभी तक केवल 2.5 लाख टन गेहूं खरीदा गया है जबकि इस साल राज्य में करीब 100 लाख टन गेहूं के उत्पादन का अनुमान है। राजस्थान में उत्पादन के मुकाबले सिर्फ 17% गेहूं खरीदने का लक्ष्य रखा गया और अब तक 3% गेहूं की खरीद भी नहीं हुई है।

सरकारी खरीद पर अंकुश के प्रयास 

पिछले कई वर्षों से सरकारी खरीद पर अंकुश लगाने की कोशिशें जारी है। साल 2015-16 से 2019-20 के बीच देश में गेहूं खरीद केंद्रोंं की संंख्या करीब 25% घटी है। जबकि इस दौरान गेहूं का उत्पादन बढ़ा है। सरकारी खजाने पर बोझ घटाने के लिए केंद्र सरकार राज्यों को गेहूं व धान पर बोनस देने से भी रोकती रही है।

मौजूदा आपदा ने सरकारी खरीद पर अंकुल लगाने की नीति को गलत साबित कर दिया है। सोचिए, अगर अनाज भंडार भरे न होते तो मास्क और सैनिटाइजर की तरह खाद्यान्न की कालाबाजारी भी शुरू हो जाती।